नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757
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रविवार, 5 जुलाई 2020

कैलाश मंदिर एलोरा (महाराष्ट्र)

कैलाश मंदिर संसार में अपने ढंग का अनूठा वास्तु जिसे मालखेड स्थित राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण (प्रथम) (757-783 ई0) में निर्मित कराया था। यह एलोरा (जिला औरंगाबाद) स्थित लयण-श्रृंखला में है।

बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को तराश कर इसे द्रविड़ शैली के मंदिर का रूप दिया गया है। अपनी समग्रता में २७६ फीट लम्बा , १५४ फीट चौड़ा यह मंदिर केवल एक चट्टान को काटकर बनाया गया है। इसका निर्माण ऊपर से नीचे की ओर किया गया है। इसके निर्माण के क्रम में अनुमानत: ४० हज़ार टन भार के पत्थारों को चट्टान से हटाया गया। इसके निर्माण के लिये पहले खंड अलग किया गया और फिर इस पर्वत खंड को भीतर बाहर से काट-काट कर 90 फुट ऊँचा मंदिर गढ़ा गया है। मंदिर के भीतर और बाहर चारों ओर मूर्ति-अलंकरणों से भरा हुआ है। इस मंदिर के आँगन के तीन ओर कोठरियों की पाँत थी जो एक सेतु द्वारा मंदिर के ऊपरी खंड से संयुक्त थी। अब यह सेतु गिर गया है। सामने खुले मंडप में नन्दी है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी तथा स्तंभ बने हैं। यह कृति भारतीय वास्तु-शिल्पियों के कौशल का अद्भुत नमूना है।

1.भगवान् शिव को समर्पित इस कैलाशनाथ मंदिर को बनाने में 10 पीढियों ने लगातार लगभग 200 वर्ष तक काम किया था।

2.कैलाशनाथ मंदिर की ऊचांई 90 फ़ीट है, यह 276 फ़ीट लम्बा और 154 फ़ीट चौड़ा गुफा मंदिर है।

3.कैलाशनाथ मंदिर एक ही विशाल चट्टान को तोड़ कर बनाया गया है, लगभग 40 हजार टन भार के पत्थारों को चट्टान से अलग कर के बनाया गया है यह भव्य मंदिर।

4.कैलाशनाथ मंदिर बाहर से मूर्ति की तरह समूचे पर्वत को ही तराश कर इसे द्रविड़ शैली के मंदिरों का रूप दिया गया है। लगभग 7000 शिल्पियों ने लगातार काम करके इसे तैयार किया है, इसकी नक्काशी अत्यंत विशाल और भव्‍य है।

5.मंदिर में एक विशाल हाथी की प्रतिमा भी है जो अब खंडित हो चुकी है।

7.विशाल गोपुरम से प्रवेश करते ही सामने खुले मंडप में नंदी की प्रतिमा नजर आती है और उसके दोनों ओर विशालकाय हाथी और स्तंभ बने हुए हैं।

8.कैलाश नाथ मंदिर में बनी भैरव की मूर्ति काफी भयकारक दिखाई देती है। कैलाश मंदिर में एक अति विशाल और भव्य शिवलिंग भी है। इसके अलावा भगवान शिव की तांडव करती हुई प्रतिमा इतनी भव्य है जैसी कहीं और देखने को नहीं मिलेगी ।

साभार-Indias Heritage
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#कृष्णधर शर्मा। #krishnadhar sharma

शनिवार, 4 जुलाई 2020

हम्पी के स्मारक

चौदहवीं शताब्‍दी के दौरान मध्‍य कालीन भारत के महानतम साम्राज्‍यों में से एक विजयनगर साम्राज्‍य की राजधानी, हम्‍पी कर्नाटक राज्‍य के दक्षिण में स्थित है। हम्‍पी के चौंदहवीं शताब्‍दी के भग्‍नावशेष यहां लगभग 26 वर्ग किलो मीटर के क्षेत्र में फैले पड़े हैं, इनमें विशालकाय स्‍तंभ और वनस्‍पति शामिल है।

चौदहवीं शताब्‍दी के दौरान मध्‍य कालीन भारत के महानतम साम्राज्‍यों में से एक, विजयनगर साम्राज्‍य की राजधानी, हम्‍पी कर्नाटक राज्‍य के दक्षिण में स्थित है। हम्‍पी के चौंदहवीं शताब्‍दी के भग्‍नावशेष यहां लगभग 26 वर्ग किलो मीटर के क्षेत्र में फैले पड़े हैं, इनमें विशालकाय स्‍तंभ और वनस्‍पति शामिल है। उत्तर में तुंगभद्रा नदी और अन्‍य तीन ओर पत्‍थरीले ग्रेनाइट के पहाडों से सुरक्षित ये भग्‍नावशेष मौन रह कर अपनी भव्‍यता, विशालता अद्भुत संपदा की कहानी कहते हैं। महलों और टूटे हुए शहर के प्रवेश द्वारा की गरिमा मनुष्‍य की असीमित प्रतिभा तथा रचनात्‍मक की शक्ति की कहानी कहती है जो मिलकर संवेदनाहीन विनाश की क्षमता भी दर्शाती है।

विजय नगर शहर के स्‍मारक विद्या नारायण संत के सम्‍मान में विद्या सागर के नाम से भी जाने जाते हैं, जिन्‍होंने इसे 1336 - 1570 ए. डी. के बीच हरीहर - 1 से सदाशिव राय की अवधियों में निर्मित कराए। इस राजवंश के महानतम शासक कृष्‍ण देव राय (एडी 1509 - 30) द्वारा बड़ी संख्‍या में शाही इमारतें बनवाई गई।

