नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

बुधवार, 24 जुलाई 2019

अंतिम छोर का आदमी


बनानेवाला कोई भी रहा हो
मगर हर सूची में रहा उसका नाम
हमेशा से ही अंतिम छोर पर
जहाँ तक पहुँचते-पहुँचते
ख़त्म हो जाती थीं तमाम वस्तुएं
योजनायें और उनका बजट
उसके नाम पर चाहे चलते रहे
सैकड़ों, हजारों एनजीओ या संस्थाएं
जिन्हें मिलते रहे अनुदान और  
सहायता राशियां लाखों, करोड़ों में
मगर पहुँच नहीं पाया उसका हिस्सा
उस तक ही, तमाम कोशिशों के बाद भी...
         (कृष्ण धर शर्मा, 10.01.2019)

मानवता की समस्याएं


पढाई के शुरुआती दिनों में
जबकि पढने-लिखने की तमाम
विषयवस्तु होती है लगभग
मजेदार, सरल व् आकर्षक
ठीक वैसे ही तो जैसे
बलि के बकरे को बलि से पहले
नहलाया-धुलाया जाता है
खिलाया-पिलाया जाता है
वयस्कता की तरफ बढ़ते हुए
किशोरवय मनःस्थिति पर
शुरू होती हैं कोशिशें
वैचारिकता और दुनियादारी की
तमाम परतें चढाने की
एक साफ़-सुथरे और निष्कपट मन को
चतुर और चालाक बनाने की
कोशिशें होती हैं यह भी समझाने की
कि सत्य, अहिंसा और शांति की राह
हम साधारण लोगों के लिए नहीं है
वह तो बड़े-बड़े महापुरुषों के लिए है
हमारे लिए तो बस यही लक्ष्य है
कि पढ़-लिखकर बन सकें
एक कुशल और कठोर प्रशासक
या एक सफल वैज्ञानिक
जो बनवा सके तमाम तरह के
आधुनिक व् खतरनाक हथियार
बम, बारूद, तोपें और मिसाइल
ताकि हम जीत सकें दुनिया को
और हो सकें अमर, अजेय!
काश! हमें पढाया जाता
कि कैसे जीतना है दिल किसी दुश्मन का
कैसे सुलझाना है गणित दुश्मनी का
ताकि हम और हमारे तथाकथित दुश्मन
साथ मिलकर यह सोच सकें कि
कैसे सुलझानी है मानवता की समस्याएं
कैसे देनी है अपनी अगली पीढ़ी को
एक शांत और बेहतर दुनिया....
         (कृष्ण धर शर्मा, 04.10.2018)

विकल्प!


हमें दो विकल्प दिए गए
पहला शांति और आनंद भरा जीवन
जिसमें हम जी सकते थे औरों के साथ
हँसते-मुस्कुराते सुख-दुःख बांटते
एक खुशहाल जीवन
जिसमें होता आपसी भाईचारा
सौहार्द्र और प्रेम-विश्वास
दूसरा औरों के काल्पनिक डर से
अपनी सुरक्षा के लिए
स्वयं हथियारबंद हो जाना
हर वक्त दूसरों से
खतरा महसूसते हुए
स्वयं को और अधिक
ताकतवर बनाना
इसी कोशिश में एक डरावने
और अविश्वासी माहौल में ही
जीवन गुजार देना
हालाँकि हमें चुनना तो था
पहला ही विकल्प
मगर शंकाओं और कुटिलताओं
भरे समय ने
मजबूर कर दिया हमें
दूसरा विकल्प चुनने को
हैरत भी नहीं हुई हमें
जब पहला विकल्प
किसी ने नहीं चुना...
       (कृष्ण धर शर्मा, 04.10.2018)

ओ कसाब!



ओ कसाब!
क्या कांपे नही थे तुम्हारे हाथ!
जब होठों को भींचकर
अपनी आँखों से
बरसा रहे थे तुम नफ़रत
और बन्दूक से गोलियां
सच बताना कसाब!
क्या चल रहा था तुम्हारे मन में
किसके लिए थी
तुम्हारी बेशुमार नफ़रत!
क्या सचमुच उन्हीं के लिए
जिनपर बरसा रहे थे तुम
अंधाधुंध गोलियां...
बिना कुछ सोचे बिना कुछ समझे
कि मरने वाले ने क्या बिगाड़ा था
तुम्हारा या तुम्हारे आकाओं का!
क्या तुम्हारा दिल या दिमाग
तुम्हारे बस में ही था
या फिर कोई और ही संचालित
कर रहा था तुम्हें!
क्या बेगुनाहों को मारते हुए
तुम समझ नहीं पाए अपना निशाना
क्या तुम ढूंढ नहीं पा रहे थे
अपने असली दुश्मन
क्या इसी हताशा में तुम पर
छा रहा था पागलपन
और तुम अपने हाथों में थामे मशीनगन
खुद बन चुके थे मौत की मशीन
ठीक उसी तरह से जैसे कि हजारों जिहादी
जो समझ नहीं पाते जिहाद का मतलब
और बनाते रहते हैं
सारी दुनिया को जहन्नुम!
           (कृष्ण धर शर्मा, 15.09.2016)

चीन से क्यों पिछड़ गए हम?

