नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757
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रविवार, 12 जनवरी 2014

भारतीय इतिहास की समयरेखा

पाकिस्तान, बांग्लादेश एवं भारत एक साझा इतिहास के भागीदार हैं इसलिए भारतीय इतिहास की इस समय रेखा में सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की झलक है।

  • 1 पाषाण युग
    • 1.1 भीमबेटका पाषाण आश्रय (९०००- ७००० ई. पूर्व)
    • 1.2 मेहरगढ़ सभ्यता (७०००-३३०० ई पूर्व)
    • 1.3 सिंधु घाटी की सभ्यता (२८००-१९०० ई पूर्व)
    • 1.4 वैदिक काल (१५००-५०० ई पूर्व)
  • 2 लौह युग
  • 3 प्राचीन भारत (५०० ईसा पूर्व- ५५० ईस्वी)
  • 4 मध्यकालीन भारत
  • 5 स्वतन्त्र भारत
    • 5.1 १९४७ से १९५०
    • 5.2 १९५० से १९७०
    • 5.3 १९७० से १९८०
    • 5.4 १९८० से १९९०
    • 5.5 १९९० से २०००
    • 5.6 २००० से वर्तमान  
    • पाषाण युग
      पाषाण युग इतिहास का वह काल है जब मानव का जीवन पत्थरों (संस्कृत - पाषाणः) पर अत्यधिक आश्रित था । उदाहरनार्थ पत्थरों से शिकार करना, पत्थरों की गुफाओं में शरण लेना, पत्थरों से आग पैदा करना इत्यादि। इसके तीन चरण माने जाते हैं; पुरापाषाण काल, मध्यपाषाण काल एवं नवपाषाण काल जो मानव इतिहास के आरम्भ (२५ लाख साल पूर्व) से लेकर काँस्य युग तक फ़ैला हुआ है।
      भीमबेटका पाषाण आश्रय (९०००- ७००० ई. पूर्व)
      भीमबेटका (भीमबैठका) भारत के मध्य प्रदेश प्रान्त के रायसेन जिले में स्थित एक पुरापाषाणिक आवासीय पुरास्थल है। यह आदि-मानव द्वारा बनाये गए शैल चित्रों और शैलाश्रयों के लिए प्रसिद्ध है। इन चित्रो को पुरापाषाण काल से मध्यपाषाण काल के समय का माना जाता है। अन्य पुरावशेषों में प्राचीन किले की दीवार, लघुस्तूप, पाषाण निर्मित भवन, शुंग-गुप्त कालीन अभिलेख, शंख अभिलेख और परमार कालीन मंदिर के अवशेष भी यहां मिले हैं। भीम बेटका क्षेत्र को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण, भोपाल मंडल ने अगस्त १९९० में राष्ट्रीय महत्त्व का स्थल घोषित किया। इसके बाद जुलाई २००३ में यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। ये भारत में मानव जीवन के प्राचीनतम चिह्न हैं। ऐसा माना जाता है कि यह स्थान महाभारत के चरित्र भीम से संबन्धित है एवं इसी से इसका नाम भीमबैठका पड़ा। ये गुफाएँ मध्य भारत के पठार के दक्षिणी किनारे पर स्थित विन्ध्याचल की पहाड़ियों के निचले छोर पर हैं।; इसके दक्षिण में सतपुड़ा की पहाड़ियाँ आरम्भ हो जाती हैं। इनकी खोज वर्ष १९५७-१९५८ में डाक्टर विष्णु श्रीधर वाकणकर द्वारा की गई थी।
      मेहरगढ़ सभ्यता (७०००-३३०० ई पूर्व)
      मेहरगढ़ पुरातात्विक दृष्टि से महत्वपूर्ण एक स्थान है जहाँ नवपाषाण युग (७००० ईसा-पूर्व से 33०० ईसा-पूर्व ) के बहुत से अवशेष मिले हैं। यह स्थान वर्तमान बलोचिस्तान (पाकिस्तान) के कच्ची मैदानी क्षेत्र में है। यह स्थान विश्व के उन स्थानों में से एक है जहाँ प्राचीनतम कृषि एवं पशुपालन से सम्बन्धित साक्ष्य प्राप्त हुए हैं। इन अवशेषों से पता चलता है कि यहाँ के लोग गेहूँ एवं जौ की खेती करते थे तथा भेड़, बकरी एवं अन्य जानवर पालते थे। "
      सिंधु घाटी की सभ्यता (२८००-१९०० ई पूर्व)
      हड़प्पा सभ्यता(३३००-१७०० ई.पू.) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी। यह सिंधु घाटी सभ्यता और सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से भी जानी जाती है। इसका विकास सिंधु और घघ्घर/हकड़ा (प्राचीन सरस्वती) के किनारे हुआ। मोहनजोदड़ो, कालीबंगा , चन्हुदडो , रन्गपुर् , लोथल् , धोलावीरा , राखीगरी , दैमाबाद , सुत्कन्गेदोर, सुरकोतदा और हड़प्पा इसके प्रमुख केन्द्र थें। ब्रिटिश काल में हुई खुदाइयों के आधार पर पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकारों का अनुमान है कि यह अत्यंत विकसित सभ्यता थी और ये शहर अनेक बार बसे और उजड़े हैं।
      वैदिक काल (१५००-५०० ई पूर्व)
      वैदिक काल प्राचीन भारतीय संस्कृति का एक काल खंड है, जब वेदों की रचना हुई थी। हड़प्पा संस्कृति के पतन के बाद भारत में एक नई सभ्यता का आविर्भाव हुआ। इस सभ्यता की जानकारी के स्रोत वेदों के आधार पर इसे वैदिक सभ्यता का नाम दिया गया। वैदिक काल को दो भागों ऋग्वैदिक काल ( 1500- 1000 ई. पू. ) तथा उत्तर वैदिक काल ( 1000 - 700 ई. पू. ) में बांटा गया जाता है।
      लौह युग
      प्राचीन भारत (५०० ईसा पूर्व- ५५० ईस्वी)
      १००० ई पू के पश्चात १६ महाजनपद उत्तर भारत में मिलते हैं। ५०० ईसवी पूर्व के बाद, कई स्वतंत्र राज्य बन गए| उत्तर में मौर्य वंश, जिसमें चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक सम्मिलित थे, ने भारत के सांस्कृतिक पटल पर उल्लेखनीय छाप छोडी | १८० ईसवी के आरम्भ से, मध्य एशिया से कई आक्रमण हुए, जिनके परिणामस्वरूप उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीप में इंडो-ग्रीक, इंडो-स्किथिअन, इंडो-पार्थियन और अंततः कुषाण राजवंश स्थापित हुए | तीसरी शताब्दी के आगे का समय जब भारत पर गुप्त वंश का शासन था, भारत का "स्वर्णिम काल" कहलाया| दक्षिण भारत में भिन्न-भिन्न समयकाल में कई राजवंश चालुक्य, चेर, चोल, कदम्ब, पल्लव तथा पांड्य चले | विज्ञान, कला, साहित्य, गणित, खगोल शास्त्र, प्राचीन प्रौद्योगिकी, धर्म, तथा दर्शन इन्हीं राजाओं के शासनकाल में फ़ले-फ़ूले।
      मध्यकालीन भारत
      12वीं शताब्दी के प्रारंभ में, भारत पर इस्लामी आक्रमणों के पश्चात, उत्तरी व केन्द्रीय भारत का अधिकांश भाग दिल्ली सल्तनत के शासनाधीन हो गया; और बाद में, अधिकांश उपमहाद्वीप मुगल वंश के अधीन। दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य शक्तिशाली निकला । हालांकि, विशेषतः तुलनात्मक रूप से, संरक्षित दक्षिण में, अनेक राज्य शेष रहे अथवा अस्तित्व में आये ।
      17वीं शताब्दी के मध्यकाल में पुर्तगाल, डच, फ्रांस, ब्रिटेन सहित अनेकों युरोपीय देशों, जो कि भारत से व्यापार करने के इच्छुक थे, उन्होनें देश में स्थापित शासित प्रदेश, जो कि आपस में युद्ध करने में व्यस्त थे, का लाभ प्राप्त किया। अंग्रेज दुसरे देशों से व्यापार के इच्छुक लोगों को रोकने में सफल रहे और १८४० ई तक लगभग संपूर्ण देश पर शासन करने में सफल हुए। १८५७ ई में ब्रिटिश इस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध असफल विद्रोह, जो कि भारतीय स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम से जाना जाता है, के बाद भारत का अधिकांश भाग सीधे अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक नियंत्रण में आ गया।
      स्वतन्त्र भारत
      १९४७ से १९५०
    • देश आजाद: १४ अगस्त १९४७ को जैसे ही घड़ी की सुई मे रात के १२ बजे, प्रथम प्रधानमंत्री श्री जवाहर लाल नेहरू ने देश के स्वतंत्र होने की घोषणा की।
    • शोक की लहर: ३० जनवरी १९४८ को उस समय सारे देश में शोक की लहर दौड़ गई, जब नाथूराम गोड्से ने महात्मा गांधी की हत्या कर दी।
    • भारत-पाकिस्तान के बीच प्रथम युद्ध: देश विभाजन के बाद नए पड़ोसी बने पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। यह लड़ाई ३१ दिसम्बर, १९४८ को समाप्त हुई और इसमें दोनों देशों के लगभग १५००-१५०० सैनिक मारे गए तथा पाकिस्तान ने कश्मीर के एक भूभाग पर अधिकार कर लिया।
    • भारत बना गणतंत्र: संविधान सभा द्वारा १९४९ में पारित किए जाने के बाद २६ जनवरी, १९५० को पहली बार देश का संविधान स्वीकार किया गया।
    • जेल की बैरक में आईआईटी की स्थापना: सन् १९५० में पश्चिम बंगाल के खड़गपुर के निकट हुबली जेल के परिव्यक्त बैरक में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) के रूप में देश के पहले तकनीकी उच्च शिक्षा संस्थान की नींव डाली गई।
    १९५० से १९७०
  • भाषाई आधार पर राज्यों का गठन: अलग तेलुगू राज्य की मांग को लेकर हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद १९५३ में पहली बार भाषाई आधार पर आंध्रप्रदेश राज्य का गठन किया गया।
  • वामपंथ का उदय: सन् १९५४ में शीत युद्ध के दौर से गुजर रहे विश्व के समक्ष पंडित जवाहरलाल नेहरू ने गुटनिरपेक्षता का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसे बाद में यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो, इंडोनेशिया के सुकर्णो और मिस्त्र के गमाल अब्दुल नासिर ने अंगीकार करते हुए गुटनिरपेक्ष आंदोलन को जन्म दिया।
  • भारत-चीन युद्ध: २० अक्टूबर, १९६२ को पड़ोसी चीन ने विश्वासघात करते हुए अरुणाचल प्रदेश और लद्दाख की सीमा पर धावा बोल दिया। इस युद्ध में भारत की शर्मनाक हार हुई, और चीन ने अक्साई चिन पर अधिकार कर लिया।
  • पंडित नेहरू का देहांत: पक्षाघात का शिकार होने के बाद सन् १९६४ में पंडित नेहरू का निधन हो गया और प्रधानमंत्री की कुर्सी उनकी पुत्री इंदिरा गांधी के स्थान पर लाल बहादुर शास्त्री को प्राप्त हुई।
  • इंदिरा बनीं प्रधानमंत्री: ११ जनवरी १९६६ को ताशकंद में लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी भारत की प्रथम महिला प्रधानमन्त्री बनीं।
  • हरित क्रांति का जन्म: सन् १९६७ से लेकर १९७८ तक चली हरित क्रांति ने भारत को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बना दिया।
  • आईटी क्रांति: १९६८ में टाटा कन्सल्टन्सी सर्विसिज़ की स्थापना से भारत नई ऊँचाई पर पहुंचा दिया।
  • बैंकों का राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स का उन्नमूलन: १९ जुलाई, १९६९ को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया, और साथ ही, उन्होंने लगभग ४०० रजवाड़ों को आजादी के समय से ही मिल रहे खैरात (प्रिवी पर्स) को बंद कर दिया।
१९७० से १९८०
भारत के प्रथम परमाणु परीक्षण के बाद पोखरण का एक दृश्य।
  • भारत-पाक के मध्य तीसरा युद्ध: सन् १९७१ में एक बार फिर भारत और पाकिस्तान आपस में भिड़ गए। परिणामस्वरूप एक नए देश बांग्लादेश(२५ दिसम्बर, १९७१) का जन्म हुआ। शिमला समझौते के अंतर्गत दोनों देशों के बीच शांति स्थापित हुई।
  • चिपको आन्दोलन का जन्म: सन् १९७३ में उत्तराखंड राज्य के कुछ ग्राम वासियों ने वनों को काटने से बचाने के लिए एक अनोखे आंदोलन आरंभ किया, जिसमें वे पेड़ से चिपक जाते थे।
  • पहला परमाणु परीक्षण: १८ मई, १९७४ को राजस्थान के पोखरण में भारत ने पहली बार सफल परमाणु परीक्षा किया. इस मिशन का नाम बुद्धा स्माइल्स रखा गया।
  • शोले की रिकार्ड तोड़ सफलता: १९७५ में रमेश सिप्पी द्वारा निर्देशित चलचित्र शोले ने बालीवुड नया कीर्तिमान रचा और उस समय तक का यह सर्वश्रेष्ठ चलचित्र घोषित किया गया।
  • अन्तरिक्ष में भारत: १९ अप्रैल १९७५ को पहले भारतीय उपग्रह आर्यभट्ट का सफल प्रक्षेपण ।
  • आपातकाल की घोषणा: जून १९७५ में इंदिरा गांधी ने आपातकाल की घोषणा की।
  • टीकाकरण अभियान की शुभारंभ: १९७८ में सभी शिशुओं और गर्भवती महिलाओं को डिप्थीरिया, पोलियो, टिटनेस और कुकुरखांसी से बचाने के लिए टीकाकरण का सघन अभियान छेड़ा गया।
  • मदर टेरेसा को नोबेल पुरस्कार: अपने जीवन का अधिकांश भाग कलकत्ता की मलिन बस्तियों में रहने वाले गरीबों की सेवा में गुजार देने वाली मदर टेरेसा को सन् १९७९ में शांति के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।
१९८० से १९९०
  • एशियाई खेलों का सफल आयोजन: सन् १९८२ में भारत में दूसरी बार एशियाई खेलों का सफल आयोजन किया गया, जो कि पिछली बार की अपेक्षा कहीं बड़े पैमाने पर रहा और साथ ही इसी वर्ष रंगीन टीवी भी भारत आया।
  • भारत बना क्रिकेट विश्व चैंपियन: १९८३ में खेलों की दुनिया में सबसे बड़ी जीत दर्ज करते हुए भारत ने कपिल देव की कप्तानी मे वेस्ट इंडीज को हराकर क्रिकेट विश्व कप अपने नाम कर लिया।
  • ऑपरेशन ब्लूस्टार: जून १९८४ में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में जरनैल सिंह भिंडरावाले के नेतृत्व में घुसे खालिस्तानी आतंकवादियों को निकाल बाहर करने के लिए सेना ने ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया।
  • अंतरिक्ष में प्रथम भारतीय: अप्रैल १९८४ में भारत ने अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में एक और सफलता प्राप्त की, जब पहला भारतीय अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा, जो भारतीय वायुसेना के एक पायलट थे, अंतरिक्ष पहुंचे।
पहला भारतीय अंतरिक्ष यात्री, राकेश शर्मा।
  • इंदिरा गांधी की हत्या: ३१ अक्टूबर, १९८४ को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके ही सिख अंगरक्षकों ने गोली मारकर हत्या कर दी। इस हत्या को ऑपरेशन ब्लू स्टार के प्रतिकार के रूप में देखा गया। (यह केवल कुछ इतिहासकारो की राय है)। इंदिरा गांधी की हत्या के हुए सिक्ख विरोधी दंगों में २,००० से अधिक लोग मारे गए।
  • एवरेस्ट विजय: २३ मई १९८४ को बचेंद्री पाल विश्व की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई करने वाली भारत की पहली और विश्व की पांचवीं महिला बनीं।
  • भोपाल गैस त्रासदी: ३ दिसम्बर, १९८४ को विश्व का सर्वाधिक भीषण औद्योगिक दुर्घटना सामने आई, जब मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में यूनियन कार्बाइड के कारखाने में गैस का रिसाब होने से लगभग ३,००० लोग अकाल मृत्यु का शिकार बने।


