नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757
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मंगलवार, 7 जुलाई 2020

क्यों खास है यह पत्थर!

 दही जमाने के लिए लोग अक्सर जामन ढूंढ़ते नजर आते हैं... वहीं राजस्थान के जैसलमेर जिले में स्थित इस गांव में जामन की जरूरत नहीं पड़ती है...यहां ऐसा पत्थर है जिसके संपर्क में आते ही दूध जम जाता है... इस पत्थर पर विदेशों में भी कई बार रिसर्च हो चुकी है...फॉरेनर यहां से ले जाते हैं इस पत्थर के बने बर्तन....।

स्वर्णनगरी जैसलमेर का पीला पत्थर विदेशों में अपनी पहचान बना चुका है... इसके साथ ही जिला मुख्यालय से 40 किमी दूर स्थित हाबूर गांव का पत्थर अपने आप में विशिष्ट खूबियां समेटे हुए है..इसके चलते इसकी डिमांड निरंतर बनी हुई है...हाबूर का पत्थर दिखने में तो खूबसूरत है ही, साथ ही उसमें दही जमाने की भी खूबी है... इस पत्थर का उपयोग आज भी जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में दूध को जमाने के लिए किया जाता है... इसी खूबी के चलते यह विदेशों में भी काफी लोकप्रिय है..इस पत्थर से बने बर्तनों की भी डिमांड बढ़ गई है..।

कहा जाता है कि जैसलमेर पहले अथाह समुद्र हुआ करता था और कई समुद्री जीव समुद्र सूखने के बाद यहां जीवाश्म बन गए व पहाड़ों का निर्माण हुआ.. हाबूर गांव में इन पहाड़ों से निकलने वाले इस पत्थर में कई खनिज व अन्य जीवाश्मों की भरमार है.
 जिसकी वजह से इस पत्थर से बनने वाले बर्तनों की भारी डिमांड है। साथ ही वैज्ञानिकों के लिए भी ये पत्थर शोध का विषय बन गया है... इस पत्थर से सजे दुकानों पर बर्तन व अन्य सामान पर्यटकों की खास पसंद होते हैं और जैसलमेर आने वाले वाले लाखों देसी विदेशी सैलानी इसको बड़े चाव से खरीद कर अपने साथ ले जाते हैं...।

▪️क्यों है खास
▪️हाबूर का पत्थर

इस पत्थर में दही जमाने वाले सारे कैमिकल मौजूद है... विदेशों में हुए रिसर्च में ये पाया गया है कि इस पत्थर में एमिनो एसिड, फिनायल एलिनिया, रिफ्टाफेन टायरोसिन हैं... ये कैमिकल दूध से दही जमाने में सहायक होते हैं... इसलिए इस पत्थर से बने कटोरे में दूध डालकर छोड़ देने पर दही जम जाता है…. इन बर्तनों में जमा दही और उससे बनने वाली लस्सी के पयर्टक दीवाने हैं... अक्सर सैलानी हाबूर स्टोन के बने बर्तन खरीदने आते हैं... इन बर्तनों में बस दूध रखकर छोड़ दीजिए, सुबह तक शानदार दही तैयार हो जाता है, जो स्वाद में मीठा और सौंधी खुशबू वाला होता है... इस गांव में मिलने वाले इस स्टोन से बर्तन, मूर्ति और खिलौने बनाए जाते हैं... ये हल्का सुनहरा और चमकीला होता है.. इससे बनी मूर्तियां लोगों को खूब अट्रैक्ट करती हैं..।

साभार-वैदिक साइंस
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रविवार, 5 जुलाई 2020

रोग प्रतिरोधकता


बहुत ही साधारण शब्दों में कहें तो शरीर की रोग पैदा करने वाले हानिकारक कीटाणुओं को कोशिकाओं के अंदर प्रवेश ना करने देने की क्षमता को ही रोगप्रतिरोधकता कहते हैं।

रोगप्रतिरोधकता कितने प्रकार की होती है?

यह मुख्यतः दो प्रकार की होती है

1. जन्मजात रोगप्रतिरोधकता
2. उपार्जित रोगप्रतिरोधकता

जन्मजात रोगप्रतिरोधकता किसी भी जीव में जन्म के समय से ही विद्यमान होती है जबकि उपार्जित रोगप्रतिरोधकता जन्म के बाद हासिल की जाती है। जन्मजात रोगप्रतिरोधकता के काम ना करने की स्थिति में उपार्जित रोगप्रतिरोधकता अपना काम करने लगती है।

