नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शनिवार, 29 अगस्त 2026

झुकी कमान - चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी'

 (1)

आए प्रचंड रिपु, शब्द सुना उन्हीं का,
भेजी सभी जगह एक झुकी कमान।
ज्यों युद्ध चिह्न समझे सब लोग धाये,
त्यों साथ थी कह रही यह व्योम वाणी॥
"सुना नहीं क्या रणशंखनाद ?
चलो पके खेत किसान! छोड़ो।
पक्षी उन्हें खांय, तुम्हें पड़ा क्या?
भाले भिड़ाओ, अब खड्ग खोलो।
हवा इन्हें साफ़ किया करैगी,-
लो शस्त्र, हो लाल न देश-छाती॥"

स्वाधीन का सुत किसान सशस्त्र दौड़ा,-
आगे गई धनुष के संग व्योमवाणी।

 


(2)

छोड़ो शिकारी! गिरी की शिकार,
उठा पुरानी तलवार लीजै।
स्वतंत्र छूटें अब बाघ भालू,
पराक्रमी और शिकार कीजै।
बिना सताए मृग चौकड़ी लें-
लो शस्त्र, हैं शत्रु समीप आएं ॥"
आया सशस्त्र, तजके मृगया अधूरी;
आगे गई धनुष के संग व्योमवाणी॥

 


(3)

"ज्योनार छोड़ो सुख की, रईसो!
गीतांत की बाट न वीर! जोहो।
चाहे घना झाग सुरा दिखावै,
प्रकाश में सुंदरि नाचती हों।
प्रासाद छोड़, सब छोड़ दौड़ो,
स्वदेश के शत्रु अवश्य मारो।"
सर्दार ने धनुष ले, तुरही बजाई; -
आगे गई धनुष के संग व्योमवाणी॥

 

(4)

राजन! पिता की तब वीरता को,
कुंजों, किलों में सब गा रहे हैं।
गोपाल बैठे जहँ गीत गावैं ,
या भाट वीणा झनका रहे हैं॥
अफ़ीम छोड़ो, कुल-शत्रु आए-
नया तुम्हारा यश भाट पावैं।"

बंदूक ले नृप-कुमार बना सु-नेता,
आगे गई धनुष के सँग व्योमवाणी॥

 

(5)

"छोड़ो अधूरा अब यज्ञ ब्रह्मन !
वेदांत-पारायण को बिसारो।
विदेश ही का बलि वैश्वदेव,
' तर्पणों में रिपुरक्त डारो॥
शस्त्रार्थ शास्त्रार्थ गिनो अभी से-
चलो, दिखाओ हम अग्रजन्मा॥
धोती सम्हाल, कुश छोड़, सबाण दौड़े-
आगे गई धनुष के संग व्योमवाणी॥

 

(6)

"माता! न रोको निज पुत्र आज,
संग्राम का मोद उसे चखाओ।
तलवार भाले भगिनी! उठा ला,
उत्साह भाई निज को दिलाओ॥
तू सुंदरी! ले प्रिय से विदाई,
स्वदेश माँगे उनकी सहाई॥"
आगे गई धनुष के संग व्योमवाणी
है सत्य की विजय, निश्चय बात जानी॥
है जन्मभूमि जिनको जननी समान,
स्वातंत्र्य है प्रिय जिन्हें शुभ स्वर्ग से भी,
अन्याय की जकड़ती कटु बेड़ियों को,
विद्वान वे कब समीप निवास देंगे?

 

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कृष्णधरशर्मा Krishnadharsharma

नागार्जुन के बाँदा आने पर - केदारनाथ अग्रवाल

 

यह बाँदा है।

सूदख़ोर आढ़त वालों की इस नगरी में,

 

जहाँ मार, काबर, कछार, मड़ुआ की फ़सलें,

कृषकों के पौरुष से उपजा कन-कन सोना,

 

लढ़ियों में लद-लद कर आ कर,

बीच हाट में बिक कर कोठों-गोदामों में,

 

गहरी खोहों में खो जाता है जा-जा कर,

और यहाँ पर

 

रामपदारथ, रामनिहोरे,

बेनी पंडित, बासुदेव, बल्देव, विधाता,

 

चंदन, चतुरी और चतुर्भुज,

गाँवों से आ-आ कर गहने गिरवी रखते,

 

बढ़े ब्याज के मुँह में बर-बस बेबस घुसते,

फिर भी घर का ख़र्च नहीं पूरा कर सकते,

 

मोटा खाते, फटा पहनते,

लस्टम-पस्टम जैसे-तैसे भरते-खपते,

 

न्याय यहाँ पर अन्यायों पर विजय न पाता,

सत्य सरल होकर कोरा असत्य रह जाता,

 

