नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757
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शुक्रवार, 17 मार्च 2017


आमेर का किला जयपुर 
राजस्थान का  उपनगर आमेर  4 वर्ग किलोमीटर (1.5 वर्ग मीटर) में फैला एक शहर है जो भारत के राजस्थान राज्य के जयपुर से 11 किलोमीटर दुरी पर स्थित है. यह किला ऊँचे पर्वतो पर बना हुआ है, असल में आमेर शहर को मीनाओ ने बनवाया था और बाद में राजा मान सिंह प्रथम ने वहा शासन किया. यह जयपुर के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है, जो कि पहाड़ी पर स्थित है। आमेर दुर्ग का निर्माण राजा मान सिंह-प्रथम ने करवाया था। आमेर दुर्ग हिन्दू तत्वों की अपनी कलात्मक शैली के लिए जाना जाता है। अपनी विशाल प्राचीर, दरवाजों की श्रंखला और लम्बे सर्पिलाकार रास्ते के साथ यह अपने सामने की ओर स्थित मावठा झील की ओर देखता हुआ खड़ा है।
इस अजेय दुर्ग का सौंदर्य इसकी चारदीवारी के भीतर मौजूद इसके चार स्तरीय लेआउट प्लान में स्पष्ट दिखाई पड़ता है, जिसमें लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से निर्मित दीवान-ऐ-आम या "आम जनता के लिए विशाल प्रांगण", दीवान-ऐ-ख़ास या "निजी प्रयोग के लिए बना प्रांगण", भव्य शीश महल या जय मंदिर तथा सुख निवास शामिल हैं, जिन्हें गर्मियों में ठंडा रखने के लिए दुर्ग के भीतर ही कृत्रिम रूप से बनाये गए पानी के झरने इसकी समृद्धि की कहानी कहते हैं। इसीलिये, यह आमेर दुर्ग "आमेर महल" के नाम से भी जाना जाता है। राजपूत महाराजा अपने परिवारों के साथ इस महल में रहा करते थे। महल के प्रवेश द्वार पर, किले के गणेश द्वार के साथ चैतन्य सम्प्रदाय की आराध्य माँ शिला देवी का मंदिर स्थित है।
यह आमेर का किलाजयगढ़ दुर्ग के साथ, अरावली पर्वत श्रृंखला पर चील के टीले के ठीक ऊपर इस प्रकार स्थित है कि ये दो अलग अलग किले होते हुए भी समग्र रूप में एक विशाल संरचना का रूप लेते हुए दिखाई पड़ते हैं क्योंकि दोनों किले ना सिर्फ एक दूसरे के बेहद करीब स्थित हैं, बल्कि एक सुरंग के रास्ते से दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए भी हैं। आमेर के किले से जयगढ़ के किले तक की यह सुरंग इस उद्देश्य से बनायी गयी थी कि युद्ध के समय में राज परिवार के लोग आसानी से आमेर के किले से जयगढ़ के किले में पहुँच सकें, जो कि आमेर के किले की तुलना में अधिक दुर्जेय है।
यह मुगलों और हिन्दूओं के वास्तुशिल्प का मिलाजुला और अद्वितीय नमूना है। जयपुर से पहले कछवाहा राजपूत राजवंश की राजधानी आमेर ही थी। राजा मानसिंह जी ने वर्ष १५९२ में इसका निर्माण आरंभ किया था। पहाड़ी पर बना यह महल टेढ़े मेढ़े रास्तों और दीवारों से पटा पड़ा है। महल के पीछे से जयगढ दिखाई देता है। महल को बनाने में लाल पत्थरों और सफ़ेद मार्बल का बहुत अच्छे से उपयोग किया गया है। महल के कई अनुभाग देखने योग्य हैं।

महल में जय मंदिर, शीश महल, सुख निवास और गणेश पोल देखने और घूमने के अच्छे स्थान हैं। इन्हें समय-समय पर राजा मानसिंह ने दो सदी के शासन काल के दौरान बनवाया था। आमेर का पुराना नगर महल के पास नीचे की ओर बसा था। यहाँ का जगत शिरोमणि मंदिर, नरसिंह मंदिर देखने योग्य हैं।