उपार्जित रोगप्रतिरोधकता भी दो प्रकार की होती है

1. प्राकृतिक
2. कृत्रिम

प्राकृतिक उपार्जित रोगप्रतिरोधकता भी दो प्रकार की होती है

1. पैसिव और
2. एक्टिव

▪️पैसिव प्राकृतिक उपार्जित रोगप्रतिरोधकता गर्भावस्था के दौरान माँ से भ्रूण में प्लेसेंटा के द्वारा स्थानांतरित की जाती है। इसमें मुख्यतः IgG का ट्रांसफर होता है और जन्म के तुरंत बाद के दूध में IgA एंटीबॉडीज का ट्रांसफर होता है। जबकि एक्टिव प्राकृतिक उपार्जित रोगप्रतिरोधकता में रोग पैदा करने वाले किसी रोगकारक के सम्पर्क में आने के बाद शरीर में उसकी इम्यूनोलॉजिकल मेमोरी रह जाती है।

अब बात करते हैं कृत्रिम उपार्जित रोगप्रतिरोधकता की। यह भी दो तरह की होती है

1. पैसिव और
2. एक्टिव

▪️पैसिव कृत्रिम उपार्जित रोगप्रतिरोधकता एंटीबाडी ट्रांसफर से प्राप्त की जाती है। जबकि एक्टिव कृत्रिम उपार्जित रोगप्रतिरोधकता प्राप्त करने के लिए वैक्सीन का सहारा लिया जाता है।

रोगप्रतिरोधकता का काम है रोगाणुओं से लड़ना और रोगप्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है सन्तुलित पोषण। शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बनाए रखने में मुख्य भूमिका निभाते हैं प्रोटीन, विटामिन्स और मिनरल्स जो हमें मिलते हैं उस सात्विक भोजन से जिसे प्रकृति ने हमें इसी उद्देश्य से प्रदान किया है।

आज हम बात करेंगे उन्हीं 15 खाद्य पदार्थों की जो शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकास करने में सहायक हैं। ये खाद्य पदार्थ हैं

1. *हल्दी*: हल्दी को सूजन कम करने की विशेषता के कारण ओस्टियोअर्थराइटिस और रह्यूमेटॉइड अर्थराइटिस के इलाज के लिए सदियों से उपयोग किया जा रहा है। आप सभी अब जान चुके हैं कि हल्दी के अंदर पाया जाने वाला कुरक्यूमिन शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकास करने में सर्वोपरि है और यह एन्टीवायरल भी है।

2. *लहसुन*: इसके अंदर पाया जाने वाला सल्फर युक्त कम्पाउंड एलिसिन कमाल का है। इसी के कारण आयुर्वेद में लहसुन को रोगप्रतिरोधक क्षमता बढाने वाला बताया गया है।

3. *अदरख*: अदरख में पाया जाने वाला जिंजीरोल ही इसकी जान है। तीखा जरूर है मगर है बहुत कमाल का। गले की खिचखिच मिनटों में दूर कर देता है। इन्फ्लेमेशन कम करता है और कोलेस्ट्रॉल भी कम करता है।

4. *नींबू वर्गीय फल*: निम्बू वर्गीय फलों में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है और यह विटामिन सी ही हमें रोगों से लड़ने की अनोखी शक्ति प्रदान करता हैं। विटामिन सी श्वेत रक्त कणिकाओं के बनने में सहायक होता है और यह श्वेत रक्त कणिकाएं ही रोगाणुओं से लड़कर हमें रोग से बचाती हैं। इन फलों में चकोतरा, संतरा, नींबू और मुसम्मी प्रमुख हैं।

5. *पपीता*: पपीता भी विटामिन सी का अच्छा स्रोत है। इसके अलावा पपीते में पैपेन होता है जो डाइजेस्टिव एंजाइम है और एन्टीइन्फ्लामेट्री है।

6. *कीवी फ्रूट*: कीवी में भी विटामिन सी के अलावा फोलिक एसिड, पोटैशियम, विटामिन के और विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

7. *ब्ल्यूबेरी*: ब्ल्यूबेरी में एंथोसायनिन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो एन्टीऑक्सीडेंट होता है और श्वसन तंत्र के इम्यून डिफेंस सिस्टम को मजबूत करता है।

8. *शिमला मिर्च*: शिमला मिर्च में संतरे के मुकाबले में तीन गुना विटामिन सी पाया जाता है। इसके अलावा इसमें बीटा कैरोटीन भी भरपूर होता है जो हमारे शरीर में जाकर विटामिन ए में बदल दिया जाता है। विटामिन ए हमारी आंखों की ज्योति के लिए भी परम् आवश्यक है।

9. *ब्राकोली*: इसमें विटामिन ए, विटामिन सी और विटामिन ई के अलावा रेशा भी खूब होता है। बस आपको करना इतना है कि इसे या तो कच्चा ही खाइए या कम से कम पकाइए या फिर भाप में पकाइए।