न्यायालय की ड्योढ़ी पर दब कर मर जाता,

यहाँ हमारे भावी राष्ट्र-विधाता,

 

युग के बच्चे,

विद्यालय मे वाणी विद्या-बुद्धि न पाते,

 

विज्ञानी बनने से वंचित रह जाते,

केवल मिट्टी में मिल जाते।

 

यह बाँदा है,

और यहाँ पर मैं रहता हूँ,

 

जीवन-यापन कठिनाई से ही करता हूँ,

कभी काव्य की कई पंक्तियाँ,

 

कभी आठ-दस बीस पंक्तियाँ,

और कभी कविताएँ लिखकर,

 

प्यासे मन की प्यास बुझा लेता हूँ रस से,

शायद ही आता है कोई मित्र यहाँ पर,

 

शायद ही आती हैं मेरे पास चिट्ठियाँ।

मेरे कवि-मित्रों ने मुझ पर कृपा न की है,

 

इसीलिए रहता उदास हूँ, खोया-खोया,

अपने दुख-दर्दों में डूबा,

 

जन-साधारण की हालत से ऊबा-ऊबा,

बाण-बिंधे पक्षी-सा घायल,

 

जल से निकली हुई मीन-सा, विकल तड़पता,

इसीलिए आतुर रहता हूँ,

 

कभी-कभी तो कोई आए,

छठे-छमाहे चार-पाँच दिन तो रह जाए,

 

मेरे साथ बिताए,

काव्य, कला, साहित्य-क्षेत्र की छटा दिखाए,

 

और मुझे रस से भर जाए, मधुर बनाए,

फिर जाए, जीता मुझको कर जाए।

 

आख़िर मैं भी तो मनुष्य हूँ,

और मुझे भी कवि-मित्रों का साथ चाहिए,

 

लालायित रहता हूँ मैं सबसे मिलने को,

श्याम सलिल के श्वेत कमल-सा खिल उठने को।

 

सच मानो जब यहाँ निराला जी आए थे,

कई साल हो गए, यहाँ कम रह पाए थे,

 

उन्हें देख कर मुग्ध हुआ था, धन्य हुआ था,

कविताओं का पाठ उन्हीं के मुख से सुनकर,

 

गंधर्वों को भूल गया था,

तानसेन को भूल गया था,

 

सूरदास, तुलसी, कबीर को भूल गया था,

ऐसी वाणी थी हिंदी के महाकृती की।

 

तब यह बाँदा काव्य-कला की पुरी बना था,

और साल पर साल यहाँ मधुमास रहा था,

 

बंबेश्वर के पत्थर भी बन गए हृदय थे,

चूनरिया बन गई हवा थी, गौने वाली,

 

और गगन का राजा सूरज दूल्हा बन कर,

चूम रहा था प्रिय दुलहन को।

 

फिर दिन बीते, मधु-घट रीते,

फिर पहले-सा यह नीरस हो गया नगर था,

 

फिर पहले-सा मैं चिंतित था,

फिर मेरा मन भी कुंठित था,

 

फिर लालायित था मिलने की कवि-मित्रों से,

फिर मैं उनकी बाट जोहता रहा निरंतर,

 

जैसे खेतिहर बाट जोहता है बादल की,

जैसे भारत बाट जोहता है सूरज की,

 

किंतु न कोई आया,

आने के वादे मित्रों के टूटे,

 

कई वर्ष फिर बीते,

रंग हुए सब फीके,

 

और न कोई रही हृदय में आशा।

तभी बंधुवर शर्मा आए,

 

महादेव साहा भी आए,

और निराला-पर्व मनाया हम लोगों ने,

 

मुंशी जी के पुस्तक-घर में,

एक बार फिर मिला सुअवसर मधु पीने का,

 

कविता का झरना बन कर झर-झर जीने का,

लगातार घंटों, पहरों तक,

 

एक साथ साँसें लेने का,

एक साथ दिल की धड़कन से ध्वनि करने का,

 

ऐसा लगा कि जैसे हम सब,

एक प्राण हैं, एक देह हैं, एक गीत हैं, एक गूँज हैं

 

इस विराट फैली धरती के,

और हमी तो वाल्मीकि हैं, कालिदास हैं,

 

तुलसी हैं, हिंदी कविता के हरिशचंद्र हैं,

और निराला हमी लोग हैं,

 

बंधु! आज भी वह दिन मुझको नहीं भूलता,

उसकी स्मृति अब भी बेले-सी महक रही है,

 

उस दिन का आनंद आज

कालिदास का छंद बना मन मोह रहा है,

 

मुक्त मोर बन श्याम बदरिया भरे हृदय में,

दुपहरिया में, शाम-सबेरे नाच रहा है,

 

