नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

मंगलवार, 13 अप्रैल 2021

जहरीली 'जीएम' फसलों पर जरूरी है नियंत्रण

 'अमेरिका की माताएं' (मॉम्स् एक्रॉस अमेरिका) की संस्थापक जेन हनीकट ने अदालत के इस निर्णय का स्वागत करते हुए मानवता के लिए व धरती पर पनप रहे सभी तरह के जीवन के लिए इसे एक जीत बताया। फ्रांस के पर्यावरण मंत्री ब्रूने पायरसन ने इस 'ऐतिहासिक निर्णय' का स्वागत किया। भारत सहित सभी देशों को 'जीएम' फसलों, रासायनिक खरपतवार-नाशकों, जंतुनाशकों व कीटनाशकों के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर दुष्परिणामों के बारे में व्यापक जन-चेतना का अभियान चलाना चाहिए, जिससे इनके बारे में सही व प्रामाणिक जानकारी किसानों व आम लोगों तक पंहुच सके। कृषि व खाद्य क्षेत्र में 'जेनेटिक इंजीनियरिंग' की टैक्नॉलॉजी मात्र चंद बहुराष्ट्रीय कंपनियों (व उनकी सहयोगी या उप-कंपनियों) के हाथ में केंद्रित है।  

यदि कोई अवैध कार्रवाई हो रही हो तो सरकार का कर्तव्य है कि इस पर तुरंत रोक लगाए। पर हाल में कुछ लोगों ने कहा है कि सरकार कानून ही इस तरह बदल दे कि जो अवैध है वह वैध नजर आने लगे। यह अजीब स्थिति 'जीएम' (जेनेटिकली मोडीफाईड या जीन-संवर्धित) फसलों के संदर्भ में देखने में आई है। अनेक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक बार-बार चेतावनी दे चुके हैं कि स्वास्थ्य, पर्यावरण, जैव-विविधता, कृषि व खाद्य-व्यवस्था के लिए 'जीएम' फसलें बहुत खतरनाक हैं। इसके बावजूद 'जीएम' बीजों व इनसे जुड़ी रासायनिक दवाओं को बढ़ाने वाली कंपनियां अपने उत्पादों की बिक्री को तेजी से बढ़ाने के लिए इनका प्रचार-प्रसार करती रही हैं व अपनी अपार धन-दौलत के बल पर उन्होंने अपने अनेक समर्थक उत्पन्न कर लिए हैं। हाल में इन लोगों ने सरकार को विचित्र सलाह देते हुए कहा है कि कुछ 'जीएम' फसलों को अवैध रूप से भारत के खेतों में फैलाया जा रहा है जिसे रोकने के लिए सरकार को चाहिए कि वह इन 'जीएम' फसलों को वैधता दे दे। 

यह अजीब तर्क है कि किसी अवैधता को रोकने के लिए उस अवैधता को वैध कर दो, पर 'जीएम' फसलों का सारा ताना-बाना ही इस तरह के मिथ्या व भ्रामक प्रचार के बल पर खड़ा हुआ है।  'जीएम' फसलों के विरोध का एक मुख्य आधार यह रहा है कि ये फसलें स्वास्थ्य व पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित नहीं हैं तथा उनका यह असर 'जेनेटिक प्रदूषण' के माध्यम से अन्य सामान्य फसलों व पौधों में फैल सकता है। इस विचार को 'इंडिपेंडेंट साईंस पैनल' (स्वतंत्र विज्ञान मंच) ने बहुत सारगर्भित ढंग से व्यक्त किया है। इस पैनल में एकत्रित हुए अनेक देशों के प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों व विशेषज्ञों ने 'जीएम' फसलों पर एक महत्वपूर्ण दस्तावेज तैयार किया है। इसके निष्कर्ष में उन्होंने कहा है 'जीएम' फसलों के बारे में जिन लाभों का वायदा किया गया था, वे प्राप्त नहीं हुए हैं व ये फसलें खेतों में बढ़ती समस्याएं उपस्थित कर रही हैं। अब इस बारे में व्यापक सहमति है कि इन फसलों का प्रसार होने पर 'ट्रान्सजेनिक प्रदूषण' से बचा नहीं जा सकता। अत: 'जीएम' फसलों व 'गैर-जीएम' फसलों का सह-अस्तित्व नहीं हो सकता है।

 सबसे महत्वपूर्ण यह है कि 'जीएम' फसलों की सुरक्षा प्रमाणित नहीं हो सकी है। इसके विपरीत ऐसे पर्याप्त प्रमाण मिल चुके हैं जिनसे इन फसलों की सुरक्षा संबंधी गंभीर चिंताएं उत्पन्न होती हैं। यदि इनकी उपेक्षा की गई तो स्वास्थ्य व पर्यावरण की क्षति होगी जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। 'जीएम' फसलों को अब दृढ़ता से खारिज कर देना चाहिए। इन फसलों से जुड़े खतरे का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष कई वैज्ञानिकों ने यह बताया है कि जो खतरे पर्यावरण में फैलेंगे उन पर हमारा नियंत्रण नहीं रह जाएगा व गंभीर दुष्परिणाम सामने आने पर भी हम इनकी क्षति-पूर्ति नहीं कर पाएंगे। जेनेटिक प्रदूषण का मूल चरित्र ही ऐसा है। वायु-प्रदूषण व जल-प्रदूषण की गंभीरता पता चलने पर उन्हें नियंत्रित किया जा सकता है, पर जेनेटिक-प्रदूषण एक बार पर्यावरण में चले जाने पर हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों को केवल इस कारण परेशान किया गया है या उनका अनुसंधान बाधित किया गया है, क्योंकि उनके अनुसंधान से 'जीएम' फसलों के खतरे पता चलने लगे थे। 

इन कुप्रयासों के बावजूद निष्ठावान वैज्ञानिकों के अथक प्रयासों से 'जीएम' फसलों के गंभीर खतरों को बताने वाले दर्जनों अध्ययन उपलब्ध हैं। जैफरी एम. स्मिथ की पुस्तक 'जेनेटिक रुलेट् (जुआ)' के 300 से अधिक पृष्ठों में ऐसे दर्जनों अध्ययनों का सार-संक्षेप या परिचय उपलब्ध है। इनमें चूहों पर हुए अनुसंधानों में पेट, लिवर, आंतों जैसे विभिन्न महत्वपूर्ण अंगों के बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने की चर्चा है। 'जीएम' फसल या उत्पाद खाने वाले पशु-पक्षियों के मरने या बीमार होने की चर्चा है व जेनेटिक उत्पादों से मनुष्यों में भी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का वर्णन है। हाल ही में देश के जीनेटिक साइंस के महान वैज्ञानिक प्रोफेसर पुष्प भार्गव का निधन हुआ है। वे 'सेण्टर फॉर सेल्यूेलर एंड मॉलीक्यूलर बॉयोलाजी, हैदराबाद' के संस्थापक निदेशक व 'नेशनल नॉलेज कमीशन' के उपाध्यक्ष रहे थे। उनकी वैज्ञानिक उपलब्धियां बहुचर्चित रही हैं। सुप्रीम कोर्ट ने प्रो. पुष्प भार्गव को 'जेनेटिक इंजीनियरिंग एप्रूवल कमेटी' (जीईएसी) के कार्य पर निगरानी रखने के लिए नियुक्त किया था। प्रो. पुष्प भार्गव ने बहुत प्रखरता से 'जीएम' फसलों का बहुत स्पष्ट और तथ्य आधारित विरोध किया था। 