आमेर का किला, कला का एक सुंदर नमूना भी है। यहाँ पर बहुत सी फिल्मों की शूटिंग भी होती है।






आमेर का किला विश्व धरोहर
राजस्थान सरकार ने जनवरी २०११ को राजस्थान के कुछ किलों को विश्व धरोहर में शामिल करने के लिए प्रस्ताव भेजा था। उसके बाद यूनेस्को टीम की आकलन समिति के दो प्रतिनिघि जयपुर आए और एएसआई व राज्य सरकार के अघिकारियों के साथ बैठक की। इन सबके पश्चात मई २०१३ में इसे विश्व धरोहर में शामिल कर लिया गया।

आमेर जयपुर नगर सीमा मे ही स्थित उपनगर है, इसे मीणा राजा आलन सिंह ने बसाया था, कम से कम 967 ईस्वी से यह नगर मौजूद रहा है, इसे 1037 ईस्वी मे राजपूत जाति के कच्छावा कुल ने जीत लिया था। आमेर नगरी और वहाँ के मंदिर तथा किले राजपूती कला का अद्वितीय उदाहरण है। यहाँ का प्रसिद्ध दुर्ग आज भी ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माताओं को शूटिंग के लिए आमंत्रित करता है। मुख्य द्वार गणेश पोल कहलाता है, जिसकी नक्काशी अत्यन्त आकर्षक है। यहाँ की दीवारों पर कलात्मक चित्र बनाए गए थे और कहते हैं कि उन महान कारीगरों की कला से मुगल बादशाह जहांगीर इतना नाराज़ हो गया कि उसने इन चित्रों पर प्लास्टर करवा दिया। ये चित्र धीरे-धीरे प्लास्टर उखड़ने से अब दिखाई देने लगे हैं। आमेर में ही है चालीस खम्बों वाला वह शीश महल, जहाँ माचिस की तीली जलाने पर सारे महल में दीपावलियाँ आलोकित हो उठती है। हाथी की सवारी यहाँ के विशेष आकर्षण है, जो देशी सैलानियों से अधिक विदेशी पर्यटकों के लिए कौतूहल और आनंद का विषय है।





नाम का स्रोत

प्राचीन काल में आमेर को अम्बावती, अमरपुरा तथा अमरगढ़ के नाम से जाना जाता था। कुछ लोगों को कहना है कि अम्बकेश्वर भगवान शिव के नाम पर यह नगर "आमेर" बना, परन्तु अधिकांश लोग और तार्किक अर्थ अयोध्या के राजा भक्त अम्बरीश के नाम से जोड़ते हैं। कहते हैं भक्त अम्बरीश ने दीन-दुखियों के लिए राज्य के भरे हुए कोठार और गोदाम खोल रखे थे। सब तरफ़ सुख और शांति थी परन्तु राज्य के कोठार दीन-दुखियों के लिए खाली होते रहे। भक्त अम्बरीश से जब उनके पिता ने पूछताछ की तो अम्बरीश ने सिर झुकाकर उत्तर दिया कि ये गोदाम भगवान के भक्तों के गोदाम है और उनके लिए सदैव खुले रहने चाहिए। भक्त अम्बरीश को राज्य के हितों के विरुद्ध कार्य करने के लिए आरोपी ठहराया गया और जब गोदामों में आई माल की कमी का ब्यौरा अंकित किया जाने लगा तो लोग और कर्मचारी यह देखकर दंग रह गए कि कल तक जो गोदाम और कोठार खाली पड़े थे, वहाँ अचानक रात भर में माल कैसे भर गया।

भक्त अम्बरीश ने इसे ईश्वर की कृपा कहा। चमत्कार था यह भक्त अम्बरीश का और उनकी भक्ति का। राजा नतमस्तक हो गया। उसी वक्त अम्बरीश ने अपनी भक्ति और आराधना के लिए अरावली पहाड़ी पर इस स्थान को चुना, उनके नाम से कालांतर में अपभ्रंश होता हुआ अम्बरीश से "आमेर" या "आम्बेर" बन गया।