रैन-अँधेरे में चंदनियाँ बाँह पसारे,

हमको, सबको भेंट रहा है।

 

संभवतः उस दिन मेरा नव जन्म हुआ था,

संभवतः उस दिन मुझको कविता ने चूमा,

 

संभवतः उस दिन मैंने हिमगिरि को देखा,

गंगा के कूलों की मिट्टी मैंने पाई,

 

उस मिट्टी से उगलती फ़सलें मैंने पाईं,

और उसी के कारण अब बाँदा में जीवित रहता हूँ,

 

और उसी के कारण अब तक कविता की रचना करता हूँ,

और तुम्हारे लिए पसारे बाँह खड़ा हूँ,

 

आओ साथी गले लगा लूँ,

तुम्हें, तुम्हारी मिथिला की प्यारी धरती को,

 

इसमें व्यापे विद्यापति को,

और वहाँ की जनवाणी के छंद चूम लूँ,

 

और वहाँ के गढ़-पोखर का पानी छू कर नैन जुड़ा लूँ,

और वहाँ के दुखमोचन, मोहन माँझी को मित्र बना लूँ,

 

और वहाँ के हर चावल को हाथों में ले हृदय लगा लूँ,

और वहाँ की आबहवा से वह सुख पा लूँ

 

जो नृत्यों में नाचा जा कर कभी न चुकता,

जो आँखों में आँजा जा कर कभी न चुकता,

 

जो ज्वाला में डाला जा कर कभी न जलता,

जो रोटी में खाया जा कर कभी न कमता,

 

जो गोली से मारा जा कर कभी न मरता,

जो दिन दूना रात चौगुना व्यापक बनता,

 

और वहाँ नदियों में बहता,

नावों को ले आगे बढ़ता,

 

और वहाँ फूलों में खिलता,

बागों को सौरभ से भरता।

 

अहोभाग्य है जो तुम आए मुझसे मिलने,

इस बाँदा में चार रोज़ के लिए ठहरने,

 

अहोभाग्य है मेरा, मेरे घर वालों का,

जिनको तुम स्वागत से हँसते देख रहे हो।

 

अहोभाग्य है इस जीवन के इन कूलों का,

जिनको तुम अपनी कविता से सींच रहे हो।

 

अहोभाग्य हैं हम दोनों का,

जिनको आजीवन जीना है काव्य-क्षेत्र में।

 

अहोभाग्य है हम दोनों की इन आँखों का,

जिनमें अनबुझ ज्योति जगी है अपने युग की।

 

अहोभाग्य है दो जनकवियों के हृदयों का

जिनकी धड़कन गरज रही है घन-गर्जन-सी।

 

अहोभाग्य है कठिनाई में पड़े हुए प्रत्येक व्यक्ति का,

जिनका साहस-शौर्य न घटता।

 

अहोभाग्य है स्वयं उगे इन सब पेड़ों का,

जिनके द्रुम-दल झरते फिर-फिर नए निकलते।

 

अहोभाग्य है हर छोटी चंचल चिड़िया का,

जिनका नीड़ बिगड़ते-बनते देर न लगती।

 

अहोभाग्य है बंबेश्वर की चौड़ी-चकली चट्टानों का,

जिनको तुमने प्यार किया है, सहलाया है।

 

अहोभाग्य है केन नदी के इस पानी का,

जिसकी धारा बनी तुम्हारे स्वर की धारा।

 

अहोभाग्य है बाँदा की इस कठिन भूमि का,

जिसको तुमने चरण छुला कर जिला दिया है।

 

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कृष्णधरशर्मा Krishnadharsharma

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

अमृता प्रीतम - मन योगी तन भस्म भया

 

मन योगी तन भस्म भया

तू कैसो हर्फ़ कमाया


अज़ल के योगी ने फूँक जो मारी

इश्क़ का हर्फ़ अलाया...

 

धूनी तपती मेरे मौला वाली

मस्तक नाद सुनाई दे

 

अंतर में एक दीया जला

आस्मान तक रोशनाई दे

 

कैसो रमण कियो रे जोगी!

किछु न रहियो पराया

 

मन योगी तन भस्म भया

तू ऐसी हर्फ़ कमाया...

