नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

कोई उम्मीद दिखाई नहीं पड़ती


सच कहा जाए तो आज अपने देश में निराशा का जैसा माहौल है वैसा शायद पहले कभी नहीं था । दीवाली के समय में उत्तर भारत में यह प्रथा रही है कि लोग अपने पराये सबों से गले मिलते हैं और कुशल क्षेम पूछते हैं । इस बार जब भी लोग अपने पराये लोगों से मिले तो सबों के मुंह से एक ही आह  निकली कि पता नही भारत का क्या भविष्य होगा? सब लोग केवल महगांई और भ्रष्टाचार की बातें करते थे। सबों का यही प्रश्न था कि यह महगांई और यह भ्रष्टाचार कहां जाकर रूकेगा?
अभी कुछ वर्ष पहले ही शरद ऋतु के आगमन के साथ पूरे उत्तर भारत में हर्षोल्लास का वातावरण छा जाता था । सबसे पहले लोग नवरात्रि की पूजा में व्यस्त हो जाते थे । फिर दीवाली की रौनक होती थी। उसके बाद छठ पूजा होती थी। फिर गोपाष्टमी का पर्व होता था । फिर औरानवमी होती थी  जब  बागीचों में लोग पिकनिक मनाते थे और सर्वत्र खुशी का माहौल होता था। कुछ सप्ताह बाद सिमस और बड़े दिन की छुट्टियां होती थी और नये साल का जश्न मनाया जाता  था । सीमित साधनों में भी लोग सुखी संपन्न थे । परन्तु आज की महंगाई ने लोगों की कमर तोड़ दी है । लोगों को सरकारी वादों पर विश्वास नहीं हो रहा है कि यह महंगाई शीघ्र रूक जाएगी । महंगाई के साथ साथ अर्थव्यवस्था में मन्दी का दौर भी शुरू हो गया है । औद्योगिक उत्पादन तेजी से गिरा है जिसका अर्थ है कि आने वाले  दिनों में कल कारखाने धड़ल्ले से बन्द होंगे और लोगों में बेरोजगारी तेजी से फैलेगी जिसके कारण समाज में बेचैनी और अव्यवस्था फैलेगी । सरकार के लाख दावों के बावजूद यह साबित हो गया है कि निर्यात तेजी से गिरा है और निकट भविष्य में उसमें सुधार की कोई गुंजाइश दिखाई नहीं दे रही है । अमेरिका और यूरापीय  देशों की आर्थिक हालत अत्यन्त ही खस्ता है ।  निकट भविष्य में उनकी आर्थिक हालत में सुधार की कोई उम्मीद दिखाई नहीं  पड़ती है । वैसे भी अमेरिका, कनाडा और यूरोप के देशों की मंडियों में चीन छा गया है । चीन ने अपने सस्ते उत्पादों के बल पर भारतीय वस्तुओं को सारे संसार की मंडियों से गायब कर दिया है । निकट भविष्य में इस स्थिति में सुधार की कोई आशा दिखाई नहीं पड़ती है । संक्षेप में, सर्वत्र निराशा का माहौल दिख रहा है ।
सबसे अधिक चिन्ता की बात यह है कि नित्य नये भ्रष्टाचार के उजागर होने से लोगों का विश्वास सभी राजनीतिक दलों से उठ गया है । हर रोज नये नये भ्रष्टाचार की कहानियां प्रकाश में आती हैं । आम जनता अब अच्छी तरह समझ गई है कि नेताओं ने भ्रष्ट तरीके से जो अकूत धन जमा किया है वह उन्हीं की गाढी कमाई का पैसा है । पिछले कुछ महीनों से देश में एक राजनीतिक माहौल ऐसा बन गया है कि जिससे  लगता है कि लोकसभा का चुनाव शायद कुछ महीनों के अन्दर ही हो जाए । कुछ प्रमुख राजीनतिक दलों ने तो अपने उम्मीदवारों के नामों की भी घोषणा कर दी है । अन्य दल जी जान से चुनाव की तैयारी में लग गये हैं । यह सोचकर कि लोकसभा का चुनाव कभी भी हो सकता है । 
