नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757
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मंगलवार, 31 मार्च 2020

गन्दगी


दीनू ने अपनी माँ से कहा “माँ, मैंने अपने लिए एक लड़की पसंद की है. सरकारी नौकरी में है. इसी शहर की है.”
माँ ने परेशान होते हुए कहा “तूने अपने मन से लड़की पसंद कर ली और मुझे अब बता रहा है!”
दीनू ने कहा “अरे माँ! पहले लड़की की फोटो तो देख लो फिर बाद में गुस्सा करना.”
दीनू ने अपने मोबाईल फोन में लड़की की फोटो दिखाते हुए माँ से पूछा “अब बताओ माँ! कैसी लग रही है तुम्हारी होनेवाली बहू!”
माँ ने फोटो देखते हुए कहा “दिखने में तो बहुत सुन्दर और सुशील लग रही है बेटा, मगर उसके परिवार वाले कौन हैं क्या करते हैं और लड़की क्या नौकरी करती है!”
माँ के सवालों की बौछार से दीनू पहले तो हड़बड़ा गया मगर फिर संयत होते हुए बोला “लड़की के माँ-बाप नहीं हैं, बचपन में ही एक दुर्घटना में मारे गए थे. वह अनाथ आश्रम में ही पली-बढ़ी है. अभी नगर पंचायत में सफाई कर्मचारी का काम करती है”
माँ ने गुस्से मे दीनू को घूरते हुए कहा “क्या कहा! वह सफाई कर्मचारी है! तेरा दिमाग तो ठीक है न! तू एक नाली साफ़ करनेवाली लड़की से शादी करेगा!”
‘इससे क्या फर्क पड़ता है माँ कि वह एक सफाई कर्मचारी है”
“वाह बेटा! क्या फर्क पड़ता है! अरे समाज में हमारी भी कोई इज्जत है. तू सबके सामने हमारी नाक कटवाएगा क्या!”
“इसमें नाक कटवाने वाली क्या बात हुई माँ! मैं एक सफाई करने वाली से ही तो शादी करना चाहता हूँ न कि एक गन्दगी फ़ैलाने वाली से! इससे तो हमारी इज्जत और बढ़नी चाहिए न माँ!”
बेटे की बात सुनकर माँ ने नाराजगी से कहा “अब तो तू समझदार हो गया है बेटा, अब भला मेरी बात क्यों मानेगा. जा, तुझे जो करना है कर, मगर मुझसे कुछ उम्मीद मत रखना” कहकर गुस्से से पैर पटकती हुई माँ रसोई मे चली गई और दीनू वहीँ खड़ा सोचता रहा कि गंदगी नाली से ज्यादा तो लोगों के दिमाग में भरी हुई है.     
      कृष्ण धर शर्मा 08.03.2020   
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“आभिजात्य”