देवी मंदिर



आम्बेर देवी के मंदिर के कारण देश भर में विख्यात है। शीला-माता का प्रसिद्ध यह देव-स्थल भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने, देवी चमत्कारों के कारण श्रद्धा का केन्द्र है। शीला-माता की मूर्ति अत्यंत मनोहारी है और शाम को यहाँ धूपबत्तियों की सुगंध में जब आरती होती है तो भक्तजन किसी अलौकिक शक्ति से भक्त-गण प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। देवी की आरती और आह्वान से जैसे मंदिर का वातावरण एकदम शक्ति से भर जाता है। रोमांच हो आता है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं और एक अजीब सी सिहरन सारे शरीर में दौड़ जाती है। पूरा माहौल चमत्कारी हो जाता है। निकट में ही वहाँ जगत शिरोमणि का वैष्णव मंदिर है, जिसका तोरण सफ़ेद संगमरमर का बना है और उसके दोनों ओर हाथी की विशाल प्रतिमाएँ हैं।
 शीश महल


इसकी भीतरी दीवारों, गुम्बदों और छतों पर शीशे के टुकड़े इस प्रकार जड़े गए हैं कि केवल कुछ मोमबत्तियाँ जलाते ही शीशों का प्रतिबिम्ब पूरे कमरे को प्रकाश से जगमग कर देता है।
आम्बेर का किला अपने शीश महल के कारण भी प्रसिद्ध है। इसकी भीतरी दीवारों, गुम्बदों और छतों पर शीशे के टुकड़े इस प्रकार जड़े गए हैं कि केवल कुछ मोमबत्तियाँ जलाते ही शीशों का प्रतिबिम्ब पूरे कमरे को प्रकाश से जगमग कर देता है। सुख महल व किले के बाहर झील बाग का स्थापत्य अपूर्व है।
भक्ति और इतिहास के पावन संगम के रूप में स्थित आमेर नगरी अपने विशाल प्रासादों व उन पर की गई स्थापत्य कला की आकर्षक पच्चीकारी के कारण पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। पत्थर के मेहराबों की काट-छाँट देखते ही बनती है। यहाँ का विशेष आकर्षण है डोली महल, जिसका आकार उस डोली (पालकी) की तरह है, जिनमें प्राचीन काल में राजपूती महिलाएँ आया-जाया करती थीं। इन्हीं महलों में प्रवेश द्वार के अन्दर डोली महल से पूर्व एक भूल-भूलैया है, जहाँ राजे-महाराजे अपनी रानियों और पट्टरानियों के साथ आँख-मिचौनी का खेल खेला करते थे। कहते हैं महाराजा मान सिंह की कई रानियाँ थीं और जब राजा मान सिंह युद्ध से वापस लौटकर आते थे तो यह स्थिति होती थी कि वह किस रानी को सबसे पहले मिलने जाएँ। इसलिए जब भी कोई ऐसा मौका आता था तो राजा मान सिंह इस भूल-भूलैया में इधर-उधर घूमते थे और जो रानी सबसे पहले ढूँढ़ लेती थी उसे ही प्रथम मिलन का सुख प्राप्त होता था।
यह कहावत भी प्रसिद्ध है कि अकबर और मानसिंह के बीच एक गुप्त समझौता यह था कि किसी भी युद्ध से विजयी होने पर वहाँ से प्राप्त सम्पत्ति में से भूमि और हीरे-जवाहरात बादशाह अकबर के हिस्से में आएगी तथा शेष अन्य खजाना और मुद्राएँ राजा मान सिंह की सम्मति होगी। इस प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त करके ही राजा मान सिंह ने समृद्धशाली जयपुर राज्य का संचलन किया था। आमेर के महलों के पीछे दिखाई देता है नाहरगढ़ का ऐतिहासिक किला, जहाँ अरबों रुपए की सम्पत्ति ज़मीन में गड़ी होने की संभावना और आशंका व्यक्त की जाती है।




