नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

दंगे के असली दोषी

जब भी गुजरात दंगे के मुकदमे में किसी को सजा होती है, मुझे यह उम्मीद होने लगती है कि दंगे के असली दोषी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को एक न एक दिन निश्चित ही सजा मिलेगी। अभी 2002 के दंगे में अहमदाबाद के नरोदा-पाटिया में नरसंहार कराने वाली माया कोडनानी को सुप्रीम कोर्ट से 28 साल की सजा मिली है। इससे मेरा यह विश्वास मजबूत हुआ है कि न्याय मिलने में थोड़ी देर हो सकती है, लेकिन न्याय से किसी को वंचित नहीं किया जा सकता। मोदी ने दंगे में कोडनानी की भूमिका को इस हद तक सराहा था कि उसे मंत्री बना दिया था। पुलिस ने इस बात की पूरी कोशिश की थी कि कोडनानी के शामिल होने की बात रिकार्ड पर नहीं आए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के विशेष जांच दल ने उसके अपराध को सामने लाकर दिखा दिया।
यह सवाल मुझे बराबर परेशान करता रहता है कि एक मुख्यमंत्री को किस तरह सजा दिलाई जा सकती है, जिसने अपने ही लोगों की हत्या की साजिश रची और उसे अमल में लाया, क्योंकि वे लोग दूसरे धर्म के थे। करीब दो हजार मुस्लिम मार डाले गए थे। इनमें से 95 तो अकेले नरोदा-पाटिया में मारे गए थे। मेरे मन में कुछ इसी तरह का सवाल 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उभरा था, जब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में तीन हजार से यादा सिख मार डाले गए थे। निर्दोष सिखों की हत्या की साजिश करने वालों को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने पुरस्कृत किया था। उनका एक बदनाम कथन आज भी मुझे परेशान करता है: बड़ा पेड़ गिरने पर पृथ्वी तो डोलेगी ही।
गुजरात और दिल्ली, दोनों ही जगह हत्या और लूट का तरीका समान था। लोगों को भड़काया गया, पुलिस को इसे अनदेखा करने का निर्देश दिया गया और जान-बूझ कर सेना की तैनाती देर से की गई। अगर लोकपाल नाम की संस्था रहती तो वह अपराधियों की सूची में मोदी और राजीव गांधी का नाम निश्चित तौर पर शामिल करती। कुछ इस तरह का समाधान नहीं रहने की स्थिति में लोग, और विशेषकर पीड़ित, न्याय पाने के लिए आखिर क्या करें? जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो फिर बचने का कोई रास्ता नहीं रह जाता।
वास्तव में गुजरात और दिल्ली ने कानून और व्यवस्था की मशीनरी की स्वतंत्रता पर आम सवाल खड़ा किया है। पुलिस शासकों के इशारे पर नाचने को तैयार है और वह स्वतंत्र तरीके से काम नहीं कर रही। धर्मवीर कमेटी ने 1980 में पुलिस महकमे में सुधार की सिफारिशें की थी। अगर इसे लागू किया गया होता, तो स्थिति थोड़ी बेहतर हो सकती थी। इसमें पुलिस अधिकारियों की तबादले का अधिकार एक कमेटी को देने को कहा गया था। इस कमेटी में विपक्ष के नेता को भी रखने की बात थी। लेकिन कोई भी राय सरकार इन सिफारिशों को लागू करने को तैयार नहीं है। वास्तव में, राय की सीमाओं से बाहर होने वाले अपराधों, या अलगाववाद, भेदभाव की श्रेणी में आने वाले मामलों तथा ऐसे दूसरे अपराधों को देखने के लिए अमेरिका की तर्ज पर फेडरल पुलिस बनाने की जरूरत है। अमेरिका का मिसिसिप्पी मामला बहुचर्चित है। इस मामले में अमेरिकी फेडरल पुलिस ने स्थानीय प्रशासन और राजनीतिज्ञों की सांठगांठ का खुलासा कर दोषियों को सजा दिलाई थी।
चूंकि राय सरकारें कानून और व्यवस्था की मशीनरी पर अपने अधिकार की रक्षा काफी मजबूती से करती हैं, इसलिए जब नई दिल्ली का खुद ही राजनीतिकरण हो चुका हो में वैसे में किसी फेडरल पुलिस पर उनके राजी की बात सोचना कठिन है। अल्पसंख्यकों की स्थिति देखें, तो गुजरात में मुसलमानों और दिल्ली में सिखों की स्थिति से यह बात साफ हो जाती है कि शासक अपनी पार्टी के सदस्यों को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इनके नाम अलग-अलग है, लेकिन बीते वर्षों  में ये समान रूप से अपने राजनीतिक हुक्मरानों के हाथों अत्याचार के हथियार बन चुके हैं।  वास्तविक भयावह पहलू यह है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और संघ परिवार अधिक से अधिक हिंदुओं के दिमाग में विष घोल रहा है। यह सोचने वाली बात है कि संघ के उग्रवादी घटक बजरंग दल के एक सदस्य को नरोदा-पाटिया मामले में आजीवन कारावास की सजा मिली है। फिर भी यादा दुखद यह है कि बहुसंख्यक समुदाय धर्मनिरपेक्षता से पीछे हटता दिख रहा है। अगर सचमुच में ऐसा हो गया तो फिर भारत बर्बाद हो जाएगा।
2014 के चुनाव में जीत की उम्मीद करने वाली भाजपा देश को संकीर्णता से बचाने की अपनी जवाबदेही को नहीं समझ रही है। यह भी सही है कि दूसरी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस भी भाजपा की कार्बन कॉपी बन चुकी है। लेकिन कांग्रेस आज भी धर्मनिरपेक्ष स्वरूप का समर्थन करती है। पार्टी का रवैया अधिकांशत: अवसरवादी होता है, लेकिन यह महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू से प्रेरणा ग्रहण करती है, न कि गोलवरकर से। शायद यही कारण है कि कांग्रेस समय पड़ने पर धर्मनिरपेक्ष रुख अख्तियार करती है और सांप्रदायिकता फैलाने वालों का विरोध करती है।
हालांकि मुझे इस बात को लेकर निराशा होती है कि कांग्रेस सरकार न तो शिवसेना, या राष्ट्रीयतावाद के नाम पर मुंबई में भीड़ को भड़काने वाले राज ठाकरे और न ही आजाद मैदान की हिंसा में शामिल और दो लोगों को मार डालने वाले मुस्लिम कठमुल्लों के खिलाफ कोई कार्रवाई करती है। मुझे बताया गया है कि कांग्रेस के एक स्थानीय मुस्लिम नेता ने आजाद मैदान में भीड़ को भड़काया था। दु:ख की बात है कि कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही इस सोच से प्रभावित हैं कि जाति और समुदाय की बात करने पर उन्हें अधिक वोट मिलेंगे।
अगर सुप्रीम कोर्ट ने फर्जी मुठभेड़ के विभिन्न मामलों में से नौ मामलों को अलग नहीं किया होता, तो फिर किसी माया कोडनानी को सजा नहीं मिल पाती। लेकिन सिखों की हत्या के मामले में दखल देने के लिए कोई सुप्रीम कोर्ट नहीं था, क्योंकि राजीव गांधी प्रशासन ने सारे धब्बों को धो डाला था। कोई सबूत नहीं छोड़ा गया था और झूठे रिकार्ड तैयार कर लिए गए थे। नरसंहार की पूरी योजना सत्तारूढ़ कांग्रेस ने तैयार की थी और इसे पूर्व नियोजित तरीके से अमल में लाया गया था।  युवा वकील एच.एस. फुलका को शुयिा अदा करनी चाहिए, जिन्होंने पीड़ितों के शपथपत्र के आधर पर मजबूत मामला बनाया। इसके बावजूद फूलका और न्याय पाने की कोशिश करने वाले दूसरे लोगों का अनुभव है कि सुनवाई को आगे ले जाने से रोकने के लिए कांग्रेस सरकार कदम-कदम पर रोड़े अटकाती रही है। गुजरात में मिली सजा एक अपवाद है। वहां फिर भी कुछ सबूत बच गए थे, जिसके आधार पर विशेष जांच दल ने मामले को फिर से खड़ा किया। लेकिन दिल्ली में कांग्रेस सरकार ने उन सारे सबूतों को धो डाला है, जिनसे 1984 नरसंहार के दोषियों को पकड़ा जा सकता था।
सरकार द्वारा मामले को दबाने का एक और उदाहरण है। 1987 में उत्तर प्रदेश के हसीमपुरा में 22 मुस्लिम लड़कों को मार डाला गया था। यह मामला निचली अदालत से आगे नहीं बढ़ सका। असम का दंगा भी मुस्लिम विरोधी है। इन सबों से यही बात साफ होती है कि कानून का राज का अपने-आप में कोई मतलब नहीं होता अगर सरकार बिना किसी डर या पक्षपात के कानून का पालन नहीं करती।

