इस घटना का संबंध पिताजी से है। मेरे सपने से है और शहर से भी है।
शहर के प्रति जो एक जन्म-जात भय होता है, उससे भी है।
पिताजी तब पचपन साल के हुए थे। दुबला शरीर। बाल बिलकुल मक्के के भुए
जैसे सफ़ेद। सिर पर जैसे रुई रखी हो। वे सोचते ज़्यादा थे—बोलते बहुत कम। जब बोलते
तो हमें राहत मिलती, जैसे
देर से रुकी हुई साँस निकल रही हो। साथ-साथ हमें डर भी लगता। हम बच्चों के लिए वे
एक बहुत बड़ा रहस्य थे। हमें पता था कि संसार के सारे ज्ञान की तिजोरी उनके पास
है। हम जानते थे कि संसार की सारी भाषाएँ वे बोल सकते हैं। दुनिया उनको जानती है
और हमारी तरह ही उनसे डरती हुई उनका सम्मान करती है।
हमें उनकी संतान होने का गर्व था।
कभी-कभी, वैसे
ऐसा सालों में एकाध बार ही होता,
वे शाम को हमें अपने साथ टहलाने कहीं बाहर ले जाते। चलने से पहले वे
मुँह में तंबाकू भर लेते। तंबाकू के कारण वे कुछ बोल नहीं पाते थे। वे चुप रहते।
यह चुप्पी हमें बहुत गंभीर, गौरवशाली, आश्चर्यजनक और भारी-भरकम लगती। छोटी
बहन कभी उनसे रास्ते में कुछ पूछना चाहती तो फ़ौरन मैं उसका जवाब देने की कोशिश
करता, जिससे पिताजी को
न बोलना पड़े।
वैसे यह काम काफ़ी मुश्किल और जोखिम भरा होता। क्योंकि मैं जानता था
कि अगर मेरा जवाब ग़लत हुआ तो पिताजी को बोलना पड़ जाएगा। बोलने में उन्हें
परेशानी होती थी। एक तो उन्हें तंबाकू की पीक निकालनी पड़ती थी, फिर जिस दुनिया में वे रहते थे, वहाँ से निकलकर यहाँ तक आने में उन्हें
एक कठिन दूरी तय करनी पड़ती थी। वैसे बहन के सवालों में कोई ख़ास बात होती नहीं
थी। जैसे वह यही पूछ लेती कि सामने छिउले की सूखी टहनी पर बैठी उस चिड़िया को क्या
कहते हैं? चूँकि
सारी चिड़ियों को जानता था इसलिए बता सकता था कि वह नीलकंठ है और दशहरे के दिन से
ज़रूर देखना चाहिए। मेरी पूरी कोशिश रहती कि पिताजी को आराम रहे और वे सोचते रहें।
मेरी और माँ की, दोनों
की पूरी कोशिश रहती कि पिताजी अपनी दुनिया में सुख-चैन से रहें। वहाँ से उन्हें
जबरन बाहर न निकाला जाए। वह दुनिया हमारे लिए बहुत रहस्यपूर्ण थी, लेकिन हमारे घर की और हमारे जीवन की
बहुत-सी समस्याओं का अंत पिताजी वहीं रहते हुए करते थे। जैसे जब मेरी फ़ीस की बात
आई, उस समय हमारे
पास का आख़िरी गिलास भी गुम गया था और सब लोग लोटे में पानी पीते थे। पिताजी दो
दिन तक बिलकुल चुप रहे। माँ को भी शक हुआ था कि पिताजी फ़ीस की बात बिलकुल भूल गए
हैं या फिर इसका हल उनके वश की बात नहीं है। लेकिन तीसरे दिन, सुबह-सुबह, पिताजी ने मुझे एक पत्र लिफ़ाफ़े में
रखकर दिया और शहर के डॉक्टर पंत के पास भेजा। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब डॉक्टर ने
मुझे शरबत पिलाई, घर
के भीतर ले जाकर अपने बेटे से परिचय कराया और सौ-सौ के तीन नोट मुझे दिए।
हम पिताजी पर गर्व करते थे, प्यार करते थे, उनसे
डरते थे और उनके होने का अहसास ऐसा था जैसे हम किसी क़िले में रह रहे हों। ऐसा
क़िला, जिसके चारों ओर
गहरी नहरें खुदी हुई हों, बुर्जे
बहुत ऊँची हों, दीवारें
सख़्त लाल चट्टानों की बनी हुई हों और हर बाहरी हमले के सामने हमारा क़िला अभेद्य
हो।
पिताजी एक ख़ूब मज़बूत क़िला थे। उनके परकोटे पर हम सब कुछ भूलकर
खेलते थे, दौड़ते
थे। और, रात में ख़ूब
गहरी नींद मुझे आती थी।
लेकिन उस दिन शाम को,
जब पिताजी बाहर से टहलकर आए तो उनके टख़ने में पट्टी बँधी थी। थोड़ी
देर में गाँव के कई लोग वहाँ आ गए। पता चला कि पिताजी को जंगल में तिरिछ (विषखापर, एक ज़हरीला लिज़ार्ड) ने काट लिया है।
हम सब जानते थे कि तिरिछ के काटने पर आदमी बच ही नहीं सकता। रात में, लालटेन की धुँधली-मटैली रौशनी में गाँव
के बहुत से लोग हमारे आँगन में जमा हो गए थे। पिताजी उनके बीच थे, ज़मीन पर बैठे हुए। फिर पास के गाँव का
चुटुआ नाई भी आया। वह अरंड के पत्ते और कंडे की राख से ज़हर उतारता था।
तिरिछ एक बार मैंने देखा था।
तालाब के किनारे जो बड़ी-बड़ी चट्टानों के ढेर थे, और जो दोपहर में ख़ूब गर्म हो जाते थे, उनमें से किसी चट्टान की दरार से
