नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

दलाई लामा कुछ वर्ष अरुणाचल क्यों नहीं रहते?


 चीन का एक अद्र्ध सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भारत को नसीहत के साथ-साथ नाकाबिले बर्दाश्त की भी धमकी दी है। वजह दलाई लामा हैं, जिनके अरुणाचल जाने पर चीन को आपत्ति है। तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा 10 अप्रैल तक अरुणाचल प्रदेश में रहेंगे। परम पावन कोई पहली बार अरुणाचल नहीं आये हैं। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में बस जाने के बाद वे सातवीं बार अरुणाचल भ्रमण पर आये हैं। 24 मार्च से 6 मई 1983 को परम पावन का पहला अरुणाचल दौरा था, तब भी चीन काफी उछला-कूदा था। दलाई लामा का दूसरा दौरा 7 से 16 दिसंबर 1996, तीसरा 7 से 21 अक्टूबर 1997 को हुआ था। 2003 में दो बार 29 अप्रैल से 9 मई, और 11 से 17 दिसंबर को तिब्बती धर्मगुरु का अरुणाचल आना हुआ था। दलाई लामा का छठा अरुणाचल दौरा 8 से 15 नवंबर 2009 को संपन्न हुआ था। चीन, दलाई लामा के हर अरुणाचल दौरे पर भारत को धमका चुका है। उसकी गीदड़ भभकी को क्या गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है?
चीन दलाई लामा के हर अरुणाचल दौरे पर दो कारणों से उछलता है। पहला, 1914 का शिमला कन्वेंशन है, जिसके मुताबिक तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने माना था कि दक्षिणी तिब्बत के पड़ोस में बसा तवांग और संपूर्ण अरुणाचल भारत का हिस्सा है। चीन 1914 के शिमला कन्वेंशन को मानने से इंकार करता रहा है। दूसरा, 1959 में विद्रोह के तुरंत बाद दलाई लामा का तिब्बत से महाभिनिष्क्रमण हुआ। 30 मार्च 1959 को वे तवांग आये, और फिर 18 अप्रैल को असम के तेजपुर पहुंचे। कुछ महीने बाद कोई 80 हजार शरणार्थियों के साथ धर्मशाला में तिब्बत की निर्वासित सरकार की स्थापना हुई। अरुणाचल का तवांग एक तारीखी स्थान है, जब भी दलाई लामा इस सूबे में आते हैं, तवांग जरूर जाकर अपनी याद ताजा करते हैं। चीन के इस दर्द को बदस्तूर जारी रखने के लिए दलाई लामा को चाहिए कि वे अरुणाचल ही कुछ वर्ष रहें।
एक आम फहम है कि तिब्बत की निर्वासित सरकार की स्थापना पंडित नेहरू की वजह से हुई। मगर, सच यह है कि इस पूरे खेल को सीआईए के ‘स्पेशल एक्टिविटी डिवीजन’ ने अंजाम दिया था। 1942 से पहले तिब्बत में अंदरूनी दांव-पेंच से शेष दुनिया अनजान थी। तिब्बत में पीत वस्त्र धारी गेलुग (जिसके धर्मगुरु 14वें दलाई लामा हैं), ‘काग्यु’, ‘न्यींगमां’, और शाक्य मत को मानने वाले ग्यालपो धर्मगुरु विभिन्न मठों के जरिये अपना अखंड राज चला रहे थे। 1642 से 1950 तक ल्हासा से लेकर तिब्बत पठार के बड़े हिस्से पर एक से चौदहवें दलाई लामाओं ने राज किया है। बीच में 1705 से 1750 की अवधि को छोडक़र, जब मांचु और छिंग राजाओं का शासन तिब्बत में था।
चीन का मकसद था, बहुसंख्यक गेलुग मतावलंबियों को कमजोर करना। उसने दलाई लामा के विकल्प के रूप में पणछेन लामाओं को तैयार किया। यह किस्सा 1933 का है, जब तेरहवें दलाई लामा की मृत्यु हो चुकी थी। उन दिनों नौवें पणछेन लामा थुब्तेन चोक्यी न्यीमा पांच सौ चीनी सैनिकों और कुछ समर्थक लामाओं के साथ खाम आये और कमजोर मठों को दबाकर सत्ता पर काबिज हो गये। 1942 के बाद च्यांग काई शेक ने तिब्बत में विस्तार देने की नीयत से और भी साजिशें कराईं। फिर भी गेलुग लामा उनके काबू नहीं आ रहे थे।
