गुरुवार, 28 मार्च 2024

विश्वास का फल

 

बड़े-बड़े मकानों, बड़ी-बड़ी दूकानों, लंबी-चौड़ी सड़कों, एक से एक बढ़ के कारख़ानों और रोज़गारियों की बहुतायत ही के सबब से नहीं, बल्कि अंग्रेज़ो की कृपा से सैर तमाशे का घर बने रहने और समुद्र का पड़ोसी होने तथा जहाज़ी तिजारत की बदौलत आला दरजे की तरक़्क़ी पाते रहने के कारण इस समय कलकत्ता शहर जितना मशहूर और लक्ष्मी के कृपापात्रों का घर हो रहा है उतना बंबई के सिवा और कोई दूसरा शहर नहीं। साथ ही इसके इस शहर में जैसे अमीरों और बड़ी-बड़ी सड़कों और मकानों की भरमार है उसी तरह मज़दूरी पेशे वाले, दीन-लाचार तथा और तरह से औक़ात गुज़ारी करने वाले ग़रीबों और उनके रहने वाले छोटे-छोटे तंग, गंदे और पुराने मकानों तथा उसी ढब की गंदी गलियों की भी कमी नहीं है। अस्तु इस समय हम कलकत्ते की ख़ूबी और ख़राबी का बयान करने के लिए तैयार नहीं हैं जो यहाँ का ख़ुलासा हाल लिखकर पाठकों का अमूल्य समय नष्ट करें, बल्कि वहाँ के एक छोटे से फैक्ट को लिखकर पाठकों को एक अनूठा रहस्य दिखाना चाहते हैं।

कलकत्ते की एक तंग, अँधेरी और गंदी गली के अंदर पुराने और छोटे से मकान की नीचे वाली कोठड़ी में एक औरत को फटे-पुराने आसन पर बैठे हुए परमात्मा के ध्यान में निमग्न देख रहे हैं। इस मकान में यद्यपि इसी की तरह और भी कई ग़रीब किराएदार रहते हैं और उनकी बातचीत तथा आपस में झगड़े तकरार के कारण इस समय मकान में कोलाहल-सा हो रहा है मगर उस औरत का चित्त किसी तरह हिलता हुआ दिखाई नहीं देता और वह आँखें बंद किए माला जपती अपने ध्यान में लगी हुई है और उस कोठड़ी का दरवाज़ा अधखुला-सा दिखाई दे रहा है।

 

जब हम उसके सामान की तरफ़ ध्यान देते हैं तब उस औरत की ग़रीबी और लाचारी का अंदाज़ा सहज ही में मिल जाता है। एक कोने में फटे-पुराने कपड़े की छोटी अधखुली-सी गठड़ी, दूसरे कोने में पानी की एक ठिलिया और उसके पास ही छोटा-सा पीतल का गिलास पड़ा है। ऊपर की तरफ़ एक किल्ली के सहारे काली पेंदी की हाँडी टँगी हुई है जिससे मालूम होता था कि यही हाँडी नित्य चूल्हे पर चढ़ा करती है। पानी वाले घड़े के दाहिनी तरफ़ चूल्हा और उसके सहारे छोटी-छोटी दो रिकाबियाँ रखी हैं, वे भी साबुत नहीं है। बाईं तरफ़ (जहाँ औरत बैठी है) मिट्टी का छोटा-सा चौकूठा चबूतरा बना है जिस पर तुलसी जी का एक पेड़ है जिसके सामने वह औरत बैठी हुई इस कंगाली की अवस्था में भी बे-फ़िक्री के साथ उपासना कर रही है और उसके पास ही एक चक्की भी गड़ी हुई है।

इतना होने पर भी उस कोठड़ी में किसी तरह की गंदगी या मैलापन नहीं है, गोबर से लीपकर तमाम ज़मीन साफ़ और सुथरी बनाई हुई है।

 

स्त्री का जप पूरा हुआ और वह तुलसी जी को प्रणाम कर हाथ की माला रक्खा ही चाहती थी कि कोठड़ी का दरवाज़ा खुला और एक आठ या नौ वर्ष का बालक अंदर आता हुआ दिखाई दिया।

बालक, “माँ! तू पूजा कर चुकी?”