अंग्रेजी दैनिक 'हिंदुस्तान टाईम्स' के अपने लेख में प्रो. भार्गव ने लिखा था कि लगभग 500 अनुसंधान प्रकाशनों ने 'जीएम' फसलों के मनुष्यों, अन्य जीव-जंतुओं व पौधों के स्वास्थ्य पर हानिकारक असर को स्थापित किया है। ये सभी प्रकाशन ऐसे वैज्ञानिकों के हैं जिनकी ईमानदारी के बारे में कभी, कोई सवाल नहीं उठा है। प्रो. भार्गव ने आगे लिखा कि दूसरी ओर 'जीएम' फसलों का समर्थन करने वाले लगभग सभी पेपर या प्रकाशन उन वैज्ञानिकों के हैं जिन्होंने 'कॉन्फ्लिओक्ट ऑफ इंटरेस्ट' स्वीकार किया है या जिनकी विश्वसनीयता व ईमानदारी के बारे में सवाल उठ सकते हैं। 'जीएम' फसलों के समर्थक प्राय: कहते हैं कि इनको वैज्ञानिकों का समर्थन मिला है, पर प्रो. भार्गव ने इस विषय पर समस्त अनुसंधानों का आंकलन कर स्पष्ट बता दिया था कि अधिकतम निष्पक्ष वैज्ञानिकों ने 'जीएम' फसलों का विरोध ही किया है। साथ में उन्होंने यह भी बताया था कि जिन वैज्ञानिकों ने 'जीएम' को समर्थन दिया है उनमें से अनेक किसी-न-किसी स्तर पर 'जीएम' बीज बेचने वाली कंपनियों या इस तरह के निहित स्वार्थों से किसी-न-किसी रूप में जुड़े या प्रभावित रहे हैं। कुछ 'जीएम' फसलों के साथ खतरनाक खरपतवार-नाशकों को जोड़ दिया गया है। ऐसा 'ग्लाईफोसेट' नामक एक खरपतवार-नाशक स्वास्थ्य के लिए बहुत खतरनाक पाया गया है। हाल ही में कैलिफोर्निया (अमरीका) की एक अदालत ने अपने महत्वापूर्ण निर्णय में एक बहुराष्ट्रीय कंपनी को जानसन नामक व्यक्ति को बहुत अधिक क्षतिपूर्ति राशि देने को कहा है। यह कंपनी 'ग्लाईफोसेट' नामक खतरनाक रसायन बनाती है। जानसन का कार्य स्कूलों के मैदानों की देख-रेख था। उसने इन खरपतवार-नाशकों का छिड़काव वर्षों तक किया जिससे उसे रक्त-कोशिका का एक ऐसा गंभीर कैंसर हो गया था जिसे 'नॉन-हाजकिन लिंफोमा' कहा जाता है। इस मुकदमे के दौरान यह भी देखा गया कि इस खरपतवार-नाशक को किसी-न-किसी तरह सुरक्षित सिद्ध कर पाने के लिए कंपनी ने स्वयं तथ्य गढ़े और फिर किसी विशेषज्ञ का नाम उससे जोड़ दिया। यह इसके बावजूद किया गया कि 'विश्व स्वास्थ्य संगठन' (डब्यूेषज एचओ) की कैंसर से जुडी अंतर्राष्ट्रीय अनुसंधान एजेंसी (आईएआरसी) ने वर्ष 2015 में ही इस खरपतवार-नाशक से होने वाले कैंसर की संभावना के बारे में बता दिया था। भारत में भी इसका उपयोग होता है। 'ग्लाईफोसेट' का उपयोग 'जीएम' फसलों के साथ नजदीकी से जुड़ा रहा है और इसके गंभीर खतरों के सामने आने से 'जीएम' फसलों से जुड़े खतरों की पुष्टि होती है।

 विशालकाय बहुराष्ट्रीय कंपनियां, जैसे-'मानसेंटो' व 'बेयर' (जो बहुत बड़े सौदे के बाद एक हो गई हैं) बीज और कृषि रसायनों के व्यवसाय को साथ-साथ कर रही हैं व कई फसलों (विशेषकर 'जीएम' फसलों) के बीजों के साथ ही उनके लिए उपयुक्त खरपतवार-नाशकों, कीटनाशकों आदि को भी बेचा जाता है। इससे कंपनियों की कमाई बहुत तेजी से बढ़ती है और किसानों का खर्च और कर्ज उससे भी तेजी से बढ़ते हैं। वकीलों जिस टीम ने जानसन की ओर से मुकदमा लड़ा था उनमें एडवर्ड केनेडी भी थे जिनके इसी नाम के विख्यात सीनेटर पिता थे। एडवर्ड केनेडी ने मुकदमे में जीत के बाद कहा कि इस तरह के उत्पादों की बिक्री के कारण न केवल बहुत से लोग गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से त्रस्त हो रहे हैं, अपितु अनेक अधिकारियों को भ्रष्ट बनाया जा रहा है, प्रदूषण से बचाने वाली एजेंसियों पर नियंत्रण किया जा रहा है व विज्ञान को झुठलाया जा रहा है। 'अमेरिका की माताएं' (मॉम्स् एक्रॉस अमेरिका) की संस्थापक जेन हनीकट ने अदालत के इस निर्णय का स्वागत करते हुए मानवता के लिए व धरती पर पनप रहे सभी तरह के जीवन के लिए इसे एक जीत बताया। फ्रांस के पर्यावरण मंत्री ब्रूने पायरसन ने इस 'ऐतिहासिक निर्णय' का स्वागत किया। भारत सहित सभी देशों को 'जीएम' फसलों, रासायनिक खरपतवार-नाशकों, जंतुनाशकों व कीटनाशकों के स्वास्थ्य व पर्यावरण पर दुष्परिणामों के बारे में व्यापक जन-चेतना का अभियान चलाना चाहिए, जिससे इनके बारे में सही व प्रामाणिक जानकारी किसानों व आम लोगों तक पंहुच सके। कृषि व खाद्य क्षेत्र में 'जेनेटिक इंजीनियरिंग' की टैक्नॉलॉजी मात्र चंद बहुराष्ट्रीय कंपनियों (व उनकी सहयोगी या उप-कंपनियों) के हाथ में केंद्रित है। इनका उद्देश्य 'जेनेटिक इंजीनियरिंग' के माध्यम से दुनियाभर की कृषि व खाद्य व्यवस्था पर ऐसा नियंत्रण स्थापित करना है जैसा विश्व इतिहास में आज तक संभव नहीं हुआ। इन तथ्यों व जानकारियों को ध्यान में रखते हुए सभी 'जीएम' फसलों का विरोध जरूरी है। इसके साथ अवैध ढंग से हमारे देश में जिन 'जीएम' खाद्य उत्पादों का आयात होता रहा है, उस पर रोक लगाना भी जरूरी है।  