 

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कृष्णधरशर्मा Krishnadharsharma

बुधवार, 19 अगस्त 2026

राम की शक्ति-पूजा - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'


रवि हुआ अस्त : ज्योति के पत्र पर लिखा अमर

रह गया राम-रावण का अपराजेय समर

 

आज का, तीक्ष्ण-शर-विधृत-क्षिप्र-कर वेग-प्रखर,

शतशेलसंवरणशील, नीलनभ-गर्ज्जित-स्वर,

 

प्रतिपल-परिवर्तित-व्यूह-भेद-कौशल-समूह,

राक्षस-विरुद्ध प्रत्यूह,—क्रुद्ध-कपि-विषम—हूह,

 

विच्छुरितवह्नि—राजीवनयन-हत-लक्ष्य-बाण,

लोहितलोचन-रावण-मदमोचन-महीयान,

 

राघव-लाघव-रावण-वारण—गत-युग्म-प्रहर,

उद्धत-लंकापति-मर्दित-कपि-दल-बल-विस्तर,

 

अनिमेष-राम-विश्वजिद्दिव्य-शर-भंग-भाव,

विद्धांग-बद्ध-कोदंड-मुष्टि—खर-रुधिर-स्राव,

 

रावण-प्रहार-दुर्वार-विकल-वानर दल-बल,

मूर्च्छित-सुग्रीवांगद-भीषण-गवाक्ष-गय-नल,

 

वारित-सौमित्र-भल्लपति—अगणित-मल्ल-रोध,

गर्ज्जित-प्रलयाब्धि—क्षुब्ध—हनुमत्-केवल-प्रबोध,

 

उद्गीरित-वह्नि-भीम-पर्वत-कपि-चतुः प्रहर,

जानकी-भीरु-उर—आशाभर—रावण-सम्वर।

 

लौटे युग-दल। राक्षस-पदतल पृथ्वी टलमल,

बिंध महोल्लास से बार-बार आकाश विकल।

 

वानर-वाहिनी खिन्न, लख निज-पति-चरण-चिह्न

चल रही शिविर की ओर स्थविर-दल ज्यों विभिन्न;

 

प्रशमित है वातावरण; नमित-मुख सांध्य कमल

लक्ष्मण चिंता-पल, पीछे वानर-वीर सकल;

 

रघुनायक आगे अवनी पर नवनीत-चरण,

श्लथ धनु-गुण है कटिबंध स्रस्त—तूणीर-धरण,

 

दृढ़ जटा-मुकुट हो विपर्यस्त प्रतिलट से खुल

फैला पृष्ठ पर, बाहुओं पर, वक्ष पर, विपुल

 

उतरा ज्यों दुर्गम पर्वत पर नैशांधकार,

चमकती दूर ताराएँ ज्यों हों कहीं पार।

 

आए सब शिविर, सानु पर पर्वत के, मंथर,

सुग्रीव, विभीषण, जांबवान आदिक वानर,

 

सेनापति दल-विशेष के, अंगद, हनुमान

नल, नील, गवाक्ष, प्रात के रण का समाधान

 

करने के लिए, फेर वानर-दल आश्रय-स्थल।

बैठे रघु-कुल-मणि श्वेत शिला पर; निर्मल जल

 

ले आए कर-पद-क्षालनार्थ पटु हनुमान;

अन्य वीर सर के गए तीर संध्या-विधान

 

वंदना ईश की करने को, लौटे सत्वर,

सब घेर राम को बैठे आज्ञा को तत्पर।

 

पीछे लक्ष्मण, सामने विभीषण, भल्लधीर,

सुग्रीव, प्रांत पर पाद-पद्म के महावीर;

 

यूथपति अन्य जो, यथास्थान, हो निर्निमेष

देखते राम का जित-सरोज-मुख-श्याम-देश।

 

है अमानिशा; उगलता गगन घन अंधकार;

खो रहा दिशा का ज्ञान; स्तब्ध है पवन-चार;

 

अप्रतिहत गरज रहा पीछे अंबुधि विशाल;

भूधर ज्यों ध्यान-मग्न; केवल जलती मशाल।

 

स्थिर राघवेंद्र को हिला रहा फिर-फिर संशय,

रह-रह उठता जग जीवन में रावण-जय-भय;

 

जो नहीं हुआ आज तक हृदय रिपु-दम्य-श्रांत,

एक भी, अयुत-लक्ष में रहा जो दुराक्रांत,

 

कल लड़ने को हो रहा विकल वह बार-बार,

असमर्थ मानता मन उद्यत हो हार-हार।

 

ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत

जागी पृथ्वी-तनया-कुमारिका-छवि, अच्युत

 

देखते हुए निष्पलक, याद आया उपवन

विदेह का,—प्रथम स्नेह का लतांतराल मिलन

 

नयनों का—नयनों से गोपन—प्रिय संभाषण,

पलकों का नव पलकों पर प्रथमोत्थान-पतन,

 

काँपते हुए किसलय,—झरते पराग-समुदय,

गाते खग-नव-जीवन-परिचय,—तरु मलय—वलय,

 

ज्योति प्रपात स्वर्गीय,—ज्ञात छवि प्रथम स्वीय,

जानकी—नयन—कमनीय प्रथम कम्पन तुरीय।

 