आमेर किले की कुछ रोचक बाते

1. आमेर का नामकरण अम्बा माता से हुआ था, जिन्हें मीनाओ की देवी भी कहा जाता था.
2.
आमेर किले की आतंरिक सुंदरता में महल में बना शीश महल सबसे बड़ा आकर्षण है.
राजपूतो के सभी किलो और महलो में आमेर का किला सबसे रोमांचक है.
3.
आमेर किले की परछाई मौटा झरने में पड़ती है, जो एक चमत्कारिक परियो के महल की तरह ही दीखता है.
4.
किले का सबसे बड़ा आकर्षण किले के निचे है जहा हाथी आपको आमेर किले में ले जाते है. हाथी की सैर करना निश्चित ही सभी को आकर्षित करता है.
5.
अम्बेर में स्थापित, जयपुर से 11 किलोमीटर की दुरी पर स्थित आमेर किला कछवाह राजपूतो की राजधानी हुआ करती थी, लेकिन जयपुर के बनने के बाद जयपुर उसकी राजधानी बन गयी थी.
6.
महल का एक और आकर्षण चमत्कारिक फूल भी है, जो एक मार्बल का बना हुआ है और जिसे साथ अद्भुत आकारो में बनाया गया है. मार्बल द्वारा बनी यह आकृति सभी का दिल मोह लेती है.
7.
महल का एक और आकर्षण प्रवेश द्वार गणेश गेट है, जिसे प्राचीन समय की कलाकृतियों और आकृतियों से सजाया गया है.
8.
जयगढ़ किले और आमेर किले के बीच एक 2 किलोमीटर का गुप्त मार्ग भी बना हुआ है. पर्यटक इस रास्ते से होकर एक किले से दूसरे किले में जा सकते है.



साभार- विकिपीडिया व् अन्य स्रोत 

शनिवार, 6 सितंबर 2014

इलाहाबाद का किला



इलाहाबाद में संगम के निकट स्थित इस किले को मुगल सम्राट अकबर ने 1583 ई. में बनवाया था।  
वर्तमान में इस किले का कुछ ही भाग पर्यटकों के लिए खुला रहता है। बाकी हिस्से का प्रयोग भारतीय सेना करती है। इस किले में तीन बड़ी गैलरी हैं जहां पर ऊंची मीनारें हैं। सैलानियों को अशोक स्तंभ, सरस्वती कूप और जोधाबाई महल देखने की इजाजत है। इसके अलावा यहां अक्षय वट के नाम से मशहूर बरगद का एक पुराना पेड़ और पातालपुर मंदिर भी है।
निर्माण की कहानी:
इलाहाबाद किले की स्थापना मुगल बादशाह अकबर ने की थी। हालांकि इस पर इतिहासकारों में मतभेद है। समकालीन लेखक अब्दुल कादिर बदायूंनी ने 'मुंतखवुल-तवारीख' में लिखा है कि किले की नींव सन् 1583 में डाली गई थी। नदी की कटान से यहां की भौगोलिक स्थिति स्थिर न होने से इसका नक्शा अनियमित ढंग से तैयार किया गया था। वे लिखते हैं कि अनियमित नक्शे पर किले का निर्माण कराना ही इसकी विशेषता है। किले का कुल क्षेत्रफल तीन हजार वर्ग फुट है। इसके निर्माण में कुल लागत छह करोड़, 17 लाख, 20 हजार 214 रुपये आयी थी। निर्माण का उद्देश्य  अकबर ने इस किले का निर्माण मुगलकाल में पूर्वी भारत [वर्तमान में पूर्वी उत्तरप्रदेश और बिहार] से अफगान विद्रोह को खत्म करने के लिए किया था। 

