शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

रात का फूल

 

एक फूल

रात की किसी अंधी गाँठ में

घाव की तरह खुला है

किसी बंजर प्रदेश में

और उसके रंग में जादू है

टूटती हुई गृहस्थी,

छूटती हुई नौकरी, अपमान और असुरक्षा

के तनाव में टूटते हुए मस्तिष्क से

निकली है कोई कविता

जिसके क्रोध और दुख और घृणा में

कला है

ख़ाली बरतनों, दवाइयों की शीशियों

और मृत्यु की गहरी गंध से भरे

कमरे में

हँसता है वह ढाई साल का बच्चा

और उसके दूधिया दाँतों में

ग़ज़ब की चमक है!

 

उदय प्रकाश

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