 

स्त्री, “हाँ बेटा कर चुकी।”

बालक, “बाहर हरी खड़ा है। कहता है, पाठशाला में जाने का समय हो गया। मुझे भूख लगी है; बिना खाए मैं पाठशाला में कैसे जाऊँ?”

 

स्त्री, “(लंबी साँस लेकर और माला रखकर) बेटा आज तो कुछ खाने को नहीं है, मैं दो-तीन जगह गई थी, कहीं से गेहूँ भी नहीं मिला जो पीसकर दे आती और मजूरी के दो पैसे लेकर तेरे खाने का इंतिज़ाम करती। नवीन की माँ ने गेहूँ देने के लिए दस बजे बुलाया था सो अब मैं जाती हूँ।”

बालक, “तो मैं पाठशाला में न जाऊँगा। मुझे बड़ी भूख लगी है। तू तो दिन-रात पूजा ही किया करती है, खाने को तो लाती नहीं।”

 

स्त्री, “बेटा क्या करूँ! तेरे ही लिए तो दिन-रात पूजा किया करती हूँ। ठाकुरजी से तेरे खाने के लिए माँगती हूँ।”

बालक, “क्या तेरे माँगने से ठाकुरजी खाने को दे देंगे?”

 

स्त्री, “क्यों न देंगे? तमाम दुनिया को देते हैं तो क्या मुझी को न देंगे?”

बालक, “तो देते क्यों नहीं? मुझे बता ठाकुर जी कहाँ हैं, मैं भी उनसे माँगूँ।”

 

स्त्री, “(डबडबाई आँखों से) ठाकुरजी बड़ी दूर रहते हैं, इसी से मेरी आवाज़ अभी तक उन्होंने नहीं सुनी।”

बालक, “तो दूसरों की आवाज़ कैसे सुनते हैं जिन्हें खाने को देते हैं?”

 

स्त्री, “(कुछ सोचकर) रोज़-रोज़ के पुकारने से सुन ही लेते हैं और जब सुन लेते हैं तो सब कुछ देते हैं।”

बालक, “हलुआ, जलेबी, लड्डू पेड़ा सब कुछ देते हैं?”

 

स्त्री, “हाँ बेटा, सब कुछ देते हैं।” इतना कहकर स्त्री ने पूजा समाप्त की और लड़के को गोद में लेकर आँचल से उसका मुँह पोंछने लगी और लड़के ने पुनः उससे पूछना शुरू किया।

बालक, “हाँ माँ, तो तू ठाकुरजी का ठिकाना तो बता दे।”

 

स्त्री, “बेटा! ठाकुर जी बैकुंठ में रहते हैं। वह सब राजों के राजा हैं, उनका ठिकाना क्या?”

बालक, “बैकुंठ कैसा है?”

 

स्त्री, “बैकुंठ बड़ा भारी मकान है। चारों तरफ़ हीरा-पन्ना, जवाहिरात जड़े हैं। वहाँ बड़ा आनंद रहता है।”

बालक, “हमेलटीन कंपनी की दुकान से भी ज़ियादा सजा हुआ है? वहाँ मैं नवीन भैया के साथ गया था। ख़ूब देखा, मगर चपरासी ने भीतर जाने नहीं दिया। कान पकड़ के निकाल दिया।”

 

स्त्री, “बेटा, मैं क्या जानूँ हमेलटीन कौन है और उसकी दुकान कहाँ है, पर ठाकुर जी के बराबर दुनिया में किसी का मकान न होगा।”

बालक, “ठाकुरजी का नाम ‘ठाकुरजी’ ही है या कोई और भी है? जैसे मेरा नाम गोपाल भी है, लल्लो भी है।”

 

स्त्री, “हाँ बेटा, तुम्हारे तो दो ही नाम हैं मगर उनके हज़ारों नाम हैं।”

बालक, “सबसे बड़ा नाम उनका कौन है?”