भोपाल गैस कांड स्मारक।
  • सड़क पर उतरी मारुति: १९८४ में ८०० सीसी की मारुति कार लांच हुई, जिसने देश में वाहन क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया।
  • शाह बानो मामला: इस विवादास्पद मामले में उच्चतम न्यायालय ने मुस्लिम बोर्ड के निर्णय को पलटते हुए शाह बानो को गुजारा भत्ता देने को कहा लेकिन कट्टरपंथी मुस्लिम कार्यकर्ताओं के दबाव के आगे राजीव गांधी सरकार ने उच्चतम न्यायालय के निर्णय को प्रभावहीन बनाया।
  • कनिष्क बमकांड: २३ जून, १९८५ को बब्बर खालसा के आतंकवादियों ने आयरलैंड से टोरंटो आ रहे एयर इंडिया के विमान को बम से उड़ा दिया, जिसमें सवार सभी ३२९ यात्री मारे गए।
  • असम समझौता: १९८५ में राजीव गांधी सरकार और असम के चरमपंथी गुटों में ऐतिहासिक समझौते से यह आस बंधी थी कि इस राज्य में शांति हो जाएगी, लेकिन ऐसा पूरी तरह संभव नहीं हो सका।
  • भारत-श्रीलंका शांति समझौता: भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी और श्रीलंका के राष्ट्रपति जेआर ने १९८७ में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। यह समझौता एक भूल साबित हुआ और इसके चलते श्रीलंका में हिंसक आंदोलन जोर पकड़ने लगा।
  • मताधिकार की आयु सीमा घटी: १९८८ में राजीव गांधी सरकार ने मतदान के लिए न्यूनतम आयु सीमा २१ वर्ष से घटाकर १८ वर्ष कर दी।
  • पृथ्वी प्रक्षेपास्त्र का सफल परीक्षण: भारत ने पूर्णतया स्वदेशी तकनीक पर आधारित बैलिस्टिक प्रक्षेपास्त्र का १९८८ में सफल परीक्षण किया।
  • आरक्षण का पेंच: अगस्त १९९० में तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए २७ प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान लागू कर दिया।
१९९० से २०००
  • राजीव गांधी की हत्या: २१ मई, १९९१ को तमिलनाडु के श्रीपेराम्बदुर में लिट्टे की आत्मघाती हमलावर धनु ने राजीव गांधी की हत्या कर दी।
  • आर्थिक उदारीकरण: १९९२ में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने देश में आर्थिक सुधारों का नया दौर आरंभ किया।
  • सत्यजीत राय को ऑस्कर अवार्ड: विश्व सिनेमा को यादगार फिल्में देने वाले निर्माता-निर्देशक सत्यजीत राय को १९९२ में ऑस्कर का लाइफटाइम एचीवमेंट अवार्ड प्रदान किया गया।
  • प्रतिभूति घोटाला: शेयर बाजारों में नियोजित तरीके से तेजी लाकर शेयरधारकों के करोड़ों रुपए का वारा-न्यारा करने का खेल पहली बार जगजाहिर हुआ। इस पूरे प्रकरण में हर्षद मेहता नामक व्यक्ति की सबसे बड़ी भूमिका थी।
  • बाबरी विध्वंस: ६ दिसंबर १९९२ को अयोध्या में विवादास्पद बाबरी ढांचे को कट्टरपंथी हिंदुओं की भीड़ ने ढहा दिया। जिसकी प्रतिक्रिया में देश सांप्रदायिक दंगों की आग धधकने लगा था।
  • मुंबई बमकांड: बाबरी मस्जिद ढहाए जाने की घटना के बाद मुंबई(१९९३) में श्रृंखलाबद्ध बम विस्फोट हुए, जिसमें लगभग २५० लोग मारे गए।
  • सुष्मिता को ब्रह्मांड सुंदरी का ताज: सुष्मिता सेन ब्रह्मांड सुंदरी का ताज पहनने वाली भारत की पहली महिला बनीं।
  • सेलफोन की शुरूआत: १९९५ में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु और केंद्रीय संचार मंत्री सुखराम ने सेलफोन पर पहली बार बात करते हुए देश में मोबाइल सेवा की शुरूआत की।
  • इंटरनेट युग का आरंभ: १९९५ में विदेश संचार निगम लिमिटेड (वीएसएनएल) ने देश के छह नगरों में इंटरनेट सेवा का शुभारंभ किया।
  • पोखरण-2: अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के शासनकाल में भारतीय वैज्ञानिकों ने ११-१३ मई, १९९८ में पोखरण में पांच परमाणु परीक्षण किए। पाकिस्तान ने भी प्रतिकार स्वरूप २८ मई, १९९८ में छह परमाणु परीक्षण कर डाले।
  • अमर्त्य सेन को नोबेल पुरस्कार: १९९८ में अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।
  • भारत-पाक बस सेवा: १९९९ में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत-पाकिस्तान के बीच बस सेवा आरंभ की।
  • कारगिल की लड़ाई: जुलाई, १९९९ में भीरतीय सेना को कारगिल में पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ की जानकारी मिली। जिसके बाद भारतीय सेना ने घुसपैठियों के विरुद्ध कार्रवाई आरंभ कर दी। इस कार्रवाई के परिणामस्वरूप पाकिस्तानी सेना और घुसपैठिये पीछे हटे।
  • मैच फिक्सिन्ग: अप्रैल, २००० में क्रिकेट में मैच फिक्सिन्ग् उजागर होने से क्रिकेट की दुनिया में तहलका मचा। दिल्ली पुलिस ने दक्षिण अफ्रीका के कप्तान हेन्स क्रोनिये के विरुद्ध इस संबंध में मामला दर्ज किया।
२००० से वर्तमान
  • भारतीय संसद भवन पर हमला: १३ दिसंबर, २००१ को आतंकवादियों ने संसद भवन पर हमला किया, लेकिन देश के बहादुर सिपाहियों ने अपनी प्राणों की आहुति देकर भी आतंकवादियों के इरादों को विफल कर दिया।
  • तहलका कांड: तहलका डॉटकॉम ने स्टिंग ऑपरेशन के द्वारा रक्षा सौदों के लिए सांसदों और सैन्य अधिकारियों को घूस लेते हुए उजागर किया।
  • गोधरा जनसंहार: गुजरात के गोधरा में २७ फरवरी, २००२ को हिंदू तीर्थयात्रियों से भरी एक ट्रेन की बोगी को कुछ असामाजिक तत्वों ने जला डाला और जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप अगले ही दिन पूरे राज्य में दंगे भड़क उठे।
  • कल्पना चावला का दुखद अंत: अंतरिक्ष पर पहुंचने वाली पहली भारतीय महिला कल्पना चावला की दूसरी अंतरिक्ष यात्रा ही उनकी अंतिम यात्रा साबित हुई। ३ फरवरी, २००३ के दिन पृथ्वी की कक्षा में प्रवेश करते समय कोलंबिया शटल यान दुर्घटनाग्रस्त हो गया और कल्पना सहित इसमें सवार सातों अंतरिक्ष यात्री मारे गए।
  • सहवाग बनें `मुल्तान का सुल्तान´: २००४ में पाकिस्तान के विरुद्ध मुल्तान टेस्ट में सहवाग शानदार तिहरा शतक जमाने वाले पहले क्रिकेटर बने।
  • भारत-अमेरिका परमाणु समझौता: २००५ में भारतीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने ऐतिहासिक असैन्य परमाणु सहयोग संधि पर हस्ताक्षर किए।
  • सूचना का अधिकार: २००५ के सूचना के अधिकार कानून ने सरकारी बाबुओं को जवाबदेह बनाया।
  • ११/७, मुंबई की उपनगरीय रेलों में श्रृंखलाबद्ध बम विस्फ़ोट: ११ जुलाई, २००६ को एक बार फिर मुंबई आतंकवादियो के निशाने पर आ गई। शाम के समय अपने घरों को लौट रहे लोकल ट्रेन के खचाखच भरे डिब्बों में २० मिनट के अंतराल पर हुए सात बम धमाको में २५० लोग मारे गए।
  • टाटा ने कोरस को खरीदा: २००७ में किसी भारतीय कंपनी द्वारा अब तक के सबसे बड़े अधिग्रहण के रूप में टाटा स्टील ने एंग्लो-डच कंपनी कोरस को खरीद लिया।
  • पहली महिला राष्ट्रपति: महाराष्ट्र की पहली महिला राज्यपाल बनने वाली प्रतिभा पाटील ने २५ जुलाई २००७ को देश की पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण की।
  • मुंबई २६/११: एक बार फिर राष्ट्र की वित्तीय राजधानी पर आतंकवादियों का हमला। बुधवार, २६ नवंबर, २००८ की रात लगभग १० पाकिस्तानी आतंकवादी आधुनिक हथियारों से युक्त होकर चर्चगेट स्टेशन, कामा अस्पताल, और ताज और ओबेरॉय-ट्रायडैन्ट में घुसे। ३ दिन तक चले कमांडो ऑपरेशन में २०० से अधिक लोग मारे गए, और १० में से नौ आतंकवादी भी। एक आतंकवादी, अजमल कसाब को जीवित पकड़ लिया गया।

