सबसे पहले हम अपने पाठकगण से यह कह देना आवश्यक समझते हैं कि ये
महाशय जिनकी चिट्ठी हम आज प्रकाशित करते हैं रत्नधाम नामक नगर के सुयोग्य
निवासियों में से थे। इनको वहाँ वाले हंसपाल कहकर पुकारा करते थे। ये बिचारे मध्यम
श्रेणी के मनुष्य थे। आय से व्यय अधिक होने के कारण सदा दुःख में रहते। पर फिर भी
चित्त को नहीं रोक सकते थे, इसलिए
ऋण लेकर काम चलाते। एक ठौर वह स्वयं अपनी चिट्ठी में लिखते हैं कि, ‘मैं व्यापार मंद हो जाने के कारण शीघ्र
ही दरिद्र हो गया।’ और जब इन पर अत्यन्त तगादा होने लगा तो इन्होंने अपनी जान
बचाने के लिए मूसे के बिल के समान कोई संरक्षित स्थान न पाकर इस पृथ्वीतल को छोड़
देने के लिए मन में ठान लिया।
उस चिट्ठी की नक़ल यह है—
ज्योतिष विद्यालय के सभापति महाशय!
कदाचित् आप महाशयों को स्मरण होगा कि रत्नधाम नगर में एक हंसपाल नामक
शिल्पकार भाथी बनाने वाला रहा करता था, जो कि और तीन मनुष्यों के साथ वहाँ से न जाने कहाँ अलोप हो गया था।
ये चार आदमी किस रीति से कहाँ चले गए सो किसी की भी समझ में न आया। अब क्षमा पाने
की आशा पर मैं लिखता हूँ कि मैं ही वह हंसपाल नामक मनुष्य हूँ। मेरे सहवासी इससे
भली-भाँति अभिज्ञ होंगे कि चालीस वर्ष लों मैं सौर किरीट नामक मुहल्ले में एक छोटे
से घर में निवास करता था। मेरे पूर्वज भी न जाने किस समय से इसी घर में रहते आते
थे और इसी भाथी मरम्मत करने के चलते व्यापार में दृढ़ता से लगे रहते थे।
परंतु शीघ्र ही राजनीतिक स्वतंत्रता तथा मनुष्य समाज संशोधकों की
बड़ी-बड़ी वक्तृताओं का प्रभाव हम सबके व्यापार पर पड़ने लगा। जो लोग पहले अच्छे
ग्राहकों में से थे, अब
उनको हमारे तक आने का अवकाश भी नहीं मिलता था। मैं शीघ्र अतिशय कंगाल हो गया। मुझे
अपनी स्त्री तथा बाल-बच्चों के लिए भोजनादि का जुहाना असहनीय दिखाई देने लगा। और
मुझे अब नित्य यही चिंता बनी रहती कि क्योंकर इस जीवन से छुटकारा पाऊँगा। इसी बीच
में तगादगीरों का इतना तगादा आरंभ हुआ कि साँस लेना भी कठिन हो गया। मेरा घर
प्रात:काल से लेकर रात्रि के समय तक इन लोगों से घिरा रहता था। परंतु तीन मनुष्य
विशेषत: मुझे कष्ट देते और नित्य मेरे द्वार पर बने रहते थे, तथा नियमानुसार मुझे दंड दिलाने की
धमकी देते थे। मैंने अपने मन में दृढ़ प्रतिज्ञा कर ली थी कि जब कभी ये मेरे पंजे
में आ जाएँगे, इनसे
अवश्य बदला लूँगा और केवल इसी आशा के भविष्यत् आनंद ने मुझे स्वयं प्राणघात करने
से रोका था। अब जहाँ तक हो सकता था,
मैं अपने क्रोध को छिपाता था और नम्रतापूर्वक उन्हें शीघ्र
कौड़ी-कौड़ी चुका देने का भरोसा दिया करता था।
एक दिन संयोगवश मैं उनसे पीछा छुड़ा बड़ी व्याकुलता से एक गली में
निष्प्रयोजन घूम रहा था, कि
अकस्मात् मैं एक पुस्तक की दुकान के सामने आ खड़ा हुआ और एक कुर्सी पर, जो कि पास ही ग्राहकों के लिए रखी हुई
थी, मैं बैठ गया और
फिर निष्प्रयोजन एक पुस्तक उठा देखने लगा। यह एक ज्योतिष-विद्या की छोटी-सी पुस्तक
निकली, जिसको बर्लिन
नगर के एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक ने लिखा था।
उस पुस्तक-भर में कुछ ऐसी बातें थीं जिनका एक अद्भुत प्रभाव मेरे
हृदय पर पड़ा। और ज्यों-ज्यों मैं उस विषय पर अधिक सोचता था मेरे हृदय में उसकी
रुचि बढ़ती ही जाती थी।
प्रात:काल उठ आवश्यक क्रियाओं से छुट्टी पा मैं फिर पुस्तक की दुकान
को चला गया और मैंने दो-तीन पुस्तकें शिल्प विद्या तथा ज्योतिष विद्या की मोल ले
लीं। और घर पहुँचकर मैं इन्हीं पुस्तकों के पढ़ने में लवलीन हो गया। शीघ्र ही मैं
इन विद्याओं में ऐसी दक्षता को प्राप्त हो गया कि मैं अपने एक विशेष उद्देश्य में
अपने को पहले ही से सफल विचारने लगा। इस बीच में मैं उन तीन महाजनों को
धीरज-दिलासा देता रहा और बड़े यत्न से मैंने अपना थोड़ा माल असबाब बेचकर उन्हें
कुछ रुपया दे प्रसन्न कर लिया। बाक़ी के लिए मैंने उनसे प्रतिज्ञा की कि मैंने एक
उपाय सोचा है, उसमें
कृतकार्य होने पर वह भी चुका दूँगा और उनको प्रसन्न तथा सन्तुष्ट रखने के लिए
मैंने उस काम में उनसे सहायता के लिए प्रार्थना की। इस ढंग से मैंने उनको राज़ी कर
लिया।
इस प्रकार सब प्रबंध करके मैंने अपनी स्त्री को भी इस काम में
सन्नद्ध कर लिया और सब बात गुप्त रखने के लिए उसको चेता दिया। तब मेरे पास जो कुछ
माल असबाब शेष रह गया था, उसे
बेचना आरंभ किया, और
झूठे बहानों पर भिन्न-भिन्न पुरुषों से ऋण लेने लगा। यों द्रव्योपार्जन करके मैंने
बढ़िया कमरखी मलमल के बारह-बारह गज़ के टुकड़े मोल लिए, तथा सुतली की डोरियाँ, डालियों के बने हुए बड़े तथा गहरे
टोकरे, बढ़िया बारनिश।
सारांश यह कि एक बड़े बेलून के लिए जिन-जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती है उन्हें
जुहा लिया। यह सब सामग्री मैंने अपनी स्त्री को दे उसे बनाने की रीति इत्यादि से