 

स्त्री, “लक्ष्मीनाथ। अच्छा बेटा, अब तू ज़रा यहाँ बैठ, मैं नवीन की माँ के पास से जा के पीसने के लिए गेहूँ ले आऊँ, तब तेरे खाने-पीने का भी बंद-ओ-बस्त करूँ। आज तू पाठशाले मत जा, कल जाइओ।”

बालक, “अच्छा माँ, तू जा, मैं यहाँ बैठा-बैठा लिखूँगा-पढ़ूँगा। मगर मुझे पानी पिलाती जा, कुछ तो पेट भर जाएगा।”

 

स्त्री की आँखें अच्छी तरह डबडबा आई। मगर उसने जल्दी से आँखें पोंछ डाली जिससे गोपाल को मालूम न हो और पानी पिलाकर घर के बाहर निकल गर्इ।

संध्या होने में अभी दो घंटे की देर है। कलकत्ते के बाज़ारों की रौनक़ पल-पल में बढ़ती जाती है। और बाज़ारों को छोड़कर हम अपने पाठकों को उस बाज़ार में ले चलते हैं जिसकी दोनों मंज़िलें सैर-तमाशे के शौक़ीनों के दिल में ठंढक देने और मनचलों की झुकी हुई गरदने ऊपर की तरफ़ उठा देने वाली हैं। इसी बाज़ार में हम एक दोहरे टपवाली (लैंडो) फिटिन, जिसके आगे बैलों की जोड़ी जुती हुई है, धीरे-धीरे जाते देखते हैं।

 

इस गाड़ी में एक अधेड़ उम्र का रईस बैठा हुआ है और उसके सामने की तरफ़ दो आदमी (जो उसके आश्रित होंगे) भी बैठे कभी-कभी कुछ बातें करते जाते हैं, रईस की निगाह दोनों तरफ़ की दुकानों और कोठों पर पड़कर उसके दिल में तरह-तरह के भाव पैदा करते जाते थे। अकस्मात् उस रईस की निगाह एक बालक के ऊपर जा पड़ी, जो सड़क के किनारे पर रखे हुए एक लेटर बक्स के अंदर चीठी डालने का उद्योग कर रहा था, मगर उसके मुँह तक हाथ न जाने के कारण वह बहुत ही दु:खी होकर तरह-तरह की तरकीबें कर रहा था। धीरे-धीरे यह फिटिन भी उसके पास तक जा पहुँची और उस लड़के की सूरत-शक्ल तथा इस समय की अवस्था पर रईस को बड़ी दया आई। उसने समझा कि यह ग़रीब लड़का, जिसके बदन पर साबुत कपड़ा तक नहीं है, शायद किसी दुकानदार का शागिर्द या नौकर है और उसी ने इस बेचारे को इसकी सामर्थ्य से बाहर काम करने की आज्ञा दी है और यह बेचारा डर के मारे अपना काम पूरा किए बिना यहाँ से टलना नहीं चाहता। रईस ने अपने एक मुसाहब को जो उसके सामने की तरफ़ बैठा हुआ था, गाड़ी से नीचे उतरकर उस लड़के की कठिनाई को दूर करने का इशारा किया। गाड़ी खड़ी की गई और वह मुसाहब नीचे उतरकर लड़के के पास गया। बोला, “ला तेरी चीठी मैं इस बम्बे में डाल दूँ।” इसके जवाब में लड़के ने सलाम करके चीठी उसके हाथ में दे दी। मुसाहब की निगाह जब लिफ़ाफ़े पर पड़ी तो चौंक पड़ा और वह लिफ़ाफ़ा रईस के पास नाम दिखाने के लिए ले आया। लड़के को यह बात कुछ बुरी मालूम हुई क्योंकि उसे अपनी चीठी के छिन जाने का भय हुआ। इसलिए वह भी उस मुसाहब के पीछे-पीछे गाड़ी के पास तक चला आया और रोनी सूरत से उस रईस के मुँह की तरफ़ देखने लगा। उसकी इस अवस्था पर रईस का दिल और भी हिल गया। उसने लिफ़ाफ़े पर एक नज़र डालने के बाद उस लड़के से कहा, “डरो मत, हम तुम्हारी चीठी ले न लेंगे, इस पर पता ठीक-ठीक नहीं लिखा है इसी से यह आदमी मुझे दिखाने के लिए ले आया है। कहो तो मैं इस पर अंग्रेज़ी में पता लिख दूँ जिसमें चीठी जल्द ठाकुर जी के पास पहुँच जाए।” लड़के ने ख़ुश होकर कहा, “हाँ, लिख दीजिए।”