निकलकर वह पानी पीने तालाब की ओर जा रहा था।
मेरे साथ थानू था। उसने बतलाया कि वह तिरिछ है, काले नाग से सौ गुना ज़्यादा उसमें
ज़हर होता है। उसी ने बताया कि साँप तो तब काटता है, जब उसके ऊपर पैर पड़ जाए या कोई जब ज़बरदस्ती उसे तंग करे। लेकिन
तिरिछ तो नज़र मिलते ही दौड़ता है। पीछे पड़ जाता है। उससे बचने के लिए कभी सीधे
नहीं भागना चाहिए। टेढ़ा-मेढ़ा,
चक्कर काटते हुए, गोल-मोल
दौड़ना चाहिए।
दरअसल जब आदमी भागता है तो ज़मीन पर वह सिर्फ़ अपने पैरों के निशान
ही नहीं छोड़ता, बल्कि
हर निशान के साथ, वहाँ
की धूल में, अपनी
गंध भी छोड़ जाता है। तिरिछ इसी गंध के सहारे दौड़ता है। थानू ने बतलाया कि तिरिछ
को चकमा देने के लिए आदमी को यह करना चाहिए कि पहले तो वह बिलकुल पास-पास क़दम
रखकर, जल्दी-जल्दी कुछ
दूर दौड़े फिर चार-पाँच बार ख़ूब लंबी-लंबी छलाँग दे। तिरिछ सूँघता हुआ दौड़ता
आएगा, जहाँ पास-पास
पैर के निशान होंगे, वहाँ
उसकी रफ़्तार ख़ूब तेज़ हो जाएगी और जहाँ से आदमी ने छलाँग मारी होगी, वहाँ आकर वह उलझन में पड़ जाएगा। वह
इधर-उधर तब तक भटकता रहेगा जब तक उसे अगले पैर का निशान और उसमें बसी गंध नहीं मिल
जाती।
हमें तिरिछ के बारे में दो बातें और पता थीं। एक तो यह कि जैसे ही वह
आदमी को काटता है, वैसे
ही वह वहाँ से भागकर किसी जगह पेशाब करता है और उस पेशाब में लोट जाता है। अगर
तिरिछ ने ऐसा कर लिया तो आदमी बच नहीं सकता। अगर उसे बचना है तो तिरिछ के पेशाब
में लोटने के पहले ही, ख़ुद
किसी नदी, कुएँ
या तालाब में डुबकी लगा लेनी चाहिए या फिर तिरिछ के ऐसा करने के पहले ही उसे मार
देना चाहिए।
दूसरी बात यह कि तिरिछ काटने के लिए तभी दौड़ता है, जब उससे नज़र टकरा जाए। अगर तिरिछ को
देखो तो उससे कभी आँख मत मिलाओ। आँख मिलते ही वह आदमी की गंध पहचान लेता है और फिर
पीछे लग जाता है। फिर तो आदमी चाहे पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा ले, तिरिछ पीछे-पीछे आता है।
मैं भी तमाम बच्चों की तरह उस समय तिरिछ से बहुत डरता था। मेरे
दुःस्वप्न के सबसे ख़तरनाक पात्र दो ही थे—एक हाथी और दूसरा तिरिछ। हाथी तो फिर भी
दौड़ता-दौड़ता थक जाता था और मैं पेड़ पर चढ़कर बच जाता था, या फिर उड़ने लगता था, लेकिन तिरिछ उसके सामने तो मैं किसी
इंद्रजाल में बँध जाता था। मैं सपने में कहीं जा रहा होता तो अचानक ही किसी जगह वह
मिल जाता, उसकी
जगह तय नहीं होती थी। कोई ज़रूरी नहीं था कि वह चट्टानों की दरार में, पुरानी इमारतों के पिछवाड़े या किसी
झाड़ी के पास दिखे—वह मुझे बाज़ार में, सिनेमा हाल में, किसी
दुकान या मेरे कमरे में ही दिख सकता था।
मैं सपने में कोशिश करता कि उससे नज़र न मिलने पाए, लेकिन वह इतनी परिचित आँखों से मुझे
देखता कि मैं अपने-आपको रोक नहीं पाता था और बस, आँख मिलते ही उसकी नज़र बदल जाती थी—वह दौड़ता था और मैं भागता था।
मैं गोल-गोल चक्कर लगाता, जल्दी-जल्दी पास-पास डग भरकर अचानक ख़ूब लंबी-लंबी छलाँगें लगाने
लगता, उड़ने की कोशिश
करता, किसी ऊँची जगह
पर चढ़ जाता, लेकिन
मेरी हज़ार कोशिशों के बावजूद वह चकमा नहीं खाता था। वह मुझे बहुत घाघ, समझदार, चतुर और ख़तरनाक लगता। मुझे लगता कि वह मुझे ख़ूब अच्छी तरह से जानता
है। उसकी आँखों में मेरे लिए परिचय की जो चमक थी, उससे मुझे लगता कि वह मेरा ऐसा शत्रु है जिसे मेरे दिमाग़ में आने
वाले हर विचार के बारे में पता है।
मेरा सबसे ख़ौफ़नाक,
यातनादायक, भयाक्रांत
और बेचैनी से भरा यही सपना था। भागते-भागते मेरा पूरा शरीर थक जाता, फेफड़े फूल जाते, मैं पसीने में लथ-पथ होकर बेदम होने
लगता और एक बहुत ही डरावनी, सुन्न
कर डालने वाली मृत्यु मेरे बिलकुल क़रीब आने लगती। मैं ज़ोरों से चीख़ता, रोने लगता। पिताजी को, थानू को या माँ को पुकारता और फिर मैं
जान जाता कि यह सपना है। लेकिन यह पता चल जाने के बावजूद मैं अच्छी तरह से जानता
कि तब भी मैं अपनी इस मृत्यु से नहीं बच सकता। मृत्यु नहीं—तिरिछ द्वारा अपनी
हत्या से-और ऐसे में मैं सपने में ही कोशिश करता कि किसी तरह मैं जाग जाऊँ। मैं