वर्ष 1980 में चीन के नागरिक की औसत आय भारत के नागरिक की तुलना में 1.2 गुना थी। 2018 में यह 4.4 गुना हो गई है। जाहिर है कि हमारी तुलना में चीन बहुत आगे निकल गया है वर्तमान समय में परिस्थिति में मौलिक अंतर आ गया है। अब विकसित देशों के पास पर्सनल कंप्यूटर जैसे नए आविष्कार नहीं हो रहे हैं जिन्हें बेच कर वे विश्व से भारी आय अर्जित कर लें। बल्कि विदेशी निवेश के माध्यम से विकसित देशों ने अपनी हाई टेक तकनीकों का निर्यात कर दिया है और आज चीन, दक्षिण कोरिया और वियतनाम मंग हाई टेक माल की मैन्युफैक्चरिंग हो रही है। विकसित देशों में माल की मांग नहीं है जिसकी पूर्ति के लिए वे आज भारत जैसे विकाशील देशों में निवेश करके मैन्युफैक्चरिंग करें। 

वर्ष 1980 में चीन के नागरिक की औसत आय भारत के नागरिक की तुलना में 1.2 गुना थी। 2018 में यह 4.4 गुना हो गई है। जाहिर है कि हमारी तुलना में चीन बहुत आगे निकल गया है।  चीन ने 80 के दशक में आर्थिक सुधार लागू किये थे। उन्होंने मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दिया था। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को न्योता दिया था कि वे चीन में आकर फैक्ट्रियां लगाएं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों को श्रम एवं पर्यावरण कानून में ढील दी जिससे उन्हें निवेश करने में परेशानी न हो। चीन के सस्ते श्रम का लाभ उठाने के लिए भारी संख्या में बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने चीन में निवेश किया था। उन्होंने चीन में फैक्ट्रियां लगाईं जिससे चीन में रोजगार बने और देश की आय भी बढ़ी।  लेकिन वह 1980 का दशक था। आज 2020 आने को है। आज उस नीति को हम अपनाकर सफल नहीं हो सकते हैं क्योंकि परिस्थितियां बदल गईं हैं। 

80 और 90 के दशक में विकसित देशों की अर्थव्यवस्थायें तीव्र गति से आगे बढ़ रही थीं। इन्टरनेट और पर्सनल कंप्यूटर जैसे नए अविष्कार हो रहे थे और इन नए उत्पादों को विश्व में महंगा बेच ये देश भारी आय अर्जित कर रहे थे। इन्हीं हाई-टेक उत्पादों के निर्यात में विकसित देशों में रोजगार भी उत्पन्न भी हो रहे थे।  उस परिस्थिति में उनके लिए यह लाभप्रद था कि मैन्युफैक्चरिंग के 'गंदे' कार्य को वे चीन को निर्यात कर दें, और स्वयं हाई टेक उत्पादों की मैन्युफैक्चरिंग एवं हाई टेक सेवाओं को प्रदान करने में अपने देश में रोजगार बनाए। उस समय विकसित देशों और चीन—दोनों के लिए यह लाभ का सौदा था। विकसित देशों में नई तकनीकों से आय और रोजगार बढ़ रहे थे और चीन से उन्हें सस्ते आयात भी मिल रहे थे। दूसरी तरफ चीन को विदेशी निवेश मिल रहा था, रोजगार बन रहे थे और आय भी बढ़ रही थी।  

वर्तमान समय में परिस्थिति में मौलिक अंतर आ गया है। अब विकसित देशों के पास पर्सनल कंप्यूटर जैसे नए आविष्कार नहीं हो रहे हैं जिन्हें बेच कर वे विश्व से भारी आय अर्जित कर लें। बल्कि विदेशी निवेश के माध्यम से विकसित देशों ने अपनी हाई टेक तकनीकों का निर्यात कर दिया है और आज चीन, दक्षिण कोरिया और वियतनाम मंग हाई टेक माल की मैन्युफैक्चरिंग हो रही है। विकसित देशों में माल की मांग नहीं है जिसकी पूर्ति के लिए वे आज भारत जैसे विकाशील देशों में निवेश करके मैन्युफैक्चरिंग करें। आज चीन की रणनीति लागू न हो पाने का दूसरा कारण रोबोट का आविष्कार है। वर्तमान समय में मैन्युफैक्चरिंग में रोबोट का भारी उपयोग होने लगा है। रोबोट के उपयोग से श्रम की मांग कम हो गई है और विकासशील देशों में उपलब्ध सस्ते श्रम का आकर्षण कम हो गया है। जैसे पहले कार बनाने की फैक्ट्री में यदि पांच हजार श्रमिक लगते थे तो आज उसमे चार हजार का कार्य रोबोट द्वारा हो रहा है और केवल एक हजार कर्मियों की जरूरत है। कर्मियों की संख्या कम हो जाने से चीन में उपलब्ध सस्ते श्रम का आकर्षण कम हो गया है। ब

हुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए आज चीन में उत्पादन करके उस माल का अमेरिका को निर्यात करने की तुलना में रोबोट के माध्यम से अमेरिका तथा यूरोप में ही उस माल की मैन्युफैक्चरिंग कर लेना ज्यादा लाभप्रद हो गया है। इन दोनों के कारणों चीन द्वारा 80 के दशक में लागू की गई आर्थिक विकास नीति को आज हम लागू नहीं कर पायेंगे। यही कारण है कि पिछले 5 सालों में मेक इन इंडिया सफल नहीं हुआ है और वर्तमान बजट में भी वित्त मंत्री द्वारा बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आने का आह्वान करना भी सफल होता नहीं दिखता है।  