उस चीठी पर यह लिखा हुआ था—श्री ठाकुरजी महाराज लक्ष्मीनाथ के पास चीठी पहुँचे।

 

स्थान—बैकुंठ।

रईस ने अंग्रेज़ी में उस पर यह लिख दिया- M. PRATAP NARAIN HARRISON ROAD, Calcutta,

 

लड़का अंग्रेज़ी नहीं जानता था इसलिए वह इस बात को कुछ समझ न सका। इसके बाद रईस ने उस लड़के से, जो बातचीत करने में बहुत तेज़ और ढीठ भी था, पूछा, “तुम्हारा मकान कहाँ पर है?”

लड़का, “(हाथ का इशारा करके) उस तरफ़, बड़ी दूर है।”

 

रईस, “(प्यार से उसका हाथ पकड़ के) आओ हमारी गाड़ी पर बैठ जाओ, हम तुम्हें तुम्हारे घर तक पहुँचा देंगे।”

लड़का गाड़ी पर सवार हो गया। रईस ने उसे अपने बग़ल में बैठा लिया, गाड़ी पुनः धीरे-धीरे रवाना हुई और रईस तथा उस लड़के में यूँ बातचीत होने लगी—

 

रईस, “यह चीठी तुमने अपने हाथ से लिखी है?”

लड़का, “हाँ।”

 

रईस, “किसके कहने से लिखी है?”

लड़का, “अपनी ख़ुशी से।”

 

रईस, “तुमने कैसे जाना कि ठाकुर जी किसी का नाम है?”

लड़का, “मेरी माँ रोज़ उनकी पूजा किया करती है। उसी से मैंने सब कुछ पूछा था।”

 

रईस, “तुम्हारी माँ ने तुम्हें धोखा दिया।”

लड़का, “मेरी माँ कभी झूठ नहीं बोलती, सब कोई कहते हैं कि लल्लो की माँ झूठ नहीं बोलती।”

 

रईस, “तो क्या यह चीठी तुमने अपनी माँ से छिपा के लिखी है?”

लड़का, “हाँ (रोनी सूरत से) अगर मेरी माँ सुनेगी तो मुझे मारेगी... ”

 

रईस, “(लड़के की पीठ पर हाथ फेर के) नहीं-नहीं, तुम डरो मत। हम तुम्हारी माँ से यह हाल न कहेंगे। हमारा कोई आदमी भी ऐसा न करेगा। अच्छा यह तो बताओ कि चीठी में तुमने क्या लिखा है?”