सिहरा तन, क्षण-भर भूला मन, लहरा समस्त,

हर धनुर्भंग को पुनर्वार ज्यों उठा हस्त,

 

फूटी स्मिति सीता-ध्यान-लीन राम के अधर,

फिर विश्व-विजय-भावना हृदय में आई भर,

 

वे आए याद दिव्य शर अगणित मंत्रपूत,

फड़का पर नभ को उड़े सकल ज्यों देवदूत,

 

देखते राम, जल रहे शलभ ज्यों रजनीचर,

ताड़का, सुबाहु, विराध, शिरस्त्रय, दूषण, खर;

 

फिर देखी भीमा मूर्ति आज रण देखी जो

आच्छादित किए हुए सम्मुख समग्र नभ को,

 

ज्योतिर्मय अस्त्र सकल बुझ-बुझकर हुए क्षीण,

पा महानिलय उस तन में क्षण में हुए लीन,

 

लख शंकाकुल हो गए अतुल-बल शेष-शयन,

खिंच गए दृगों में सीता के राममय नयन;

 

फिर सुना—हँस रहा अट्टहास रावण खलखल,

भावित नयनों से सजल गिरे दो मुक्ता-दल।

 

बैठे मारुति देखते राम—चरणारविंद

युग ‘अस्ति-नास्ति' के एक-रूप, गुण-गण—अनिंद्य;

 

साधना-मध्य भी साम्य—वाम-कर दक्षिण-पद,

दक्षिण-कर-तल पर वाम चरण, कपिवर गद्-गद्

 

पा सत्य, सच्चिदानंदरूप, विश्राम-धाम,

जपते सभक्ति अजपा विभक्त हो राम-नाम।

 

युग चरणों पर आ पड़े अस्तु वे अश्रु युगल,

देखा कपि ने, चमके नभ में ज्यों तारादल;

 

ये नहीं चरण राम के, बने श्यामा के शुभ,

सोहते मध्य में हीरक युग या दो कौस्तुभ;

 

टूटा वह तार ध्यान का, स्थिर मन हुआ विकल,

संदिग्ध भाव की उठी दृष्टि, देखा अविकल

 

बैठे वे वही कमल-लोचन, पर सजल नयन,

व्याकुल-व्याकुल कुछ चिर-प्रफुल्ल मुख, निश्चेतन।

 

'ये अश्रु राम के' आते ही मन में विचार,

उद्वेल हो उठा शक्ति-खेल-सागर अपार,

 

हो श्वसित पवन-उनचास, पिता-पक्ष से तुमुल,

एकत्र वक्ष पर बहा वाष्प को उड़ा अतुल,

 

शत घूर्णावर्त, तरंग-भंग उठते पहाड़,

जल राशि-राशि जल पर चढ़ता खाता पछाड़

 

तोड़ता बंध—प्रतिसंध धरा, हो स्फीत-वक्ष

दिग्विजय-अर्थ प्रतिपल समर्थ बढ़ता समक्ष।

 

शत-वायु-वेग-बल, डुबा अतल में देश-भाव,

जलराशि विपुल मथ मिला अनिल में महाराव

 

वज्रांग तेजघन बना पवन को, महाकाश

पहुँचा, एकादशरुद्र क्षुब्ध कर अट्टहास।

 

रावण-महिमा श्मामा विभावरी-अंधकार,

यह रुद्र राम-पूजन-प्रताप तेजःप्रसार;

 

उस ओर शक्ति शिव की जो दशस्कंध-पूजित,

इस ओर रुद्र-वंदन जो रघुनंदन-कूजित;

 

करने को ग्रस्त समस्त व्योम कपि बढ़ा अटल,

लख महानाश शिव अचल हुए क्षण-भर चंचल,

 

श्यामा के पदतल भारधरण हर मंद्रस्वर

बोले—“संबरो देवि, निज तेज, नहीं वानर

 

यह,—नहीं हुआ शृंगार-युग्म-गत, महावीर,

अर्चना राम की मूर्तिमान अक्षय-शरीर,

 

चिर-ब्रह्मचर्य-रत, ये एकादश रुद्र धन्य,

मर्यादा-पुरुषोत्तम के सर्वोत्तम, अनन्य

 

लीलासहचर, दिव्यभावधर, इन पर प्रहार

करने पर होगी देवि, तुम्हारी विषम हार;

 

विद्या का ले आश्रय इस मन को दो प्रबोध,

झुक जाएगा कपि, निश्चय होगा दूर रोध।

 

कह हुए मौन शिव; पवन-तनय में भर विस्मय

सहसा नभ में अंजना-रूप का हुआ उदय;

 

बोली माता—“तुमने रवि को जब लिया निगल

तब नहीं बोध था तुम्हें, रहे बालक केवल;

 

यह वही भाव कर रहा तुम्हें व्याकुल रह-रह,

यह लज्जा की है बात कि माँ रहती सह-सह;

 

यह महाकाश, है जहाँ वास शिव का निर्मल

पूजते जिन्हें श्रीराम, उसे ग्रसने को चल

 

क्या नहीं कर रहे तुम अनर्थ?—सोचो मन में;

क्या दी आज्ञा ऐसी कुछ श्रीरघुनंदन ने?

