नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शुक्रवार, 25 जून 2021

ये हैं भारत के वो 5 मशहूर चोर बाजार, जहां कम से कम में खरीद सकते हैं कपड़ों से लेकर इलेक्ट्रानिक का सामान

 

आपने कभी चोर बाजार से कोई अपना जरूरी सामान कम से कम दाम में खरीदा है? अगर नहीं, तो ये रहे भारत के 5 ऐसे मशहूर चोर बाजार जहां आप फर्नीचर, कपड़ों से लेकर गाड़ी के पार्ट्स तक खरीद सकते हैं।



भारत में ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें कम से कम दाम में चीजों को खरीदना बहुत पसंद होता है। ऐसे लोगों को अगर आप बोल दें, कि इस मार्किट में आज 50 परसेंट ऑफ मिल रहा है या सेल लगी है, तो वहां कुछ ही घंटों में आप इतनी भीड़ देख लेंगे, जहां पैर रखने की जगह नहीं होती। बहुत से लोग तो ऐसे होते हैं, जो ऑनलाइन में भी डिस्काउंट और सेल तलाश रहे होते हैं। लेकिन क्या आप ये बात जानते हैं? कि भारत में ऐसे कई चोर बाजार हैं, जहां आप चीजों को बहुत ही सस्ते दाम में खरीद सकते हैं। इन बाजारों में आप फर्नीचर, कपड़े, इलेक्ट्रानिक सामान से कार के पार्ट्स भी सस्ते दाम में खरीद सकते हैं। तो चलिए हम आपको उन बाजारों के बारे में बताते हैं -

मटन स्ट्रीट, मुंबई - Mutton Street, Mumbai 


मुंबई में एक मशहूर मटन स्ट्रीट नाम से एक चोर बाजार है, जो कि लगभग 150 साल से यही पर है। पहले इस बाजार का नाम शोर बाजार था, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि ब्रिटिश लोग इस शब्द को सही ढंग से नहीं बोल पाते थे, वो शोर बाजार को चोर बाजर कहते थे। यहां आप विंटेज मूवी पोस्टर्स से लेकर एंटीक फर्नीचर, सेकेंड हैंड कपड़े, लग्जरी ब्रांड के प्रोडक्ट्स की फर्स्ट कॉपी बहुत कम दाम में खरीद सकते हैं। अगर आपका कोई सामान चोरी हुआ है, तो आप यहां आकर अपने सामान को ढूंढ सकते हैं, क्योंकि कई बार लोगों को अपना खोया हुआ सामान यहां मिल 
जाता है।

चिकपेट मार्केट, बेंगलुरु - Chickpet Market, Bengaluru


चिकपेट मार्किट भी बेंगलुरु के सबसे लोकप्रिय चोर बाजार में आती है। चिकपेट एक ऐसा बाजार है, जहां आप कई तरह के आकर्षक सामान खरीद सकते हैं। यहां आपको कई सिल्क की साड़ियां देखने को मिल जाएंगी। इसके अलावा आप यहां बहुत कम दाम में कपड़े और आर्टिफिशियल गहने भी खरीद सकते हैं। अगर आप जिम का सामान खरीदने के लिए कोई सस्ती दूकान खरीद रहे हैं, तो आप यहां जा सकते हैं।

चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली - Chandni Chowk, Old Delhi 



दिल्ली के चांदनी चौक बाजार को कौन नहीं जानता, देश के साथ-साथ यहां कई विदेशी लोग भी खरीदारी करने आते हैं। दिल्ली के इस बाजार में सबसे ज्यादा हलचल देखने को मिलती है। ये बाजार सबसे अधिक कपड़े और हार्डवेयर के लिए जाना जाता है। इस मार्किट में कई पुरानी दुकाने हैं, जिनसे आप बहुत ही कम दाम में सामान खरीद सकते हैं। यहां पर मिलने वाला सामान या तो सेकेंड हैंड होता है या फिर थोड़ा डिफेक्टिव होता है। आप बड़े ब्रांड से लेकर छोट-छोट ब्रांड के प्रोडक्ट्स यहां देख सकते हैं। चांदनी चौक के पास दरियागंज बाजार भी है, जहां से आप बहुत ही कम दाम में किताबें खरीद सकते हैं।