इसका जवाब लड़के ने कुछ भी न दिया। रईस ने दो-तीन दफ़े यही बात पूछी मगर कुछ जवाब न पाया। आख़िर यह सोचकर चुप हो रहा कि आख़िर वह चीठी मेरे यहाँ पहुँचेगी क्योंकि मैंने उस पर अपना पता लिख दिया है, अस्तु जो कुछ उसमें होगा मालूम हो जाएगा।

 

इतने ही में लड़का चौंक पड़ा और गद्दी पर से कुछ उठकर बोला, “वह मेरी गली आ गई, मुझे उतार दो।”

रईस की आज्ञानुसार गाड़ी खड़ी की गई और वह लड़का उतरकर अपने उसी मकान में चला गया जिसका परिचय हम पहिले बयान में दे आए हैं। मगर रईस का इशारा पाकर उसका एक आदमी लड़के के पीछे-पीछे गया और उसका मकान अच्छी तरह देख-भाल आया। इसके बाद गाड़ी वहाँ से रवाना होकर तेज़ी के साथ एक तरफ़ को चली गई।

 

हमारे परिचित रईस महाराज कुमार प्रतापनारायण की अवस्था आज कुछ निराले ही ढंग की हो रही है। वह ऊँचे दर्जे का अमीर और ज़मींदार था, वह हर तरह की ख़ुशी का सामान अपने चारों तरफ़ देखता था और बिना औलाद के रहकर भी वह दिन-रात अपने को प्रसन्न रखता था। मगर आज मालूम होता है कि उसकी तमाम बनावटी ख़ुशियों का ख़ून हो गया है और उसके अंदर किसी सच्ची ख़ुशी का दरिया जोश मार रहा है, जिसके सबब से उसकी बड़ी-बड़ी आँखें प्रेम के आँसुओं का सोता बहा रही हैं। गोपाल लड़के के हाथ की लिखी हुई कल वाली चीठी जिस पर उसने अपना पता लिखकर डाक के बंबे में छुड़वा दिया था, उसके हाथ में थी और वह अपने कमरे में अकेला बैठा हुआ उसे बारबार पढ़कर भी अपने दिल को संतोष नहीं दे सकता था। उस चिट्ठी का यह मज़मून था—

‘श्रीठाकुरजी महाराज! लक्ष्मीनाथ!’

 

मैंने अपनी माँ से सुना है कि तमाम दुनिया को तुम खाने के लिए देते हो, जो कोई जो कुछ माँगता है, तुम वही देते हो, तुम्हारे भंडार में सब कुछ भरा रहता है तो फिर मुझे क्यों नहीं देते? दयानिधान! आज मैं दिन भर का भूखा हूँ, मेरी माँ न मालूम कै दिन की भूखी है, मेरे घर का रोज़ ही यही हाल रहता है, कब तक मैं लिखा करूँगा? कृपा कर मेरे लिए दो सेर लड्डू का बंद-ओ-बस्त कर दीजिए जिससे मैं, मेरी माँ और मेरे साथ खेलने वाले लड़के भी रोज़ खा लिया करें, मैंने आज तक कभी नहीं खाया, मैं उसका स्वाद नहीं जानता...।’

पुनः पढ़कर उसने अपने कलेजे पर हाथ रखा और लंबी साँस लेकर कहा, “हा!! व्यर्थ ही इतने दिन भूल-भुलैये में घूमते हुए नष्ट किए। हाँ! एक दिन भी ऐसा सरल विश्वास भगवान् पर न हुआ! आज मालूम हुआ कि मैं कौन हूँ और मुझे क्या करना चाहिए! हे ईश्वर तू धन्य है, निःसंदेह तुझ पर जो भरोसा और विश्वास रखता है, उसी का बेड़ा पार है। अच्छा, पतितपावन! अब मैं भी तेरे दरवाज़े की ख़ाक छानूँगा और देखूगा कि तेरी लंबी भुजा के सहारे मुझ अधर्म का क्योंकर उद्धार होता है?”