इस अवधि में हिन्‍दू धार्मिक कला, वास्‍तुकला को एक अप्रत्‍याशित पैमाने पर दोबारा उठते हुए देखा गया। हम्‍पी के मंदिरों को उनकी बड़ी विमाओं, फूलदार सजावट, स्‍पष्‍ट और कोमल पच्‍चीकारी, विशाल खम्‍भों, भव्‍य मंडपों और मूर्ति कला तथा पारम्‍परिक चित्र निरुपण के लिए जाना जाता है, जिसमें रामायण और महाभारत के विषय शामिल है।

हम्‍पी में स्थित विठ्ठल मंदिर विजय नगर शैली का एक उत्‍कृष्‍ट उदाहरण है। देवी लक्ष्‍मी, नरसिंह और गणेश की एक पत्‍थर से बनी मूर्तियां अपनी विशालता और भव्‍यता के लिए उल्‍लेखनीय है। यहां स्थित कृष्‍ण मंदिर, पट्टाभिराम मंदिर, हजारा राम चंद्र और चंद्र शेखर मंदिर भी यहां के जैन मंदिर हैं जो अन्‍य उदाहरण हैं। हम्‍पी के अधिकांश मंदिरों में कई स्‍तर वाले मंडपों के बगल में व्‍यापक रूप से फैले बाजार हैं।

उत्तर में तुंगभद्रा नदी और अन्‍य तीन ओर पत्‍थरीले ग्रेनाइट के पहाडों से सुरक्षित ये भग्‍नावशेष मौन रह कर अपनी भव्‍यता, विशालता अद्भुत संपदा की कहानी कहते हैं। महलों और टूटे हुए शहर के प्रवेश द्वारा की गरिमा मनुष्‍य की असीमित प्रतिभा तथा रचनात्‍मक की शक्ति की कहानी कहती है जो मिलकर संवेदनाहीन विनाश की क्षमता भी दर्शाती है।

विजय नगर शहर के स्‍मारक विद्या नारायण संत के सम्‍मान में विद्या सागर के नाम से भी जाने जाते हैं, जिन्‍होंने इसे 1336 - 1570 ए. डी. के बीच हरीहर - 1 से सदाशिव राय की अवधियों में निर्मित कराए। इस राजवंश के महानतम शासक कृष्‍ण देव राय (एडी 1509 - 30) द्वारा बड़ी संख्‍या में शाही इमारतें बनवाई गई।

इस अवधि में हिन्‍दू धार्मिक कला, वास्‍तुकला को एक अप्रत्‍याशित पैमाने पर दोबारा उठते हुए देखा गया। हम्‍पी के मंदिरों को उनकी बड़ी विमाओं, फूलदार सजावट, स्‍पष्‍ट और कोमल पच्‍चीकारी, विशाल खम्‍भों, भव्‍य मंडपों और मूर्ति कला तथा पारम्‍परिक चित्र निरुपण के लिए जाना जाता है, जिसमें रामायण और महाभारत के विषय शामिल है।

हम्‍पी में स्थित विठ्ठल मंदिर विजय नगर शैली का एक उत्‍कृष्‍ट उदाहरण है। देवी लक्ष्‍मी, नरसिंह और गणेश की एक पत्‍थर से बनी मूर्तियां अपनी विशालता और भव्‍यता के लिए उल्‍लेखनीय है। यहां स्थित कृष्‍ण मंदिर, पट्टाभिराम मंदिर, हजारा राम चंद्र और चंद्र शेखर मंदिर भी यहां के जैन मंदिर हैं जो अन्‍य उदाहरण हैं। हम्‍पी के अधिकांश मंदिरों में कई स्‍तर वाले मंडपों के बगल में व्‍यापक रूप से फैले बाजार हैं।
साभार- Indias Heritage
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महासू देवता मंदिर

महासू देवता मंदिर, हनोल 
महासू देवता मंदिर उत्तराखंड के देहरादून जिले के जनजाति क्षेत्र चकराता ब्लॉक के हनोल में स्थित है। यह देहरादून एवं उत्तरकाशी जिले की सीमा पर टौंस (तमसा) नदी के किनारे बसा एक छोटा सा गांव है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार 9 वीं शताब्दी में सम्पूर्ण क्षेत्र में किरमिर नाम के दानव का आतंक था। उस से सभी जन मानस बहुत परेशान थे। समस्त जनता को इस दानव के आतंक से छुटकारा दिलाने हेतु "हुणा भाट" नाम के एक ब्राह्मण ने कश्मीर जा कर शिव और शक्ति दोनों की पूजा अर्चना की। उनकी प्रार्थना से खुश हो कर जब शिव और शक्ति ने उनसे उपासना का कारण पूछा तो उन्होंने आपबीती सुनाई। इसके बाद शिव जी ने उन्हें एक दिव्य हल दिया और बोला कि इस से अपने खेत को जोतना तुम्हारी समस्या का समाधान मिल जायेगा। हुणा भाट वो दिव्य हल लेकर वापस अपने गांव की ओर चल दिए। जैसे ही उन्होंने हल जोतना शुरू किया उनके खेत से एक एक कर के चार देव प्रकट हुए जिनमें सबसे पहले
महासू जिन्हें बोठा भी कहा जाता है फिर बाशिक फिर पवासी एवं अंत में चाल्दा।


आगे चलकर इन्हीं देवताओं ने समस्त क्षेत्र को दानव मुक्त किया। तभी से सम्पूर्ण देहरादून के जौनसार बावर, कांडोई भरम, देवघार एवं उत्तरकाशी जिले के बंगान, कोठी गाढ़ आदि क्षेत्र एवं हिमाचल प्रदेश का भी कई हिस्सा महासू देवता की पूजा करता है।

