सामाजिक मुद्दों से सम्बंधित लेखों और विचारों का संग्रह

नमस्कार,

आज की इस व्यस्त और भागदौड़ भरी जिंदगी में हम बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. अपने समाज में हो रहे बदलावों से या तो अनभिज्ञ रहते हैं या तो जान-बूझकर भी अनजान बन जाते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमें अंतर्मुखी और स्वार्थी बनाती है, जो कि इस समाज के लिए हितकारी नहीं है. यहाँ पर कुछ ऐसे ही मुद्दों से सम्बंधित लेख और विचारों का संग्रह करने का मैंने प्रयास किया है. (कृष्णधर शर्मा- 9479265757) facebook.com/kdsharmambbs

रविवार, 27 नवंबर 2011

मुहावरे (च)

चंडाल चौकड़ी : दुष्टों का समुदाय, समूह. 

चंद्रमा बलवान होना : भाग्य अनुकूल होना. आजकर तुम्हारा चंद्रमा बलवान है, जो कुछ करोगे उसमें लाभ होगा.

चंपत हो जाना : चला जाना, भाग जाना. सुल्तान के बहुत-से सिपाही तो लड़ाई में मारे गए. जो बचे वे प्राण बचाकर इधर-उधर चंपत हो गए.

चकमा देना : धोखा देना. इस बदमाश ने मुझे बड़ा चकमा दिया.

चक्कर में फँसना : झंझट, कठिनाई, बखेड़े में फँसना.

चखचख मचना : लड़ाई-झगड़ा होना.

चट कर जाना : सबका सब का जाना. दूसरे की वस्तु हड़प कर जाना.

चड्ढ़ी गाँठना : सवारी करना.

चढ़ दौड़ना : आक्रमण करना.

चना-चबैना : रूखा-सूखा भोजन.

चपेट में आना : चंगुल में फँसना.

चप्पा-चप्पा छान डालना : हर जगह देख आना.

चरणों की धूल : किसी की तुलना में अत्यन्त नगण्य व्यक्ति.

चरणामृत लेना : देवमूर्ति, महात्मा आदि के चरण धोकर पीना.

चरबी चढ़ना : बहुत मोटा होना. मदांध होना.

चलता करना : हटा देना, भगा देना, निपटाना. किसी प्रकार इस मामले को चलता करो.

चलता-पुरजा : चालाक, व्यवहार-कुशल. मोहन बड़ा चलता-पुरजा आदमी है, वह तुम्हारा काम करा देगा.

चलता-फिरता नजर आना : चले जाना, खिसक जाना. यहाँ बैठिए मत, चलते-फिरते नजर आइए.

चस्का लगना : शौक होना, आदत पड़ना. कुछ दिनों से कमलाचरण को जुए का चस्का पड़ चला था.

चहल-पहल रहना : रौनक होना, बहुत-से लोगों का आना-जाना, एकत्र होना. जहाँ रात-दिन निर्जनता और नीरवता का आधिपत्य रहता था वहाँ अब हरदम चहल-पहल रहती है.

चाँद का टुकड़ा : अत्यंत सुंदर व्यक्ति/पदार्थ.

चाँद पर थूकना : किसी ऐसे महान व्यक्ति पर कलंक लगाना जिसके कारण स्वयं अपमानित होना पड़े.

चाँदी कटना : खूब लाभ होना. आजकल राशनवालों की चाँद कट रही है.

चाँदी के टुकड़े : रुपए उसने चाँदी के टुकड़ों के लिए अपना ईमान बेच दिया है.

चाक चौबंद : चौकन्ना और स्वस्थ, हर दृष्टि से होशयार-चतुर.

चादर देखकर पाँव फैलाना : आय के अनुसार व्यय करना, शक्ति के अनुसार काम करना.

चाम के दाम चलाना : अन्याय करना, अपनी जबरदस्ती के भरोसे कोई काम करना.

चार आँखें होना : देखा-देखी होना, किसी से नजरें मिलाना.

चार चाँद लगना : शोभा, सौंदर्य की अत्यधिक वृद्धि करना.

चार पैसे : थोड़ा-सा धन. उनका बस चलता तो दाननाथ चार पैसे के आदमी हो गए होते.

चार सौ बीस : बहुत बड़ा धूर्त, कपटी, छलिया.

चिकना घड़ा : निर्लज्ज, बेहया व्यक्ति. नारद का कर्म-सचेत मन इन धमकियों के लिए अब चिकने घड़े के समान हो चुका था.

चिकना देखकर फिसल पड़ना : सुन्दर रूप-रंग देखकर मुग्ध हो जाना.

चिकनी चुपड़ी बातें : मीठी बातें जो किसी को प्रसन्न करने, बहकाने या धोखा देने के लिए कही जाएँ.

चिड़िया का दूध : अप्राप्य वस्तु, ऐसी वस्तु जिसका अस्तित्व न हो.

चिड़िया फँसाना : किसी मालदार आदमी को अपने दाँव पर चढ़ाना. किसी स्त्री को अपने वश में करना.

चित्त चुराना : मन मोह लेना. शकुन्तला ने दुष्यन्त का चित्त चुरा लिया था.

चित्र-लिखा-सा जान पड़ना : बिलकुल मंत्रमुग्ध, स्थिर, चुपचाप या जड़वत् रहना. तुम्हारे राग से लोग ऐसे बेसुए हो गए हैं कि सारी रंगशाला चित्र-लिखी-सी जान पड़ती है.