जिस प्रकार वर्षा के समय उपयुक्त नीति को सूखे के समय लागू नहीं किया जा सकता है उसी प्रकार 80 की मैन्युफैक्चरिंग की रणनीति को आज लागू नहीं किया जा सकता हैं।  इस परिस्थिति में हमें सेवा क्षेत्र को बढ़ावा देना चाहिए। बताते चलें कि अर्थव्यवस्था के तीन मुख्य क्षेत्र होते है-कृषि, मैन्युफैक्चरिंग एवं सेवा। आज अमेरिका जैसे विकसित देशों की अर्थव्यवस्थाओं में कृषि का हिस्सा मात्र एक प्रतिशत, मैन्युफैक्चरिंग का लगभग 9 प्रतिशत और सेवा क्षेत्र का 90 प्रतिशत हो गया है। सेवा क्षेत्र में सॉफ्टवेयर, सिनेमा, संगीत, पर्यटन आदि सेवाएं आती हैं। इससे पता लगता है कि अर्थव्यवस्था जैसे जैसे बढ़ती है उसमें सेवा क्षेत्र का हिस्सा बढ़ता जाता है। अत: सिकुड़ते हुए मैन्युफैक्चरिंग को पकड़ने के स्थान पर सूर्योदय होते सेवाक्षेत्र को पकड़ना चाहिए। सेवाक्षेत्र हमारे लिए विशेषकर उपयुक्त इसलिए भी है कि सेवा क्षेत्र में बिजली की जरूरत कम होती है। 

मैन्युफैक्चरिंग में एक रुपया जीडीपी उत्पन्न करने में जितनी बिजली की जरूरत होती है तुलना में सेवाक्षेत्र में वही एक रुपया जीडीपी उत्पन्न करने में उसकी मात्र दस प्रतिशत बिजली की जरूरत होती है। इसलिए पर्यावरण की दृष्टि से भी सेवाक्षेत्र हमारे लिए उपयुक्त है। अपने देश में अंग्रेजी भाषा बोलने वाले भी उपलब्ध हैं इसलिए हमें सूर्योदय सेवाक्षेत्र को बढ़ावा देना चाहिए और पर्यटन, विदेशी भाषा, सिनेमा इत्यादि क्षेत्रों के आधार पर अर्थव्यवस्था को बढ़ाना चाहिए।  

सेवा क्षेत्र के विकास में मुख्य समस्या हमारी शिक्षा व्यवस्था है। विश्व के इनोवेशन अथवा सृजनात्मकता सूचकांक में चीन की रैंक 25 है जबकि भारत की 66 है। नए माल अथवा सेवाओं का उत्पादन करने में हम बहुत पीछे हैं।  इसका मुख्य कारण यह है कि अपने देश में विश्वविद्यालयों की परिस्थिति ठीक नहीं है। अधिकतर शिक्षक रिसर्च नहीं करते हैं। उन्हें रिसर्च करने का कोई आकर्षण नहीं है क्योंकि उनके वेतन सुनिश्चित रहते हैं। ऊपर से राजनीतिक नियुक्तियां की जाती हैं जो कि कुशल शिक्षकों को आगे नहीं आने देते हैं। इसलिए यदि हमारी अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना है तो सरकारी विश्वविद्यालयों का बाहरी मूल्यांकन कराना चाहिए और उन्हें दिए जाने वाले अनुदान को इस मूल्यांकन के आधार पर देना चाहिए। देश के सबसे कमजोर 25 प्रतिशत विश्वविद्यालयों को दी जाने वाली रकम में हर वर्ष 10 से 20 प्रतिशत की कटौती करनी चाहिए और अच्छा काम करने वाले विश्वविद्यालयों में उतनी ही वृद्धि करनी चाहिए। ऐसा करने से हमारे विश्वविद्यालयों में अध्यापकों की जवाबदेही बनेगी, वे बच्चों को पढ़ाएंगे और हमारा देश सेवाक्षेत्र में उपस्थित अवसरों को हासिल करने में सफल हो सकता है।  

डॉ. भरत झुनझुनवाला  (साभार-देशबन्धु)