कुलदीप नैय्यर (साभार-देशबन्धु )

रमणी का रहस्य

 

लड़कपन में वणिक्-पुत्र सुना करता कि सात समुद्र, नव द्वीप के पार एक स्फटिकमय भूमि है। वहाँ एक तपस्वी क्या जाने कब से अविराम तप कर रहा है और उसकी पवित्रता के कारण सूर्यनारायण निरंतर उसकी परिक्रमा किया करते हैं और उसके तेज़ से वहाँ कभी अंधकार नहीं होता।

उस यती के एक कन्या है—वही इस संसार में उसकी एकमात्र कुटुंबी है। वह कन्या प्रभात बेला के जैसी टटकी और कमनीय है तथा स्वाती की बूँद की तरह निर्मल, शीतल और दुर्लभ है।

 

उन दिनों वह सोचता कि मैं ऐसी अच्छी सखी पाऊँ, तो दिन-का-दिन उसके संग खेलता-कूदता रहूँ, ऊधम मचाता रहूँ। अपने प्रत्येक खेल-कूद में वह उसका स्थान नियत कर लेता और कल्पना से उसकी पूर्ति कर लेता।

किंतु, धीरे-धीरे कल्पनापूर्ण लड़कपन यथार्थता खोजने वाली युवावस्था में परिवर्तित हो गया और वणिक्-पुत्र के लिए जो बातें सच थी, अब लड़कपन का खिलवाड़ हो गईं। और उसे उस कुमारी को वस्तुतः प्राप्त करके अपनी जीवन-सहचरी बनाकर युवावस्था का अधूरापन दूर करने की चिंता दिन-रात सताने लगी।

 

धीरे-धीरे अनेक नगरों से उसके ब्याह की बातचीत आने लगी; किंतु ब्याह का नाम सुनते ही उसका मुँह लटक जाता। उसकी यह दशा देख उसके पिता ने एक दिन पूछा—हे वत्स! क्या कारण है कि विवाह का नाम सुनकर तुम अवसन्न हो जाते हो?

तब उस वणिक् पुत्र ने अपना तात्पर्य छिपाकर नम्रतापूर्वक पिता से कहा—तात! वैश्यकुल में मेरा जन्म हुआ है; अतः वाणिज्य मेरा धर्म है। सो मेरी इच्छा है कि अपने बाहुबल में कुछ अर्जन कर लूँ, तब गृहस्थाश्रम में प्रवेश करूँ; क्योंकि स्वार्जित वित्त के व्यय और उपभोग से मेरा आनंद, उत्साह और हृदय द्विगुण हो उठेगा।

 

‘पुत्र! तुमने बहुत उचित सोचा है और यद्यपि मेरा हृदय तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता और तुम्हारे वियोग से तुम्हारी माता की वृद्धावस्था भार-रूप हो जाएगी, तो भी तुमने स्वधर्म की बात विचारी है, अतः मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा। कल ही मैं तुम्हारे लिए सात पोत लदवाए देता हूँ, तुम उन्हें लेकर अपने परिकर समेत देश-देशांतर भ्रमण कर के यथेष्ट व्यापार और उपार्जन करो।’

आज्ञा पाकर उसके आनंद का पारावार न रहा और रात-दिन परिश्रम कर के सात दिन में वह अपनी यात्रा के लिए पूर्णतः तैयार हो गया।

 

आठवें दिन प्रातःकाल वह अपने माता-पिता से विदा हुआ। उस समय उनकी आँखों में आँसू भर जाने से उनकी दृष्टि धुंधली पड़ रही थी, अतः वे अपनी संतान को ठीक-ठीक देख भी न सके। यद्यपि वणिक्-पुत्र को उनका वियोग सहज न था, तो भी नए देशों के देखने का उत्साह और अपनी कल्पना की प्रेयसी के मिलने की प्रत्याशा से उसका हृदय आनंद से फड़क रहा था।

शीघ्र ही वह अपने जहाज़ पर बैठा और उसका, सातों जहाज़ों का बेड़ा, अनुकूल पवन पाता हुआ द्वीप-पर-द्वीप तय करता गया।

 

प्रत्येक द्वीप में व्यापार करते-करते उसने स्वर्ण की बड़ी भारी राशि बटोर ली थी और यों तीन वर्ष बीतने पर जब वह स्कंध नाम देश में पहुँचा, जहाँ के लोग भालू और सामुद्रिक सिंह की खाल पहनते हैं, तो उसने बड़ा उत्सव मनाया, क्योंकि उसे अनेक देश देखने का तथा अर्थ के लाभ का आनंद तो दिखाने-मात्र को था; उसको प्रसन्नता तो इस बात की थी कि वह अपने लक्ष्य-स्थान के पास पहुँच गया था, क्योंकि यहाँ से वह स्फटिक द्वीप केवल एक मास की दूरी पर था।

तब वणिक्-पुत्र ने अपने छ: जलयानों को और समस्त साथियों को वहीं छोड़ा और अकेला एक पोत पर अपने अभीष्ट स्थान की ओर चल पड़ा। उसके साथी न तो उसे रोकने में ही कृतकार्य हुए, न उसका यह उद्देश्य जानने में ही।

 

दो दिन में उसका जहाज़ उस समुद्र में पहुँच गया, जो ठीक शरद् के आकाश की नाईं है, क्योंकि वह वैसा ही प्रशस्त है, वैसा ही निर्मल है और वैसा ही नील है, साथ ही जैसे इसमें शुभ्र घन घूमा करते हैं, वैसे ही उसमें बड़े-बड़े बर्फ़ के पहाड़ तैर रहे थे। उन्हें देखकर माँझियों के छक्के छूट गए, किंतु वणिक्-पुत्र में ऐसी दृढ़ता आ गई थी कि उसने उन लोगों को पूरा धीरज बँधा दिया और स्वयं जहाज़ का मार्ग निर्दिष्ट करने लगा। सचमुच ही उसके निश्चय को उन विशालकाय हिम-पर्वतों ने मार्ग देना आरंभ किया और अपनी यात्रा के महीनवें दिन वह जहाज़ स्फटिक द्वीप के किनारे जा लगा।