22 फरवरी 1940 को जब ल्हासा में 14वें दलाई लामा तेन्जिंग ग्यात्सो का राज्याभिषेक हुआ तब वे पांच साल के बालक थे। 17 नवंबर 1950 को वे पन्द्रह वर्ष के हो चुके थे, उस दिन उन्हें गेलुग शासन के राजनीतिक फैसले लेने का अधिकार मिल चुका था। तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र के शासक की हैसियत से दलाई लामा के कई पत्र ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ को भेजे जाते रहे। 27 सितंबर 1954 को चीनी संसद ‘नेशनल पीपुल्स कांग्रेस’ की स्टैंडिंग कमेटी के ‘वॉइस चेयरमैन’ दलाई लामा बनाये गये। यह दर्शाता है कि तत्कालीन चीनी सरकार दलाई लामा को तिब्बत में बहैसियत शासक की मान्यता दे रही थी। लेकिन च्यांगकाई शेक तिब्बत पर प्रतिरूपी प्रशासक नहीं, प्रत्यक्ष चीनी आधिपत्य चाहते थे।
14वें दलाई लामा को तख्ता पलट का अंदाजा हो चुका था। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से इस वास्ते 1956 में मदद भी मांगी थी। परंतु पंडित नेहरू ने 1954 में चीन से हुई संधि का हवाला देकर, प्रत्यक्ष मदद देने से इंकार कर दिया था। पंडित नेहरू नहीं चाहते थे, कि इसे लेकर चीन से टकराव आरंभ हो जाए। इस बीच सीआईए का ‘स्पेशल एक्टिविटी डिवीजन’(एसएडी) ने दलाई लामा का तिब्बत से पलायन का इंतजाम किया। उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहॉवर संभवत: पंडित नेहरू को समझा पाने में सफल हुए थे कि तिब्बत की निर्वासित सरकार भविष्य में चीन पर अंकुश का काम करेगी। बाद में जनवरी 1961 में राष्ट्रपति निक्सन सत्ता में आये, तो तिब्बत की निर्वासित सरकार को और भी फंड व ताकत मिली। 1959, 1961, और 1965 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में तिब्बत से संबंधित तीन प्रस्ताव पास किये गये। 21 सितंबर 1987 को अमेरिकी कांग्रेस में तिब्बत को शांति क्षेत्र बनाने संबंधी पांच सूत्री प्रस्ताव पर भी मुहर लगी। इसे लेकर चीन की भृकुटि तनी रही।
तिब्बत को केंद्र में रखकर सीआईए जो कुछ कर रही थी, उसे रूसी एजेंसियां ‘काउंटर’ तो नहीं कर पा रही थीं, मगर समय-समय पर उन गतिविधियों पर से पर्दा उठाने का काम क्रेमलिन की तरफ से होता रहा। रूसी इतिहासकार दिमित्रि बर्खोतुरोव ने कई सारे दस्तावेजों के आधार पर खुलासा किया कि यूएस कांग्रेस ने 1 लाख 80 हजार डॉलर 1964 के ड्राफ्ट बजट में आबंटित किया था। तिब्बत आंदोलन में सीआईए की कितनी गहरी दिलचस्पी रही है, उसका सबसे बड़ा उदाहरण पश्चिमी नेपाल सीमा से लगा तिब्बत का खाम प्रदेश है, जहां 1959 में खंफा युद्ध हुआ था। इसके लिए अमेरिका के कोलराडो स्थित कैंप हाले में 2100 खंफा लड़ाके लाये गये और उन्हें गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग देकर नेपाल के बरास्ते वापिस खाम भेजा गया। इस पूरे कार्यक्रम में नौ लाख डॉलर के खर्चे की मंजूरी अमेरिकी कांग्रेस से ली गई थी। जिसमें चार लाख डॉलर कैम्प हाले में व्यय किया गया था।