भलीभाँति विज्ञ कर दिया। इस बीच में मैंने उन डोरियों से बटकर बड़े-बड़े रस्से
तैयार किए और फिर उन यन्त्रों तथा पदार्थों को मोल लेकर जुहाने लगा जिनकी आवश्यकता
ऊपरी वायुमंडल के जाँचने के लिए पड़ती थी। तब रत्नधाम से कुछ दूरी पर एक एकांत
स्थान पर पाँच बड़े-बड़े पीपे, टीन
की दस फुट लंबी छ: नलियाँ, एक
धातु संबंधी पदार्थ-विशेष (जिसका नाम हम अभी नहीं लिखेंगे) और कई भाँति के तेज़ाब
रखवा दिए। इन तेज़ाबों से जो गैस मैं बनाने को था, उसके समान गैस आज पर्यंत कभी किसी ने नहीं बनाया था और कभी किसी ने
उससे यह काम लेने का विचार भी नहीं किया था। यह एक बेर स्वरूप परिवर्तन करके फिर
पूर्व स्वरूप धारण नहीं कर सकता था। और इसकी घनता (Density) लोग हाइड्रोजिन से 37.4 गुना कम जानते थे। जिस स्थान पर मैंने छोटे
पीपे बेलून में गैस तैयार हो लेने तक रखने चाहे थे, उसी के समीप ही मैंने कई एक गड़हे खोद दिए। और इन छोटे गड़हों के बीच
में जो एक बड़ा गड़हा था, उसे
मैंने कुछ अधिक गहरा खोदा था। इन पाँच छोटे गड़हों में मैंने पचास-पचास पाउंड, तथा बड़े में एक सौ पचास पाउण्ड, बारूद रख दिया और इन गड़हों को एक
रस्सी द्वारा मिला रखा और उसके एक सिरे पर एक बड़ी दियासलाई रख दी, जिसका एक मुँह कुछ मिट्टी से ऊपर
निकलता था, और
बाकी सब ढक दिया गया था। इन सब को ठीक करके ऊपर से पीपे रख दिए। इन सामग्रियों के
अतिरिक्त मैंने ग्रीम का बनाया हुआ वायु के ज़माने का नवीन यंत्र वहीं एक कोने में
छिपा दिया। इस यंत्र का मुझे बहुत कुछ परिशोधन करना पड़ा, तब यह मेरे काम का हुआ। मेरा बेलून
शीघ्र बनकर तैयार हो गया। प्रत्येक वस्तु जुह जाने पर मैंने अपनी स्त्री से शपथ ले
ली कि वह यह भेद किसी से न कहेगी,
और मैंने भी उससे प्रतिज्ञा की कि मैं भी शीघ्र लौट आने की चेष्टा
करूँगा। फिर जो थोड़ा-सा रुपया मेरे पास बच गया था उसे दे मैं उससे विदा हुआ। जब
मैं उससे विदा हुआ उस समय रात्रि बड़ी अँधेरी थी। और उन तीनों महाजनों की सहायता
से बेलून तथा कार इत्यादि को लिए हुए उस स्थान पर पहुँचा जहाँ दूसरी सामग्री रख दी
थी। और उन सबको ज्यों का त्यों पाकर अपने काम में प्रवृत्त हो गया। उस दिन अपरैल
महीने की पहिली तारीख़ थी (जिसे ईसाईमत वाले ‘फूल्स डे’ भी कहते हैं) कोई चार घंटे
के समय में मैंने देखा कि बेलून यथोचित गैस से फूल गया है। तब मैंने कार को उसमें
बाँध दिया और इसमें एक टेलिस्कोप,
एक बैरोमीटर, और
एक थर्मोमीटर, एक
एलोक्ट्रोमीटर, एक
परकाल, एक दिग्दर्शक, एक सेकंड बतलाने वाली घड़ी, एक घंटी, एक तुरही, एक
वायुशून्य शीशे का गेंद, जिसका
मुँह कार्क से भलीभाँति बंद कर दिया था, एक वायु जमाने का यंत्र, पीने का बहुत-सा पानी,
और अपने भोजन इत्यादि के पूरे सामान से उसको परिपूर्ण कर लिया और
इसमें एक बिल्ली और एक जोड़ा कबूतर भी मैंने रख लिए थे।
अब प्रात:काल का समय आ पहुँचा था, क्योंकि पौ फटे देर हो चुकी थी। मैंने सोचा कि अब विलंब न करना चाहिए
और चल देना ही परमोत्तम होगा। भूमि पर एक सुलगता हुआ सिगार स्वयं गिराकर और फिर
उसको उठाने के बहाने से झुककर मैंने दियासलाई में आग लगा दी। तत्क्षण कूदकर मैं
कार में जा बैठा और फिर उस रस्सी को जो मेरे बेलून को पृथ्वी के संग बाँधे थी, शीघ्र काट दिया। इसके काटते ही एक झपकी
मात्र में मेरा बेलून पृथ्वी से ऊपर की ओर अत्यंत शीघ्रता से चढ़ गया। मेरे ऊपर
चढ़ते समय बेरोमीटर तीस इंच और थर्मामीटर 19 डिगरी पर था। मेरा बेलून अभी 50 गज़
भी ऊँचा न चढ़ा होगा कि पीछे आग का भभका बड़ी भयानक रीति से आता दिखलाई पड़ा। और
फिर उसमें मिट्टी, कंकड़
इत्यादि भी उड़ते दिखलाई पड़े। यह भयंकर दृश्य देखकर मैं ऐसा भयभीत हुआ कि कार में
गिर पड़ा और मारे भय के काँपने लगा। पड़ा-पड़ा चित्त में विचारता रहा कि यदि इसी
प्रकार मैं भयभीत हूँगा तो काम कैसे चलेगा। क्योंकि यह तो अभी श्रीगणेश ही है। जब
मैं कुछ चैतन्य हुआ तो समझ गया कि यह सब उपद्रव उस बारूद के उड़ने की धमक से था
जिसे मैंने उन पीपों में पृथ्वी के तले उन दुष्टों के प्राणवध के हेतु रख दिया था
और जिसमें मैंने जानकर ऊपर उड़ती समय आग लगा दी थी। बेलून पहले तो सिमटा, पर शीघ्र ही फैलकर गोलाकार हो गया। फिर
बड़ी तेजी से चक्कर खाने लगा। और अंत में एक मतवाले के समान लड़खड़ा-लड़खड़ाकर ऐसी
शीघ्रता से घूमने लगा कि मैं कार की एक कोर पर मुँह के बल बड़े जोर से गिरा और एक
रस्सा जो वहीं पड़ा था उसी में मैं बझ गया। उस समय मेरी दशा जैसी भयंकर थी उसका
यथायोग्य ध्यान में लाना सर्वथा असंभव है। मैं घबरा-घबरा कर साँस लेने को मुँह
बाता था। किसी पीड़ित व्यक्ति के समान मेरी नस-नस टूट रही थी। जान पड़ता था कि
नेत्रों से ढेले निकले पड़ते हैं। और रह-रहकर मेरा जी ऐसा मचलता था कि मैं व्याकुल