भारत डोगरा  (साभार- देशबंधु) 

समाज की बात Samaj Ki Baat कृष्णधर शर्मा KD Sharma

बड़ी मानवीय त्रासदी बन सकती है म्यांमार की स्थिति

  हाल के समय में ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं जब आंतरिक हिंसा बढ़ने पर व गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर खाद्य संकट भी उत्पन्न हो गया व स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी अनिवार्य सुविधाएं भी ध्वस्त हो गईं।

हाल के समय में ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं जब आंतरिक हिंसा बढ़ने पर व गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर खाद्य संकट भी उत्पन्न हो गया व स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी अनिवार्य सुविधाएं भी ध्वस्त हो गईं। अत: म्यांमार को इस स्थिति से बचाने के लिए अभी से समुचित प्रयासों को अपनाना चाहिए। एक पड़ोसी देश होने के नाते और इस क्षेत्र की एक बड़ी ताकत होने के नाते भारत का भी कर्तव्य है कि वह इन प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए ताकि म्यांमार में लोकतंत्र की वापसी हो सके, हिंसा पर नियंत्रण लग सके व आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि भी सुनिश्चित हो सके। म्यांमार (बर्मा) में जिस तरह से बड़े टकराव की स्थिति सैन्य बल और लोकतांत्रिक ताकतों के बीच आ गई है, उसका कोई आसान व शीघ्र समाधान अभी नजर नहीं आ रहा है। 

यदि भारी बहुमत से जीत कर आए राजनीतिक दल से सरकार बनाने का अधिकार छीना जाए और उसके लोकप्रिय नेताओं को जेल में डाल दिया जाए तो उसके समर्थकों का सड़क पर उतरना निश्चित ही है और वही हो रहा है। यदि सेना को यही सब कुछ करना है तो चुनाव करवाने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है। दूसरी ओर इतना जोर-जुल्म करने के बाद सेना को यह भी आसान नहीं लग रहा है कि लोकतंत्र की ओर शीघ्र वापसी की जाए। दो महीने में ही 500 लोकतंत्र प्रहरियों को मार देना भयानक है। जहां एक ओर हाल ही में आरंभ हुआ संघर्ष लंबा खिंच सकता है, वहां अल्पसंख्यक समुदायों के अनेक संघर्ष म्यांमार में काफी समय से चलते रहे हैं। मौजूदा अराजकता के दौर में वे नए सिरे से जोर पकड़ सकते हैं और ऐसे हमलों के समाचार हाल में मिले भी हैं। इस तरह कई स्तरों पर हिंसा और दमन का दौर निकट भविष्य में म्यांमार में हावी हो सकता है और गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ऐसी स्थिति का अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ना स्वाभाविक है। 

ऐसी अशान्त और अस्थिर स्थिति में स्वाभाविक है कि घरेलू और बाहरी निवेश बहुत कम होगा। तिस पर यदि संयुक्त राष्ट्र अमेरिका जैसे देशों ने प्रतिबंध सख्त किए तो व्यापार पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। हालांकि चीन जैसे कुछ बड़े देशों का बाजार म्यांमार के लिए खुले रहने की पूरी संभावना है, पर जरूरी है कि निर्यात के स्थान कम होने पर निर्यातों से प्राप्त होने वाले मूल्य पर कुछ असर तो पड़ेगा ही।  इसका दूसरा पक्ष यह है कि आयात के लिए विदेशी मुद्रा भी कम उपलब्ध होगी।  हिंसा व  दमन के बढ़ते दौर में सैन्य शासकों को सैन्य सामग्री के अधिक आयात की जरूरत पड़ेगी। धनी तबके भी अपने लिए आयात करते ही रहेंगे। अत: आयात कम करने की क्षमता का असर आम लोगों की जरूरतों की आपूर्ति पर अधिक पड़ सकता है। 

दूसरी ओर स्थानीय स्तर के औद्योगिक और कृषि उत्पादन पर व कुछ जरूरी सेवाओं पर भी हिंसा के दौर में प्रतिकूल असर पड़ने की पूरी संभावना है। इस स्थिति में आजीविका के स्रोत भी कम होंगे व गरीबी बढ़ेगी। जहां एक ओर अनेक आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति कम होगी वहां बहुत से लोगों की क्रय शक्ति में भी कमी आएगी। इन दोनों के मिले-जुले असर से लोगों की जीवन की कठिनाईयां बहुत बढ़ सकती हैं। वैसे साधारणत: म्यांमार को कृषि निर्यातक की दृष्टि से अतिरिक्त उत्पादन का देश माना जाता है। यहां की अधिकांश जनसंख्या कृषि से जुड़ी रही है। चावल मुख्य भोजन है। चावल के निर्यातक देश के रूप में भी म्यांमार की एक बड़ी पहचान बनी हुई है। इस आधार पर यह दावा किया जात है कि यहां भूख, अल्प-पोषण या कुपोषण की समस्या नहीं है या कम है। पर जरूरी नहीं है कि ऐसा हो। 

कृषि निर्यात की अधिकता की स्थिति में भी कई देशों में भूख व कुपोषण की समस्या देखी गई है। कुछ समुदायों व स्थानों में यह समस्या अधिक हो सकती है जो भेदभाव का शिकार हैं। म्यांमार की हकीकत भी ऐसी स्थिति के नजदीक की है। इस स्थिति में यदि हिंसा का प्रसार अधिक होता है तो कृषि उत्पादन कम हो सकता है पर यह उत्पादन कम होने के बावजूद निर्यात अधिक बनाए रखने के प्रयास हो सकते हैं क्योंकि शासक वर्ग को आयातों के लिए विदेशी मुद्रा चाहिए। दूसरी ओर सैनिकों व सेना को समर्थन करने वाले संगठनों के लिए भी पर्याप्त खाद्य उपलब्धि काफी कम हो सकती है। विशेषकर जो क्षेत्र व स्थान विद्रोहियों के या विपक्षियों के गढ़ माने जाते हैं वहां के लिए खाद्य व अन्य आवश्यक उत्पादों की स्थिति कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में अनेक स्थानों के लिए जरूरी दवाओं व स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धि सामान्य स्थिति से कहीं कम हो सकती है व इसका बहुत घातक असर पड़ सकता है। यदि अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर कड़े प्रतिबंध हो तो दवाओं की कमी और विकट हो सकती है। यदि सकारात्मक पहलू को देखें तो म्यांमार के पास तेल व गैस का अच्छा भंडार है, अन्य मूल्यवान खनिज हैं जिनसे अर्थव्यवस्था कुछ समय के लिए संभल सकती है पर प्रतिबंधों की स्थिति में इनसे आय अर्जन में भी कमी आ सकती है। 