इनके मंदिर का निर्माण जौनसार की पौराणिक शैली के अनुसार हुआ है जिसमें मंदिर तीन हिस्सो में बटा रहता है, पहला प्रांगण जिसमे देवता की पूजा अर्चना में बजने वाले वाद्य यंत्र रखे जाते है, उसके दूसरा कमरा जिसमें कि देवता जी के हथियार इत्यादि रखे जाते है और श्रद्धालुओं को भी इसी कमरे तक जाने की अनुमति होती है, एवं अंत में तीसरा कमरा जिसे की भंडार एवं भू गर्भ गृह भी कहा जाता है देव पालकी इसी में रहती है एवं यहां पर पुजारी के अलावा अन्य किसी भी व्यक्ति के प्रवेश कि अनुमति नहीं होती। माहसू देवता को कई त्यौहार समर्पित किए जाते है जिनमे सबसे प्रमुख जागरा, जखोली, नूनाई, विशू एवं जौंदोई इत्यादि है। आज भी क्षेत्र के लोग पुलिस या कानून से अधिक भरोसा म्हासू देवता के न्याय पर करते है।
(साभार- सचिन पवार)
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जतमई घटारानी छत्तीसगढ़

गर्मियों के आते ही लोग घर से निकलना कम ही पसंद करते हैं। आज की इस व्यस्तता भरी दुनिया में लोग अपनी ही भागदौड़ में लगे हुए है। जिससे परिवार और दोस्तों को वक़्त देना मुश्किल होता जा रहा है। आज हम आपको ऐसी जगह के बारे में बताने जा रहे हैं। जो की पहले से ही विश्वप्रसिद्ध है। मगर इससे अच्छी जगह नहीं हो सकती जब आप अपने परिवार और दोस्तों को वक़्त देना चाहें। हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ के विश्वप्रसिद्ध दार्शनिक स्थल और जलप्रपात घटारानी और जतमई की। इस जगह की सबसे अच्छी बात है की यहाँ आप किसी भी मौसम में जा सकते हैं।



छत्तीसगढ़ का ऐसा मंदिर जहां माता के चरण छूने मंदिर तक पहुंचती है जलधारा
ऐसा माना जाता है कि झरने के रूप में गिर रही यह जल धाराएं माता की सेविका हैं जो हमेशा माता के मंदिर के आसपास ही रहती हैं। प्राकृतिक रूप से यह स्थल काफी मनमोहक है।छत्तीसगढ़ में जतमई और घटरानी एेसे मंदिर हैं जहां जलधाराएं हर साल माता के चरण छूने मंदिर के अंदर तक पहुंचती हैं। ऐसा माना जाता है कि झरने के रूप में गिर रही यह जल धाराएं माता की सेविका हैं जो हमेशा माता के मंदिर के आसपास ही रहती हैं।

प्राकृतिक रूप से यह स्थल काफी मनमोहक है। चारों ओर फैली हरियाली और उंचे पहाड़ों के बीच गिरता झरना यहां आने वालों के लिए यादगार बन जाता है। यह स्थल धार्मिक महत्व तो रखता ही है साथ ही पर्यटन की दृष्टि से भी समृद्ध है।
राजधानी से लगभग 80 किलोमीटर पर राजिम मार्ग पर स्थित है जतमई का यह स्थल। यहां से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है घटारानी। जतमई पहाड़ी को पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करने के बाद यह स्थल पर्यटन के नक्शेे पर आया जिसके बाद यहां पर लोग इस मनमोहक प्राकृतिक स्थल को जान व देख रहे हैं। पटेवा के निकट स्थित जतमई पहाड़ी एक 200 मीटर क्षेत्र में फैला पहाड़ है, जिसकी उंचाई करीब 75 मीटर है। यहां शिखर पर विशालकाय पत्थर आपस में जुड़े हुए हैं। जिसे देखकर लगता है इन्हें यहां किसी ने रखा हुआ है।

जतमई और घटारानी की सैर करने के लिए सभी मौसम अनुकूल है। बारिश के मौसम में आसपास का जंगल में हरियाली और ज्यादा बढ़ जाती है। और गर्मियों में हरियाली पेड़ की छाव और पानी आपका मन मोह लेगी। झरने का पानी और भी ज्यादा मनमोहक लगता है। इस झरने पर आकर पर्यटक नहाने का भी भरपूर मजा ले सकते हैं। घटारानी प्रपात तक पहुंचने के लिए घने जंगल के बीच बनी सकरी सड़क है। जिसमें बताया जाता है कि जंगली जानवर भी हैं। जो कभी कभी यहां से गुजरने वाले पर्यटकों के वाहन के सामने आ जाते हैं। प्रकृति प्रेमियों के लिए इन जगहों पर जाने का सबसे अच्छा समय अगस्त से फरवरी तक है।
साभार- दीपक साहू (पत्रिका)
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रविवार, 28 जून 2020

माणा- एक ऐसा गाँव जहाँ दिव्यता का निवास है



बद्रीनाथ से 10 मिनट की दूरी पर है माणा और वहाँ तक जाने वाला रास्ता ही बेहद खूबसूरत है। पहाड़ी कुत्तों का हमारी तरफ बढ़ना, सरस्वती के तेज़ प्रवाह से बहने की आवाज़, हर तरफ सेना के कैंप और एक विशाल गाँव जिसके दरवाज़े के बाहर लिखा है ‘द लास्ट इंडियन विलेज’। वहाँ मौजूद हर चीज़ हमें बता रही थी कि हम सब कुछ छोड़ कर कितनी दूर निकल आए हैं।
यह गाँव 3115 मीटर की ऊँचाई पर उत्तराखंड के चमोली जिले में बसा है। इस गाँव की दिव्यता से हम बहुत ही अनोखे ढंग से परिचित हुए। गाँव के बच्चे हमें इस गाँव से जुड़ी महाभारत की कहानियाँ सुना रहे थे। बच्चे हमें गाँव की छोटी छोटी गलियों से गुज़ारते हुए व्यास गुफ़ा तक ले गए, एक ऐसी गुफा जहाँ वेद व्यास जी ने चारों वेद लिखे थे और पहली बार महाभारत पढ़ी गयी थी।