 

तुम सेवक हो, छोड़कर धर्म कर रहे कार्य

क्या असंभाव्य हो यह राघव के लिए धार्य?

 

कपि हुए नम्र, क्षण में माताछवि हुई लीन,

उतरे धीरे-धीरे, गह प्रभु-पद हुए दीन।

 

राम का विषण्णानन देखते हुए कुछ क्षण,

''हे सखा'', विभीषण बोले, “आज प्रसन्न वदन

 

वह नहीं, देखकर जिसे समग्र वीर वानर

भल्लूक विगत-श्रम हो पाते जीवन—निर्जर;

 

रघुवीर, तीर सब वही तूण में हैं रक्षित,

है वही वक्ष, रण-कुशल हस्त, बल वही अमित,

 

हैं वही सुमित्रानंदन मेघनाद-जित-रण,

हैं वही भल्लपति, वानरेंद्र सुग्रीव प्रमन,

 

तारा-कुमार भी वही महाबल श्वेत धीर,

अप्रतिभट वही एक—अर्बुद-सम, महावीर,

 

है वही दक्ष सेना-नायक, है वही समर,

फिर कैसे असमय हुआ उदय यह भाव-प्रहर?

 

रघुकुल गौरव, लघु हुए जा रहे तुम इस क्षण,

तुम फेर रहे हो पीठ हो रहा जब जय रण!

 

कितना श्रम हुआ व्यर्थ! आया जब मिलन-समय,

तुम खींच रहे हो हस्त जानकी से निर्दय!

 

रावण, रावण, लंपट, खल, कल्मष-गताचार,

जिसने हित कहते किया मुझे पाद-प्रहार,

 

बैठा उपवन में देगा दु:ख सीता को फिर,

कहता रण की जय-कथा पारिषद-दल से घिर;

 

सुनता वसंत में उपवन में कल-कूजित पिक

मैं बना किंतु लंकापति, धिक्, राघव, धिक् धिक्!

 

सब सभा रही निस्तब्ध : राम के स्तिमित नयन

छोड़ते हुए, शीतल प्रकाश देखते विमन,

 

जैसे ओजस्वी शब्दों का जो था प्रभाव

उससे न इन्हें कुछ चाव, न हो कोई दुराव;

 

ज्यों हों वे शब्द मात्र,—मैत्री की समनुरक्ति,

पर जहाँ गहन भाव के ग्रहण की नहीं शक्ति।

 

कुछ क्षण तक रहकर मौन सहज निज कोमल स्वर

बोले रघुमणि—मित्रवर, विजय होगी न समर;

 

यह नहीं रहा नर-वानर का राक्षस से रण,

उतरीं पा महाशक्ति रावण से आमंत्रण;

 

अन्याय जिधर, हैं उधर शक्ति! कहते छल-छल

हो गए नयन, कुछ बूँद पुनः ढलके दृगजल,

 

रुक गया कंठ, चमका लक्ष्मण-तेजः प्रचंड,

धँस गया धरा में कपि गह युग पद मसक दंड,

 

स्थिर जांबवान,—समझते हुए ज्यों सकल भाव,

व्याकुल सुग्रीव,—हुआ उर में ज्यों विषम घाव,

 

निश्चित-सा करते हुए विभीषण कार्य-क्रम,

मौन में रहा यों स्पंदित वातावरण विषम।

 

निज सहज रूप में संयत हो जानकी-प्राण

बोले—“आया न समझ में यह दैवी विधान;

 

रावण, अधर्मरत भी, अपना, मैं हुआ अपर

यह रहा शक्ति का खेल समर, शंकर, शंकर!

 

करता मैं योजित बार-बार शर-निकर निशित

हो सकती जिनसे यह संसृति संपूर्ण विजित,

 

जो तेजःपुंज, सृष्टि की रक्षा का विचार

है जिनमें निहित पतनघातक संस्कृति अपार

 

शत-शुद्धि-बोध—सूक्ष्मातिसूक्ष्म मन का विवेक,

जिनमें है क्षात्रधर्म का धृत पूर्णाभिषेक,

 

जो हुए प्रजापतियों से संयम से रक्षित,

वे शर हो गए आज रण में श्रीहत, खंडित!