“वह” अब मध्यम वर्ग से धीरे-धीरे आभिजात्य वर्ग की ओर बढ़ रहे थे. इसलिए अब उन्होंने अपनी मध्यम वर्ग वाली आदतें धीरे-धीरे छोडनी शुरू कर दी थी. जैसे कि, फल-सब्जियां इत्यादि जो वह पहले सस्ता हो जाने का इन्तजार करते थे फिर उन्हें खरीदते थे. चावल, दाल और अन्य दैनिक वस्तुओं को कीमतों के आधार पर तय करते थे कि कम कीमत वाली वस्तुएं ही खरीदी जाएं. बच्चों के लिए स्कूल ड्रेस लेना हो या जूते खरीदने हों, बहुत मोलभाव करके खरीदते थे. ब्रांडेड कपड़ों और वस्तुओं की खरीदी से बचते थे. कभी फिल्म देखने जाना हो तो खुद और बीवी-बच्चों को घर से ही खाना-नास्ता खिलाकर निकलते थे ताकि बच्चे फिल्म देखने के समय थियेटर के मंहगे समोसे या पॉपकार्न खरीदने की जिद न करें.
मगर “वह” जबसे मध्यम वर्ग से कुछ आगे निकलकर आभिजात्य वर्ग में शामिल होने लगे तो उन्होंने उस वर्ग की आदतें अपनानी शुरू कर दीं, जैसे कि मंहगे, ब्रांडेड कपडे, जूते, परफ्यूम इत्यादि खरीदने शुरू कर दिए. किराने की दुकान पर पहुँचते ही (अभी तक उनके शहर में शापिंग माल जैसी व्यवस्था का उदय नहीं हुआ था) ज़रा ऊँची आवाज में दुकानवाले को सामान की लिस्ट पकड़ाकर उसे समझाते हुए बोलते “देख लो भाई, सारे सामन ज़रा अच्छे और ऊँचे ब्रांड के देना”.
दुकानदार भी समझदार किस्म का था. वह उन्हें चने के झाड में चढ़ाये रखता और चुन-चुनकर मंहगी और अनावश्यक वस्तुएं भी पकड़ा देता. बिल देखकर उनकी हार्टबीट तो ज़रा बढ़ जाती मगर अपनी अभिजात्यता का लिहाज करके वह उसे नियंत्रित कर लेते और कुछ बोल न पाते. बिल की रकम पकड़ाकर सामन जल्दी से घर भिजवाने की हिदायत देकर वह वहां से निकल लेते. सब्जी बाजार से सब्जियां या फल वही खरीदते जो बेमौसम और बाजार में सबसे मंहगा होता. एक दिन वह सब्जी खरीदने निकले तो चुन-चुनकर मंहगी और बे-मौसम की सब्जियां खरीद डाली मगर टमाटर न खरीद पाए क्योंकि उस दिन सारे बाजार में सस्ता और एक ही भाव में टमाटर बिक रहा था. उन्होंने काफी खोजा मगर उन्हें मंहगा टमाटर कहीं नहीं मिला. हारकर वह बिना टमाटर लिए ही बाजार से लौट आये.
पत्नी ने जब सब्जी का थैला देखा तो उन्हें टमाटर कहीं नजर न आया. उन्होंने पूछा कि टमाटर कहाँ है? तो वह अपनी दुविधा बताने लगे कि अच्छा और मंहगा टमाटर नहीं मिलने से उन्होंने नहीं खरीदा. यह सुनकर पत्नी ने अपना माथा पीट लिया और उन्हें घूरते हुए भारी और ठंडी आवाज में कहा कि “आपको पता है न कि आज शाम को मेरी कुछ सहेलियां डिनर पर आने वाली हैं”.... 
कृष्ण धर शर्मा 25.10.2019 
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“अ” और “ब” के चबूतरे


एक दिन “अ” और “ब” में लड़ाई हुई. लड़ाई घर के बाहर बने चबूतरे को लेकर थी. “ब” ने चबूतरे की मरम्मत करवाते समय उसके आकार में बित्ते भर का इजाफा कर लिया था इसलिए “अ” ने “ब” को पहले प्यार से समझाया फिर बहस करने पर धमकाया भी. मगर “ब” ने कहा “कि तुम मेरे चबूतरे से क्यों चिढ़ते हो! तुमको बहुत बुरा लग रहा है तो तुम भी अपना चबूतरा थोडा सा बढ़ा लो.”
“अ” ने भड़कते हुए कहा कि “पागल हो गए हो क्या! इससे इस रास्ते से आने-जाने वालों को परेशानी नहीं हो जाएगी क्या!”
“ब” ने कहा “कोई परेशानी नहीं होगी. थोड़े दिन के लिए असुविधा होगी मगर बाद में आदत पड़ जाएगी. फिर कोई कुछ नहीं बोलेगा.”
“अ” को “ब” कि बात जंच गई और उसने भी रास्ते की तरफ अपना चबूतरा बित्ता भर बढ़ा लिया. अब दोनों पड़ोसी अपने-अपने चबूतरे पर बैठ कर दुनिया-जहान की बातें करते हुए खुश रहते हैं और रास्ते से गुजरने वालों की परेशानियाँ को अनदेखा करते रहते हैं. 
कृष्ण धर शर्मा 7-9-2019  
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सच्चा पत्रकार

