रविवार, 21 सितंबर 2014

“कविजी”


मेरी कविताओं को पढ़कर कविजीबोले
"ये क्या लिखते हो तुम
कौन  पढता है आजकल यह सब!.
 
मुझे हैरान देखकर कविजी बोले
लिखो"  जरूर लिखो "!
"मगर पढनेवाले की पसंद"-नापसंद को जानो, समझो.
फिर ऐसा लिखो कि पढनेवाले को मजा आ जाये.
मैंने कहा कविजी, क्षमा कीजियेगा मैं किसी की पसंद और नापसंद पर कविता नहीं लिख पाता. कविता तो ह्रदय से निकलती है. किसी की पसंद-नापसंद पर लिखने से तो बनावटी कविता या तुकबन्दियाँ ही बन पाती हैं. वह कविता कहाँ बन पाती हैं!.
कविजी बोले मूर्ख तुम आगे नहीं बढ़ पाओगे, तुम कवि नहीं बन पाओगे.
 “अगर तुम्हें कवि बनना है, आगे बढ़ना है तो तुम्हें किसी बड़े कवि, लेखक नेता , या बिजनेसमैन की प्रशंसा में लिखो.
उनके स्तुतिगान लिखो तब कहीं जाकर तुम्हे उनका आशीर्वाद प्रशस्ति पत्र और पुरस्कार के रूप में मिलेगा, सम्मान के रूप में मिलेगा और तब जाकर तुम कवि बन पाओगे क्योंकि आजकल बिना किसी प्रशस्तिपत्र या पुरस्कार के मिले बिना कोई कवि नहीं बन पाता है.

यह सब सुनकर मैं भलीभांति समझ चुका था की मैं कभी कवि नहीं बन पाऊंगा.........
 
कृष्ण धर शर्मा 9.2014

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