नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

गुरुवार, 13 जून 2013

साबुन

 

सुखदेव ने ज़ोर से चिल्ला कर पूछा—“मेरा साबुन कहाँ है?”

श्यामा दूसरे कमरे में थी। साबुनदानी हाथ में लिए लपकी आई, और देवर के पास खड़ी हो कर हौले से बोली—“यह लो।”

 

सुखदेव ने एक बार अँगुली से साबुन को छू कर देखा, और भँवें चढ़ा कर पूछा—“तुमने लगाया था, क्यों?”

श्यामा हौले से बोली—“ज़रा मुँह पर लगाया था।”

 

क्यों तुमने मेरा साबुन लिया? तुमसे हज़ार बार मना कर चुका हूँ। लेकिन तुम तो बेहया हो न!”

गाली मत दो! समझे?”

 

श्यामा ने डिब्बी वहीं ज़मीन पर पटक दी, और तेज़ क़दमों से बाहर जाती-जाती बोली—“ज़रा साबुन छू लिया मैंने, तो मानो ग़ज़ब हो गया!” फिर दूसरे कमरे की चौखट पर मुड़ कर, बोली—“मैं क्या चमार हूँ?”

सुखदेव ने वहीं से चिल्ला कर कहा—“हो चमार! तुम चमार हो! ख़बरदार जो अब कभी मेरा साबुन छुआ!”

 

अँगीठी पर तरकारी पक रही थी। श्यामा भुन-भुन करती, ढक्कन हटा कर, करछुल से उसे लौट-पौट करने लगी, तो देखा तरकारी आधी से ज़्यादा जल गई है। उसने कढ़ाई उठा कर, नीचे ज़मीन पर पटक दी।

ख़ाक हो गई नासपिटी!” तरकारी को निहारती, नाराज़ हो कर बोली। तभी उधर ठन्न से लोटा गिरने की आवाज़ हुई श्यामा ने चौंक कर देखा, बड़ा लड़का बाल्टी खींच कर बाहर लिए जा रहा था। चिल्ला कर कहा—“कहाँ लिए जा रहा है, अभागे?”

 

नहाएँगे,” लड़का शांत भाव से ज़मीन पर बाल्टी घसीटता, बोला—“चाचाजी ने कहा है।”

चाचाजी के बच्चे! गू-मूतों में डाल दी बाल्टी!”

 

उसने लड़के के हाथ से बाल्टी छीन ली, और पैरों से धमधम करती ग़ुसलख़ाने के आगे तक आई।

सुखदेव छोटे भतीजे को सामने बिठा कर उसके सिर पर साबुन मल रहा था। भाभी को देख कर बोला—“काला कर दिया साबुन। चेहरे का रंग लग गया इसमें काली माई के!”

 

श्यामा ने चिल्ला कर पूछा—“मैं काली हूँ?”

सुखदेव न बोला। बच्चे के सिर पर साबुन मलता रहा।

 

श्यामा ने बाल्टी वहीं पटक दी, और चढ़े स्वर में पूछा—“मैं काली हूँ? मैं काली माई हूँ?”

सुखदेव ने घबरा कर कहा—“धीरे बोलो। भाई साहब आ गए!”

 

श्यामा ने चौंक कर उधर देखा। कमरे के दरवाज़े पर पति के जूते चमक रहे थे।

ऊपर जो किराएदार रहते थे, उनके यहाँ बड़ी क्लाक-घड़ी थी। टन करके आधा घंटा बजा, तो उसने जल्दी-जल्दी हाथ चलाए। फिर थाली परोस कर पति को आवाज़ दी—“आओ।”

 

ब्रजलाल ने आसन पर बैठ कर, भोजन पर एक नज़र डाली और पूछा—“आज तरकारी नहीं बनी?”

नहीं।”

 

यहाँ प्याली में क्या है?”

कदुआ है। लल्ला के लिए रख दिया है। दाल से खाओ।”

 

पति ने आज्ञा मान कर, एक ग्रास मुख में दिया, और शांत भाव से बोले—“नमक लाओ।”

क्या कम है?”—श्यामा ने नमक की बुकनी थाली में छोड़ते हुए पूछा।

 

बिलकुल नहीं है।”

क्यों झूठ बोलते हो? मैंने नमक डाला था। शर्त लगाती हूँ।”

 

पति ने हँस कर कहा—“यही सही। लेकिन अपनी कुशल चाहो, तो पतीली में नमक पीस कर डाल दो। सुखदेव अभी खाने बैठेगा, तो फिर आफ़त आ जाएगी तुम्हारी।”

श्यामा ने स्वर को चढ़ा कर कहा—“क्या आफ़त आएगी? फाँसी दे देंगे मुझे? मैं दासी हूँ न सबकी!”

 

ब्रजलाल ने हँस कर कहा—“तुम राजरानी हो। लाओ, रोटी तो दो।”

वे कपड़े पहन कर आफ़िस जाने को तैयार हुए, तो श्यामा ने चौखट पकड़े-पकड़े, कहा—“मुझे साबुन चाहिए।”

 

साबुन!”—पति ने अचरज से कहा—”कैसा साबुन? सुखदेव से कहो। छाता लाओ। वह फ़ाइल उठाना।”

तभी रसोईघर से एक पुकार आई—“भाभी, खाना परोसो।”

 

फिर दो पतली आवाज़ें एक साथ आई—“भाभी, खाना परोसो।”

बड़ा लड़का अलग थाली में खाता है। छोटा अपने चाचाजी के हाथ से खाता है। तीनों पास-पास, नहाए-धोए, आसनों पर बिराजे, भोजन कर रहे थे।

 

बड़े लड़के ने मुँह बिचका कर कहा—“दाल में इतना नमक है कि पूछो मत!”

श्यामा ने डरते-डरते देवर की ओर देखा। पर सुखदेव ने नमक के बारे में कुछ शिकायत न की, उलटे भतीजे को डाँट कर बोला—“खाओ चुपचाप!” फिर भाभी के आगे प्याली सरका कर बोला—“तरकारी और देना भाभी।”

 

भाभी ने हँस कर, कहा—“तरकारी अब नहीं है।”

सब ख़तम?”

 

यह देखो,” कढ़ाई आगे खींच कर, हँस कर कहा—“जल गई सब। यही इतनी बची थी, सो तुम्हारे लिए छाँट कर निकाल ली थी।”

देखें, जली हुई का स्वाद देखें।”

 

श्यामा ने कढ़ाई पीछे को करके कहा—“यह तुम्हारे खाने के क़ाबिल नहीं है। लो, दाल और ले लो।”

बड़े लड़के ने कहा—“मैं भी दाल और लूँगा।”

 

श्यामा ने उसके आगे सरका कर कहा—“ले, दाल ले।”

लड़का पतीली में झाँक कर बोला—“कहाँ है इसमें दाल?”

 

दाल नहीं है। अब तू मेरा सिर खा ले, पेटू!”…

छोटे भतीजे के जूठे हाथ धो कर, सुखदेव कॉलेज के कपड़े पहनने लगा तो, क़मीज़ में एक ही बटन बचा पाया।

 

सुई-डोरा और बटन हाथ में लिए, भाभी के आगे आ खड़ा हुआ। श्यामा थाली परोस कर खाना शुरू ही कर रही थी। सुखदेव ने क़मीज़ उसकी गोदी में रख कर कहा—“जल्दी, भाभी, जल्दी!”

भाभी जल्दी-जल्दी बटन टाँकने लगी और तब सुखदेव की नज़र भाभी के परोसे हुए भोजन पर गई। तरकारी, जो जल कर काली हो गई थी, अकेली-अकेली थाली में सजी थी।

 

तभी भाभी ने क़मीज़ ऊपर को करके कहा—“लो, थामो! अब मुझे भी पेट में कुछ डाल लेने दो।”

बड़ा भतीजा बाहर दरवाज़े पर खड़ा था। उसके स्कूल की आज छुट्टी थी। कॉलेज जाने लगा, तो सुखदेव उसका हाथ पकड़ कर, खींचता हुआ ले गया जल्दा-जल्दी बड़ी दूर तक।

 

चार मिनट बाद लड़के ने दही का कुल्हड़ माँ के आगे ला धरा।

श्यामा उसी जली तरकारी से रोटी खाए जा रही थी! दही देख कर अचरज से पूछा—“कहाँ से ले आया, रे?”

 

लड़का बाहर को भागता-भागता बोला—“चाचाजी ने दिया है।”

(दो)

 

पड़ोस में रहने वाली पंजाबिन बच्चों के कपड़े बहुत सस्ते सीती थी। उसके आदमी को श्यामा ने पति से आग्रह कर-कर के, उन्हीं के आफ़िस में लगवा दिया था। सुखदेव अपने सब कपड़े जे.बी. दत्ता कंपनी में सिलवाता था। बच्चों की क़मीज़ें भी पिछली बार, उसने वहीं सिलवाईं। वे सब क़मीज़ें पहनने पर बच्चों की छोटी हुईं, और सिलाई लगी इतनी। देवर-भाभी में एक द्वंद्व युद्ध हो गया। फलतः इस बार बच्चों की क़मीज़ें पंजाबिन को दीं श्यामा ने। सिलाई ऐसी सुघड़ हुई, कि देख कर दिल ख़ुश हो गया। ख़ुश हो कर, उसके आगे एक रुपया धरा, और हँस कर बोली—“अबकी बार मुन्ना के बाबू की क़मीज़ें भी तुम्हीं से सिलवाऊँगी बहिन।”

ज़रूर-ज़रूर बहिन जी! मुझी से सिलवाना बाबूजी की क़मीज़ें। यह रुपया रख लो, बहिन जी, यह रुपया रख लो।”

 

श्यामा ने कहा—“नहीं, बहिन, सिलाई तो तुम्हें लेनी ही होगी।”

पंजाबिन बोली—“मुझ पर ज़ुल्म न करो, बहिन जी!” आँखों में आँसू भर कर बोली—“ज़ुल्म न करो मुझ पर। मुझे इतना जुदा न करो, रानी जी! मुन्ना क्या मेरा बेटा नहीं है? तुम्हें मेरे सिर की क़सम बहिन जी, यह रुपया उठा लो।”….

 

वही एक रुपया था श्यामा के पास, और उसी रुपए को लिए-लिए सारे दिन घूमती रही कि आज साबुन मँगा कर छोड़ूँगी। पर ऐसी तक़दीर फिरी, कि कोई न मिला साबुन लाने वाला। तब खीझ कर, बड़े लड़के को समझा-बुझा कर गली के मोड़वाली दुकान पर भेजा साबुन लाने और संतोष की साँस ले कर, बोली मन-ही-मन कि “सुबह अपनी नई टिक्की से जब नहाऊँगी, तो देखूँगी! रोज़ लगाऊँगी साबुन!”

पर लड़के की अक़्ल पर पत्थर पड़ गए। दो आने का कपड़े धोने का बदबूदार साबुन और चौदह आने पैसे माँ के सामने रख कर भाग गया।

 

श्यामा ने वह दो आने का साबुन उठा कर कोने में फेंक दिया, और लड़के को कोसती रसोई बनाने लगी।

आध घंटे बाद पति आ पहुँचे, और उसके आध घंटा बाद देवर। खाना तैयार हो चुका था। पति के कोई मित्र आ गए थे, और बातों की झड़ी लगाए थे। श्यामा दस बार उस कमरे के दरवाज़े पर झाँक कर लौट आई, और दो बार लड़के को भी बाप के पास भेजा। ब्रजलाल ने कहा—“आते हैं।” पर वह बातूनी भला आदमी न उठा, न उठा।

 

हार कर श्यामा ने देवर से कहा—“लल्ला, तुम तो खाओ। वे तो आज बातों से ही पेट भरेंगे!”

सुखदेव ने हौले से कहा—“कहो, तो मैं जाऊँ और उनसे हाथ जोड़ कर कहूँ अब तशरीफ़ ले जाइए, श्रीमान्!”

 

श्यामा ने हँस कर कहा—“गोली मारो श्रीमान को! लो, मैंने थाली परोस दी।”

सुखदेव ने चारों ओर नज़र दौड़ा कर पूछा—“बच्चे कहाँ हैं?”

 

श्यामा हँस कर बोली—“चाचा की ससुराल गए हैं। प्रियंवदा का नौकर आया था। उनके यहाँ आज कथा है। तुम नहीं जाओगे?”

बको मत!” सुखदेव ने जल्दी से कौर मुँह में दे कर कहा—“पानी दो गिलास में!”

 

ऊपर पानी बंद हो गया था। ऊपर वाली सेठानी यहाँ बाल्टी लगाए खड़ी थी। हँस कर बोली—“म्हाने भर लेने दो, जी!”

पर सुखदेव ने जल्दी-जल्दी पानी पिया, और जल्दी-जल्दी क़मीज़ पहन कर पैरों में चप्पलें डाल कर खड़ा हो गया रसोई-घर के सामने।

 

श्यामा जूठी थाली ले कर, बाहर निकली, और उसे यूँ खड़ा देखा, तो रुक गई।

सुखदेव ने हौले से कहा—“भाभी!”