हो जाता था। इसके पश्चात मैं मूर्च्छित होकर गिर पड़ा और अचेत हो गया। इस रीति से
मैं कोई 15 मिनट लों लटका झूलता रहा। इतनी बेर लों लटके रहने से जो रक्त मेरे सिर
में एकत्रित हो गया था, अब
अपने उचित मार्ग में जाने लगा। अब मैं फिर एक बेर बड़े वेग से ऊपर उछला और फिर उसी
कोर को पकड़कर कलैया खाने लगा और ऐसा करता-करता सिर के बल कार के बीच में बड़े
ज़ोर से गिरा। कुछ कालोपरांत जब मैं सँभला तो बेलून की चिंता पड़ी और ध्यानपूर्वक
इधर-उधर देखने से मालूम हुआ कि वह प्रत्येक विषय में दुरुस्त है। कहीं कुछ बिगड़ा
नहीं है। मेरे यंत्र बोझे तथा भोजनादि सभी संरक्षित हैं, क्योंकि मैंने उन सबको अपने-अपने स्थान
पर ऐसी सावधानी से रखा था कि एक ऐसी छोटी घटना से उनमें कुछ हानि नहीं पड़ सकती
थी। इस समय मैंने अपनी घड़ी निकाली और देखने पर मालूम हुआ कि छ: बजा है। मेरा
बेलून बड़े वेग से ऊपर चढ़ रहा था और बेरोमीटर देखने से जान पड़ा कि हम लगभग साढ़े
तीन मील ऊपर चढ़ आए हैं। नीचे देखने से ठीक मेरे बेलून के तले समुद्र में एक छोटा
काला पदार्थ देख पड़ा जिसका आकार लम्ब के समान था। मैंने शीघ्र ही टेलीस्कोप
निकाला और तब मालूम हुआ कि वह पदार्थ एक जंगी जहाज है और उसके चारों ओर जलामयी
दिखलाई देती है। कहीं पृथ्वी नाम मात्र को भी नहीं दिखाई देती।
तीन-साढ़े तीन मील की ऊँचाई पर पहुँचकर मैंने अपने कार से कुछ बोझ
नीचे फेंका, पर
उससे मेरे बेलून का वेग न बढ़ा। अबलों मुझे कोई शारीरिक पीड़ा नहीं मालूम होती थी।
स्वतंत्रतापूर्वक मैं साँस लेता था और सिर में भी कोई पीड़ा नहीं जान पड़ती थी।
बिल्ली भी मेरे कोट पर बड़े आनंद से बैठी थी और कनखियों से कबूतरों को देख रही थी।
इन कबूतरों के पैर मैंने बाँध दिए थे कि जिससे वे भाग न जाएँ और वे सब भी बैठे
दाने चुग रहे थे जो मैंने उनके लिए कार में फेंक दिए थे।
साढ़े 6 बजे बेरोमीटर देखने से मालूम हुआ कि मैं लगभग 5 मील ऊँचे चढ़
आया हूँ। मैं यह जानकर बड़ा प्रसन्न हुआ। रेखागणित की गणना से मैं जान सकता था कि
पृथ्वी का कितना क्षेत्रफल मेरी दृष्टि के सामने था। सारे भूगोल का सोलहवाँ हिस्सा
मैं देख रहा था। समुद्र एक स्वच्छ दर्पण के समान मुझे देख पड़ता था। जहाज़ जो
मैंने अभी देखा था, उसका
अब कहीं पता न था। अब ठहर-ठहर कर मेरे सिर में कुछ पीड़ा मालूम होने लगी और
विशेषकर कानों के समीप बहुत पीड़ा थी। पर तिस पर भी मैं स्वतंत्रतापूर्वक साँस ले
रहा था। मेरे कबूतर और बिल्ली भी दु:खी नहीं दिखाई देती थीं।
अब मैं बड़े वेग से ऊपर चढ़ रहा था और सात बजे बेरोमीटर देखने से
मालूम हुआ कि मैं नौ-साढ़े नौ मील से ऊपर निकल आया हूँ। अब मुझे साँस लेने में
बड़ी कठिनाई जान पड़ने लगी। मेरे सिर में भी अब बड़ी पीड़ा थी। अपने गालों पर कुछ
चिपचिपाहट का बोध होने पर हाथों से टोने से मालूम हुआ कि कान के पर्दो से
रुधिर-प्रवाह जारी है। इस समय केवल अविचार से मैंने पंद्रह पौंड का बोझ नीचे गिरा
दिया। इससे बेलून का वेग अधिकतर बढ़ गया और मुझे इससे भी अधिक पतले वायुमंडल में
ले गया, जिसका परिणाम
मेरे उद्योग के लिए नाशक हुआ, तथा
मेरे लिए भी प्राणघातक सरीखा निकला।
मैं पाँच मिनट तक बिलकुल बेसुध रहा। मेरी नस-नस जकड़ गई थी। और जब
इसमें कुछ कमी भी हुई तो बड़ी देर के बाद साँस लेता था और वह भी हाँफता हुआ मुँह
खोल के तब कहीं साँस ले सकता था। अब मेरी नासिका तथा मेरे नेत्रों से भी रुधिर बह
रहा था और प्रवाह बड़े वेग से निकलता जाता था। कबूतर भी बड़े दुःख में थे और भाग
जाने की चेष्टा कर रहे थे। बिल्ली बड़ी दीनता से म्यूँ-म्यूँ कर रही थी। उसकी जीभ
मुँह से बाहर लटक रही थी, मानो
किसी विष के प्रभाव से इधर-उधर लड़खड़ा रही हो। अब उस बोझ के फेंक देने की मूर्खता
स्वयं मुझे खटकने लगी। अब मुझे मृत्यु एक-एक क्षण में आती देख पड़ती थी। शारीरिक
पीड़ा तथा दु:ख के प्रभाव से न तो मैं अपने बचने की चेष्टा कर सकता था और न कोई
युक्ति सोच सकता था। मेरे सिर की पीड़ा प्रतिक्षण बढ़ती ही जाती थी। अब मुझे पूरा
विश्वास हो गया कि कुछ कालोपरांत मैं उन्मत्त हो जाऊँगा। मैं कार में पड़ा अपना
चित्त एकाग्र कर रहा था कि मुझे यह ध्यान आया कि किसी प्रकार देह में से कुछ रुधिर
निकाल दूँ। मेरे पास कोई शलाका न थी जिससे यह काम सहज से करता, इसलिए अपनी छुरी से मैंने अपनी बाई
बाँह की एक रग काट दी। रुधिर प्रवाह का निकलना था कि मुझे एक प्रकार का सुख मिलने
लगा और थोड़ी देर में जब एक कटोरा रुधिर से भर गया तो मेरी पीड़ा बहुत कम हो गई।
अभी मैंने पैरों के बल उठने की चेष्टा न की थी। अपने घाव को भली प्रकार चिथड़े से
बाँधकर मैं लेट रहा। कोई पाव घंटे लेटे रहने के उपरान्त जब मैं उठा तो मुझे किसी
प्रकार की पीड़ा नहीं मालूम देती थी। साँस लेने का दुःख बहुत कम हो गया था और