 बदलते वक्त के साथ तिब्बतियों को सीआईए का सहयोग धीरे-धीरे कम होता गया। 1968 में सूचना मिली कि सीआईए के जरिये तिब्बतियों को बजटीय सहयोग कम करके 11 लाख, 65 हजार डॉलर कर दिया गया था। कुछ कूटनीतिक मानते हैं कि इस सारे खेल के पीछे चीन के प्रथम नाभिकीय परीक्षण को पटरी से उतारना था, जो 16 अक्टूबर 1964 को लोप नूर में संपन्न हुआ था। लोप नूर तिब्बत से सटे शिन्चियांग में हैं, जहां के उईगुर अलगाववादी चीन को चुनौती देते रहे हैं। चीनी मामलों के जानकार जोनाथन मिस्की ने सूचना दी कि 1972 में राष्ट्रपति निक्सन के चीन दौरे के बाद ‘खंफा ऑपरेशन’ के बाद के काम को भी स्थगित कर दिया गया।
6 जुलाई 2017 को 14 वें दलाई लामा 82 साल के हो जाएंगे। उनके तेवर, उम्र के साथ ढीले पडऩे लगे हैं। उनमें बदलाव दो दशक पहले से आरंभ था। 21 सितंबर 1987 को जर्मनी के श्ट्राशबुर्ग में परम पावन ने पांच सूत्री मध्य मार्ग का प्रस्ताव दिया था। जिसमें पूरे तिब्बत को शांति क्षेत्र घोषित करने, चीनी मूल के हान वंशियों को कहीं और शिफ्ट करने, तिब्बत में मानवाधिकार, तिब्बत को नाभिकीय कचरे का ठिकाना बनाने से परहेज करने जैसे लीपापोती वाले प्रस्ताव थे। ऐसे प्रस्ताव से तिब्बत स्वतंत्र हो जाएगा, ऐसा दलाई लामा का कोई अंधभक्त ही सोच सकता है।
दलाई लामा कुछ वर्षों से धर्मगुरु का ब्रांड लेकर विचरण करते रहे हैं। लेकिन उनकी धार्मिक यात्रा पर भी चीन को आपत्ति है। बड़ा सवाल यह है कि इस समय सीआईए तिब्बत के मामले में कितना सक्रिय है? और ट्रंप प्रशासन दलाई लामा के बारे में क्या सोचता है? ट्रंप व्यापारी नेता हैं, और वे स्पष्ट कर चुके हैं कि दुनिया का राजनीतिक मानचित्र बदलने के लिए अमेरिकी टैक्स पेयर्स का पैसा अब और नहीं गलाएंगे। दलाई लामा यों भी चीन के विरूद्ध हथियार डाल चुके हैं। एक-दो मौकों पर जब दलाई लामा ने बयान दिया कि वे ‘वन चाइना पॉलिसी’ का समर्थन करते हैं, तो उन बचे-खुचे लोगों को आश्चर्य हुआ, जिन्होंने तिब्बत की आजादी के वास्ते बड़ी कुर्बानियां दी थीं। क्या दलाई लामा बदल चुके हैं? इस प्रश्न पर निष्पक्ष रूप से चिंतन की आवश्यकता है।
 चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने बयान दिया कि दलाई लामा के अरुणाचल दौरे से चीन की ‘वन चाइना पॉलिसी’ को धक्का पहुंचा है, और इससे भारत-चीन संबंध प्रभावित होते हैं। तो क्या हम अरुणाचल की कीमत पर ‘वन चाइना पॉलिसी’ को समर्थन दें? अरुणाचल भारत का अभिन्न अंग है, और रहेगा। भाड़ में जाए वन चाइना पॉलिसी! इसके लिए चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग प्रधानमंत्री मोदी के साथ अगली बार झूला झुलने से मना कर दें, तो उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए।
चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने 6 अप्रैल को नुमाया संपादकीय ‘इंडिया यूज दलाई लामा कार्ड’ को बड़े ही नकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। उसकी टिप्पणी थी, ‘एनएसजी का सदस्य नहीं बन पाने, और यूएन में मसूद अजहर को आतंकी लिस्ट में शामिल न करा पाने का हिसाब भारत दलाई लामा के जरिये चुकता कर रहा है।’ संपादकीय लिखने वाला जैसे सीमा पर खड़ा ललकार रहा हो, ‘अगर नई दिल्ली ‘साइनो-इंडिया’ संबंध को खराब करता है, और दोनों देश प्रतिद्वंद्वी के रूप में आमने-सामने होते हैं, तो क्या भारत उसके दुष्परिणामों को झेल पायेगा? इसलिए राष्ट्रवादी मित्रों, इस देश में सिर्फ एक बार चीनी माल की बिक्री संपूर्ण रूप से बंद करा दीजिए। चीन इस आर्थिक झटके को झेल नहीं पायेगा!