रविवार, 2 जून 2019

एवरेस्ट पर ट्रैफिक जाम

 29 मई 1953 को सुबह साढ़े 11 बजे जब सर एडमंड हिलेरी और शेरपा तेनजिंग नोर्गे ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी एवरेस्ट पर कदम रखा था, तो इंसान के हौसले, दृढ़ इच्छाशक्ति और अदम्य जिजीविषा की एक नई इबारत लिखी गई थी। 
जो अब तक अबूझ है, उसे जानने की लालसा लेकर इंसान समुद्र की अतल गहराइयों तक भी पहुंचा है, अंतरिक्ष की असीम ऊंचाइयों को छूने निकला और अजेय माने जाने वाली पर्वत चोटियों पर विजय की पताका लहराई।   इन साहसी-दुस्साहसी कारनामों से इंसान ने अपनी क्षमताओं को तो जान लिया, लेकिन प्रकृति के मर्म को समझ नहीं पाया। यही कारण है कि मोती और रत्न सहेजने वाले सागर में कचरा जमा हो रहा है और उसका खामियाजा जीव-जंतुओं को भुगतना पड़ रहा है। अं
तरिक्ष भी प्रदूषण की चपेट में आ रहा है और अब एवरेस्ट से भी ऐसी ही चिंता उपजाने वाली खबर आई है।  इस साल अब तक 11 पर्वतारोहियों की मौत इस 8, 848 मीटर ऊंची चोटी पर चढ़ने के दौरान हो चुकी है। इसका कारण अत्यधिक ठंड, और आक्सीजन की कमी तो है ही, नौसिखिए पर्वतारोहियों का चढ़ना भी एक बड़ी समस्या है।   एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे से बहुत से पर्वतारोहियों ने प्रेरणा तो ली, लेकिन उनसे प्रकृति की उदात्तता के आगे समर्पण वाली भावना शायद नहीं ली गई। अब सब को एवरेस्ट पर झंडे गाड़ना है, वहां पहुंचकर सेल्फी लेना है कि देखो हम दुनिया में सबसे ऊंचे हो गए हैं। वैसे एवरेस्ट पर सेल्फी के शौकीनों को यह याद रखना चाहिए कि एडमंड हिलेरी ने यह कारनामा करने के बाद बर्फ काटने वाली कुल्हाड़ी के साथ तेनजिंग नोर्गे की फोटो ली, अपनी नहीं खिंचवाई।  तेनजिंग ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि हिलेरी ने अपनी फोटो खिंचवाने से मना कर दिया था। 
बहरहाल, ऊंचा होने का यह शौक ही अब जानलेवा साबित हो रहा है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ कि एवरेस्ट पर ट्रैफिक जाम जैसी स्थिति बनी हो। लेकिन अब पर्वतारोहियों की बढ़ती भीड़ के कारण चढ़ने और उतरने में अधिक वक्त लग रहा है, जिस कारण दुर्घटनाएं हो रही हैं। हाल ही में एक पर्वतारोही और एडवेंचर फिल्ममेकर एलिया साइक्ले ने इंस्टाग्राम पर डाली एक पोस्ट में कहा कि- मौत, लाशें, अराजकता, रास्तों पर लाशें और कैंप में और लाशें।  जिन लोगों को मैंने वापस भेजने की कोशिश की थी, उनकी भी यहां आते-आते मौत हो गई। लोगों को घसीटा जा रहा है। 
कुछ ऐसा ही अनुभव एक अन्य पर्वतारोही अमीषा चौहान का था, जिन्हें एवरेस्ट से उतरने के दौरान भीड़ के कारण लगभग 20 मिनट इंतजार करना पड़ा।   यह सब अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है, लेकिन यही कड़वी सच्चाई है। और अब लोगों की जान के साथ-साथ पर्यावरण का नुकसान न हो इसके लिए पहल करनी होगी। हाल ही में नेपाल ने एवरेस्ट पर सफाई अभियान चलाया और दशकों से इकठ्ठा हुए लगभग 11 टन कचरे को वहां से हटाया। इस पूरे काम में एक महीने से अधिक का वक्त लगा।  अनुमान लगाया जा सकता है कि एवरेस्ट पर चढ़ने की ललक कितनी हानिकारक साबित हो रही है। वैसे एवरेस्ट नेपाल के लिए आय का एक बड़ा जरिया है। इसके आरोहण के लिए नेपाल की ओर से जारी किए जाने वाले परमिट की कीमत करीब 11 हजार डॉलर है। इससे नेपाल के पास अच्छी खासी विदेशी मुद्रा आती है। इसलिए नेपाल फिलहाल पर्वतारोहियों की संख्या सीमित रखने का कोई विचार नहीं कर रहा है। लेकिन देर-अबेर इस संकट के बारे में सोचना ही होगा।       साभार- देशबंधु