पूरी ताक़त लगाता, सपने
के भीतर आँखें खोलकर फाड़ता, रौशनी
को देखने की कोशिश करता और ज़ोर से कुछ बोलता। कई बार बिलकुल ऐन मौक़े पर मैं
जागने में सफल भी हो जाता।
माँ बतलाती कि मुझे सपने में बोलने और चीख़ने की आदत है। कई बार
उन्होंने मुझे नींद में रोते हुए भी देखा था। ऐसे में उन्हें मुझे जगा डालना चाहिए, लेकिन वे मेरे माथे को सहला कर मुझे
रज़ाई से ढक देती थीं और मैं उसी ख़ौफ़नाक दुनिया में अकेला छोड़ दिया जाता था।
अपनी मृत्यु-बल्कि अपनी हत्या से बचने की कमज़ोर कोशिश में भागता, दौड़ता चीख़ता।
वैसे, धीरे-धीरे
मैंने अनुभवों से यह जान लिया था कि आवाज़ ही ऐसे मौक़े पर मेरा सबसे बड़ा अस्त्र
है, जिससे मैं तिरिछ
से बच सकता था। लेकिन दुर्भाग्य से,
हर बार, इस
अस्त्र की याद मुझे बिलकुल अंतिम समय पर आती थी। तब, जब वह मुझे बिलकुल पा लेने वाला होता। अपनी हत्या की साँसें मुझे
छूने लगतीं, मौत
के नशे से भरे एक निर्जीव लेकिन डरावने अँधेरे में मैं घिर जाता, लगता मेरे नीचे कोई ठोस आधार नहीं
है−मैं हवा में हूँ और वह पल आ जाता, जब मेरे जीवन का अंत होने वाला होता। तभी, बिलकुल इसी एक बहुत ही छोटे और नाज़ुक
पल में मुझे अपने इस अस्त्र की याद आती और मैं ज़ोर-ज़ोर से बोलने लगता और इस
आवाज़ के सहारे मैं सपने से बाहर निकल आता। मैं जाग जाता।
कई बार माँ मुझसे पूछतीं भी कि मुझे क्या हो गया था। तब मेरे पास
इतनी भाषा नहीं थी कि मैं उन्हें सब कुछ, एक-एक चीज़ उसी तरह बता पाता। अपनी इस असमर्थता के बारे में मुझे
ख़ूब पता था और इसी वजह से मैं एक अजीब-से तनाव, बेचैनी और असहायता से भर जाता। अंत में हारकर इतना ही कह पाता कि
“बहुत डरावना सपना था।”
जाने क्यों मुझे शक था कि पिताजी को उसी तिरिछ ने काटा था, जिसे मैं पहचानता था और जो मेरे सपने
में आता था।
लेकिन एक अच्छी बात यह हुई थी कि जैसे ही वह तिरिछ पिताजी को काटकर
भागा, पिताजी ने उसका
पीछा करके उसे मार डाला था। तय था कि अगर वे फ़ौरन उसे नहीं मार पाते तो वह पेशाब
करके उसमें ज़रूर लोट जाता। फिर पिताजी किसी हाल में न बचते। यही वजह थी कि पिताजी
को लेकर मुझे उतनी चिंता नहीं रह गई थी। बल्कि एक तरह की राहत और मुक्ति की ख़ुशी
मेरे भीतर धीरे-धीरे पैदा हो रही थी। कारण, एक तो यही कि पिताजी ने तिरिछ को तुरंत मार डाला था और दूसरा यह कि
मेरा सबसे ख़तरनाक, पुराना
परिचित शत्रु आख़िरकार मर चुका था। उसका वध हो गया था और अब मैं अपने सपने के भीतर, कहीं भी, बिना किसी डर के सीटी बजाता घूम सकता था।
उस रात देर तक हमारे आँगन में भीड़ रही आई। पिताजी की झाड़-फूँक चलती
रही। काटे के ज़ख़्म को चीर कर ख़ून भी बाहर निकाला गया और कुएँ में डालने वाली
लाल दवा (पोटेशियम परमैंगनेट) ज़ख़्म में भरा गया। मैं निश्चिंत था।
अगली सुबह पिताजी को शहर जाना था। अदालत में पेशी थी। उनके नाम सम्मन
आया था। हमारे गाँव से लगभग दो किलोमीटर दूर से निकलने वाली सड़क से शहर के लिए
बसें गुज़रती थीं। उनकी संख्या दिन भर में मुश्किल से दो या तीन थी। ग़नीमत थी कि
पिताजी जैसे ही सड़क तक पहुँचे,
शहर जाने वाला पास के गाँव का एक ट्रैक्टर उन्हें मिल गया। ट्रैक्टर
में बैठे हुए लोग पहचान के थे। ट्रैक्टर दो-ढाई घंटे में शहर पहुँच जाने वाला था।
यानी अदालत खुलने से काफ़ी पहले।
रास्ते में तिरिछ वाली बात चली। पिताजी ने अपना टख़ना उन लोगों को
दिखलाया। ट्रैक्टर में पंडित राम औतार भी थे। उन्होंने बतलाया कि तिरिछ के ज़हर की
एक ख़ासियत यह भी है कि कभी-कभी यह चौबीस घंटे बाद, ठीक उसी वक़्त, जिस
वक़्त पिछले दिन तिरिछ काटता है,
अपना असर दिखाता है। इसलिए अभी पिताजी को निश्चिंत नहीं होना चाहिए।
ट्रैक्टर के लोगों ने पिताजी का ध्यान एक और बड़ी ग़लती की ओर खींचा। उनका कहना था
कि यह तो पिताजी ने बहुत ठीक किया कि तिरिछ को फ़ौरन मार डाला, लेकिन इसके बाद भी तिरिछ को यूँही नहीं
छोड़ देना चाहिए था। उसे कम-से-कम जला ज़रूर देना चाहिए था।
उन लोगों का कहना था कि बहुत-से कीड़े-मकोड़े और जीव-जंतु रात में