अब वणिक्-पुत्र ने उन माँझियों से भी पिंड छुड़ाया और अकेला उस द्वीप पर एक ओर चल पड़ा! वास्तव में वह द्वीप भी बर्फ़ का ही था, और वह कुछ दूर भी नहीं गया होगा कि मारे शीत के उसके पैर निष्प्राण-से हो उठे, किंतु उसका साहस उसे घसीट ले चला और उसे एक झुंड ऐसे पक्षियों का आता दिखलाई पड़ा, जो क़रीब-क़रीब मनुष्य ही के जितने ऊँचे थे और झूमते हुए मोटे मनुष्य की तरह चल भी रहे थे! उनके संपूर्ण शरीर रोएँदार पर से ढँके हुए थे और अपनी भाषा में कुछ कहते हुए वे उसी की ओर बढ़े आ रहे थे।

 

वणिक्-पुत्र उनका कोलाहल तो न समझ सका, किंतु इतना जान गया कि वे उसकी सहायता के लिए आ रहे हैं, अतएव वह वहीं ठहर गया। कुछ क्षणों में वे उसके निकट आ गए और उसे चारों ओर से इस तरह घेर लिया कि उनकी गर्मी से शीघ्र ही वह स्वस्थ हो गया। फिर तो पक्षियों का वह झुंड, उसके साथ हो लिया और उसे बड़े सुख से मार्ग दिखाता हुआ उस तापस के आश्रम की ओर ले चला!

वह झुंड उसे गर्मी पहुँचाता था—जब बर्फ़ पड़ने लगती थी, तब अपने डैनों की आड़ में ले लेता था और रात्रि में अपने डैनों का ओढ़ना-बिछौना बनाकर उसे सुख की नींद सुलाता था, इतना ही नहीं, अपने में साहुत करके प्रति सातवें दिन उनमें से एक अपना प्राण दे देता था, जिससे एक सप्ताह तक वणिक्-पुत्र का उदर-पोषण होता था।

 

इस प्रकार इक्कीसवें दिन उसे तापस का आश्रम दिखलाई दिया। ज्यों-ज्यों वह उसके निकट पहुँचने लगा, त्यों-त्यों उसकी विचित्र दशा होती गई—उसके मन, प्राण और शरीर में एक ऐसा ज़बरदस्त तूफ़ान उठ खड़ा हुआ कि उसमें उसका आपा सर्वथा विलीन हुआ जा रहा था। यह अवस्था यहाँ तक बढ़ी कि उस आश्रम में पहुँचते ही ज्यों उस मुनि-कन्या पर उसकी दृष्टि पड़ी, वह पत्थर का हो उठा और मुनि-कन्या, जो ललककर उसके स्वागतार्थ बढ़ी थी, यह दशा देखकर एक चीख़ मार के बेहोश हो गई।

उसका आरव सुनकर तपस्वी अपने एकांत से उठ आया। उसने अपने तपोबल से वैश्य-कुमार को पुनरुज्जीवित किया, फिर परिचर्या द्वारा अपनी कन्या की मूर्च्छा भी दूर की। वैश्य-कुमार उस समय एक अद्भुत आनंद के समुद्र में डूब-उतरा रहा था; क्योंकि उसने मुनि-कन्या की अपने में जो कल्पना की थी, वह इसके सामने कोई चीज़ ही न थी। यह तो आशा के समान लावण्यवती थी और जब उसने पहले-पहल प्रश्न किया—तुम्हें क्या हो गया था?—तब उसे ऐसा जान पड़ा कि वीणा का स्वर—इस कंठ की छूँछी विडंबना मात्र है।

 

कुछ ही क्षणों में तापस अपने एकांत में चला गया और वे दोनों ऐसे घुल-मिल गए, मानो जन्म-जन्म के संगी हों, एवं विविध वार्तालाप करने लगे। इस प्रकार जब तीन प्रहर बीत गए, तब वह मुनि पुनः वहाँ आया और वणिक्-पुत्र से कहने लगा—

वत्स, मैंने जान लिया कि इस कुमारी का जन्म तुम्हारे लिए ही हुआ है, सो इसे ग्रहण करो, मैं इसे तुमको दूँगा। यद्यपि देवता तक इसकी आकांक्षा कर रहे हैं। किंतु मैंने उनसे स्पष्ट कह दिया है कि यह मर्त्यबाला है और मर्त्य से ही इसका संबंध शोभन होगा। परंतु, मेरी प्रतिज्ञा थी कि जो मर्त्य यहाँ तक पहुँच सकेगा, वही इसका अधिकारी होगा, सो आज तुम आ गए! अब शुभ-लग्न में मैं इसे तुमको दे दूँगा। चौबीस प्रहर तुम हमारा आतिथ्य स्वीकार करो, उसके बाद वह मुहूर्त्त आवेगा।

 

इतना कहकर वह तो चला गया और मुनि-कन्या, जो सिर नीचा किए हुए थी, उसी मुद्रा से उससे बोली—मेरी भी एक प्रतिज्ञा है, उसे तुम समझ लो, क्योंकि बिना उसके पूरा हुए तुम मुझे न पा सकोगे।

वणिक्-पुत्र कहने लगा—चारुहासिनी! वह कौन ऐसी बात है, जो मैं तुम्हारे लिए न कर सकूँगा! तुम उसके कहने में संकोच न करो, बस शीघ्र ही मुझे अपनी प्रतिज्ञा सुनाओ, क्योंकि मैं अधीर हो रहा हूँ।

 

तब वणिक्-पुत्र को अपनी चितवन की इन्दीवर माला पहनाते हुए उसने दृढ़ता से कहा—जो यहाँ बसने की प्रतिज्ञा करेगा, वही मुझे पा सकेगा, अन्यथा मैं विवाह न करूँगी; क्योंकि पिता को अकेला छोड़कर मैं नहीं जी सकती, कौन उनकी देख-रेख करेगा। पिता से अनुनय करके उन्हें उनके निश्चय से विरत करूँगी और आजन्म कुमारी रहने की अनुज्ञा प्राप्त करूँगी।

वैश्य-पुत्र ने समझा था कि कुमारी कोई बड़ी समस्या उपस्थित करेगी, किंतु उसकी बात सुनकर उसे अत्यंत आश्चर्य हुआ, क्योंकि उसे तो अपने देश की कोई सुध ही न रह गई थी—वह तो कुमारीमय हो रहा था।

 

अविलंब ही वह बोला—यह कौन बड़ी बात है—रम्य प्रेमा न जन्म-भूः। भला इससे बढ़कर कौन देश होगा, जहाँ सूर्य कभी अस्त ही नहीं होता और तुम्हारा पूर्ण चंद्रानन नित्य उदित रहता है।

यह सुनकर कुमारी ने अपनी मुस्कान का जादू उस पर फेर दिया।

 