मंगलवार, 19 मार्च 2019

हिन्दी साहित्य की भूमिका

आज से लगभग हजार वर्ष पहले हिंदी साहित्य बनना शुरू हुआ था।  इन हजार वर्षों में भारतवर्ष का हिंदी भाषी जन समुदाय क्या सोच-समझ रहा था, इस बात की जानकारी का एकमात्र साधन हिंदी साहित्य ही है। कम से कम भारतवर्ष के आधे हिस्से की सहस्रवर्ष-व्यापी आशा-आकांक्षाओं का मूर्तिमान् प्रतीक यह हिंदी साहित्य अपने आपमें एक ऐसी शक्तिशाली वस्तु है कि उसकी उपेक्षा भारतीय विचार धारा के समझने में घातक सिद्ध होगी। पर नाना कारणों से सचमुच ही यह उपेक्षा होती चली आई है।  प्रधान कारण यह है कि इस साहित्य के जन्म के साथ-ही-साथ भारतीय इतिहास में एक अभूतपूर्व राजनीतिक और धार्मिक घटना हो गई।  भारतवर्ष के उत्तर-पश्चिम सीमांत से विजयदृत्त इस्लाम का प्रवेश हुआ, जो देखते-देखते इस महादेश के इस कोने से उस कोने तक फैल गया। इस्लाम जैसे सुसंगठित धार्मिक और सामाजिक मतवाद से इस देश का कभी पाला नहीं पड़ा था, इसीलिए नवागत समाज की राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक गतिविधि इस देश के ऐतिहासिक का सारा ध्यान खींच लेती है। यह बात स्वाभाविक तो है, पर उचित नहीं है। 
दुर्भाग्यवश हिंदी साहित्य के अध्ययन और लोक चक्षु गोचर करने का भार जिन विद्वानों ने अपने ऊपर लिया है, वे भी हिंदी साहित्य का संबंध हिंदू जाति के साथ ही अधिक बतलाते हैं और इस प्रकार अनजान आदमी को दो ढंग से सोचने का मौका देते हैं: एक यह कि हिंदी साहित्य एक हतदर्प पराजित जाति की संपत्ति है, इसलिए उसका महत्त्व उस जाति के राजनीतिक उत्थान-पतन के साथ अंगांगि भाव से संबद्ध है, और दूसरा यह कि ऐसा न भी हो, तो भी वह एक निरंतर पतनशील जाति की चिंताओं का मूर्त प्रतीक है, जो अपने आपमें कोई विशेष महत्त्व नहीं रखता। मैं इन दोनों बातों का प्रतिवाद करता हूँ और अगर ये बातें मान भी ली जाएँ तो भी यह कहने का साहस करता हूँ कि फिर भी इस साहित्य का अध्ययन करना नितांत आवश्यक है, क्योंकि दस सौ वर्षों तक दस करोड़ कुचले हुए मनुष्यों की बात भी मानवता की प्रगति के अनुसंधान के लिए केवल अनुपेक्षणीय ही नहीं, बल्कि अवश्य ज्ञातव्य वस्तु है। ऐसा करते मैं इस्लाम के महत्त्व को भूल नहीं रहा हूँ, लेकिन जोर देकर कहना चाहता हूँ कि अगर इस्लाम नहीं आया होता तो भी इस साहित्य का बारह आना वैसा ही होता जैसा आज है।
      अपनी बात को ठीक-ठीक समझाने के लिए मुझे और भी हजार वर्ष पीछे लौट जाना पड़ेगा। आज के हिंद समाज में आज से दो हजार वर्ष पहले से लेकर हजार वर्ष पहले तक के हजार वर्षों में ग्रंथ लिखे गए, उनकी प्रामाणिकता में बाद में चलकर कभी कोई संदेह नहीं किया गया और उन्हें ही यथार्थ में हिन्दू धर्म का मेरुदंड कह सकते हैं। मनु और ज्ञातवल्क्य की स्मृतियाँ सूर्यादि पाँचों सिद्धांत ग्रंथ, चरक और सुश्रुत की संहिताएँ न्यायादि छहों दर्शन सूत्र प्रसिद्ध महाभाष्य आदि कोई भी प्रामाणिक माना जानेवाला ग्रंथ क्यों न हो, उसकी रचना संकलन या रूप प्राप्ति सन् ईस्वी के दो ढाई सौ वर्ष इधर उधर की ही है। उसके बाद की चार पाँच शताब्दियों तक इन निर्दिष्ट आदर्श का बहुत प्रचार होता रहा और इसी प्रचार काल में संस्कृत साहित्य के अनमोल रत्नों का प्रादुर्भाव हुआ। अश्वघोष, कालिदास, भद्रबाहु, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त, कुमारिल, शंकर, दिड्नाग, नागार्जुन आदि बड़े-बड़े आचार्यों ने इन शताब्दियों में उत्पन्न होकर भारतीय विचारधारा को अभिनव समृद्धि से समृद्ध किया। वेद अब भी आदर के साथ मान्य समझे जाते थे, पर साधारण जनता में उनकी महिमा नाम गोत्र में ही प्रतिष्ठित रही। 
अगर आप भारतवर्ष के मानचित्र में उस अंश को देखें, जिसकी साहित्यिक भाषा हिंदी मानी जाती है तो आप देखेंगे कि यह विशाल क्षेत्र एक तरफ तो उत्तर में भारतीय सीमा को छुए हुए हैं, जहाँ से आगे बढ़ने पर एकदम भिन्न जाति की भाषा और संस्कृति से संबंध होता है और दूसरी तरफ पूर्व की ओर भी भारतवर्ष की पूर्व सीमाओं को बनाने वाले प्रदेशों से सटा हुआ है। पश्चिम और दक्षिण में भी वह एक ही संस्कृत पर भिन्न प्रकृति के प्रदेशों से सटा हुआ है। भारतवर्ष का ऐसा कोई भी प्रांत नहीं है, जो इस प्रकार चौमुखी प्रकृति और संस्कृति से घिरा हुआ हो। इस घिराव के कारण उसे निरंतर भिन्न- भिन्न संस्कृतियों और भिन्न-भिन्न विचारों के संघर्ष में आना पड़ा है। पर जो बात और भी ध्यानपूर्वक लक्ष्य करने की है वह यह है कि यह ‘मध्यदेश’ वैदिक युग से लेकर आज तक अतिशय रक्षणशीलता और पवित्र्याभिमानी रहा है। एक तरफ तो भिन्न विचारों और संस्कृतियों के निरंतर संघर्ष ने और दूसरी तरफ रक्षणशीलता और श्रेष्ठत्त्वाभिमान ने इसकी प्रकृति में इन दो बातों को बद्धमूल कर दिया है-एक अपने प्राचीन आचारों से चिपटे रहना पर विचार में निरंतर परिवर्तन होते रहना, और दूसरे धर्मों, मतों, संप्रदायों और संस्कृतियों के प्रति सहनशील होना। अब देखा जाए कि हिंदी साहित्य के जन्म होने के पहले कौन-कौन से आचार-विचार या अन्य उपादन इस प्रदेश के समाज को रूप दे रहे थे।   
 इस बात के निश्चित प्रमाण हैं कि सन् ईसवी की सातवीं शताब्दी में युक्तप्रांत, बिहार, बंगाल, आसाम, और नेपाल में बौद्ध धर्म काफी प्रबल था। यह उन दिनों की बात है, जब इस्लाम घर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद का जन्म ही हुआ था। बौद्ध धर्म के प्रभावशाली होने का सबूत चीनी यात्री हुएंत्सांग के यात्रा-विवरण में मिलता है। यह भी निश्चित है कि वह बौद्ध धर्म के महायान संप्रदाय से विशेष रूप से प्रभावित था, क्योंकि उत्तरी बौद्ध धर्म यदि हीनयानीय शाखा का भी था तो भी महायान शाखा के प्रभाव से अछूता नहीं था। सातवीं शताब्दी के बाद उस धर्म का क्या हुआ, इसका ठीक विवरण हमें नहीं मिलता, पर वह एकाएक गुम तो नहीं हुआ होगा। उस युग के दर्शनग्रंथों काव्यों, नाटकों आदि से स्पष्ट ही जान पड़ता है कि ईसा की पहली सहस्राब्दी में वह इन प्रांतों में एकदम लुप्त नहीं हो गया था।
  इधर हाल में जो सब प्रमाण संगृहीत किए जा सके हैं, उनसे इतना निःसंकोच कहा जा सकता है कि मुसलमानी आक्रमण के आरंभिक युगों में भारतवर्ष से इस धर्म की एकदम समाप्ति नहीं हो गई थी। हम आगे चलकर देखेंगे कि इन प्रदेशों के धर्ममत, विचारधारा और साहित्य पर इस धर्म ने जो प्रभाव छोड़ा है, वह अमिट है।   लेकिन जब मैं ऐसा कहता हूँ तो प्रभाव शब्द का जो अर्थ समझता हूँ उसको ध्यान में रखना चाहिए। मैं यही नहीं कहता कि हिंदी भाषी प्रदेश का जन समुदाय उन दिनों बौद्ध था। वस्तुतः सारा समाज किसी भी दिन बौद्ध था या नहीं, यह प्रश्न काफी विवादास्पद है। कारण यह है कि बौद्ध धर्म संन्यासियों का धर्म था, लोक के सामाजिक जीवन पर उसका प्रभुत्व कम ही था। जिस प्रकार आज के नागा संप्रदाय को देखकर कोई विदेशी यात्री कह सकता है कि भारतवर्ष में नागा संप्रदाय खूब प्रबल है, परंतु यह बात सच होते हुए भी इसकी सचाई के साथ सामाजिक जीवन का गहरा संबंध नहीं है। इसी प्रकार चीनी यात्री के यात्रा विवरण का भी विचार होना चाहिए।
(हजारी प्रसाद द्विवेदी)