कालोनी के 2 बच्चों में खेलते-खेलते किसी बात पर लड़ाई हुई जो बाद में उनकी माओं तक पहुँच गई जिसमें दोनों तरफ से एक-दूसरे के खानदानों की दिलचस्प व्याख्या की गई. कालोनी में ही निवास करने वाले एक महान पत्रकार द्वारा इसकी रिपोर्टिंग भी कर ली गई. अगले दिन अख़बार के सिटी पेज पर इस लड़ाई की विस्तृत रिपोर्ट छपी थी जिसका शीर्षक था “सवर्णों द्वारा दलितों पर अत्याचार”. रिपोर्ट में बताया गया कि कैसे आज के ज़माने में भी सवर्ण लोग दलितों पर अत्याचार करने से चूकते.
यह खबर पढ़कर दलित परिवार के मुखिया उन महान पत्रकार के पास पहुंचे और उन्हें लताड़ते हुए बोले “अरे पत्रकार महोदय! बच्चों के एक छोटे से आपसी झगडे को तुमने यह क्या रंग दे दिया!” 
पत्रकार महोदय बोले “आपको यह सिर्फ छोटा सा झगडा लगता है! अरे यह आप और आपके परिवार पर एक सवर्ण परिवार का जुल्म है, अन्याय है.”
दलित परिवार के मुखिया ने कहा “अरे भाई! तुमने बेवजह ही बच्चों के आपसी झगडे को सवर्ण-दलित झगडे में बदल दिया! हम दोनों परिवार पढ़े-लिखे और सुलझे हुए हैं. हम इन बेवकूफी भरी बातों पर यकीन नहीं करते हैं.”
महान पत्रकार ने कहा “आपको भले ही अपने परिवार और समाज की चिंता न हो, मगर हमें है. हम सच्चे पत्रकार हैं, हम आपके परिवार और आपके समाज के ऊपर यह जुल्म नहीं होने देंगे. हम यह बात सारी दुनिया तक पहुंचाएंगे.”
दलित परिवार के मुखिया उस महान और सच्चे पत्रकार का मुंह देखते खड़े रह गए....
     कृष्ण धर शर्मा 19.8.2019  

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गणित


मैंने नीलू से कहा कि “भाई क्यों नहीं तुम उज्ज्वला योजना में मिले गैस सिलेंडर को भरवा देते! कम से कम तुम्हारी माँ को दिनभर लकड़ी के लिए जंगल में तो नहीं भटकना पड़ेगा और तुम्हारी पत्नी को भी खाना बनाते समय धुएं में परेशान नहीं होना पड़ेगा!”
नीलू ने मेरी बात को टालना चाहा तो मैंने फिर उसे समझाते हुए कहा “देखो भाई, सीधा सा गणित है. अगर तुम्हारी माँ पूरे महीने में 10 दिन भी लकड़ी चुनने जंगल जाती हैं तो 10 दिन की मजदूरी कम से कम 2000 रूपये होती है न! और गैस सिलेंडर 750 रूपये में भी भरवाते हो तो वह कम से कम 45 दिन तो चलेगा ही न! फिर फायदा किस्में है!”
नीलू ने मुस्कुराते हुए कहा कि “घर काम के लिए तो बीवी है ही, फिर माँ दिनभर घर में बैठकर करेगी भी क्या! वह इस बुढ़ापे में कहीं मजदूरी तो कर नहीं सकती! और जंगल नहीं काटेंगे तो हमें नए खेत कैसे कब्ज़ा करने को मिलेंगे!
नीलू ने एक ही झटके में मेरे सारे गणित पर पानी फेर दिया और मैं उसका गणित समझने की कोशिश करता रह गया.      
    कृष्ण धर शर्मा 12.8.2019 
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रविवार, 31 मार्च 2019