सोती गंज मेरठ - Soti Ganj, Meerut


सोती गंज भारत के प्रसिद्ध बाजारों में शामिल है। जो लोग वाहन प्रेमी हैं, उनके लिए ये मार्किट एकदम बेस्ट है। इस मार्किट में आप गाड़ी के सामान जैसे ईंधन टैंक और बहुत सी चीजें सबसे कम दाम में खरीद सकते हैं। सोती गंज, मेरठ में मौजूद है, जहां सस्ते में ऑटोमोबाइल पार्ट्स बेचे जाते हैं। आपको बता दें, दिल्ली/एनसीआर या उत्तरी शहरों से जो भी गाड़ी का सामान या कार चोरी होता है, उसे यही बेचा जाता है। इस बाजार में आप मारुति 800 से लेकर रोल्स रॉयस जैसे महंगी गाड़ियों के सामान तक खरीद सकते हैं।

पुदुपेट मार्केट, चेन्नई - Pudupet Market, Chennai




पुदुपेट मार्केट चेन्नई का एक मशहूर मार्किट है, जो दक्षिण के ऑटोमोबाइल प्रेमियों के लिए फेमस है। इस बाजार में आप स्पेयर ऑटो पार्ट्स से लेकर असेंबल और कस्टमाइज्ड कारों तक हर तरह के ऑटोमोबाइल पार्ट्स देख सकते हैं। ये बाजार बिल्कुल वैसा ही होता है, जैसा आप बॉलीवुड की फिल्मों में देखते हैं, जिनकी स्टोरी माफिया और तस्करी के आसपास घूमती हैं।

आलेख साभार- नवभारत टाइम्स (फोटो साभार : TOI)
समाज की बात Samaj Ki Baat KD Sharma कृष्णधर शर्मा 




सौर ऊर्जा एवं पम्प स्टोरेज से बनाइए साफ बिजली

 हम सौर ऊर्जा के साथ स्वतंत्र पम्प स्टोरेज परियोजनाएं लगाएं तो हम छह रुपये में रात की बिजली उपलब्ध करा सकते हैं जो कि थर्मल बिजली के मूल्य के बराबर होगा। इसके अतिरिक्त जब कभी-कभी अकस्मात ग्रिड पर लोड कम-ज्यादा होता है उस समय भी पम्प स्टोरेज परियोजनाओं से बिजली को बनाकर या बंद करके ग्रिड की स्थिरता को संभाला जा सकता है।