चिराग तले अँधेरा होना : जहाँ विशेष विचार, न्याय, योग्यता आदि की आशा हो वहाँ पर कुविचार, अन्याय, अयोग्यता आदिहोना.

चिराग लेकर ढूँढना : बड़ी छानबीन, परिश्रम के साथ तलाश करना.

चीं-चपड़ करना : उज्र-इन्कार करना. किसी ने जरा भी चीं-चपड़ की तो हड्डी तोड़ दूँगा.

चीं बोलना : बहुत थक जाना, हार मान लेना. मिर्जा जी बड़ी जवांमर्दी दिखाने चले थे. पचास कदम में ही चीं बोल गए.

चींटी की चाल : बहुत मन्द गति. चींटी की पर निकलना : मृत्यु के निकट आना.

चील-झपट्टा होना : छीना-झपटी होना या झपटकर ले जाना.

चुटिया हाथ में होना : किसी के अधीन या पूर्णतः नियंत्रण में होना.

चुपड़ी और दो-दो : दोनों ओर से लाभ, दोहरा लाभ, बढ़िया भी और मात्रा में भी अधिक.

चूँ-चूँ का मुरब्बा : तरह-तरह की बेमेल चीजों का योग.

चूना लगाना : ठग लेना, नीचा दिखाना, बेवकूफ बनाना, हानि पहुँचाना. इन्होंने पहले यह बताया ही नहीं था कि चचिया ससुर को चूना लगाने के लिए बनारस चलना है.

चूर रहना : निमग्न, डूबा हुआ, मस्त रहना. माधवी कल्पित प्रेम के उल्लास में चूर रहती थी.

चूलें ढीली होना : अधिक परिश्रम के कारण बहुत थकावट होना.

चूल्हे में जाय : नष्ट हो जाए. चूल्हे में जाय तू और तेरे वकील.

चेहरा उतरना : चिन्ता, लज्जा, शोक, दुख, भय, रोग आदि के कारण मुख का कान्तिहीन हो जाना. कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी नहीं दी मैया. यह सुनते ही बिरजू की माँ का चेहरा उतर गया.

चेहरा खिल उठना : प्रसन्न होना, चेहरे से हर्ष प्रकट होना. अहाते के फाटक में फिटन के प्रवेश करते ही शेख जी का चेहरा खिल उठा.

चेहरा तमतमाना : तेज गर्मी, अत्यधिक क्रोध या तीव्र ज्वर के कारण चेहरे का लाल हो जाना.

चेहरा फ़क पड़ जाना : किसी अप्रत्याशित बात के सुनते ही चेहरा कान्तिहीन हो जाना.

चैन की नींद सोना : निश्च्िान्त रहना, सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करना. लाला धनीराम और उनके सहयोगियों को मैं चैन की नींद न सोने दूंगा.

चोटी का : सर्वोत्तम, सर्वश्रेष्ठ. यह पहला अवसर था कि उन्हें चोटी के आदमियों से इतना सम्मान मिले.

चोटी हाथ में होना : किसी के वश में होना, लाचार होना. उनकी चोटी मेरे हाथ में है. अगर रुपये न दिए तो ऐसी खबर लूंगा कि याद करेंगे.

चोला छोड़ना : मरना, शरीर त्यागना. जिस दिन उमंग आई मैं हिमालय की ओर जाकर चोला छोड़ दूंगा.

चोली-दामन का साथ : घनिष्ठ सम्बन्ध, साथ-साथ चलने वाली वस्तुएँ. पन्ना रूपवती स्त्री थी और रूप तथा गर्व में चोली-दामन का नाता है.

चौकड़ी भूल जाना : घबड़ा जाना, सिटपिटा जाना.

चौक पूरना : पूजा आदि पवित्र कार्य के लिए आटे और अबीर-हल्दी से चौखटा बनाकर उसके भीतर तरह-तरह की आकृतियाँ बनाना.

चौका-बरतन करना : बरतन माँजने और रसोईघर लीपने-पोतने या धोने का काम करना.

चौखट पर माथा टेकना : अनुनय-विनय करना, विनीत प्रार्थना करना.

चौथ का चाँद : भादों शुक्ल चौथ का चाँद जिसके बारे में यह कहा जाता है कि यदि कोई उसे देख ले तो कलंक लगता है.

रविवार, 13 नवंबर 2011

मुहावरे (घ)

घंटा दिखाना : आवेदक या याचक को कोई वस्तु न देना, उसे निराश कर देना.

घट-घट में बसना : हर एक मनुष्य के हृदय में रहना.

घड़ियाँ गिनना : बहुत उत्कंठा के साथ प्रतीक्षा करना, मरणासन्न होना.

घड़ों पानी पड़ना : दूसरों के सामने हीन सिद्ध होने पर अत्यंत लज्जित होना.

घपले में पड़ना : किसी काम का खटाई में पड़ना.

घमंड में चूर होना : अत्यधिक अभिमान होना.

घर करना : बसना, रहना, निवास करना, जमना, बैठना.

घर का न घाट का : बेकाम, निकम्मा.

घर फूंककर तमाशा देखना : घर की दौलत उड़ाकर मौज करना.

घर में भूंजी भाँग न होना : घर में कुछ धन-दौलत न होना, अकिंचन होना, अत्यंत निर्धन होना.

घाट-घाट का पानी पीना : अनेक स्थलों का अनुभव प्राप्त करना. देश-देशान्तर के लोगों की जीवनचर्या की जानकारी प्राप्त करना.