स्वीपर और संभ्रांत


कालोनी में गली क्रिकेट चल रहा था जिसमें अधिकतर बच्चे मध्यम संभ्रांत वर्ग के थे, जो कालोनी के ही छोटे से खेल मैदान को कालोनी के ही कुछ दबंगों द्वारा हड़पकर मैदान की जगह में एक एक मंदिर, कालोनी का ऑफिस और एक बड़ा मीटिंग हाल कम गेट-टुगेदर रूम बनाकर खेल मैदान का अस्तित्व मिटा चुके थे.
अब खेल मैदान के अभाव में बच्चे कालोनी की गली में ही क्रिकेट खेलकर किसी तरह अपना शौक पूरा कर रहे थे. मगर वहां भी समस्याओं की कमी न थी. कभी गेंद किसी की खिड़की का कांच तोड़कर घर में घुस जाती जो फिर शायद ही वापस आ पाती या फिर अधिकतर गेंदें कालोनी की अर्द्धविकसित खुली नाली में गिर जाती जिसे निकालने में वह मध्यम संभ्रात वर्गीय  बच्चे असहज महसूस करते. इस तरह से एक दिन में कई गेंदे बेकार हो जातीं.
एक दिन इन्हीं बच्चों के खेल के दौरान कालोनी का स्वीपर उधर से गुजर रहा था कि अचानक एक गेंद नाली में जा गिरी जिसे स्वीपर ने तुरन्त उठाया और अपने कपड़ों से पोंछते हुए गेंद बच्चों की तरफ उछाल दी. मगर वह बच्चे पीछे की तरफ हटते हुए स्वीपर को ही बुरा-भला कहने लगे कि तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई नाली में गिरी हुई गेंद हमारी तरफ फेंकने की! हम लोग नाली में गिरी हुई गेंद से दुबारा कैसे खेल सकते हैं!.
स्वीपर ने हँसते हुए कहा “अरे बाबू साहब! हमारे मोहल्ले के बच्चे तो ऐसे ही खेलते हैं. इसमें कौन सी बड़ी बात है.”
इस पर कालोनी के सारे बच्चे एक-दुसरे का मुंह ताकने लगे. तब तक स्वीपर वहां से निकल गया. अब सभी बच्चों में फिर बहस छिड़ी कि “स्वीपरों के बच्चे जरूर नाली में गिरी हुई गेंद को फिर से निकालकर उससे दुबारा खेल सकते हैं मगर हम ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि हम बड़े घरों के बच्चे हैं”
इस पर एक बच्चे ने कहा “अरे इसमें कोई इतनी बड़ी बुराई की बात नहीं है. गेंद को नाली से निकालकर फिर उसे नल के पानी से धोकर दुबारा खेला जा सकता है. हाँ मगर गेंद को नाली से निकालकर उसे धोएगा कौन!”
इस बात पर सभी बच्चों की नजरें वापस जाते हुए स्वीपर पर जा टिकीं.
   (कृष्ण धर शर्मा 31.3.2019)
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शुक्रवार, 29 मार्च 2019

पल्लेदार


गेहूं, चावल की चार बोरियों को दुकान से उठाकर 50 मीटर दूर कार की डिक्की में रखवाने के लिए वह पल्लेदार से बहस कर रहे थे “हद है भाई लूट की! 4 बोरियों की हमाली का 40 रुपया! अंधेर मचा रखी है इन लोगों ने.!
“चलो हटो रहने दो, मैं खुद ही उठाकर कार में रख लूँगा”
उन्होंने गुस्से में एक बोरी उठाई और कार तक पहुँचने से पहले ही लड़खड़ाकर बोरी सहित उलट गए. “हाय राम! कमर तो टूट गई मेरी”
इतने में वह पल्लेदार दौड़कर आया और उन्हें उठाकर कार में बिठाते हुए बोला “आप रहने दीजिये सर, मैं बोरियों को उठाकर रख देता हूँ”
पल्लेदार ने देखते ही देखते चारों बोरियों को उठाकर कार्ट की डिक्की में रख दिया और उनको नमस्कार करके जाने लगा तो उन्होंने बुलाकर उसके हाथ में 50 रूपये का एक नोट रख दिया.
पल्लेदार उन्हें 20 रूपये वापस करने लगा तो उन्होंने आश्चर्य से कहा “अरे भाई पूरे रूपये रख लो, वैसे भी तुम्हारी मेहनत के 40 रूपये तो हो ही रहे हैं फिर तुमने गिर जाने पर मेरी हेल्प भी तो की है”
पल्लेदार मुस्कुराते हुए बोला “नहीं सर, मैंने 3 बोरी ही आपकी कार में लोड की है. एक बोरी तो आप खुद ही उठाकर कार के पास लेकर पहुँच चुके थे. और हम लोग किसी के गिर जाने पर उसको उठाने का रुपया नहीं लेते हैं सर”
कहते हुए पल्लेदार हाथ जोड़कर अपने स्थान की ओर लौट गया और वह पल्लेदार की गन्दी पीठ ऑस साफ़ नीयत को देखते रहे.  
       (कृष्ण धर शर्मा 29.3.2019)
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मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