 

इतने ही में कमरे का दरवाज़ा खुला और विपिनविहारी बाबू वकील हाईकोर्ट की सूरत दिखाई दी, जो बड़े ही नेक, भोले-भाले तबीअत के आदमी थे और जिन्हें महाराज कुमार प्रतापनारायण ने एक वसीयतनामा लिखने के लिए बुलाया था।

आओ देखें तो सही इस समय हमारा गोपाल कहाँ है और क्या कर रहा है। देखो वह अपनी माँ के पास बैठा हुआ मीठी-मीठी बातें कर रहा है। वह डरता-डरता कह रहा है—“माँ, मैंने ठाकुरजी को चीठी लिखी है। वह आज ज़रूर पहुँच गई होगी। तू कहती थी कि वह पल-भर में तमाम दुनिया की ख़बर ले लेते हैं, अगर ऐसा है तो बस अब थोड़ी ही देर में मेरे पास भी लड्डू की हाँड़ी पहुँचा चाहती है। आज तू मेरे खाने की फ़िक्र न कर।” इत्यादि और उसकी माँ अपनी आँखों से आँसुओं की धारा बहा रही है। इतने ही में दरवाज़े के बाहर से किसी ने गोपाल कहकर पुकारा, जिसे सुनकर गोपाल दौड़ता हुआ घर के बाहर चला गया। थोड़ी ही देर के बाद जब लौटकर अपनी माँ के पास आया तो उसके एक हाथ में लड्डू से भरी हुई एक हाँडी थी और दूसरे हाथ में एक चीठी। गोपाल ने ख़ुशी-ख़ुशी अपनी माँ से कहा, “देख माँ, मैं कहता था न...कि ठाकुर जी का आदमी लड्डू लेकर आता होगा। देख, कैसा बढ़िया लड्डू है, अहाहा।”

 

एक चीठी भी ठाकुरजी ने भेजी है। देख यह चीठी है—

गोपाल की बात सुनकर उसकी माँ भौचक-सी हो गई और वह तअज्जुब भरी निगाहों से गोपाल का मुँह देखने लगी। दिल के अंदर से उठे हुए जोश ने उसका गला भर दिया था और वह कुछ बोल नहीं सकती थी। जब गोपाल ने चीठी उसके हाथ में दी, तब वह खोलकर पढ़ने लगी। जिसका मतलब यह था—

 

“ठाकुर जी ने दो सेर लड्डू रोज़ तुम्हारे पास भेजने की आज्ञा दी है सो आज से बराबर तुम्हारे पास पहुँचा करेगा। ठाकुर जी ने तुम्हारे लिए और भी बहुत कुछ प्रबंध किया है जिसका हाल कुछ दिन बाद मालूम होगा।”

गोपाल की माँ को बड़ा ही आश्चर्य हुआ! वह तअज्जुब-भरी निगाहों से कभी गोपाल का मुँह देखती और कभी लड्डू तथा चीठी की तरफ़ ध्यान देती। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आता था कि यह क्या हुआ और क्योंकर हुआ। मगर गोपाल को इन सब सोच-विचारों से क्या संबंध था, वह उसी समय थोड़ा-सा लड्डू लेकर घर के बाहर निकल गया और अपने हमजोली तथा साथ खेलने वाले लड़कों को ख़ुशी से बाँटकर घर चला आया। इसके बाद ख़ुद भी लड्डू खाए और अपनी माँ को भी ज़िद कर के खिलाया।

 

पंद्रह दिन तक नित्य एक आदमी आकर गोपाल के घर पर लड्डू दे जाया करता और उसकी माँ तरह-तरह के सोच-विचारों में अपना समय बिताया करती।

इसके बाद सोलहवें दिन जब महाराज कुमार प्रतापनारायण की चीठी एक वसीयतनामे के साथ सरकारी वकील की मार्फ़त उसके पास पहुँची, तब उसे मालूम हुआ कि गोपाल के सच्चे प्रेम, विश्वास और भोलेपन ने उसकी हुर्मत और औक़ात तथा ज़िंदगी के ढंग का कैसा काया पलट कर डाला है और उसके घर पर लड्डू पहुँचाने वाले महाराज कुमार प्रतापनारायण के दिल पर उसका कितना बड़ा असर पड़ा कि उसने अपनी तमाम जायदाद का मालिक गोपाल को बनाकर इसलिए ब्रज-यात्रा की कि उसी भक्तवत्सल, पतितपावन बैकुंठनाथ के प्रेम में अपना जीवन समाप्त करके सच्चे सुख का लाभ करे।