 

भाभी हौले से बोलीं—“क्यों, क्या है?”

भाभी, आज बड़ी अच्छी फ़िल्म है।”

 

तुम जा रहे हो?”

पैसे नहीं हैं!”

 

भाभी ने सोच कर कहा—“चौदह आने से काम चल जाएगा? चौदह आने हैं मेरे पास।”

लाओ, लाओ!”

 

श्यामा ने थाली वहीं रख दी, और दौड़ी जाकर बक्स में से चौदह आने निकाल लाई और देवर की जेब में वे चौदह आने डाल कर, बोली हौले से—“वह उधर वाली कुंडी खटखटाना, मैं जागती रहूँगी।”

सुखदेव ने हौले से कहा—“अच्छा। भाई साहब पूछेंगे तो क्या कहोगी?”

 

श्यामा ने हौले से कहा—“कह दूँगी, कि प्रोफेसर शर्मा के यहाँ गए हैं!”

सुखदेव ने प्रसन्न हो कर कहा—“बस-बस, यही कह देना।” और दरवाज़े की ओर दबे पाँव बढ़ा, और चौखट के पार हो गया। फिर किवाड़े पर मुँह रख कर, हौले से पुकारा—“भाभी!”

 

भाभी लपक कर आगे आईं। हौले से बोलीं—“हाँ।”

सुखदेव ने हौले से कहा—“नमस्ते!”

 

तभी ब्रजलाल ने पीछे से आवाज़ दी—“खाना परोसो!”

(तीन)

 

प्रियंवदा से सुखदेव का परिचय था। दो साल पहले वह एक लड़की को पढ़ाने जाता था। वहीं अपनी शिष्या की सहेली के रूप में प्रथम साक्षात्कार हुआ था। फिर वह परिचय प्रगाढ़ हो कर, जब रूप बदलने लगा और स्नेह की वर्षा होने लगी, तो दोनों ओर से भाग्यदेवता बहुत हँसे। किसी को कानों-कान ख़बर न हुई, और स्नेह का रंग प्रणय में परिणत हो गया। उस लड़की की पढ़ाई बंद हो गई, तो और उपाय न पा कर, काग़ज़ के टुकड़ों पर मन के अंतराल की बातें अंकित हो कर आने लगीं। भाग्य के देवता हँसते रहे।…...

श्यामा एक दिन धोबी को मैले कपड़े दे रही थी। जेबें ख़ाली करके देवर का कोट डालने लगी धोबी के आगे, तो उनमें एक पत्र पाया, जिसमें लिखा था—“प्राणों के स्वामी हृदयेश्वर...।”

 

ख़ूब ख़ुश हुई वह, और सुखदेव को ख़ूब डराया-धमकाया। तुच्छ-सा हो गया वह भाभी के आगे। सिर झुका लिया, और बार-बार उस चिट्ठी को लौटाने की ज़िद करने लगा। श्यामा ने हँसी रोक कर कहा—“नहीं, यह चिट्ठी तुम्हें नहीं, तुम्हारे भैया को दूँगी। ज़रा आटे-दाल का भाव मालूम हो तुम्हें!”

सुखदेव से और कुछ बन न पड़ा। भाभी के पैरों पर अपना सिर रख कर रोने लगा। ऐसा कायर निकला प्रेमी!...

 

उसी दिन से भाभी ‘नर्म-सचिव’ हो गईं। उन्हीं की सलाह से सब काम होने लगा। एक दिन नुमाइश में दूर से प्रियंवदा के दर्शन भी करा दिए भाभी को। घर लौटने लगे, तो राह में भाभी चलती-चलती बोलीं—“हे भगवान, यही तुम्हारी प्रियंवदा है! रूप की जोत लिए सारी नुमाइश को चकाचौंध किए थी। हाय राम, मैं तो उसके पैरों के धोवन भी नहीं हूँ। कैसे उसकी जिठानी बन पाऊँगी? मुझे ‘जीजी’ कहते भी वह घिनाएगी, मुझे देख कर हँसेगी।”

सुखदेव सुन कर, हौले से बोला—“गला काट लूँगा!”

 

भाभी बोली—“किसका गला काट लोगे? मेरा?”

पर सुखदेव और कुछ न बोला।...

 

दूसरे दिन प्रियंवदा का नौकर श्यामा को एक छोटी-सी ‘पाती’ दे गया, जिसमें ‘जीजी’ के चरण कमलों में ‘दासी’ प्रियंवदा के प्रणाम की बात लिखी थी, और लिखा था कि “अभागिन से ऐसा क्या अपराध हो गया, जो इतने निकट आ कर भी राजराजेश्वरी माता बिना दर्शन दिए चली गईं? एक बार चरणों की रज अपने माथे पर लगा लेती। जीवन कृतार्थ कर लेती अपना...”

पर ‘राजराजेश्वरी’ का यहाँ हाल था कि तन पर कभी पूरे कपड़े भी नहीं हो पाते हैं।

 

ठंड पड़ने लगी, और सुबह तड़के-तड़के नहा कर रसोई चढ़ाते जब श्यामा को कँपकँपी लगने लगी, तो उसने याद करके देवर का बक्स खोल कर वह पुराना स्वेटर निकाल लिया, जिसे कीड़ों ने जगह-जगह काट कर तरह-तरह के वातायन और गवाक्ष बना दिए थे, हवा के आने-जाने के लिए।

उसी स्वेटर को रोज़ सुबह पहन लेती, और गर्मी पा कर कहती, कि “चलो अच्छा है। यह जाड़ा मज़े में काट देगा।”

 

रात को सिनेमा देखा सुखदेव ने, और सुबह सूरज चढ़े तक गहरी नींद ली। फिर भी देह का आलस्य न गया। एक जमाई ले कर छोटे भतीजे से बोला—”चलो बेटा, चाय पी आएँ।”

लड़का कूद कर बोला—“चाचाजी, बिस्कुट भी खाएँगे न?”

 

सहसा सुखदेव को याद आया कि चायवाले के नौकर को उसने अपना स्वेटर देने का वादा किया था। वह बक्स खोल कर, पुराना स्वेटर खोजने लगा। पर स्वेटर न मिला। एक-एक करके, सारे कपड़े बाहर निकाल कर फेंक दिए। पर स्वेटर के दर्शन न हुए। कहाँ गया?

भाभी रसोईघर में बैठी, दाल बीन रही थीं। उनसे आ कर पूछा—“मेरा स्वेटर था एक पुराना।”

 

मैंने ले लिया!”

तुमने कैसे ले लिया?”—सुखदेव ने माथे पर बल डाल कर कहा, “तुमने क्यों मेरा बक्स खोला? क्यों ले लिया मेरा स्वेटर?”

 

भाभी ने शांत स्वर में कहा—“बेकार पड़ा था, इसलिए निकाल लिया।”

सुखदेव ने स्वर को तीव्र करके कहा—“मुझसे बिना पूछे तुमने कैसे ले लिया? तुम मेरी चीज़ क्यों छूती हो?”

 

भाभी सुन कर चुप रहीं।

सुखदेव ने उसी स्वर में कहा—“कहाँ है स्वेटर, लाओ दो!”

 

भाभी ने शांत स्वर में कहा—“चलो अपने कमरे में। लाए देती हूँ स्वेटर।”

यहीं ला कर दो। अभी फ़ौरन!”

 

भाभी ने इधर को पीठ करके स्वेटर उतारा, फिर उधर को मुँह करके शांत स्वर में कहा—“यह लो!” और नतमुख किए हौले से कहा—“बाक़ी कपड़े भी उतरवा लो तन के!”

सुखदेव क्षण भर भौचक्का-सा खड़ा रहा। स्वेटर सामने पड़ा था, और भाभी सिर झुकाए फिर दाल बीनने लगी थीं। सुखदेव वह स्वेटर उठाने लगा, तो एक बार भाभी के झुके मुख की ओर देखा। आँखों से आँसू टपक रहे थे भाभी के।….

 

वही कल वाला बातूनी आदमी सुबह होते ही फिर आ धमका था। ब्रजलाल को अपने साथ ले गया। सड़क तक बातें करते-करते। साढ़े नौ बजे उधर से लौटे तो हँस रहे थे। खाने बैठे, तब भी हँस रहे थे। हँसते गए, और खाते गए। और खाते-खाते ही बोले, हँस कर—“तुम्हारी देवरानी को देख आए।”

श्यामा तब से गुम-सुम बैठी थी। वह सुन कर, कुछ न बोली। पति ने हँस कर कहा—“लड़की ज़रा उठते क़द की है। सुखदेव के कंधे तक समझो।”

 

श्यामा ने फिर भी कुछ न कहा। पति हँस कर बोले—“पैसा बहुत है उसके पास। सुखदेव को विलायत भेजने को तैयार है। एक मकान दहेज में देने को कह रहा है।”

श्यामा फिर चुप रही।

 

ब्रजलाल ने खाना समाप्त करके पानी पिया, और उठ गए। घड़ी की ओर देखते गए, और कपड़े पहनते गए। फ़ाइल सँभाली, और शीशे में अपना मुँह देखा और बाहर को बढ़े कि श्यामा ने रास्ता रोक कर कहा—“मेरे लिए एक स्वेटर ला दो।”

स्वेटर!”—पति ने झिड़की दे कर कहा—“क्या कह रही हो? मुझे आफ़िस की देरी हो रही है। और तुम स्वेटर की फ़र्माइश कर रही हो। सुखदेव से कहो।”

 

श्यामा ने सिर झुकाकर कहा—“तो मुझे कुछ रुपए दो आज। मैं मँगवा लूँगी किसी से।”

किसी से क्यों?”—ब्रजलाल ने जल्दी से एक रुपए का नोट निकाल कर कहा—“सुखदेव ले आएगा। लो, थामो। है कहाँ सुखदेव?”

 

पर सुखदेव का पता न था। घंटे पर घंटा बीतता गया। सुखदेव जाने कहाँ जा कर बैठ गया था। खाना ठंडा होने लगा। श्यामा बार-बार दरवाज़े तक आ कर, दूर तक नज़र दौड़ाने लगी। दोनों लड़के एक-दूसरे का हाथ पकड़ कर चाय वाले की दुकान पर जा कर, चाचाजी को खोज आए, और उदास हो कर भूखे-प्यासे लेटे रहे चाजाजी के पलंग पर।

दूर गली के छोर पर एक संगी लड़का रहता था। श्यामा ने घबरा कर बड़े मुन्ना से कहा—“जा तो, विद्याभूषण के यहाँ चला जा, भैया! कहियो कि हमारे चाचाजी अभी तक घर नहीं लौटे। तुमको मिले थे? कहाँ गए हैं चाचाजी? कहियो कि हमारी माँ बहुत घबरा रही हैं।”

 

तभी खट से किसी के जूतों की आवाज़ हुई। श्यामा ने चौंक कर देखा तो सुखदेव सिर झुकाए फीते खोल रहा था।...

खाते समय बिल्कुल सन्नाटा रहा। लड़के भी इशारे से एक-दूसरे से बातें करते रहे। सुखदेव ने तो एक बार भी थाली से सिर न उठाया।

 

तीनों जने खा कर कमरे में लौट गए, और लड़कों की धूम-धड़ाक सुनाई देने लगी, तो श्यामा ने एक संतोष की साँस ली।

सहसा बड़े लड़के ने हाँफते हुए आ कर, माँ को एक काग़ज़ दिया, और बोला—“ले, पढ़ ले। चाचाजी ने दिया है। ले, पेंसिल ले यह! जवाब लिख।”

 

श्यामा ने हाथ का काम रोक कर, अचरज से वह काग़ज़ पढ़ा। सुखदेव ने लिखा था—

मुझसे प्रोफ़ेसर शर्मा की एक किताब खो गई है। आज उन्होंने अपनी किताब माँगी है। बाज़ार से ख़रीद कर ले जाऊँगा। साढ़े दस रुपए चाहिए। आप किसी से उधार दिलवा दीजिए। मैं सुबह से रुपयों की कोशिश करता रहा, पर कहीं नहीं मिले। आप कहीं से दिलवा दीजिए। भाई साहब से न कहिएगा आपको मेरे सिर की क़सम है। इति”

 

श्यामा ने उसी काग़ज़ की पीठ पर लिखा—

मेरे पास दस रुपए हैं। आप चाहें तो ले सकते हैं। आठ आने का इन्तिज़ाम कर लीजिए। इति”

 

ज़रा देर के बाद लड़का फिर दूसरा काग़ज़ ले आया। सुखदेव ने लिखा था—

दस रुपए ही सही। दीजिए। भाई साहब से न कहिएगा। मैं अगले महीने में आपको रुपए लौटा दूँगा। इति”

 

श्यामा ने दूसरी ओर लिखा—

मैं आपके भाई साहब से नहीं कहूँगी। आप ये रुपए मुझे अब लौटाइएगा नहीं, आपको मेरे सिर की क़सम है। इति”

 

(चार)

शाम को सुखदेव कॉलेज से लौटा, तो घर में कुहराम मचा था। बड़ा लड़का मुन्ना बाहर आँगन में खड़ा रो रहा था। और भाभी वाले कमरे से छोटे की चीख-पुकार सुनाई दे रही थी—“हाय, चाचाजी! हाय चाचाजी!”