बच्चे महाभारत के किस्से ऐसे सुना रहे थे मानो वो किसी ग्रन्थ के बारे में नहीं बल्कि पड़ोस में हुई घटना के बारे में बता रहें हो। मुझे ऐसा लगता है की माणा के निवासियों ने यह मान लिया है कि यह एक देव भूमि है और यहाँ भगवान का वास था। इसलिए जब यात्री यहाँ आते हैं तो आपका अनुभव बहुत अलग होता है।

यही अनुभव माणा को बाकि जगह से अलग बनाते हैं। व्यास गुफ़ा से कुछ ही दूरी पर गणेश गुफ़ा है और माना जाता है कि भगवान गणेश ने इसी गुफ़ा में बैठकर महाभारत लिखी थी। यह गुफा भले ही पूरे विश्व में धर्म से जुड़ी होने की वजह से प्रसिद्ध है पर यहाँ के बच्चे इस गुफा में क्रिकेट खेलते हैं और औरतें पूरे दिन यहाँ सिलाई बुनाई का काम करती हैं।
▪️माणा में घूमने की जगह और वहाँ से जुड़े कुछ मिथक

#सरस्वती नदी के किनारे बैठने का आनंद

#सरस्वती_नदी देवी सरस्वती के नाम पर रखा गया है जिन्हें बुद्धि की देवी भी कहा जाता है। यह नाम बिलकुल इस नदी के लिए परफेक्ट है क्योंकि भारत के इतिहास का बहुत महत्वपूर्ण ग्रन्थ इसी नदी के किनारे बैठ कर लिखा गया था। इस नदी का नाम गुप्त गामिनी भी है क्योंकि यह नदी 100 मीटर तक बहने के बाद माणा के केशव प्रयाग में अलकनंदा से मिल जाती है। अगर पौराणिक कथाओं की मानें तो सरस्वती नदी की आवाज़ महर्षि व्यास के महाभारत लिखने में भंग डाल रही थी इसलिए महर्षि ने नदी को यहाँ श्राप दिया था कि नदी गायब हो जाए।

#भीम_पुल पर ज़रूर जाएँ, यह जगह सीधे मिथकों से जुड़ी है

सरस्वती नदी भीम पुल के पास एक विशाल पत्थर से निकलती है। नदी के धारा बहुत पतली होती है पर नदी आवाज़ कान बंद करने वाली होती है। नदी के ऊपर पत्थरों से बना एक प्राकृतिक पुल है और माना जाता है कि जब पांडव इस नदी को पार करके सवर्ग की ओर बढ़ रहे थे तब भीम ने एक बहुत बड़ा पत्थर उठाकर वहाँ द्रौपदी के लिए रखा था ताकि उस नदी को वो आसानी से पार कर सकें। भीम पुल के बगल में ही आपको 20 फुट का एक पैर का निशान भी दिखेगा और माना जाता है कि ये पैर के निशान भीम के हैं।

#व्यास_गुफ़ा

व्यास गुफ़ा के नाम से प्रख्यात इस गुफ़ा में महर्षि व्यास ने वेदों को चार भाग में दोबारा बाँट कर भागवद गीता लिखी थी। ऐसा माना जाता है कि इसी गुफा में व्यास ने गणेश को महाभारत सुनाई थी और गणेश ने महाभारत लिखी थी। गुफा की छत को देख कर ऐसा लगता है कि ताड़ के पत्तों पर कुछ लिखा हुआ है। इस पत्थर को व्यास पुस्तक के नाम से जाना जाता है और ऐसा मानना है कि ये पुस्तक वर्षों के बाद पत्थर में बदल गयी है।

▪️वो जगह ज़रूर घूमें जहाँ महाभारत लिखी गई थी

गणेश गुफा वो गुफा है जहाँ भगवन गणेश ने महर्षि वाल्मीकि को बुलाकर महभारत सुनी थी और उसके बाद इस महान ग्रन्थ की रचना की थी। गणेश गुफा व्यास गुफा से कुछ ही दूरी पर है और ये सोचने वाली बात है कि क्या भगवन गणेश को इस गुफा तक व्यास की आवाज़ सुनाई दी थी। पौराणिक कथाओं के बारों में इतनी गहरायी से सिर्फ माणा के लोग ही सोच सकते हैं।

▪️भारत के आखिरी चाय की दुकान पर चाय ज़रूर पीएँ

यात्रियों के लिए ये चाय की दुकान बहुत ही पसंदीदा है और ये सबके लिए फोटो लेने की एक परफेक्ट जगह है। यहाँ की चाय बहित स्वादिष्ट है पर मेरा सुझाव होगा कि आप यहाँ की ग्रीन टी ज़रूर ट्राई करें।

#बद्रीनाथ

ये मंदिरों का शहर माणा से सिर्फ 3 कि.मी. की दूरी पर है और यहाँ पर मई से नवम्बर महीने तक श्रधालुओं की भीड़ लगी होती है। इसलिए अगर आप ज्यादा धार्मिक नहीं हैं और इस शहर के बेहतर लुत्फ़ उठाना चाहते हैं तो तो बद्रीनाथ मई से नवम्बर के अलावा किसी और महीने में जाएँ।

