नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

इक नज़्म मेरी चोरी कर ली कल रात किसी ने!

 

इक नज़्म मेरी चोरी कर ली कल रात किसी ने

यहीं पड़ी थी बालकनी में

 

गोल तपाई के ऊपर थी

व्हिस्की वाले ग्लास के नीचे रखी थी

 

शाम से बैठा,

नज़्म के हल्के-हल्के सिप मैं घोल रहा था होंटों में

 

शायद कोई फ़ोन आया था...

अंदर जाके, लौटा तो फिर नज़्म वहाँ से ग़ायब थी

 

अब्र के ऊपर-नीचे देखा

सुर्ख़ शफ़क़ की जेब टटोली

 

झाँक के देखा पार उफ़क़ के

कहीं नज़र न आई, फिर वो नज़्म मुझे...

 

आधी रात आवाज़ सुनी, तो उठ के देखा

टाँग पे टाँग रखे, आकाश में

 

चाँद तरन्नुम में पढ़-पढ़ के

दुनिया भर को अपनी कह के नज़्म सुनाने बैठा था!

 

गुलज़ार

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