 

देखा, हैं महाशक्ति रावण को लिए अंक,

लांछन को ले जैसे शशांक नभ में अशंक;

 

हत मंत्रपूत शर संवृत करतीं बार-बार,

निष्फल होते लक्ष्य पर क्षिप्र वार पर वार!

 

विचलित लख कपिदल, क्रुद्ध युद्ध को मैं ज्यों-ज्यों,

झक-झक झलकती वह्नि वामा के दृग त्यों-त्यों,

 

पश्चात्, देखने लगीं मुझे, बँध गए हस्त,

फिर खिंचा न धनु, मुक्त ज्यों बँधा मैं हुआ त्रस्त!

 

कह हुए भानुकुलभूषण वहाँ मौन क्षण-भर,

बोले विश्वस्त कंठ से जांबवान—रघुवर,

 

विचलित होने का नहीं देखता मैं कारण,

हे पुरुष-सिंह, तुम भी यह शक्ति करो धारण,

 

आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर,

तुम वरो विजय संयत प्राणों से प्राणों पर;

 

रावण अशुद्ध होकर भी यदि कर सका त्रस्त

तो निश्चय तुम हो सिद्ध करोगे उसे ध्वस्त,

 

शक्ति की करो मौलिक कल्पना, करो पूजन,

छोड़ दो समर जब तक न सिद्धि हो, रघुनंदन!

 

तब तक लक्ष्मण हैं महावाहिनी के नायक

मध्य भाग में, अंगद दक्षिण-श्वेत सहायक,

 

मैं भल्ल-सैन्य; हैं वाम पार्श्व में हनूमान,

नल, नील और छोटे कपिगण—उनके प्रधान;

 

सुग्रीव, विभीषण, अन्य यूथपति यथासमय

आएँगे रक्षाहेतु जहाँ भी होगा भय।”

 

खिल गई सभा। ‘‘उत्तम निश्चय यह, भल्लनाथ!”

कह दिया वृद्ध को मान राम ने झुका माथ।

 

हो गए ध्यान में लीन पुनः करते विचार,

देखते सकल-तन पुलकित होता बार-बार।

 

कुछ समय अनंतर इंदीवर निंदित लोचन

खुल गए, रहा निष्पलक भाव में मज्जित मन।

 

बोले आवेग-रहित स्वर से विश्वास-स्थित

मातः, दशभुजा, विश्व-ज्योतिः, मैं हूँ आश्रित;

 

हो विद्ध शक्ति से है खल महिषासुर मर्दित,

जनरंजन-चरण-कमल-तल, धन्य सिंह गर्ज्जित!

 

यह, यह मेरा प्रतीक, मातः, समझा इंगित;

मैं सिंह, इसी भाव से करूँगा अभिनंदित।”

 

कुछ समय स्तब्ध हो रहे राम छवि में निमग्न,

फिर खोले पलक कमल-ज्योतिर्दल ध्यान-लग्न;

 

हैं देख रहे मंत्री, सेनापति, वीरासन

बैठे उमड़ते हुए, राघव का स्मित आनन।

 

बोले भावस्थ चंद्र-मुख-निंदित रामचंद्र,

प्राणों में पावन कंपन भर, स्वर मेघमंद्र

 

“देखो, बंधुवर सामने स्थित जो यह भूधर

शोभित शत-हरित-गुल्म-तृण से श्यामल सुंदर,

 

पार्वती कल्पना हैं। इसकी, मकरंद-बिंदु;

गरजता चरण-प्रांत पर सिंह वह, नहीं सिंधु;

 

दशदिक-समस्त हैं हस्त, और देखो ऊपर,

अंबर में हुए दिगंबर अर्चित शशि-शेखर;

 

लख महाभाव-मंगल पदतल धँस रहा गर्व

मानव के मन का असुर मंद, हो रहा खर्व’’

 

फिर मधुर दृष्टि से प्रिय कपि को खींचते हुए

बोले प्रियतर स्वर से अंतर सींचते हुए

 

“चाहिए हमें एक सौ आठ, कपि, इंदीवर,

कम-से-कम अधिक और हों, अधिक और सुंदर,

 

जाओ देवीदह, उषःकाल होते सत्वर,

तोड़ो, लाओ वे कमल, लौटकर लड़ो समर।”

 

अवगत हो जांबवान से पथ, दूरत्व, स्थान,

प्रभु-पद-रज सिर धर चले हर्ष भर हनूमान।

 

राघव ने विदा किया सबको जानकर समय,

सब चले सदय राम की सोचते हुए विजय।

 

निशि हुई विगतः नभ के ललाट पर प्रथम किरण

फूटी, रघुनंदन के दृग महिमा-ज्योति-हिरण;

 

