गुरुवार, 29 सितंबर 2016

तुम्हारा भाग्य


युग बदले शासक बदले
बदला नहीं तुम्हारा भाग्य
हाय हिरण तुम छले गए
हर युग में स्त्री की तरह
न्याय की देवी की आँखों में
बांध दी गई काली पट्टी
सुन तो सके पर देख न पाये
साजिश हुई युगों से ऐसी
न्याय हुआ न रामराज में
और न होगा कलयुग में भी
समय भले ही बदल गया हो
सोच मगर बदली है नहीं
अत्याचार सहते रहना
शायद नियति तुम्हारी है
रामराज हो भले मगर
धोबी की सोच तो भारी है...

                 (कृष्ण धर शर्मा, ७.२०१६)

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