10. *पालक*: पालक में ना केवल विटामिन सी और आयरन प्रचुर मात्रा में होता है बल्कि इसके अंदर असंख्य एन्टीऑक्सीडेंट्स और बीटा कैरोटीन भी पाया जाता है और यह सभी रोगप्रतिरोधकता का विकास करने में सहायक हैं।

11. *शकरकंद*: शकरकंद में बीटा कैरोटीन पाया जाता है जो शरीर में जाकर विटामिन ए में बदल जाता है और शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करता है।

12. *बादाम*: प्रोटीन के साथ साथ विटामिन ई का बेहतरीन स्रोत। चूंकि विटामिन ई वसा में घुलनशील विटामिन है इसलिए बादाम के साथ घी का प्रयोग विटामिन ई के अवशोषण को काफी हद तक बढा देता है।

13. *सूरजमुखी के बीज*: इनमें फास्फोरस और मैग्नीशियम के अलावा विटामिन बी6 और विटामिन ई प्रचुर मात्रा में होता है। जिनके कारण रोगप्रतिरोधकता विकसित करने में यह बहुत अच्छी भूमिका निभाते हैं।

14. *योगार्ट*: एक दिन हमने पहले भी बताया था कि इसके अंदर प्रोबायोटिक होते हैं अर्थात ऐसे लाभकारी बैक्टीरिया होते हैं जो अपनी संख्या बढाकर रोग पैदा करने वाले रोगाणुओं के लिए समस्या पैदा कर देते हैं और उन्हें पनपने नहीं देते। योगार्ट का नियमित सेवन रोगप्रतिरोधकता बनाए रखता है।

15. *डार्क चॉकलेट*: डार्क चॉकलेट में पाया जाने वाला थियोब्रोमीन शरीर की कोशिकाओं को फ्री रेडिकल्स से बचाकर शरीर के इम्यून सिस्टम को मजबूत करता है।

उपरोक्त 15 खाद्य पदार्थों के अलावा कुछ जड़ी बूटियां भी शरीर की रोगप्रतिरोधकता क्षमता का विकास करती हैं जैसे *गिलोय* और *कालमेघ*। इनका जिक्र किसी अन्य पोस्ट में करेंगे।

और हाँ.... हमेशा की तरह... *गौ माता* से बेहतरीन सुरक्षा कौन प्रदान कर सकता है!!! *पंचामृत* का सेवन आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखेगा। इसलिए गाय के दूध, गाय के दूध की दही, गाय के दूध से बना घी, शहद और नारियल पानी से बने पंचामृत का नियमित सेवन करें। जय हो।

डॉ संजीव कुमार वर्मा
प्रधान वैज्ञानिक
भा.कृ.अनु.प. - केंद्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान
मेरठ छावनी (उत्तर प्रदेश)
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गुरुवार, 18 जून 2020

फलों और सब्जियों को ब्लीच से डिसइंफेक्टेंट करना है नुकसानदायक

फलों और सब्जियों को ब्लीच से डिसइंफेक्टेंट करना है नुकसानदायक, चीजों को बैक्टीरिया फ्री करने का तरीका बता रही हैं डाइटीशियन डॉ अनामिका सेठी

कोविड - 19 के दौरान अपने हाथों और घर को अल्कोहल बेस्ड सेनिटाइजर से डिसइंफेक्टेंट करना तो सही है। लेकिन खाने की चीजों को डिसइंफेक्टेंट करने के लिए ब्लीच जैसे केमिकल का उपयाेग आपकी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है।

कोरोना वायरस के कहर से बचने के लिए हम सभी कई तरह की सावधानी बरत रहे हैं। इन दिनों ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो खाने की चीजों से बैक्टीरिया खत्म करने के लिए सेहत को नुकसान पहुंचान वाले डिस्इंफेक्टेंट का इस्तेमाल कर रहे हैं। हाल ही वे एक सर्वे में ये बात सामने आई है कि कई लोग फलों और सब्जियों को साफ करने के लिए ब्लीच तक का उपयोग कर रहे हैं।

सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन की वेबसाइट पर जारी 19% लोगों पर किए गए सर्वे के अनुसार फूड आइटम्स को बैक्टीरिया फ्री करने के लिए ब्लीच का इस्तेमाल गलत है। इस सर्वे से ये 3 बातें साबित होती है।

1. कोरोना वायरस पर हुई अब तक की किसी शोध से यह साबित नहीं होता कि खाद्य सामग्री को डिस्इंफेक्टेंट करने के लिए ब्लीच का उपयाेग किया जाना चाहिए।

2. कोरोना काल में गले को बैक्टीरिया फ्री करने के लिए डाइल्यूट ब्लीच सॉल्यूशन या साबुन के पानी से गरारे करना भी सेहत को नुकसान पहुंचा सकता है।