 

माधव प्रसाद मिश्र

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सोमवार, 18 मार्च 2024

जैनेन्द्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ- डॉ. निर्मला जैन

 सड़क पर से नर-नारियों का अविरत प्रवाह आ रहा था और जा रहा था। उसका न ओर था न छोर। यह प्रवाह कहां जा रहा था और कहां से आ रहा था, कौन बता सकता है ? सब उम्र के संब तरह के लोग उसमें थे। मानो मनुष्य के नमूनों का बाजार, सजकर, सामने से इठलाता निकला चला जा रहा हो। 

अधिकार-गर्व में तने अंग्रेज उसमें थे, और चिथड़ों से सजे, घोड़ों की बाग थामें वे पहाड़ी उसमें थे, जिन्होंने अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान को कुचल कर शून्य बना लिया है, और जो बड़ी तत्परता से दुम हिलाना सीख गये हैं। 

भागते-खेलते, हंसते शरारत करते, लाल-लाल अंग्रेज बच्चे थे और पीली-पीली आंखें फोड़े, पिता की ऊंगली पकड़कर चलते हुए अपने हिन्दुस्तानी नौनिहाल भी थे। 

अंग्रेज पिता थे जो अपने बच्चों के साथ भाग रहे थे, हंस रहे थे और खेल रहे थे। उधर भारतीय पितृदेव भी थे, जो बुजुर्गो को अपने चारों तरफ लपेटे धन-सम्पन्नता के लक्षणों का प्रदर्शन करते हुए चल रहे थे। 

अंग्रेज रमणियां थीं, जो धीरे नहीं चलती थीं, तेज चलती थीं। उन्हें न चलने में थकावट आती थी, न हंसने में लाज आती थी। कसरत के नाम पर भी बैठ सकती थीं, और घोड़े के साथ ही साथ जरा जी होते ही, किसी हिन्दुस्तानी पर भी कोड़े फटकार सकती थीं। वह दो-दो-तीन-तीन, चार-चार की टोलियों में निश्शक, निरापद, इस प्रवाह में मानो अपने स्थान को जानती हुई, सड़क पर से चली जा रही थीं। 

उधर हमारी भारत की कुललक्ष्मियां, सड़क के बिल्कुल किनारे-किनारे दामन बचाती और सम्हलाती हुई, साड़ी की कई तहों में सिमट सिमटकर, लोक-लाज, स्त्रीत्व और भारतीय गरिमा के आदर्श को अपने परिवेष्टनों में छिपाकर, सहमी सहमी धरती में आंखें गाड़े कदम-कदम बढ़ रही थीं। इसके साथ ही भारतीयता का एक और नमूना था। अपने कालेपन को खुरच-खुरच कर बहा देने की इच्छा करने वाले अंग्रेजीदा पुरुषोत्तम भी थे, जो नेटिव को देखकर मुंह फेर लेते थे और अंग्रेज को देखकर आंखे बिछा देते थे, और दुम हिलाने लगते थे। वैसे वह अकड़ कर चलते थे-मानो भारत भूमि को इसी अकड़ के साथ कुचल-कुचलकर चलने का उन्हें अधिकार मिला है। (जैनेन्द्र की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ- डॉ. निर्मला जैन)