अंशुमन्त अयोध्या के राजा

अंशुमन्त अयोध्या के राजा

यादवकुल
1 मनु | इला | पुरुरवस् | आयु | नहुष | ययाति | यदु | क्रोष्टु | 11 वृजिनिवन्त् | स्वाहि | रुशद्गु | चित्ररथ | शशबिन्दु | 21 पृथुश्रवस् | अन्तर | सुयज्ञ | उशनस् | शिनेयु | मरुत्त | 32 कम्बलबर्हिस् | रुक्मकवच | परावृत् | ज्यामघ | विदर्भ | 41 क्रथभीम | कुन्ति | धृष्ट | निर्वृति | विदूरथ | दशार्ह | व्योमन् | जीमूत | विकृति | भीमरथ | 51 रथवर | दशरथ | एकादशरथ | शकुनि | करम्भ | देवरात | देवक्षत्र | देवन | 61 मधु | पुरुवश | पुरुद्वन्त | जन्तु | सत्वन्त् | भीम | अन्धक | कुकुर | वृष्णि | कपोतरोमन | 80 विलोमन् | नल | अभिजित् | पुनर्वसु | उग्रसेन | कंस | 94 कृष्ण | साम्ब
पौरवकुल
1 मनु | इला | पुरुरवस् | आयु | नहुष | ययाति | पूरु | जनमेजय | प्राचीन्वन्त् | प्रवीर | 11 मनस्यु | अभयद | सुधन्वन् | बहुगव | संयति | अहंयाति | रौद्राश्व | ऋचेयु | मतिनार | तंसु | 43 दुष्यन्त | भरत | भरद्वाज | वितथ | भुवमन्यु | बृहत्क्षत्र | सुहोत्र | हस्तिन् | 53 अजमीढ | नील | सुशान्ति | पुरुजानु | ऋक्ष | भृम्यश्व | मुद्गल | 61 ब्रह्मिष्ठ | वध्र्यश्व | दिवोदास | मित्रयु | मैत्रेय | सृञ्जय | च्यवन | सुदास | संवरण | सोमक | 71 कुरु | परीक्षित १ | जनमेजय | भीमसेन | विदूरथ | सार्वभौम | जयत्सेन | अराधिन | महाभौम | 81 अयुतायुस् | अक्रोधन | देवातिथि | ऋक्ष २ | भीमसेन | दिलीप | प्रतीप | शन्तनु | भीष्म | विचित्रवीर्य | धृतराष्ट्र | 94 पाण्डव | अभिमन्यु | परीक्षित | जनमेजय
अयोध्याकुल
1 मनु | इक्ष्वाकु | विकुक्षि-शशाद | कुकुत्स्थ | अनेनस् | पृथु | विष्टराश्व | आर्द्र | युवनाश्व | श्रावस्त | 11 बृहदश्व | कुवलाश्व | दृढाश्व | प्रमोद | हरयश्व | निकुम्भ | संहताश्व | अकृशाश्व | प्रसेनजित् | युवनाश्व २ | 21 मान्धातृ | पुरुकुत्स | त्रसदस्यु | सम्भूत | अनरण्य | त्रसदश्व | हरयाश्व २ | वसुमत | त्रिधनवन् | त्रय्यारुण | 32 सत्यव्रत | हरिश्चन्द्र | रोहित | हरित | विजय | रुरुक | वृक | बाहु | 41 सगर | असमञ्जस् | अंशुमन्त | दिलीप १ | भगीरथ | श्रुत | नाभाग | अम्बरीश | सिन्धुद्वीप | अयुतायुस् | 51 ऋतुपर्ण | सर्वकाम | सुदास | मित्रसह | अश्मक | मूलक | शतरथ | ऐडविड | विश्वसह १ | दिलीप २ | 61दीर्घबाहु | रघु | अज | दशरथ | 65 राम | कुश | अतिथि | निषध | नल | 71 नभस् | पुण्डरीक | क्षेमधन्वन् | देवानीक | अहीनगु | पारिपात्र | बल | उक्थ | वज्रनाभ | शङ्खन् | 81 व्युषिताश्व | विश्वसह २ | हिरण्याभ | पुष्य | ध्रुवसन्धि | सुदर्शन | अग्निवर्ण | शीघ्र | मरु | प्रसुश्रुत | 91 सुसन्धि | अमर्ष | विश्रुतवन्त् | 94 बृहद्बल | बृहत्क्षय ['bhaarshiva]]
अन्य राजा

ययाति,यदु

ययाति 

इक्ष्वाकु वंश के राजा नहुष के छः पुत्रों याति, ययाति, सयाति, अयाति, वियाति तथा कृति में से एक थे। याति राज्य, अर्थ आदि से विरक्त रहते थे इसलिये राजा नहुष ने अपने द्वितीय पुत्र ययाति का राज्यभिषके करवा दिया। ययाति का विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ हुआ।

ययाति ग्रंथि वृद्धावस्था में यौवन की तीव्र कामना की ग्रंथि मानी जाति है। किंवदंति है कि, राजा ययाति एक सहस्त्र वर्ष तक भोग लिप्सा में लिप्त रहे किन्तु उन्हें तृप्ति नहीं मिली। विषय वासना से तृप्ति न मिलने पर उन्हें उनसे घृणा हो गई और उन्हों ने पुरु की युवावस्था वापस लौटा कर वैराग्य धारण कर लिया। ययाति को वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्होने कहा-
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
कालो न यातो वयमेव याताः
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥
अर्थात, हमने भोग नहीं भुगते, बल्कि भोगों ने ही हमें भुगता है; हमने तप नहीं किया, बल्कि हम स्वयं ही तप्त हो गये हैं; काल समाप्त नहीं हुआ हम ही समाप्त हो गये; तृष्णा जीर्ण नहीं हुई, पर हम ही जीर्ण हुए हैं !

महराजा यदु

महराजा यदु एक चंद्रवंशी राजा थे. वे यदुकुल के प्रथम सदस्य माने जाते है. उनके वंशज जो कि यादव के नाम से जाने जाते हैं, भारत एवं निकटवर्ती देशो मे काफ़ी संख्या मे पाये जाते हैं. उनके वंशजो मे सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं पौराणिक ग्रन्थ महाभारत के महानायक भगवान श्रीकृष्ण.