पुष्परंजन
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रविवार, 9 अप्रैल 2017

हार की जीत

 

माँ को अपने बेटे, साहूकार को अपने देनदार और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवत-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाक़े में न था। बाबा भारती उसे “सुलतान” कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, ख़ुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। ऐसे लगन, ऐसे प्यार, ऐसे स्नेह से कोई सच्चा प्रेमी अपने प्यारे को भी न चाहता होगा। उन्होंने अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, रुपया, माल, असबाब, ज़मीन, यहाँ तक कि उन्हें नागरिक जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते थे; परंतु सुलतान से बिछुड़ने की वेदना उनके लिए असह्य थी। मैं इसके बिना नहीं रह सकूँगा, उन्हें ऐसी भ्रांति-सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, ऐसे चलता है जैसे मोर घन-घटा को देखकर नाच रहा हो। गाँवों के लोग इस प्रेम को देखकर चकित थे, कभी-कभी कनखियों से इशारे भी करते थे, परंतु बाबा भारती को इसकी परवा न थी। जब तक संध्या-समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।

खड्गसिंह उस इलाक़े का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुलतान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया।

 

बाबा भारती ने पूछा, “खड्गसिंह, क्या हाल है?”

खड्गसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “आपकी दया है।”


“कहो, इधर कैसे आ गए?”

“सुलतान की चाह खींच लाई।”

 

“विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।”

“मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।”

 

“उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!”

“कहते हैं देखने में भी बहुत सुंदर है।”

 

“क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।”

“बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।”

 

बाबा और खड्गसिंह दोनों अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से। उसने सैकड़ों घोड़े देखे थे, परंतु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुज़रा था। सोचने लगा, भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड्गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात् हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की-सी अधीरता से बोला, “परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?”

बाबा जी भी मनुष्य ही थे। अपनी वस्तु की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर लाए और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे। एकाएक उचककर सवार हो गए। घोड़ा वायु-वेग से उड़ने लगा। उसकी चाल देखकर, उसकी गति देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था और आदमी भी। जाते-जाते उसने कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।”

 

बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती थी। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रतिक्षण खड्गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ लापरवाह हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाई मिथ्या समझने लगे।

संध्या का समय था। बाबा भारती सुलतान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को, और मन में फूले न समाते थे।

 

सहसा एक ओर से आवाज़ आई, “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।”

आवाज़ में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, “क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?”

 

अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामाँवाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।”

“वहाँ तुम्हारा कौन है?”

 

“दुर्गादत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।”

बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे।

 

सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख़ निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड्गसिंह था।

बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, “ज़रा ठहर जाओ।”

 

खड्गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।”

“परंतु एक बात सुनते जाओ।”

 

खड्गसिंह ठहर गया। बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा क़साई की ओर देखता है और कहा, “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड्गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।”

“बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल यह घोड़ा न दूँगा।”

 

“अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।”

खड्गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड्गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, “बाबाजी, इसमें आपको क्या डर है?”

 

सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, “लोगों को यदि इस घटना का पता लग गया तो वो किसी ग़रीब पर विश्वास न करेंगे।”

और यह कहते-कहते उन्होंने सुलतान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही न रहा हो। बाबा भारती चले गए। परंतु उनके शब्द खड्गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाई खिल जाता था। कहते थे, “इसके बिना मैं रह न सकूँगा।” इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुःख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख़याल था कि कहीं लोग ग़रीबों पर विश्वास करना न छोड़ दें। उन्होंने अपनी निज की हानि को मनुषयत्व की हानि पर न्योछावर कर दिया। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है।

 

रात्रि के अंधकार में खड्गसिंह बाबा भारती के मंदिर पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश पर तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड्गसिंह सुलतान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक किसी वियोगी की आँखों की तरह चौपट खुला था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। हानि ने उन्हें हानि की तरफ़ से बे-परवाह कर दिया था। खड्गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे।

अंधकार में रात्रि ने तीसरा पहर समाप्त किया, और चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात्, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर मुड़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँवों को मन-मन-भर का भारी बना दिया। वे वहीं रुक गए।

 

घोड़े ने स्वाभाविक मेघा से अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया।

बाबा भारती दौड़ते हुए अंदर घुसे, और अपने घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे, जैसे बिछुड़ा हुआ पिता चिरकाल के पश्चात् पुत्र से मिलकर रोता है। बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते और कहते थे “अब कोई ग़रीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।”

 

थोड़ी देर के बाद जब वह अस्तबल से बाहर निकले, तो उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। ये आँसू उसी भूमि पर ठीक उसी जगह गिर रहे थे, जहाँ बाहर निकलने के बाद खड्गसिंह खड़ा रोया था।

दोनों के आँसुओं का उसी भूमि की मिट्टी पर परस्पर मिलाप हो गया।

सुदर्शन

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