कलाकार


वह किसी महान फिल्म की शूटिंग कर रहे थे, जिसमें उनका पात्र मुख्य भूमिका में था. 
जिसने उन्होने दर्जनों गुंडों को कुछ ही पलों में धूल चटा दी थी और कई गरीबों की मदद की व उन्हें न्याय दिलाया. शॉट बहुत बढ़िया गया था. डायरेक्टर सहित सारी टीम बहुत खुश नजर आ रही थी. कुछ ही देर में पैकअप की उद्घोषणा हुई. शूटिंग के बड़े कलाकार तो निकल लिए और स्पॉटबॉय सहित बाकी लोग पैकअप के काम में लग गए.  मुख्य पात्र अपनी लग्जरी गाड़ी में सेक्रेटरी के साथ जा रहे थे. रास्ते में एक एक्सीडेंट हुआ था जिसमें 2-3 घायल सड़क पर पड़े तड़प रहे थे.  सेक्रेटरी ने कहा 
"सर हमें यहाँ पर रूककर घायलों की मदद करनी चाहिए”. 
मुख्य पात्र ने कहा 
"क्या बात करती हो!" 
"अरे हम कलाकार हैं, हमें इन झंझटों में नहीं पड़ना चाहिए. इनकी मदद के लिए तो हजारों लोग मिल जायेंगे
जी सर” 
सेक्रेटरी ने मुख्य पात्र की बात सुनते हुये कहा. मगर उसका मन कह रहा था कि 
“क्या खाक् कलाकार हो तुम!"
"अरे असली कलाकार तो दूसरो की मदद करते हैं, जो कि तुमसे हो ही नहीं सकती”
         (कृष्णधर शर्मा) 05.08.2018

वतन


                                                    
सरकारी अस्पताल में घायल जवान की मरहम पट्टी करते हुए नर्स ने पूछा
"आप को इतनी सारी चोटें कैसे लगीं!"
जवान ने जख्मों के दर्द को दबाते हुए चेहरे पर बनावटी मुस्कान लाते हुए कहा 
"वतन की मोहब्बत के जख्म हैं ये"
नर्स ने कहा 
"मैं समझी नहीं!" 
"मुहब्बत में तो सुकून मिलता फिर जख्म कैसे!"
जवान ने फिर हँसते हुए कहा 
"वह मोहब्बत ही कैसी जिसमें जख्म न मिलें"
इतना कहते-कहते जवान की आवाज ने गंभीरता का लबादा ओढ़ लिया था.
"हम अपने वतन और वतनवालों की हिफाजत में अपनी जान की बाजी तक लगा जाते हैं, मगर वतनवाले हमारा स्वागत पत्थर मारकर करते हैं
नर्स ने कहा 
"मगर पत्थर तो लोग पागलों को मारते हैं न!"
जवान ने फिर हँसते हुए कहा 
"हम भी किसी पागल से कम कहाँ हैं! जो अपना सबकुछ छोड़कर वतन की हिफाजत में अपनी सारी जिंदगी गुजार देते हैं!”
नर्स यह सुनकर खुद भी जवान को पागलों की तरह देखती रह गई
         (कृष्णधर शर्मा) 05.08.2018