मैंने विचारा कि अब मुझे शीघ्र ही वायु ज़माने के यंत्र द्वारा सहायता लेनी
पड़ेगी। मेरी बिल्ली मेरे कोट से सटी बैठी थी। जब मैं पीड़ित कार में पड़ा था, मेरी बिल्ली ने तीन बच्चे जने। यह
देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। यह तीन जीव मानो मेरे साथी यात्रियों की संख्या में
परमेश्वर की ओर से बढ़ाए गए। पर जो कुछ हो, मैं इस संख्या वृद्धि पर प्रसन्न था। मेरा यह विचार था कि पृथ्वीतल
पर जो वायु का दबाव मनुष्य-देह पर पड़ता है, उसमें कमी होना ही मानो इन नाना प्रकार के दुःख-पीड़ाओं का कारण है।
और अब यदि इन बच्चों को कुछ पीड़ा हुई तो मैं समझूगा कि मेरा विचार मिथ्या है।
आठ बजे के उपरांत मैं भूमितल से सत्रह मील ऊपर चढ़ आया था, जिससे मुझे मालूम हुआ कि मेरे बेलून का
वेग अब बहुत बढ़ गया है और यह भी सिद्ध था कि यदि मैं उन बोझों को नीचे न फेंकता, तो भी वेग की कुछ वृद्धि अवश्य होती।
रह-रहकर मेरे सिर पर कान में बहुत पीड़ा मालूम देती थी। और मेरी नासिका से रुधिर
भी बहने लगता था। पर पहले से अब पीड़ा बहुत कम थी। मैं शीघ्र शीघ्र साँस लेता था
और प्रति बार साँस लेने में मुझे छाती जकड़ने की पीड़ा जान पड़ती थी। अब मैंने
कनडेन्सर, हवा
को जमाने अथवा घनी करने वाला यंत्र निकाला और उसे शीघ्र काम करने के योग्य बना
दिया।
उन कबूतरों को इस समय बड़ी पीड़ा में देख उनको स्वतंत्र कर देने का
मेरा विचार हुआ। इसलिए मैंने एक का बंधन खोला और उसको विकर वर्क के कोर पर धर
दिया। वह बड़ा बेचैन जान पड़ता था और अचम्भे से अपने चारों ओर देख रहा था। कभी पंख
फड़फड़ाता, कभी
गुटक-गुटक कर बोलता था। यह सब कुछ करने पर भी वह कार को छोड़कर बाहर नहीं जाया
चाहता था। अंत में मैंने उसे उठा लिया और अपने बेलून से कोई छ: हाथ की दूरी पर
बड़े वेग से लोका दिया। उसने नीचे उतरने की कोई चेष्टा न की और मेरे पास आ जाने का
बड़ा उद्योग करता रहा और साथ ही बड़े ज़ोर से चीख़ता जाता था। अंत में बेलून के
कोर तक पहुँचने में वह कृतकार्य हुआ। पर ज्यों ही उस पर बैठा था कि उसका सिर उसकी
छाती पर गिरा और वह मुर्दा हो कार में गिर पड़ा। यह विचार कि कहीं यह भी इसी
प्रकार फिर मेरे पास न लौट आएँ,
मैंने दूसरे को नीचे की ओर अपने पूरे बल से फेंक दिया और यह देखकर
मैं बड़ा प्रसन्न हुआ कि वह बड़े वेग से पंख मारता हुआ नीचे चला जा रहा है। कुछ
काल में वह दृष्टि से लोप हो गया और मुझे पूरा विश्वास हो गया कि वह बिना किसी
विघ्न के घर पहुँच गया होगा। बिल्ली ने, जो कि अब किसी प्रकार पीड़ित नहीं जान पड़ती थी, इस मुए कबूतर को बड़ी रुचि से खाया और
खा-पीकर सो रही। उसके बच्चे बड़े हर्षित देख पड़ते थे और किसी प्रकार दुखित नहीं
जान पड़ते थे। सवा आठ बजे मैंने देखा कि मैं बिना अत्यंत कष्ट के साँस नहीं ले
सकता। इसलिए कण्डेंसर यंत्र को मैंने अपने कार के चारों ओर लगाया। अब मुझे आवश्यक
जान पड़ता है कि मैं आप महाशयों को इस यंत्र का कुछ वर्णन सुनाऊँ। कार को इस
प्रकार इस गढ़बंदी द्वारा घेर देने से मेरा तात्पर्य यह था कि मैं इस यंत्र द्वारा
इस गढ़बंदी में बाहर से वायु इकट्ठा करूँ और उसको साँस लेने के योग्य जमा लूँ। इसी
अभिप्राय से मैंने एक पुष्ट, एयर
टाइट और लचीला थैला बनाया। इस बड़े थैले में मानो एक प्रकार से सारा कार रख दिया
गया, कार के मानो इस
दीवार में तीन ओर तीन शीशे की खिड़कियाँ थीं, जिनसे बाहर के हर एक पदार्थ मैं भली प्रकार देख सकता था। कार के
पेंदे के पास उस ढँपने में एक चौथी खिड़की थी। इससे मैं ठीक अपने नीचे समकोणगामी
देख सकता था, पर
अपने ऊपर शिरोबिन्दु को मैं नहीं देख सकता था और उस स्थान पर वस्त्र में चूनन होने
के कारण मैं शीशा भी नहीं लगा सकता था। बगल की एक खिड़की के कुछ नीचे एक गोल छेद, जिसका व्यास तीन इंच था, कर दिया गया था। कंडेंसर यंत्र की बड़ी
नली इस छेद में पेंच द्वारा कस दी गई। इस यंत्र में जो वायुशून्य स्थान बना दिया
गया था, उसमें इस नली
द्वारा निकटवर्ती वायु का प्रवेश होता था और उस शून्य स्थान में जमकर चारों ओर कार
में वह फैल जाता था। यही उपाय कई बेर करने से कार में इतना वायु एकत्र हो गया था
कि जो साँस लेने के लिए बहुत था। पर इस छोटे से घिरे हुए स्थान में शीघ्र यह वायु
गंदा हो जाता, क्योंकि
फेफड़े से बराबर संयोग होने से यह वायु कुछ समयोपरांत अवश्य प्राणनाशक हो जाता। इस
कारण नीचे के एक वाल्ब ढकने से यह गंदा वायु निकाल दिया गया, क्योंकि कार में का सघन वायु बाहर के
पतले वायु से शीघ्र जा मिला। कार के पूर्णतया वायुशून्य न हो जाने के भय से इसकी
सफ़ाई एक बेर पूरी नहीं की जाती थी। वाल्व का ढकना एक बेर कुछ क्षण खुले रहने के
पश्चात् फिर ढाँप दिया जाता था और इसी बीच में कंडेंसर के पंप द्वारा बाहर से वायु
आ जाता था। परीक्षा लेने के विचार से मैंने बिल्ली तथा उसके बच्चों को एक टोकरे