आम जनता चुनाव के नाम से ही खौफ खाती है। अब यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि आम चुनाव में पैसा पानी की तरह बहता है । प्रश्न यह है कि इतना ढेर सारा पैसा आखिर आता कहां से है ? सुप्रीम कोर्ट के दखल देने पर चुनाव कानूनों में यह  संशोधन किया गया कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों को  अपनी संपत्ति का ब्यौरा देना होगा । परन्तु इन सफेदपोश राजनेताओं ने देश और विदेशों में जो बेशुमार संपत्ति जमा कर ली है उनके बारे में पता लगाना कठिन ही नहीं असंभव है। कभी कभी संयोग से  इन राजनेताओं के काले धन की कहानी मीडिया में आ जाती है । परन्तु सच्चाई तो इससे बहुत अधिक है। अब यह बात किसी से छिपी हुई नहीं है कि लोकसभा और विधानसभा के चुनावों में करोड़ों रूपया खर्च होता है । अब यह बात आम जनता भी समझ गई है कि जो नेता चुनाव पर इतना अधिक खर्च करेगा वह इसका कई  गुना अधिक पांच वर्ष की अवधि में विभिन्न स्रोतों से अवश्य जमा करेगा । वह इंजीनियरों को डरा धमकाकर विभिन्न सरकारी योजनाओं से पैसे मारेगा ।  उन्हें यह पाठ पढायेगा कि बहती गंगा में वह  हाथ धोये, फर्जी बिल बनाये । फि र दोनों मिल बैठकर उस काले धन को आपस में बांटेंगे और मौज करेंगे । कभी एमपी-एमएलए जनता के सेवक होते थे । आज  हालत यह है कि एमपी-एमएलए को देखकर जनता खौफ खाती है । क्योंकि अनेक एमपी-एमएलए जनता का शोषण कर बेशुमार पैसा बटोर रहे हैं और अपना घर भर रहे हैं । 
जब जब चुनाव की घोषणा होती है, नेताओं के द्वारा कमाया हुआ अकूत काला धन जो अधिकतर विदेशों में पड़ा हुआ है वह हवाला के द्वारा भारत आता है । कुछ अन्य माध्यमों से भी देश में आता है और अब तो यह बात शीशे की तरह साफ है कि  हर चुनाव के बाद इस काले धन के कारण महंगाई बेतहाशा बढ़ जाती है । अत: चुनाव की आशंका से ही आम जनता खौफ खाने लगती है । आज गांव गांव में लोग पंचायत घरों में डीजल से चलने वाले केबल टीवी को देखते हैं और उन्हें तुरन्त यह पता चल जाता है कि भारत के विभिन्न भागों में कहां क्या हो रहा है ?
पुरानी पीढ़ी के लोग जब किसी को रातों रात अमीर होते देखते थे या किसी राजनेता को भ्रष्ट तरीके से अकूत धन जमा करते हुए देखते थे तो यही सोचते थे कि उनकी तकदीर में अमीरी लिखी है और बाकी लोगों की तकदीर में गरीबी । परन्तु नई पीढ़ी के युवा इन राजनेताओं की हेराफेरी को अच्छी तरह समझते हैं और यह भी समझते हैं कि उनकी सारी समस्याओं की जड़ में भ्रष्टाचार है और सारे भ्रष्टाचार की जड़ में ये राजनेता हैं चाहे वे किसी भी राजनीतिक दल के नेता हों । चुनाव के पहले हर राजनीतिक दल यही कहता है कि उसकी पार्टी अपराधी छवि के लोगों को टिकट नहीं देगी । परन्तु जब चुनाव का समय आता है तब अन्धा धुन्ध तरीके से अपराधी प्रवृति के लोगों को टिकट दे दिया जाता है । इस सिलसिले में एक दिलचस्प बात यह है कि सफेदपोश अपराधी प्रवृति के राजनेता जो स्वयं मंत्री या पूर्व मंत्री होते हैं पर्दे के पीछे से सारे अपराधों को इतनी होशियारी से संचालित करते हैं कि आम लोगों को उन पर जरा भी शक नहीं होता है । इन तथाकथित गौडफ ादरों के चेहरे पर शराफत का नकाब रहता है जिसे यदि सही अर्थ में उतारा जाए तो उनके अपराध सामने आ जाएंगे । परन्तु प्रश्न यह है कि इन दादाओं के नकाब को उतारेगा कौन ? सच कहा जाए तो आम जनता आज की तारीख में जिस तरह पिस रही है वैसा पहले कभी नहीं हुआ था । समय आ गया है जब युवा वर्ग के बुद्विजीवी समाज के लोगों को जागृत करें और उन राजनेताओं का सामाजिक बहिष्कार करें जो देश में भ्रष्टाचार फैला रहे हैं ।