आर्थिक आंकड़ों में सरकारी हस्तक्षेप का आरोप

 अनौपचारिक चर्चाओं में वाणिज्य एवं मैनेजमेंट के वरिष्ठ शिक्षणों की 108 अर्थशास्त्रियों द्वारा उनके बयान को मीडिया पर सार्वजनिक किए जाने की आलोचना करने के बाद ही चर्चा की दिशा शेयर बाजार में आए उछाल की ओर मुड़ गई। इन प्राध्यापकों का कहना था कि अर्थव्यवस्था का मजबूती और विकास की सही दिशा का सूचक संवेदी सूचकांक सेंसेक्स है। उनका कहना था कि जिस तरह से मार्च महीने में शेयर बाजार में उछाल आया है, वह देश विदेश के करोड़ों छोटे-बड़े निवेशकों भारतीय कंपनियों  के शेयरों में भारी मात्रा में निवेश का परिणाम है। इन प्राध्यापकों का कहना था कि शेयर बाजार में पैसा लगाना जुआ या सट्टा नहीं है। इसके लिए अर्थव्यवस्था की मजबूती और राजनैतिक स्थिरता की वर्तमान स्थिति एवं भावी संभावनाओं को अध्ययन की जरूरत होती है। 
आर्थिक समाचार पत्रों में विगत 15 व 16 मार्च को दो समाचार प्रमुखता से छाए रहे। पहला, देश-विदेश के अर्थशास्त्रियों द्वारा आर्थिक आंकड़ों में मोदी सरकार द्वारा हस्तक्षेप को लेकर चिंता व्यक्त करने संबंधित समाचार था। दूसरा, भारत के शेयर बाजारों में पूरे सप्ताह निवेशकों द्वारा जोरदार की गई खरीदारी से आए उछाल से निवेशकों द्वारा कई गुना मुनाफा कमाए जाने की चर्चा रही। पहला समाचार,  भारतीय अर्थशास्त्रियों एवं छात्रों के बीच अधिक चर्चा का विषय रहा। देश-विदेश के जाने माने 108 अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों द्वारा संयुक्त बयान में आर्थिक आंकड़ों में मोदी सरकार द्वारा हस्तक्षेप को लेकर चिंता जाहिर करते हुए सांख्यिकी संगठनों की स्वतंत्रता बहाल करने की अपील की गई थी। इन अर्थशास्रियों को सन्देह है कि केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन ने मोदी सरकार के दबाव के कारण  2016-17 की जीडीपी में वृद्धि अनुमान को पहले के मुकाबले 1.1 प्रतिशत बढ़ाकर 8.2 प्रतिशत किया है।  इन अर्थशास्रियों को यह भी सन्देह है कि नेशनल सेम्पल सर्वे के 2017-18 के श्रम बल सर्वेक्षण आंकड़ों को लोकसभा चुनाव के सम्पन्न होने तक जानबूझ कर सार्वजनिक किए जाने से रोका गया है। बयान पर हस्ताक्षर करने वाले इन अर्थशास्त्रियों में देश-विदेश के शैक्षणिक एवं शोध संस्थानों से जुड़े हुए नामी-गिरामी अर्थशास्री व समाजशास्सी शामिल हैं। इनमें अमेरिका के जेम्स बॉयस, कनाडा के पैट्रिक फ्रांकोइस, तथा भारत के राकेश बसंत, सतीश देशपांडे, आर. रामकुमार, हेमा स्वामीनाथन, रोहित आजाद प्रमुख हैं।
 इन अर्थशास्रियों ने बयान में कहा है कि जनहित की नीतियां बनाने और जानकारी भरे सामाजिक विमर्श के लिए आंकड़ों को वैज्ञाानिक तरीकों से जुटाकर, उनका विश्लेषण उनके समय से जारी करना जनता की सेवा के समान है। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि सांख्यिकी जुटाने वाली और विश्लेषण करने वाली इन संस्थाओं की विश्वनीयता बनी रहे। विदेशों में इन संस्थाओं को पेशेवर स्वायत्ता दी जाती है। 
 ओडिशा में संबलपुर स्थित राज्य सरकार के गंगाधर मेहर विश्वविद्यालय के प्लेटनम जुबली समारोहों की शृंखला में वाणिज्य एवं प्रबंधन विभाग द्वारा आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार अन्य स्थानीय कार्यक्रमों में हिस्सा लेने के सिलसिले में मैं 14 मार्च से 16 मार्च की दोपहर तक संबलपुर में था। उद्यमिता विकास विषय पर विश्वविद्यालय की सेमीनार में उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि, पूर्ण अधिवेशन के सभापति तथा प्रथम सत्र में प्रमुख वक्ता, इन तीन सत्रों में उद्बोधनकर्ता के रूप में मुझे निमंत्रित किया गया था। सभी सत्रों में स्थानीय छात्र-छात्राओं की भी बड़ी सक्रिय भागीदारी रही। सत्रावसान के बाद जलपान के समय कुछ शिक्षकों ने मुझे स्थानीय समाचारपत्रों में प्रकाशित 108 अर्थशास्रियों की अपील दिखाते हुए पूछा कि क्या मैं छत्तीसगढ़ इकानॉमिक एसोसियेशन के अध्यक्ष होने के नाते इन अर्थशास्रियों के समर्थन में हस्ताक्षर अभियान प्रारंभ करूंगा। मेरा उत्तर था कि इन प्रमुख अर्थशास्रियों ने व्यक्तिगत हैसियत से बयान पर हस्ताक्षर किए हैं। इसलिए मेरा अध्यक्ष के रूप में अभियान चलाने का कोई इरादा नहीं है।  