रविवार, 5 जून 2016

घाटी का दर्द


एक घाटी
जो जार-जार रोती
दिन भर वाहनों के शोरोगुल से
रही आक्रांत
हैरान और परेशान  
जो रात में चाहे विश्राम
मगर सो न पाती
इंसानों की दिन-रात चलने की हवस
उसे सोने न देती
डर है कि कहीं घाटी
जो दिन-रात सो न पाती
नाराज गर हुई तो
आफत ही फिर आ जाती 
स्वार्थी मानव आबादी
फिर चीखती चिल्लाती
घाटी मगर चाहकर भी
इनपर रहम न कर पाती
                 (कृष्ण धर शर्मा, २०१६)

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