 

सुखदेव ने घबरा कर मुन्ना से पूछा—“क्या हुआ रे?”

मुन्ना रोता-रोता बोला—“अम्माँ ने उसे बहुत मारा है। अब रस्सी से बाँध रही है।”

 

सुखदेव ने जल्दी से किताबें आलमारी में फेंकीं, और जूता बिना उतारे फड़ाक से किवाड़ खोल कर, भीतर जा खड़ा हुआ, जहाँ भाभी छोटे भतीजे के दोनों कोमल हाथ रस्सी से बाँध रही थीं, और मुख से कहती जा रही थीं—“बुला चाचाजी को! देखूँ कौन तुझे बचाता है? और चिल्ला, और पुकार चाचाजी को!...”

सुखदेव ने धक्का दे कर, श्यामा को पीछे ढकेल दिया, और जल्दी-जल्दी बच्चे के हाथ खोल कर, उसे कलेजे से लगा लिया। बच्चा चाचाजी से लिपट कर ख़ूब फूट-फूट कर रोने लगा।

 

आँखों में आँसू भरे, सुखदेव ने भाभी की ओर निहार कर पूछा—“क्यों मारा तुमने इसे?”

भाभी न बोलीं। हाथ पर हाथ धरे, बैठी रहें।

 

क्यों मारा तुमने इसे?”

भाभी ने हाथ उठा कर कहा—“ज़रा अपने कमरे में तो जा कर देखो! तुम्हारी भरी दावात उलट दी नासपीटे ने। एक रुपए का नुकसान कर दिया।”

 

सुखदेव ने कहा—“इसलिए तुमने मारा, क्यों?”

भाभी चुप रहीं।

 

सुखदेव ने कहा—“आज माफ़ करता हूँ। आइंदा जो तुमने बच्चे पर हाथ चलाया, तो मैं खाना छोड़ दूँगा समझीं?”

भाभी न बोलीं।

 

सुखदेव ने बाहर जाते-जाते कहा—“हत्यारिन ने ज़रा-सी दावात के पीछे अधमरा कर दिया मेरे लड़के को।”

और वह बच्चे को पुचकारता, बाहर आँगन तक आया, तो एक किनारे हाथ में ढका थाल लिए, प्रियंवदा के नौकर को खड़ा पाया। तब वह भाभी को एक आवाज़ दे कर, भतीजे को लिए-लिए अपने कमरे में आ कर टहलने लगा।….

 

प्रियंवदा के यहाँ भोज हुआ था। बच्चों को बुलाया था, पुरुषों का बुलाया था, स्त्रियों को बुलाया था। बच्चे, पुरुष, स्त्री, कोई भी न गया यहाँ से। दुखी हो कर, प्रियंवदा ने स्वयं भोजन न किया। फिर उदास हो कर, नौकर के हाथ बच्चों के लिए मीठा भिजवाया, अपनी माँ से कह कर।

नौकर थाल ख़ाली करके, हाथ जोड़ कर, विनय के स्वर में श्यामा से बोला—“माँ जी, आपको बीबीजी ने बुलाया है। जब कहें, मैं आपको लिवा ले चलूँ। एक दिन चल कर हमारी झोपड़ी पवित्र कर आइए, माँ जी!”

 

श्यामा को बहुत अच्छा लगा। प्रसन्न हो कर बोली—“वह तो मेरा अपना ही घर है। तू ऐसी बातें मत कह।”

नौकर हाथ जोड़े बोला—“तो कब चलेंगी माँ जी?”

 

श्यामा ने अधीर भाव से कहा—“कल इतवार है। इन लोगों की छुट्टी होगी। कल ही चलूँगी। तू दोपहर को आ जाना। खा-पी कर चलूँगी।”

नौकर सिर हिला कर बोला—“तो नहीं होगा, माँ जी! वहीं जीमिएगा। रूखा-सूखा जो कुछ हम ग़रीबों के घर बने...”

 

श्यामा ने हँस कर कहा—“अच्छा, यही सही।”

(पाँच)

 

उस शाम को ब्रजलाल देर से घर लौटे। वह बातूनी फिर मिल गया क्या रास्ते में?

ख़ूब भुखा गए थे। आते ही बोले—“खाना लाओ। यहीं कमरे में ले आओ।”

 

श्यामा ने दृढ़ स्वर में कहा—“खाना नहीं है।”

पति ने अचरज से पूछा—“क्यों, अभी तक नहीं बना क्या?”

 

बना है”, श्यामा ने दृढ़ स्वर में कहा—“लेकिन तुम्हारे लिए नहीं!”

ब्रजलाल ने खीझ कर कहा—“क्या बक रही हो? जाओ, थाली परोस कर लाओ।”

 

श्यामा पास वाली कुरसी पर धम्म से बैठ गई और हाथ उठा कर बोली—“पहले एक बात का फ़ैसला कर दो, तब खाना लाऊँगी।”

बोलो क्या है?”

 

श्यामा ने आगे को झुक कर कहा—“इस घर की मालकिन कौन है?”

ब्रजलाल ने हँस कर कहा—“तुम!”

 

श्यामा ने कहा—“उस बातूनी आदमी से तुमने यह बात कही या नहीं?”

तब वह मेरे देवर से अपनी लड़की ब्याहने वाला कौन होता है? और तुम्हीं क्या हक़ रखते हो इस तरह मुझसे बिना पूछे कोई बात कहने का?”

 

मैं उसका बड़ा भाई हूँ।” पति ने हँस कर कहा।

और मैं कौन हूँ?”—श्यमा ने आँखें सिकोड़ कर पूछा।

 

तुम भाभी हो उसकी।”

सिर्फ़ भाभी?”

 

ब्रजलाल चुप रह गए।

श्यामा ने सिर तानकर कहा—“जनाब, मैं ही उसकी माँ हूँ। मैं उसकी बहिन हूँ। मैं ही सब कुछ हूँ उसकी। समझे? मेरी आज्ञा के ख़िलाफ़ वह एक क़दम नहीं रख सकता। विश्वास न हो, तो करके देख लो कुछ। तुम यह शादी ठहराओ, मैं कल ही उसे ले कर यहाँ से चली जाऊँगी। बहुतेरा कमा लेगा। तुम समझते क्या हो मुझे?”

 

ब्रजलाल ने कहा—“तुम क्या कहलवाना चाहती हो मुझसे? जल्दी से बतला दो। मैं कहने को तैयार हूँ। खाना ला दो फिर।”

श्यामा ने कहा—“अब आए ठिकाने पर! अच्छा, कहो, तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध...?”

 

ब्रजलाल ने जल्दी से कहा—“तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध... “

श्यामा ने आगे कहलवाया—“कहो—कुछ न होगा।”

 

कुछ न होगा।”—ब्रजलाल ने जल्दी से दोहरा कर कहा—“अब खाना ले आओ।”

पर श्यामा न उठी। बोली—“कहो, मुझसे आज ग़लती हुई है, यानी...” और अचानक सुखदेव को सामने खड़ा देख कर, चुप रह गई वह।

 

देवर ने शायद वह उतनी आधी बात सुन ली। ब्रजलाल ने सिर उठाया, तो वे भी छोटे भाई को देख कर सकपका गए। श्यामा सिर पर आँचल खींच कर भागी।...

खाना प्रायः समाप्त हो चुका था। ब्रजलाल ने पानी पी कर एक डकार ली, फिर पत्नी के शांत, सौम्य मुख की ओर क्षण भर निहार कर बोले—“तो यहाँ अपने देवर की शादी न करोगी।”

 

हरगिज़ नहीं।”—श्यामा सिर हिला कर बोली।

पति ने हँस कर कहा—”वह मुझे सौ रुपए भेंट कर गया है।”

 

लौटा दो।” श्यामा ने फ़ौरन कहा।

पति बोले—“लौटा दूँगा। लेकिन परसों सुखदेव को अपनी परीक्षा की फ़ीस दाख़िल करनी है। कल इतवार है। कहो एक सप्ताह के लिए ये रुपए रख लूँ। पहली तारीख़ को शाम को वेतन मिल जाएगा। उसी दिन दे आऊँगा।”

 

जी नहीं।”

तब उसकी फ़ीस का क्या इंतिज़ाम करूँ?”

 

मैं कर दूँगी इंतिज़ाम। ऊपर वाली मारवाड़िन लोगों के ज़ेवर गिरवी रखती है। मैं अपनी लाकेट गिरवी रख कर तुम्हें रुपए दूँगी। अभी ला दूँ? संतोष न हो तो ला दूँ अभी। तुमने समझा क्या है?”

ब्रजलाल ने दोनों हाथ जोड़ कर सिर से लगाया और मुँह से कहा—“नमस्कार शत बार!”

 

श्यामा ने घबरा कर कहा—“अरे, लल्ला आ रहे हैं! हाथ नीचे करो, हाथ नीचे करो!”

पर सुखदेव इधर न आया। वहीं आँगन में खड़ा-खड़ा बोला—“भाभी, भूख लगी है।”

 

(छः)

रविवार को दोनों भाइयों का नियम-सा था कि सुबह नाश्ता करके निकल जाते यार-दोस्तों में और दोपहर को बारह-एक बजे तक लौटने का नाम न लेते। वही आज भी हुआ।

 

श्यामा को प्रियंवदा के घर जाना था। उसने जल्दी-जल्दी रसोई बनाई, फिर सब सँभाल-सुधार वहाँ जाने की तैयारी करने लगी। शीशे के सामने जा खड़ी हुई। भौंहों के नीचे से गाल तक कालिख लगी दीखी। हथेली रगड़ कर उस कालिख को मिटाने लगी, आँखें मींच कर। काफ़ी देर तक रगड़ा। फिर जो आँखें उघारकर शीशे में देखा तो सनाका हो गया। सारा चेहरा काला हो गया था। सारे चेहरे पर कालिख फैल गई थी।

श्यामा ने घबरा कर चारों ओर नज़र दौड़ाई कि कोई देख तो नहीं रहा है। फिर जल्दी से साबुनदानी उठा कर ग़ुसलख़ाने की ओर भाग गई।

 

मुख धोया साबुन से, हाथ धोए साबुन से। फिर पैरों की ओर नज़र गई तो पैर भी बहुत गंदे दीखे। तब फिर पैरों पर भी साबुन मलने लगी।

सहसा बाईं ओर किसी की परछाईं देख कर श्यामा ने साबुन मलते-मलते उधर को मुँह किया तो हाथ जहाँ के तहाँ रुक गए और आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा।

 

सामने नंगे बदन, कंधे पर धोती-तौलिया डाले, सुखदेव खड़ा था निश्चल, निर्वाक।

श्यामा से कुछ न बन रहा था। यूँही पैर पर साबुन लगाए बैठी रही।

 

आख़िर सुखदेव ने ही वह निस्तब्धता तोड़ी। मुस्करा कर मुँह खोल कर बोला—“बैठी क्यों हो? पैर धो कर हटो न!”

तब मानो श्यामा की चेतना लौटी। ओठों में तनिक मुस्कुराई और जल्दी-जल्दी पैर धो कर उठ आई वहाँ से। कमरे में आ कर शीघ्रता से साबुन की टिक्की एक कपड़े पर दबा-दबा कर सुखाई, फिर बड़े जतन से उसे साबुनदानी में रख कर ले आई।

 

सुखदेव पाइप खोल कर खड़ा था और जाने क्या सोचता पानी की धार को देख रहा था। खट से भाभी ने पैरों के पास वह साबुनदानी रख दी और लौट चली लंबे डग भरती।

सुखदेव क्षण भर साबुनदानी को निहारता रहा। फिर उसने नीचे झुक कर साबुन की टिक्की उठा ली और फिर तड़ित-वेग से दूर जाती भाभी की ओर वह साबुन फेंक दिया ज़ोर से।

 

पर साबुन भाभी के न लगा। जाने कैसे उसी क्षण ऊपरवाले मारवाड़ी सेठ सामने आ पहुँचे और जाने कैसे वह साबुन सेठजी की तोंद पर फटाक से लगा।

अरे, मार डाला रे!” सेठजी वहीं पेट पकड़ कर बैठ गए।

 

श्यामा ने पीछे घूम कर देखा और सुखदेव ने भी देखा। घबरा कर वह सेठ जी के पास दौड़ा आया और दोनों हाथों से उसकी वज़नी देह उठाता बोला—“अभी इधर एक बंदर कूदा था। मैंने देखा था, उसके हाथ में यह साबुन था।”

सेठजी ने एक हाथ की टेक ज़मीन पर लगाई और दूसरे हाथ में वह सामने पड़ा साबुन ले कर उठ बैठे किसी तरह। फिर उस साबुन को लौट-पौट कर निहारा और सुखदेव की ओर तिरछी नज़र से ताक कर बोले—“साबण तो नयो है! छै आणे को माल दे गयो हनूमान!”