डा. गौरीशंकर राजहंस (लेखक पूर्व सांसद एवं पूर्व राजदूत हैं)  

(साभार -देशबंधु )

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

काकी

उस दिन बड़े सवेरे जब श्यामू की नींद खुली तब उसने देखा—घर भर में कुहराम मचा हुआ है। उसकी काकी उमा एक कंबल पर नीचे से ऊपर तक एक कपड़ा ओढ़े हुए भूमि-शयन कर रही हैं, और घर के सब लोग उसे घेरकर बड़े करुण स्वर में विलाप कर रहे हैं।

लोग जब उमा को श्मशान ले जाने के लिए उठाने लगे तब श्यामू ने बड़ा उपद्रव मचाया। लोगों के हाथों से छूटकर वह उमा के ऊपर जा गिरा। बोला—“काकी सो रही हैं, उन्हें इस तरह उठाकर कहाँ लिए जा रहे हो? मैं न जाने दूँगा।”

 

लोग बड़ी कठिनता से उसे हटा पाए। काकी के अग्नि-संस्कार में भी वह न जा सका। एक दासी राम-राम करके उसे घर पर ही सँभाले रही।

यद्यपि बुद्धिमान गुरुजनों ने उन्हें विश्वास दिलाया कि उसकी काकी उसके मामा के यहाँ गई है, परंतु असत्य के आवरण में सत्य बहुत समय तक छिपा न रह सका। आस-पास के अन्य अबोध बालकों के मुँह से ही वह प्रकट हो गया। यह बात उससे छिपी न रह सकी कि काकी और कहीं नहीं, ऊपर राम के यहाँ गई है। काकी के लिए कई दिन तक लगातार रोते-रोते उसका रुदन तो क्रमश: शांत हो गया, परंतु शोक शांत न हो सका। वर्षा के अनंतर एक ही दो दिन में पृथ्वी के ऊपर का पानी अगोचर हो जाता है, परंतु भीतर ही भीतर उसकी आर्द्रता जैसे बहुत दिन तक बनी रहती है, वैसे ही उसके अंतस्तल में वह शोक जाकर बस गया था। वह प्राय: अकेला बैठा-बैठा, शून्य मन से आकाश की ओर ताका करता।

 

एक दिन उसने ऊपर एक पतंग उड़ती देखी। न जाने क्या सोचकर उसका हृदय एकदम खिल उठा। विश्वेश्वर के पास जाकर बोला—“काका मुझे पतंग मँगा दो।”

पत्नी की मृत्यु के बाद से विश्वेश्वर अन्यमनस्क रहा करते थे। “अच्छा, मँगा दूँगा।” कहकर वे उदास भाव से और कहीं चले गए।

 

श्यामू पतंग के लिए बहुत उत्कंठित था। वह अपनी इच्छा किसी तरह रोक न सका। एक जगह खूँटी पर विश्वेश्वर का कोट टँगा हुआ था। इधर-उधर देखकर उसने उसके पास स्टूल सरकाकर रखा और ऊपर चढ़कर कोट की जेबें टटोलीं। उनमें से एक चवन्नी का आविष्कार करके तुरंत वहाँ से भाग गया।