घात में रहना : किसी को हानि पहुँचाने के लिए अनुकूल अवसर ढूँढते फिरना.

घाव पर नमक छिड़कना : दुख पर दुख देना, दुखी व्यक्ति को और यंत्रणा देना.

घाव पर मरहम रखना : सांत्वना देना, तसल्ली बंधाना.

घाव हरा होना : भूला हुआ दुख फिर याद आ जाना.

घास न डालना : प्रोत्साहन न देना, सहायता न करना.

घिग्घी बँध जाना : भय, क्षोभ या अन्य किसी संवेग के कारण मुंह से बोली न निकलना, कण्ठावरोध होना.

घी का चिराग जलाना : कार्य सिद्ध होने पर आनंद मनाना, प्रसन्न होना.

घी-खिचड़ी होना : आपस में अत्यधिक मेल होना.

घुट-घुट कर मरना : पानी या हवा के न मिलने से असह्य कष्ट भोगते हुए मरना.

घुटा हुआ : बहुत चालाक, धूर्त, छंटा हुआ बदमाश.

घुन लगना : शरीर का अंदर-अंदर क्षीण होना, चिंता होना.

घुल-मिल जाना : एक हो जाना.

घूंघट का पट खोलना : अज्ञान का परदा दूर करना.

घोड़ा बेंचकर सोना : खूब निश्चिंत होकर सोना.

घोलकर पी जाना : किसी चीज का अस्तित्व न रहने देना.

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर

नोबल पुरस्कार [साहित्य] विजेता गुरुदेव  रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म  7 मई, 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। वे देवेन्द्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के पुत्र थे .
 उनकी पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री टैगोर सहज ही कला के कई स्वरूपों की ओर आकृष्ट हुए जैसे- साहित्य, कविता, नृत्य और संगीत। उन्होंने बैरिस्टर बनने की चाहत में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही स्वदेश वापस आ गए। सन् 1883 में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ।
दुनिया की समकालीन सांस्कृतिक रुझान से वे भली-भाँति अवगत थे। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में टैगोर की चित्रकला यात्रा शुरू हुई। यह उनके कवित्य सजगता का विस्तार था। हालांकि उन्हें कला की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी उन्होंने एक सशक्त एवं सहज दृश्य शब्दकोश का विकास कर लिया था। श्री टैगोर की इस उपलब्धि के पीछे आधुनिक पाश्चात्य, पुरातन एवं बाल्य कला जैसे दृश्य कला के विभिन्न स्वरूपों की उनकी गहरी समझ थी। रबीन्द्रनाथ टैगोर को प्रकृति से बहुत प्यार था। वे गुरुदेव के नाम से लोकप्रिय थे। भारत आकर गुरुदेव ने फिर से लिखने का काम शुरू किया।
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रचनाएँ
रबीन्द्रनाथ ठाकुर एक बांग्ला कवि, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंधकार और चित्रकार थे। जिन्हें 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। टैगोर ने बांग्ला साहित्य में नए गद्य और छंद तथा लोकभाषा के उपयोग की शुरुआत की और इस प्रकार शास्त्रीय संस्कृत पर आधारित पारंपरिक प्रारूपों से उसे मुक्ति दिलाई। धर्म सुधारक देवेन्द्रनाथ टैगोर के पुत्र रबींद्रनाथ ने बहुत कम आयु में काव्य लेखन प्रारंभ कर दिया था। 1870 के दशक के उत्तरार्द्ध में वह इंग्लैंड में अध्ययन अधूरा छोड़कर भारत वापस लौट आए। भारत में रबींद्रनाथ टैगोर ने 1880 के दशक में कविताओं की अनेक पुस्तकें प्रकाशित की तथा मानसी (1890) की रचना की। यह संग्रह उनकी प्रतिभा की परिपक्वता का परिचायक है। इसमें उनकी कुछ सर्वश्रेष्ठ कविताएँ शामिल हैं, जिनमें से कई बांग्ला भाषा में अपरिचित नई पद्य शैलियों में हैं। साथ ही इसमें समसामयिक बंगालियों पर कुछ सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य भी हैं।

दो-दो राष्ट्रगानों के रचयिता रवीन्द्रनाथ टैगोर के पारंपरिक ढांचे के लेखक नहीं थे। वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं- भारत का राष्ट्र-गान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं। वे वैश्विक समानता और एकांतिकता के पक्षधर थे। ब्रह्मसमाजी होने के बावज़ूद उनका दर्शन एक अकेले व्यक्ति को समर्पित रहा। चाहे उनकी ज़्यादातर रचनाऐं बांग्ला में लिखी हुई हों। वह एक ऐसे लोक कवि थे जिनका केन्द्रीय तत्त्व अंतिम आदमी की भावनाओं का परिष्कार करना था। वह मनुष्य मात्र के स्पन्दन के कवि थे। एक ऐसे कलाकार जिनकी रगों में शाश्वत प्रेम की गहरी अनुभूति है, एक ऐसा नाटककार जिसके रंगमंच पर सिर्फ़ ‘ट्रेजडी’ ही ज़िंदा नहीं है, मनुष्य की गहरी जिजीविषा भी है। एक ऐसा कथाकार जो अपने आस-पास से कथालोक चुनता है, बुनता है, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि घनीभूत पीड़ा के आवृत्ति करे या उसे ही अनावृत्त करे, बल्कि उस कथालोक में वह आदमी के अंतिम गंतव्य की तलाश भी करता है।
यहाँ पर उनकी दो लोकप्रिय रचनाएं प्रस्तुत हैं:-
                                             १.
आमार ए गान छेड़ेछे तार शॉकोल ऑलोंकार
तोमार कछे रखे नि आर शाजेर ऑहोंकार
ऑलोंकार जे माझे पॉड़े मिलॉनेते अड़ाल कॉरे,
तोमार कॉथा ढाके जे तार मुखॉरो झॉंकार ।