है नहीं शरासन आज हस्त-तूणीर स्कंध,

वह नहीं सोहता निविड़-जटा दृढ़ मुकुट-बंध;

 

सुन पड़ता सिंहनाद,—रण-कोलाहल अपार,

उमड़ता नहीं मन, स्तब्ध सुधी हैं ध्यान धार;

 

पूजोपरांत जपते दुर्गा, दशभुजा नाम,

मन करते हुए मनन नामों के गुणग्राम;

 

बीता वह दिवस, हुआ मन स्थिर इष्ट के चरण,

गहन-से-गहनतर होने लगा समाराधन।

 

क्रम-क्रम से हुए पार राघव के पंच दिवस,

चक्र से चक्र मन चढ़ता गया ऊर्ध्व निरलस;

 

कर-जप पूरा कर एक चढ़ाते इंदीवर,

निज पुरश्चरण इस भाँति रहे हैं पूरा कर।

 

चढ़ षष्ठ दिवस आज्ञा पर हुआ समाहित मन,

प्रति जप से खिंच-खिंच होने लगा महाकर्षण;

 

संचित त्रिकुटी पर ध्यान द्विदल देवी-पद पर,

जप के स्वर लगा काँपने थर-थर-थर अंबर;

 

दो दिन-निष्पंद एक आसन पर रहे राम,

अर्पित करते इंदीवर, जपते हुए नाम;

 

आठवाँ दिवस, मन ध्यान-युक्त चढ़ता ऊपर

कर गया अतिक्रम ब्रह्मा-हरि-शंकर का स्तर,

 

हो गया विजित ब्रह्मांड पूर्ण, देवता स्तब्ध,

हो गए दग्ध जीवन के तप के समारब्ध,

 

रह गया एक इंदीवर, मन देखता-पार

प्रायः करने को हुआ दुर्ग जो सहस्रार,

 

द्विप्रहर रात्रि, साकार हुईं दुर्गा छिपकर,

हँस उठा ले गई पूजा का प्रिय इंदीवर।

 

यह अंतिम जप, ध्यान में देखते चरण युगल

राम ने बढ़ाया कर लेने को नील कमल;

 

कुछ लगा न हाथ, हुआ सहसा स्थिर मन चंचल

ध्यान की भूमि से उतरे, खोले पलक विमल,

 

देखा, वह रिक्त स्थान, यह जप का पूर्ण समय

आसन छोड़ना असिद्धि, भर गए नयनद्वयः

 

“धिक् जीवन को जो पाता ही आया विरोध,

धिक् साधन, जिसके लिए सदा ही किया शोध!

 

जानकी! हाय, उद्धार प्रिया का न हो सका।”

वह एक और मन रहा राम का जो न थका;

 

जो नहीं जानता दैन्य, नहीं जानता विनय

कर गया भेद वह मायावरण प्राप्त कर जय,

 

बुद्धि के दुर्ग पहुँचा, विद्युत्-गति हतचेतन

राम में जगी स्मृति, हुए सजग पा भाव प्रमन।

 

“यह है उपाय” कह उठे राम ज्यों मंद्रित घन

“कहती थीं माता मुझे सदा राजीवनयन!

 

दो नील कमल हैं शेष अभी, यह पुरश्चरण

पूरा करता हूँ देकर मातः एक नयन।''

 

कहकर देखा तूणीर ब्रह्मशर रहा झलक,

ले लिया हस्त, लक-लक करता वह महाफलक;

 

ले अस्त्र वाम कर, दक्षिण कर दक्षिण लोचन

ले अर्पित करने को उद्यत हो गए सुमन।

 

जिस क्षण बँध गया बेधने को दृग दृढ़ निश्चय,

काँपा ब्रह्मांड, हुआ देवी का त्वरित उदय :

 

‘‘साधु, साधु, साधक धीर, धर्म-धन धन्य राम!”

कह लिया भगवती ने राघव का हस्त थाम।

 

देखा राम ने—सामने श्री दुर्गा, भास्वर

वाम पद असुर-स्कंध पर, रहा दक्षिण हरि पर:

 

ज्योतिर्मय रूप, हस्त दश विविध अस्त्र-सज्जित,

मंद स्मित मुख, लख हुई विश्व की श्री लज्जित,

 

हैं दक्षिण में लक्ष्मी, सरस्वती वाम भाग,

दक्षिण गणेश, कार्तिक बाएँ रण-रंग राग,

 

मस्तक पर शंकर। पदपद्मों पर श्रद्धाभर

श्री राघव हुए प्रणत मंदस्वर वंदन कर।

 

''होगी जय, होगी जय, हे पुरुषोत्तम नवीन!''

कह महाशक्ति राम के वदन में हुईं लीन।

 

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कृष्णधरशर्मा Krishnadharsharma