वहां के शिक्षकों ने अर्थशास्रियों की इस अपील के सन्दर्भ में सवाल पूछे थे जिसमें उन्होंने भारत के सभी अर्थशास्रियों, सांख्यिकीविद् और स्वतंत्र शोधकर्ताओं से अपील की थी कि वे सरकार द्वारा प्रतिकूल आंकड़ों को दबाने की प्रवृत्ति के खिलाफ आवाज उठाने तथा सांख्यिकी संगठनों की संस्थागत स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए दबाव डालने के लिए उनका सार्वजनिक रूप से समर्थन करें।
 अनौपचारिक चर्चा के समय उपस्थित वरिष्ठ प्राध्यापकों ने उन प्रबुद्ध अर्थशास्त्रियों द्वारा अपने  बयान को देश-विदेश के मीडिया को सार्वजनिक किए जाने पर अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए कहा कि इस समय भारत और पाकिस्तान के बीच जो मीडिया वार चल रहा है,  इन अर्थशास्त्रियों ने पाकिस्तान को अनायास ही भारत के विरूद्ध यहां की अर्थव्यवस्था के बारे में मीडिया प्रोपेगंडा की सामग्री प्रदान कर दी है, जो इन अर्थशास्रियों के बयान को वहां के मीडिया कवरेज मिलने से जाहिर होता है।
  उल्लेखनीय है कि भारत के मीडिया में पाकिस्तान द्वारा आतंकवादियों के समर्थन के वर्णन के साथ-साथ इमरान खान सरकार की खस्ता वित्तीय स्थिति का प्रमुखता से जिक्र किया जाता है। उसी प्रकार चीन की विकास दर में गिरावट का भी भारतीय मीडिया में अच्छा स्थान मिलता है।  अनौपचारिक चर्चाओं में वाणिज्य एवं मैनेजमेंट के वरिष्ठ शिक्षकगणों की 108 अर्थशास्त्रियों द्वारा उनके बयान को मीडिया पर सार्वजनिक किए जाने की आलोचना करने के बाद ही चर्चा की दिशा शेयर बाजार में आए उछाल की ओर मुड़ गई। इन प्राध्यापकों का कहना था कि अर्थव्यवस्था का मजबूती और विकास की सही दिशा का सूचक संवेदी सूचकांक सेंसेक्स है। उनका कहना था कि जिस तरह से मार्च महीने में शेयर बाजार में उछाल आया है, वह देश विदेश के करोड़ों छोटे-बड़े निवेशकों भारतीय कंपनियों  के शेयरों में भारी मात्रा में निवेश का परिणाम है। इन प्राध्यापकों का कहना था कि शेयर बाजार में पैसा लगाना जुआ या सट्टा नहीं है।  इसके लिए अर्थव्यवस्था की मजबूती और राजनैतिक स्थिरता की वर्तमान स्थिति एवं भावी संभावनाओं को अध्ययन की जरूरत होती है।
 स्वयं के अध्ययन या स्टॉक मार्केट के विशेषज्ञों की सलाह पर संस्थागत व छोटे निवेशक करोड़ों रुपये का निवेश करते हैं और अर्थव्यवस्था की कमजोरी की हालत में बिकवाली करते हैं।  बम्बई स्टॉक एक्सचेंज का 30 शेयरों वाला संवेदी सूचकांक सेंसेक्स मार्च के पहले सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन के मुकाबले 15 मार्च को 1353 बिन्दु की जोरदार उछाल के साथ 38,000 बिन्दु पार कर बन्द हुआ। एक सप्ताह में 3.7 प्रतिशत की सेंसेक्स में हुई वृद्धि 6 माह के बाद नजर आई। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का 50 शेयरोंवाला सूचकांक निफ्टी 391 बिन्दु अर्थात 3.5 फीसदी तेजी के साथ 11,427 पर बन्द हुआ। नरेन्द्र मोदी सरकार की वापसी की संभावनाओं को देखते हुए निवेशक अच्छे प्रतिफल देने वाले शेयरों में हर दिन करोड़ों रुपये निवेश करते रहे।
इस सप्ताह सेंसेक्स की चोटी की 10 कंपनियों में से 8 कंपनियों का बाजार पूंजीकरण कुल मिलाकर 1.4 लाख करोड़ रुपए बढ़ा है। 18 मार्च के प्रात: सत्र में सेंसेक्स 38,000 बिन्दु के पार चल रहा है। मोदी सरकार की जीत की संभावनाओं को देशकर विदेशी संस्थागत एवं पोर्टफोलियो निवेशक 11 मार्च से हर दिन शेयरों की जोरदार खरीदी कर रहे हैं। शेयर बाजार ही नहीं इस सप्ताह डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 
(डॉ. हनुमंत यादव) 
समाज की बात -Samaj Ki Baat
 कृष्णधर शर्मा - Krishnadhar Sharma 