बात करते चौबीस पहर बीत गए, क्योंकि यहाँ कभी सूर्यास्त न होने के कारण समय की गणना पहरों से ही होती थी और वह शुभ घड़ी आ पहुँची, जिसकी अभिलाषा वणिक्-पुत्र को जन्म से ही थी। योगी को मुक्ति से जो आनंद होता है, उसका उसे अनुभव-सा हो उठा और विवाह-कृत्य पूर्ण करके यती जब अपनी साधना में प्रवृत्त हुआ, तब दंपति हाथ-में-हाथ दिए हुए बर्फ़ के मैदान में टहलने के लिए निकल पड़े। उस समय वैश्य-पुत्र को ऐसा प्रतीत हुआ कि वह अपनी शची को लिए हुए नंदन कामन-बिहारी इंद्र है। प्रेमालाप करते हुए दोनों आगे बढ़े। वणिक्-पुत्र का मुँह दिव्य तेज़ से दमक रहा था, उसने कहा—सखि! मैं यहीं बर्फ़ काटकर तुम्हारे लिए एक ऐसी गुफ़ा बनाऊँगा कि तुम्हें उसमें शीत का लेश-मात्र कष्ट न होगा।

किंतु नवपरिणीता ने इसका कोई उत्तर न दिया। वह क्षितिज को एकटक देख रही थी। ऐसा जान पड़ता था कि उसकी दृष्टि उस पटल को बेधकर उसके पार के दृश्य देखने में निमग्न है।

 

कौतूहल से उसकी यह तन्मयता भंग करते हुए वैश्य-पुत्र ने पूछा—किस ध्यान में हो?

‘कुछ नहीं, सोच रही थी कि तुम्हारा देश कैसा होगा!’

 

क्यों?—पति ने उत्सुकता से पूछा।

इसीलिए कि वह तुम्हारा देश है। उसकी ममता ने उत्तर दिया।

 

सहसा आर्य-कुमार को जन्मभूमि की याद आ गई। माता-पिता की विकलता उसका हृदय सालने लगी। तो भी वह बड़ी कठिनता से अपने भावों को सफलतापूर्वक दबाए रहा; किंतु उसकी अर्धांगिनी उन भावों का स्वतः अनुभव कर रही थी। जी से बोली—उत्कट इच्छा होती है वहाँ चलने की; किंतु साथ ही उसने बेबसी से नहीं अपने पिता की प्रीति में पगकर कहा—ऐसा कहाँ संभव है!

पति पुलक उठा। उसने अपनी प्रेयसी को चूम लिया। यह चुंबन उस तापस-कन्या के जीवन में प्रणय का प्रथम चुंबन था। वह अपने को संभाल न सकी। उसका शरीर सनसना उठा, आँखें मुँद गईं; किंतु एक ही क्षण में उसकी अकृत्रिम, सरल, नर-नारी-भेद-विहीन उन्मुक्त प्रकृति जहाँ-की-तहाँ आ गई और उसने कहा—चलो, विवाह मंडप ज्यों-का-त्यों पड़ा है। उसका परिष्कार करना है।

 

दोनों लौट पड़े।

***

 

दो-तीन पहर बाद तापस अपनी साधना से विरत हुआ। नवदंपती कहीं एकांत में बैठे प्रेमालाप कर रहे थे। उसने उन्हें आवाज़ दी और वे उस ओर चले, किंतु पत्नी सकुच रही थी।

इस जोड़ी को देखकर उसके निराकुल हृदय में भी सांसारिकता की एक लहर आ गई, जिसके कारण उसकी प्रशांत दृष्टि हर्ष से चमकने लगी। प्रसन्नता का एक उच्छ्वास लेकर उसने जामाता से कहा—धनी! मेरी साधना में आज तक तेरी इस थाती की चिंता बाधक थी, आज उसे तुझको सौंपकर में पूर्णतः निर्मम हो गया। अब तुमको अपने देश जाना चाहिए।

 

मुनि-कन्या पति के पीछे आँखें नीची किए खड़ी थी। यह सुनकर उसका हृदय सिहर उठा। उसने कुछ कहना चाहा। पिता से आज तक उसे जो कहना हुआ था, उसने निधड़क कहा था, किंतु इस समय उसका हृदय धड़कने लगा, लाज ने उसका कंठ थाम लिया।

वैश्य-कुमार ने संभ्रम से पूछा—यहाँ आपकी सेवा...।

 

तपस्या और सेवा—ये दो विरुद्ध बातें हैं। तपस्वी को सेवा की क्या आवश्यकता! इसके यहाँ रहने पर मैं इससे परिचारित होता था, इसके ममत्व से सिंचित होता था, इसलिए नहीं कि मुझे उनकी आवश्यकता थी। नारी जगज्जननी हैं, उनका हृदय दया-मया, करुणा से निर्मित होता है। वहाँ से इनकी निरंतर वृष्टि हुआ करती है, जो इस धधकते हुए जगती-तल को शीतल और हरा-भरा बनाए रहती है। उसी वृष्टि को—इनके स्वभाव को—इसी दिन के लिए बनाए रखना मेरा कर्त्तव्य था। आज उसके उपयोग का समय आ गया है। अब अपने गृहक्षेत्र को उस वृष्टि से यह सींचे।—उस नवीन गृही को तत्त्वदर्शी ने समझाया।

तो क्या हम लोग आपको ऐसे ही छोड़ दें?—उसने शंका की।

 

तपस्वी ने उत्तर दिया—यही तो मेरी सबसे बड़ी सेवा होगी। तुम्हीं सोचो कि तुम लोगों के यहाँ रहने से मेरे मार्ग में विक्षेप के सिवा क्या होगा, गृही और गृहत्यागी का साथ नहीं हो सकता। मुझे तो एकांत दे दो।

वैश्य ने नतशिर होकर यह आदेश अंगीकार किया। और तपस्वी यह कहकर पुनः एकांत में चला गया कि—अब से डेढ़ पहर बाद तुम्हारे प्रस्थान का मुहूर्त्त है, उस समय आकर मैं तुम्हें विदा दे दूँगा।

 

तापस-कन्या रो रही थी। अतीत वर्तमान बनकर उसके सामने अभिनय करने लगा।

तुम उदास क्यों हो रही हो इतना?—वैश्य-पुत्र उसका पाणि-पीड़न करते हुए समझाने लगा।

 

कुछ नहीं, अतीत की स्मृति बड़ी दुखदार्इ होती है।—उसने अनमनेपन से उत्तर दिया।

हाँ, वह वर्तमान को भी विगत बना देती है।—कुछ गंभीर होकर उसके पति ने कहा।

 

सो तो जानती हूँ, किंतु क्या कीजिएगा! प्राण जो रोते हैं!—उसने मृदुलता से कहा, एक लंबी साँस लेकर।

हृदय छोटा न करो—वैश्य-पुत्र ने ढाढ़स दिया।

 

तुम पुरुषों में इतनी निर्ममता हो और तुम्हीं पर नारी ममता करे, यह भी एक विधि-विडंबना है!—उदासीनता से रुदिता ने कहा।

पति ने सफ़ाई दी—मुझसे तुम्हारे आँसू नहीं देखे जाते।

 

क्योंकि तुम पुरुष हो। तुम रूप रखना जानते हो और नारी से भी उसी की प्रत्याशा करते हो। तभी तो कहती हूँ कि तुम निर्मम होते हो। मैं जानती हूँ कि यहाँ अब मेरा कुछ नहीं। अब तो वही मेरा देश है, वहीं मेरा संसार है; वहीं के लिए उपजी हूँ, फिर भी हृदय नहीं मानता, वह तड़पता है, मैं रोती हूँ। यदि मैं पुरुष होती और रूप रखे होती, तो तुम्हें शांति मिलती।