नहुष

भगवान् विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए। ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रि से चन्द्रमा, चन्द्रमा से बुध, और बुध से इलानन्दन पुरूरवा का जन्म हुआ। पुरूरवा से आयु, आयु से राजा नहुष, और नहुष के छः पुत्रों याति ययाति सयाति अयाति वियाति तथा कृति उत्पन्न हुए। नहुष ने स्वर्ग पर भी राज किया था।
नहुष प्रसिद्ध चंद्रवंशी राजा पुरुरवा का पौत्र था। वृत्तासुर का वध करने के कारण इन्द्र को ब्रह्महत्या का दोष लगा और वे इस महादोष के कारण स्वर्ग छोड़कर किसी अज्ञात स्थान में जा छुपे। इन्द्रासन ख़ाली न रहने पाये इसलिये देवताओं ने मिलकर पृथ्वी के धर्मात्मा राजा नहुष को इन्द्र के पद पर आसीन कर दिया। नहुष अब समस्त देवता , ऋषि और गन्धर्वों से शक्ति प्राप्त कर स्वर्ग का भोग करने लगे। अकस्मात् एक दिन उनकी दृष्टि इन्द्र की साध्वी पत्नी शची पर पड़ी। शची को देखते ही वे कामान्ध हो उठे और उसे प्राप्त करने का हर सम्भव प्रयत्न करने लगे। जब शची को नहुष की बुरी नीयत का आभास हुआ तो वह भयभीत होकर देव-गुरु बृहस्पति के शरण में जा पहुँची और नहुष की कामेच्छा के विषय में बताते हुये कहा, “हे गुरुदेव! अब आप ही मेरे सतीत्व की रक्षा करें।” गुरु बृहस्पति ने सान्त्वना दी, “हे इन्द्राणी! तुम चिन्ता न करो। यहाँ मेरे पास रह कर तुम सभी प्रकार से सुरक्षित हो।” इस प्रकार शची गुरुदेव के पास रहने लगी और बृहस्पति इन्द्र की खोज करवाने लगे। अन्त में अग्निदेव ने एक कमल की नाल में सूक्ष्म रूप धारण करके छुपे हुये इन्द्र को खोज निकाला और उन्हें देवगुरु बृहस्पति के पास ले आये। इन्द्र पर लगे ब्रह्महत्या के दोष के निवारणार्थ देव-गुरु बृहस्पति ने उनसे अश्वमेघ यज्ञ करवाया। उस यज्ञ से इन्द्र पर लगा ब्रह्महत्या का दोष चार भागों में बँट गया। 1. एक भाग वृक्ष को दिया गया जिसने गोंद का रूप धारण कर लिया। 2. दूसरे भाग को नदियों को दिया गया जिसने फेन का रूप धारण कर लिया। 3. तीसरे भाग को पृथ्वी को दिया गया जिसने पर्वतों का रूप धारण कर लिया और 4. चौथा भाग स्त्रियों को प्राप्त हुआ जिससे वे रजस्वला होने लगीं। इस प्रकार इन्द्र का ब्रह्महत्या के दोष का निवारण हो जाने पर वे पुनः शक्ति सम्पन्न हो गये किन्तु इन्द्रासन पर नहुष के होने के कारण उनकी पूर्ण शक्ति वापस न मिल पाई। इसलिये उन्होंने अपनी पत्नी शची से कहा कि तुम नहुष को आज रात में मिलने का संकेत दे दो किन्तु यह कहना कि वह तुमसे मिलने के लिये सप्तर्षियों की पालकी पर बैठ कर आये। शची के संकेत के अनुसार रात्रि में नहुष सप्तर्षियों की पालकी पर बैठ कर शची से मिलने के लिये जाने लगा। सप्तर्षियों को धीरे-धीरे चलते देख कर उसने 'सर्प-सर्प' (शीघ्र चलो) कह कर अगस्त्य मुनि को एक लात मारी। इस पर अगस्त्य मुनि ने क्रोधित होकर उसे शाप दे दिया, “मूर्ख! तेरा धर्म नष्ट हो और तू दस हज़ार वर्षों तक सर्पयोनि में पड़ा रहे।” ऋषि के शाप देते ही नहुष सर्प बन कर पृथ्वी पर गिर पड़ा और देवराज इन्द्र को उनका इन्द्रासन पुनः प्राप्त हो गया। ययाति इक्ष्वाकु वंश के राजा नहुष के छः पुत्र थे – याति, ययाति , सयाति, अयाति, वियाति तथा कृति। याति परमज्ञानी थे तथा राज्य, लक्ष्मी आदि से विरक्त रहते थे इसलिये राजा नहुष ने अपने द्वितीय पुत्र ययाति का राज्यभिषके कर दिया। उन्हीं दिनों की बात है कि एक बार दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा अपनी सखियों के साथ अपने उद्यान में घूम रही थी। उनके साथ में गुरु शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी भी थी। शर्मिष्ठा अति मानिनी तथा अति सुन्दरी राजपुत्री थी किन्तु रूप लावण्य में देवयानी भी किसी प्रकार कम नहीं थी। वे सब की सब उस उद्यान के एक जलाशय में, अपने वस्त्र उतार कर स्नान करने लगीं। उसी समय भगवान शंकर पार्वती के साथ उधर से निकले। भगवान शंकर को आते देख वे सभी कन्याएँ लज्जावश जल मेँ से निकली और दौड़ कर अपने- अपने वस्त्र पहनने लगीं। शीघ्रता में शर्मिष्ठा ने भूलवश देवयानी के वस्त्र पहन लिये। इस पर देवयानी अति क्रोधित होकर शर्मिष्ठा से बोली, “रे शर्मिष्ठा! एक असुर पुत्री होकर तूने ब्राह्मण कन्या का वस्त्र धारण करने का साहस कैसे किया? तूने मेरे वस्त्र धारण करके मेरा अपमान किया है।” देवयानी ने शर्मिष्ठा को इस प्रकार से और भी अनेक अपशब्द कहे। देवयानी के अपशब्दों को सुनकर शर्मिष्ठा अपने अपमान से तिलमिला गई और देवयानी के वस्त्र छीन कर उसे एक कुएँ में धकेल दिया। देवयानी को कुएँ में धकेल कर शर्मिष्ठा के चले जाने के पश्चात् दैववश राजा ययाति शिकार खेलते हुये वहाँ पर आ पहुँचे। अपनी प्यास बुझाने के लिये वे कुएँ के निकट गये और उस कुएँ में वस्त्रहीन देवयानी को देखा। उन्होंने देवयानी के देह को ढँकने के लिये अपना दुपट्टा उस पर डाल दिया और उसका हाथ पकड़कर उसे कुएँ से बाहर निकाला। इस पर देवयानी ने प्रेमपूर्वक राजा ययाति से कहा, “हे आर्य! आपने मेरा हाथ पकड़ा है अतः मैं आपको अपने पति रूप में स्वीकार करती हूँ। हे वीरश्रेष्ठ! यद्यपि मैं ब्राह्मण पुत्री हूँ किन्तु वृहस्पति के पुत्र कच के शाप¹ के कारण मेरा विवाह ब्राह्मण कुमार के साथ नहीं हो सकता। इसलिये आप मुझे अपने प्रारब्ध का भोग समझ कर स्वीकार कीजिये।” ययाति ने प्रसन्न होकर देवयानी के इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। देवयानी वहाँ से अपने पिता शुक्राचार्य के पास आई तथा उनसे समस्त वृत्तांत कहा। शर्मिष्ठा के किये हुये कर्म पर शुक्राचार्य को अत्यन्त क्रोध आया और वे दैत्यों से विमुख हो गये। इस पर दैत्यराज वृषपर्वा अपने गुरुदेव के पास आकर अनेक प्रकार से अनुनय-विनय करने लगे।
शुक्राचार्य का क्रोध कुछ शान्त हुआ और वे बोले, “हे राजन्! मुझे तुमसे किसी प्रकार की अप्रसन्नता नहीं है किन्तु मेरी पुत्री देवयानी अत्यन्त रुष्ट है। यदि तुम उसे प्रसन्न कर सको तो मैं पुनः तुम्हारा साथ देने लगूँगा।”

उससे कहा, “हे पुत्री! तुम जो कुछ भी माँगोगी मैं तुम्हें वह प्रदान करूँगा।” देवयानी बोली, “हे दैत्यराज! मुझे आपकी पुत्री शर्मिष्ठा दासी के रूप में चाहिये।” अपने परिवार पर आये संकट को टालने के लिये शर्मिष्ठा ने देवयानी की दासी बनना स्वीकार कर लिया। शुक्राचार्य ने अपनी पुत्री देवयानी का विवाह राजा ययाति के साथ कर दिया। शर्मिष्ठा भी देवयानी के साथ उसकी दासी के रूप में ययाति के भवन में आ गई। कुछ काल उपरान्त देवयानी के पुत्रवती होने पर शर्मिष्ठा ने भी पुत्रोत्पत्ति की कामना से राजा ययाति से प्रणय निवेदन किया जिसे ययाति ने स्वीकार कर लिया।
तथा तुवर्सु और शर्मिष्ठा से तीन पुत्र द्रुह्य, अनु तथा पुरु हुये। जब देवयानी को ययाति तथा शर्मिष्ठा के सम्बंध के विषय में पता चला तो वह क्रोधित होकर अपने पिता के पास चली गई। शुक्राचार्य ने राजा ययाति को बुलवाकर कहा, “रे ययाति! तू स्त्री लम्पट, मन्द बुद्धि तथा क्रूर है। इसलिये मैं तुझे शाप देता हूँ तुझे तत्काल वृद्धावस्था प्राप्त हो।” उनके शाप से भयभीत हो राजा ययाति अनुनय करते हुये बोले, “हे ब्रह्मदेव! आपकी पुत्री के साथ विषय भोग करते हुये अभी मेरी तृप्ति नहीं हुई है। इस शाप के कारण तो आपकी पुत्री का भी अहित है।” तब कुछ विचार कर के शुक्रचार्य जी ने कहा, “अच्छा! यदि कोई तुझे प्रसन्नतापूर्वक अपनी यौवनावस्था दे तो तुम उसके साथ अपनी वृद्धावस्था को बदल सकते हो।” इसके पश्चात् राजा ययाति ने अपने ज्येष्ठ पुत्र से कहा, “वत्स यदु! तुम अपने नाना के द्वारा दी गई मेरी इस वृद्धावस्था को लेकर अपनी युवावस्था मुझे दे दो।” इस पर यदु बोला, “हे पिताजी! असमय में आई वृद्धावस्था को लेकर मैं जीवित नहीं रहना चाहता। इसलिये मैं आपकी वृद्धावस्था को नहीं ले सकता।” ययाति ने अपने शेष पुत्रों से भी इसी प्रकार की माँग की किन्तु सबसे छोटे पुत्र पुरु को छोड़ कर अन्य पुत्रों ने उनकी माँग को ठुकरा दिया। पुरु अपने पिता को अपनी युवावस्था सहर्ष प्रदान कर दिया। पुनः युवा हो जाने पर राजा ययाति ने यदु से कहा, “तूने ज्येष्ठ पुत्र होकर भी अपने पिता के प्रति अपने कर्तव्य को पूर्ण नहीं किया। अतः मैं तुझे राज्याधिकार से वंचित करके अपना राज्य पुरु को देता हूँ। मैं तुझे शाप भी देता हूँ कि तेरा वंश सदैव राजवंशियों के द्वारा बहिष्कृत रहेगा।” राजा ययाति के इसी पुत्र यदु के वंश में श्री कृष्ण का अवतार हुआ । राजा ययाति एक सहस्त्र वर्ष तक भोग लिप्सा में लिप्त रहे किन्तु उन्हें तृप्ति नहीं मिली। विषय वासना से तृप्ति न मिलने पर उन्हें उनसे घृणा हो गई और उन्हों ने पुरु की युवावस्था वापस लौटा कर वैराग्य धारण कर लिया। ययाति को वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त हुआ और उन्होने कहा– भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः। कालो न यातो वयमेव याताः तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥ अर्थात्- हमने भोग नहीं भुगते, बल्कि भोगों ने ही हमें भुगता है; हमने तप नहीं किया, बल्कि हम स्वयं ही तप्त हो गये हैं; काल समाप्त नहीं हुआ हम ही समाप्त हो गये; तृष्णा जीर्ण नहीं हुई, पर हम ही जीर्ण हुए हैं ! 1. वृहस्पति के पुत्र कच गुरु शुक्राचार्य के आश्रम में रह कर सञ्जीवनी विद्या सीखने आये थे। देवयानी ने उन पर मोहित होकर उनके सामने अपना प्रणय निवेदन किया था किन्तु गुरुपुत्री होने के कारण कच ने उसके प्रणय निवेदन को अस्वीकार कर दिया। इस पर देवयानी ने रुष्ट होकर कच को अपनी पढ़ी हुई विद्या को भूल जाने का शाप दिया। कच ने भी देवयानी को शाप दे दिया कि उसे कोई भी ब्राह्मण पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं करेगा।
 

