शुक्रवार, 15 फ़रवरी 2013

जन्नत में बंधक सुर

अपनी क्रांतिकारी रचनाओं से रूढ़िवादियों के बीच उथल-पुथल मचा कर रख देने वाली कवयित्री ललदेद की कर्मभूमि कश्मीर में मध्यकाल से अधिक 21वींसदी में धर्मांधता की जकड़न दिखाई पड़ रही है।
 कश्मीर में लड़कियों के पहले संगीत बैंड प्रगाशा को कट्टरपंथियों ने संगीत का उजियारा फैलाने से पहले ही अंधेरे में धकेल दिया। गत वर्ष दिसंबर में बैंड प्रतियोगिता बैटल आफ बैंड्स में इस राक बैंड ने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन का खिताब जीता था। दसवींकक्षा में पढ़ने वाली तीन लड़कियों के इस बैंड से संगीत जगत को काफी उम्मीदें थीं। इनके गुरु अदनान मट्टू इनमें गजब की प्रतिभा देखते हैं, उन्हें भी दुख है कि चंद कट्टरपंथियों के कारण इन तीनों को संगीत की राह छोड़नी पड़ी।

नोमा नाजिर, फराह डीबा और अनीका खालिद के इस राक बैंड को निरंतर एसएमएस व सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिए बलात्कार व हत्या जैसी गंभीर धमकियां मिल रही थीं, सिर्फ इसलिए कि इन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र में कदम रखने की हिम्मत दिखाई। धमकियों के इस सुर में जब जम्मू-कश्मीर के प्रमुख मुफ्ती बशीरूद्दीन अहमद के फतवे का सुर भी शामिल हो गया तो इन अबोध लड़कियों के आगे संगीत का क्षेत्र छोड़ देने के सिवाए कोई रास्ता नहींबचा। इन लड़कियों को जिस अंदाज में तालिबानी किस्म की धमकियां दी गईं, उससे मलाला युसूफजई के साथ हुआ वाकया याद आ गया। मलाला ने पढ़ाई जारी रखने की अपनी जिद के कारण आतंकवादियों की गोली खाई। उसकी बहादुरी के चर्चे दुनिया भर में फैले और उसे नोबेल के शांति पुरस्कार के लिए नामित करने की भी खबर है।

 नोमा, फराह और अनीका ने गोली नहींखाई, बैंड छोड़ देने के कारण किसी किस्म की शारीरिक प्रताड़ना भी उन्हें नहींमिली, किंतु संगीत की नैसर्गिक प्रतिभा से जबरन मुंह मोड़ने के कारण और रूढ़िवादी धमकियों के कारण उन्हें जो मानसिक प्रताड़ना मिली है, उसकी पीड़ा भी लंबे समय तक सालती रहेगी। इन लड़कियों के साथ हुए अन्याय के दोषी केवल तालिबानी सोच के लोग नहींहै, बल्कि हमारी पूरी व्यवस्था, अक्सर मुंह बंद रखने वाला आत्मकेन्द्रित समाज और तथाकथित प्रगतिशील, उदारवादी लोग भी हैं।
 

हम अपने समाज के एक व्यापक हिस्से को उदारवादी मानते हैं, किंतु यह कैसी विडंबना है कि लाखों उदार लोगों पर चंद तंग सोच वाले अक्सर भारी पड़ जाते हैं। इनकी कट्टरवादी सोच के अनुरूप न चलने पर कभी जाति से बहिष्कृत किया जाता है, कभी उल जुलूल किस्म के फतवे जारी किए जाते हैं और कभी जान से मारने का हुक्म ही जारी कर दिया जाता है। उंगलियों पर गिने जाने लायक कट्टरपंथी कानून और संविधान के साथ मनचाहा खिलवाड़ करते हैं और सरकार, प्रशासन, समाज लाचार से देखते रह जाते हैं। अधिक से अधिक ऐसे लोगों के खिलाफ थोड़ी बहुत कानूनी कार्रवाई कर दी जाती है, लेकिन अब तक ऐसा माहौल बनाने में हमारी सरकारें और प्रशासनिक व्यवस्था नाकाम रही हैं, कि कोई नागरिकों के अधिकारों का हनन करने की जुर्रत न कर सके।

कश्मीर में लड़कियों को संगीत से दूर रहने की हिदायत दी जाती है, संगीत को इस्लाम के खिलाफ सर्वोच्च मौलवी बताते हैं, बाद में फतवा जारी करने की बात से मुकर भी जाते हैं। लेकिन दुख्तारन-ए-मिलात (डाटर्स आफ नेशन) के आसिया अंदराबी इस फतवे का समर्थन करते हैं। इस्लाम में संगीत की मनाही करने वालों के कानों में शायद इस उपमहाद्वीप के सैकड़ों गायकों के सुर नहींपड़े हैं, जो इस्लाम के साथ-साथ संगीत की भी इबादत करते हैं। ये लोग भारतीय संगीत में अमीर खुसरो के अतुलनीय योगदान से भी अपरिचित हैं। इनकी अनभिज्ञता का खामियाजा नोमा, फराह और अनीका जैसी कई अचीन्ही प्रतिभाओं को भुगतना पड़ रहा है।

ऐसा लगता है कि धीरे-धीरे शांति और सामान्य जीवन की ओर बढ़ रहे कश्मीर को तालिबानियों के हाथों बंधक बनाने की साजिश चल रही है। इसलिए कभी जनतांत्रिक चुनाव का विरोध होता है, तो कभी नागरिकों के सामान्य जीवन में बाधाएं डाली जाती हैं। फिलहाल इन लड़कियों को धमकी देने वालों के खिलाफ पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की है, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी लड़कियों के समर्थन में आगे आए हैं। लेकिन इस तमाम कवायद का फायदा तभी मिलेगा, जब संगीत की स्वर लहरियां लैंगिक भेदभाव के परे इस जन्नत में गूंजेगी।
(साभार-देशबंधु)

1 टिप्पणी:

  1. सार्थक और जरुरी पोस्ट आँखें खोलने में सक्षम अच्छी जानकारी आभार

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