इन सभी विकट संभावनाओं से बचने के लिए जरूरी है कि अपेक्षाकृत आरंभिक स्थिति में ही राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर यहां अमन-शांति व लोकतंत्र स्थापना के प्रयास तेज किए जाएं। इसके अतिरिक्त ग्रामीण समुदायों को चाहिए कि कठिन समय में वे खाद्य उत्पादन बढ़ाने के अधिक आत्म-निर्भर उपायों को अपनाएं ताकि हर स्थिति में कम से कम खाद्य सुरक्षा को बनाए रखा जा सके। विश्व खाद्य कार्यक्रम को भी खाद्य सहायता पहुंचाने के लिए म्यांमार की बदलती स्थिति पर नजर रखनी चाहिए। डाक्टरों व स्वास्थ्यकर्मियों के कुछ संगठन हिंसा-प्रभावित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाते रहे हैं। उन्हें भी म्यांमार की जरूरतों को निकट भविष्य में ध्यान में रखना होगा। उम्मीद तो यह जरूर रखनी चाहिए कि निकट भविष्य में संकट सुलझ जाए, पर अधिक विकट स्थितियों में सहायता पहुंच सके इसकी तैयारी भी अभी से करनी चाहिए। 

हाल के समय में ऐसे अनेक उदाहरण उपलब्ध हैं जब आंतरिक हिंसा बढ़ने पर व गृह युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर खाद्य संकट भी उत्पन्न हो गया व स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी अनिवार्य सुविधाएं भी ध्वस्त हो गईं। अत: म्यांमार को इस स्थिति से बचाने के लिए अभी से समुचित प्रयासों को अपनाना चाहिए। एक पड़ोसी देश होने के नाते और इस क्षेत्र की एक बड़ी ताकत होने के नाते भारत का भी कर्तव्य है कि वह इन प्रयासों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए ताकि म्यांमार में लोकतंत्र की वापसी हो सके, हिंसा पर नियंत्रण लग सके व आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि भी सुनिश्चित हो सके। 

भारत डोगरा (साभार-देशबंधु)

समाज की बात Samaj Ki Baat कृष्णधर शर्मा  KD Sharma

शुक्रवार, 19 मार्च 2021

मंगल ग्रह का पानी उड़ा नहीं, वहीं 4 अरब साल से सतह की नीचे छुपा है

 Martian waters मंगल ग्रह को धरती से मिलता-जुलता ग्रह माना जाता है, साथ ही वैज्ञानिकों यह भी उम्मीद है कि मंगल ग्रह पर जीवन की संभावना हो सकती है। 

मंगल ग्रह को लेकर किए गए अभी तक सभी शोधों व वैज्ञानिक परीक्षणों में यह खुलासा हुआ है कि अरबों साल पहले मंगल ग्रह पर बड़ी तादाद में सागर और झीलें हुआ करती थी, लेकिन फिलहाल ये ग्रह पूरी तरह से सूख गया है और एक चट्टानी ग्रह बन गया है। साथ ही वैज्ञानिक यह भी मानते आए हैं कि मंगल ग्रह से पानी अब अंतरिक्ष में उड़ गया है। 

लेकिन अब NASA द्वारा वित्तपोषित एक अध्ययन के मुताबिक मंगल ग्रह से पानी कहीं नहीं गया, बल्कि ग्रह की ऊपरी सतह में खनिजों के बीच ही फंसा हुआ है. मंगल ग्रह की ऊपरी सतह पर ही मौजूद है पानी 'साइंस' पत्रिका में नए शोधपत्र की मुख्य लेखिका ईवा स्केलर ने कहा कि मंगल ग्रह की परी सतह पानी भरे खनिजों से बनी है, ऐसे खनिज, जिनके क्रिस्टल स्ट्रक्चर में ही पानी है। 



स्केलर के मॉडल से संकेत मिलता है कि मंगल ग्रह पर करीब 30 से 99 फीसदी पानी इन्हीं खनिजों में फंसा हुआ है। शोध के मुताबिक मंगल ग्रह पर इतना पानी था कि वह लगभग 100 से 1,500 मीटर (330 से 4,920 फुट) समुद्र से ही समूचे ग्रह को कवर कर सकता था। मंगल ग्रह ने अपना अपना मैग्नैटिक फील्ड खो दिया था इस कारण से मंगल ग्रह का पर्यावरण धीरे-धीरे समाप्त हो गया।

 पूरा पानी अंतरिक्ष में नहीं उड़ा शोधकर्ताओं का दावा है कि मंगल ग्रह का पूरा पानी अंतरिक्ष में नहीं उड़ा है। नए अध्ययन के लेखकों के अनुसार कुछ पानी जरूर खत्म हुआ होगा, या गायब हो गया होगा, लेकिन अधिकतर पानी ग्रह पर ही है। 

मार्स रोवरों द्वारा किए गए ऑब्जर्वेशनों और ग्रह के उल्कापिंडों का इस्तेमाल कर टीम ने पानी के अहम हिस्से हाइड्रोजन पर फोकस किया है। हाइड्रोजन के अलग-अलग तरह के अणु होते हैं। अधिकतर के न्यूक्लियस में सिर्फ एक प्रोटॉन होता है, लेकिन बहुत कम (लगभग 0.02 प्रतिशत) के भीतर एक पेरोटॉन के साथ एक न्यूट्रॉन भी होता है, जिसकी वजह से उनका वजन बढ़ जाता है। इन्हें ड्यूटेरियम या 'भारी' हाइड्रोजन के नाम से जाना जाता है। हल्के अणु ग्रह के वातावरण को तेज गति से छोड़ जाते हैं, अधिकतर पानी अंतरिक्ष में चले जाने की वजह से कुछ भारी ड्यूटेरियम पीछे छूट गए।

साभार-नई दुनिया 

समाज की बात samaj ki baat कृष्णधर शर्मा  KD Sharma

स्मॉग टॉवर : क्या यही है राइट च्वाइस ?

 सारा विवाद इसी को लेकर है कि स्मॉग टॉवर वायु प्रदूषण की समस्या का हल नहीं है और यह प्रदूषण उत्पन्न करने वाले कारकों पर कोई प्रभाव नहीं डालता है। 

बीते महीने के अंत में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण पर सुनवाई करते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने स्मॉग टॉवर न लगने पर कड़ी नाराजगी जताई थी। शीर्ष अदालत ने पूछा था कि उसके आदेश के बावजूद अभी तक टॉवर क्यों नहीं लगे। शीर्ष अदालत की फटकार पर सरकार की तरफ से अदालत को सही तकनीकी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई बल्कि मीडिया में जो खबरें आईं उससे यही प्रतीत होता है कि सरकार वायु प्रदूषण की समस्या की असल जड़ से अदालत और जनता का ध्यान हटाना कर स्मॉग टॉवर में उलझाना चाहती है। 

सरल शब्दों में समझें तो स्मॉग टॉवर एक तरह से बहुत बड़ा एयर प्योरीफायर होता है, जो वैक्यूम क्लीनर की तरह धूल कणों को हवा से खींच लेता है। आमतौर पर स्मॉग टॉवर में एयर फिल्टर की कई परतें फिट होती हैं, जो प्रदूषित हवा, जो उनके माध्यम से गुजरती है, को साफ करती है। विशेषज्ञों के मुताबिक एक स्मॉग टॉवर 50 मीटर की परिधि की वायु को साफ कर सकता है। 