जीवनकाल

जीवनकाल को आयु कहते हैं, यद्यपि वय, अवस्था या उम्र को भी बहुधा आयु ही कह दिया जाता है। जीवित मानव, पशु, पक्षियों, कीट, पतन्‍गों, सूच्‍छम जीवियों, वनस्‍पतियों और र्निजीव पदार्थों के जन्‍म अथवा पैदा होंनें के समय से लेकर उस पदार्थ की मृत्‍यु अथवा समाप्‍त होंनें तक के समय को आयु से सम्‍बोधित करते हैं ।
विभिन्न प्राणियों की आयुओं में बड़ी भिन्नता है। एक प्रकार की मक्खी की आयु कुछ घंटों की ही होती है। उधर कछुए की आयु दो सौ वर्षों तक की होती है। आयु की सीमा मोटे हिसाब से शरीर की तौल के अनुपात में होती है, यद्यपि कई अपवाद भी हैं। कुछ पक्षी कई स्तनधारियों से अधिक जीवित रहते हैं। कुछ मछलियाँ १५० से २०० वर्षों तक जीवित रहती हैं, किंतु घोड़ा ३० वर्ष में मर जाता है। वृक्षों की रचना भिन्न होने से उनकी आयु की कोई मर्यादा नहीं है। अमरीका में कुछ वृक्षों को गिराने के बाद उनके वार्षिक वलयों से पता लगा कि वे २००० वर्षों से भी कुछ अधिक वय के थे।
मृत्यु पर, अर्थात्‌ जीवन के अंत पर, अमीबा तथा अन्य प्रोटोज़ोआ ने विजय प्राप्त कर ली। एक से दो में विभक्त होकर प्रजनित होने से इन्होंने आयु की सीमा को लाँघ लिया है। इनकी अबाध जीवनधारा के कारण इन्हें अमर भी कहा जाता है। परंतु उन्नत वर्ग के प्राणियों में जीवन का अंत टालना असंभव है; इसलिए उन सभी की आयु सीमाबद्ध है। यह देखकर कि किसी प्राणी को प्रौढ़ होने में कितने वर्ष लगते हैं, उसकी पूरी आयु का अनुमान लगाया जा सकता है। मनुष्य का जीवनकाल १०० वर्ष आँका गया है।
पिछले कई वर्षों में कई कारणों से मनुष्य का महत्तम काल तो अधिक नहीं बढ़ पाया है, किंतु औसत आयु बढ़ गई है। यह वृद्धि इसलिए हुई कि बच्चों को मृत्यु से बचाने में आयुर्विज्ञान (मेडिकल सायंस) ने बड़ी उन्नति की है। बुढ़ापे के रोगों में, विशेषकर धमनियों के कड़ी हो जाने की चिकित्सा में, विशेष सफलता नहीं मिली है। आनुवंशिकता और पर्यावरण का आयु पर बहुत प्रभाव पड़ता है। खोजों से पता चला है कि यदि प्रसव के समय की मृत्युओं की गणना न की जाय तो पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियाँ अधिक समय तक जीवित रहती हैं। यह भी निर्ववाद है कि दीर्घजीवी माता पिता की संतान साधारणत: दीर्घजीवी होती हैं। स्वस्थ वातावरण में प्राणी दीर्घजीवी होता है। जीव की जन्मजात बलशाली जीवनशक्ति बाहर के दूषित वातावरण के प्रभाव से प्राणी की बहुत कुछ रक्षा करती है, परंतु अधिक दूषित वातावरण रोगों के माध्यम से आयु पर प्रभाव डालता है। इसके अतिरिक्त देखा गया है कि चिंता, अनुचित आहार तथा अस्वास्थ्यकारी पर्यावरण आयु घटाते हैं। दूसरी ओर, प्रतिदिन की मानसिक या शारीरिक कार्यशीलता बुढ़ापे के विकृत रूप को दूर रखती है। अंगों के जीर्ण शीर्ण हो जाने की आशंका की अपेक्षा अकार्यता से बेकार होने की संभावना अधिक रहती है। विश्व के अनेक लेखक और चित्रकार दीर्घजीवी हुए हैं और अंत तक वे नए ग्रंथ और नए चित्र की रचना करते रहे हैं। अनियमित आहार, अति सुरापान और अति भोजन आयु को घटाते हैं। सौ वर्ष से अधिक काल तक जीनेवाले व्यक्तियों में से अधिकांश लघु आहार करनेवाले रहे हैं। अधिक भोजन करने से बहुधा मधुमेह (डायबिटीज़) या धमनी, हृदय या वृक्क (गुरदे) का रोग हो जाता है। बुढ़ापा स्वस्थ और सुखद हो सकता है अथवा रोगग्रस्त, पीड़ामय और दु:खद। स्वस्थ बुढ़ापे में क्रियाशीलता कम हो जाती है और कुछ दुर्बलता आ जाती है, परंतु मन शांत रहता है। मानसिक दृष्टिकोण साधारणत: व्यक्ति के पूर्वगामी दृष्टिकोण पर निर्भर रहता है, जिससे कुछ व्यक्ति सुखी और दयालु रहते हैं, कुछ निराशावादी और छिद्रान्वेषी। श्टाइनाख और वोरोनॉफ़ ने बंदर की ग्रंथियों को मनुष्य में आरोपित करके अल्पकालीन युवावस्था कुछ लोगों में ला दी थी, परंतु उनकी रीतियों को अब कोई पूछता भी नहीं। उनकी शल्यक्रिया में मनुष्य का जीवन बढ़ नहीं सका।
कुछ रोगों से मनुष्य समय के बहुत पहले बुड्ढा लगने लगता है। प्रोजीरिया नामक रोग में तो बच्चे भी बुड्ढों की आकृति के हो जाते हैं, परंतु सौभाग्यवश यह रोग बहुत कम होता है। कुछ रोग विशेषकर बुड्ढों में होते हैं। इनमें से प्रधान रोग हैं मधुमेह (डायबिटीज़), कर्कट (कैंसर) और हृदय, धमनी तथा वृक्क के रोग। बचपन और युवावस्था के रोगों में से न्यूमोनिया बहुधा बूढ़ों को भी हो जाता है और साधारणत: उनका प्राण ही ले लेता है।
भेषज वैधिक (मेडिका-लीगल) कार्यों में यथार्थ वयhttp://www.achhikhabar.com/2011/12/16/age-quotes-in-hindi/ का आगणन बड़े महत्व की बात है। वयनिर्धारण में दाँत, बाल, मस्तिष्क तथा अस्थि की परीक्षा की जाती है और एक्स-किरणों आदि की सहायता भी ली जाती है। परंतु २५ वर्ष के ऊपर वय की निश्चित गणना ठीक से नहीं हो सकती।

जीवनकाल

यद्यपि आयु तथा जीवनकाल एक दूसरे के पर्याय के रूप में प्रयोग कर सकते हैं, किन्तु इतिहास की दृष्टि से किसी व्यक्ति के जीवित रहने की अवधि को भी जीवनकाल कहा जाता है। उदाहरण के लिए - अमुक व्यक्ति का जीवनकाल सन् ---- से सन् ---- का था।

कानून में आयु

आयु के समय की अवधि की ओर संकेत मिलता है। शरीर-विज्ञान-वेत्ता मनुष्य के विकास की अवस्था के अर्थ में 'आयु' शब्द का प्रयोग करते हैं; जैसे शैशव पाँच वर्ष की आयु तक, बचपन १४ वर्ष तक, तरुणावस्था २१ वर्ष तक, वयस्क ५० वर्ष तक और इसके बाद वृद्धावस्था। विकास की अवस्था के लिए प्रयुक्त आयु का तात्पर्य शारीरिक आयु से होता है।
कानून सम्बंधी विविध कार्यों के लिए विभिन्न आयु सरकार की ओर से निश्चित की जाती हैं, जैसे मतदान के लिए कहीं १८ वर्ष और कहीं २१ वर्ष की आयु निर्धारित है। कुछ पदों के लिए भी आयु की एक सीमा बना दी जाती है। कुछ संस्थाएँ अपनी सदस्यता के लिए आयु की किसी निश्चित सीमा पर अधिक बल देती है।

मानसिक आयु

२०वीं शताब्दी के प्रारंभ में 'मानसिक आयु' (मेंटल एज) का प्रयोग किया गया है। यद्यपि इस शब्दावली की ओर सन्‌ १८८७ ई. में भी संकेत किया गया था, तथापि इसका श्रेय फ्रांस के मनोवैज्ञानिक अल्फ्रडे बीने (१८५७-१९११) को दिया जाता है। मानसिक आयु का तात्पर्य कुछ समान आयुवाले बालकों की औसत मानसिक योग्यता से है। इससे बालक की साधारण मानसिक योग्यता का अनुमान मिलता है। मानसिक आयु बढ़ती है और परिपक्व होती है। सामान्यत: इसकी परिपक्वता का समय १४ से २२ वर्ष की आयु के भीतर कभी भी आ सकता है। कुछ लोगों में इसकी परिपक्वता २२ वर्ष के बाद भी आ सकती है।

 

हिन्दू धर्म के अनुसार-मनु

मनु हिन्दू धर्म के अनुसार, संसार के प्रथम पुरुष थे। प्रथम मनु का नाम स्वायंभुव मनु था, जिनके संग प्रथम स्त्री थी शतरूपा। ये स्वयं भू यानि पृथ्वी से उत्पन्न होने के कारण ही स्वायंभू कहलाये। इन्हीं प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री की सन्तानों से संसार के समस्त जनों की उत्पत्ति हुई। मनु की सन्तान होने के कारण वे मानव या मनुष्य कहलाए। स्वायंभुव मनु को आदि भी कहा जाता है। आदि का अर्थ होता है प्रारंभ। सभी भाषाओं के मनुष्य-वाची शब्द मैन, मनुज, मानव, आदम, आदमी आदि सभी मनु शब्द से प्रभावित है। यह समस्त मानव जाति के प्रथम संदेशवाहक हैं। इन्हें प्रथम मानने के कई कारण हैं। सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई। प्रमाण यही बताते हैं कि आदि सृष्टि की उत्पत्ति भारत के उत्तराखण्ड अर्थात् इस ब्रह्मावर्त क्षेत्र में ही हुई। मानव का हिन्दी में अर्थ है वह जिसमें मन, जड़ और प्राण से कहीं अधिक सक्रिय है। मनुष्य में मन की शक्ति है, विचार करने की शक्ति है, इसीलिए उसे मनुष्य कहते हैं। और ये सभी मनु की संतानें हैं इसीलिए मनुष्य को मानव भी कहा जाता है।

 मनुओं की संख्या
हिंदू धर्म में स्वायंभुव मनु के ही कुल में आगे चलकर स्वायंभुव सहित कुल मिलाकर क्रमश: १४ मनु हुए। महाभारत में ८ मनुओं का उल्लेख मिलता है व श्वेतवराह कल्प में १४ मनुओं का उल्लेख है। इन चौदह मनुओं को ही जैन धर्म में कुलकर कहा गया है।
चौदह मनुओं के नाम इस प्रकार से हैं:
  1. स्वायम्भु मनु
  2. स्वरोचिष मनु
  3. औत्तमी मनु
  4. तामस मनु
  5. रैवत मनु
  6. चाक्षुष मनु
  7. वैवस्वत मनु या श्राद्धदेव मनु
  8. सावर्णि मनु
  9. दक्ष सावर्णि मनु
  10. ब्रह्म सावर्णि मनु
  11. धर्म सावर्णि मनु
  12. रुद्र सावर्णि मनु
  13. देव सावर्णि मनु या रौच्य मनु
  14. इन्द्र सावर्णि मनु या भौत मनु
वर्तमान काल तक वराह कल्प के स्वायम्भु मनु, स्वरोचिष मनु, उत्तम मनु, तमास मनु, रेवत-मनु चाक्षुष मनु तथा वैवस्वत मनु के मन्वन्तर बीत चुके हैं और अब वैवस्वत तथा सावर्णि मनु की अन्तर्दशा चल रही है। सावर्णि मनु का आविर्भाव विक्रमी सम्वत प्रारम्भ होने से ५६३० वर्ष पूर्व हुआ था।