चंद्रमा की रौशनी में दुबारा जी उठते हैं। चाँदनी में जो ओस और शीत होती है उसमें
अमृत होता है और कई बार ऐसा देखा गया है कि जिस साँप को मरा हुआ समझकर रात में यूँ
ही फेंक दिया जाता है, उसका
शरीर चाँद की शीत में भीग कर दुबारा जी उठता है और वह भाग जाता है। फिर वह हमेशा
बदला लेने की ताक में रहता है।
ट्रैक्टर के लोगों को शक था कि कहीं ऐसा न हो कि रात में जी उठने के
बाद तिरिछ पेशाब करके उसमें लोट जाए। ऐसा हुआ तो चौबीस घंटे बीतते-बीतते, ठीक उसी घड़ी के आने पर, तिरिछ का जानलेवा ज़हर पिताजी पर चढ़ना
शुरू हो जाएगा। उन लोगों ने सलाह भी दी कि पिताजी को वहीं से वापस लौट जाना चाहिए
और अगर संयोग से, उस
तिरिछ की लाश उसी जगह पड़ी हुई हो,
तो उसे अच्छी तरह जलाकर राख कर देना चाहिए। लेकिन पिताजी ने उन्हें
बताया कि पेशी कितनी ज़रूरी थी। यह तीसरा सम्मन थी। और अगर इस बार भी वे अदालत में
हाज़िर न हुए तो ग़ैर-ज़मानती वारंट निकलने का डर था। पेशी भी हमारे उसी मकान को
लेकर थी, जिसमें हमारा
परिवार रह रहा था। वकील को पिछले दो बार की पेशी में फ़ीस भी नहीं दी जा सकी थी और
कहीं अगर उसने लापरवाही दिखला दी और जज सनक गया तो वह हमारी कुड़की-डिक्री भी करवा
सकता था।
विचित्र स्थिति थी कि अगर पिताजी उस तिरिछ की लाश को जलाने के लिए
ट्रैक्टर से उतरकर, वहीं
से, गाँव लौट आते तो
ग़ैरज़मानती वारंट के तहत वे गिरफ़्तार कर लिए जाते और हमारा घर हमसे छिन जाता।
अदालत हमारे ख़िलाफ़ हो जाती।
लेकिन पंडित राम औतार एक वैद्य भी थे। ज्योतिष पंचांग के अलावा
उन्हें जड़ी-बूटियों की भी बड़ी गहरी जानकारी थी। उन्होंने सुझाया कि एक तरीक़ा
ऐसा है, जिससे पिताजी
पेशी में हाज़िर भी हो सकते हैं और तिरिछ के ज़हर से चौबीस घंटे के बाद बच भी सकते
हैं। उन्होंने बताया कि चरक का निचोड़ इस सूत्र में है कि विष ही विष की औषधि होता
है। अगर धतूरे के बीज कहीं मिल जाएँ तो वह तिरिछ के ज़हर की काट तैयार कर सकते
हैं।
अगले गाँव सामतपुर में ट्रैक्टर रोक दिया गया और एक तेली के खेत में
धतूरे के पौधे आख़िरकार खोज निकाले गए। धतूरे के बीजों को पीसकर उसे ताँबे के
पुराने सिक्के के साथ उबालकर काढ़ा तैयार किया गया। काढ़ा बहुत कड़वा था इसलिए उसे
चाय में मिलाया गया और पिताजी को वह चाय पिला दी गई। इसके बाद सभी निश्चिंत हो गए।
एक बहुत बड़े ख़तरे से पिताजी को निकालने की कोशिश हो रही थी।
वैसे मुझे तिरिछ के बारे में तीसरी बात भी पता थी, जो पिताजी के जाने के कई घंटे बाद
अचानक याद आ गई थी। यह बात साँप की उस बात से मिलती-जुलती थी, जिसके फलस्वरूप आगे चलकर कैमरे का
आविष्कार हुआ था।
माना यह जाता था कि अगर कोई आदमी साँप को मार रहा हो तो अपने मरने से
पहले वह साँप, अंतिम
बार, अपने हत्यारे के
चेहरे को पूरी तरह से, बहुत
ग़ौर से देखता है। आदमी उसकी हत्या कर रहा होता है और साँप टकटकी बाँधकर उस आदमी
के चेहरे की एक-एक बारीकी को अपनी आँख के भीतरी पर्दे में दर्ज कर रहा होता है।
साँप की मृत्यु के बाद साँप की आँख के भीतरी पर्दे पर उस आदमी का चित्र स्पष्ट
दर्ज हो जाता है।
बाद में, आदमी
के जाने के बाद, उस
साँप का दूसरा जोड़ा जाकर उस मरे हुए साँप की आँख के भीतर झाँकता है और इस तरह वह
हत्यारा पहचान लिया जाता है। सारे साँप उसे पहचानने लगते हैं। फिर वह कहीं भी चला
जाए, उससे बदला लेने
की फ़िराक़ में वे रहते हैं। हर साँप उसका शत्रु होता है।
मुझे शक था कि मरे हुए तिरिछ की आँख के भीतरी पर्दे पर पिताजी का
चेहरा दर्ज होगा। कोई दूसरा तिरिछ आकर उस लाश की आँख में से झाँकेगा और पिताजी
वहाँ पहचान लिए जाएँगे। मेरे भीतर इस बात को लेकर बेचैनी पैदा हुई कि पिताजी ने यह
सतर्कता क्यों नहीं बरती? उन्हें
तिरिछ को मारने के साथ ही किसी पत्थर से उसकी दोनों आँखों को कुचलकर फोड़ देना
चाहिए था। लेकिन अब क्या हो सकता था? पिताजी शहर जा चुके थे और मेरे सामने उलझन और चुनौती थी कि गाँव के
पास फैले इतने बड़े जंगल में जिस जगह तिरिछ को मारकर उन्होंने छोड़ा था, वह जगह मैं खोज निकालूँ।
मैं थानू के साथ बोतल में मिट्टी का तेल, दियासलाई और डंडा लेकर जंगल में तिरिछ
