रविवार, 29 मई 2016

दुःस्वप्न


पत्नी को नहीं पसंद आता है अब
कच्ची घानी का सरसों तेल
नहीं पसंद आता है चक्की का पिसा आटा
नहीं पसंद आता है अब
घरेलू नाश्ता या खाना बनाना
नहीं भाता है अब हलवा या पोहा
चीला या दालपूरी या कढ़ी
भाते हैं अब इडली और दोसे
चाइनीज, पास्ता और बर्गर
नहीं पसंद आता है अब
घर में मेहमानों का आना
या फिर अपने पुराने दोस्तों को
मिलना या अपने घर बुलाना
नहीं पसंद आता है
अपने प्रियजनों को कुछ भी देना
नहीं पसंद है मेरी दयालुता
किसी भी जीव के प्रति
नहीं पसंद है मेरी मेहनत और  
मेरी ईमानदारी की नौकरी
नहीं पसंद है मेरी मूछें भी
तो फिर बचा क्या है अब मुझमें!
अचानक खुल जाती मेरी नींद
पसीने से तरबतर शरीर
और बेकाबू होती धडकनों को
सँभालते हुए याद करता हूँ
वह भयावह दुस्वप्न
जिसने मेरी तो जान ही ले ली थी

                  (कृष्ण धर शर्मा, २०१६)

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