सोमवार, 14 मार्च 2016

नदी और संस्कृति पर खतरा

मानव सभ्यता और संस्कृति का विकास नदियों के किनारे हुआ है, यह सर्वज्ञात तथ्य है। इंसान और नदी का रिश्ता मां और बच्चे की तरह है। यूं तो पूरे विश्व में अपने-अपने तरीके से नदियों के प्रति कृतज्ञता दिखलाई जाती है, लेकिन भारत इस मामले में भी अनूठा है। हमने नदियों को मां ही नहींदेवी का दर्जा दिया। नदियों की आरती करना, उनके नाम के साथ जी लगाना, उनके नामों की सौगंध उठाना, यह सब इस देश में खूब होता है। हमारे पुरखे दूरदृष्टि रखने वाले रहे होंगे, उन्हें अंदेशा होगा कि आने वाली पीढिय़ां नदियों के साथ बदसलूकी कर सकती हैं, इसलिए उन्होंने ऐसी परंपराएं बनाई होंगी कि कम से कम धर्मभीरू होकर ही सही, पर भावी पीढिय़ां नदियों की रक्षा करेंगी, उनका अनुचित दोहन, शोषण नहींकरेंगी। पुरखों की बनाई धार्मिक परंपराओं को हमने खूब निभाया और प्रकृति की रक्षा की उपेक्षा करते रहे। आज नियम से नदियों की आरती होती है, उनकी पौराणिक कथाएं सुनाई जाती हैं, नदियों से जुड़े तमाम कर्मकांडों को पूरा किया जाता है और बताया जाता है कि यह सब मानवता का उद्धार करने के लिए है। देश की राजधानी में यमुना नदी के किनारे होने वाले भव्य विश्व सांस्कृतिक महोत्सव को लेकर भी ऐसे ही तर्क दिए जा रहे हैं कि इससे दुनिया में देश की सांस्कृतिक छवि का नवनिर्माण होगा, दुनिया को भारतीयता की ताकत दिखाने का अवसर मिलेगा, एक साथ 35 हजार कलाकारों का प्रदर्शन और 35 लाख दर्शकों के शामिल होने का रिकार्ड गिनीज बुक में दर्ज होगा, आदि, आदि। श्री श्री रविशंकर की संस्था आर्ट आफ लिविंग पहले भी ऐसे कार्यक्रम कर चुकी है, लेकिन इस बार का कार्यक्रम इतने वृहद पैमाने पर इसलिए किया जा रहा है क्योंकि संस्था के 35 वर्ष पूरे हो रहे हैं। यूं 10, 25, 50, 75 या सौ का आंकड़ा पूरा होने पर जयंतियां मनाई जाती हैं, फिर 35 साल में ऐसा क्या खास है, यह बूझने की बात है। वैसे जब पांच साल के लिए चुनी गई सरकारें सौ दिन पूरा होने पर जश्न मनाती हैं, तो फिर रजत, स्वर्ण या हीरक जयंती की बात बेमानी है। श्री श्री रविशंकर के अनुयायी पूरे विश्व में हैं और वे चाहते तो कहींभी ऐसा सांस्कृतिक महोत्सव कर लेते। लेकिन उन्होंने यमुना का किनारा ही चुना। कुछ वर्ष पहले उन्होंने यमुना का सफाई अभियान अपनी संस्था के जरिए चलवाया था। अब यमुना पहले से अधिक गंदी हो गई है, इसमें उनका कोई कसूर नहींहै। लेकिन ऐसा लगता है कि सफाई अभियान का मेहनताना इस सांस्कृतिक उत्सव के जरिए लिया जा रहा है। यमुना के डूब वाले क्षेत्र में इस कार्यक्रम को मंजूरी देने से लेकर, लोकनिर्माण विभाग, पुलिस और सेना के इस्तेमाल तक कई सवाल उठाए गए हैं। सबसे गंभीर सवाल है यमुना नदी के साथ हो रहे खिलवाड़ का। इस आयोजन से यहां की जैवपारिस्थितिकी को होने वाले नुकसान का। पर्यावरण का। किसानों की उजाड़ी गई फसल का। बहुत दुख होता है यह देखकर कि कैसे कार्यक्रम के आयोजक, समर्थक और कानूनी पैरोकार इन सवालों के एवज में जवाबों और तर्कों को इस तरह प्रस्तुत कर रहे हैं मानो यमुना नदी कुछ लोगों की जागीर है, जिसका वे मनमाना उपयोग कर सकते हैं। अगर वे इसे अपनी जागीर मान रहे हैं, तब तो उन्हें इसके साथ और सावधानी से बर्ताव करना चाहिए। मौजूदा माहौल तो ऐसा है, मानो नदी से पुरानी दुश्मनी निकाली जा रही हो। यमुना के डूब वाला क्षेत्र भूकंप और बाढ़ दोनों के लिहाज से काफी संवेदनशील है। प्राकृतिक आपदाएं बोलकर नहींआती, लेकिन मानव अपनी सावधानी से उनसे बच सकता है। जब सावधानियां नहींबरती गईं तो उसका नुकसान कितना जानलेवा साबित हुआ यह सुनामी और बाढ़ के प्रसंगों में देखा जा सकता है। यमुना किनारे एक बार फिर विश्व सांस्कृतिक महोत्सव के बैनर तले नदी और इंसानी जीवन से खिलवाड़ की आलीशान तैयारी की गई है। आयोजकों का कहना है कि पर्यावरण को किसी तरह का नुकसान नहींपहुंचाया जा रहा है। लेकिन खबरें हैं कि कई एकड़ की फसल नष्ट कर दी गई है और लगभग 200 किसान इससे प्रभावित हुए हैं। बहुत सा कचरा डालकर नदी किनारे के गड्ढों को भरा गया है और जमीन समतल की गई है। 35 लाख लोगों समेत कई अतिविशिष्ट मेहमानों के लिए भव्य मंच, दर्शकदीर्घा इत्यादि का निर्माण किया गया है। लगभग 650 मोबाइल शौचालय आयोजन स्थल पर होंगे, जो नदी किनारे ही है। कई गाडिय़ों की पार्किंग की व्यवस्था है। तीन दिनों के कार्यक्रम के लिए आसपास के कई इलाकों की यातायात व्यवस्था प्रभावित होगी और इन सबसे जो ध्वनि प्रदूषण होगा, सो अलग। क्या यह सब पर्यावरण के लिए घातक नहींहै। शायद इसी वजह से नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आयोजकों पर पांच करोड़ का जुर्माना लगाया है, जिससे श्री श्री रविशंकर सहमत नहींहैं। अगर वे इतना जुर्माना भर भी देते हैं तो क्या यह नदी की कीमत तय करने जैसा नहींहै। अच्छा होता अगर सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद केवल और केवल नदी के हित को देखते हुए फैसला लिया जाता। नदी भी बचती, संस्कृति भी और तब महोत्सव का आनंद उठाया जाता। साभार: देशबंधु (सम्पादकीय)

1 टिप्पणी:

  1. आपने लिखा...
    कुछ लोगों ने ही पढ़ा...
    हम चाहते हैं कि इसे सभी पढ़ें...
    इस लिये आप की ये खूबसूरत रचना दिनांक 15/03/2016 को पांच लिंकों का आनंद के
    अंक 242 पर लिंक की गयी है.... आप भी आयेगा.... प्रस्तुति पर टिप्पणियों का इंतजार रहेगा।

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