भारत में प्रयोग होने वाले खेत नापने के फार्मूले

नापने का पैमाना

1 Gaz (एक गज)
= 1 Yard (एक यार्ड)
= 0.91 Meters (0.91 
मीटर)
= 36 Inch (36 
इंच)
1 Hath (एक हाथ)
=½ Gaz (आधा गज)
= 18 Inch (18 
इंच)
1Gattha (एक गट्ठा)
= 5 ½ Hath (साढे पांच हाथ)
= 2.75 Gaz (
पौने तीन गज)
= 99 Inch (99 
इंच)
1 Jareeb (जरीब)
= 55 Gaz (55 गज)


क्षेत्रफल मापने के मात्रक

1 Unwansi (एक   उनवांसी)
=24.5025 Sq Inch (24.5025 वर्ग   इंच)
1 Kachwansi (एक  कचवांसी)
=20 Unwansi (20 उनवांसी)
1 Biswansi ( एक बिसवांसी)
=20 Kachwansi (20 कचवांसी)
= 1 Sq. Gattha (
एक वर्ग गट्ठा)
= 7.5625 Sq.Yard (7.5625 
वर्ग   गज)
= 9801 Sq Inch (9801 
वर्ग इंच)
1 Bissa (एक बिस्सा)
=20 Biswansi (20 बिस्वांसी)
= 20 Sq.Gattha (20 
वर्ग गट्ठा)
1 Kaccha Bigha (एक कच्चा बीघा)
= 6 2/3 Bissa (6 2/3 बिस्से:)
= 1008 Sq.Yard and 3Sq Feet   (1008 
वर्ग गज और 3वर्गफुट)
= 843 Sq. Meters (843 
वर्ग मीटर)
1 Pucca Bigha (एक पक्काf बीघा)
= 1 sq. Jareeb (एक वर्ग जरीब)
= 3 Kaccha Bigha (
तीन कच्चे   बीघे)
=20 Bissa (20 
बिस्सें)
= 3025 Sq. Yard (3025 
वर्ग गज)
= 2529 Sq. Meters 2529 
वर्ग   मीटर)
= 27225 Sq. Feet (27225 
वर्ग   फुट)
=165x165 Feet
1 Acre (एक एकड)
= 4840 Sq. Yard (4840 वर्ग गज)
= 4046.8 Sq.Meters   (4046.8 
वर्ग   मीटर)
= 43560 Sq. Feet (43560 
वर्ग   फुट)
= 0.4047 Hectare   (0.4047 
हेक्टेयर)
1 Hectare (एक हेक्टेयर)
= 2.4711 Acre (2.4711 एकड)
= 10000 Sq meters ( 10000 
वर्ग   मीटर










भू-मीत (कृष्ण धर शर्मा - Krishnadhar Sharma)
Samaj ki Baat - समाज की बात