तोमार काछे खाटे ना मोर कोबिर गॉर्बो कॉरा,
मॉहाकोबि, तोमार पाये दिते जे चाइ धॉरा ।
जीबोन लोये जॉतोन कोरि जोदि शॉरोल बाँशि गॉड़ि,
आपोन शुरे दिबे भोरि सॉकोल छिद्रो तार ।
    
                     २.
धोने धान्ये पुष्पे भोरा, आमादेईर बसुन्धरा
ताहार माझे आछे देशेक सकोल देशेर शेरा
ओ जे स्वप्नों दिये तोइरी शे देश स्मृति दिये घेरा
ऐमोन देशटि कोथाये खुंजे पाबे नाको तुमि
सकोल देशेर रानी शे जे आमार जन्मोभूमि ।
चन्द्रो सुरजो ग्रोहो तारा कोथाये उजलो ऐमोन धारा
कोथाये ऐमोन खालेय तोरीर ऐमोन कालो मेघेय
ओ तार पाखिरे डाके घूमिये पोडी पाखिर डाके जागेय ।
एतो स्निग्धो नदी काहार कोथाये ऐमोन धूम्र पाहाड़
कोथाये ऐमोन होरित खेत्रो, आकाश तौलेय मेशे
ऐमोन धानेर ओपोर ढेऊ खेलेय जाय बाताश काहार देशे ।
पुष्पे पुष्पे भोरा साखी कुंजेय कुंजेय गाहेय पाखी
गूंजरिया आशेय ओली पूंजेय पूंजेय धेये
तारा फोलेर उपौर घूमिये पावरेय फुलेर मोधु खेये ।
ओ माँ तोमार चरोन दूटी बोक्खे आमार धोरी
आमार एई देशेतेय जन्मो जेनो एई देशेतेय मोरी ।
सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
सियालदह और शजादपुर स्थित अपनी ख़ानदानी जायदाद के प्रबंधन के लिए 1891में टैगोर ने 10 वर्ष तक पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांगला देश) में रहे, वहाँ वह अक्सर पद्मा नदी (गंगा नदी) पर एक हाउस बोट में ग्रामीणों के निकट संपर्क में रहते थे और उन ग्रामीणों की निर्धनता व पिछड़ेपन के प्रति टैगोर की संवेदना उनकी बाद की रचनाओं का मूल स्वर बनी। उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ, जिनमें ‘दीन-हीनों’ का जीवन और उनके छोटे-मोटे दुख’ वर्णित हैं, 1890 के बाद की हैं और उनकी मार्मिकता में हल्का सा विडंबना का पुट है। जो टैगोर की निजी विशेषता है तथा जिसे निर्देशक सत्यजित राय अपनी बाद की फ़िल्मों में कुशलतापूर्वक पकड़ पाए हैं।
गल्पगुच्छ की तीन जिल्दों में उनकी सारी चौरासी कहानियाँ संगृहीत हैं,जिनमें से केवल दस प्रतिनिधि कहानियाँ चुनना टेढ़ी खीर है। 1891 से 1895 के बीच का पाँच वर्षों का समय रवीन्द्रनाथ की साधना का महान काल था। वे अपनी कहानियाँ सबुज पत्र (हरे पत्ते)में छपाते थे। आज भी पाठकों को उनकी कहानियों में ‘हरे पत्ते’ और ‘हरे गाछ’ मिल सकते हैं। उनकी कहानियों में सूर्य, वर्षा, नदियाँ और नदी किनारे के सरकंडे, वर्षा ऋतु का आकाश, छायादार गाँव, वर्षा से भरे अनाज के प्रसन्न खेत मिलते हैं। उनके साधारण लोग कहानी खत्म होते-होते असाधारण मनुष्यों में बदल जाते हैं। महानता की पराकाष्ठा छू आते हैं। उनकी मूक पीड़ा की करुणा हमारे हृदय को अभिभूत कर लेती है।
उनकी कहानी पोस्टमास्टर इस बात का सजीव उदाहरण है कि एक सच्चा कलाकार साधारण उपकरणों से कैसी अद्भुत सृष्टि कर सकता है। कहानी में केवल दो सजीव साधारण-से पात्र हैं। बहुत कम घटनाओं से भी वे अपनी कहानी का महल खड़ा कर देते हैं। एक छोटी लड़की कैसे बड़े-बड़े इंसानों को अपने स्नेह-पाश में बाँध देती हैं। ‘क़ाबुलीवाला’ भी इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। रवीन्द्रनाथ ने पहली बार अपनी कहानियों में साधारण की महिमा का बखान किया।
रवीन्द्रनाथ की कहानियों में अपढ़ ‘क़ाबुलीवाला’ और सुसंस्कृत बंगाली भूत भावनाओं में एक समान हैं। उनकी क़ाबुलीवाला, मास्टर साहब और ‘पोस्टमास्टर’ कहानियाँ आज भी लोकप्रिय कहानियाँ हैं-लोकप्रिय और सर्वश्रेष्ठ भी और बनी रहेंगी। उनकी कहानियाँ सर्वश्रेष्ठ होते हुए भी लोकप्रिय हैं और लोकप्रिय होते हुए भी सर्वश्रेष्ठ हैं।