▪️माणा के आस-पास एडवेंचर

माणा पास तक की ड्राइव: एक और एडवेंचर जिसका आप माणा में लुत्फ़ उठा सकते हैं वो है माणा पास तक की ड्राइव। माणा गाँव से 50 कि.मी. दूर चीन के बॉर्डर के पास माणा पास है। वहाँ जाने के लिए जोशीमठ आर्मी स्टेशन से आपको पहले अनुमति लेनी पड़ेगी।
▪️माणा के आस पास के ट्रेक्स:

अगर आप यात्रा के दौरान एडवेंचर के शौक़ीन हैं तो माणा के आस पास की ट्रेकिंग आपको खुश कर देगी। स्वर्गरोहिनी, सतोपंथ लेक, और वसुंधरा फॉल्स कुछ ऐसे ट्रेक हैं जो माणा से शुरू होते हैं। आपको बद्रीनाथ में कई गाइड मिल जायेंगे जो आपको इन ट्रेक पर मदद करेंगे।

#खाना

माणा के आस-पास आपको खाने की सबसे बेहतरीन जगह बद्रीनाथ है। माणा में आपको कुछ चाय और टपरी मिल जाएगी पर वहाँ ज्यादा खाने की दुकाने नहीं हैं। बद्रीनाथ में आपको कई शाकाहारी रेस्टोरेंट मिल जायेंगे। आपको यहाँ शाकाहारी थाली और साउथ इंडियन फ़ूड बहुत आसानी से मिल जाएगा।

▪️ठहरने का ठिकाना

माणा में लगातार लैंडस्लाइड होने की वजह से मेरा सुझाव होगा कि आप जोशीमठ में ही ठिकाना देखें। द स्लीपिंग ब्यूटी होटल में आपको सभी सुविधाएँ मिलेंगी। आपको वहाँ नाश्ता साथ में मिलेगा और गढ़वाल पहाड़ों के नज़ारे आपको अपनी खिड़की से दिखाई देंगे।

▪️माणा कैसे पहुँचे?

✈️हवाई यात्रा: माणा से सबसे करीबी एयरपोर्ट है देहरादून के पास जॉली ग्रांट एयरपोर्ट

🚊ट्रेन: माणा का सबसे करीबी रेलवे स्टेशन हरिद्वार है जो वहाँ से 275 कि.मी. की दूरी पर है।

🚗रोड: माणा पहुँचने के लिए आपको देहरादून या हरिद्वार से टैक्सी, कैब या फिर बद्रीनाथ/ गोविन्दघाट के लिए बस लेनी पड़ेगी। आपकी यह यात्रा 7-8 घंटे की होगी।
साभार- वैदिक साइंस
#समाज की बात #samaj ki Baat #कृष्णधर शर्मा #krishnadhar sharma

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

गोवर्धन पर्वत [गिरीराज]

मथुरा से कुछ दूरी पर स्थित है गोवर्धन पर्वत यह पावन धाम हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है. जहां भगवान श्री कृष्ण ने अनेक लीलाएं की थी. अपने पौराणिक महत्व के फलस्वरूप यह पर्वत सभी के लिए पूजनिय धाम बना है. गोवर्धन पर्वत जिसे गिरीराज के नाम से भी जाना जाता है . 
गोवर्धन पर्वत पर अनेक पवित्र स्थल मौजूद हैं जो जिनका दर्शन पाकर सभी धन्य होते हैं. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की तिथी को गोवर्धन पूजा की जाती है इस दिन अन्न कुट, मार्गपाली आदि का आयोजन किया जाता है. यह ब्रज का मुख्य त्यौहार होता है. 
अन्नकुट जिसे गोवर्धन पूजा भी कहा जाता बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है़ इस दिन गाय बैल का पूजन किया जाता है उन्हें फूल माला, चन्दन आदि लगाया जाता है.  गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर उसका पूजन होता है तथा परिक्रमा की जाती है. 

  
    

गोवर्धन पर्वत कथा

इस पर्वत के साथ अनेक कथाएं जुड़ी हुई हैं. कहते हैं कि यह पर्वत रोज कम होता जाता है. 
किंवदंती अनुसार एक बार मुनी पुलस्थय भ्रमण करते हुए गोवर्धन पर्वत जा पहूँचे,  वहां का सुंदर मनोहर नजारा देखकर उनका हृदय प्रसन्न हो गया उनके मन में  गोरिराज को अपने साथ ले जाने का विचार उत्पन्न हुआ. 
मुनी ने राजा से ओरोंकल गोवर्धन ले जाने की बात रखी उन्हों ने कहा की वह जहां से आए हैं वहां पर एक भी सुंदर पर्वत नहीं है अत: आप इस अनमोल रत्न को मुझे सौंप दें. परंतु राजा ने मुनी को कुछ और मांगने को कहा वह उसे नही देना चाहते थे. यह सब बातें गोवर्धन ने सुन ली और मुनी से कहा की मैं आपके साथ जाने के लिए तैयार हूं किंतु मेरी एक शर्त है कि आप मुझे जहां भी रखेगें मै वहीं पर रूक जाऊंगा और वहां से हिलूंगा भी नही. 
मुनी ने यह बात स्वीकार कर ली. पुलस्थय मुनि गोवर्धन को अपने दायें हाथ पर रख कर कली के लिए निकल पडे़. जब मुनी ब्रज से गुजर रहे थे तब मुनी साधना के लिए रूक गए और उन्होंने गोवर्धन को भूल वश वहीं रख दिया तथा जब मुनी की अराधना समाप्त हुई तो उन्होंने पर्वत को उठाना चाहा परंतु गोवर्धन तो वहीं पर स्थिर हो चुका था. 
उन्हें गोवर्धन की कही बात याद आई परंतु ऋषि न माने और हठ करने लगे इतने पर भी जब पर्वत अपने स्थान से नही हिला तो उन्हें बहुत क्रोध आया ओर क्रोधवश उन्होंने पर्वत को शाप देते हुए कहा कि गोवर्धन तुम घरती में धसते चले जाओंग ओर एक दिन पूर्ण रुप से धरती के गर्भ में समा जाओगे. इसी कारण गोवर्धन प्रतिदिन नीचे धसते चले जा रहे हैं. 
इसके अतिरिक्त कहते हैं कि गोवर्धन पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा अँगुली पर उठा लिया था और इन्द्र के प्रकोप से ब्रज वासियों की रक्षा की थी तब से गोवर्धन पूजा की जाती है.
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की तिथी को गोवर्धन पूजा की जाती है इस दिन अन्न कुट, मार्गपाली आदि का आयोजन किया जाता है. यह ब्रज का मुख्य त्यौहार होता है. अन्नकुट जिसे गोवर्धन पूजा भी कहा जाता बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है़ इस दिन गाय बैल का पूजन किया जाता है उन्हें फूल माला, चन्दन आदि लगाया जाता है.  गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर उसका पूजन होता है तथा परिक्रमा की जाती है. 