स्मॉग टॉवर का आईडिया मूलतः चीन से आया है। वर्षों से वायु प्रदूषण से जूझ रहे चीन के पास अपनी राजधानी बीजिंग में और उत्तरी शहर शीआन में दो स्मॉग टॉवर हैं। पूर्व क्रिकेटर और पूर्वी दिल्ली के भाजपा सांसद गौतम गंभीर ने इस वर्ष 3 जनवरी को राष्ट्रीय राजधानी के लाजपत नगर में एक प्रोटोटाइप एयर प्यूरीफायर का उद्घाटन किया। उन्होंने ट्वीट किया, “मेरा नाम गौतम गंभीर है। मैं बात करने में विश्वास नहीं करता, मैं जीवन को बदलने में विश्वास करता हूँ! सतत समर्थन के लिए माननीय गृह मंत्री अमित शाह जी को धन्यवाद।” 

अब इन स्मॉग टॉवर को लेकर विवाद उठ रहे हैं। इसी महीने सर्वोच्च न्यायालय ने वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली में स्मॉग टॉवर स्थापित करने के अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की एक याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी थी कि इससे चीनी कंपनियों को पैसा मिलेगा और यह साबित करने के लिए कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है कि स्मॉग टॉवर प्रदूषण को नियंत्रित कर सकता है। इसके इतर काउंसिल ऑफ एनर्जी, एनवायरमेंट एंड वॉटर (CEEW) के अनुसार राजधानी दिल्ली की हवा को साफ करने के लिए कम से कम लगभग पौने दो करोड़ रूपये की लागत वाले पच्चीस लाख स्मॉग टावरों की जरूरत होगी।

 दरअसल सारा विवाद इसी को लेकर है कि स्मॉग टॉवर वायु प्रदूषण की समस्या का हल नहीं है और यह प्रदूषण उत्पन्न करने वाले कारकों पर कोई प्रभाव नहीं डालता है। असल बात यह है कि जब तक प्रदूषण फैलाने वाले स्रोत बंद नहीं किए जाएंगे, तब तक स्मॉग टॉवर जैसे टोटके सिर्फ जन-धन की हानि करते रहेंगे। वायु प्रदूषण के सबसे बड़े स्रोत कल कारखाने और थर्मल पॉवर प्लांट हैं। प्रदूषण उत्पन्न करने वाले इन असल स्रोतों पर कोई आंच नहीं आए इसी लिए कभी पराली जलाने को वायु प्रदूषण के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया जा ता ह और कभी कोई और तर्क दे दिए जाते हैं।   

पर्यावरण मंत्रालय ने दिसंबर 2015 में बिजली संयंत्रों के लिए नए उत्सर्जन नियमों की पुष्टि की थी। उन्हें लागू करने की मूल समय सीमा पहले दिसंबर 2017 थी, लेकिन फिर दिसंबर 2019 तक आगे धकेल दी गई और बाद में इसे दिसंबर 2022 तक कंपित कार्यान्वयन में बदल दिया गया। इधर इस वर्ष के शुरू में आई एक खबर पर ध्यान देना जरूरी हो जाता है। 

समाचार एजेंसी रॉयटर्स के हवाले से मीडिया में रिपोर्ट्स प्रकाशित हुई थीं कि भारत के आधे से अधिक कोयला-आधारित बिजली संयंत्रों और 94% कोयला-संचालित इकाइयों में वायु प्रदूषण को रोकने के लिए रेट्रोफिट उपकरण का आदेश दिया गया था। लेकिन नई दिल्ली के आसपास कोयले से चलने वाले उद्योग भारतीय अधिकारियों की इस चेतावनी कि अगर उन्होंने साल के अंत तक सल्फर ऑक्साइड के उत्सर्जन में कटौती करने के लिए उपकरण नहीं लगाए तो इन उद्योगों को बंद कर दिया जाएगा, के बावजूद ये संयंत्र बिना उपकरणों के चल रहे थे। 

एक तरफ तो दिल्ली में स्मॉग टॉवर लगाकर वायु प्रदूषण पर लगाम कसने के टोटके किए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ सरकार कोयला क्षेत्र को निजी खनन के लिए खोलकर देश की हवा को और अधिक जहरीला बनाने के इंतजाम कर रही है। जरूरत इस बात की थी कि जो भी याचिकाकर्ता सर्वोच्च न्यायालय में यह दलील देने गए थे कि स्मॉग टॉवर से चीन की इकॉनॉमी को पायदा होगा, वह शीर्ष अदालत के सामने सही तर्क प्रस्तुत करते कि स्मॉग टॉवर समस्या का समाधान नहीं है और यह सिर्फ जनता की मेहनत की गाढ़ी कमाई की बर्बादी है, इसलिए इससे बहुत कम खर्च पर कोयला-संचालित इकाइयों में वायु प्रदूषण को रोकने के लिए रेट्रोफिट उपकरण लगाने पर सख्ती की जाए। 

(अमलेन्दु उपाध्याय  साभार-देशबंधु )

समाज की बात samaj ki baat कृष्णधर शर्मा KDSharma

शनिवार, 9 जनवरी 2021

ऊर्जा-क्षेत्र में सौर ऊर्जा की दावेदारी

 'राष्ट्रीय विद्युत नीतिके अनुसार अगले दशक में विद्युत की बढ़ती मांग को 2027 तक दो लाख 75 हजार मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा किया जा सकता हैइसलिए कोयले के नये संयंत्रों की जरूरत नहीं पड़ेगी। ऐसी परिस्थितियों में बिजली की मांग और अर्थव्यवस्था की गति को बनाए रखने के लिए आवश्यक हो गया है कि नवीकरणीय ऊर्जा में निरंतर वृद्धि करते हुए विद्युत उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भरता कम की जाए। वैसे भीवैश्विक एनजीओ 'ग्रीन पीसके अनुसार कोयले से उत्पन्न बिजलीसौर और पवन ऊर्जा से 65 फीसदी महंगी है।

सौर ऊर्जा में सस्ती टेक्नालॉजी और नवाचार ने पूरी दुनिया में बिजली का परिदृश्य बदल दिया है। सन् 2010 में भारत का 'राष्ट्रीय सौर ऊर्जा मिशनशुरू किया गया था। उस समय सौर ऊर्जा से मात्र 17 मेगावाट बिजली का उत्पादन होता था। बीस जून 2020 तक सौर बिजली उत्पादन की स्थापित क्षमता 35 हजार 739 मेगावाट हो गई है। वर्तमान केंद्र सरकार ने 2022 तक एक लाख मेगावाट सौर ऊर्जा, 60 हजार मेगावाट पवन ऊर्जा और 15  हजार मेगावाट  अन्य परम्परागत क्षेत्रों से बिजली उत्पादन का लक्ष्य रखा है। देश के पांच प्रमुख राज्यों में सोलर ऊर्जा का उत्पादन इस प्रकार है (मेगावाट में) कर्नाटक (7100), तेलगांना (5000), राजस्थान (4400), गुजरात (2654)। मध्यप्रदेश भी इस सूची में जल्द ही शामिल होने वाला है।