अधिपत्य:
सन् 1773 में अंग्रेज इस किले में आए और सन् 1765 में बंगाल के नवाब शुजाउद्दौला के हाथ 50 लाख रुपये में बेच दिया। सन 1798 में नवाब शाजत अली और अंग्रेजों में एक संधि के बाद किला फिर अंग्रेजों के कब्जे में आ गया। आजादी के बाद भारत सरकार का किले पर अधिकार हुआ। किले में पारसी भाषा में एक शिलालेख भी है, जिसमें किले की नींव पड़ने का वर्ष 1583 दिया है। किले का स्वरूप  किले में एक जनानी महल है, जिसे जहांगीर महल भी कहते हैं। मुगल शासकों ने किले में बड़े फेरबदल कराये और फिर अंग्रेजों ने भी इसे अपने माकूल बनाने के लिए काफी तोड़-फोड़ की। इससे किले को काफी क्षति पहुंची।
वर्तमान स्थिति:
कई शासकों और अंग्रेजों को सुरक्षित रखने तथा आज भी देश की सेना को शरण देने वाले इस किले की अवस्था अब जर्जर हो गई है। इसकी दीवारों पर बरगद, नीम, पीपल आदि ने जड़ें जमा ली हैं। घास-फूंस और झाड़ियां भी फैल गई हैं। दीवारों पर निकले पेड़ पौराणिक अक्षयवट की जड़ों की उपज हैं। इनमें कुछ पेड़ ऐसे भी हैं, जो पक्षियों के कारण दरारों में जम गए हैं। जल्द इन पेड़ों को नहीं काटा गया तो ये किले की दीवारों के लिए खतरा बन जाएंगे। चूंकि किला इस समय सेना के कब्जे में है, इसलिए उसकी इजाजत के बगैर पुरातत्व विभाग सौंदर्यीकरण या मरम्मत भी नहीं करा सकता है। संरक्षण कार्य  सब एरिया कमांडर ब्रिगेडियर आरके भूटानी का कहना है कि दीवारों पर उगे पेड़ काटे जा रहे हैं। इससे साथ ही केमिकल ट्रीटमेंट से उन पेड़ों का समूल भी नाश किया जा रहा है। यह कार्य पिछले छह महीनों से चल रहा है। दीवारों की भी मरम्मत कराई जा रही है और उन्हें भी रासायनिक उपचार दिया जा रहा है। संरक्षण कार्य किले के उन क्षेत्रों में कराया जा रहा है, जहां आम शहरियों का जाना मना है।
 
कुछ अन्य जानकारियां:

गंगा-यमुना एवं अदृश्य सरस्वती के संगम तट पर स्थित अकबर का किला न सिर्फ स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है, बल्कि अपने गर्भ में जहांगीर (अक्षयवट) अशोक स्तंभ व अंग्रेजों की गतिविधियों की कई अनसुलझी कहानियों को भी समेटे हुए है।   

मुगल बादशाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर ने अपने जीवनकाल में कई किले बनवाए, जिनमें आगरा, लाहौर, फतेहपुर-सीकरी आदि किलों के नाम बड़ी ही शान के साथ लिए जाते हैं, लेकिन अकबर द्वारा इलाहाबाद में बनवाया गया किला इन सभी में विशाल है।  इस किले से ही मुगल सल्तनत द्वारा देश के पूर्वी भाग का संचालन किया जाता था। ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण होते हुए भी यह किला जिस तरह से आवरण के रहस्य में छिपा है, उससे उसकी आभा पर ग्रहण-सा लग गया है।  
 
 इतिहासकार हमिल्टन ने 1815 में लिखा था कि इस तरह का भव्य किला और भवन यूरोप में भी बहुत कम हैं। इसकी नक्काशी और चित्रकारी इतनी दर्शनीय है कि इसकी तुलना पूरे भारत में किसी भवन से नहीं की जा सकती है। इसी किले के भीतर टकसाल थी, जिसमें चांदी और तांबे के सिक्के ढाले जाते थे। किले के अंदर पानी के जहाज और नाव भी बनाए जाते थे।  अपने शासनकाल में अंग्रेजों ने इस किले में सैनिक छावनी बनाई थी और आजादी के बाद भारतीय सरकार ने इसे अपना आयुद्ध भंडार बनाए रखा। आम लोगों के लिए इसके फाटक बंद ही रहते हैं, जबकि इसी किले के चारों तरफ विश्व के सबसे बड़े धार्मिक मेले कुंभ का आयोजन किया जाता है, साथ ही प्रतिवर्ष माघ मेले के अवसर पर लाखों लोग यहां इकट्ठा होते हैं।        
समकालीन इतिहासकार अबुल फजल के अनुसार इस किले की नींव वर्ष 1583 में रखी गई थी। बीस हजार मजदूरों ने दिन-रात की मेहनत से 45 वर्ष में इसका निर्माण कार्य पूरा किया था। इतिहासकार बदायूनी के अनुसार 1583 में अकबर ने तीन सौ नावों के बेड़े के साथ यहां आकर निर्माण कार्य का निरीक्षण किया था।  अकबर ने इसके पास ही चार किलोमीटर लम्बा एक बांध भी बनवाया था, ताकि गंगा की बाढ़ से इलाहाबाद शहर को बचाया जा सके। 