 

गोवर्धन धार्मिक स्थल

गोवर्धन में अनेक रमणीय स्थल देखने को मिलते हैं इसकी परिक्रमा करते समय रास्ते में प्रमुख स्थल देखे जा सकते हैं जिनका अपना एक इतिहास है और कुछ भगवान की लीलाओं का आधार रहे. मार्ग मे अनेक कुण्ड दिखाई पड़ते है जिसमें से कुछ प्रमुख स्थल इस प्रकार हैं 

दान घाटी

  गोवर्धन के मार्ग पर  यह मन्दिर स्थित है यहां पर एक सुंदर मंदिर स्थापित है और जब गोवर्धन परिक्रमा की शुरूआत की जाती है तब इसी मंदिर से आरंम्भ होते हुए यहीं पर समाप्त भी होती है. मान्यता है कि इसी स्थान पर कृष्ण भगवान ने दानी बनकर गोपीयों से दान मांगा था ओर राधा ने दान दिया था.
कृष्ण की इस लीला का वर्णन अनेक कवियों ने अपने ग्रंथों में किया है. इस मन भावन लीला का वर्णन गौडी़य संप्रदाय के लोग भक्ति रस के गीतों मे करते रहे हैं वहीं  दानकेलि कौमुदी आदि ग्रन्थों में इस प्रेम लीला का वर्णन मिलता है. इस प्रसंग के कारण ही इस जगह को दान घाटी के नाम से जाना जाता है तथा मंदिर में विराजमान गोवर्धन  शीला का दूधाभिषेक किया जाता.
 

जतीपुरा


जतीपुरा जो गोपालपुरा के नाम से भ जाना जाता था में श्रीनाथ भगवान का मंदिर है कहते हैं यहीं पर कृष्ण के परम भक्त कवि सूरदास जी भगवान के गितों को गाया करते थे तथा कीर्तन किया करते थे. यह स्थल बल्लभ सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र रहा है यहां  बल्लभ सम्प्रदाय के अनेक मन्दिर देखे जा सकते हैं. यहीं मुखारबिन्द है. बिलछू कुण्ड , ढाक, श्याम, हरजी कुण्ड, गोविन्द स्वामी की कदम्ब खण्डी आदि ऐतिहासिक स्थान भी हैं. 

श्रीलौठाजी मन्दिर


गोवर्धन से कुछ दूरी पर स्थित है पूंछरी गांव जो परिक्रमा मार्ग में आता है यहां  श्रीलौठाजी का मन्दिर स्थापित है मान्यता है कि भगवान कृष्ण के एक मित्र थे लौठा जब भगवान ब्र्ज छोड़कर जा रहे थे तोउन्होंने लौठा को भी अपने साथ चलने को कहा परंतु उन्होंने मना कर दिया और कहा की जब तक तुम वापस ब्रज नहीं आते तब तक मै अन्न जल ग्रहण नहीं करूंगा ओर अपने प्राण त्याग दूंगा.
इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया की तुम्हे कुछ नही होगा तुम जीवित रहोगे. तभी से लौठाजी तपस्या मे लीन हैं और उन्हें यकीन है कि भगवान यहां वापस जरूर आएंगे अत: यहां श्रीलौठाजी का मन्दिर स्थापित है. सभी भक्त लोग यहां आकर अदभुत शांति का अनुभव करते हैं एक भक्त की अनूठी श्रद्धा का प्रतीक है यह मंदिर. 

मानसी गंगा


गोवर्धन गाँव के बीच में श्री मानसी गंगा है इस पर एक कथा प्रचलित है एक बार सभी ब्रजवासी गंगा स्नान करने के लिए गंगा धाम जाने लगे संध्या समय वे गोवर्धन पहुँचे ओर वहीं पर रात्रि व्यतीत करने का विचार व्यक्त किया भगवान कृष्ण मन में विचारते है. 
ब्रज तो तीर्थों का स्थल है यहां से कहीं ओर जाने की क्या आवश्यकता है. अत: इस विचार के आते ही गंगा जी मानसी रुप में गोवर्धन पर्वत की तलहटी में प्रकट हो गईं. और जब प्रात समय ब्रजवासियों ने वहां गंगा जी के दर्शन किए तो सभी चकित रह गए ओर श्री कृष्ण के कहने पर सभी ने वहीं पर गंगा स्नान किया एवं पवित्र गंगा जल में दीप दान किया.
 श्री कृष्ण के मन से उत्पन्न (आविर्भूत) होने के कारण गंगाजी को मानसीगंगा कहा जाता है. यहां मानसी गंगा स्नान का महत्व गंगा स्नान जितना ही है भक्तगण यहाँ पर स्नान पूजा-अर्चना करते हैं । भाग्यवान भक्तों को कभी-कभी इसमें दूध की धारा का दर्शन होता है.मानसी गंगा के किनारे पर मुखारविन्द मन्दिर स्थित है.

