शुक्रवार, 14 जुलाई 2023

मुझे तीन दो शब्द

 

मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ।

एक शब्द वह जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ,

 

और दूसरा : जिसे कह सकूँ

किंतु दर्द मेरे से जो ओछा पड़ता हो।

 

और तीसरा : खरा धातु, पर जिसको पाकर पूछूँ—

क्या न बिना इसके भी काम चलेगा? और मौन रह जाऊँ।

 

मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ।

 

अज्ञेय

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बुधवार, 12 जुलाई 2023

खोई हुई दिशाएँ- सेवा राम यात्री

 यों तो शहर में चीनी मिलें भी कई खुल गई थीं, मगर गाँव में नवम्बर से लेकर फरवरी-मार्च तक कोल्हू चलते थे और गन्नों का रस बड़े-बड़े कड़ाहों में पकाकर मिट्टी के बहुत लम्बे-चौड़े चाकों में डालकर लकड़ी के बेलचों से खूब चाँड़ा जाता था। जब वह ठंडा होकर सख्त होने लगता था तो उसे गुड़ की भेलियों की शक्ल में ढाल दिया जाता था। 

मैं भी अपने छुटपन में चच्चा और मन्नी बाबा के साथ-जब वह अपनी बारी आने पर बैलों की जोट (जोड़ी) लेकर कोल्हू पर जाते थे-चल पड़ता था और कभी- कभी तो रात-भर उस झोंपड़ी में रह जाता था जहाँ पूरी रात में चाक में कई बार गुड़ बनाया जाता था। जो लोग उस समय कोल्हू पर होते थे उन्हें गरम ताजे गुड़ के गोल-गोल ढेले दिए जाते थे। कुछ उन्हें उसी वक्त खा लेते थे तो कुछ सँभाल कर रख लेते थे और घर जाते समय अपने साथ ले जाते थे। 

गाँव की जिन्दगी के यह तीन-चार महीने बहुत खुशगवार होते थे। खेतों में मटर और चने की फसल फल-फूल रही होती थी। हम लोग खेतों में निकल जाते थे, खूब मटर की फलियाँ तोड़-तोड़ कर खाते थे। ईख के खेतों से गन्नों को झटका देकर तोड़ लेते थे। खेतों की मेड़ों पर फसकड़ा मारकर बैठ जाते थे और ढेरों गन्ने चूस डालते थे। इस तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता था कि हम किस खेत से गन्ने चटका रहे हैं या किसके खेत से मटर की फलियाँ तोड़-तोड़कर खा रहे हैं। गाँव की जिन्दगी में उस वक्त मेरा-तेरा का कोई भेद नहीं था। महिलाएँ और नौजवान युवतियाँ खेतों में घूम-घूमकर चने और सरसों का साग खोंटती रहती थीं। घर लाकर हँडियों में उस साग को पकाया जाता था। मक्का और बाजरे की रोटियों के साथ, सरसों और चने का साग कितनी बड़ी नियामत थी- इसे कहकर नहीं बताया जा सकता। साग के साथ छाछ और 'गुड़ भी मिल जाते थे तो मन्नी बाबा कहते थे, “बस सुरग अबै बालिस्तेक दूर रह गयो हतै।" मैं उनसे पूछता था कि “सुरग पूरा क्यों नहीं मिल गया यह एक बालिश्त दूर क्यों रह गया?” वह हँसकर जवाब देते थे, “बाबरे, पूरा सुरंग तो मरके ई मिल्यो करै है - जीते-जी तो बस सुरंग को सुख ई कदी-कदा मिले जात हैगो।” (खोई हुई दिशाएँ- से. रा. यात्री)




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सोमवार, 3 जुलाई 2023

एक कतरा खून-इस्मत चुगताई

 अमीर माविया ने हर मुकाम पर अपने आज़मूदार इस्लामी गवर्नर बना दिए, जिन्हें अपनी फौज रखने की इजाज़त थी। वह मालिक और आम मुसलमान उनके ग़ुलाम बन गए। वह जिसे चाहते जिलाते, जिसे चाहते मारते। कोई पुरसाहाल न था। सिर्फ एक शर्त थी कि अमीर माविया को अपना ख़लीफ़ा मानें और उनके जाती ख़ज़ाने के लिए मुकर्रर टैक्स देते रहें। इसके अलावा जैसी वसूली करना चाहें, रिआया से कर लें। अगर अवाम उन्हें मनमानी करने से रोकना चाहें तो अमीर माविया की ज़बर्दस्त फौज उनकी मदद को पहुँच जाएगी। इसका चंद साल में ही यह नतीजा हुआ कि चंद बड़े-बड़े ताकतवर सरदार बहुत अमीर हो गए। बाकी अवाम में गुरबत बढ़ गई। अवाम की लूट शुरू हो गई। ख़वास फिर उन ऐयाशियों और बदकारियों में गर्क हो गए, जिनके ख़िलाफ़ एक दिन इस्लाम ने जंग की थी। 

दो ख़िलाफ़तें कायम हो गईं। एक अली की इस्लामी उसूलों की कायम हुई जम्हूरियत', दूसरी तरफ अमीर माविया की शहंशाहियत'। अली आम ग़रीब इंसान के साथ थे। मगर अमीर माविया की ताकत और दौलत ज्यादा कामयाब साबित हो रही थी। अमीर का साथ देने में बड़े फायदे थे, जबकि अली के साथ उड़बार की नेमतें थीं। दुनिया की नेमतें उकबा के दावों पर ग़ालिब आ गई। 

हुनैन के मुकाम पर मुसलमानों में आपस ही में जंग छिड़ गई। अमीर माविया के साथ ज़बर्दस्त फ़ौज थी। दौलत तो थी मगर यकीन की कमी थी। उस पर अली बिन अबी तालिब की फुतूहात' की हैबत' तारी थी। 

आम अरब बड़ा वहमी होता है। वह बड़ी आसानी से जज़्बात की रौ में बह जाता है। इंसान सिर्फ हथियारों से नहीं लड़ते, ईमान भी साथ में होना लाज़मी है। अमीर माविया ने अपनी फौज को यकीन और भरोसे की कमी की वजह से पस्पा' होते देखकर फौरन अपनी सियासते-अमली' से काम लिया। कुरान दरम्यान में रखकर जंग रोक दी। अली उनकी यह चाल पहचान गए। उन्होंने बहुत कहा, “यह अमीर माविया की कोई तदबीर है। जंग बंद करवा के वह कोई नई चाल चलने वाले हैं ताकि अपनी शिकस्त को नया मोड़ दे सकें।" मगर यह मुसलमान और काफिर की जंग नहीं थी। यह दो इस्लामी गिरोहों की जंग थी। कुरान के बीच में आने के बाद जंग न रोकना करान की तौहीन थी। (एक कतरा खून-इस्मत चुगताई)




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