क्लीनर्स या डिस्इंफेक्टेंट के ज्यादा इस्तेमाल से नाक या साइनस में जलन, सिरदर्द, पेट में दर्द, वॉमिटिंग या सांस लेने में दिक्कत हो सकती है।

खाद्य सामग्री को साफ करने का सही तरीके बता रही हैं जयपुर की सीनियर डाइटीशियन डॉ. अनामिका सेठी।

1. गर्म पानी से धोकर साफ करें

सबसे पहले मार्केट से लाई गई सब्जियां या फलों को सादे पानी से दो-तीन बार धो लें। उसके बाद इन चीजों को नमक मिले हुए गर्म पानी में डालकर लगभग 15 मिनट तक रखें। फिर किसी साफ कपड़े से पोंछ लें और अच्छी तरह सूखाने के बाद फ्रिज में रखें। सब्जियों को साफ करने के दौरान मास्क पहनकर रखें ताकि इन फूड में पाए जाने वाले बैक्टीरिया चेहरे तक न

2. सेंधा नमक और हल्दी का उपयोग करें

 सेंधा नमक मिले हुए पानी से फलों और सब्जियों को धोने से बैक्टीरिया दूर होते हैं। इसके लिये एक बाउल में पानी भरें। उसमें सेंधा नमक डालकर 10 मिनट के लिये फल और सब्जियों को भिगो दें। फिर साफ पानी से धोकर खाने के लिये प्रयोग करें। इसी तरह हल्दी में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं जो बैक्टीरिया दूर करने में मदद करते हैं।

डॉ अनामिका सेठी

(साभार-भास्कर)

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शनिवार, 30 अगस्त 2014

पीलीया



सुबह का भोजन :-    
1) गन्ने का रस + चूना मिलाकर   
2) 50 ग्राम मूली रस + मिश्री मिलाकर पीना  
दोहपर का भोजन :-   
1) लौकी, बथुआ, पालक, मूली की सब्जियाँ    
2) गेहूँ, जौ की रोटी का प्रयोग करें   
3) मूंग दाल का प्रयोग  
शाम का भोजन :-    
1) दूध में मुनक्का डालकर पीना।   
पथ्य :-  पालक, लौकी, मूली, केला, आँवला  आम, पपीता, चौलार्इ, घी, दूध, मूंग, अंजीर, मुनक्का, दिन में आराम करना, मीठे फलों का प्रयोग अधिक !    
अपथ्य :-  सरसों, उड़द, रार्इ, हींग, तिल, मटर, चना, मसाला और तेल के सभी पदार्थ, बाहरी पदार्थ, मैदेवाले पदार्थ      
रोग मुक्ति के लिये आवश्यक नियम  :    
पानी के सामान्य नियम :    
) सुबह बिना मंजन/कुल्ला किये दो गिलास गुनगुना पानी पिएं    
) पानी हमेशा बैठकर घूँट-घूँट कर के पियें   
) भोजन करते समय एक घूँट से अधिक पानी कदापि ना पियें, भोजन समाप्त होने के डेढ़ घण्टे बाद पानी अवश्य पियें    
) पानी हमेशा गुनगुना या सादा ही पियें (ठंडा पानी का प्रयोग कभी भी ना करें।     
भोजन के सामान्य नियम :   
) सूर्योदय के दो घंटे के अंदर सुबह का भोजन और सूर्यास्त के एक घंटे पहले का भोजन अवश्य कर लें    
) यदि दोपहर को भूख लगे तो १२ से बीच में अल्पाहार कर लें, उदाहरण - मूंग की खिचड़ी, सलाद, फल और छांछ    
) सुबह दही फल दोपहर को छांछ और सूर्यास्त के पश्चात दूध हितकर है    
) भोजन अच्छी तरह चबाकर खाएं और दिन में बार से अधिक ना खाएं      
अन्य आवश्यक नियम :    
) मिट्टी के बर्तन/हांडी मे बनाया भोजन स्वस्थ्य के लिये सर्वश्रेष्ठ है   
) किसी भी प्रकार का रिफाइंड तेल और सोयाबीन, कपास, सूर्यमुखी, पाम, राईस ब्रॉन और वनस्पति घी का प्रयोग विषतुल्य है उसके स्थान पर मूंगफली, तिल, सरसो नारियल के घानी वाले तेल का ही प्रयोग करें     
) चीनी/शक्कर का प्रयोग ना करें, उसके स्थान पर गुड़ या धागे वाली मिश्री (खड़ी शक्कर) का प्रयोग करें    
) आयोडीन युक्त नमक से नपुंसकता होती है इसलिए उसके स्थान पर सेंधा नमक या ढेले वाले नमक प्रयोग करें    
) मैदे का प्रयोग शरीर के लिये हानिकारक है इसलिए इसका प्रयोग ना करें