की खोज में भटकता रहा। मैं उसे अच्छी तरह से पहचानता था। बहुत अच्छी तरह। थानू
निराश था।
फिर, मुझे
अचानक ही लगने लगा कि इस जंगल को मैं अच्छी तरह से जानता हूँ। एक-एक पेड़ मेरा
परिचित निकलने लगा। इसी जगह से कई बार सपने में मैं तिरिछ से बचने के लिए भागा था।
मैंने ग़ौर से हर तरफ़ देखा—बिलकुल यही वह जगह थी। मैंने थानू को बताया कि एक
सँकरा-सा नाला इस जगह से कितनी दूर दक्षिण की तरफ़ बहता है। नाले के ऊपर जहाँ
बड़ी-बड़ी चट्टानें हैं, वहाँ
कीकर का एक बहुत पुराना पेड़ है,
जिस पर बड़े-बड़े शहद के छत्ते हैं। उन्हें देखकर लगता है कि वे कई
शताब्दियों पुराने हैं। मैं उस भूरे रंग की चट्टान को जानता था, जो बरसात भर नाले के पानी में आधी डूबी
रहती थी और बारिश के बीतने के बाद जब बाहर निकलती थी तो उसकी खोहों में कीचड़ भर
जाती थी और अजीब-अजीब वनस्पतियाँ वहाँ से उग आती थीं। चट्टान के ऊपर हरी काई की एक
पर्त-सी जम जाती थी। इसी चट्टान की सबसे ऊपर वाली दरार में तिरिछ रहता था। थानू इस
बात को मेरी कल्पना मान रहा था।
लेकिन बहुत जल्द हमें वह नाला मिल गया। कीकर का वह बूढ़ा पेड़ भी, जिस पर शहद के छत्ते थे, और वह चट्टान भी। तिरिछ की लाश चट्टान
से ज़रा हटकर, ज़मीन
पर, घास के ऊपर
चित्त पड़ी हुई थी। बिलकुल यह वही तिरिछ था। मेरे भीतर हिंसा और उत्तेजना और ख़ुशी
की एक सनसनी दौड़ रही थी।
थानू ने और मैंने सूखे पत्ते और लकड़ियाँ इकट्ठी की, ख़ूब सारा मिट्टी का तेल उसमें डाला और
आग लगा दी। तिरिछ उसमें जल रहा था। उसके जलने की चिरायंध गंध हवा में फैल रही थी।
मेरा मन ज़ोर से चिल्लाने को हुआ लेकिन मैं डरा कि कहीं मैं जाग न जाऊँ और यह सब
कुछ सपना न साबित हो जाए। मैंने थानू की ओर देखा। वह रो रहा था। वह मेरा बहुत
अच्छा दोस्त था।
मेरे सपने में इसी जगह से निकलकर उस तिरिछ ने कई बार मेरा पीछा करना
शुरू किया था। आश्चर्य था कि इतने लंबे अर्से से उसके अड्डे को इतनी अच्छी तरह से
जानने के बावजूद कभी दिन में आकर मैंने उसे मारने की कोई कोशिश नहीं की थी।
मैं आज बेतहाशा ख़ुश था।
पंडित राम औतार ने बतलाया था कि ट्रैक्टर ने पौने दस बजे के लगभग शहर
का चुंगीनाका पार किया था। वहाँ उन्हें नाके का टोल टैक्स चुकाने के लिए कुछ देर
रुकना भी पड़ा था। वहाँ पर पिताजी ट्रैक्टर से उतरकर पेशाब करने गए थे। लौटने पर
उन्होंने बताया था कि उनका सिर कुछ घूम-सा रहा है, तब तक पिताजी को धतूरे का काढ़ा पिए हुए तक़रीबन डेढ़ घंटा हो चुका
था। ट्रैक्टर ने पिताजी को शहर में दस बजकर पाँच-सात मिनट के आसपास छोड़ दिया था।
ट्रैक्टर में ही बैठे पलड़ा गाँव के मास्टर नंदलाल का कहना था कि जब शहर में, मिनर्वा टाकीज के पास वाले चौराहे पर
पिताजी को ट्रैक्टर से उतारा गया,
तब उन्होंने शिकायत की थी कि उनका गला कुछ सूख-सा रहा है। वे थोड़ा
परेशान भी थे क्योंकि अदालत जाने का रास्ता उन्हें मालूम नहीं था और शहर के लोगों
से पूछ-पूछकर कहीं जाने में उन्हें बहुत तकलीफ़ होती थी।
पिताजी के साथ एक दिक़्क़त यह भी थी कि गाँव या जंगल की पगडंडियाँ तो
उन्हें याद रहती थीं, शहर
की सड़कों को वे भूल जाते थे। शहर वे बहुत कम जाते थे। जाना ही पड़े तो अंतिम समय
तक वे टालते रहते थे, तब
तक, जब तक जाना
बिलकुल ही ज़रूरी न हो जाए। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि पिताजी सारा सामान लेकर शहर
के लिए रवाना हुए और बस अड्डे से लौट आए। बहाना यह कि बस छूट गई। जब कि हम सब
जानते थे कि ऐसा नहीं हुआ होगा। पिताजी ने बस को देखा होगा, फिर वे कहीं बैठ गए होंगे—पेशाब करने
या पान खाने। फिर उन्होंने देखा होगा कि बस छूट रही है। उन्होंने ज़रा-सा और
इंतिज़ार किया होगा। जब बस ने रफ़्तार पकड़ ली होगी—तब वे कुछ दूर तक दौड़े होंगे।
फिर उनके क़दम धीमे पड़ गए होंगे और अफ़सोस और ग़ुस्सा प्रकट करते वे लौट आए
होंगे। ऐसा करते हुए उन्हें स्वयं भी लगा होगा कि बस सचमुच छूट गई है। ऐसे में, जबकि हम मान चुके होते कि वे शहर जा
चुके हैं, वह