में धरकर कार के बाहर लटका दिया था। पर वाल्ब के ढकने (वह ढकना जो एक ओर खुले, उसे वाल्ब कहते हैं) के समीप ही मैंने
इसे लटकाया था, इस
विचार से कि यदि आवश्यकता पड़े तो शीघ्र भीतर ले लूँ। ज्यों ही कि बाहर से सघन
वायु भीतर प्रवेश करता था, यह
लचीला ढकना आप ही फैल जाता था। यह प्रबंध करने के उपरांत घड़ी देखने से मालूम हुआ
कि नौ में दस मिनट की देरी है। इस प्रबंध के पूर्व जो कष्ट मुझे साँस लेने में
होता था, उसका कारण जान
मैं अब अपनी मूर्खता पर पछताता था। पर अब मुझे तनिक भी कष्ट न था। मैं फिर
स्वतंत्रतापूर्वक साँस लेता था और जो अनेक प्रकार की पीड़ाओं से मैं पहले दुखित था, अब वे कोई भी बाक़ी नहीं रहती थीं। नौ
से बीस मिनट पहले बेरोमीटर देखने से मालूम हुआ कि मैं पचीस मील ऊपर चढ़ आया हूँ।
साढ़े नौ बजे के लगभग मैंने कुछ पंख वाल्व ढकने से नीचे फेंके। जैसा
मैंने विचारा था वैसे वे वायु में तैरते नहीं थे, पर बड़े वेग से सीधे नीचे की ओर गिर रहे थे और कुछ क्षण उपरांत वे
दृष्टि से अलोप हो गए। पहले मैं इस घटना का अर्थ नहीं समझा। पर कुछ विचारने पर
स्पष्ट हो गया कि वायु अब इतना पतला हो गया है कि पंख के बोझ को भी नहीं सँभाल
सकता और इस कारण वे बड़े वेग से किसी पत्थर के समान गिरे चले जा रहे हैं। पर यह
जानकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ कि मेरे बेलून का वेग इस समय अत्यंत बढ़ गया है।
इस समय कोई नवीन बात नहीं थी। मेरे बेलून का वेग प्रति क्षण बढ़ता ही
जाता था। पर खेद है कि वेग नापने का कोई यंत्र मेरे पास न था। मुझे कोई पीड़ा न थी
और मैं इस समय अति प्रसन्न था और जब से मैंने रत्नधाम छोड़ा तब से ऐसी प्रसन्नता
को मैं इसके पूर्व प्राप्त नहीं हुआ था। अब एक सिरे से मैं अपने सब यंत्रों को
जाँच गया। फिर इसके पश्चात् कार के वायु-संशोधन में लगा। इस वायु-संशोधन में मैं
प्रति चालीस मिनट के उपरांत प्रवृत्त हो जाता था। इसमें शीघ्रता मैं अपनी आरोग्यता
बनाए रखने के लिए करता था।
पाँच बजे सायंकाल के मैं अपने कमरे की वायु की सफ़ाई कर रहा था, कि इतने में मुझे बिल्ली और उसके
परिवार का ध्यान आया और मैं उन्हें वाल्व से झाँककर देखने लगा। बिल्ली फिर पहले की
नाईं श्वाँस लेने की पीड़ा से दुखित जान पड़ती थी। पर उसके बच्चों के विषय में
मेरा अनुभव विचित्र ठहरा। मैंने सोचा था कि ये बच्चे अपनी माँ से कम पीड़ित न
होंगे। पर मैंने भली प्रकार देखने से यह जाना कि वे बड़े प्रसन्न थे, तथा स्वतंत्रतापूर्वक श्वाँस ले रहे थे
और तनिक भी दुखित नहीं देख पड़ते थे। अब मुझे यह ज्ञान हुआ कि रासायनिक रीति से यह
पतला वायु जीवन आधार के लिए कम नहीं है, और जो जीव कि इसी अवस्था में उत्पन्न हो उसे श्वाँस लेने में कुछ भी
पीड़ा नहीं हो सकती, और
जिस प्रकार एक मनुष्य को ऊपर चढ़कर श्वाँस लेने में पीड़ा होती है, उसी प्रकार उसे नीचे पृथ्वीतल के समीप
श्वास लेने में कष्ट होगा। यह विचार कर मैंने बड़ी बिल्ली को एक कटोरे में पानी भर
देना चाहा कि मेरी क़मीज़ की बाँह टोकरे में उलझ गई और एक पल में टोकरा उस परिवार
के सहित अंतर्धान हो गया।
दस बजे मुझे कुछ निद्रा मालूम होने लगी और मैं सोने के लिए लेटा। पर
मुझे यह ध्यान आया कि यदि मैं सोया तो मेरे कमरे का वायु कौन बदलेगा, क्योंकि एक घंटे से अधिक मैं इस वायु
को नहीं पी सकता था और यदि इससे दस-पाँच मिनट की भी देरी हुई तो बड़ा बुरा फल
देखने में आवेगा। इस विचार ने मुझे अति चिंतित कर दिया और इन भयानक विपदों के
उपरांत मुझे यह विचार भी ऐसा भयानक देख पड़ता था कि मुझे इसकी कोई युक्ति न सूझी
और मैंने नीचे उतर चलने का विचार ठहरा लिया। परंतु यह भाव मेरे चित्त में थोड़ी
देर रहा। मुझे यह विचार उत्पन्न हुआ कि मनुष्य वास्तव में चाल व्यवहार का दास है
और बहुत-सी बातें जो उसके नित्य कर्म में माननीय हैं, उन्हें भली प्रकार विचारने से यह देखा
गया है कि वे सब उसने स्वयं अपने ऊपर संचालित कर ली हैं। यह बात स्पष्ट सिद्ध थी
कि मैं बिना निद्रा विश्राम के नहीं रह सकता था। पर साथ ही मैं यह कर सकता था कि
प्रति घंटे उठ बैठने का अपने को अभ्यासी बना लूँ, और मुझे तनिक भी कष्ट न हो। यह केवल पाँच मिनट का काम था कि मैं अपने
कमरे के वायु को शुद्ध कर लूँ। पर कठिन केवल इतना ही था कि ठीक नियत समय पर उठू और
इस काम को पूरा करूँ। अंत में एक नवीन आविष्कार से मैं अत्यंत प्रसन्न हुआ; और गैलीलियो को टेलीस्कोप यंत्र के, अथवा स्टीफेन्सन को भाप इंजन के
आविष्कार पर भी इतनी प्रसन्नता न हुई होगी, जितना मैं इस अद्भुत उपाय के जानने पर गद्गद था। इतनी ऊँचाई पर
पहुँचकर मेरा बेलून ऐसे समभाव से जा रहा था कि कार तनिक नहीं डगमगाता था। मेरे
नवीन आविष्कार में यह समभाव अति लाभदायक जान पड़ा। मेरे पीने का जल बड़े-बड़े