संतानें

स्वायंभुव मनु एवं शतरूपा के कुल पाँच सन्तानें हुईं थीं जिनमें से दो पुत्र प्रियव्रत एवं उत्तानपाद तथा तीन कन्याएँ आकूति, देवहूति और प्रसूति थे।

कन्याएं

आकूति का विवाह रुचि प्रजापति के साथ और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ। देवहूति का विवाह प्रजापति कर्दम के साथ हुआ। कपिल ऋषि देवहूति की संतान थे। हिंदू पुराणों अनुसार इन्हीं तीन कन्याओं से संसार के मानवों में वृद्धि हुई।

पुत्र

मनु के दो पुत्रों प्रियव्रत और उत्तानपाद में से बड़े पुत्र उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नी थीं। उत्तानपाद के सुनीति से ध्रुव तथा सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुए। ध्रुव ने भगवान विष्णु की घोर तपस्या कर ब्रह्माण्ड में ऊंचा स्थान पाया।
स्वायंभुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियव्रत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था जिससे उनको दस पुत्र हुए थे।

कामायनी के मनु

मनु कवि जयशंकर प्रसाद की कामायनी के भी मुख्य पात्र हैं। महाभारत में उल्लेखित वैवस्वत मनु का संबंध कामायनी के नायक से जोड़ा जा सकता है। कामायनी में मनु का चित्रण देवताओं से इतर मानवीय सृष्टि के व्यवस्थापक के रूप में विशेषतः किया गया है। देव सृष्टि के संहार के बाद वे चिंता मग्न बैठे हुए हैं। श्रद्धा की प्रेरणा से वे जीवन में फिर से रुचि लेने लगते हैं पर कुछ काल के बाद श्रद्धा से असंतुष्ट होकर उसे छोड़कर वे चले जाते हैं। अपने भ्रमण में वे सारस्वत प्रदेश जा पहुँचते हैं, जहाँ की अधिष्ठात्री इड़ा थी। इड़ा के साथ वे एक नई वैज्ञानिक सभ्यता का नियोजन करते हैं। पर उनके मन की मूल अधिकर की लिपसा अभी गई नहीं है। वे इड़ा पर अपना अधिकार चाहते हैं। फलस्वरूप प्रजा विद्रोह करती है, जिसमें मनु घायल होकर मूर्छित हो जाते हैं। श्रद्धा अपने पुत्र मानव के लिए हुए मनु की खोज में सारस्वत प्रदेश तक आ जाती है, जहाँ दोने का मिलन होता है। मनु अपनी पिछली भूलों के लिए पश्चात्ताप करते हैं। श्रद्धा मानव को इड़ा के संरक्षण में छोड़कर मनु को लेकर हिमालय की उपत्यका में चली जाती है, जहाँ श्रद्धा की सहायता से मनु आनंद की स्थिति को प्राप्त होते हैं।

मनुस्मृति

महाभारत में ८ मनुओं का उल्लेख है। शतपथ ब्राह्मण में मनु को श्रद्धादेव कहकर संबोधित किया गया है। श्रीमद्भागवत में इन्हीं वैवस्वत मनु और श्रद्धा से मानवीय सृष्टि का प्रारंभ माना गया है। श्वेत वराह कल्प में १४ मनुओं का उल्लेख है। महाराज मनु ने बहुत दिनों तक इस सप्तद्वीपवती पृथ्वी पर राज्य किया। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। इन्हीं ने मनुस्मृति नामक ग्रन्थ की रचना की थी जो आज मूल रूप में उपलब्ध नहीं है। उसके अर्थ का अनर्थ ही होता रहा है। उस काल में वर्ण का अर्थ रंग होता था और आज जाति।
प्रजा का पालन करते हुए जब महाराज मनु को मोक्ष की अभिलाषा हुई तो वे संपूर्ण राजपाट अपने बड़े पुत्र उत्तानपाद को सौंपकर एकान्त में अपनी पत्नी शतरूपा के साथ नैमिषारण्य तीर्थ चले गए लेकिन उत्तानपाद की अपेक्षा उनके दूसरे पुत्र राजा प्रियव्रत की प्रसिद्धि ही अधिक रही। स्वायम्भु मनु के काल के ऋषि मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलह, कृतु, पुलस्त्य, और वशिष्ठ हुए। राजा मनु सहित उक्त ऋषियों ने ही मानव को सभ्य, सुविधा संपन्न, श्रमसाध्य और सुसंस्कृत बनाने का कार्य किया।

बुधवार, 13 जुलाई 2011

भारत एक नजर में

पृष्‍ठभूमि

भारत विश्‍व की सबसे पुरानी सम्‍यताओं में से एक है जिसमें बहुरंगी विविधता और समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत है। इसके साथ ही यह अपने-आप को बदलते समय के साथ ढ़ालती भी आई है। आज़ादी पाने के बाद पिछले 62 वर्षों में भारत ने बहुआयामी सामाजिक और आर्थिक प्रगति की है। भारत कृषि में आत्‍मनिर्भर बन चुका है और अब दुनिया के सबसे औद्योगीकृत देशों की श्रेणी में भी इसकी गिनती की जाती है। साथ ही उन चंद देशों में भी इसका शुमार होने लगा है, जिनके कदम चांद तक पहुंच चुके हैं। भारत का क्षेत्रफल 32,87,263 वर्ग कि.मी. है, जो हिमाच्‍छादित हिमालय की ऊंचाइयों से शुरू होकर दक्षिण के विषुवतीय वर्षा वनों तक फैला हुआ है। विश्‍व का सातवां बड़ा देश होने के नाते भारत शेष एशिया से अलग दिखता है जिसकी विशेषता पर्वत और समुद्र ने तय की है और ये इसे विशिष्‍ट भौगोलिक पहचान देते हैं। उत्तर में बृहत् पर्वत श्रृंखला हिमालय से घिरा यह कर्क रेखा से आगे संकरा होता जाता है। पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर तथा दक्षिण में हिन्‍द महासागर इसकी सीमा निर्धारित करते हैं।
पूरी तरह उत्‍तरी गोलार्ध में स्थित भारत की मुख्‍यभूमि 8 डिग्री 4 मिनट और 37 डिग्री 6 मिनट उत्‍तरी अक्षांश और 68 डिग्री 7 मिनट तथा 97 डिग्री 25 मिनट पूर्वी देशान्‍तर के बीच स्थित है । उत्‍तर से दक्षिण तक इसकी अधिकतम लंबाई 3,214 कि.मी. और पूर्व से पश्चिम तक अधिकतम चौड़ाई 2,933 कि.मी. है। इसकी ज़मीनी सीमाओं की लंबाई लगभग 15,200 कि.मी. है। जबकि मुख्‍यभूमि, लक्षद्वीप और अण्‍डमान तथा निकोबार द्वीपसमूह की तटरेखा की कुल लम्‍बाई 7,516.6 कि.मी है।

भूगोल


भारत के बारे में भौगोलिक जानकारी
ब्यौरेविवरण
स्‍थानहिमालय द्वारा भारतीय पेनिसुला का मुख्‍य भूमि एशिया से अलग किया गया है। देश पूर्व में बंगाल की खाड़ी, पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण में हिन्‍द महासागर से घिरा हुआ है।
भौगोलिक समन्‍वययह पूर्ण रूप से उत्तरी गोलार्ध मे स्थित है, देश का विस्‍तार 8° 4' और 37° 6' l अक्षांश पर इक्‍वेटर के उत्तर में, और 68°7' और 97°25' देशान्‍तर पर है।
स्‍थायी मान समयजी एम टी + 05:30
क्षेत्र3.3 मिलियन वर्ग किलोमीटर
देश का टेलीफोन कोड+91
सीमाओं में स्थित देशउत्तर पश्चिम में अफगानिस्‍तान और पाकिस्‍तान, भूटान और नेपाल उत्तर में; म्‍यांमार पूरब में, और पश्चिम बंगाल के पूरब में बंगलादेश। श्रीलंका भारत से समुद्र के संकीर्ण नहर द्वारा अलग किया जाता है जो पाल्‍क स्‍ट्रेट और मनार की खाड़ी द्वारा निर्मित है।
समुद्रतट7,516.6 किलोमीटर जिसमें मुख्‍य भूमि, लक्षद्वीप, और अण्‍डमान और निकोबार द्वीपसमूह शामिल हैं।
जलवायुभारत की जलवायु को मोटे तौर पर उष्‍णकटिबंधीय मानसून के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। परन्‍तु भारत का अधिकांश उत्तरी भाग उष्‍णकटिबंधीय क्षेत्र के बाहर होने के बावजूद समग्र देश में उष्‍णकटिबंधीय जलवायु है जिसमें अपेक्षाकृत उच्‍च तापमान और सूखी सर्दी पड़ती है। चार मौसम है:
  1. सर्दी (दिसम्‍बर-फरवरी)
  2. गर्मी (मार्च-जून)
  3. दक्षिण पश्चिम मानसून का मौसम (जून-सितम्‍बर)
  4. मानसून पश्‍च मौसम (अक्‍तूबर-नवम्‍बर)
भूभागमुख्‍य भूमि में चार क्षेत्र हैं नामत: ग्रेट माउन्‍टेन जोन, गंगा और सिंधु का मैदान, रेगिस्‍तान क्षेत्र और दक्षिणी पेनिंसुला।
प्राकृतिक संसाधनकोयला, लौह अयस्‍क, मैगनीज अयस्‍क, माइका, बॉक्‍साइट, पेट्रोलियम, टाइटानियम अयस्‍क, क्रोमाइट, प्राकृतिक गैस, मैगनेसाइट, चूना पत्‍थर, अराबल लेण्‍ड, डोलोमाइट, माऊलिन, जिप्‍सम, अपादाइट, फोसफोराइट, स्‍टीटाइल, फ्लोराइट आदि।
प्राकृतिक आपदामानसूनी बाढ़, फ्लेश बाढ़, भूकम्‍प, सूखा, जमीन खिसकना।
पर्यावरण - वर्तमान मुद्देवायु प्रदूषण नियंत्रण, ऊर्जा संरक्षण, ठोस अपशिष्‍ट प्रबंधन, तेल और गैस संरक्षण, वन संरक्षण, आदि।
पर्यावरण-अंतर्राष्‍ट्रीय करारपर्यावरण और विकास पर रीयो की घोषणा, जैव सुरक्षा पर कार्टाजेना प्रोटोकॉल, जलवायु परिवर्तन पर संयुक्‍त राज्‍य ढांचागत कार्य सम्‍मेलन के लिए क्‍योटो प्रोटोकॉल, विश्‍व व्‍यापार करार, नाइट्रोजन ऑक्‍साइड के सल्‍फर उत्‍पसर्जन को कम करने सर उनके ट्रांस बाउन्‍ड्री फ्लेक्‍सेस (नोन प्रोटोकॉल) पर एल आर टी ए पी हेन्सिंकी प्रोटोकॉल, वोलाटाइल ऑरगनिक समिश्रण या उनके ट्रांस बाऊन्‍ड्री फलाक्‍सेस (वी वो सी प्रोटोकॉल) के उत्‍सर्जन से संबंधित एल आर टी ए पी के लिए जेनेवा प्रोटोकॉल।
भूगोल-टिप्‍पणीभारत दक्षिण एशिया उप महाद्वीप के बड़े भूभाग पर फैला हुआ है।