लौटकर हमें चकित कर देते।
ट्रैक्टर से मिनर्वा टाकीज के पास वाले चौराहे पर, सिंध वाच कंपनी के ठीक सामने लगभग दस
बज कर सात मिनट पर उतरने के बाद से लेकर शाम छह बजे तक पिताजी के साथ शहर में जो
कुछ भी हुआ, उसका
सिर्फ़ एक धुँधला-सा अनुमान ही लगाया जा सकता है। यह जानकारी भी कुछ लोगों से
बातचीत और पूछताछ के बाद मिली है। किसी की भी मृत्यु के बाद, अगर वह मृत्यु बहुत आकस्मिक और
अस्वाभाविक ढंग से हुई हो, ऐसी
जानकारियाँ मिल ही जाती है। उस दिन,
बुधवार 17 मई, 1972
को सुबह दस-दस से लेकर शाम छह बजे तक, लगभग पौने आठ घंटे में पिताजी कहाँ-कहाँ गए, कहाँ-कहाँ उनके साथ क्या-क्या हुआ, इसका बहुत सही और विस्तृत ब्यौरा तो
मिलना मुश्किल है। जो सूचनाएँ या जानकारियाँ बाद में मिली, उनके ज़रिए उन घटनाओं का सिर्फ़ अनुमान
ही लगाया जा सकता है।
जैसा कि पलड़ा गाँव के मास्टर नंदलाल का कहना था कि जब पिताजी
ट्रैक्टर से उतरे, तभी
उन्होंने गला सूखने की शिकायत की थी। इसके पहले चुंगीनाका के पास, जब पेशाब करके पिताजी लौटे थे तो
उन्होंने सिर घूमने की बात की थी। यानी पिताजी पर धतूरे के बीजों के काढ़े का असर
होना शुरू हो गया था। वैसे भी शहर पहुँचने तक पिताजी को काढ़ा पिए हुए लगभग दो
घंटे हो चुके थे। मेरा अनुमान है कि उस समय पिताजी को प्यास बहुत लगी होगी। गला
भिगाने के लिए वे किसी होटल या ढाबे की तरफ़ गए भी होंगे, लेकिन जैसा कि मुझे उनके स्वभाव के
बारे में पता है, वे
वहाँ कुछ देर खड़े रहे होंगे, और
फिर एक गिलास पानी माँगने का फैसला न कर सके होंगे। एक बार उन्होंने बताया भी था
कि कुछ साल पहले गर्मियों के दिनों में जब उन्होंने किसी होटल में पानी माँगा था, तो वहाँ काम करने वाले नौकर ने उन्हें
गाली दी थी। पिताजी बहुत संवेदनशील थे, इसलिए उन्होंने अपनी प्यास को दबाया होगा और वे वहाँ से चल पड़े
होंगे।
सवा दस से लेकर लगभग ग्यारह बजे के बीच, पैंतालीस मिनट तक पिताजी कहाँ-कहाँ गए, इसकी कोई जानकारी कहीं से नहीं मिलती।
इस बीच ऐसी कोई ख़ास घटना भी नहीं हुई, जिससे कोई कुछ कह सके। फिर शहर में सड़क पर आते-जाते लोगों में से
किसी ने उन पर ध्यान दिया हो, उन्हें
देखा हो, इसका पता लगाना
भी मुश्किल है। वैसे मेरा अपना अंदाज़ा है कि इस बीच पिताजी ने कुछ लोगों से अदालत
जाने का रास्ता पूछा होगा और उनके दिमाग़ में यह बात भी रही होगी कि वहाँ पहुँचकर
वे अपने वकील एस.एन. अग्रवाल से पानी माँग लेंगे। लेकिन उनके पूछने पर या तो लोग
चुप रह कर तेज़ी से आगे बढ़ गए होंगे या किसी ने इतनी बौखलाहट और जल्दबाज़ी में
उन्हें कुछ बताया होगा, जो
पिताजी ठीक से समझ नहीं सके होंगे और सिर्फ़ अपमानित, दुःखी और परेशान होकर रह गए होंगे। शहर
में ऐसा होता ही है।
वैसे बीच के पौन घंटे के बारे में मेरा अपना अनुमान है कि इस बीच
पिताजी पर काढ़े का असर काफी बढ़ गया होगा। मई की धूप और प्यास ने इस असर को और भी
तेज, और भी गहरा कर
दिया होगा। उनके पैर लड़खड़ाने भी लगे होंगे और बहुत संभव है कि एकाध बार, इस बीच, उन्हें चक्कर भी आ गए हों।
पिताजी ग्यारह बजे,
शहर में देशबंधु मार्ग पर स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की इमारत में
घुसे थे। वे वहाँ क्यों गए, इसकी
वजह ठीक-ठीक समझ में नहीं आती। वैसे हमारे गाँव का रमेश दत्त शहर में भूमि विकास
सहकारी बैंक में क्लर्क है। हो सकता है पिताजी के दिमाग में सिर्फ बैंक रहा हो और
यहाँ से गुज़रते हुए अचानक उन्होंने स्टेट बैंक लिखा हुआ देखा हो और वे उधर घूम गए
हों। उन्होंने अब तक पानी नहीं पिया था इसलिए उन्होंने सोचा होगा कि वे रमेश दत्त
से पानी भी माँग लेंगे, अदालत
जाने का रास्ता भी पूछ लेंगे और बता सकेंगे कि उनका सिर घूम-सा रहा है, यह भी कि कल शाम उन्हें तिरिछ ने काटा
था। स्टेट बैंक के कैशियर अग्निहोत्री के अनुसार वह उस समय कैश रजिस्ट्री चेक कर
रहा था। उसकी मेज़ पर लगभग अट्ठाइस हजार रुपयों की गड्डियाँ रखी हुई थीं। उस वक्त
ग्यारह से दो-तीन मिनट ऊपर हुए होंगे, तभी पिताजी वहाँ आए। उनके चेहरे पर धूल लगी हुई थी, चेहरा डरावना था और अचानक ही उन्होंने