पीपों में भर के पेंदे में बड़ी सावधानी से रख दिया गया था। मैंने एक पीपा खोल
डाला और विकर-वर्क के कोर में दो रस्से समानान्तर बाँधकर उन पर एक पीपा रख दिया, और लगभग आठ इंच उसके नीचे मैंने एक
लकड़ी का टाँड़ बना दिया, और
ठीक उस पीपे के नीचे मैंने एक मिट्टी का घड़ा रख दिया। अब मैंने उस पीपे के पेंदे
में एक छेद कर दिया और एक गायदुम ठेपी लकड़ी की उसमें लगा दी। कई बेर के
निकासने-पैठाने के पश्चात् मैंने उसको ऐसा कस दिया कि टोप-टोप पानी उसमें से चूने
लगा, और इसी प्रकार
टोप-टोप चूने से वह घड़ा साठ मिनट में भर जाता था। अब मैंने अपना बिछौना ठीक उस
घड़े के नीचे बिछाया और फिर भी इस युक्ति से कि मेरा सिर ठीक उस घड़े के नीचे था।
अब यह स्पष्ट है कि एक घंटे उपरांत घड़ा भर जाने पर पानी नीचे बहने लगा और नीचे
बहने से मेरे मुख पर अवश्य गिरता। मेरा क्रोनोमीटर प्रति साठ मिनट पर मुझे जगा
देता था और मैं अपने कमरे को शुद्ध कर फिर बिछौने पर चला जाता था। मेरी निद्रा में
यह नियमशील विघ्न मुझे अधिक दुःखदायक नहीं जान पड़ता था। और जब मैं दूसरे दिन
प्रात:काल उठा तो सात बज गए थे। और सूर्य देव मेरे दिग्मंडल के बहुत ऊपर चढ़ आए
थे।
3 अप्रैल—मेरा बेलून बहुत ऊँचाई पर चढ़ आया था। पृथ्वी की मध्योन्नति
स्पष्ट प्रकट होने लगी थी। मेरे बेलून के नीचे सागर में कई काले-काले धब्बे देख
पड़ते थे जो वास्तव में टापू थे। ऊपर आकाश अत्यंत श्याम वर्ण दिखाई देता था और
तारे विशेषता से चमक रहे थे। उत्तर दिशा में बड़ी दूर दिग्मंडल के किनारे-किनारे
देखने से एक पतली सफ़ेद तथा चमकीली लकीर देख पड़ती थी, जो कि विचारने से मालूम हुआ कि ध्रुव
संबंधी समुद्र का बर्फ़ानी मंडल हैं। यह कौतुक देख मैं बड़ा प्रसन्न हुआ और मैंने
विचारा कि मैं भी यदि उत्तर दिशा की ओर गया तो एक न एक समय अवश्य ठीक ध्रुव के ऊपर
पहुँच जाऊँगा।
4 अप्रैल—बिछौने से बड़ा आरोग्य तथा प्रफुल्लित उठा और समुद्र की
विचित्रता देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। इसमें जो गहरा नील वर्ण पाया जाता था, वह आज नहीं था; वरन उसके स्थान में सफ़ेदी भूरापन
झलकता था। और आज इसमें इतनी चमक थी कि नेत्र चौंधियाते थे।
5 अप्रैल—सूर्योदय की विचित्र लीला मैंने उस समय देखी जबकि सारी
पृथ्वी अंधकूप में पड़ी होगी। समय पहुँचने पर प्रकाश फैल गया और मुझे फिर बर्फ़ानी
लकीर उत्तर दिशा में देख पड़ी। अब यह अति स्पष्ट देख पड़ती थी और पहले से अधिक
काले रंग की थी।
6 अप्रैल—बर्फ़ानी लकीर को कुछ निकट देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। यह
सिद्ध था कि बेलून यदि इसी प्रकार चला गया तो मैं शीघ्र जमे हुए समुद्र के ऊपर
पहुँचा जाऊँगा और फिर ध्रुव देख लेने में भी कोई संदेह न रहेगा।
7 अप्रैल—मैं बड़े सवेरे उठा और उत्तरीय ध्रुव को देखकर अति प्रसन्न
हुआ, क्योंकि मैं ठीक
उसके ऊपर था। पर ख़ेद इतना ही था कि बहुत ऊपर चले आने से मैं उसे शुद्धता से नहीं
देख सकता था। आज प्रात:काल बेरोमीटर देखने से मालूम हुआ कि मैं समुद्रतल से लगभग
7254 मील ऊपर चढ़ आया हूँ।
8 अप्रैल—आज मैंने पृथ्वी के प्रत्यक्ष व्यास में बड़ी कमी पाई और
फिर इसके रंग रूप में भी बड़ा अंतर पड़ गया था। इसका संपूर्ण क्षेत्रफल कहीं तो
फीका और कहीं अत्यंत चमकीला देख पड़ता था और नीचे पृथ्वीतल का भी कुछ हाल विशेष
नहीं दिखाई पड़ता था, इस
कारण कि बीच में बहुत घने-मेघ छाए हुए थे।
9 अप्रैल—आज पृथ्वी का व्यास बहुत घटा हुआ दिखाई देता था और उसकी सतह
का रंग गहरा पीला देख पड़ता था और बेलून ठीक दक्षिण दिशा में जा रहा था और रात्रि
के नौ बजे यह ठीक मेक्सिकन खाड़ी के ऊपर पहुँच गया था।
10 अप्रैल—मैं अकस्मात् आज पाँच बजे प्रातः समय एक भयानक कड़क सुनकर
निद्रा से चौंक पड़ा, और
किसी प्रकार इसका कारण मैं नहीं समझ सका। यह कड़क क्षण मात्र रही होगी, पर मैंने पृथ्वी में कभी इसके समान
शब्द नहीं सुना था, जिससे
मुझे इसके विषय में अनुभव होता। पहले तो मुझे यह भय हुआ कि कहीं मेरा बेलून न फट
पड़ा हो, और मैं अब गिरा
और अब गिरा, यही
सोच रहा था। पर सावधान होकर मैं अपने बेलून के एक-एक यंत्र को जाँचने लगा और बड़ा
प्रसन्न हुआ जब मैंने यह देखा कि सब यंत्र यथाक्रम थे। दिन भर इस परमेश्वरी कौतुक
पर सोचता रहा, पर
अंत में असंतुष्ट हो सो रहा।
11 अप्रैल—आज मैंने पृथ्वी के व्यास में अत्यंत कमी पाई, और आज ही पहली बेर चंद्रमा बहुत बड़ा
देख पड़ने लगा। अब कमरे में जीवन आधार के लिए वायु जमाना बहुत कठिन हो गया था।
12 अप्रैल—आज बेलून के मार्ग में बड़ा अंतर पड़ गया। यद्यपि मुझे
पहले से यह मालूम था, पर
इस समय प्रत्यक्ष देखकर आनंद को प्राप्त हुआ।
13 अप्रैल—जिस कड़क के शब्द ने मुझे दसवीं को भयभीत कर दिया था, वही भयानक कड़क आज फिर हुई। फिर बड़ी
देर लों सोचता रहा, पर