आज सम्पूर्ण विश्व बाढ़, तूफान, सूखा और कोविड जैसी समस्याओं से ग्रसित है। ये समस्याएँ कहीं न कहीं मनुष्य द्वारा पर्यावरण में अत्यधिक दखल करने के कारण उत्पन्न हुई दिखती है। इस दखल का एक प्रमुख कारण बिजली का उत्पादन है। थर्मल पावर को बनाने के लिए बड़े क्षेत्रों में जंगलों को काट कर कोयले का खनन किया जा रहा है। इससे वनस्पति और पशु प्रभावित हो रहे हैं। जलविद्युत के उत्पादन के लिए नदियों को अवरोधित किया जा रहा है और मछलियों की जीविका दूभर हो रही है। लेकिन मनुष्य को बिजली की आवश्यकता भी है। अक्सर किसी देश के नागरिकों के जीवन स्तर को प्रति व्यक्ति बिजली की खपत से आंका जाता है। अतएव ऐसा रास्ता निकालना है कि हम बिजली का उत्पादन कर सकें और पर्यावरण के दुष्प्रभावों को भी सीमित कर सकें।  अपने देश में बिजली उत्पादन के तीन प्रमुख स्रोत हैं। पहला है-थर्मल यानी कोयले से निर्मित बिजली। इसमें प्रमुख समस्या यह है कि अपने देश में कोयला सीमित मात्रा में ही उपलब्ध है। हमें दूसरे देशों से कोयला भारी मात्र में आयात करना पड़ रहा है। यदि कोयला आयात करके हम अपने जंगलों को बचा भी लें तो आस्ट्रेलिया जैसे निर्यातक देशों में जंगलों के कटने और कोयले के खनन से जो पर्यावरणीय दुष्प्रभाव होंगे वे हमें भी प्रभावित करेंगे ही। कोयले को जलाने में कार्बन का उत्सर्जन भारी मात्रा में होता है जिसके कारण धरती का तापमान बढ़ रहा है और तूफान, सूखा एवं बाढ़ जैसी आपदाएं उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही हैं। बिजली उत्पादन का दूसरा स्रोत जल विद्युत अथवा हाइड्रोपावर है। इस विधि को एक साफ-सुथरी तकनीक कहा जाता है चूंकि इससे कार्बन उत्सर्जन कम होता है।  थर्मल पावर में एक यूनिट बिजली बनाने में लगभग 900 ग्राम कार्बन का उत्सर्जन होता है जबकि जलविद्युत परियोजनाओं को स्थापित करने में जो सीमेंट और लोहा आदि का उपयोग होता है उसको बनाने में लगभग 300 ग्राम कार्बन प्रति यूनिट का उत्सर्जन होता है। जलविद्युत में कार्बन उत्सर्जन में शुद्ध कमी 600 ग्राम प्रति यूनिट आती है जो कि महत्वपूर्ण है। लेकिन जलविद्युत बनाने में दूसरे तमाम पर्यावरणीय दुष्प्रभाव पड़ते हैं। जैसे सुरंग को बनाने में विस्फोट किये जाते हैं जिससे जलस्रोत सूखते हैं और भूस्खलन होता है। बराज बनाने से मछलियों का आवागमन बाधित होता और जलीय जैव विविधिता नष्ट होती है। बड़े बांधों में सेडीमेंट जमा हो जाता है और सेडीमेंट के न पहुंचने के कारण गंगासागर जैसे हमारे तटीय क्षेत्र समुद्र की गोद में समाने की दिशा में हैं। पानी को टर्बाइन में मथे जाने से उसकी गुणवत्ता में कमी आती है। इस प्रकार थर्मल और हाइड्रो दोनों ही स्रोतों की पर्यावरणीय समस्या है।