सोमवार, 27 अप्रैल 2015

जनरल वार्ड


जनरल वार्ड के बेड न. २७ पर लेटे हुए ११ साल के लड़के से जब माँ ने पूछा कि “ मैं काम पर जा रही हूँ बेटा. शाम को जल्दी आ जाउंगी. तब तक तू अकेले रह लेगा न!”.
यह सुनकर आस-पास के सभी लोगों सहित मैं भी चौंक पड़ा.
 पलट कर देखा तो फटे-पुराने कपडे पहने एक औरत अपने बेटे को दिलासा दे रही थी कि तू घबराना मत बेटे, मैं काम पर जाकर शाम तक जल्दी वापस आ जाउंगी.
 अभी तक यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि वह दिलासा अपने बेटे को दे रही है या खुद अपने को!
औरत से पूछने पर पता लगा कि कल रात उसके शराबी पति ने शराब के लिए रूपये न मिल पाने पर अपनी बीवी और बच्चे की पहले तो पिटाई की बाद में हताशा में अपनी ही झोपडी में आग लगा दी.
वह औरत चाहकर भी झोपडी से अपना कुछ भी सामान नहीं निकल पाई और रोती-बिलखती रह गई.
 
पति को तो पुलिस उठाकर ले गई और बच्चे की पिटाई और सदमें से तबियत बिगड़ गई जिसे लेकर वह सरकारी अस्पताल में आई थी जहाँ पर पर्ची कटवाने के लिए उसके पास १० रूपये भी नहीं थे.
अगले दिन सुबह काफी सोच-विचार कर उसने काम पर जाने का निर्णय लिया.
उसके इस निर्णय पर अस्पताल में उपस्थित सभी लोग एक साथ हैरान और शर्मिंदा लग रहे थे................कृष्ण धर शर्मा 4.2015

सोमवार, 16 मार्च 2015

आत्मसम्मान


बस स्टैंड में अपने दो बच्चों को लेकर बैठी हुई माँ से आखिर नहीं रहा गया तो बचाकर रखे हुए बीस रूपये लेकर वह दुकान पहुंची. जहाँ से कोल्ड्रिंक की दो बाटल लेकर आई और अपने दोनों बच्चों के हाथों में पकड़ा कर उसके चेहरे पर ऐसे भाव उभरे जैसे उसने जग जीत लिया हो.

पिछले एक घंटे वह गाँव जाने के लिए बस का इन्तजार करती हुई बस स्टैंड में अपने बच्चों के साथ बैठी हुई थी.
भीषण गर्मी से सबका हाल बेहाल था.
हालाँकि बड़ी बखरी से मांग कर लाये हुए मट्ठे को वह खुद और बच्चों को पिलाकर घर से निकली थी मगर बस स्टैंड में कुछ नवधनाढ्यों के बच्चों को कभी चिप्स तो कभी कोल्ड्रिंक खाते-पीते देखकर उसके बच्चे मना करने पर भी नहीं मान रहे थे और कोल्ड्रिंक पीने की जिद पर अड़े थे.
बच्चों के लिए कोल्ड्रिंक खरीद लेने पर उसका बजट किस बुरी तरह से प्रभावित होने वाला था यह सिर्फ उसे ही पता था.
आखिर में उसका सब्र तब जवाब दे गे जब नवधनाढ्यों की टोली उसके बच्चों की तरफ देखकर हिकारत भरी हंसी हंस रहे थे.
वह अचानक कुछ सोचकर उठी और अपनी चोटी को झटका देते हुये दुकान की तरफ बढ़ी और संभालकर रखे हुए पचास रुपयों में से बीस रूपये की दो कोल्ड्रिंक की बाटल खरीदकर आपने बच्चों के हाथ में दे दी............कृष्ण धर शर्मा 3.2015