 

सेठजी साबुन ले कर चल दिए। सुखदेव और श्यामा देखते रह गए। आख़िर प्रियंवदा का नौकर आ गया बुलाने। श्यामा ने दोनों लड़कों को सजा-सजू कर बाहर खड़ा किया। फिर डरती-डरती देवर के पास आ कर बोली—“ज़रा अपना रूमाल दे दोगे?”

क्यों, तुम्हारा रूमाल क्या हुआ?”

 

मेरे पास कब था रूमाल?”

तो यूँही जाओ।”

 

श्यामा ने अनुनय करके कहा—“दे दो ज़रा देर के लिए।”

सुखदेव ने चिल्ला कर कहा—“नहीं दूँगा रूमाल! चलो जाओ सामने से।”

 

श्यामा ने मुँह पर हाथ रख कर कहा—“अरे, धीरे बोलो! बाहर नौकर खड़ा है!”

सुखदेव ने और चिल्ला कर कहा—“नौकर की ऐसी-तैसी!”

 

श्यामा घबरा कर बाहर निकल आई।

(सात)

 

प्रियंवदा ने उसी विनम्र टोन में कहा—“मैं सच कह रही हूँ दीदी, न जाने कितनी बार उनके मुँह से यह बात सुन चुकी हूँ कि मेरी भाभी के सामने लक्ष्मण की सीता भी तुच्छ हैं। कितनी ही बार तुम्हारी बड़ाई करते-करते, तुम्हारी बातें सुनाते-सुनाते आँखों में आँसू भर लाए हैं, और भरे गले से कहा है कि भाभी मेरी इस धरती माता की तरह है। ऐसी ही सहनशील, ऐसी ही विशाल, ऐसी ही महान। मुझे कहते थे कि उनकी सेविका बन कर जीवन सफल कर लेना अपना! तुम्हारे जन्म-जन्मांतर के पाप धुल जाएँगे।”—कहते-कहते प्रियंवदा का स्वर करुण हो उठा और नयन गीले हो गए।

श्यामा न बोली। बोल नहीं पा रही थी। उसके कंठ में जाने क्या आ कर अटक गया था। फिर रुक-रुक कर भरे गले से बोली—“मैंने जाने कितने पुण्य किए थे उस जन्म में, जो ऐसे पति और देवर पाए। सच मानो बहिन, वे लोग देव-योनि के हैं। राह की धूल उड़ कर राज-मुकुट से जा लगी। पर मुकुट तो मुकुट ही है सखी, और धूल धूल!”

 

प्रियंवदा की आँखें सजल हो गई थीं। उन्हीं सजल आँखों से दीदी का सौम्य मुख निहार कर बोली—“दीदी, तुम देवता के कंठ की वरमाला हो। राह की धूल तो मैं हूँ, जो चरणों से लग कर पवित्र हो गई!” कह कर उसने श्यामा के पैरों से अँगुलियाँ लगा कर माथे से छुआ लीं।...

तभी छोटा लड़का घर की पालतू बिल्ली को गोद में लिए आ खड़ा हुआ। प्रियंवदा ने दोनों हाथ बढ़ा कर उसे गोदी में खींच लिया, फिर दो बार उसके शुभ्र सुंदर कपोलों का चुंबन करके बोली—“तुम्हारा क्या नाम है भैया?”

 

लड़के ने ऊपर मुँह करके कहा—“पहले तुम अपना नाम बतलाओ!”

प्रियंवदा हँसने लगी।

 

श्यामा ने हौले से कहा—“ये तुम्हारी चाचीजी हैं। समझे?” फिर प्रियंवदा की स्वच्छ साड़ी की ओर देख कर बोली—“बे-शुऊर, चमार कहीं का! सारी साड़ी गंदी कर दी पैरों से। उतार दो बहिन इसे।”

लड़का प्रियंवदा के गले से लिपट कर बोला—“नहीं उतरूँगा। ऐं चाचीजी?”

 

प्रियंवदा ने पुलकित हो कर बच्चे को फिर चूम लिया और हौले-हौले कहने लगी—“मेरा राजा भैया विलायत जाएगा पढ़ने। बैरिस्टर बनेगा न?”

लड़के ने कहा—“मैं तो प्रेसीडेंट बनूँगा!”

 

श्यामा हँसने लगी। हँसते-हँसते बोली—“यही सब रटा दिया है चाचाजी ने!”

प्रियंवदा पुलकित हो कर बोली—“कहते हैं कि मेरे जीवन की सबसे बड़ी साध यही है कि इन दोनों को बड़ा आदमी बना दूँ। भैया ने आधे पेट रह कर, पसीना बहा कर मुझे आदमी बनाया है। मैं अपने तन का रक्त दे कर बच्चों के व्यक्तित्व को महान कर सका तो जीवन सफल समझूँगा। क्यों रे, विलायत जाएगा न?”

 

लड़के ने प्रियंवदा की गोदी में सिर छिपा कर कहा—“नहीं चाचीजी, मुझे तो चाचाजी अमेरिका भेजेंगे पढ़ने को। हवाई जहाज़ से जाऊँगा। तुम कभी बैठी हो चाचीजी हवाई जहाज़ में?”

तभी सहसा प्रियंवदा की माँ ने आ कर कहा—“बेटी, चलो खाना खाओ।”

 

रामाशंकर प्रियंवदा का बड़ा भाई था। उसकी चौक में बहुत-सी दुकानें थीं। पत्नी उसकी मर गई थी। घर का कर्ता-धर्ता वही था।

रामाशंकर व्यस्त हो कर, श्यामा के लिए स्वयं थाली लगा रहा था कि वह आ पहुँची। अम्माजी भीतर जाने क्या लेने गईं कि चट-से श्यामा कढ़ाई के पास आ बैठी और एक पूरी बेल कर गर्म घी में छोड़ दी और प्रसन्न मुद्रा से बोली—“आज भैया को मैं बना कर खिलाऊँगी!”

 

उसी सजी थाली में रामाशंकर भैया को खिला कर श्यामा चूल्हे के पास से उठ आई। फिर पास खड़ी प्रियंवदा का हाथ पकड़ कर खींचती हुई बोली—“आओ सखी! मुझे तो बड़ी भूख लगी है।” और वही भैया की जूठी थाली आगे को खींच ली और पुकार कर कहा—“अम्मा, हम लोगों को खाना परोस जाओ!”

अम्मा ने धड़कता कलेजा लिए पूछा—“तो फिर, बेटी, मैं कल रामा को भेजूँ बड़े दामाद के पास?”

 

श्यामा ने भौंहें सिकोड़ कर कहा—“बड़े दामाद कौन खेत की मूली हैं अम्मा, तुम बड़ी बेटी की इज़्ज़त गिराओगी क्या?” तुम्हारी बड़ी बेटी ने जो कुछ कह दिया, उसे पत्थर की लकीर समझो।”

अम्मा मुँह देखने लगीं बड़ी बेटी का।

 

बड़ी बेटी ने तब तनिक नाराज़-सी हो कर कहा—“तुम्हें यक़ीन नहीं हुआ क्या अम्मा? अरे, मैं कहती हूँ, सुखदेव के साथ प्रियंवदा की शादी होगी, होगी, होगी। बस!”

रामाशंकर भी पास आ खड़ा हुआ था। श्यामा ने उसकी ओर देख कर पूछा—“भैया, अपनी दुकान पर साबुन भी बिकता है न?”

 

बहुतेरा साबुन है तुम्हारी दुकान में। साबुन की तो एजेंसी तक है।”

तब एक शर्त है,” श्यामा ने अँगुली उठा कर कहा।

 

अम्मा का दिल धड़कने लगा। रामाशंकर भी घबराया कि भगवान, क्या शर्त है इसकी?

श्यामा अँगुली उठा कर बोली—“भैया, तुम्हें हर महीना मुझे एक साबुन की टिक्की देनी होगी। बोलो, हामी भरते हो?”

 

रामाशंकर ठहाका मार कर हँस पड़ा।

अम्मा ने आँखों में आँसू भर कर कहा—“हाय पगली!”

 

पर श्यामा न हँसी। बल्कि स्वर में दुख भर कर बोली—“तुम्हें क्या मालूम अम्मा कि मैं साबुन के लिए कितनी परेशान रहती हूँ!”

रामाशंकर ने गद्गद् कंठ से कहा—“बहिन, आज ही तुम्हारे पास एक पेटी साबुन भिजवा दूँगा।”

 

नौकर पीछे से बोला—“मैं दे आऊँगा शाम को।”

जाने किधर से बड़े लड़के ने सब सुन लिया। वह रामाशंकर के आगे आ कर बोला—“मामाजी, आज अम्मा से और चाचाजी से साबुन के पीछे ख़ूब लड़ाई हुई थी।”

 

श्यामा ने चिल्ला कर कहा—“चुप रह चुग़लख़ोर!”

पर लड़का न माना। उसी दृढ़ स्वर में बोला—“सच, मामाजी, इसने चाचाजी का साबुन ले लिया था। सो चाचाजी ने...”

 

श्यामा ने लपक कर उसका मुँह बंद कर दिया।

सारा घर हँस रहा था।

 

द्विजेंद्रनाथ मिश्र 'निर्गुण'

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अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं,
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है,
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं।

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
किसको मालूम कहाँ के हैं, किधर के हम हैं।


चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं किस राहग़ुज़र के हम हैं।
                                                               निदा फाज़ली 

हम तो हैं परदेश में देश में निकला होगा चाँद

हम तो हैं परदेश में देश में निकला होगा चाँद
अपनी रात की छत पे कितना तनहा होगा चाँद।

चाँद बिना हर शब यों बीती जैसे युग बीते
मेरे बिना किस हाल में होगा कैसा होगा चाँद।

आ पिया मोरे नैनन में मैं पलक ढाँप तोहे लूँ
ना मैं देखूँ और को, ना तोहे देखन दूँ।

रात ने ऐसा पेंच लगाया टूटी हाथ से डोर
आँगन वाले नीम में जाकर अटका होगा चाँद।
                                                                   राही मासूम रजा 

रविवार, 9 जून 2013

प्रेरणा स्रोत महिलायें



नोरती बाई

10 साल की उम्र में पढ़ाई से छोड़ने वाली नोरती बाई ने 45 साल बाद कंप्यूटर सीखने का फैसला किया। कंप्यूटर सीखने के लिए कम ज्ञान और शिक्षा को कभी हावी नहीं होने दिया। शुरू में कंप्यूटर की बेसिक जानकारी लेने के बाद नोरती देवी जल्द ही कंप्यूटर चलाने में माहिर हो गईं। फिर उनकों समाज के लिए कंप्यूटर और इंटरनेट की उपयोगिता के बारे में एहसास हुआ।
पहली बार, नोरती बाई ने स्थानीय पंचायत योजनाओं से जुड़कर आसपास के गांवों में जलसंसाधनों की जानकारी सरकार को मुहैया कराई। इस प्रक्रिया में पानी, नलकूप और तालाब के स्थानों के लिए नक्शे शामिल थे, जो स्थानीय समुदाय के लिए काफी सहायक साबित हुआ। इसी के साथ नोरती ने कॉलेज में स्थानीय महिलाओं को कंप्यूटर सिखाना भी शुरू कर दिया। इस बात की खबर पूरे गांव में फैल गई और लोग नोरती से पढ़ने के लिए आने लगे। यहां तक कि गांव की 5 वीं, 6ठी पास लड़कियां भी कंप्यूटर सीखने के लिए नोरती के पास पहुंचने लगीं।
हालांकि, नोरती बाई को गाववालों के पूरा समर्थन मिला, जिससे वो स्थानीय चुनाव जीतकर हरमारा गांव की पहली दलित महिला सरपंच भी बन गई। आज गांव की दूसरी महिलाएं नोरती बाई को अपना आदर्श मानती हैं।
नोरती बाई देशभर की गिनी चुनी उन महिलाओं में से हैं जिन्होंने सीआईआई-भारती वुमेन एक्जेंमपलरी अवॉर्ड प्राप्त किया है। ये अवॉर्ड उन्हें 2007 में समाज में विकास के लिए सराहनीय योगदान के लिए दिया गया।

कृष्णा पुनिया

11 अक्टूबर 2010 को दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स में डिस्कस थ्रो के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली महिला एथलीट बन गईं। हरियाणा के अग्रोहा गांव में एक जाट परिवार में जन्मी कृष्णा के सर से मां का साया बचपन में उठ गया। उसके दूसरे रिश्तेदारों ने उन्हें पाल पोष का बड़ा किया।
सीमित साधन और तंगहाली की वजह से कृष्णा ने बड़ी मुश्किल से हालात का मुकाबला किया। इन सबके बावजूद उसने कभी हिम्मत नहीं हारी औऱ एक सफल एथलीट बनने के लिए दिन-रात कड़ी मेहनत करती रही।
अपने बांह की मांसपेशियों को मजबूत करने के लिए अपने पिता के डेयरी में भैंसों से दूध निकालती थी, यहीं उसके व्यायाम के लिए नया औजार था। परिवार का पूरा साथ मिलने पर अपनी पढ़ाई के साथ साथ कृष्णा ने खेल पर भी समय देना शुरू कर दिया। जल्द ही कृष्णा की शादी गगरवास गांव में विरेंदर सिंह पुनिया से हो गई, जहां पर्दा प्रथा का चलन था। हालांकि, अपने पति की वजह से कृष्णा को ज्यादा परेशानी नहीं आई। पूर्व एथलीट होने की वजह से पति ने अपनी पत्नी कृष्णा का भरपूर सहयोग दिया। 2012 में लंदन ओलंपिक्स में डिस्कस थ्रो कैटगरी में कृष्णा सातवीं पायदान पर रहीं।