वणिक् अवाक हो गया। उसे यह रहस्य अवगत हो उठा कि नारी का प्रकृत रूप उसकी मुस्कान में नहीं, उसके आँसुओं में प्रत्यक्ष होता है।

 

वैश्य-बाला रोती रही।

***

 

डेढ़ पहर बीत गया। तपस्वी पुनः आया। कन्या उसके पाँव पकड़कर रुदन करने लगी। पिता ने उठा लिया। सिर पर हाथ फेरते हुए रुद्ध कंठ से उसने कहा—वत्से! क्यों अपने पिता की ममता को बाँध रही है। इस अकिंचन के पास एक वही तो तुझे दहेज देने को बची है। उसे भी अपनी ममता के अपार भंडार में मिला ले और उसका भूरि-भूरि उपहार उन्हें जाकर दे, जो वहाँ तुम्हारी बाट जोह रहे हैं।

उसने अपनी बेटी से इतनी भीख माँगी; किंतु कामना करके भी वह उसे प्रदान न कर सकी। उलटे इस असमर्थता ने उसकी करुणा को और भी विगलित कर दिया।

 

तपस्वी पुनः प्रशांत हो गया। गंभीर होकर बोला—बेटी! तेरी इतने दिनों की साधना का यह शुभ फल मुझे मिला है, अब जिस आश्रम का द्वार तेरे लिए उन्मुक्त हुआ है, उसमें प्रवेश करके उसकी सिद्धि कर। यही परंपरा तो तुझे पूर्णता तक पहुँचावेगी। अब देर न कर, मुहूर्त्त बीत रहा है।

बेटी की रोते-रोते हिचकियाँ बँध गई थीं। उसने चुपचाप पिता के चरण छुए। वैश्य का भी हृदय गद्गद् हो रहा था, उसने भी उनके चरणों पर अपने आँसू चढ़ाए। तपस्वी ने दोनों की पीठ पर हाथ रखकर असीसा—जाओ तुम्हारा संसार सुखी और भरा-पूरा हो।

 

***

तपस्वी वहीं ज्यों-का-त्यों खड़ा था। उसके दोनों हाथ वक्षस्थल पर मुद्रित थे, दाहिना पंजा बाँयी और बायाँ दाहिनी काँख के नीचे दबा हुआ था। वह एकटक शून्य दृष्टि से उसी ओर देख रहा था, जिधर नवदंपती चले जा रहे थे। उस वीतराग की ममता ही उनका एकमात्र असबाब था। प्रस्थिता के पैर लड़खड़ा रहे थे, मानो पीछे पड़ते हों। वह अपने को संभाल न सकती थी—उसका स्वामी उसे सहारा दे रहा था।

 

देखते-ही-देखते वे ओझल हो गए और उसी क्षण उस निर्मम की आँखों से ममता की दो बूँदें टपक पड़ीं।

 

राय कृष्णदास

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शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

आकाशदीप

 

(एक)

“बंदी!”

 

“क्या है? सोने दो।”

“मुक्त होना चाहते हो?”

 

“अभी नहीं, निद्रा खुलने पर, चुप रहो।”

“फिर अवसर न मिलेगा।”

 

“बड़ा शीत है, कहीं से एक कंबल डालकर कोई शीत से मुक्त करता।”

“आँधी की संभावना है। यही अवसर है। आज मेरे बंधन शिथिल हैं।”

 

“तो क्या तुम भी बंदी हो?”

“हाँ, धीरे बोलो, इस नाव पर केवल दस नाविक और प्रहरी हैं।”

 

“शस्त्र मिलेगा?”

“मिल जाएगा। पोत से संबद्ध रज्जु काट सकोगे?”

 

“हाँ।”

समुद्र में हिलोरें उठने लगीं। दोनों बंदी आपस में टकराने लगे। पहले बंदी ने अपने को स्वतंत्र कर लिया। दूसरे का बंधन खोलने का प्रयत्न करने लगा। लहरों के धक्के एक-दूसरे को स्पर्श से पुलकित कर रहे थे। मुक्ति की आशा—

 

स्नेह का असंभावित आलिंगन। दोनों ही अंधकार में मुक्त हो गए। दूसरे बंदी ने हर्षातिरेक से उसको गले से लगा लिया। सहसा उस बंदी ने कहा- “यह क्या? तुम स्त्री हो?”

“क्या स्त्री होना कोई पाप है?”—अपने को अलग करते हुए स्त्री ने कहा।

 

“शस्त्र कहाँ है? तुम्हारा नाम?”

“चंपा।”

 

तारक-खचित नील अंबर और समुद्र के अवकाश में पवन ऊधम मचा रहा था। अंधकार से मिलकर पवन दुष्ट हो रहा था। समुद्र में आंदोलन था। नौका लहरों में विकल थी। स्त्री सतर्कता से लुढ़कने लगी। एक मतवाले नाविक के शरीर से टकराती हुई सावधानी से उसका कृपाण निकालकर, फिर लुढ़कते हुए, बंदी के समीप पहुँच गई। सहसा पोत से पथ-प्रदर्शक ने चिल्लाकर कहा- “आँधी!”

आपत्ति-सूचक तूर्य बजने लगा। सब सावधान होने लगे। बंदी युवक उसी तरह पड़ा रहा। किसी ने रस्सी पकड़ी, कोई पाल खोल रहा था। पर युवक बंदी ढुलककर उस रज्जु के पास पहुँचा, जो पोत से संलग्न थी। तारे ढँक गए। तरंगें उद्वेलित हुईं, समुद्र गरजने लगा। भीषण आँधी, पिशाचिनी के समान नाव को अपने हाथों में लेकर कंदुक-क्रीड़ा और अट्टहास करने लगी।

 

एक झटके के साथ ही नाव स्वतंत्र थी। उस संकट में भी दोनों बंदी खिलखिला कर हँस पड़े। आँधी के हाहाकार में उसे कोई न सुन सका।

(दो)

 

अनंत जलनिधि में ऊषा का मधुर आलोक फूट उठा। सुनहली किरणों और लहरों की कोमल सृष्टि मुस्कुराने लगी। सागर शांत था। नाविकों ने देखा, पोत का पता नहीं। बंदी मुक्त हैं।

नायक ने कहा- “बुधगुप्त! तुमको मुक्त किसने किया?”

 

कृपाण दिखाकर बुधगुप्त ने कहा- “इसने।”

नायक ने कहा- “तो तुम्हें फिर बंदी बनाऊँगा।”

 

“किसके लिए? पोताध्यक्ष मणिभद्र अतल जल में होगा, नायक! अब इस नौका का स्वामी मैं हूँ।”

“तुम? जलदस्यु बुधगुप्त? कदापि नहीं।”—चौंककर नायक ने कहा और अपना कृपाण टटोलने लगा! चंपा ने इसके पहले उस पर अधिकार कर लिया था। वह क्रोध से उछल पड़ा।

 

“तो तुम द्वंद्व युद्ध के लिए प्रस्तुत हो जाओ; जो विजयी होगा, वह स्वामी होगा।”—इतना कहकर बुधगुप्त ने कृपाण देने का संकेत किया। चंपा ने कृपाण नायक के हाथ में दे दिया।

भीषण घात-प्रतिघात आरंभ हुआ। दोनों कुशल, दोनों त्वरित गति वाले थे। बड़ी निपुणता से बुधगुप्त ने अपना कृपाण दाँतों से पकड़कर अपने दोनों हाथ स्वतंत्र कर लिए। चंपा भय और विस्मय से देखने लगी। नाविक प्रसन्न हो गए। परंतु बुधगुप्त ने लाघव से नायक का कृपाण वाला हाथ पकड़ लिया और विकट हुँकार से दूसरा हाथ कटि में डाल, उसे गिरा दिया। दूसरे ही क्षण प्रभात की किरणों में बुधगुप्त का विजयी कृपाण हाथों में चमक उठा। नायक की कातर आँखें प्राण-भिक्षा माँगने लगीं।

 

बुधगुप्त ने कहा- “बोलो, अब स्वीकार है कि नहीं?”