 एक नवम्बर 2020 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में विभिन्न स्रोतों से मिलने वाली बिजली (मेगावाट में) इस प्रकार है - राज्य थर्मल (5400), राज्य जल विद्युत (917), संयुक्त उपक्रम एवं अन्य (2456), केंद्रीय क्षेत्र  (5055), निजी क्षेत्र (1942), अल्ट्रा-मेगा पावर प्रोजेक्टस  (1485) एवं नवकरणीय ऊर्जा (3965) अर्थात 21 हजार 220 मेगावाट प्रतिदिन की क्षमता है। दिसम्बर 2020 में राज्य में अधिकतम बिजली की मांग 15 हजार मेगावाट दर्ज की गई थीजबकि वर्ष भर में औसत मांग लगभग हजार मेगावाट है। 

इसके अतिरिक्त रीवा में 750 मेगावाट की 'अल्ट्रा मेगा सोलर प्लांटशुरू हो चुका है। एक सरकारी विज्ञप्ति के मुताबिक इससे हर साल 15.7 लाख टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन को रोका जाएगाजो दो करोड़ 60 लाख पेड़ों के लगाने के बराबर है। मध्यप्रदेश के विभिन्न अंचलों में सोलर पावर प्लांट (मेगावाट में) कीआगर (550), नीमच (500), मुरैना(1400), शाजापुर(450), छतरपुर(1500) औरओंकारेश्व र (600) परियोजनाएंअर्थात कुल पांच हजार मेगावाट क्षमता की परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं।        

भारत में तीन करोड़ कृषि पम्प हैं जिनमें से एक करोड़ पम्प डीजल से चलाए जाते हैं। इन किसानों को  'ऊर्जा सुरक्षा उत्थान महा-अभियान' (कुसुम) योजना के तहत जो सोलर पम्प दिए जा रहे हैंउनसे कुल 28 हजार 250 मेगावाट बिजली पैदा होगी। मध्यप्रदेश सरकार का दावा है कि अब तक 14 हजार 250 किसानों के लिए सोलर पम्प स्थापित किये जा चुके हैं। तीन सालों में दो लाख पम्प और लगाने का लक्ष्य है। दूसरी ओरमध्यप्रदेश में अब तक 30 मेगावाट क्षमता के सोलर रूफ-टॉप संयत्र स्थापित किये जा चुके हैं। इस साल 700 सरकारी भवनों पर 50 मेगावाट के सोलर रूफ-टॉप और लगेंगे। भोपाल के निकट मंडीदीप में 400 औद्योगिक इकाईयों के लिए 32 मेगावाट क्षमता की सोलर रूफ-टॉप परियोजनाओं पर कार्य किया जा रहा है।

जबलपुर शहर की 'गन-कैरिज फैक्ट्री' (जीसीएफ)  और 'व्हीटकल फैक्ट्री' (वीएफजे) में 10-10 मेगावाट के सोलर प्लांट लगाए गए हैं। इन दोनों जगहों से बिजली का उत्पादन और वितरण किया जा रहा है। अब जितनी बिजली इन प्लांट से बनती हैउतना क्रेडिट इनके बिल में किया जा रहा है। ऐसे में न केवल 'वीएफजेऔर 'जीसीएफ,' बल्कि 'आयुध निर्माणीखम्हरिया' (ओएफके)तथा 'ग्रे-आयरनफाउंड्री' (जीआइएफ) को भी बिलों में बचत होने लगी है। न केवल चारों आयुध निर्माणी फैक्ट्रियांबल्कि इस्टेट के बंगले एवं क्वार्टर में होने वाली बिजली की खपत भी इसमें समाहित की गई है। इन दोनों सोलर प्लांट से हर साल करोड़ 60 लाख यूनिट से ज्यादा का बिजली उत्पादन किये जाने की अपेक्षा है। एक अनुमान के अनुसार इन दोनों प्लांट से 40 हजार टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को रोका जा सकेगा।                   

देश में अधिकांशलगभग 58 फीसदीबिजली का उत्पादन कोयले से होता है। भारत में बिजली की स्थापित क्षमतातीन लाख 73 हजार 436 मेगावाट हैजिसमें कोयला आधारित विद्युत संयंत्रों का योगदान  दो लाख 21 हजार 803 मेगावाट है। इसमें से 30 हजार मेगावाट से अधिक क्षमता के संयंत्र 20 साल से ज्यादा पुरानेखर्चीले और प्रदूषणकारी हैं। औद्योगिक विकास के लिए कोयला और पेट्रोलियम जलाने से निकलने वाला कार्बन का धुआं पृथ्वी के जलवायु परिवर्तन का मुख्य कारक है। 'ग्लोबल रिस्क इंडेक्स-2020' के अनुसार सन् 1998 से 2017 के बीच भारत में जलवायु परिवर्तन (सूखाअतिवृष्टिसमुद्री तूफान आदि) के कारण पांच लाख 99 हजार करोड़ रुपयों का आर्थिक नुकसान हुआ है। वहीं केवल सन् 2018 में जलवायु परिवर्तन से दो लाख 79 हजार करोड़ रुपयों का आर्थिक नुकसान हुआ और 2081 लोगों की मौतें हो गईं थीं।

 'राष्ट्रीय विद्युत नीतिके अनुसार अगले दशक में विद्युत की बढ़ती मांग को 2027 तक दो लाख 75 हजार मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा से पूरा किया जा सकता हैइसलिए कोयले के नये संयंत्रों की जरूरत नहीं पड़ेगी। ऐसी परिस्थितियों में बिजली की मांग और अर्थव्यवस्था की गति को बनाए रखने के लिए आवश्यक हो गया है कि नवीकरणीय ऊर्जा में निरंतर वृद्धि करते हुए विद्युत उत्पादन के लिए कोयले पर निर्भरता कम की जाए। वैसे भीवैश्विक एनजीओ 'ग्रीन पीसके अनुसार कोयले से उत्पन्न बिजलीसौर और पवन ऊर्जा से 65 फीसदी महंगी है।

सम्पूर्ण भारतीय भूभाग पर 5000 लाख करोड़ किलोवाट प्रति वर्ग किलोमीटर के बराबर सौर ऊर्जा आती हैजो कि विश्व की सम्पूर्ण खपत से कई गुना है। देश में वर्ष में 250 से 300 दिन ऐसे होते हैं जब सूर्य की रोशनी पूरे दिन भर उपलब्ध रहती है। भारत का दुनिया भर में बिजली के उत्पादन और खपत के मामले में पांचवां स्थान है। भारत की लगभग 72 फीसदी आबादी गांवों में निवास करती है और इनमें से हजारों गांव ऐसे भी हैं जो आज भी बिजली जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित है। यह देश को ऊर्जा की गुणवत्तासंरक्षण और ऊर्जा के नवीन स्रोतों पर ध्यान देने का उचित समय है। सौर ऊर्जाभारत में ऊर्जा की आवश्यकताओं की बढती मांग को पूरा करने का सबसे अच्छा तरीका है।राजकुमार सिन्हा