इतिहासकार सालिग्राम श्रीवास्तव के अनुसार किले के निर्माण में उस वक्त 6 करोड 17 लाख 20 हजार रुपए खर्च हुए थे। करीब 983 बीघे में फैले इस किले की लम्बाई 2,280 गज तथा चौडाई 1,560 गज है।    

इलाहाबाद भी आजादी की लड़ाई का साक्षी हैइस तिमंजिले किले में 23 भवन, तीन ख्वाबगाहें, 25 द्वार, 23 बुर्ज, 277 आवास, 176 कोठरियां, दो खासोआम, 77 तहखाने, एक दालान, 20 तबेले, एक बावड़ी, पांच कुएं और एक नहर है जो किले को यमुना नदी से जोड़ती है। इसके हॉल में 64 खंभे हैं जो बरामदों से घिरे हुए हैं। किले में 16 बेगम अपनी दासियों के साथ 48 कमरों में रहती थीं।  अकबर अपनी बेगमों के साथ किले के झरोखों से हाथी की लड़ाई देखता था। अकबर के साथ आए लोगों ने भी भवन बनवाए और इस शहर को बसाया। 1789 में जब अंग्रेजों ने इस किले पर कब्जा किया तो कर्नल कीड इसके पहले कमांडेंट बने और उन्होंने इसका अधिकांश भाग ध्वस्त करा दिया। किले में सिर्फ रानीमहल ही वह भाग है जिसका पुनरुद्धार लॉर्ड कर्जन ने कराकर इसे मूल स्वरूप वापस दिया।  किले को चार भागों में बांटा गया है। पहला भाग खूबसूरत आवास है, जो फैले हुए उद्यानों के मध्य में है। यह भाग बादशाह का आवासी हिस्सा माना जाता है। दूसरे और तीसरे भाग में अकबर का शाही हरम था और यहां नौकर-चाकर रहते थे। चौथे भाग में सैनिकों के लिए आवास बनाए गए थे।  
 पाषाण युग में भी नालंदा था महानगर   इतिहासकारों के अनुसार इस किले का निर्माण राजा टोडरमल, सईद खान, मुखलिस खा,. राय भरत दीन एवं प्रयागदास मुंशी की देखरेख में हुआ था। किले में ही जब सलीम ने यहां के सूबेदार के रूप में रहना शुरू किया था तो अपने लिए काले पत्थरों के एक सिंहासन का निर्माण कराया था, जिसे वर्ष 1611 में आगरा भेज दिया गया।  जहांगीर ने किले में मौर्य कालीन एक अशोक स्तंभ पड़ा पाया तो उसे फिर से स्थापित किया। पैंतीस फुट लम्बे इस स्तंभ पर उसने अपनी सम्पूर्ण वंशावली खुदवा दी थी। यह अशोक स्तंभ 273 ई. पू. का है।  बाद में जिस पर चक्रवर्ती समुद्रगुप्त ने अपनी कीर्ति अंकित कराई थी।  यह उन दुर्लभ स्तंभों में एक है जिस पर अशोक महान की राजाज्ञों के साथ समुद्रगुप्त और जहांगीर की प्रशस्तियां भी खुदी हैं। सन् 1600 से 1603 तक जहांगीर भी इसी किले में रहा। इस किले में सरस्वती कूप है जिसके बारे में कहा जाता है कि यहीं से सरस्वती नदी जाकर गंगा-यमुना में मिलती थीं। सरस्वती कूप में ही हजारों साल पुराना अक्षयवट है। सुरक्षा कारणों से कुंभ, अर्द्धकुंभ एवं माघ मेले के दौरान ही इसका दर्शन किया जा सकता है।  अब किले की बाह्य दीवारों पर पेड़ उग आए हैं और दरारें पड़ गई हैं। इससे साफ लगता है कि अकबर महान द्वारा निर्मित कई किलों में सबसे विशाल यह किला गुमनामी के अंधेरे में ही दम तोड़ देगा और इसकी यादें ही रह जाएंगी।

साभार: इंटरनेट व अन्य स्रोत