सुखिया दासी का लड़का भोला, श्यामू का समवयस्क साथी था। श्यामू ने उसे चवन्नी देकर कहा—“अपनी जीजी से कहकर गुपचुप एक पतंग और डोर मँगा दो। देखो, ख़ूब अकेले में लाना, कोई जान न पावे।”

 

पतंग आई। एक अँधेरे घर में उसमें डोर बाँधी जाने लगी। श्यामू ने धीरे से कहा, “भोला, किसी से न कहो तो एक बात कहूँ।”

भोला ने सिर हिलाकर कहा—“नहीं, किसी से नहीं कहूँगा।”

 

श्यामू ने रहस्य खोला। कहा—“मैं यह पतंग ऊपर राम के यहाँ भेजूँगा। इसे पकड़कर काकी नीचे उतरेंगी। मैं लिखना नहीं जानता, नहीं तो इस पर उनका नाम लिख देता।”

भोला श्यामू से अधिक समझदार था। उसने कहा—“बात तो बड़ी अच्छी सोची, परंतु एक कठिनता है। यह डोर पतली है। इसे पकड़कर काकी उतर नहीं सकतीं। इसके टूट जाने का डर है। पतंग में मोटी रस्सी हो, तो सब ठीक हो जाए।”

 

श्यामू गंभीर हो गया! मतलब यह, बात लाख रुपए की सुझाई गई है। परंतु कठिनता यह थी कि मोटी रस्सी कैसे मँगाई जाए। पास में दाम है नहीं और घर के जो आदमी उसकी काकी को बिना दया-माया के जला आए हैं, वे उसे इस काम के लिए कुछ नहीं देंगे। उस दिन श्यामू को चिंता के मारे बड़ी रात तक नींद नहीं आई।

पहले दिन की तरकीब से दूसरे दिन उसने विश्वेश्वर के कोट से एक रुपया निकाला। ले जाकर भोला को दिया और बोला—“देख भोला, किसी को मालूम न होने पाए। अच्छी-अच्छी दो रस्सियाँ मँगा दे। एक रस्सी ओछी पड़ेगी। जवाहिर भैया से मैं एक काग़ज़ पर ‘काकी’ लिखवा रखूँगा। नाम की चिट रहेगी, तो पतंग ठीक उन्हीं के पास पहुँच जाएगी।”

 

दो घंटे बाद प्रफुल्ल मन से श्यामू और भोला अँधेरी कोठरी में बैठे-बैठे पतंग में रस्सी बाँध रहे थे। अकस्मात् शुभ कार्य में विघ्न की तरह उग्ररूप धारण किए विश्वेश्वर वहाँ आ घुसे। भोला और श्यामू को धमकाकर बोले—“तुमने हमारे कोट से रुपया निकाला है?”

भोला सकपकाकर एक ही डाँट में मुख़बिर हो गया। बोला—“श्यामू भैया ने रस्सी और पतंग मँगाने के लिए निकाला था।” विश्वेश्वर ने श्यामू को दो तमाचे जड़कर कहा—“चोरी सीखकर जेल जाएगा? अच्छा, तुझे आज अच्छी तरह समझाता हूँ।” कहकर फिर तमाचे जड़े और कान मलने के बाद पतंग फाड़ डाला। अब रस्सियों की ओर देखकर पूछा—“ये किसने मँगाई?”

 

भोला ने कहा—“इन्होंने मँगार्इ थी। कहते थे, इससे पतंग तानकर काकी को राम के यहाँ से नीचे उतारेंगे।”

विश्वेश्वर हतबुद्धि होकर वहीं खड़े रह गए। उन्होंने फटी हुई पतंग उठाकर देखी। उस पर चिपके हुए काग़ज़ पर लिखा हुआ था—“काकी।”

 

 सियारामशरण गुप्त

#समाजकीबात #samajkibaat #Sahitya #साहित्य

#कृष्णधरशर्मा #Krishnadharsharma