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शनिवार, 9 मार्च 2024

रेत जैसे रंग वाली लड़की

रेत जैसे रंग वाली लड़की

रेत के घरौंदे बनाया करती थी

ताम्बई रंग वाला लड़का

उन घरौंदों को लात मारकर

अक्सर तोड़ जाया करता था

बहुत मजा आता था उसे

रेत जैसे रंग वाली लड़की के

रेत वाले घरौंदों को तोड़कर

बहुत खुश होता था

ताम्बई रंग वाला लड़का

रेत जैसे रंग वाली लकड़ी के

चेहरे पर उदासी देखकर

मगर रेत जैसे रंग वाली लड़की

ताम्बई रंग वाले लड़के से

नाराज न होकर

फिर-फिर रेत के घरौंदे

बनाती थी इस उम्मीद में

कि कभी तो ताम्बई रंग वाला लड़का

उसके बनाये घरौंदे की

करेगा तारीफ़ और कहेगा

कि ओ रेत जैसे रंग वाली लड़की

तुम रेत के घरौंदे कितना सुन्दर बनाती हो...

             कृष्णधर शर्मा  9.3.24 

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शनिवार, 2 मार्च 2024

सौदामिनी-विभूतिभूषण मुखोपाध्याय

 वास्तव में, दो दिन में ही, जैसा धैर्य-च्युत हो बैठा हूं-इससे भली-भांति समझा जा सकता है कि यह नौकरी रहेगी नहीं। एक तो इस अभिजात वातावरण में अपने को एडजस्ट नहीं कर पा रहा। दूसरे एक रहस्य भी है....इस कोठी में कहीं कोई एक गृहस्वामिनी भी है किन्तु उनके अस्तित्व का पक्की तरह निदर्शन नहीं मिल रहा। देखता हूं, मीरा ही सर्वमयी है। शायद मेरी नौकरी से उसका कोई साक्षात् सम्बन्ध नहीं फिर भी कुछ परेशानी का अनुभव कर रहा हूं। सबसे अधिक असह्य हो उठा है पत्थर जैसा खाली वक्त ! 

तरु प्रातः कहां जाती है ? ट्यूशन पढ़कर आती है ? दोपहर को कहां जाती है? स्कूल ?.... फिर मुझे इतना वेतन देकर क्यों रखा गया है ? काम के अभाव में कोठी के साथ किसी सम्पर्क सूत्र का अनुभव भी नहीं कर पा रहा हूं। अच्छी चाल है बड़े लोगों की ! आदमी रख लिया, पर उसका काम तक निश्चित नहीं कर देते। इसके बिल्कुल विपरीत पहले वाली सब जगहों पर गार्जियन-उपगार्जियनों का दल भागकर आता कि एक क्षण भी खाली तो नहीं बैठा हूं कहीं ! पर इससे तो सौ गुणा वही अच्छा था। 

रहस्य उस दिन कुछ खुला। 

चिट्ठी पोस्ट करके मन-ही-मन सोचता-विचारता बाग में एक लोहे के बेंच पर जा बैठा। बाहर से बाग जितना अधिक कृत्रिम और भद्दा लग रहा था अब उतना नहीं लग रहा। बल्कि कहूं कि अच्छा ही लग रहा है। साफ-सुथरे कटे-छटे बालों वाले व्यक्ति के शरीर पर जैसे ढीला-ढाला कोट अच्छा नहीं दीखता, बल्कि सुडौल कुरता सुन्दर लगता है। इस कोठी के ख्याल से यह बाग भी कुछ वैसा ही है। 

मेरे बेंच के पास गुलाब की एक क्यारी है। हाथ के पास वाले पौधे में पांच-छह गुलाब खिले हुए हैं। इन दिनों सोचते-सोचते कोठी के अन्दर की हवा मानो भाराक्रांत हो उठी थी....यहां अच्छा लगा। मैंने गन्ध लुब्ध हो एक फूल खींचकर अलग पकड़ लिया- पत्ते घास पर झर पड़े। मैं शंकित हो उठा। एक बार देखा-निःशब्द वहां से चले जाने की सोच ही रहा था कि बरामदे से बेयरा ने आवाज दी, "मास्टर साहब मेम साहब आपको बुला रही हैं।" 

(सौदामिनी-विभूतिभूषण मुखोपाध्याय)




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