कुसुम सरोवर
17:40, 26 सितम्बर 2009 के समय के संस्करण का थम्ब प्रारूप।
गोवर्धन से लगभग 2 किलोमीटर दूर राधाकुण्ड के निकट स्थापत्य कला के नमूने का एक समूह जवाहर सिंह द्वारा अपने पिता सूरजमल ( ई.1707-1763) की स्मृति में बनवाया गया। ई. 1675 से पहले यह कच्चा कुण्ड था जिसे ओरछा के राजा वीर सिंह ने पक्का कराया उसके बाद राजा सूरजमल ने इसे अपनी रानी किशोरी के लिए बाग़-बगीचे का रूप दिया और इसे अधिक सुन्दर और मनोरम स्थल बना दिया

 

राधाकुण्ड और कृष्ण कुण्ड

 
एक समय भगवान कृष्ण अपनी गायों को चराने के लिए जा रहे थे उसी समय एक राक्षस उनकी गायों मे गाय का रूप बना कर आ गया और उत्पात मचाने लगा। भगवान कृष्ण ने उसे पहचान लिया और उसका वध कर उसकी करनी का दण्ड दिया। वध करने के पश्‍चात भगवान कृष्ण राधा से मिलने गये। राधा ने कहा कि मैं  आपसे नहीं मिलूगी. और आपको गौ हत्या का पाप लग गया है। 
कहा की उन पर गौ हत्या का पाप लगा है जब तक आप इस पाप से मुक्ति नहीं पा लेते तब तक मुझसे नहीं मिल पाओगे अत: भगवान ने  प्रायश्चित स्वरूप वहां पर एक कुण्ड का निर्माण किया तथा समस्त  तीर्थों को आह्वान किया व उन्हें जलरूप द्वारा कुण्ड में प्रवेश करवाया तत्पश्चात पवित्र निर्मल जल मे स्नान कर पाप से मुक्ति प्राप्त कि किन्तु राधा उस कुण्ड से भी सुन्दर कुण्ड का निर्माण करके सभी को चकित करना चाहती थी
इसलिए उन्होंने अपने कंगन से एक मनोहर कुण्ड का निर्माण कर दिया और वह कुण्ड भी सब तीर्थों के जल से परिपूर्ण हो गया. इस प्रकार इन कुण्डों का निर्माण हुआ जिस कारण यह स्थल पवित्र पावन स्थल माना जाता है. और कार्तिक मास की कृष्णाष्टमी के दिन असंख्य श्रद्धालु यहां पर स्नान  करते हैं.

उद्धव कुण्ड


गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर स्थित है उद्धव कुण्ड यह भगवान के सखा एवं भक्त उद्धव के नाम से प्रसिद्ध है. अनेक ग्रंथों मे इसके बारे में उल्लेख प्राप्त होते हैं. कहते हैं की वज्रनाभ समेत शाण्डिल्य ऋषि के द्वारा यहाँ उद्धव कुण्ड का निर्माण हुआ था.
स्कन्द पुराण में इसका वर्णन मिलता है माना जाता है कि उद्धव जी यहाँ हमेशा निवास करते हैं. और यहीं पर जब कृष्ण सभी से विछोह कर  चले गए थे तो उद्धव जी ने महिषियों को सांत्वना दी.
इसी प्रकार गोवर्धन पर्वत मार्ग में अन्य कई महत्वपूर्ण स्थान आते हैं आन्यौर, कुसुम सरोवर है जो बहुत ही सुंदर एवं मनहर स्थल है यहां पर मंदिर भी स्थापित है एकचक्रेश्वर महादेव का मंदिर है  मानसी गंगा के समीप मुखारविन्द बना है 
आषाढ़ पूर्णिमा तथा कार्तिक माह की अमावस्या को यहां मेले का आयोजन किया जाता है. गोवर्द्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी तथा एक शिला पर भगवान के  चरणचिह्न मौजूद हैं. इसके साथ ही यहां श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर, श्री हरिदेव मंदिर, दानबिहारी मंदिर श्री राधा मदनमोहन मंदिर, विश्वकर्मा मंदिर, वेंकटेश्वर मंदिर, श्यामसुन्दर मंदिर तथा चकलेश्वर महादेव मंदिर इत्यादि पवित्र स्थल हैं.  

मंगलवार, 26 जुलाई 2011

माउंट आबू

समुद्र तल से 1220मीटर की ऊंचाई पर स्थित माउंट आबू राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है। नीलगिरी की पहाड़ियों पर बसे माउंट आबू की भौगोलिक स्थित और वातावरण राजस्थान के अन्य शहरों से भिन्न व मनोरम है। यह स्थान राज्य के अन्य हिस्सों की तरह गर्म नहीं है। माउंट आबू हिन्दु और जैन धर्म का प्रमुख तीर्थस्थल है। यहां का ऐतिहासिक मंदिर और प्राकृतिक खूबसूरती सैलानियों को अपनी ओर खींचती है।

 