अपनी कल्पना के पात्रों के साथ रवीन्द्रनाथ की अद्भुत सहानुभूतिपूर्ण एकात्मकता और उसके चित्रण का अतीव सौंदर्य उनकी कहानी को सर्वश्रेष्ठ बना देते हैं जिसे पढ़कर द्रवित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। उनकी कहानियाँ फ़ौलाद को मोम बनाने की क्षमता रखती हैं।
अतिथि का तारापद रवीन्द्रनाथ की अविस्मरणीय सृष्टियों में है। इसका नायक कहीं बँधकर नहीं रह पाता। आजीवन ‘अतिथि’ ही रहता है। क्षुधित पाषाण, आधी रात में (निशीथे) तथा ‘मास्टर साहब’ प्रस्तुत संग्रह की इन तीन कहानियों में दैवी तत्त्व का स्पर्श मिलता है। इनमें पहली ‘क्षुधित पाषाण’ में कलाकार की कल्पना अपने सुंदरतम रूप में व्यक्त हुई है। यहाँ अतीत वर्तमान के साथ वार्तालाप करता है-रंगीन प्रभामय अतीत के साथ नीरस वर्तमान। समाज में महिलाओं का स्थान तथा नारी जीवन की विशेषताएँ उनके लिए गंभीर चिंता के विषय थे और इस विषय में भी उन्होंने गहरी अंतर्दृष्टि का परिचय दिया है।
संगीत
राष्‍ट्रगान (जन गण मन) के रचयिता टैगोर को बंगाल के ग्राम्यांचल से प्रेम था और इनमें भी पद्मा नदी उन्हें सबसे अधिक प्रिय थी। जिसकी छवि उनकी कविताओं में बार-बार उभरती है। उन वर्षों में उनके कई कविता संग्रह और नाटक आए, जिनमें सोनार तरी (1894; सुनहरी नाव) तथा चित्रांगदा (1892) उल्लेखनीय है। वास्तव में टैगोर की कविताओं का अनुवाद लगभग असंभव है और बांग्ला समाज के सभी वर्गों में आज तक जनप्रिय उनके 2,000 से अधिक गीतों, जो ‘रबींद्र संगीत’ के नाम से जाने जाते हैं, पर भी यह लागू होता है।
चित्रकला
साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में टैगोर की चित्रकला यात्रा शुरू हुई। यह उनके कवित्य सजगता का विस्तार था। हालांकि उन्हें कला की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी उन्होंने एक सशक्त एवं सहज दृश्य शब्दकोष का विकास कर लिया था। श्री टैगोर की इस उपलब्धि के पीछे आधुनिक पाश्चात्य, पुरातन एवं बाल्य कला जैसे दृश्य कला के विभिन्न स्वरूपों की उनकी गहरी समझ थी। एक अवचेतन प्रक्रिया के रूप में आरंभ टैगोर की पांडुलिपियों में उभरती और मिटती रेखाएं ख़ास स्वरूप लेने लगीं। धीरे-धीरे टैगोर ने कई चित्रों को उकेरा जिनमें कई बेहद काल्पनिक एवं विचित्र जानवरों, मुखौटों, रहस्यमयी मानवीय चेहरों, गूढ़ भू-परिदृश्यों, चिड़ियों एवं फूलों के चित्र थे। उनकी कृतियों में फंतासी, लयात्मकता एवं जीवंतता का अद्भुत संगम दिखता है। कल्पना की शक्ति ने उनकी कला को जो विचित्रता प्रदान की उसकी व्याख्या शब्दों में संभव नहीं है। कभी-कभी तो ये अप्राकृतिक रूप से रहस्यमयी और कुछ धुंधली याद दिलाते हैं। तकनीकी रूप में टैगोर ने सर्जनात्मक स्वतंत्रता का आनंद लिया। उनके पास कई उद्वेलित करने वाले विषय थे जिनको लेकर बेशक कैनवस पर रंगीन रोशनाई से लिपा-पुता चित्र बनाने में भी उन्हें हिचक नहीं हुई। रोशनाई से बने उनके चित्र में एक स्वच्छंदता दिखती है जिसके तहत कूची, कपड़ा, रूई के फाहों, और यहाँ तक कि अंगुलियों के बख़ूबी इस्तेमाल किए गए हैं। टैगोर के लिए कला मनुष्य को दुनिया से जोड़ने का माध्यम है। आधुनिकवादी होने के नाते टैगोर विशेष कर कला के क्षेत्र में पूरी तरह समकालीन थे।
राष्ट्रगान (जन गण मन) के रचयिता टैगोर को बंगाल के ग्राम्यांचल से प्रेम था और इनमें भी पद्मा नदी उन्हें सबसे अधिक प्रिय थी। जिसकी छवि उनकी कविताओं में बार-बार उभरती है। उन वर्षों में उनके कई कविता संग्रह और नाटक आए, जिनमें सोनार तरी (1894; सुनहरी नाव) तथा चित्रांगदा (1892) उल्लेखनीय है।