राजकला देवी

राजस्थान, अलवर जिले के हिंगवाहेरा गांव में राजकला देवी सबसे पहली महिला सरपंच हैं। बिना किसी शिक्षा के एक साधारण परिवार में पली बढ़ी राजकला ने अबतक एक लंबा सफर तय कर लिया है। पहले पंचायत की बैठक में महिलाओं के शामिल होने पर अजीब नजर से देखते और हतोत्साहित करते थे। लेकिन जबसे राजकला सरपंच बनी, तब से उन्होंने समाज की रूढ़ीवादी सोच में सफलतापूर्वक बदलाव लाया है। इस भरोसे के साथ कि लड़कियों के लिए शिक्षा एक समाज को नई दिशा दे सकती है, उन्होंने इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया। राजकला के नेतृत्व में गांव की गरीब महिलाओं को बीपीएल कार्ड मिला और हर गांववाले को साफ पीने का पानी, सड़क, शौचालय मुहैया हो सका। दूसरी बार संरपंच चुनीं जाने पर राजकला ने गांव की कई महिलाओं को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वो भी पुरानी रुढ़ीवादी प्रथा का मुकाबला करें और जोरदार तरीके से अपनी बात पुरुषों के सामने भी रखें। इसके अलावा राजकला ने महिलाओं को स्थानीय राजनीति में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। ताकि समाज की कई समस्याओं का हल खुद ढूंढ़ सकें। आज राजकला समाज के लिए आदर्श के साथ-साथ प्रेरक भी बन गईं हैं।
फिलहाल, राजकला यूएन वुमेन और हंगर प्रोजेक्ट के साथ जुड़ीं हैं और वो महिला जागरुक मंच के साथ काम कर रही हैं।

सुषमा भादो

बचपन में ही स्कूल छोड़ चुकी 32 साल की सुषमा भादू हरियाणा में धानी मियां गांव के विश्नोई समुदाय से हैं। समुदाय में सदियों से प्रचलित घूंघट की प्रथा के जरिए महिलाएं बड़े-बुजुर्गों का सम्मान करती हैं। लेकिन, सुषमा को ये कतई पसंद नहीं था। सदियों पुरानी इस प्रथा से वो छुटकारा पाना चाहती थी। इसलिए वो गांव की राजनीति में हिस्सा लेना चाहती थी और फिर जून 2010 में गांव की सरपंच चुन ली गई। महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ाने के लिए सुषमा ने गांव में ही उनके लिए इंडियन बैंक की मदद से एक टेलरिंग ट्रेनिंग सेंटर की स्थापना की। ये गांव के लिए सुषमा का क्रांतिकारी कदम साबित हुआ । इसके अलावा सुषमा ने गांव के हर बच्चे को स्कूल भेजने पर दिया और साथ ही राज्य सरकार से गांव में पीने का पानी के लिए फंड मंगाए। इस तरह सुषमा के आत्मविश्वास के साथ उसकी शख्सियत भी मशहूर होती गई। एक दिन आम बैठक में खुलेआम पर्दे का विरोध कर दिया और लोगों से भी ऐसा करने को कहा था। लेकिन, आज धानी मियां गांव की महिलाएं सुषमा को आदर्श मान चुकीं हैं। इस तरह सुषमा ने गांव में खुद को आइरन लेडी की तरह साबित किया है।

बिमला देवी

बिमला देवी का जन्म हरियाणा के रेवाड़ी में एक दलित परिवार में हआ था। भेदभाव से घिरा बिमला का बचपन काफी दिक्कतों में गुजरा, जहां उन्हें आम जगहों पर पाबंदी और सरेआम बेइज्जती भी झेलनी पड़ी। इस दर्द को लिए बिमला ने एक ऐसे समाज की कल्पना की जहां किसी तरह का भेदभाव न हो और सभी जाति के लोग एक साथ रहें। बड़ी होकर बिमला ने अपने गांव की महिलाओं को इकट्ठा कर स्वास्थ्य के कई मुद्दों पर शिक्षित करना शुरू किया। साथ ही उन्होंने चुनाव के दौरान वोट की अहमियत, आर्थिक विकास और समाज में समानता के बारे में बताया। इसके अलावा गांववालों को सभी प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं को बारे में खुलकर बताने के लिए प्रोत्साहित किया। धीरे-धीरे बिमला ने समाज में छूआछूत और भेदभाव जैसे मुद्दों को भी उठाना शुरू किया। इसी कोशिश के चलते आज गांव में उंची जाति और निचली जाति के लोग समाज में एक साथ एक ही नल का पानी पीते है।
सिर्फ आठवीं क्लास तक पढ़ी बिमला का आत्मविश्वास इतना बढ़ चुका है कि समाज में महिला के हक के लिए हमेशा खड़ी दिखती हैं। आजकल बिमला स्थांनीय एनजीओ के साथ मिलकर गांव की लड़कियों को स्वास्थ और जाति जैसे विषयों पर शिक्षा देती हैं। भविष्य में बिमला अपने किताब के जरिए अपनी जिंदगी की पहलूओं से अवगत कराते हुए महिलाओं के स्वास्थ्य की बातों से अवगत कराएंगी।
क्वोट- “समाज में महिलाओं को बराबर का अधिकार है। हमें भी समाज में पुरुषों की तरह आजाद और सुरक्षित महसूस करने का हक है। मुझे गर्व है कि मैने महिला के रूप में जन्म लिया और दूसरों की भलाई के लिए काम कर रही हूं।”

गीतांजलि बब्बर

पत्रकारिता में स्नातक और डेवलपमेंट कम्युनिकेशन में स्नाकोत्तर गीतांजलि बब्बर ने वेश्याओं की जिंदगी बेहतर बनाने के लिए कई बड़ी-बड़ी नौकरियों को ठुकरा कर एक सेंटर की स्थापना की। गीतांजलि के दिल में वेश्याओं के लिए हमदर्दी तब पैदा हुई जब उन्हें नेशनल एड्स कंट्रोल सोसायटी के साथ एक छात्र के रूप में दिल्ली के जी बी रोड में किन्नरों के साथ काम करने का मौका मिला। इस दौरान गीतांजलि इलाके की कई वेश्याओं से रूबरू हुईं। वेश्याओं की जिंदगी को करीब से देखने के बाद गीतांजलि को कड़वी सच्चाई का पता चला,जिसमें उन्होंने पाया कि प्रत्येक वेश्या दिन भर में 20 से 40 ग्राहकों की सेवा करती हैं। गुमनामी की जिंदगी गुजार रही वेश्याओं को जरूरत थी कि कोई उनसे उनका दर्द बांटे, न कि सुरक्षित यौन संबंध की बात करे। और इसी कमी को पूरा करने के लिए गीतांजलि बब्बर ने कट-कथा नाम की संस्था की शुरुआत की। कट-कथा गीतांजलि द्रारा एक ऐसा प्रयास है जिससे वेश्याओं की जिंदगी में बदलाव और उन्हें रोजगार का दूसरा विकल्प मिल सके। इसमें एक बड़ी खासियत ये है कि ये संस्था वेश्यवृति के खिलाफ प्रचलित अभियानों के बजाय समुदाय की भागीदारी पर जोर देती है। गीतांजलि जी बी रोड की वेश्याओं को कई तरह के प्रशिक्षण के साथ-साथ जिंदगी की मुख्याधारा से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। आज कट-कथा के जरिए गीतांजलि करीब 3500 से 4000 वेश्याओं के साथ मिलकर समाज में बदलाव के लिए प्रेरक बन चुकी हैं।

सुनिता चौधरी

यूपी के बहादुरगढ़ में सुनिता चौधरी ऐसे रुढ़ीवादी समाज में पली बढ़ीं जहां महिलाओं, लड़कियों को पर्दे में रहना पड़ता है। स्कूल, कॉलेज में महिलाओं का जाना मुश्किल होता है, जिसकी वजह से उस गांव की महिलाएं कम पढ़ी लिखी हैं। दूसरी महिलाओं की तरह सुनिता भी पूरी जिंदगी भर की चार दिवारी के भीतर गुजार दिया और आज वो सिर्फ पढ़ना और गिनना जानती है। 14 साल की उम्र में एक ऐसे पुरुष से शादी हो गई थी जो हमेशा गाली-गलौच और झगड़ा करता, जिससे वो काफी दुखी रहती थी। इससे तंग आकर एक दिन भागकर दिल्ली चली गई।
एक अंजान शहर में अपनी जिंदगी चलाने के लिए सुनिता ने काफी दिक्कतें झेली। ऐसे ही एक दिन बस में सफर के दौरान उनकी नजर ड्राइवर पर गई और फिर फैसला किया कि वो भी एक दिन ड्राइविंग सीखकर ऑटो चलाएगी, ताकि उसकी कुछ कमाई हो सके। महिला होने के नाते पुरुष प्रधान समाज में ऑटो चलाना एक अजीबोगरीब फैसला था। लेकिन, सुनिता ने कभी हिम्मत नहीं हारी। सुनिता ने हर चुनौतियों का सामना किया और ठीक तीन साल बाद उसे ऑटो लाइसेंस केसाथ-साथ ऑटो खरीदने के लिए लोन भी मिल गए।
लोन चुकाने के लिए सुनिता दिल्ली और एनसीआर में रोजाना 2 शिफ्ट में ऑटो चलाने लगी। शांत स्वभाव और दृढ़ निश्चय वाली सुनिता आज दूसरी महिलाओं के आदर्श बन चुकी है। अब सुनिता अपनी ही तरह दूसरी महिलाओं की मदद करती है। आगे चलकर लड़कियों की शिक्षा पर काम करना चाहती है, जिसकी कमी से उसे जिंदगी में कई मुश्किलों का समना करना पड़ा।
क्वोट- “मुझे अपने महिला होने पर गर्व है क्योंकि महिला ही किसी को भी एक नई जिंदगी देती है। अगर महिला चाहे तो वो शक्तिशाली बन सकती है, उसके कई रूप होते हैं। वो अगर भगवान हो सकती है तो विध्वंसक भी बन सकती है।”

चांदरो तोमर

करीब 10 साल पहले, चांदरो तोमर अपनी पोती के साथ स्थानीय फायरिंग रेंज घूमने गईं। वहां पहुंचकर, अचानक उनको लगा उनमें भी शूटिंग करने की काबलियत है। यूपी के बागपत जिले की चांदरो तोमर ने 65 साल की उम्र में पहली बार राइफल को उठाया। उसी वक्त उनके कोच को भी तोमर की काबलियत का पता चला। इसे देखकर कोच इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने तोमर को प्रशिक्षण और प्रोत्साहन देने का फैसला किया।
हालांकि शूटिंग करियर के शुरूआत में, तोमर को काफी दिक्कते आईं। अपने रिश्तेदारों के अलावा समाज का पुरुष वर्ग भी तोमर के फैसले के खिलाफ था। लेकिन, तोमर ने इसका बिना कोई परवाह किए प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। तोमर की काबलियत को देखकर दूसरे प्रतियोगी भी उनसे हारने में भी बेइज्जती महसूस नहीं करते थे।
आज 78 साल की चांदरो तोमर दुनिया का सबसे बुजुर्ग शार्पशूटर बन गईं हैं जिन्होंने 25 से ज्यादा राष्ट्रीय शूटिंग चैंपियनशिप जीत चुकी हैं। इसके अलावा, परिवार में 6 बच्चों और 15 नाती-पोतों की देखभाल करती हैं। अपने हौसले और काबलियत की बदौलत चांदरो तोमर आज की नई पीढ़ी के लिए एक आदर्श बन चुकी हैं।
चांदरों तोमर गांवों की दूसरी लड़कियों के लिए शूटिंग कैंप आयोजित करने से लेकर अबतक 27 से ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय शूटर्स को भी प्रशिक्षित कर चुकीं हैं।