  
माउंट आबू पहले चौहान साम्राज्य का हिस्सा था। बाद में सिरोही के महाराजा ने माउंट आबू को राजपूताना मुख्यालय के लिए अंग्रेजों को पट्टे पर दे दिया। ब्रिटिश शासन के दौरान माउंट आबू मैदानी इलाकों की गर्मियों से बचने के लिए अंग्रेजों का पसंदीदा स्थान था।
माउंट आबू प्राचीन काल से ही साधु संतों का निवास स्थान रहा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार हिन्दु धर्म के तैंतीस करोड़ देवी देवता इस पवित्र पर्वत पर भ्रमण करते हैं। कहा जाता है कि महान संत वशिष्ठ ने पृथ्वी से असुरों के विनाश के लिए यहां यज्ञ का आयोजन किया था। जैन धर्म के चौबीसवें र्तीथकर भगवान महावीर भी यहां आए थे। उसके बाद से माउंट आबू जैन अनुयायियों के लिए एक पवित्र और पूज्यनीय तीर्थस्थल बना हुआ है।
   

दिलवाड़ा जैन मंदिर-इन मंदिरों का निर्माण ग्यारहवीं और तेरहवीं शताब्दी के बीच हुआ था। यह शानदार मंदिर जैन धर्म के र्तीथकरों को समर्पित हैं। दिलवाड़ा के मंदिरों में विमल वासाही मंदिर प्रथम र्तीथकर को समर्पित
सर्वाधिक प्राचीन है जो 1031 ई.में बना था। बाईसवें र्तीथकर नेमीनाथ को समर्पित लुन वासाही मंदिर भी काफी लोकप्रिय है। यह मंदिर 1231ई.में वास्तुपाल और तेजपाल नामक दो भाईयों द्वारा बनवाया गया था। दिलवाड़ा जैन मंदिर परिसर में पांच मंदिर संगमरमर का हैं। मंदिरों के लगभग 48स्तम्भों में नृत्यांगनाओं की आकृतियां बनी हुई हैं। दिलवाड़ा के मंदिर और मूर्तियां मंदिर निर्माण कला का उत्तम उदाहरण हैं।
नक्की झील-नक्की झील माउंट आबू का एक बेहतरीन पिकनीक स्थल है। कहा जाता है कि एक हिन्दु देवता ने अपने नाखूनों से खोदकर यह झील बनाई थी। इसीलिए इसे नक्की (नख या नाखून)नाम से जाना जाता है। झील से चारों ओर के पहाड़ियों का नजारा बेहद सुंदर दिखता है। इस झील में नौकायन का भी आनंद लिया जा सकता है।
  
गोमुख मंदिर-इस मंदिर परिसर में गाय की एक मूर्ति है जिसके सिर के ऊपर प्राकृतिक रूप से एक धारा बहती रहती है। इसी कारण इस मंदिर को गोमुख मंदिर कहा जाता है। संत वशिष्ठ ने इसी स्थान पर यज्ञ का आयोजन किया था। मंदिर में अरबुआदा सर्प की एक विशाल प्रतिमा है। संगमरमर से बनी नंदी की आकर्षक प्रतिमा को भी यहां देखा जा सकता है।
सनसेट प्वाइंट-नक्की झील के दक्षिण-पश्चिम में स्थित सनसेट प्वांइट से डूबते हुए सूरज की खूबसूरती को देखा जा सकता है। यहां से दूर तक फैले हरे भरे मैदानों के दृश्य आंखों को सुकून पहुंचाते हैं। सूर्यास्त के समय आसमान के बदलते रंगों की छटा देखने सैकड़ों पर्यटक यहां आते हैं।
माउंट आबू वन्यजीव अभ्यारण्य-यह अभ्यारण्य मांउट आबू का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है। यहां मुख्य रूप से तेंदुए, स्लोथबियर,वाइल्ड बोर,सांभर,चिंकारा और लंगूर पाए जाते हैं। 288वर्ग किमी.में फैले इस अभ्यारण्य की स्थापना 1960में की गई थी। यहां पक्षियों की लगभग 250और पौधों की 110से ज्यादा प्रजातियां देखी जा सकती हैं। पक्षियों में रुचि रखने वालों के लिए उपयुक्त जगह है।
अचलगढ़ किला व मंदिर-दिलवाड़ा के मंदिरों से 8किमी.उत्तर पूर्व में यह किला और मंदिर स्थित हैं। अचलगढ़ किला मेवाड़ के राजा राणा कुंभ ने एक पहाड़ी के ऊपर बनवाया था। पहाड़ी के तल पर 15वीं शताब्दी में बना अचलेश्वर मंदिर है जो भगवान शिव को समर्पित है। कहा जाता है कि यहां भगवान शिव के पैरों के निशान हैं। नजदीक ही 16वीं शताब्दी में बने काशीनाथ जैन मंदिर भी हैं।
गुरु शिखर-माउंट आबू से 15किमी.दूर गुरु शिखर अरावली पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी है। पर्वत की चोटी पर बने इस मंदिर की शांति दिल को छू लेती है। मंदिर की इमारत सफेद रंग की है। यह मंदिर भगवान विष्णु के अवतार दत्तात्रेय को समर्पित है। मंदिर से कुछ ही दूरी पर पीतल की घंटी है जो माउंट आबू को देख रहे संतरी का आभास कराती है। गुरु शिखर से नीचे का दृश्य बहुत की सुंदर दिखाई पड़ता है।

माउंट आबू:एक नजर
राज्य-राजस्थान
जिला-सिरोही क्षेत्रफल-25वर्ग किमी.
समुद्र तल से ऊंचाई-1220मी.
वर्षा- 153से 177सेंमी.
भाषा-गुजराती,हिंदी और अंग्रेजी
कब जाएं-फरवरी से जून और सितंबर से दिसंबर
पर्यटक कार्यालय
राजस्थान पर्यटन
टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर
बस स्टैंड के सामने,माउंट आबू
दूरभाष-02974-235151एसटीडी कोड-02974