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गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

जलवायु परिवर्तनसे नाराज चार बच्चों ने किया 33 देशों के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज

पुर्तगाल के चार बच्चों और दो नवयुवाओं ने मिल कर यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय के आगे 33 देशों के खिलाफ जलवायु परिवर्तन को गति देने के लिए एक मुक़दमा दर्ज कर दिया है।

स्ट्रासबर्ग में यूरोपीय कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स के सामने दर्ज इस मुक़दमे में पुर्तगाल के इन चार बच्चों और दो नवयुवाओं ने जलवायु संकट को बढ़ाने के लिए 33 देशों को जवाबदेह ठहराया है। ग्लोबल लीगल एक्शन नेटवर्क (GLAN) के समर्थन के साथ लाया गया यह मामला जलवायु परिवर्तन के उनके जीवन और उनके शारीरिक और मानसिक भलाई और स्वास्थ्य के लिए बढ़ते खतरे पर केंद्रित है। सफल होने पर, 33 देश कानूनी रूप से बाध्य होंगे, न केवल उत्सर्जन में कटौती करने के लिए, बल्कि उनकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों सहित जलवायु परिवर्तन में विदेशी योगदान से निपटने के लिए भी।

पुर्तगाल के नब्बे साल में सबसे गर्म जुलाई रिकॉर्ड किए जाने के बाद मामला फाइल/दर्ज किया गया है। क्लाइमेट एनालिटिक्स द्वारा मामले के लिए तैयार की गई एक विशेषज्ञ रिपोर्ट में पुर्तगाल को एक जलवायु परिवर्तन "हॉटस्पॉट" के रूप में वर्णित किया गया है जो तेजी से घातक गर्मी के चरम को सहने के लिए सेट/तैयार है। चार युवा- आवेदक लीरिया में रहते हैं, जो विनाशकारी जंगल की आग की चपेट में आने वाले क्षेत्रों में से एक है, जिसमें 2017 में 120 से अधिक लोग मारे गए थे। शेष दो आवेदक लिस्बन में रहते हैं, जहां अगस्त 2018 में हीटवेव के दौरान 440C का एक नया तापमान रिकॉर्ड स्थापित किया गया था। वार्मिंग के लगभग 3 डिग्री सेल्सियस की ओर जाने वाले वर्तमान मार्ग पर, वैज्ञानिकों ने भविष्यवाणी की है कि पश्चिमी यूरोप में हीटवेव से 2071-2100 की अवधि तक पश्चिमी यूरोप में हीटवेव से होने वाली मौतों में तीस गुना वृद्धि होगी।

उनके वकील आधिकारिक क्लाइमेट एक्शन ट्रैकर का हवाला देते हैं जो देशों की उत्सर्जन कटौती नीतियों की विस्तृत रेटिंग प्रदान करता है। यूरोपीय संघ, ब्रिटेन, स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, रूस, तुर्की और यूक्रेन के लिए इसकी रेटिंग - जो मुकदमा दायर होने वाले 33 देशों को कवर करते हैं - बताते हैं कि पेरिस समझौते के समग्र लक्ष्य को पूरा करने के लिए उनकी नीतियां बहुत कमजोर हैं।

इस मामले पर मुक़दमा दर्ज करने वाले दो नवयुवाओं में से एक, कैटरिना मोटा, का कहना है, "मुझे यह जानकर घबराहट होती है कि हमारे द्वारा सहन की गई रिकॉर्ड तोड़ने वाली हीट वेव्स केवल शुरुआत हैं। इसे रोकने के लिए इतना कम समय बचा है, सरकारों को ठीक से हमारी रक्षा करने के लिए मजबूर करने के लिए, हमें वह सब कुछ करना चाहिए जो हम कर सकते हैं।

इस मामले पर GLAN के साथ जुड़े हुए कानूनी अधिकारी गैरी लिस्टन का मानना है, “यह मामला ऐसे समय में दायर किया जा रहा है जब यूरोपीय सरकारें कोविड -19 द्वारा प्रभावित अर्थव्यवस्थाओं को बहाल करने के लिए अरबों खर्च करने की योजना बना रही हैं। यदि वे जलवायु तबाही को रोकने के लिए अपने कानूनी दायित्वों के बारे में गंभीर हैं, तो वे इस धन का उपयोग जीवाश्म ईंधन से एक कट्टरपंथी और तेजी से संक्रमण को सुनिश्चित करने के लिए करेंगे। यूरोपीय संघ के लिए विशेष रूप से इसका मतलब है कि 2030 तक न्यूनतम 65% उत्सर्जन में कमी लक्ष्य के लिए प्रतिबद्ध होना। अगर यह एक ग्रीन रिकवरी  वसूली नहीं है तो कोई सच्ची रिकवरी नहीं है।"

(अमलेंदु उपाध्याय)

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सोमवार, 23 नवंबर 2020

एक महिला की हिम्मत से सैंकड़ों की समस्याएं सुलझ रहीं

सरकार के स्तर पर नागरिकों के लिए अनेक कल्याणकारी योजनाएं व कार्यक्रम हैं। विशेषकर निर्धन वर्ग व जरूरतमंद महिलाओं के लिए ऐसे अनेक कार्यक्रम हैं जो सही ढंग से उन तक पहुंचें तो काफी राहत पंहुचा सकते हैं। इसके अतिरिक्त समुदाय की आंतरिक समस्याओं से भी राहत मिलने के सरकार के कार्यक्रम है। उदाहरण के लिए घरेलू हिंसा से रक्षा के लिए महिलाओं के लिए अनेक कानूनी प्रावधान हैं व सहायता के कार्यक्रम हैं। 

समस्या यह है कि प्राय: सबसे जरूरतमंद लोगों तक इन कार्यक्रमों का लाभ नहीं पहुंच पाता है। न तो उनके पास इनकी जानकारी पंहुचती हैन वे इतने शिक्षित व सक्षम होते हैं कि इस राहत को प्राप्त करने के लिए समुचित प्रयास वे कर सकें। इस स्थिति में निर्धन वर्ग के बीच निरंतरता से कार्य करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता पूरी ईमानदारी व कर्मठता से अपनी भूमिका निभाएं तो वास्तविक जरूरतमंदों तक सरकारी लाभ पहुंचाने में व घरेलू हिंसा जैसी समस्याओं से रक्षा उपलब्ध करवाने में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। ऐसी ही भूमिका जयपुर की अनेक निर्धन बस्तियों में पुष्पा सैनी ने निभाई है।