सौर ऊर्जा को आगे बढ़ाने से इन दोनों के बीच रास्ता निकल सकता है। भारत सरकार ने इस दिशा में सराहनीय कदम उठाए हैं। अपने देश में सौर ऊर्जा का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। विशेष यह कि सौर ऊर्जा से उत्पादित बिजली का दाम लगभग तीन रुपये प्रति यूनिट आता है जबकि थर्मल बिजली का छह रुपये और जलविद्युत का आठ रुपये प्रति यूनिट। इसलिए सौर ऊर्जा हमारे लिए हर तरह से उपयुक्त है। यह सस्ती भी है और इसके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी तुलना में कम हैं। लेकिन सौर ऊर्जा में समस्या यह है कि यह केवल दिन के समय में बनती है। रात में और बरसात के समय बादलों के आने जाने के कारण इसका उत्पादन अनिश्चित रहता है। ऐसे में हम सौर ऊर्जा से अपनी सुबह, शाम और रात की बिजली की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते हैं।  इसका उत्तम उपाय है कि 'स्टैंड अलोन' यानि कि 'स्वतंत्र' पम्प स्टोरेज विद्युत परियोजनायें बनाई जाएं। इन परियोजनायों में दो बड़े बनाये जाते हैं। एक तालाब ऊंचाई पर और दूसरा नीचे बनाया जाता है। दिन के समय जब सौर ऊर्जा उपलब्ध होती है तब नीचे के तालाब से पानी को ऊपर के तालाब में पम्प करके रख लिया जाता है। इसके बाद सायंकाल और रात में जब बिजली की जरूरत होती है तब ऊपर से पानी को छोड़ कर बिजली बनाते हुए नीचे के तालाब में लाया जाता है। अगले दिन उस पानी को पुन: ऊपर पंप कर दिया जाता है। वही पानी बार-बार ऊपर-नीचे होता रहता है। इस प्रकार दिन की सौर ऊर्जा को सुबह, शाम और रात की बिजली में परिवर्तित किया जा सकता है।  विद्यमान जलविद्युत परियोजनाओं को ही पम्प स्टोरेज में ही तब्दील किया जा सकता है। जैसे टिहरी बांध के नीचे कोटेश्वरर जलविद्युत परियोजनाओं को पम्प स्टोरेज में परिवर्तित कर दिया गया है। दिन के समय इस परियोजना से पानी को नीचे से ऊपर टिहरी झील में वापस डाला जाता है और रात के समय उसी टिहरी झील से पानी को निकाल कर पुन: बिजली बनाई जाती है। विद्यमान जलविद्युत परियोजनाओं को पम्प स्टोरेज में परिवर्तित करके दिन की बिजली को रात की बिजली में बदलने का खर्च मात्र 40 पैसे प्रति यूनिट आता है। इसलिए तीन रुपये की सौर ऊर्जा को हम 40 पैसे के अतिरिक्त खर्च से सुबह शाम की बिजली में परिवर्तित कर सकते हैं। लेकिन इसमें समस्या यह है कि टिहरी और कोटेश्वर जल विद्युत परियोजनाओं से जो पर्यावरणीय दुष्प्रभाव होते हैं वे तो होते ही रहते हैं। कुएं से निकले और खाई में गिरे। सौर ऊर्जा को बनाया लेकिन उसे रात की बिजली बनाने में पुन: नदियों को नष्ट किया।

इस समस्या का उत्तम विकल्प यह है कि हम स्वतंत्र पम्प स्टोरेज परियोजना बनाएं जैसा ऊपर बताया गया है। इन परियोजना को नदी के पाट से अलग बनाया जा सकता है। किसी भी पहाड़ के ऊपर और नीचे उपयुक्त स्थान देख कर दो तालाब बनाये जा सकते हैं। ऐसा करने से नदी के बहाव में व्यवधान पैदा नहीं होगा। ऐसी स्वतंत्र पम्प स्टोरेज परियोजना से दिन की बिजली को रात की बिजली में परिवर्तित करने में मेरे अनुमान से तीन रुपये प्रति यूनिट का खर्चा आएगा। अत: यदि हम सौर ऊर्जा के साथ स्वतंत्र पम्प स्टोरेज परियोजनाएं लगाएं तो हम छह रुपये में रात की बिजली उपलब्ध करा सकते हैं जो कि थर्मल बिजली के मूल्य के बराबर होगा। इसके अतिरिक्त जब कभी-कभी अकस्मात ग्रिड पर लोड कम-ज्यादा होता है उस समय भी पम्प स्टोरेज परियोजनाओं से बिजली को बनाकर या बंद करके ग्रिड की स्थिरता को संभाला जा सकता है। इसलिए हमें थर्मल और जल विद्युत के मोह को त्यागकर सौर एवं स्वतंत्र पम्प स्टोरेज के युगल को अपनाना चाहिये। जंगल और नदियां देश की धरोहर और प्रकृति एवं पर्यावरण की संवाहक हैं। इन्हें बचाते हुए बिजली के अन्य विकल्पों को अपनाना चाहिए।

भरत झुनझुनवाला  (साभार- देशबंधु)

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