थिनलास कारोल

थिनलास कारोल का जन्म लद्दाख के ताकमाचिक इलाके में हुआ था। बचपन में ही मां के साए से महरूम हो चुकी थिनलास, पिता की छत्रछाया में बड़ी हुई। कहीं पिता का भी साया सर से न उठ जाए, इस डर से थिनलास अपने पिता को अपनी नजरों से दूर नहीं होने देती थी। यहां तक कि पिता के साथ ही पहाड़ों में भेड़ बकरियां चराने जाती थी। पहाड़ों के बीच रहकर धीरे-धीरे थिलनास को बाहर घूमना, पहाड़ों पर चढ़ना अच्छा लगने लगा। अचानक एक दिन, एक दिन उसे बाहर से आए ट्रैक्रस के साथ जाने का मौका मिला। उसे ये काम इतना अच्छा लगा कि उसने फैसला कर लिया कि भविष्य में हो माउंटेन गाइड का करेंगी। और फिर, थिनलास ने पर्वतारोहण का कोर्स के साथ साथ पूरी तरह से प्रशिक्षण लेकर लद्दाख में ट्रेकिंग गाइड की भूमिका में उतरीं। इस क्षेत्र में थिलनास ने न सिर्फ खुद को स्थापित किया बल्कि और लड़कियों को भी इसमें नए आयाम दिए ।

हालांकि, 2004 से लेकर अब तक थिनलास को बहुत सी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। इन चुनौतियों के सीख लेकर थिलनास ने दूसरों को प्रशिक्षण देने के लिए महिलाओं द्वारा संचालित गाइड कंपनी खोलने का फैसला किया। इस प्रकार 2009 में लद्दाख वुमेंस ट्रेवल्स कंपनी की स्थापना कर दूसरी महिलाओं को भी आगे बढ़ने को प्रेरित कर रही हैं।
इसके लिए 2008 में उन्हें लद्दाख वुमेंस राइटर अवॉर्ड्स से भी नवाजा जा चुका है। फिलहाल, थिनलास एक स्वतंत्र गाइड के रूप में लद्दाख की दूसरी महिलाओं का मार्गदर्शन कर रही हैं।
क्वोट- मुझे खुशी है कि मैंने सिर्फ खुद को नहीं, बल्कि दूसरी लड़कियों को भी इस क्षेत्र में अपनी एक जगह बनाने के लिए प्रेरित किया। मैं खुश हूं कि पर्वतारोहण और ट्रैकिंग के सिक्लड वर्क में सफलता हासिल की और लोग मुझे जानते हैं, मुझे सराहते हैं।

रानी बेगम

मुजफ्फरपुर में चतुर्भुज स्थान की पार्षद रानी बेगम का बचपन काफी परेशानियों में बीता। 12 साल की उम्र से ही उनपर जुल्म होते रहे। उत्तरी बिहार का एक छोटा सा शहर यानी रेड लाइट एरिया जहां एक हजार से ज्यादा वेश्याएं रहती है। इस इलाके में रानी बेगम को अपनी बहनों के खिलाफ हो रहे अत्याचार ना काबिले बर्दाश्त थे। और फिर एक दिन, इन वेश्यायों के हमक औऱ जुल्म के खिलाफ लड़ने का फैसला कर लिया। हालांकि, रानी बेगम के लिए ये आसान नहीं था औऱ यहां तक कि इस कदम के लिए कई नेता, अपराधी औऱ पुलिस का विरोध झेलना पड़ा। बिना डरे और रुके, अपनी मांग पर ध्यान आकर्षित कराने के लिए रानी ने कई बार विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल किए। इनकी कोशिशों के चलते स्थानीय प्रशासन ने रेड लाइट इलाके में 6 राशन की दुकान के साथ शिविर भी लगवाए जहां महिलाओं और बेरोजगार युवाओं के लिए प्राथमिक चिकित्सा सुविधा उपल्ब्ध थी। धीरे-धीरे रानी बेगम को इलाके के लोगों का समर्थन मिलता गया और उनके काम ने समाज में एक पहचान दिलाई। और फिर एक दिन रानी बेगम ने राजनीति का हिस्सा बनने का फैसला कर मुजफ्फपुर स्थानीय निकाय चुनाव में कूद पड़ी और लोगों ने उन्हें अपना वॉर्ड काउंसिलर चुन लिया। रानी बेगम ने इलाके में अपने प्रति न सिर्फ लोगों की सोच को बदला, बल्कि समाज में हर तबके का ख्याल रखकर उनका विकास किया। आज वो एक गर्वान्वित दादी अपने 2 नाती-पोतों के साथ खुशहाल हैं।
क्वोट- “मुझे गर्व है कि मैंने इमानदारी और लगन से कई लोगों की जिंदगी में खुशी ला पाई हूं। दुनिया में आज जहां वेश्या और वेश्यालयों को हेय नजर से देखते हैं, मुझे खुशी है कि मेरी कोशिशों ने उनकी जिंदगी को आसान औऱ खुशहाल बनाया है। अगर मुझे मौका मिला तो पूरे शहर को और खूबसूरत बनाउंगी।“

फ़ाल्गुनी निवेतिया

गुजरात में जन्मीं और कलकत्ता के एक बड़े व्यवसायी की बेटी- फ़ाल्गुनी को काफी विरोध का सामना करना पड़ा जब उसने अरुण से शादी का फैसला किया। 10 साल की उम्र से कैंसर रोग से ग्रसित अरुण को कई और बिमारियों ने जकड़ रखा था। लेकिन, फिर भी परिवार के लाख विरोध के बावजूद फ़ाल्गुनी ने अपने प्यार अरुण से ही शादी रचाई। शादी के बाद अरुण की इलाज के लिए फ़ाल्गुनी उसे लेकर अकसर मुंबई आना जाना करती थी। इससे जाहिर होता है कि कलकत्ता में स्वास्थ्य चिकित्सा की बेहतर सुविधा न होने की वजह से लोगों को इलाज के लिए दूसरे शहर जाना पड़ता था। इस परेशानी से दो-चार होकर एक दिन दोनों ने फैसला किया कि कलकत्ता में चिक्तिसा सुविधा बेहतर करने के लिए वो हर संभव कोशिश करेंगे। इस प्रकार, 2009 में फ़ाल्गुनी ने अपने 20 साल पुरानी नौकरी छोड़ नादिया जिले में एक प्राइमरी हेल्थ केयर फाउंडेशन की स्थापना की हालांकि, फ़ाल्गुनी को हेल्थ केयर फाउंडेशन और परिवार की देखरेख करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। परिवार और अपने बीमार पति की देखरेख के अलावा हेल्थ केयर फाउंडेशन के प्रबंधन बखूबी करती हैं। अपनी लगन और समाज के प्रति समर्पण से आज फ़ाल्गुनी सभी औरतों के लिए आदर्श बन चुकी हैं।नादिया जिले के मायापुर में एक सेंटर के रूप में शुरू हुई प्राइमरी हेल्थ केयर फाउंडेशन की आज बंगाल के 4 जिलों में 5 सेंटर हैं। यहां गरीबों के लिए सस्ते इलाज के साथ साथ एक हफ्ते की फ्री दवाई भी मिलती है।
2012 में इस सामाजिक सेवा के लिए प्राइमरी हेल्थ केयर फाउंडेशन को सोशल इटरप्राइज ऑफ द ईयर अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है। गरीबों की सेवा में समर्पित फ़ाल्गुनी और अरुण 2015 तक बंगाल के हर जिले में प्राइमरी हेल्थ केयर फाउंडेशन की इकाई खोलना चाहते हैं।
क्वोट-” मैं उस समुदाय से आती हूं जहां हमेशा से पुरुषों का बोलबाला रहा है, किसी भी फैसले में महिला की भागीदारी नहीं होती। लेकिन, मैंने कुछ अलग करने का फैसला किया। और आज मुझे अपने सभी फैसले पर गर्व है, चाहे वो एक कैंसर रोगी से शादी का मामला हो या शिक्षिका की नौकरी छोड़ समाज की सेवा का फैसला हो। ये सब किसी भी महिला के लिए तभी संभव हो सकता है जब वो खुद की क्षमताओं को पहचान कर अपने डर पर काबू पाए, जिससे उसे समाज में सही मुकाम मिल सकता है।”

अर्चना राजेंदर हेगड़े

उत्तर कन्नड़ जिले में अर्चना हेगड़े का गांव सुपारी के व्यवसाय के लिए जाना जात है। यहां ज्यादातर लोग गरीब हैं, जो साल के 6 महीने सुपारी के फॉर्म में मजदूरी कर अपना परिवार चलाते है। सुपारी फॉर्मिंग सीजन खत्म होने के बाद गांव के लोग अपना घर, परिवार छोड़ रोजगार की तलाश में दूसरे शहरों में पलायन करते हैं। अर्चना ने इसी गरीबी और पलायन की समस्या से निजात दिलाने और गांव को लोगों की तकदीर बदलने की ठानी। एक बार मंदिर में दर्शन के दौरान अर्चना ने लोगों को सुपारी के पेड़ के पत्तों में खाना खाते देखा। इसी से प्रभावित होकर अर्चना को लगा कि गांव में बेकार पड़े कृषि के कचड़े को रिसाइकिल कर प्लास्टिक प्लेट्स, कप की जगह इस्तेमाल कर सकते हैं। काफी शोध के बाद अर्चना को लगा वो गांववालों के साथ मिलकर सुपारी के पत्तों से प्लेट्स, कप तैयार कर सकती हैं जिससे गांव में एक रोजगार का नया साधन पैदा हो सकता है। अपने नए आइडिया से उत्साहित अर्चना ने आखिरकार इसके लिए पैसा इकट्ठा करना शुरू किया। लेकिन, उसके लिए लोन लेना आसान नहीं था। कई कोशिशों के बाद आईआईएम बैंगलोर की ग्रामीण विकास शाखा ‘बी फंड!’ ने अर्चना की आइडिया पर पैसा लगाने का फैसला किया। अर्चना की इन कोशिशों की बदौलत राशिदा ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स मैन्यूफैक्चरिंग की स्थापना हुई। राशिदा ऑर्गेनिक की स्थापना के सिर्फ 2 महीने बाद ने जहां गांव की 85 महिलाओं को रोजगार दिया, वहीं 50 किसानों को आमदनी बढ़ाने में मददगार साबित हुई।
इस तरह सुपारी के पत्तों से रोजगार पैदा करने का अर्चना का आइडिया ने पूरे गांव की सूरत बदल दी। इससे पहले पूरे कर्नाटक में प्लास्टिक के प्लेट्स, कप काफी इस्तेमाल किए जाते थे। लेकिन, प्रदूषण के चलते प्लास्टिक की चीजों पर सरकारी पाबंदी अर्चना के लिए वरदान साबित हुई। प्लास्टिक पर पाबंदी के बाद अर्चना के लिए एक बड़ा और आसान बाजार मिल गया। राशिदा ऑर्गेनिक द्वारा निर्मित अब तक करीब 2 लाख प्लेट्स और कप ने कई घरों और दूकानों में जगह बना ली है। राशिदा ऑर्गेनिक में काम करने वालों में मजदूरों के अलावा, छात्र, महिलाएं भी शामिल हैं जो 500 रु. से 800 रु. प्रति माह कमा लेते हैं।
क्वोट- “महिला होने के नाते मुझे खुद पर गर्व है कि मैं आज अपने घर के साथ साथ एक सफल व्यवसायी भी हूं। साथ ही मुझे गर्व है कि बतौर सफल उद्यमी मैं दूसरी महिलाओं और बच्चों को भी प्रेरित करती हूं, जो मुझे रोल मॉडल के रूप में देखते हैं।“

बिरो बाला राभा

भारत के नॉर्थ-ईस्ट इलाके में जनजातीय समाज के बीच जादू-टोना एक सामाजिक अभिशाप बन चुका है। इस इलाके में अगर किसी बच्चे की तबीयत भी खराब होती है, तो लोग किसी अन्य महिला पर जादू-टोना का इल्जाम लगाकर उसे सरेआम बेइज्जत करते हैं। ऐसे अंधविश्वास, कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने की किसी की हिम्मत नहीं होती। इस प्रकार, हर साल अंधविश्वास की शिकार करीब 150 से 200 महिलाओं की मौत हो जाती है।
लेकिन, असम के एक छोटे से गांव गोलपारा में जन्मी बिरो बाला राभा की कहानी इन महिलाओं से अलग है। बिरो ने अपने समाज में फैले अंधविश्वास, कुरीतियों को जड़ से मिटाने का बीड़ा उठाया है। कई साल पहले, बिरो बाला के मानसिक रोगी बेटे को गांव के ही एक डॉक्टर ने जादू-टोना का शिकार बताया और फिर उसे डायन करार दिया गया था। अपने बच्चे के इलाज को लेकर परेशान बिरो बाला अंग्रेजी दवा कराना चाहती थी, लेकिन गांव वालों ने ऐसा करने से भी रोक दिया। इस हद तक गांव वालों ने प्रताड़ित किया कि उसे गांव छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। अंधविश्वास की शिकार बिरो बाला, अब अपने दृढ़ निश्चय के साथ समाज में फैले अंधविश्वास और कुरीतियों और शिक्षा के जरिए लोगों की सोच बदलने के लिए लगातार सक्रीय है। समाज के लिए बिरो का समर्पण और त्याग उसके लिए एक बड़ा हथियार है, जिससे गांव की दूसरी औरतों को भी एक सामान्य जिंदगी जीने की उम्मीद जगी है।