कुछ अनुभव न हुआ। पृथ्वी का व्यास बहुत छोटा देख पड़ता था और अब बेलून के नीचे
फैलने से केवल 25 अंश का कोण बनता था। चंद्रमा अब मेरे शिरोबिंदु में होने से तनिक
भी दिखाई नहीं देता था।
14 अप्रैल—पृथ्वी के व्यास में कमी बढ़ती गई। आज मुझे पूरा विश्वास
हो गया कि बेलून उस मार्ग पर दौड़ा जा रहा है जिससे वह चंद्रमा के उस भाग में
पहुँचेगा जो पृथ्वी से सबसे कम दूरी पर है। चंद्रमा ठीक मेरे सिर पर था और इसी से
मुझे नहीं देख पड़ता था। वायु ज़माने में अत्यंत दुःख उठाना पड़ता था।
15 अप्रैल—पृथ्वी पर न तो कहीं महाद्वीपों का पता लगता था और न कहीं
समुद्र का चिह्न देख पड़ता था। बारह बजे के लगभग तीसरी बेर मुझे फिर वही कड़क सुन
पड़ी। अबकी यह कई पल लों ठहरी और इसकी अधिकता बढ़ती ही गई। मैं बिलकुल अचेत होकर
खड़ा था कि इतने में कार बड़े वेग से हिला और साथ ही एक जलता हुआ न जाने कौन
पदार्थ बड़े वेग से बेलून की ओर आया। जब मेरा भय विस्मय कुछ कम हुआ तो मैंने देखा
कि यह चंद्रलोक के ज्वालामुखी पर्वत से निकले हुए द्रव्य के टुकड़े हैं और पृथ्वी
पर जो उल्का पत्थर गिरते हैं उन्हीं के समान ये भी देख पड़ते थे।
16 अप्रैल—आज कमरे की दोनों खिड़कियों से ऊपर देखने से चंद्रमा का
मंडल बेलून की परिधि के चारों ओर बढ़ा देख पड़ता था। यह देखकर मेरे चित्त में एक
प्रकार की खलबली उत्पन्न हो गई थी। अब मुझे विश्वास हो गया था कि मैं अब अपने
निरूपित स्थान पर शीघ्र पहुँच जाऊँगा। वायु जमाने में अब मुझे कष्ट उठाना पड़ता
था। निद्रा विश्राम के लिए मुझे क्षण मात्र की छुट्टी नहीं मिलती थी। मैं अब सदा
किसी न किसी प्रकार से पीड़ित रहता था। यह कदापि संभव नहीं कि मनुष्य इतना कष्ट
चिरकाल लों सहन कर सके। आज रात्रि में फिर मेरे बेलून के निकट से होकर एक लुक का
पत्थर चला गया और अब इनकी अधिकता से मुझे एक प्रकार की चिंता उत्पन्न हुई।
17 अप्रैल—आज का दिन मेरे भ्रमण में चिरस्मरणीय रहेगा। पाठकों को यह
स्मरण होगा कि 13वीं तारीख़ को मेरे बेलून से पृथ्वी की कोणिक चौड़ाई 25 अंश थी, 14वीं को यह चौड़ाई बहुत घट गई, 15वीं को इसमें भी कमी हो गई और 16वीं
की रात्रि को देखने से इसका कोण केवल 7 अंश 15 मिनट बच गया था। आज 17वीं को प्रातः
समय सोकर उठने पर मुझे यह जान पड़ा कि मेरे नीचे की पृथ्वी की सतह अकस्मात् बहुत
बढ़ गई है, अर्थात्
उसका कोणिक व्यास 7 अंश से आज 69 अंश हो गया है। मैं तो यह देखकर भौचक्का हो गया
और अपना भय तथा विस्मय कदापि वर्णन नहीं कर सकता। मेरे पैरों में कँपकँपी जान
पड़ने लगी। मेरे दाँत बैठ गए, तथा
मेरे बाल मारे भय के खड़े हो गए। मेरा बेलून अब वास्तव में फटा चाहता है, मेरा बेलून अब फटा और मैं अब बड़े वेग
से गिर रहा हूँ। इतनी दूरी जो मैंने इतनी शीघ्रता से पार कर ली है, अब मैं उसी दूरी को अधिक से अधिक दस
मिनट में तै कर लूँगा और पृथ्वी-तल तक पहुँचते-पहुँचते मेरा सर्वनाश हो जाएगा—यह
विचार मेरे चित्त को चंचल किए देता था। पर तुरंत ही मैंने अपने को बहुत सँभाला, और अपनी इन मन:कल्पित बातों को असंभव
विचारने लगा। यह कदापि संभव नहीं कि मैं इतने शीघ्र नीचे पहुँच गया। यद्यपि मैं
नीची सतह पर उतर रहा हूँ, पर
मेरा वेग उतना नहीं था जितना मैंने विचारा था। इस विचार ने मेरा चित्त अति शांत कर
दिया। वस्तुतः इस भय ने मेरे इंद्रिय ज्ञानों का नाश कर दिया था। मैं कदापि उस समय
अपने होश में न हूँगा। अब मैंने यह विचारा था कि यह सतह जो मेरे नीचे देख पड़ती है, पृथ्वी की है। पर वास्तव में पृथ्वी की
सतह अब मेरे ऊपर शिरोबिंदु में हो गई थी और बेलून के आड़ में होने के कारण मुझे
कुछ नहीं देख पड़ता था और अब चंद्रमा मेरे नीचे पैरों की ओर दिखाई दे रहा था।
अपने चारों ओर की वस्तुओं में इस प्रकार एकाएक यह अद्भुत परिवर्तन
देख मैं बड़े अचंभे में पड़ गया था और यात्रा भर की बातों में इस बात का स्वयं
मुझे कुछ अर्थ नहीं समझ पड़ता था। मैंने पूर्व ही सोच लिया था कि जब मेरा बेलून उस
स्थान पर पहुँचेगा, जहाँ
इस ग्रह की आकर्षण शक्ति से उपग्रह की आकर्षण शक्ति अधिकतर हो जाएगी, तो यह परिवर्तन आवश्यकीय हो जाएगा। मैं
एक घोर निद्रा में सोया-सोया उस घटना को जो मैंने पूर्व ही विचारी थी, प्रत्यक्ष होते देखकर चौंक पड़ा। यह
चक्र अवश्य क्रम तथा बड़ी सुगमता से हुआ होगा और मुझे इसमें संदेह है कि यदि मैं
जागता भी होता तो क्या मुझे अपने बेलून का यह चक्र मालूम पड़ जाता। अब अपने भय
इत्यादि से निर्भय हो मैंने चंद्रमा के प्राकृतिक रंग-रूप को देखना आरंभ किया।
मेरे नीचे यह एक समुद्र के चित्र के समान दिखाई दे रहा था और यद्यपि चंद्रमा अभी
मेरे बेलून से कुछ दूरी पर था, पर
उसकी सतह का ऊबड़-खाबड़ स्पष्ट देख पड़ता था। चंद्र-लोक-तल से सागर वा समुद्र की