“मैं अनुचर हूँ, वरुणदेव की शपथ। मैं विश्वासघात नहीं करूँगा।” बुधगुप्त ने उसे छोड़ दिया।

 

चंपा ने युवक जलदस्यु के समीप आकर उसके क्षतों को अपनी स्निग्ध दृष्टि और कोमल करों से वेदना विहीन कर दिया। बुधगुप्त के सुगठित शरीर पर रक्त-बिंदु विजय-तिलक कर रहे थे।

विश्राम लेकर बुधगुप्त ने पूछा- “हम लोग कहाँ होंगे?”

 

“बालीद्वीप से बहुत दूर, संभवत: एक नवीन द्वीप के पास, जिसमें अभी हम लोगों का बहुत कम आना-जाना होता है। सिंहल के वणिकों का वहाँ प्राधान्य है।”

“कितने दिनों में हम लोग वहाँ पहुँचेंगे?”

 

“अनुकूल पवन मिलने पर दो दिन में। तब तक के लिए खाद्य का अभाव न होगा।”

सहसा नायक ने नाविकों को डाँड़ लगाने की आज्ञा दी, और स्वयं पतवार पकड़कर बैठ गया। बुधगुप्त के पूछने पर उसने कहा- “यहाँ एक जलमग्न शैलखंड है। सावधान न रहने से नाव टकराने का भय है।”

 

(तीन)

“तुम्हें इन लोगों ने बंदी क्यों बनाया?”

 

“वणिक मणिभद्र की पाप-वासना ने।”

“तुम्हारा घर कहाँ है?”

 

“जाह्नवी के तट पर। चंपा-नगरी की एक क्षत्रिय बालिका हूँ। पिता इसी मणिभद्र के यहाँ प्रहरी का काम करते थे। माता का देहावसान हो जाने पर मैं भी पिता के साथ नाव पर ही रहने लगी। आठ बरस से समुद्र ही मेरा घर है। तुम्हारे आक्रमण के समय मेरे पिता ने ही सात दस्युओं को मारकर जल-समाधि ली। एक मास हुआ, मैं इस नील नभ के नीचे, नील जलनिधि के ऊपर, एक भयानक अनंतता में निस्सहाय हूँ, अनाथ हूँ। मणिभद्र ने मुझसे एक दिन घृणित प्रस्ताव किया। मैंने उसे गालियाँ सुनाईं। उसी दिन से बंदी बना दी गई।”—चंपा रोष से जल रही थी।

“मैं भी ताम्रलिप्ति का एक क्षत्रिय हूँ, चंपा! परंतु दुर्भाग्य से जलदस्यु बन कर जीवन बिताता हूँ। अब तुम क्या करोगी?”

 

“मैं अपने अदृष्ट को अनिर्दिष्ट ही रहने दूँगी। वह जहाँ ले जाए।”—चंपा की आँखें निस्सीम प्रदेश में निरुद्देश्य थी। किसी आकांक्षा के लाल डोरे न थे। धवल अपांगों में बालकों के सदृश विश्वास था। हत्या-व्यवसायी दस्यु भी उसे देखकर काँप गया। उसके मन में एक सम्भ्रमपूर्ण श्रद्धा यौवन की पहली लहरों को जगाने लगी। समुद्र-वक्ष पर विलंबमयी राग-रंजित संध्या थिरकने लगी। चंपा के असंयत कुंतल उसकी पीठ पर बिखरे थे। दुर्दांत दस्यु ने देखा, अपनी महिमा में अलौकिक एक तरुण बालिका! वह विस्मय से अपने हृदय को टटोलने लगा। उसे एक नई वस्तु का पता चला। वह थी— कोमलता!

उसी समय नायक ने कहा- “हम लोग द्वीप के पास पहुँच गए।”

 

बेला से नाव टकराई। चंपा निर्भीकता से कूद पड़ी। माँझी भी उतरे। बुधगुप्त ने कहा- “जब इसका कोई नाम नहीं है, तो हम लोग इसे चंपा-द्वीप कहेंगे।”

चंपा हँस पड़ी।

 

(चार)

पाँच बरस बाद—

 

शरद के धवल नक्षत्र नील गगन में झलमला रहे थे। चंद्र की उज्ज्वल विजय पर अंतरिक्ष में शरदलक्ष्मी ने आशीर्वाद के फूलों और खीलों को बिखेर दिया।

चंपा के एक उच्चसौध पर बैठी हुई तरुणी चंपा दीपक जला रही थी। बड़े यत्न से अभ्रक की मंजूषा में दीप धरकर उसने अपनी सुकुमार उँगलियों से डोरी खींची। वह दीपाधार ऊपर चढ़ने लगा। भोली-भोली आँखें उसे ऊपर चढ़ते बड़े हर्ष से देख रही थीं। डोरी धीरे-धीरे खींची गई। चंपा की कामना थी कि उसका आकाश-दीप नक्षत्रों से हिलमिल जाए; किंतु वैसा होना असंभव था। उसने आशाभरी आँखें फिरा लीं।

 

सामने जल-राशि का रजत शृंगार था। वरुण बालिकाओं के लिए लहरों से हीरे और नीलम की क्रीड़ा शैल-मालाएँ बन रही थीं और वे मायाविनी छलनाएँ अपनी हँसी का कलनाद छोड़कर छिप जाती थीं। दूर-दूर से धीवरों का वंशी-झनकार उनके संगीत-सा मुखरित होता था। चंपा ने देखा कि तरल संकुल जल-राशि में उसके कंडील का प्रतिबिंब अस्त-व्यस्त था! वह अपनी पूर्णता के लिए सैकड़ों चक्कर काटता था। वह अनमनी होकर उठ खड़ी हुई। किसी को पास न देखकर पुकारा—“जया!”

एक श्यामा युवती सामने आकर खड़ी हुई। वह जंगली थी। नील नभोमंडल के मुख में शुद्ध नक्षत्रों की पंक्ति के समान उसके दाँत हँसते ही रहते। वह चंपा को रानी कहती; बुधगुप्त की आज्ञा थी।

 

“महानाविक कब तक आवेंगे, बाहर पूछो तो।” चंपा ने कहा। जया चली गई।

दूरागत पवन चंपा के अँचल में विश्राम लेना चाहता था। उसके हृदय में गुदगुदी हो रही थी। आज न जाने क्यों वह बेसुध थी। वह दीर्घकाल दृढ़ पुरुष ने उसकी पीठ पर हाथ रख चमत्कृत कर दिया। उसने फिरकर कहा- “बुधगुप्त!”

 

“बावली हो क्या? यहाँ बैठी हुई अभी तक दीप जला रही हो, तुम्हें यह काम करना है?”

“क्षीरनिधिशायी अनंत की प्रसन्नता के लिए क्या दासियों से आकाश-दीप जलवाऊँ?”

