गुरुवार, 21 जुलाई 2011

न्यायाधीशों का सत्यापन

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों के मुख्य सचिवों को निर्देश दिया है कि वे ऎसे नियम बनाएं जिसकी पालना में न्यायिक अधिकारियों की विस्तृत सत्यापन रिपोर्ट पुलिस द्वारा राज्य के उच्च न्यायालय को प्रस्तुत की जा सके और न्यायपालिका में आपराधिक चरित्र के व्यक्तियों का प्रवेश रोका जा सके। यह निर्णय सुप्रीम कोर्ट ने खाजिया मोहम्मद मुजाम्मिल, जो कि बेंगलुरू का जिला एवं सत्र न्यायाधीश था, की अपील को निस्तारित करते हुए दिया है। इस न्यायाधीश को वर्ष 2000 में नौकरी से इस आधार पर बर्खास्त कर दिया गया था कि कारवाड़ पुलिस स्टेशन में उसका नाम 8 जनवरी, 1993 की गुण्डाशीट में दर्ज था। मुजाम्मिल, लायर्स एसोसिएशन का अध्यक्ष था। वह "मजलिस-इसा-ओ तन्जिम" का जनरल सेक्रेटरी था। उसके विरूद्ध यह आरोप था कि वह कातिलों और लुटेरों को शरण देता था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में यह भी उल्लेख किया है कि मुजाम्मिल ने भड़काऊ और फिरकापरस्ती के भाषण दिए थे, जिनके कारण 1993 में भटकल में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे तथा उन दंगों में 19 व्यक्तियों की मृत्यु हुई थी तथा कई लोग घायल हुए थे। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने दो वर्ष तक मुजाम्मिल का गोपनीय प्रतिवेदन नहीं भरा था। एक मात्र प्रविष्टि गोपनीय प्रतिवेदन में 1997 में की गई थी, जिसके आधार पर मुजाम्मिल की परफॉरमेंस या कामकाज को संतोषजनक पाया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक अधिकारियों की गोपनीय रिपोर्ट में किस प्रकार अंकन किया जाए, के संबन्ध में भी टिप्पणी की है। यह निर्णय उस समय आया है, जब राजस्थान लोक सेवा आयोग को राजस्थान न्यायिक सेवा के सफल अभ्यर्थियों की सूची प्रकाशित करना है और राजस्थान उच्च न्यायिक सेवा का परिणाम घोषित होना है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को दृष्टिगत रखते हुए अब राजस्थान उच्च न्यायालय व राजस्थान सरकार को अविलंब न्यायिक अधिकारियों की विस्तृत सत्यापन रिपोर्ट के संबन्ध में नियम बनाना चाहिए। न्यायिक सेवा में प्रवेश देने से पूर्व अभ्यर्थी के चरित्र व अतीत के संबन्ध में पुलिस द्वारा विस्तृत छानबीन करना चाहिए। जांच करने वाला अधिकारी पुलिस अधीक्षक की श्रेणी का होना चाहिए तथा जांच रिपोर्ट के साथ उसका शपथपत्र संलग्न होना चाहिए कि जांच उसकी निजी जानकारी के अनुसार सही है। जांच का काम सामान्य पुलिसकर्मियों को सौंपना ठीक नहीं होगा। इस बाबत नीति जितनी जल्दी बन जाए, उतना अच्छा है। हर राज्य को ऎसी नीति बनाने की कार्यवाही करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की यह नई व्यवस्था ऎसी है कि उसे न्यायिक क्षेत्र की एक छोटी जरूरत या छोटी बात मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यदि किसी अधिवक्ता का चयन न्यायिक सेवा में हुआ है, तो जिस जिला न्यायालय में ऎसा अधिवक्ता प्रेक्टिस करता रहा है, उस न्यायालय के न्यायाधीश की रिपोर्ट भी ऎसे अधिवक्ता के चारित्रिक सत्यापन के संबन्ध में मांगी जा सकती है। न्यायिक अधिकारियों के चयन में पूरी सावधानी बरतना बहुत जरूरी है। एक भी गलत छवि का न्यायिक अधिकारी अगर न्यायपालिका का हिस्सा बनेगा, तो इससे न्यायपालिका की छवि ही खराब होगी। इस लिहाज से सुप्रीम कोर्ट की नई सक्रियता प्रशंसनीय है।

निष्कर्ष यही है कि न्यायिक सेवा में प्रवेश लेने वाले अभ्यर्थी कर्तव्यनिष्ठ और ईमानदार हों और इसके लिए उनके चरित्र व अतीत के संबन्ध में दी जाने वाली रिपोर्ट "केजुअल" नहीं होना चाहिए।
शिव कुमार शर्मा
पूर्व न्यायाधीश, उच्च न्यायालय, राजस्थान

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