अनुपस्थिति मुझको उसके भूगोल संबंधी अथवा बाहरी रूप में सबसे आश्चर्यजनक जान पड़ी।
पर तिस पर भी उसमें मुझे ऐसी-ऐसी समभूमि दिखाई देती थी जो कि जान पड़ता था कि जल
के वेग से कहीं-कहीं एकत्र होकर ऊँची हो गई है। उसके उस अर्द्ध भाग में, जो मेरे नेत्रों के सामने था, बहुत से ज्वालामुखी पर्वत दिखाई देते
थे और यह जान पड़ता था कि इनके उभाड़ वा फुलाव बनाए हुए हैं। इनमें जो सबसे अधिक
ऊँचा था, वह समकोण ऊँचाई
में तीन-सवा तीन मील से अधिक ऊँचा न होगा।
इनमें से बहुतेरों में से ज्वाला निकल रही थी और इनमें से जो लुक
पत्थर अब निकलते थे वे मेरे बेलून से अधिक ऊँचाई पर पहुँचते थे।
18 अप्रैल—आज मैंने चंद्रमा की परिधि में अधिक वृद्धि पाई और बेलून
के उतार के वेग में अत्यंत वृद्धि देखकर मैं अति भयभीत हुआ। इस चंद्रलोक यात्रा के
संभव मानने के पूर्व ही मैंने चंद्रमा के निकट वायुमंडल का होना संभावित माना था।
चंद्रमा से अब मेरा बेलून प्रतिक्षण निकट पहुँचता जाता था और वायु जमाने में जो
कष्ट मुझे भोगना पड़ता था, उसमें
अब तक कुछ कमी नहीं हुई थी, जिससे
मुझे यह संदेह उत्पन्न हो रहा था कि कदाचित् चंद्रमा में वायु नहीं है।
19 अप्रैल—आज प्रात:काल मुझे बड़ा हर्ष हुआ, जब मैंने देखा कि चंद्रमा अब अत्यंत
निकट आ गया है और फिर अपने वायु जमाने के यंत्र द्वारा मुझे यह जान पड़ा कि अब
वायु के पतलेपन में बड़ा अंतर पड़ गया है और दस बजे के लगभग मुझे पूरा विश्वास हो
गया कि वहाँ वायु अवश्य है। फिर ग्यारह बजे वायु जमाने में मुझे कुछ भी परिश्रम न
करना पड़ा और बारह बजे मैंने अपने कार की ओढ़नी को उतारकर रख दिया। अब मुझे पूरा
विश्वास हो गया था कि ज्यों-ज्यों मैं चंद्रमा के निकट पहुँचता जाऊँगा, वायु अधिक मिलता जाएगा। यद्यपि मेरा यह
विचारना यथार्थ निकला कि चंद्रमा के निकट उसके पिंड के यथा-योग्य वायु अवश्य पाया
जाएगा पर तिस पर भी उसकी सघनता के विषय में मैंने धोखा खाया, क्योंकि उसके तल पर भी इतना वायु नहीं
पाया जाता था जो मेरे कार को उसके बोझ सहित ऊपर सँभाले रहता। पर बड़ी उतावली के
साथ मेरे मुँह के बल गिरने से इसका खंडन हो गया। जो कुछ हो मैं अब अत्यंत वेग से
चंद्रतल पर गिर रहा था। मैंने बोझ,
जल के घड़े, वायु
जमाने के यंत्र इत्यादि के फेंकने में क्षणमात्र न गँवाया, यहाँ तक कि अंत में अपने कार में की
यावत् सामग्री नीचे फेंक दी; पर
उसके वेग में तनिक भी कभी न हुई। अब मैं चंद्रतल से कोई आध मील की दूरी पर था। अब
अंत में अपना कोट टोपी आदि फेंक देने पर मैंने अपने कार को बेलून से काट दिया और
मैं बेलून के जाल को दोनों हाथों से कस कर पकड़े रहा।
अब मैं अपने नीचे छोटे-छोटे घर तथा बस्ती देख रहा था और मुझे यह जान
पड़ता था कि मैं एक विचित्र नगर में उतर रहा हूँ। ठीक मेरे नीचे छोटे-छोटे
मनुष्यों का एक समूह एकत्र था, जो
कि न तो कुछ शब्द उच्चारण करते और न मेरी सहायता करने पर कुछ उत्साह दिखाते थे, पर मूढ़ों के समान दाँत निपोरे मुँह
बाए खड़े थे और मुझे तथा मेरे बेलून को ध्यानपूर्वक देख रहे थे। मैंने ग्लानि से
उनकी ओर से नेत्र फेर लिया और ऊपर की ओर अपनी पृथ्वी को देखने लगा, जो कि इस समय एक बड़े ताँबे के तथा
धुंधली ढाल के समान कोई दो अंश व्यास में दिखाई दे रही थी और जो कि ऊपर आकाश में
मानो अचल स्थापित थी और जिसका एक कोर सोने के समान चमक रहा था। जल वा स्थल का कोई
चिह्न विशेष नहीं बूझ पड़ता था। इस प्रकार से, पाठकगण! मैं अनेक प्रकार के दु:ख-आपत्तियों से बचकर रत्नधाम से विदा
हो, उन्नीसवें दिन
अपने स्थान पर पहुँचा। मुझे अभी बहुत कुछ कहना है। मुझे वहाँ के आब-ओ-हवा, शीत और गर्म ऋतुओं के विचित्र विभेद, एक पक्ष लों सूर्य की जलती हुई धूप, तथा दूसरे में अत्यंद सर्दी, यह सब हाल कहना बाक़ी है। वहाँ के
मनुष्य, उनके
आचार-व्यवहार, तथा
राजकीय विषय पर कुछ कहूँगा। उनकी विचित्र शारीरिक प्रकृति, उनका असौंदर्य, तथा उनका श्रवणहीन होना, उनका वाक्यहीन होने पर एक विचित्र ढंग
पर बातचीत करना, आप
महाशयों को अवश्य सुनाऊँगा। इसके अतिरिक्त और बहुत-सी विचित्रता सुनाने को हूँ जो
कि मनुष्य कदापि अपने टेलीस्कोप द्वारा नहीं देख सकता। पर इसके बदले मैं आप
महाशयों से अपने अपराध की क्षमा प्रदान चाहता हूँ। मैं अब अपनी जन्मभूमि, तथा अपने मित्र-बंधुओं के देखने की
बड़ी आकांक्षा रखता हूँ। मैं आत्म विद्या, तथा प्राकृतिक विद्या संबंधी जो हाल लिखने को हूँ, उसके प्रतिकार में मैं यह आशा रखता हूँ
कि आप मुझे उन तीन पापात्माओं के प्राण-वध के लिए क्षमा करेंगे। इस पत्र को ले
जाने वाला चंद्रमा के एक निवासियों में से है, जिसने बड़े कहने पर पृथ्वी जाना स्वीकार किया है। वह इसके उत्तर के
लिए ठहरेगा और उत्तर लेकर मेरे पास शीघ्र लौट आवेगा।
आपका दास
हंसपाल
केशवप्रसाद सिंह
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