 

“हँसी आती है। तुम किसको दीप जलाकर पथ दिखलाना चाहती हो? उसको, जिसको तुमने भगवान् मान लिया है?”

“हाँ, वह भी कभी भटकते हैं, भूलते हैं, नहीं तो, बुधगुप्त को इतना ऐश्वर्य क्यों देते?”

 

“तो बुरा क्या हुआ, इस द्वीप की अधीश्वरी चंपा रानी?”

“मुझे इस बंदी-गृह से मुक्त करो। अब तो बाली, जावा और सुमात्रा का वाणिज्य केवल तुम्हारे ही अधिकार में है महानाविक! परंतु मुझे उन दिनों की स्मृति सुहावनी लगती है, जब तुम्हारे पास एक ही नाव थी और चंपा के उपकूल में पण्य लादकर हम लोग सुखी जीवन बिताते थे, इस जल में अगणित बार हम लोगों की तरी आलोकमय प्रभात में तारिकाओं की मधुर ज्योति में थिरकती थी। बुधगुप्त! उस विजन अनंत में जब माँझी सो जाते थे, दीपक बुझ जाते थे, हम-तुम परिश्रम से थककर पालों में शरीर लपेटकर एक-दूसरे का मुँह क्यों देखते थे? वह नक्षत्रों की मधुर छाया...”

 

“तो चंपा! अब उससे भी अच्छे ढंग से हम लोग विचर सकते हैं। तुम मेरी प्राणदात्री हो, मेरी सर्वस्व हो।”

“नहीं-नहीं, तुमने दस्युवृत्ति छोड़ दी परंतु हृदय वैसा ही अकरुण, सतृष्ण और ज्वलनशील है। तुम भगवान के नाम पर हँसी उड़ाते हो। मेरे आकाश-दीप पर व्यंग कर रहे हो, नाविक! उस प्रचंड आँधी में प्रकाश की एक-एक किरण के लिए हम लोग कितने व्याकुल थे। मुझे स्मरण है, जब मैं छोटी थी, मेरे पिता नौकरी पर समुद्र में जाते थे—मेरी माता, मिट्टी का दीपक बाँस की पिटारी में भागीरथी के तट पर बाँस के साथ ऊँचे टाँग देती थी। उस समय वह प्रार्थना करती- ‘भगवान! मेरे पथ-भ्रष्ट नाविक को अंधकार में ठीक पथ पर ले चलना।’ और जब मेरे पिता बरसों पर लौटते तो कहते- ‘साध्वी! तेरी प्रार्थना से भगवान् ने संकटों में मेरी रक्षा की है।’ वह गद्गद हो जाती। मेरी माँ? आह नाविक! यह उसी की पुण्य-स्मृति है। मेरे पिता, वीर पिता की मृत्यु के निष्ठुर कारण, जलदस्यु! हट जाओ।”—सहसा चंपा का मुख क्रोध से भीषण होकर रंग बदलने लगा। महानाविक ने कभी यह रूप न देखा था। वह ठठाकर हँस पड़ा।

 

“यह क्या, चंपा? तुम अस्वस्थ हो जाओगी, सो रहो।”—कहता हुआ चला गया। चंपा मुठ्ठी बाँधे उन्मादिनी-सी घूमती रही।

(पाँच)

 

निर्जन समुद्र के उपकूल में वेला से टकराकर लहरें बिखर जाती थीं। पश्चिम का पथिक थक गया था। उसका मुख पीला पड़ गया। अपनी शांत गंभीर हलचल में जलनिधि विचार में निमग्न था। वह जैसे प्रकाश की उन्मलिन किरणों से विरक्त था।

चंपा और जया धीरे-धीरे उस तट पर आकर खड़ी हो गईं। तरंग से उठते हुए पवन ने उनके वसन को अस्त-व्यस्त कर दिया। जया के संकेत से एक छोटी-सी नौका आई। दोनों के उस पर बैठते ही नाविक उतर गया। जया नाव खेने लगी। चंपा मुग्ध-सी समुद्र के उदास वातावरण में अपने को मिश्रित कर देना चाहती थी।

 

“इतना जल! इतनी शीतलता! हृदय की प्यास न बुझी। पी सकूँगी? नहीं! तो जैसे वेला में चोट खाकर सिंधु चिल्ला उठता है, उसी के समान रोदन करूँ? या जलते हुए स्वर्ण-गोलक सदृश अनंत जल में डूबकर बुझ जाऊँ?”—चंपा के देखते-देखते पीड़ा और ज्वलन से आरक्त बिंब धीरे-धीरे सिंधु में चौथाई-आधा, फिर संपूर्ण विलीन हो गया। एक दीर्घ निश्वास लेकर चंपा ने मुँह फेर लिया। देखा, तो महानाविक का बजरा उसके पास है। बुधगुप्त ने झुककर हाथ बढ़ाया। चंपा उसके सहारे बजरे पर चढ़ गर्इ। दोनों पास-पास बैठ गए।

“इतनी छोटी नाव पर इधर घूमना ठीक नहीं। पास ही वह जलमग्न शैल खंड है। कहीं नाव टकरा जाती या ऊपर चढ़ जाती, चंपा तो?”

 

“अच्छा होता, बुधगुप्त! जल में बंदी होना कठोर प्राचीरों से तो अच्छा है।”

आह चंपा, तुम कितनी निर्दय हो! बुधगुप्त को आज्ञा देकर देखो तो, वह क्या नहीं कर सकता। जो तुम्हारे लिए नए द्वीप की सृष्टि कर सकता है, नई प्रजा खोज सकता है, नए राज्य बना सकता है, उसकी परीक्षा लेकर देखो तो...। कहो, चंपा! वह कृपाण से अपना हृदय-पिंड निकाल अपने हाथों अतल जल में विसर्जन कर दे।”—महानाविक—जिसके नाम से बाली, जावा और चंपा का आकाश गूँजता था, पवन थर्राता था, घुटनों के बल चंपा के सामने छलछलाई आँखों से बैठा था।

 

सामने शैलमाला की चोटी पर हरियाली में विस्तृत जल-देश में, नील पिंगल संध्या, प्रकृति की सहृदय कल्पना, विश्राम की शीतल छाया, स्वप्नलोक का सृजन करने लगी। उस मोहिनी के रहस्यपूर्ण नीलजाल का कुहक स्फुट हो उठा। जैसे मदिरा से सारा अंतरिक्ष सिक्त हो गया। सृष्टि नील कमलों में भर उठी। उस सौरभ से पागल चंपा ने बुधगुप्त के दोनों हाथ पकड़ लिए। वहाँ एक आलिंगन हुआ, जैसे क्षितिज में आकाश और सिंधु का। किंतु उस परिरंभ में सहसा चैतन्य होकर चंपा ने अपनी कंचुकी से एक कृपाण निकाल लिया।

“बुधगुप्त! आज मैं अपने प्रतिशोध का कृपाण अतल जल में डुबा देती हूँ। हृदय ने छल किया, बार-बार धोखा दिया!”—चमककर वह कृपाण समुद्र का हृदय बेधता हुआ विलीन हो गया।

 

“तो आज से मैं विश्वास करूँ, क्षमा कर दिया गया?”—आश्चर्यचकित कंपित कंठ से महानाविक ने पूछा।