राशीदा बी

ठीक 28 साल पहले 2-3 दिसंबर 1984 की दरमियानी रात भोपाल में मौत का कहर बरसाने वाली रात थी। ये रात भोपालवासियों के लिए काल की रात बनकर सामने आई, जिसने हजारों लोगों को मौत का नींद सुला दी और सैंकड़ों को जानलेवा बीमारी के आगोश में छोड़ गई । दरअसल, इस दिन एक भयानक औद्योगिक दुर्घटना हुई थी, जिसे हम भोपाल गैस कांड, या भोपाल गैस त्रासदी के नाम से जानते हैं। राशिदा बी भी उन बदनसीबों में शामिल थीं जिन्होंने इस गैस त्रासदी में अपनों को खोया था। 13 साल की उम्र में सुहागिन बनी राशिदा, अपने जख्मी पति और पिता को छोड़ परिवार को 6 लोगों को खोने का गम, आज भी नहीं भुला पाई हैं। ऐसे में उस वक्त राशिदा को मदद औऱ न्याय की सख्त दरकार थी, लेकिन उसे कहीं से कुछ नहीं मिला। फिर भी, अकेले पति और पिता की जिम्मेदारी का बोझ लिए राशिदा ने कभी हिम्मत नहीं हारी।
तब, राशिदा ने फैसला किया कि वो गैस त्रासदी से प्रभावित बच्चों की मदद करेंगी। अपनी ही तरह पति और बेटे को खोने वाली एक अन्य पीड़िता चम्पा देवी के साथ मिलकर राशिदा बी ने चिंगारी ट्रस्ट की स्थापना कर डाली। आज इस ट्रस्ट की अंतर्राष्ट्रीय पहचान है, जिसके लिए उन्हें गोल्डमैन पर्यावरण अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। फिलहाल, चिंगारी ट्रस्ट के अंतर्गत आज भी डाउ केमिकल और उसके सहयोगी यूनियन कार्बाइड के खिलाफ अभियान जारी है।
क्वोटः “जब तक मैं घर से बाहर नहीं निकली थी, मैं दुनिया से अनभिज्ञ थी। लेकिन, अब जबकि मैंनें लाखों लोगों के लिये आवाज उठाई है, महसूस करती हूँ कि एक नारी कितनी शक्तिशाली होती है।”

डॉ. पी भानुमति

केरल के त्रिसुर में जीवविज्ञान की प्रोफेसर, डॉ. पी भानुमति का बचपन अपने तीन मानसिक रूप से कमजोर भाई-बहनों के साथ बीता।अचानक एक दिन, उन्होंने गले में बीमारी से ग्रसित अपने भाई को खो दिया। इस दुखद घटना से भानुमति को लगा कि मानसिक बीमारी की वजह से डॉक्टरों ने उसके भाई पर कोई तवज्जू नहीं दी, जिससे उसकी मौत हो गई। साथ ही भानुमति को ये भी लगा कि शायद मानसिक रोगियों के लिए चिक्त्सा सुविधा दूसरे मरीजों के मुकाबले कम होती है।
जबकि ऐसे मरीजों की देखभाल के लिए विशेष सुविधाओं से लैस प्रशिक्षित डॉक्टरों की टीम की जरूरत होती है। इस सौतेला व्यवहार से आहत डॉ. पी भानुमति ने मानसिक रोगियों के लिए कुछ करने का फैसला किया। और इसप्रकार डॉ. भानुमति ने एशोसिएशन फॉर मेंटली हैंडीकैप्ड एडल्टस् (एएमएचए) इंस्टिच्यूच की स्थापना की। हालांकि भानुमति के लिये ये रास्ता आसान नहीं था जहां लोगों को सीखाना था कि कैसे मानसिक रोगियों की विशेष देखरेख की जाती है।
एक छोटे से गांव में सरकारी स्कूल के एक छोटे से कमरे में 3 विद्यार्थियों के साथ शुरू की गई, एएमएचए यानी एशोसिएशन फॉर मेंटली हैंडीकैप्ड एडल्टस् के पास आज कई सुविधाएँ हैं, जहां करीब 60 गरीब मानसिक रूप से बीमार लोगों की सेवा की जा रही है। अपने पति के सहयोग से स्कूल उन्होंने अपना सारा जीवन इस कार्य में लगा दिया है और उनकी देखभाल के लिए अब वो उन रोगियों के साथ स्कूल परिसर में ही रहते हैं।
अच्छे काम शायद ही कभी बिना विरोध के सम्पन्न होते हैं और भानुमति ने भी अपने ही अंदाज में कई बाधाओं को पार किया है। लंबे समय तक मतभेद और विरोध के बाद, भानुमति को आखिरकार स्थानीय प्रशासन के साथ साथ समुदाय का भी सहयोग मिला।
क्वोटः“ मैं अपने तीन मानसिक रूप से कमजोर भाई-बहनों के साथ बड़ी हुई हूँ औऱ एक को इलाज के अभाव में खो भी चुकी हूँ। मैं इन मरीजों का दर्द व तकलीफ जानती हूँ, जिनका अपना परिवार उनसे मुँह मोड़ लेता है। मुझे गर्व है कि मेरी छोटी सी कोशिश से इन चेहरों पर मुस्कुराहट आई है और उनमें सम्मान के साथ जीने की आस जगी है।”

सिंधुताई सपकाल

माई के रूप में पुकारे जाने वाली सिंधुताई का परिवार बहुत बड़ा है जिसमें उनके 200 से ज्यादा दामाद हैं, 40 से ज्यादा बहुएं हैं तो 1000 से भी ज्यादा नाती-नातिनें और पोते-पोतियां हैं। सिंधुताई के इस परिवार में हजार से भी ज्यादा ऐसे और भी बच्चें हैं जिन्हें समाज में ठुकरा दिया गया और सिंधुमाई के आंचल की छाया में पल रहे हैं। माई ने इन लोगों को हदपसर, पुणे में छत दी सनमति बाल निकेतन के नाम से। इतना ही नहीं माई ने इन अनाथों के लिए कुंभार्वलन, सस्वाद में ममता बाल सदन बनाया है तो अमरावती के चिखालदार में माई का आश्रम है। वहीं वर्धा में अभिमान बाल भवन है तो गुहा में गंधारबाबा छात्रालय है। पुणे में भी सिंधु माई ने महिलाओं और बच्चों के लिए सप्तसिंधु महिला आधारा के नाम से आश्रम बनाया है तो बच्चों के लिए बालसंग गोपन नाम से अपनी शिक्षा संस्था भी दी है।
माई को गर्व है कि उनके बहुत से बच्चे आज अनाथों का जीवन नहीं बल्कि सम्मान के साथ जी रहे हैं। कोई डाक्टर है तो कोई जाना माना वकील बन चुका है। इतना ही नहीं सिंधु माई के खुद की अपनी बेटी भी सिंधु माई की तरह अनाथ लोगों के जीवन को सेध देने की ओर अग्रसर हैं।
जिंदगी की शाम में भी माई के चेहरे पर सुबह की लाली और जुनून की रौशनी दमकती है। 80 सालों से अधिक उम्र की सिंधु माई कहती हैं मेरे पास बहुत से काम हैं जिन्हें पूरा करना है।
क्वोटः
“मैं भगवान का शुक्र मनाती हूं कि उसने मुझे औरत का जीवन दिया। क्योंकि एकमात्र मां का आंचल ही है जो हर बच्चे को छाया देने में सक्षम है। मां ही है जो खुद भूखी रहकर भी अपने कई बच्चों का एक साथ पेट भरने का माद्दा रखती है। दुनिया में सिर्फ भारत ही एक ऐसा देश है जिसे माता (भारतमाता) कहकर पुकारा जाता है। मुझे गर्व है कि मैं भी कई बच्चों की मां हूं। जब मैं घर से चली थी तो मैं भूखी थी और मेरी नन्ही सी बेटी भी। आज मुझे गर्व होता है कि मैंने अपनी भूख को जीता और हजारों बच्चों का पेट भरना सीखा। मुझे मान है, अभिमान है कि मैं मां हूं।

चंद्रलेखा

चंद्रलेखा उस गांव की हैं जहां बेटियों के जन्म पर कोई मायूस नहीं होता बल्कि खूब जश्न मनाया जाता है। बस दुख इस बात का है क यह जश्न बहुत ही गलत कारणों से मनाया जाता है। नटपुर्वा गांव जहां 300 सालों से आज भी एक निहायती बदनाम परंपरा जारी है, और ये है वेश्यावृति। इसलिए इस गांव में बेटी के जन्म पर परिवार में खुशी की छटा सी बिखर जाती है, क्योंकि इस घटिया परंपरा को आगे बढ़ाने वाली जो आ जाती है। इस कुप्रथा की बेड़ियों की पीड़ा झेल चुकी चंद्रलेखा जद्दोजहद कर रही है गांव की बेटियों को इस दलदल से निकालने के लिए। मात्र 15 साल की उम्र से इस पीड़ा का दंश झेलने वाली चंद्रलेखा को किसी और ने नहीं बल्कि उसकी अपनी दादी और मां ने ही उसे इस नर्क में धकेला था, चूंकि वो खुद भी इसी परंपरा की पैरोकार थीं।
हर रोज की यह पीड़ा, संघर्ष 20 सालों तक बदस्तूर जारी रहा। हद तो उस दिन हो गई जब एक शराबी ने नशे में धुत्त बंदूक के बल पर उससे शारीरिक संबंध बनाए। इस हैवानियत ने चंद्रलेखा को झिंझोड़ कर रख दिया और उसने फैसला कर लिया कि अब बस, बहुत हुआ इस कुप्रथा की जंजीरों को तोड़ना ही होगा। चाहे इसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़ी और उसने चुकाई भी। लोगों की गालियां, तिरस्कार, अपमान, मार और पत्थर भी खाए, मगर उसने हिम्मत नहीं हारी। इस दलदल में छह दशक बिता चुकी चंद्रलेखा चार बच्चों की मां ही नहीं बल्कि नट्पुर्वा गांव के लगभग 100 बच्चों की टीचर भी है। जो न सिर्फ उन्हें शिक्षा की रौशनी दे रही है बल्कि हर रोज उन्हें जीवन की मुख्यधारा से जुड़ने के लिए भी प्रेरित करती है। बिजली, पानी, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं के अभाव में भी वो बच्चों में अच्छे जीवन की ललक को जगाए रखने और इस दलदल से निकलने के लिए उनका मार्गदर्शन कर रही है। उसके इस साहसिक कदम में कुछ महिलाएं, कुछ युवतियां तो कुछ बच्चे जागृत हो रहे हैं, जो बेहतर भविष्य की तमन्ना लिए इस कुप्रथा को त्याग भी रहे हैं।
क्वोटः
“ मेरा बीता हुआ कल आज भी मुझे कचोटता है। मगर मुझे खुशी है कि मैं अपने गांव की बच्चियों को, औरतों को इस नरक भरी जिंदगी से निकलने के लिए जागृत कर पाई हूं। इस गांव में लड़कियां बिन ब्याही मां नहीं बल्कि उनके हाथों पर शगुन की मेहंदी भी सजदी है और उनके आंगन में शादी की शहनाई भी गूंजती है। मुझे सुकून है कि मेरी कोशिश रंग ला रही है। मगर हां उस दिन मेरा जीवन और सफल हो जाएगा जिस दिन इस गांव की हर बच्ची स्कूल फिर कालेज भी जाएगी। मेरी जीवन यात्रा ने आज मुझे मजबूत बना दिया है, मुझे गर्व होता है अपने औरत होने पर जब देखती हूं, मेरे गांव की बेटियां अब अपने हक के लिए आवाज उठाती हैं। मैं इनके लिए संघर्ष करती रहूंगी।”