व्‍यक्ति


भारतीय नागरिकों के बारे में सूचना
ब्यौरेविवरण
(आबादी) जनसंख्‍या1 मार्च, 2001 की स्थिति के अनुसार भारत की जनसंख्‍या 1,028 मिलियन (531.1 मि लियन पुरुष और 496.4 मिलियन महिला) की।
जनसंख्‍या वृद्धि दरऔसत वार्षिक घातांकी वृद्धि दर वर्ष 1991-2001 के दौरान 1.93 प्रतिशत है।
जन्‍म दरवर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार अनुमानित मृत्‍यु दर 24.8 है।
मृत्‍यु दरवर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार अनुमानित जन्‍म दर 8.9 है।
संम्‍भावित जीवन दर63.9 वर्ष (पुरुष) 66.9 वर्ष (महिला) (सितम्‍बर 2005 की स्थिति के अनुसार)
लिंग अनुपात2001 की जनगणना के अनुसार 933
राष्‍ट्रीयताभारतीय
जातीय अनुपातसभी पांच मुख्‍य प्रकार की जातियां, ऑस्‍ट्रेलियाड, मोंगोलॉयड, यूरोपॉयड, कोकोसिन और नीग्रोइड को भारत की जनता के बीच प्रतिनिधित्‍व मिलती है।
धर्मवर्ष 2001 की जनगणना के अनुसार 1,028 मिलियन देश की कुल जनसंख्‍या में से 80.5 प्रतिशत के साथ हिन्‍दुओं की अधिकांशता है दूसरे स्‍थान पर 13.4 प्रतिशत की जनसंख्‍या वाले मुस्लिम इसके बाद ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और अन्‍य आते हैं।
भाषाएंभारतीय संविधान द्वारा 22 विभिन्न भाषाओं को मान्यता दी गई है, जिसमें हिन्दी आधिकारिक भाषा है। अनुच्छेद 343 (3) भारतीय संसद को विधि के अधीन कार्यालयीन उद्देश्यों के लिए अंग्रेजी के उपयोग को जारी रखने का अधिकार देता है।
साक्षरता2001 की जनसंख्‍या के अनंतिम परिणाम के अनुसार देश मे साक्षरता दर 64.84 प्रतिशत है। 75.26 प्रतिशत पुरुषों के लिए और महिलाओं के लिए 53.67 है।


सरकार


भारत सरकार के बारे में सूचना
ब्यौरेविवरण
देश का नामरिपब्लिक ऑफ इंडिया; भारत गणराज्‍य
सरकार का प्रकारसंसदीय सरकार पद्धति के साथ सामाजिक प्रजातांत्रिक गणराज्‍य।
राजधानीनई दिल्‍ली
प्रशासनिक प्रभाग28 राज्‍य और 7 संघ राज्‍य क्षेत्र
आजादी15 अगस्‍त 1947 (ब्रिटिश उपनिवेशीय शासन से)
संविधानभारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू हुआ।
कानून प्रणालीभारत का संविधान देश की न्‍याय प्रणाली का स्रोत है।
कार्यपालिका शाखाभारत का राष्‍ट्रपति देश का प्रधान होता है, जबकि प्रधानंत्री सरकार प्रमुख होता है और मंत्रिपरिषद् की सहायता से शासन चलाता है जो मंत्रिमंडल मंत्रालय का गठन करते हैं।
विद्यायिका शाखाभारतीय वि‍द्यायिका में लोक सभा (हाउस ऑफ दि पीपल) और राज्‍य सभी (राज्‍य परिषद्) संसद के दोनों सदनों का गठन करते हैं।
न्‍यायपालिका शाखाभारत का सर्वोच्‍च न्‍यायालय भारतीय कानून व्‍यवस्‍था का शीर्ष निकाय है इसके बाद अन्‍य उच्‍च न्‍यायालय और अधीनस्थ न्‍यायालय आते हैं।
झण्‍डे का वर्णनराष्‍ट्रीय झण्‍डा आयताकार तिरंगा है जिसमें केसरिया ऊपर है, बीच में सफेद, और बराबर भाग में नीचे गहरा हरा है। सफेद पट्टी के केन्‍द्र में गहरा नीला चक्र है जो सारनाथ में अशोक चक्र को दर्शाता है।
राष्‍ट्रीय दिवस26 जनवरी (गणतंत्र दिवस)
15 अगस्‍त (स्‍वतंत्रता दिवस)
2 अक्‍तूबर (गांधी जयंती, महात्‍मा गांधी का जन्‍म दिवस)


अर्थव्‍यवस्‍था


भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के बारे में सूचना
ब्यौरेविवरण
अर्थव्‍यवस्‍था सिंहावलोकनस्‍वतंत्रता की प्राप्ति के बाद आधी शताब्‍दी में भारत ने सभी बाधाओं को पार करते हुए आर्थिक स्थिरता का स्‍पष्‍ट स्‍तर, विभिन्‍न क्षेत्रों का शिष्‍टाचार, अदम्‍य सहयोग जैसाकि कृषि, पर्याटन, वाणिज्‍य, विद्युत, संचार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी आदि। जिन्‍होंने भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के सतंभ के रूप में कार्य किया है। आज भारत विश्‍व की छह सबसे तेजी से विकसित अर्थव्‍यवस्‍था में से एक हैं। वर्ष 2001 में शाक्ति समकक्षता खरीदने (पीपीपी) की तर्ज पर भारत का चौथा स्थान है। व्‍यवसाय और विनियामक वातावरण विकसित हो राह है और स्‍थायी सुधार की ओर आगे बढ़ रहा है।
सकल घरेलू उत्‍पादवर्ष 2005-06 की द्वितीय तिमाही में 8 प्रतिशत की वृद्धि दर दर्ज की गई।
सकल घरेलू उत्‍पाद खरीद शक्ति समकक्षताभारत चौथी सबसे बड़ी अर्थव्‍यवस्‍था है, खरीद शक्ति समकक्षता की तर्ज पर इसका जीडीपी 3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर है। यह यूएसए, चीन और जापान के बाद आता है।
जीडीपी प्रति व्‍यक्तिसितम्‍बर, 2005 की स्थिति के अनुसार देश का प्रतिव्‍यक्ति सकल घरेलू उत्‍पाद 543 अमेरिकी डॉलर था।
जीडीपी क्षेत्रकों द्वारा निर्माणसेवाएं 56 प्रतिशत कृषि 22 प्रतिशत और उद्योग 22 प्रतिशत (सितम्‍बर, 2005 की स्थिति के अनुसार
श्रमिक बलइंडिया विजन : 2020 पर समिति की रिपोर्ट के अनुसार भारत का श्रमिक बल 2002 में 375 मिलियन से अधिक पहुंच गई है।
बेरोजगारी की दर9.1% (सितम्‍बर 2005 के अनुसार)
गरीबी रेखा के नीचे जनसंख्‍या1999-2000 को 26.10%
मुद्रास्‍फीति की दरजुलाई 2005 को 4.1%
सार्वजनिक ऋण31 मार्च 2002 को कुल ऋण 72117.58 करोड़ रू है
विनियम दरविनिमय दरों के लिए प्रति दिन भारतीय रिजर्व बैंक (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं) की वेबसाइट देखें
कृषि उत्‍पादचावल, गेहूं, चाय, कपास, गन्‍ना, आलू, जूट, तिलहन, पोल्‍ट्री आदि
उद्योगइस्‍पात, वस्‍त्र, पेट्रोलियम, सीमेंट, मशीनरी, लोकोमोटिव, खाद्य प्रसंस्‍करण, भैषजिक उत्‍पाद, खनन आदि
मुद्रा (कोड)भारतीय रूपए (आईएनआर)
वित्‍तीय वर्ष1 अप्रैल से 31 मार्च


[स्रोत: पर्यावरण मंत्रालय, योजना आयोग, स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय, पत्र सूचना कार्यालय, भारत की जनगणना, विदेश मंत्रालय, केन्‍द्रीय बजट, भारतीय रिजर्व बैंक]

रविवार, 8 नवंबर 2009

भारत का इतिहास


भारत का इतिहास लगभग ५००० साल पुराना माना जाता है। सिन्धु घाटी सभ्यता, जिसका आरंभ काल लगभग ३३०० ईसापूर्व से माना जाता है। इस सभ्यता की लिपि अब तक सफलता पूर्वक पढ़ी नहीं जा सकी है। सिंधु घाटी सभ्यता पाकिस्तान और उससे सटे भारतीय प्रदेशों में फैली थी। पुरातत्त्व प्रमाणों के आधार पर १९०० ईसापूर्व के आसपास इस सभ्यता का अक्स्मात पतन हो गया। १९वी शताब्दी के पाश्चात्य विद्वानों के प्रचलित दृष्टिकोणों के अनुसार आर्यों का एक वर्ग भारतीय उप महाद्वीप की सीमाओं पर २००० ईसा पूर्व के आसपास पहुंचा और पहले पंजाब में बस गया, और यही ऋग्वेद की ऋचाओं की रचना की गई। आर्यों द्वारा उत्तर तथा मध्य भारत में एक विकसित सभ्यता का निर्माण किया गया, जिसे वैदिक सभ्यता भी कहते हैं। प्राचीन भारत के इतिहास में वैदिक सभ्यता सबसे प्रारंभिक सभ्यता है जिसका संबंध आर्यों के आगमन से है। इसका नामकरण आर्यों के प्रारम्भिक साहित्य वेदों के नाम पर किया गया है। आर्यों की भाषा संस्कृत थी और धर्म "वैदिक धर्म" या "सनातन धर्म" के नाम से प्रसिद्ध था, बाद में विदेशी आक्रांताओं द्वारा इस धर्म का नाम हिन्दू पड़ा।