सोमवार, 27 अक्टूबर 2014

बड़े भाई


सन्डे की की सुबह-सुबह घंटी बजने पर पत्नी ने दरवाजा खोला तो सामने हाथ में एक बैग लिए पतिदेव के बड़े भाई खड़े थे. पत्नी ने अनमने भाव से उन्हें प्रणाम किया और सामने कमरे में ही उन्हें बैठाकर वापस बेडरूम पहुंची तो पति ने उंघते हुए पूछा कौन है इतनी सुबह-सुबह?.
और कौन होगा"! आपके बड़े भाई साहब ही हैं. हर महीने आपसे मिलने चले आते हैं.
 अब हमारी आज की पिकनिक का क्या होगा!.पति भी सोच में पड़ गया.
आज महीनों के बाद पिकनिक जाने की तैयारी बनी थी और बड़े भाई ने आकर पूरा प्लान ही चौपट कर दिया.
 मगर बड़े भाई भी क्या करें भाभी २ साल पहले ही गुजर चुकी हैं, दोनों बेटे अपनी नौकरी में ही व्यस्त रहते हैं. बहुएं भी उनका ध्यान नहीं रखती हैं इसलिए महीने में -२ दिन के लिए यहाँ पर आ जाते हैं. पत्नी थोडा भुनभुनाती जरूर है मगर पति संभाल लेता है.
पति भी उठकर बड़े भाई के पास गया. पांव छुए और हाल-चाल पूछने लगा.
घंटे के बाद फिर से दरवाजे की घंटी बजी. पति ने दरवाजा खोला तो सामने पत्नी के बड़े भाई सपरिवार खड़े थे. सब लोग अन्दर आये और हाल-चाल होने लगा.
 पति ने थोडा मौका मिलते ही पत्नी से पूछा क्यों जी अब हमारी पिकनिक का क्या होगा!.
 पत्नी ने आँखें तरेरते हुए कहा मैं खूब समझती हूँ तुम्हारे इशारे. ताने मत मारो, पंद्रह दिन के बाद तो मेरे भाई-भाभी यहाँ घूमने आये हैं और तुम्हें पिकनिक जाने की पड़ी है!
पति ने चैन की सांस ली कि आज का दिन अच्छा गुजरेगा. पत्नी मेरे बड़े भाई को लेकर ताने तो नहीं मारेगी!...........
 
कृष्ण धर शर्मा 10.2014

सोमवार, 20 अक्टूबर 2014

“वो”

नवविवाहित पति, पत्नी बाज़ार से कुछ सामान खरीदकर हाथ में आइसक्रीम लिए बस स्टैंड आकर खाली पड़ी कुर्सियों में बैठ गए और बातें करने लगे.
उनकी बातें सुनकर ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें घर में खुलकर बातें करने को समय न मिल पाता हो.
पत्नी और पति के बाजू में वोभी आकर बस का इन्तजार करते हुए बैठ गया और अनचाहे ही उनकी बातें सुनने लगा.
 पति, पत्नी बातें करने में इतने व्यस्त थे कि उन्होंने अपने गंतव्य को जाने वाली २ बसें भी छोड़ दी थी.
 पत्नी भी सुन्दर नाक-नक्श और आकर्षक व्यक्तित्व वाली थी और पति भी मगन होकर उसकी बातें सुन रहा था.
 इसी बीच पति को अचानक महसूस हुआ की पीछे से वोउसकी पत्नी को देखने का प्रयास कर रहा है और पत्नी की नजरें भी कई बार पति के पीछे बैठे वोकी तरफ जाती हुई दिखीं.
 अब माहौल प्रेममय न रहकर शंकामय हो चुका था.
 पति सहन न कर पाया और पत्नी और वोके बीच में कुछ इस तरह से बैठने की कोशिश करने लगा जिससे उनकी नजरें आपस में न टकरायें.
 उसकी यह हरकत देखकर पत्नी और वोसहित वहां पर बैठे कई लोगों के चेहरे पर शरारती मुस्कान आ गई जिसे देखकर पति की स्थिति हास्यमय हो चुकी थी.....
कृष्ण धर शर्मा 10.2014