सोनाली मुखर्जी

सोनाली मुखर्जी, ठीक अपने नाम की तरह चमकने और उसे साकार करती 17 साल की होनहार छात्रा थी। धनबाद की रहने वाली सोनाली समाजशास्त्र में ऑनर्स कर रही थी। सिर्फ पढ़ाई ही नहीं विद्यालय में होने वाली तमाम गतिविधियों के साथ एनसीसी की बेहतरीन कैडेट भी थी। मगर एक शाम उसके जीवन की चमक को स्याह अंधेरे में बदल दिया गया। उसके पड़ोस में रहने वाले एक शख्स ने एकतरफा प्यार के चलते सोनाली के साथ अपने दोस्तों के साथ मिलकर यह हैवानियत का नंगा नाच खेला, घर में सो रही सोनाली के चेहरे पर तेजाब फेंका गया। चेहरे पर तेजाब फेंके जाने से सोनाली न सिर्फ जल गई, बल्कि खूबसूरत सोनाली का चेहरा विकृत हो गया, सोनाली आंशिक रूप से दृष्टिहीन हो गई, सुनने की ताकत भी जाती रही। यहाँ तक कि उसे खाना खाने के लिए भी असहनीय दर्द से जूझना पड़ता है। एनसीसी की उमदा कैटेड आज भले शारीरिक रूप से कमजोर हो गई हो, एक वक्त पर मानसिक रूप से भी टूट चुकी सोनाली फिर से हिम्मत बटोर खड़ी है।
दर्द भरे 22 ऑपेरेशन झेल चुकी सोनाली आज अपने सम्मान और नामात्र सजा पाए उन चार शख्सों के खिलाफ खड़ी है जिन्होंने उसके जीवन के साथ खिलवाड़ किया। जबकि ऐसी स्थिति में लोग घर बैठ जाते हैं, टूट जाते हैं लेकिन सोनाली ने अलग रास्ता चुना। वो भारत के लोकप्रिय क्विज कार्यक्रम कौन बनेगा करोड़पति में गई और 25 लाख रूपये जीते, जिसे सोनाली अपने होने वाले अगले ऑपरेशनों पर खर्च करेगी।
सहयोगः परिवार का पूरा समर्थन सोनाली को जिन्दगी में लड़ने की प्रेरणा देता रहा। उस घटना के बाद का जीवन मुश्किलों का पर्याय है। सोनाली के इलाज के लिए परिवार की पुश्तैनी जमीन, मां के गहने तक बेचने पड़े। इलाज के लिए धनबाद से दिल्ली आना, शारीरिक, मानसिक पीड़ा के साथ-साथ आर्थिक तंगी की गर्त में भी धंसना था।
सोनाली चाहती है कि तेजाब से हमला करने वालों के खिलाफ कानून सख्त हो। वो चाहती है लोग उन लोगों की लड़कियों की मदद के लिए आगे आएं जो ऐसे हमलों की शिकार हुई हैं। उसके साथ न्याय नहीं हुआ है, वो कहती है मुझे इंतजार है उस दिन का जब ऐसे अमानवीय व्यवहार करने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी, क्योंकि आज भी उसके हमावर बेबाक होकर घूमते हैं।
क्वोटः मेरे जैसी अमानवीय व्यहार की शिकार लड़कियों के लिए टूट जाना जाहिर है। मैंने खुद को मजबूत बनाया, भले शारीरिक रूप से मैं कमजोर हो चुकी हूं, मगर मैं उन लोगों को बता देना चाहती हूं कि मेरी हिम्मत आज भी ऐसे लोगों को चुनौती देती है। मैं आज भी खड़ी इस हिंसा के खिलाफ, बुलंद है मेरी आवाज इस हैवानियत के खिलाफ, जारी रखुंगी मैं अपना संघर्ष। मुझे गर्व है कि मैं हिम्मती नारी हूं।

जया देवी

बिहार के मुंगेर जिले में ग्रीन लेडी के नाम से मशहूर जया देवी की परवरिश ऐसे हालात में हुई जहां गरीबी, उत्पीड़न, भूख और बदहाली के सिवाय कुछ नहीं था। यहां तक कि इलाके के नक्सलियों की धमकी के बाद चौथी क्लास में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी और 12 साल की उम्र में ही सुहागिन बनने को मजबूर होना पड़ा।ऐसे में उनका बचपन संघर्ष और सामंतवादियों के रहमो-करम पर बीता। इन्हीं हालात ने जया को समाज में परिवर्तन के लिए प्रेरित किया। जिसके बाद करैली गांव में उपेक्षिक समुदाय के लिए स्वयं-सहायता समूह की नींव रखी, ताकि वहां के लोगों खासकर महिलाओं को सूद,ब्याज से मुक्ति मिले और उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके। 9 पंचायतों में सक्रीय ग्रीन लेडी की महिम ने कई मुद्दों पर स्थानीय लोगों का ध्यान आकर्षित किया, जिसमें पर्यावरण की देखभाल, जल संरक्षण, वृक्षारोपण शामिल है।
लेकिन, इन सब के बावजूद ग्रीन लेडी ‘जया’ अपना मुख्य उद्देश्य नहीं भूलीं। अपनों की हिफाजत और नक्सली दमन से ग्रामीणों को आजादी, आज भी उनकी पहली प्राथमिकता है। हालांकि, वो बखूबी वाकिफ हैं कि नक्सलियों से मुकाबला और सामंतवादियों के खिलाफ परिवर्तन का बिगुल जीवन पर भारी पड़ सकता है, जया ने कभी हिम्मत नहीं हारी और संघर्ष जारी रखा। इतिहास से सबक लेकर, जया परिवर्तन के चक्र को घुमाने के लिये वचनबद्ध है। हम उनकी हिम्मत को सलाम करते हैं।
अगर, उनकी उपलब्धियों की बात करें तो,  उन्होंने अब तक करीब 2000 निरक्षर लोगों को हस्ताक्षर करना सिखाया है और महत्वपूर्ण दस्तावेजों जैसे राशन कार्ड, मतदाता परिचय पत्र, व पेंशन में भी मदद की है। वो अभी भी जनजातियो के यौन-उत्पीड़न के खिलाफ, अपने क्षेत्र को प्रदूषण रहित बनाने और आधारभूत सुविधाओं, शिक्षा व बच्चों के लिये पोषक तत्वों की व्यवस्था के लिये संषर्ष कर रही हैं।
“मुझे जो बात नारी होने पर गर्व कराती है कि मुझे अपनी देखभाल के लिये किसी मर्द की आवश्यकता नहीं है – मैं स्वावलंबी हूँ और अन्य महिलाओं को भी यही करने में सहायता की है। आज, हर एक महिला को समाज में अपनी स्थिति सुधारने की दिशा में काम करना चाहिये और इसके लिए उन्हें जानना चाहिये कि समान स्थिति की माँग कर वो सिर्फ अपने अधिकार की ही माँग कर रही हैं।”
बरथा जी डाखर
जन्मजात नेत्र रोग (रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा) से ग्रसित बरथा जी डाखर, की आँखों के सामने तब पूरी तरह अंधेरा छा गया, जब वो बैंगलोर में सोशल वर्क में पीजी कर रही थीं। इसके साथ ही उनका सोशल वर्क में साइकियाट्रिक बनने का भी सपना भी चूर-चूर हो गया।और फिर निराश होकर अपने पैतृक स्थान शिलॉंग वापस जाने का फैसला कर लिया।
हालांकि, घर वापसी के पहले उन्होंने एक शिक्षिका के पद के लिये आवेदन भी किया था, लेकिन उन्हें असफलता ही हाथ लगी। क्योंकि शिक्षण संस्था को डर था कि एक दृष्टिहीन काम को सफलतापूर्वक नहीं कर सकता।
ऐसे में बरथा को एक सामान्य जिंदगी जीना आसान नहीं था। अपनी जिंदगी को चलाने के लिए उन्होंने जैम और अचार भी बेचना पड़ा। असंवेदनहीन समाज में पली-बढ़ी बरथा ने फिर निश्चय किया कि आगे की जिंदगी वो दृष्टिहीनों के लिये गुजारेंगी। जिसकी वजह से उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी, उसी कमी को दूर करने के लिए यानी दृष्टिहीनों के लिए पढ़ाई की सुविधाएँ मुहैया कराने के लिए संघर्ष शुरू किया। इस प्रकार उन्होंने मेघालय के एक प्रमुख जनजातीय भाषा, खासी, में ब्रेल कोड का आविष्कार कर डाला, जिसके लिए उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया।
वैसे तो जीवन में कोई सीमा नहीं होती, वो खुद इंसानों द्वारा तय की जाती हैं। जब जिंदगी जीने की उम्मीदों पर काला साया छाने लगा, तब बरथा ने खुद राह बनाने की ठान ली थी। सभी मुश्किलों को पार कर, आज बरथा दृष्टिहीनों के लिये ज्योति श्रोत नाम की फ्री-स्कूल चलाती हैं जो कि लैटुम ख्राह, शिलांग के बेथानी सोसाइटी की एक ईकाई है। इस स्कूल ने अबतक 100 से ऊपर दृष्टिहीनों विद्यार्थियों को एक नया जीवन भी दिया है।
“मुझे नारी होने पर गर्व है क्योंकि मेरे रचयिता का विश्वास है कि जो काम मैं कर रही हूँ वह सबसे अच्छे से एक नारी हृदय के द्वारा ही की जा सकती है और मुझे गर्व है कि मैं उस विश्वास को लिए काम कर रही हूँ।”
सुचेती काडेथंकर
51 दिन, 11 घंटे व 40 मिनट वो समय है जिसमें 33 वर्षीय सुचेती काडेथंकर ने 1000 मील (1623 किमी)  लंबे एशिया के सबसे बड़े रेगिस्तान को पार करने में लगाई। 45 डिग्री की तपती गर्मी और जख्मी कंधे ने भी सुचेता को एशिया के सबसे बड़े रेगिस्तान ‘गोबी’ को पार कर अपने सपनों को साकार करने से नहीं रोक पाई।
सुचेता उस 13 सदस्यीय टीम की सदस्य थीं जिसमें विश्व भर के कई देशों से लोग शामिल थे, जिसकी अगुआई रेगिस्तान के अन्वेषक रिपले डेवेनपोर्ट कर रहे थे। पुणे के कस्बापेठ में जन्मी सुचेता अब एक सॉफ्टवेयर कंपनी में बतौर प्रिंसिपल इंफोरमेशन डेवेलपर काम कर रही हैं। इतिहास में स्नातक, सुचेता ट्रेकिंग में कदम के क्षेत्र में रखने से पहले एक मराठी समाचार-पत्र के साथ बतौर पत्रकार जुड़ी थीं।
बिना किसी बाहरी प्रेरणा के, सुचेता ने न केवल चिलचिलाती गर्मी (45 डिग्री सेल्सियस) की गर्मी को सहा, बल्कि  उस  तपती बंजर भूमि में भी पैदल यात्रा की। उसके दल के अनेक सदस्य हटते रहे, लेकिन छोड़ना उसके लिए विकल्प नहीं था। अपनी परेशानियों को याद करते हुए, सुचेता कहती है, “हमें पानी प्रत्येक 5 दिन पर मिलता था। उसमें से अधिकांश पीने के लिये सुरक्षित रखा जाता था…हम अपने आपको गीले वाइप से पोछते थे।” रिपोर्ट के मुताबिक, उनमें से किसी ने लगभग 2 महीनों तक स्नान नहीं किया था। हालांकि, उसे पता था कि उसकी यात्रा पूरी करने की खुशी उन परेशानियों ज्यादा होगी जो रास्ते में झेलनी पड़ी। और इसी खुशी को पाने के लिए  हर परेशानियों का डटकर मुकाबला किया।
हीराबाई बेन लोबी
हीराबाईबेन वास्तव में एक शक्तिशाली नारी हैं। कम उम्र में सर से मां-बाप का साया उठ जाने के बाद  हीराबाईबेन का बचपन बड़ी कठिनाइयों के साथ बीता। लेकिन, उन्होंने कभी भी हिम्मत नहीं हारा। सीमित साधन के बावजूद लगातार चुनौतियों से मुकाबला करते हुए आजीविका के लिए खेती की नई तरीकों का सहारा लिया।  इस प्रकार बैंक से  लोन लेकर उन्होंने जैविक कम्पोस्ट फार्म शुरू करने का फैसला किया, जिसके लिए स्थानीय समुदाय ने आपत्ति भी जताई। लेकिन कडी मेहनत व दृढ निश्चय और गुजरात के सिद्दी समुदाय की महिलाओं की मदद से, उनकी कोशिशों ने रंग लाया। खेती की यह नई वैज्ञानिक विधि हीराबाई बेन कि लिये बहुत फायदेमंद साबित हुआ और जिससे एक लंबे समय तक चल सकने वाला उद्योग की स्थापना हुई। आज भी हीराबाई बेन की सफलता की कहानी जारी है और उनका वर्मीकम्पोस्ट उत्पादक समूह बडे-बडे ब्रांडों से टक्कर लेते हुए, सलाना करीब 700,000 रूपये का कम्पोस्ट की बिक्री करता है।
अतिरिक्त
हीराबाई बेन ने वृहद समाज के कई दूसरे मुद्दों को भी छुआ है और साथ ही कई महिलाओं को भी इसमें भागीदार बनने के लिये प्रेरित किया है। उनके काम का मुख्य केंद्र स्वास्थ्य, आर्थिक आजादी व खेतीबाडी में बेहतरी पर रहा है। यहाँ तक कि उन्होंने अपनी आय व कृषि-व्यापार से मिले एवार्ड व फंड को भी स्थानीय स्कूल के विकास में लगाया है। और अब एक कॉलेज खोलने जा रही हैं।
60 साल की उम्र में हीराबाईबेन अपने तीन बच्चों के लिए ही नहीं, पूरे समाज के लिए प्रेरणा स्रोत हैं।
क्वोटः आपको क्या एक गर्वान्वित नारी बनाता है?
“मुझे गर्व है कि गाँव की एक नारी होने के बावजूद मैंने समुदाय के सदस्यों में आत्म-निर्भरता का भाव भरा है, जहाँ जागरूकता की कमी है व फंड जुटाना आसान काम नहीं है। वे सब मुझे एक प्रेरणास्रोत के रूप में देखते हैं ओर इससे मुझे हिम्मत मिलती है व मैं विनम्र रहती हूँ।”

साभार- रेड रिक्शा रेवलूशन