 
वैदिक सभ्यता सरस्वती नदी के तटीय क्षेत्र जिसमें आधुनिक भारत के पंजाब और हरियाणा राज्य आते हैं, में विकसित हुई। आम तौर पर अधिकतर विद्वान वैदिक सभ्यता का काल २००० ईसा पूर्व से ६०० ईसा पूर्व के बीच में मानते है, परन्तु नए पुरातत्त्व उत्खननों से मिले अवशेषों में वैदिक सभ्यता से संबंधित कई अवशेष मिले है जिससे कुछ आधुनिक विद्वान यह मानने लगे है कि वैदिक सभ्यता भारत में ही शुरु हुई थी, आर्य भारतीय मूल के ही थे और ऋग्वेद का रचना काल ३००० ईसा पूर्व रहा होगा, क्योंकि आर्यो के भारत में आने का न तो कोई पुरातत्त्व उत्खननों पर अधारित प्रमाण मिला है और न ही डी एन ए अनुसन्धानों से कोई प्रमाण मिला है। हाल ही में भारतीय पुरातत्व परिषद् द्वारा की गयी सरस्वती नदी की खोज से वैदिक सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता और आर्यों के बारे में एक नया दृष्टिकोण सामने आया है। हड़प्पा सभ्यता को सिन्धु-सरस्वती सभ्यता नाम दिया है, क्योंकि हड़प्पा सभ्यता की २६०० बस्तियों मे से वर्तमान पाकिस्तान में सिन्धु तट पर मात्र २६५ बस्तियां थीं, जबकि शेष अधिकांश बस्तियां सरस्वती नदी के तट पर मिलती हैं, सरस्वती एक विशाल नदी थी। पहाड़ों को तोड़ती हुई निकलती थी और मैदानों से होती हुई समुद्र में जाकर विलीन हो जाती थी। इसका वर्णन ऋग्वेद में बार-बार आता है, यह आज से ४००० साल पूर्व भूगर्भी बदलाव की वजह से सूख गयी थी।
ईसा पूर्व ७ वीं और शुरूआती ६ वीं शताब्दि सदी में जैन और बौद्ध धर्म सम्प्रदाय लोकप्रिय हुए । अशोक (ईसापूर्व २६५-२४१) इस काल का एक महत्वपूर्ण राजा था जिसका साम्राज्य अफगानिस्तान से मणिपुर तक और तक्षशिला से कर्नाटक तक फैल गया था । पर वो सम्पूर्ण दक्षिण तक नहीं जा सका । दक्षिण में चोल सबसे शक्तिशाली निकले । संगम साहित्य की शुरुआत भी दक्षिण में इसी समय हुई । भगवान गौतम बुद्ध के जीवनकाल में, ईसा पूर्व ७ वीं और शुरूआती ६ वीं शताब्दि के दौरान सोलह बड़ी शक्तियां (महाजनपद) विद्यमान थे। अति महत्‍वपूर्ण गणराज्‍यों में कपिलवस्‍तु के शाक्‍य और वैशाली के लिच्‍छवी गणराज्‍य थे। गणराज्‍यों के अलावा राजतंत्रीय राज्‍य भी थे, जिनमें से कौशाम्‍बी (वत्‍स), मगध, कोशल, कुरु, पान्चाल, चेदि और अवन्ति महत्‍वपूर्ण थे। इन राज्‍यों का शासन ऐसे शक्तिशाली व्‍यक्तियों के पास था, जिन्‍होंने राज्‍य विस्‍तार और पड़ोसी राज्‍यों को अपने में मिलाने की नीति अपना रखी थी। तथापि गणराज्‍यात्‍मक राज्‍यों के तब भी स्‍पष्‍ट संकेत थे जब राजाओं के अधीन राज्‍यों का विस्‍तार हो रहा था। इसके बाद भारत छोटे-छोटे साम्राज्यों में बंट गया ।
आठवीं सदी में सिन्ध पर अरबी अधिकार हो गाय। यह इस्लाम का प्रवेश माना जाता है। बारहवीं सदी के अन्त तक दिल्ली की गद्दी पर तुर्क दासों का शासन आ गया जिन्होंने अगले कई सालों तक राज किया। दक्षिण में हिन्दू विजयनगर और गोलकुंडा के राज्य थे। १५५६ में विजय नगर का पतन हो गया। सन् १५२६ में मध्य एशिया से निर्वासित राजकुमार बाबर ने काबुल में पनाह ली और भारत पर आक्रमण किया। उसने मुग़ल वंश की स्थापना की जो अगले ३०० सालों तक चला। इसी समय दक्षिण-पूर्वी तट से पुर्तगाल का समुद्री व्यापार शुरु हो गया था। बाबर का पोता अकबर धार्मिक सहिष्णुता के लिए विख्यात हुआ। उसने हिन्दुओं पर से जज़िया कर हटा लिया। १६५९ में औरंग़ज़ेब ने इसे फ़िर से लागू कर दिया। औरंग़ज़ेब ने कश्मीर में तथा अन्य स्थानों पर हिन्दुओं को बलात मुसलमान बनवाया। उसी समय केन्द्रीय और दक्षिण भारत में शिवाजी के नेतृत्व में मराठे शक्तिशाली हो रहे थे। औरंगज़ेब ने दक्षिण की ओर ध्यान लगाया तो उत्तर में सिखों का उदय हो गया। औरंग़ज़ेब के मरते ही (१७०७) मुगल साम्राज्य बिखर गया। अंग्रेज़ों ने डचों, पुर्तगालियों तथा फ्रांसिसियों को भगाकर भारत पर व्यापार का अधिकार सुनिश्चित किया और १८५७ के एक विद्रोह को कुचलने के बाद सत्ता पर काबिज़ हो गए। भारत को आज़ादी १९४७ में मिली जिसमें महात्मा गाँधी के अहिंसा आधारित आंदोलन का योगदान महत्वपूर्ण था। १९४७ के बाद से भारत में गणतांत्रिक शासन लागू है। आज़ादी के समय ही भारत का विभाजन हुआ जिससे पाकिस्तान का जन्म हुआ और दोनों देशों में कश्मीर सहित अन्य मुद्दों पर तनाव बना हुआ है।


स्रोत

समान्यत विद्वान भारतीय इतिहास को एक संपन्न पर अर्धलिखित इतिहास बताते हैं पर भारतीय इतिहास के कई स्रोत है । सिंधु घाटी की लिपि, अशोक के शिलालेख, हेरोडोटस, फ़ा हियान, ह्वेन सांग, संगम साहित्य, मार्कोपोलो, संस्कृत लेखकों आदि से प्राचीन भारत का इतिहास प्राप्त होता है । मध्यकाल में अल-बेरुनी और उसके बाद दिल्ली सल्तनत के राजाओं की जीवनी भी महत्वपूर्ण है । बाबरनामा, आईन-ए-अकबरी आदि जीवनियाँ हमें उत्तर मध्यकाल के बारे में बताती हैं ।
भारत में मानव जीवन का प्राचीनतम प्रमाण १००,००० से ८०,००० वर्ष पूर्व का है।। पाषाण युग (भीमबेटका, मध्य प्रदेश) के चट्टानों पर चित्रों का कालक्रम ४०,००० ई पू से ९००० ई पू माना जाता है। प्रथम स्थायी बस्तियां ने ९००० वर्ष पूर्व स्वरुप लिया । उत्तर पश्चिम में सिन्धु घाटी सभ्यता ७००० ई पू विकसित हुई , जो २६वीं शताब्दी ईसा पूर्व और २०वीं शताब्दी ईसा पूर्व के मध्य अपने चरम पर थी | वैदिक सभ्यता का कालक्रम भी ज्योतिष के विश्लेषण से ४००० ई पू तक जाता है।

राष्ट्र के रुप में उदय

भारत को एक सनातन राष्ट्र माना जाता है क्योंकि यह मानव सभ्यता का पहला राष्ट्र था। श्रीमद्भागवत के पञ्चम स्कन्ध में भारत राष्ट्र की स्थापना का वर्णन आता है।
भारतीय दर्शन के अनुसार सृष्टि उत्पत्ति के पश्चात ब्रह्मा के मानस पुत्र स्वायंभुव मनु ने व्यवस्था सम्भाली। इनके दो पुत्र, प्रियव्रत और उत्तानपाद थे। उत्तानपाद भक्त ध्रुव के पिता थे। इन्हीं प्रियव्रत के दस पुत्र थे। तीन पुत्र बाल्यकाल से ही विरक्त थे। इस कारण प्रियव्रत ने पृथ्वी को सात भागों में विभक्त कर एक-एक भाग प्रत्येक पुत्र को सौंप दिया। इन्हीं में से एक थे आग्नीध्र जिन्हें जम्बूद्वीप का शासन कार्य सौंपा गया। वृद्धावस्था में आग्नीध्र ने अपने नौ पुत्रों को जम्बूद्वीप के विभिन्न नौ स्थानों का शासन दायित्व सौंपा। इन नौ पुत्रों में सबसे बड़े थे नाभि जिन्हें हिमवर्ष का भू-भाग मिला। इन्होंने हिमवर्ष को स्वयं के नाम अजनाभ से जोड़कर अजनाभवर्ष प्रचारित किया। यह हिमवर्ष या अजनाभवर्ष ही प्राचीन भारत देश था। राजा नाभि के पुत्र थे ऋषभ। ऋषभदेव के सौ पुत्रों में भरत ज्येष्ठ एवं सबसे गुणवान थे। ऋषभदेव ने वानप्रस्थ लेने पर उन्हें राजपाट सौंप दिया। पहले भारतवर्ष का नाम ॠषभदेव के पिता नाभिराज के नाम पर अजनाभवर्ष प्रसिद्ध था। भरत के नाम से ही लोग अजनाभखण्ड को भारतवर्ष कहने लगे।

प्राचीन भारत

१००० ई पू के पश्चात १६ महाजनपद उत्तर भारत में मिलते हैं। ५०० ईसवी पूर्व के बाद, कई स्वतंत्र राज्य बन गए| उत्तर में मौर्य वंश, जिसमें चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक सम्मिलित थे, ने भारत के सांस्कृतिक पटल पर उल्लेखनीय छाप छोडी | १८० ईसवी के आरम्भ से, मध्य एशिया से कई आक्रमण हुए, जिनके परिणामस्वरूप उत्तरी भारतीय उपमहाद्वीप में इंडो-ग्रीक, इंडो-स्किथिअन, इंडो-पार्थियन और अंततः कुषाण राजवंश स्थापित हुए | तीसरी शताब्दी के आगे का समय जब भारत पर गुप्त वंश का शासन था, भारत का "स्वर्णिम काल" कहलाया| दक्षिण भारत में भिन्न-भिन्न समयकाल में कई राजवंश चालुक्य, चेर, चोल, कदम्ब, पल्लव तथा पांड्य चले | विज्ञान, कला, साहित्य, गणित, खगोल शास्त्र, प्राचीन प्रौद्योगिकी, धर्म, तथा दर्शन इन्हीं राजाओं के शासनकाल में फ़ले-फ़ूले |

मध्यकालीन भारत

12वीं शताब्दी के प्रारंभ में, भारत पर इस्लामी आक्रमणों के पश्चात, उत्तरी व केन्द्रीय भारत का अधिकांश भाग दिल्ली सल्तनत के शासनाधीन हो गया; और बाद में, अधिकांश उपमहाद्वीप मुगल वंश के अधीन। दक्षिण भारत में विजयनगर साम्राज्य शक्तिशाली निकला । हालांकि, विशेषतः तुलनात्मक रूप से, संरक्षित दक्षिण में, अनेक राज्य शेष रहे अथवा अस्तित्व में आये ।
17वीं शताब्दी के मध्यकाल में पुर्तगाल, डच, फ्रांस, ब्रिटेन सहित अनेकों युरोपीय देशों, जो कि भारत से व्यापार करने के इच्छुक थे, उन्होनें देश में स्थापित शासित प्रदेश, जो कि आपस में युद्ध करने में व्यस्त थे, का लाभ प्राप्त किया। अंग्रेज दुसरे देशों से व्यापार के इच्छुक लोगों को रोकने में सफल रहे और १८४० ई तक लगभग संपूर्ण देश पर शासन करने में सफल हुए। १८५७ ई में ब्रिटिश इस्ट इंडिया कम्पनी के विरुद्ध असफल विद्रोह, जो कि भारतीय स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम से जाना जाता है, के बाद भारत का अधिकांश भाग सीधे अंग्रेजी शासन के प्रशासनिक नियंत्रण में आ गया।


आधुनिक भारत

बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में अंग्रेजी शासन से स्वतंत्रता प्राप्ति के लिये संघर्ष चला। इस संघर्ष के परिणामस्वरूप 15 अगस्त, 1947 ई को सफल हुआ जब भारत ने अंग्रेजी शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की, मगर देश को विभाजन कर दिया गया। तदुपरान्त 26 जनवरी, 1950 ई को भारत एक गणराज्य बना।