जोर से कुछ कहा था। अग्निहोत्री का कहना था कि मैं अचानक डर गया। अमूमन ऐसे लोग
बैंक के इतने भीतर, कैशियर
की टेबिल तक नहीं पहुँच पाते। अग्निहोत्री का कहना यह भी था कि अगर वह पिताजी को
एकाध मिनट पहले से अपनी ओर आता हुआ देख लेता, तब शायद न डरता। लेकिन हुआ यह कि वह पूरी तरह से कैश रजिस्टर के
हिसाब-किताब में डूबा हुआ था, तभी
अचानक ही पिताजी ने आवाज़ निकाली और सिर उठाते ही उन्हें देखकर वह डर गया और चीख
पड़ा। उसने घंटी भी बजा दी।
बैंक के चपरासियों,
दो चौकीदारों और दूसरे कर्मचारियों के अनुसार अचानक ही कैशियर की चीख
और घंटी की आवाज से वे सब लोग चौंक गए और उस तरफ दौड़े, तब तक नेपाली चौकीदार थापा ने पिताजी
को दबोच लिया था और मारता हुआ कॉमन रूप की तरफ़ ले जा रहा था। एक चपरासी रामकिशोर, जिसकी उम्र पैंतालीस के आस-पास थी, ने कहा कि उसने समझा कि कोई शराबी
दफ़्तर में घुस आया है, या
पागल और चूँकि उसकी ड्यूटी बैंक के मुख्य दरवाज़े पर थी इसलिए ब्रांच मैनेजर उसे
चार्जशीट कर सकता था। लेकिन हुआ यह कि जब पिताजी को मारा जा रहा था, तभी उन्होंने अंग्रेजी में कुछ बोलना
शुरू कर दिया। इसी वजह से चपरासियों का शक बढ़ गया। इसी बीच शायद असिस्टेंट ब्रांच
मैनेजर मेहता ने यह कह दिया कि इस आदमी की अच्छी तरह से तलाशी ले लेना तभी बाहर
निकलने देना। वैसे चपरासी रामकिशोर का कहना था कि पिताजी का चेहरा अजीब तरह से
डरावना हो गया था। उस पर धूल जमा हो गई थी और उल्टी की बास आ रही थी। बैंक के
चपरासियों ने पिताजी को ज़्यादा मारने-पीटने की बात से इनकार किया, लेकिन बैंक के बाहर, ठीक दरवाज़े के पास जो पान की दुकान है, उसमें बैठने वाले बुन्नू का कहना था कि
जब साढ़े ग्यारह बजे के आस-पास पिताजी बैंक से बाहर आए तो उनके कपड़े फटे हुए थे
और निचला होंठ कट गया था, जहाँ
से ख़ून निकल रहा था। आँखों के नीचे सूजन और कत्थई चकत्ते थे। ऐसे चकत्ते बाद में
बैंगनी या नीले पड़ जाते हैं।
इसके बाद, यानी
साढ़े ग्यारह बजे से लेकर एक बजे के बीच पिताजी कहाँ-कहाँ गए, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती।
हाँ स्टेट बैंक के बाहर पान की दुकान लगाने वाले बुन्नू ने एक बात बताई थी हालाँकि
इस बारे में वह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था, या हो सकता है कि स्टेट बैंक के कर्मचारियों से डर की वजह से वह
साफ़-साफ़ बतलाने से कतरा रहा हो। बुन्नू ने बतलाया था कि स्टेट बैंक से बाहर
निकलने पर शायद (वह ‘शायद’ पर बहुत ज़ोर डाल रहा था) पिताजी ने कहा था कि उनके
रुपए और काग़ज़ात बैंक के चपरासियों ने छीन लिए हैं। लेकिन बुन्नू का कहना था कि
हो सकता है पिताजी ने कोई और बात कही हो, क्योंकि वे ठीक से बोल नहीं पा रहे थे, उनका निचला होंठ काफ़ी कट गया था, मुँह से लार भी बह रही थी और उनका दिमाग़ सही नहीं था।
मेरा अपना अंदाज़ा है कि इस समय तक पिताजी पर काढ़े का असर बहुत
ज़्यादा हो चुका था। हालाँकि पंडित राम औतार इस बात से इनकार करते हैं। उनका कहना
था कि धतूरे के बीज तो होली के दिनों में भाँग के साथ भी घोटे जाते हैं, लेकिन कभी ऐसा नहीं होता कि आदमी पूरी
तरह से पागल हो जाए। पंडित राम औतार का मानना है कि या तो तिरिछ का ज़हर उस समय
पिताजी के शरीर में चढ़ना शुरू हो गया था और उसका नशा उनके दिमाग़ तक पहुँचने लगा
था। या फिर बहुत संभव है कि जब स्टेट बैंक में पिताजी को थापा चौकीदार और
चपरासियों ने मारा-पीटा था तब उनके सिर के पीछे की तरफ़ कोई चोट लग गई हो और उस
धक्के से उनका दिमाग़ सनक गया हो। लेकिन मुझे लगता है कि उस समय तक पिताजी को
थोड़ा-बहुत होश था और वे पूरी कोशिश कर रहे थे कि किसी तरह वे शहर से बाहर निकल
जाएँ। शायद रुपए और अदालत के काग़ज़ात बैंक में छिन जाने की वजह से उन्होंने सोचा
हो कि अब यहाँ रहने का कोई मतलब भी नहीं है। उन्होंने शायद एकाध बार सोचा भी होगा
कि वापस स्टेट बैंक जाकर अपने काग़ज़ात तो कम-से-कम माँग लाएँ। फिर ऐसा करने की