पुष्पा सैनी ने स्वयं अपने निजी जीवन में भी बहुत कठिन स्थितियों का सामना सराहनीय साहस व दृढ़ निश्चय से किया है। प्रतिकूल स्थितियों में उन्होंने न केवल उच्च शिक्षा प्राप्त की अपितु अपने को समाज सेवा के कार्यों से निरंतर जोड़ा। पुष्पा का भरसक प्रयास रहा कि वे अन्य महिलाओं के दुख-दर्द को कम करने में सहायक बनें। इस कार्य में उन्हें जानी-मानी समाज सेविका प्रो. रेणुका पामेचा से बहुत सहयोग व प्रोत्साहन मिला। पुष्पा पहले उनकी छात्रा रही व फिर महिला हिंसा को कम करने में उनकी सह-यात्री बनी। रेणुका पामेचा ने महिला सलाहकार एवं सुरक्षा केन्द्र की स्थापना में व संचालन में अग्रणी भूमिका निभाई। हिंसा की शिकार महिलाओं को राहत दिलवाने के लिए उन्होंने महिला थानों की स्थापना के लिए अथक प्रयास किए। 
जब गांधीनगर (जयपुर) में महिला थाने की स्थापना हुई तो वहां महिला सलाहकार एवं सुरक्षा केन्द्र ने उच्च गुणवत्ता की जो काऊंसलिंग उपलब्ध करवाई उससे संकटग्रस्त महिलाओं की समस्याओं के समाधान में बहुत सहायता मिली। पुष्पा सैनी ने भी पहले यहां काऊंसलिंग की ही जिम्मेदारी संभाली और इसे बहुत मेहनत व योग्यता से निभाया। बाद में परिस्थितियां बदलने पर यह जरूरत महसूस हुई कि काऊंसलिंग व अन्य सहायता का कार्य कुछ निर्धन बस्तियों की महिलाओं के अधिक नजदीक रहकर किया जाए। 

इसी समय के आसपास पुष्पा सैनी को इस कार्य के लिए डैमोक्रेसी फैलोशिप भी प्राप्त हुई। इस फैलोशिप के अंतर्गत उन्हें विभिन्न सामाजिक समस्याओं से जूझने वाले अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं से मिलने व उनके अनुभवों से सीखने का अवसर भी मिला। अनेेक स्तरों पर उन्हें क्षमता विकास के अवसर मिले व इससे अपनी नई जिम्मेदारियों को निभाने में उन्हें सहायता मिली। पुष्पा का कार्यक्षेत्र जयपुर में भट्टा नगर व शास्त्री नगर है। 
यहां संजय नगरराणा कालोनी जैसी अनेक बस्तियां है। इन बस्तियों में निर्धन व जरूरतमंद लोग अधिक है। मुस्लिम बहुल आबादी है। जरूरत पड़ने पर सामान्य कार्यक्षेत्र से बाहर भी पुष्पा पहुंचती हैं। इन बस्तियों में महिला हिंसा की समस्या कम करने में पुष्पा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। प्राय: हिंसा की शिकार अधिकांश महिलाओं का प्रयास यही होता है कि हिंसा होने पर पति (या परिवार के अन्य सदस्य) पर हिंसा की राह छोड़ने के लिए दबाव पड़े। इसमें पुष्पा की भूमिका महिला सलाहकार एवं सुरक्षा केन्द्र की सहायता से यह रहती है कि उन्हें बुलाकर समझाया जाए व यह चेतावनी भी दी जाए कि यदि उन्होंने हिंसा की राह नहीं छोड़ी तो कानून के अन्तर्गत बहुत कड़ी कार्यवाही उनके विरुद्ध होगी। प्राय: इसका असर हिंसा करने वाले पुरुषों पर होता है व वे आगे हिंसा नहीं करते हैं।

पुष्पा ने चूंकि अपना कार्यालय इन बस्तियों के बहुत नजदीक बनाया है व वहां निरंतर जाती रहती हैंअत: अब महिलाओं के लिए संपर्क करना सरल हो गया है व अधिक आसानी से वे अपनी समस्या का समाधान करा पाती है। पुष्पा ने एक मिसाल कायम की है कि ई-मित्र की भूमिका को पूरी ईमानदारी व निष्ठा से निभाया जाए तो यह भूमिका कमजोर वर्गविशेषकर महिलाओं के लिए कितनी लाभदायक हो सकती है। 
ई-मित्र के माध्यम से महिलाओं को पेंशनराशनश्रमिक पंजीकरणविभिन्न योजनाओं व पहचान पत्र के लिए जरूरी सहायता भट्टा बस्तीशास्त्री नगर आदि के लोगों को उपलब्ध करवाई जाती हैं। उदाहरण के लिए यदि किसी को पेंशन नहीं मिल रही है या पहले मिलने के बाद अब रुक गई है तो पहले कंप्यूटर पर उसकी स्थिति को भली-भांति देखकर जानकारी दी जाती है व फिर आगे जिस विभाग या अधिकारी से संपर्क करना है वह सहायता भी दी जाती है। 
जन-सुनवाई जैसे कार्यक्रम में भी उनकी समस्या को उठाया जाता है। जन-सुनवाईयों के माध्यम से समस्याओं का समाधान प्राप्त करने का सामाजिक तरीका असरदार सिद्ध हुआ है। महिलाओं में आजीविका अवसर बढ़ाने के लिए महिला पुनर्वास समूह समिति इस क्षेत्र में सक्रिय रही है और पुष्पा संस्था की कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय है। इस संस्था की ओर से यहां सिलाई सिखाने का कार्य किया गया है जिसमें स्थानीय महिलाओं ने बहुत रुचि ली।

आज अनेक महिलाए इस प्रशिक्षण पर आधारित अपनी आय के अवसर प्राप्त कर सकी हैं या बढ़ा सकी हैं। शिक्षा के बाद युवाओं के लिए आजीविका व कौशल-वृद्धि के अवसर कहां उपलब्ध हैंइसके बारे में भी पुष्पा व समिति की ओर से महत्त्वपूर्ण जानकारी बस्ती स्तर पर उपलब्ध करवाई जाती है। इस कारण अनेक युवा महत्त्वपूर्ण प्रशिक्षणों से जुड़ सके व रोजगार प्राप्त कर सके। 
पुष्पा सैनी का चयन 'डेमोक्रेसी फैलोशिप के रूप में हुआ तो विभिन्न जिम्मदारियों को और भी बेहतर ढंग से निभाने के लिए फष्पा को अपनी क्षमता वृद्धि के भी पर्याप्त अवसर मिले। उदाहरण के लिए ई-मित्र चलाने के लिए प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। यह प्रशिक्षण पुष्पा के लिए व्यवहारिक स्तर पर बहुत उपयोगी रहा। इस फैलोशिप से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ताओं से भी बहुत कुछ सीखने का अवसर मिला। विभिन्न सामाजिक सुरक्षा योजनाओं की जानकारी लोगों तक सहज व सरल रूप में पहुंच सकेउसके लिए महिला पुनर्वास समूह समिति ने दो बहुत उपयोगी पुस्तिकाओं का प्रकाशन किया है। इन्हें तैयार करने में भी पुष्पा ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया व अनेक कार्यालयों में जा कर वहंा से जरूरी जानकारी प्राप्त की। अपनी समस्याओं से घबराए बिना उनका सामना मजबूती से करते हुए पुष्पा ने जिस तरह सैंकड़ों महिलाओं की गंभीर समस्याओं के समाधान में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया हैयह बहुत हिम्मत वाली प्रेरणादायक यात्रा रही है। 
(भारत डोगरा) 
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