टैगोर की कविताओं की पांडुलिपि को सबसे पहले विलियम रोथेनस्टाइन ने पढ़ा था और वे इतने मुग्ध हो गए कि उन्होंने अँग्रेज़ी कवि यीट्स से संपर्क किया और पश्चिमी जगत के लेखकों, कवियों, चित्रकारों और चिंतकों से टैगोर का परिचय कराया। उन्होंने ही इंडिया सोसायटी से इसके प्रकाशन की व्यवस्था की। शुरू में 750 प्रतियाँ छापी गईं, जिनमें से सिर्फ़ 250 प्रतियाँ ही बिक्री के लिए थीं। बाद में मार्च 1913 में मेकमिलन एंड कंपनी लंदन ने इसे प्रकाशित किया और 13 नवंबर 1913 को नोबेल पुरस्कार की घोषणा से पहले इसके दस संस्करण छापने पड़े। यीट्स ने टैगोर के अँग्रेज़ी अनुवादों का चयन करके उनमें कुछ सुधार किए और अंतिम स्वीकृति के लिए उन्हें टैगोर के पास भेजा और लिखाः ‘हम इन कविताओं में निहित अजनबीपन से उतने प्रभावित नहीं हुए, जितना कि यह देखकर कि इनमें तो हमारी ही छवि नज़र आ रही है।’ बाद में यीट्स ने ही अँग्रेज़ी अनुवाद की भूमिका लिखी। उन्होंने लिखा कि कई दिनों तक इन कविताओं का अनुवाद लिए मैं रेलों, बसों और रेस्तराओं में घूमा हूँ और मुझे बार-बार इन कविताओं को इस डर से पढ़ना बंद करना पड़ा है कि कहीं कोई मुझे रोते-सिसकते हुए न देख ले। अपनी भूमिका में यीट्स ने लिखा कि हम लोग लंबी-लंबी किताबें लिखते हैं जिनमें शायद एक भी पन्ना लिखने का ऐसा आनंद नहीं देता है। बाद में गीतांजलि का जर्मन, फ्रैंच, जापानी, रूसी आदि विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ और टैगोर की ख्याति दुनिया के कोने-कोने में फैल गई।
शांतिनिकेतन
1901 में टैगोर ने पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र में स्थित शांतिनिकेतन में एक प्रायोगिक विद्यालय की स्थापना की। जहाँ उन्होंने भारत और पश्चिमी परंपराओं के सर्वश्रेष्ठ को मिलाने का प्रयास किया। वह विद्यालय में ही स्थायी रूप से रहने लगे और 1921 में यह विश्व भारती विश्वविद्यालय बन गया। 1902 तथा 1907 के बीच उनकी पत्नी तथा दो बच्चों की मृत्यु से उपजा गहरा दुख उनकी बाद की कविताओं में परिलक्षित होता है, जो पश्चिमी जगत में गीतांजली, साँग ऑफ़रिंग्स (1912) के रूप में पहुँचा। शांति निकेतन में उनका जो सम्मान समारोह हुआ था उसका सचित्र समाचार भी कुछ ब्रिटिश समाचार पत्रों में छपा था। 1908 में कोलकाता में हुए कांग्रेस अधिवेशन के सभापति और बाद में ब्रिटेन के प्रथम लेबर प्रधानमंत्री रेम्जे मेक्डोनाल्ड 1914 में एक दिन के लिए शांति निकेतन गए थे। उन्होंने शांति निकेतन के संबंध में पार्लियामेंट के एक लेबर सदस्य के रूप में जो कुछ कहा वह भी ब्रिटिश समाचार पत्रों में छपा। उन्होंने शांति निकेतन के संबंध में सरकारी नीति की भर्त्सना करते हुए इस बात पर चिंता व्यक्त की थी कि शांति निकेतन को सरकारी सहायता मिलना बंद हो गई है। पुलिस की ब्लेक लिस्ट में उसका नाम आ गया है और वहाँ पढ़ने वाले छात्रों के माता-पिता को धमकी भरे पत्र मिल रहे हैं। पर ब्रिटिश समाचार पत्र बराबर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के इस प्रकार प्रशंसक नहीं रहे।
ब्रिटेन में गुरुदेव
रवीन्द्रनाथ ठाकुर 1878 से लेकर 1930 के बीच सात बार इंग्लैंड गए। 1878 और 1890 की उनकी पहली दो यात्राओं के संबंध में ब्रिटेन के समाचार पत्रों में कुछ भी नहीं छपा क्योंकि तब तक उन्हें वह ख्याति नहीं मिली थी कि उनकी ओर किसी विदेशी समाचार पत्र का ध्यान जाता। उस समय तो वे एक विद्यार्थी ही थे।
पहली पुस्तक का प्रकाशन
जब वे तीसरी बार 1912 में लंदन गए तब तक उनकी कविताओं की पहली पुस्तक का अंग्रेज़ी में अनुवाद प्रकाशित हो चुका था, अत: उनकी ओर ब्रिटेन के समाचार पत्रों का ध्यान गया। उनकी यह तीसरी ब्रिटेन यात्रा वस्तुत: उनके प्रशंसक एवं मित्र बृजेन्द्रनाथ सील के सुझाव एवं अनुरोध पर की गई थी और इस यात्रा के आधार पर पहली बार वहाँ के प्रमुख समाचार पत्र ‘द टाइम्स’ में उनके सम्मान में दी गई एक पार्टी का समाचार छपा जिसमें ब्रिटेन के कई प्रमुख साहित्यकार यथा डब्ल्यू.बी.यीट्स, एच.जी.वेल्स, जे.डी. एण्डरसन और डब्ल्यू.रोबेन्सटाइन आदि उपस्थित थे।
इसके कुछ दिन बाद ‘द टाइम्स’ में ही उनके काव्य की प्रशंसा में तीन पैराग्राफ लम्बा एक समाचार भी छपा और फिर उनकी मृत्यु के समय तक ब्रिटेन के समाचार पत्रों में उनके जीवन और कृतित्व के संबंध में कुछ-न-कुछ बराबर ही छपता रहा। इस पुस्तक से यह भी पता चलता है कि किस प्रकार परम्परागत रूप से भारत विरोधी समाचार पत्र उनके संबंध में चुप्पी ही लगाए रहे पर निष्पक्ष और भारत के प्रति सहानुभूति रखने वाले समाचार पत्रों ने बड़ी उदारता से उनके संबंध में समाचार, लेख आदि प्रकाशित किए। उदाहरणत: ब्रिटेन के कट्टर रुढ़िवादी कंजरवेटिव समाचार पत्र ‘डेली टेलीग्राफ’ ने उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलने की सूचना तक प्रकाशित करना उचित नहीं समझा जबकि उस दिन के अन्य सभी समाचार पत्रों में इस सूचना के साथ ही पुरस्कृत कृति ‘गीतांजलि’ के संबंध में वहाँ के समीक्षकों की सम्मति भी प्रकाशित हुई।