'विश्वास? कदापि नहीं, बुधगुप्त! जब मैं अपने हृदय पर विश्वास नहीं कर सकी, उसी ने धोखा दिया, तब मैं कैसे कहूँ? मैं तुम्हें घृणा करती हूँ, फिर भी तुम्हारे लिए मर सकती हूँ। अँधेर है जलदस्यु। तुम्हें प्यार करती हूँ।” चंपा रो पड़ी।

 

वह स्वप्नों की रंगीन संध्या, तम से अपनी आँखें बंद करने लगी थी। दीर्घ निश्वास लेकर महानाविक ने कहा- “इस जीवन की पुण्यतम घड़ी की स्मृति में एक प्रकाश-गृह बनाऊँगा, चंपा! चंपा यहीं उस पहाड़ी पर। संभव है कि मेरे जीवन की धुँधली संध्या उससे आलोकपूर्ण हो जाए।”

(छः)

 

चंपा के दूसरे भाग में एक मनोरम शैलमाला थी। वह बहुत दूर तक सिंधु-जल में निमग्न थी। सागर का चंचल जल उस पर उछलता हुआ उसे छिपाए था। आज उसी शैलमाला पर चंपा के आदि-निवासियों का समारोह था। उन सबों ने चंपा को वनदेवी-सा सजाया था। ताम्रलिप्ति के बहुत से सैनिक नाविकों की श्रेणी में वन-कुसुम-विभूषिता चंपा शिविकारूढ़ होकर जा रही थी।

शैल के एक उँचे शिखर पर चंपा के नाविकों को सावधान करने के लिए सुदृढ़ दीप-स्तंभ बनवाया गया था। आज उसी का महोत्सव है। बुधगुप्त स्तंभ के द्वार पर खड़ा था। शिविका से सहायता देकर चंपा को उसने उतारा। दोनों ने भीतर पदार्पण किया था कि बाँसुरी और ढोल बजने लगे। पंक्तियों में कुसुम-भूषण से सजी वन-बालाएँ फूल उछालती हुई नाचने लगीं।

 

दीप-स्तंभ की ऊपरी खिड़की से यह देखती हुई चंपा ने जया से पूछा- “यह क्या है जया? इतनी बालिकाएँ कहाँ से बटोर लाईं?”

“आज रानी का ब्याह है न?”—कहकर जया ने हँस दिया।

 

बुधगुप्त विस्तृत जलनिधि की ओर देख रहा था। उसे झकझोरकर चंपा ने पूछा- “क्या यह सच है?”

“यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो यह सच भी हो सकता है, चंपा! कितने वर्षों से मैं ज्वालामुखी को अपनी छाती में दबाए हूँ।”

 

“चुप रहो, महानाविक! क्या मुझे निस्सहाय और कंगाल जानकर तुमने आज सब प्रतिशोध लेना चाहा?”

“मैं तुम्हारे पिता का घातक नहीं हूँ, चंपा! वह एक दूसरे दस्यु के शस्त्र से मरे।”

 

“मैं इसका विश्वास कर सकती। बुधगुप्त, वह दिन कितना सुंदर होता, वह क्षण कितना स्पृहणीय! आह! तुम इस निष्ठुरता में भी कितने महान होते।”

जया नीचे चली गई थी। स्तंभ के संकीर्ण प्रकोष्ठ में बुधगुप्त और चंपा एकांत में एक दूसरे के सामने बैठे थे।

 

बुधगुप्त ने चंपा के पैर पकड़ लिए। उच्छ्वसित शब्दों में वह कहने लगा- “चंपा, हम लोग जन्मभूमि-भारतवर्ष से कितनी दूर इन निरीह प्राणियों में इंद्र और शची के समान पूजित हैं। पर न जाने कौन अभिशाप हम लोगों को अभी तक अलग किए है। स्मरण होता है वह दार्शनिकों का देश! वह महिमा की प्रतिमा! मुझे वह स्मृति नित्य आकर्षित करती है; परंतु मैं क्यों नहीं जाता? जानती हो, इतना महत्त्व प्राप्त करने पर भी मैं कंगाल हूँ! मेरा पत्थर-सा हृदय एक दिन सहसा तुम्हारे स्पर्श से चन्द्रकांतमणि की तरह द्रवित हुआ।

चंपा! मैं ईश्वर को नहीं मानता, मैं पाप को नहीं मानता, मैं दया को नहीं समझ सकता, मैं उस लोक में विश्वास नहीं करता। पर मुझे अपने हृदय के एक दुर्बल अंश पर श्रद्धा हो चली है। तुम न जाने कैसे एक बहकी हुई तारिका के समान मेरे शून्य में उदित हो गई हो। आलोक की एक कोमल रेखा इस निविड़तम में मुस्कुराने लगी। पशु-बल और धन के उपासक के मन में किसी शांत और एकांत कामना की हँसी खिलखिलाने लगी; पर मैं न हँस सका!

 

चलोगी चंपा? पोतवाहिनी पर असंख्य धनराशि लादकर राजरानी-सी जन्मभूमि के अंक में? आज हमारा परिणय हो, कल ही हम लोग भारत के लिए प्रस्थान करें। महानाविक बुधगुप्त की आज्ञा सिंधु की लहरें मानती हैं। वे स्वयं उस पोत-पुंज को दक्षिण पवन के समान भारत में पहुँचा देंगी। आह चंपा! चलो।”

चंपा ने उसके हाथ पकड़ लिए। किसी आकस्मिक झटके ने एक पलभर के लिए दोनों के अधरों को मिला दिया। सहसा चैतन्य होकर चंपा ने कहा- “बुधगुप्त! मेरे लिए सब भूमि मिट्टी है; सब जल तरल है; सब पवन शीतल है। कोई विशेष आकांक्षा हृदय में अग्नि के समान प्रज्वलित नहीं। सब मिलाकर मेरे लिए एक शून्य है। प्रिय नाविक! तुम स्वदेश लौट जाओ, विभवों का सुख भोगने के लिए, और मुझे, छोड़ दो इन निरीह भोले-भाले प्राणियों के दु:ख की सहानुभूति और सेवा के लिए।”

 

“तब मैं अवश्य चला जाऊँगा, चंपा! यहाँ रहकर मैं अपने हृदय पर अधिकार रख सकूँ— इसमें संदेह है। आह! उन लहरों में मेरा विनाश हो जाए।”—महानाविक के उच्छ्वास में विकलता थी। फिर उसने पूछ- “तुम अकेली यहाँ क्या करोगी?”

“पहले विचार था कि कभी-कभी इस दीप-स्तंभ पर से आलोक जलाकर अपने पिता की समाधि का इस जल से अन्वेषण करूँगी। किंतु देखती हूँ, मुझे भी इसी में जलना होगा, जैसे आकाश-दीप।”

 

(सात)

एक दिन स्वर्ण-रहस्य के प्रभात में चंपा ने अपने दीप-स्तंभ पर से देखा—सामुद्रिक नावों की एक श्रेणी चंपा का उपकूल छोड़कर पश्चिम-उत्तर की ओर महा जल-व्याल के समान संतरण कर रही है। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

 

यह कितनी ही शताब्दियों पहले की कथा है। चंपा आजीवन उस दीप-स्तंभ में आलोक जलाती रही। किंतु उसके बाद भी बहुत दिन, दीपनिवासी, उस माया-ममता और स्नेह-सेवा की देवी की समाधि-सदृश पूजा करते थे।

एक दिन काल के कठोर हाथों ने उसे भी अपनी चंचलता से गिरा दिया।

 

जयशंकर प्रसाद

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