‘गीतांजलि’ का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित होने के एक सप्ताह के अंदर लंदन से प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट’ में उसकी समीक्षा प्रकाशित हुई थी और बाद में आगामी तीन माह के अंदर तीन समाचार पत्रों में भी उसकी समीक्षा प्रकाशित हुई। रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नोबेल पुरस्कार मिलने के संबंध में ब्रिटिश समाचार पत्रों में मिश्रित प्रतिक्रिया हुई। इस संबंध में ‘द टाइम्स’ ने लिखा था कि ‘स्वीडिश एकेडेमी’ के इस अप्रत्याशित निर्णय पर कुछ समाचार पत्रों में आश्चर्य व्यक्त किया गया है’ पर इस पत्र के स्टाकहोम स्थित संवाददाता ने अपने डिस्पेच में लिखा था कि स्वीडन के प्रमुख कवियों और लेखकों ने स्वीडिश कमेटी के सदस्यों की हैसियत से नोबेल कमेटी के इस निर्णय पर पूर्ण संतोष व्यक्त किया है। इसी संबंध में ब्रिटेन के प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘मेन्चेस्टर गार्डियन’ ने लिखा था कि रवीन्द्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिलने की सूचना पर कुछ लोगों को आश्चर्य अवश्य हुआ पर असंतोष नहीं। टैगोर एक प्रतिभाशाली कवि हैं। बाद में ‘द केरसेण्ट मून’ की समीक्षा करते हुए एक समाचार पत्र ने लिखा था कि इस बंगाली (यानी रवीन्द्रनाथ ठाकुर) का अंग्रेज़ी भाषा पर जैसा अधिकार है वैसा बहुत कम अंग्रेज़ों का होता है।
जलियाँवाला काँड की निंदा
1919 में हुए जलियाँवाला काँड की जब रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने निंदा की तो ब्रिटिश समाचार पत्रों का रुख एकाएक बदल गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जलियाँवाला काण्ड के विरोध स्वरूप अपना ‘सर’ का खिताब लौटाते हुए वाइसराय को जो पत्र लिखा वह भी ब्रिटिश समाचार पत्रों ने छापना उचित नहीं समझा। पर लॉर्ड माण्टेग्यू ने पार्लियामेंट में जब घोषणा की कि ‘सर रवीन्द्रनाथ को दिया गया खिताब वापिस नहीं लिया गया है’ तो यह समाचार ब्रिटिश समाचार पत्रों में अवश्य छपा। ‘डेली टेलीग्राफ’ ने तो व्यंग्यपूर्वक यह भी लिखा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के अंग्रेज़ी प्रकाशक मेकमिलन्स उनके नाम के साथ अभी भी ‘सर’ छाप रहे हैं। 1941 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मृत्यु पर ब्रिटिश समाचार पत्रों ने जो कुछ लिखा उससे जान पड़ता है मानो उनके सिर पर से एक बहुत बड़ा भारी बोझ हट गया है। एक समाचार पत्र ने उनके मृत्यु लेख में लिखा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर को इस बात के लिए मनाने की कोशिश की गई थी कि वे अपने ‘सर’ के खिताब को वापिस करने के निर्णय पर पुनर्विचार करें।
‘द टाइम्स’ ने हाउस ऑफ़ कॉमन्स की कार्यवाही का उल्लेख करते हुए लिखा कि अंडर सेक्रेटरी फ़ॉर इंडिया ने यह माना था कि उनकी पुस्तक ‘रूस के पत्र’ के अनुवाद में एक पूरे परिच्छेद में तथ्यों को जानबूझकर तोड़ा-मरोड़ा गया था जिससे भारत में ब्रिटिश शासन की निंदा हो। इस प्रकार तथ्यों को तोड़े-मरोड़े जाने और तरह-तरह के आरोपों के बावज़ूद अधिकांश समाचार पत्रों में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के संबंध में प्राय: प्रशंसात्मक लेख ही छपते रहे। 1921 में छपे एक समाचार से पता चलता है कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की लंदन से पेरिस की पहली हवाई यात्रा का पूरा खर्च चेकोस्लावाकिया की सरकार ने दिया था।
जनसंहार की प्रतिक्रियाएँ

रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने इस हत्याकाण्ड के मुखर विरोध किया और विरोध स्वरूप अपनी ‘नाइटहुड’ की उपाधि को वापस कर दिया था। आज़ादी का सपना ऐसी भयावह घटना के बाद भी पस्त नहीं हुआ। इस घटना के बाद आज़ादी हासिल करने की इच्छा और ज़ोर से उफन पड़ी। यद्यपि उन दिनों संचार के साधन कम थे, फिर भी यह समाचार पूरे देश में आग की तरह फैल गया। ‘आज़ादी का सपना’ पंजाब ही नहीं, पूरे देश के बच्चे-बच्चे के सिर पर चढ़ कर बोलने लगा। उस दौरान हज़ारों भारतीयों ने जलियांवाला बाग़ की मिट्टी से माथे पर तिलक लगाकर देश को आज़ाद कराने का दृढ़ संकल्प लिया।

सम्मान
टैगोर के गीतांजली (1910) समेत बांग्ला काव्य संग्रहालयों से ली गई कविताओं के अंग्रेज़ी गद्यानुवाद की इस पुस्तक की डब्ल्यू.बी.यीट्स और आंद्रे जीद ने प्रशंसा की और इसके लिए टैगोर को 1913 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।
विदेशी यात्रा
1912 में टैगोर ने लंबी अवधि भारत से बाहर बिताई, वह यूरोप, अमेरिका और पूर्वी एशिया के देशों में व्याख्यान देते व काव्य पाठ करते रहे और भारत की स्वतंत्रता के मुखर प्रवक्ता बन गए। हालांकि टैगोर के उपन्यास उनकी कविताओं और कहानियों जैसे असाधारण नहीं हैं, लेकिन वह भी उल्लेखनीय है। इनमें सबसे ज़्यादा लोकप्रिय है गोरा (1990) और घरे-बाइरे (1916; घर और बाहर), 1920 के दशक के उत्तरार्द्ध में टैगोर ने चित्रकारी शुरू की और कुछ ऎसे चित्र बनाए, जिन्होंने उन्हें समकालीन अग्रणी भारतीय कलाकारों में स्थापित कर दिया।

उनके विषय में अनेक उल्लेखनीय बाते हैं जैसे कि -

उन्होंने एक हजार से भी अधिक कविताओं तथा दो हजार से भी अधिक गीतों की रचना की है!
वे एक संगीतकार, अभिनेता, गायक और जादूगर भी थे!
उनके लिखे गीत दो देशों के राष्ट्रगान हैं – एक भारत का और दूसरा बँगलादेश का!
आज भी बंगाल में उनके गीत-संगीत के बगैर कोई समारोह शुरू नहीं होता!

मृत्यु
भारत के राष्ट्रगान के प्रसिद्ध रचयिता रबीन्द्रनाथ ठाकुर की मृत्यु 7 अगस्त, 1941 को कलकत्ता में हुई थी।
[साभार– भारत कोश व अन्य]

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

हमारे समाज में हो रहे बदलाव

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आज जिस तरह से हमारे समाज में बदलाव हो रहे हैं ऐसे हालात में अच्छे और बुरे में पहचान करना बहुत ही कठिन कार्य हो गया है.
हमारे इस आधुनिक समाज में पढ़ाई-लिखाई को बहुत महत्व दिया जा रहा है मगर पढ़े-लिखे लोग ही अच्छे लोग हों यह जरूरी नहीं है. बहुत अफसोस की बात है कि हमें जो पढ़ाया जा रहा है वह व्यावहारिक नहीं है और यह किताबी पढ़ाई हमें आदमी से मशीन बना रही है व हमें एक दूसरे के सुख-दुख से दूर करती जा रही है.
हम सभ्य और विकसित होने का दावा तो करते हैं मगर किसी के दुख या परेशानी में शामिल होने के लिये हमारे पास समय नहीं है. हमारे समाज में आज सीधे-सादे और अच्छे लोगों की कोई इज्जत नही होती है और उन्हें परेशान किया जाता है जबकि भ्रष्ट और दुराचारी लोगों का सम्मान किया जाता है.
आज के इस आधुनिक समाज में सादगी और सदाचारी की जगह बनावटी और भ्रष्टाचारी लोगों का का राज है जो जनता के सामने तो सदाचार और नैतिकता की बातें करते हैं मगर पीठ पीछे दुराचार और अनैतिक बातों में लगे रहते हैं.
हम आज जिस आधुनिक समाज में रह रहे हैं वह हमें अपने अधिकारों के बारे में तो हमें बताता है मगर हमें अपने कर्तव्यों के बारे में जागरूक नहीं करता जैसे कि हमारे पूर्वजों ने जो पेड़ लगाये थे उन पेड़ों से हमें शुद्ध और ताजी हवा मिलती है, मीठे फल मिलते हैं और ठंडी छांव मिलती है. हम लोग अपने पूर्वजों के लगाये हुये पेड़ तो अपनी जरूरतों के लिये काट देते हैं मगर अपनी आने वाली पीढ़ी के लिये पेड़ नहीं लगाते जिसकी वजह से आने वाली पीढि़यों को शुद्ध और ताजी हवा, मीठे फल और ठंडी छांव कैसे मिल पायेगी इसके बारे में हम नहीं सोचते.
आज हमें जरूरत है ऐसी पढ़ाई की जो हमें अपने अधिकारों के बारे में तो पढ़ाये ही और साथ ही हमे अपने कर्तव्यों के बारे में जागरूक भी बनाये जिससे हम पढ़ें-लिखें और साथ में एक अच्छे इंसान भी बन सकें.[कृष्ण धर शर्मा]