उनकी हिम्मत नहीं पड़ी होगी। वे डर गए होंगे। उन्हें उनके जीवन में पहली बार इस
तरह से मारा गया था, इसलिए
वे ठीक से सोच पाने में सफल नहीं हो पा रहे होंगे। उनका शरीर बहुत दुबला था और
बचपन से ही उन्हें एपेंडिसाइटिस की शिकायत थी। यह भी हो सकता है कि उस वक़्त तक उन
पर काढ़े का असर इतना ज़्यादा हो गया हो कि वे एक चीज़ पर देर तक सोच ही नहीं पा
रहे हों और दिमाग़ में हर पल पैदा होने वाला, छोटे-छोटे बुलबुलों जैसे विचारों या नए-नए झटकों के वश में आकर इधर
से उधर चल पड़ते रहे हों। लेकिन मैं यह जानता हूँ, मुझे अच्छी तरह से महसूस होता है कि उनके दिमाग़ में घर लौट आने और
शहर से बाहर निकल जाने की बात-एक स्थाई, बार-बार कहीं अँधेरे से उभरने वाली, भले ही बहुत क्षीण और बहुत धुँधली बात-ज़रूर रही होगी।
पिताजी लगभग सवा बजे शहर के पुलिस थाना पहुँचे थे। थाना शहर के बाहरी
छोर पर सर्किट हाउस के पास बने विजय स्तंभ के पास है। आश्चर्य यह है कि थाने से
बमुश्किल एक किलोमीटर दूर अदालत भी है। अगर पिताजी चाहते तो यहाँ से पैदल ही दस
मिनट में अदालत पहुँच सकते थे। समझ में यह नहीं आता कि पिताजी अगर यहाँ तक पहुँचे
थे, क्या तब तक उनके
दिमाग़ में अदालत जाने की बात रह भी गई थी? उनके काग़ज़ात तो रह नहीं गए थे।
थाने के एस.एच.ओ. राघवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि उस वक़्त एक बजकर
पंद्रह मिनट हुए थे। वे घर से लाए गए टिफ़िन को खोलकर लंच लेने की तैयारी कर रहे
थे। आज टिफ़िन में पराठों के साथ करेले रखे हुए थे। करेले वे खा नहीं पाते और इसी
उलझन में थे कि अब क्या करें। तभी पिताजी वहाँ आए थे। उनके शरीर पर क़मीज़ नहीं थी, पैंट फटी हुई थी। लगता था कि वे कहीं
गिरे होंगे या किसी वाहन ने उन्हें टक्कर मारी होगी। थाने में उस वक़्त एक ही
सिपाही गजाधर प्रसाद शर्मा मौजूद था। सिपाही का कहना था कि उसने सोचा कि शायद कोई
भिखमंगा थाने में घुस आया है। उसने आवाज़ भी दी लेकिन पिताजी तब तक एस.एच.ओ.
राघवेंद्र प्रताप सिंह की टेबिल तक पहुँच चुके थे। एस.एच.ओ. ने कहा कि करेलों की
वजह से वैसे भी उनका मूड ऑफ़ था। तेरह साल के विवाहित जीवन के बावजूद पत्नी यह
नहीं जान पाई थी कि उन्हें कौन-सी चीज़ें बिलकुल नापसंद हैं, इतनी नापसंद कि वे उन चीज़ों से घृणा
करते हैं। उन्होंने जैसे ही निवाला मुँह में रखा, पिताजी बिलकुल उनके क़रीब पहुँच गए। पिताजी के चेहरे और कंधों के
नीचे उल्टी लगी हुई थी और उसकी बहुत तेज़ गंध उठ रही थी। एस.एच.ओ. ने पूछा कि क्या
बात है। तो जवाब में पिताजी ने जो कुछ कहा उसे समझना बहुत मुश्किल था। एस.एच.ओ.
राघवेंद्र सिंह बाद में पछता रहे थे कि अगर उन्हें मालूम होता कि यह आदमी बकेली
ग्राम का प्रधान और भूतपूर्व अध्यापक है तो वे उसे थाने में ही कम-से-कम दो-चार
घंटे बिठा लेते। बाहर न जाने देते। लेकिन उस समय उन्हें लगा कि यह कोई पागल है और
उन्हें खाते हुए देखकर यहाँ तक घुस आया है इसीलिए उन्होंने सिपाही गजाधर शर्मा को
ग़ुस्से में आवाज़ दी। सिपाही पिताजी को घसीटता हुआ बाहर ले गया। गजाधर शर्मा का
कहना था कि उसने पिताजी के साथ कोई मार-पीट नहीं की और उसने देखा था कि जब वे थाने
आए थे तब उनका निचला होंठ कटा था। ठुड्डी पर कहीं रगड़ा खाकर गिरने से खरोंच के
निशान थे और कुहनियाँ छिली हुई थीं। वे कहीं-न-कहीं गिरे ज़रूर थे।
यह कोई नहीं जानता कि थाने से निकलकर लगभग डेढ़ घंटे पिताजी
कहाँ-कहाँ भटकते रहे। सुबह दस बजकर सात मिनट पर, जब वे शहर आए थे और मिनर्वा टाकीज के पास वाले चौराहे पर ट्रैक्टर से
उतरे थे, तब से लेकर अब
तक उन्होंने कहीं पानी पिया था या नहीं, इसे जानना मुश्किल है। इसकी संभावना भी कम ही बनती है। हो सकता है तब
तक उनका दिमाग़ इस क़ाबिल न रह गया हो कि वे प्यास को भी याद रख सकें। लेकिन अगर
वे पुलिस थाने तक पहुँचे तो उनके मस्तिष्क में, नशे के बावजूद, कहीं
बहुत कमज़ोर-सा, अँधेरे
में डूबा यह ख़याल रहा होगा कि वे किसी तरह अपने गाँव जाने का रास्ता वहाँ पूछ लें, या उस ट्रैक्टर का पता पूछे या फिर
अपने रुपए और अदालती काग़ज़ात छिन जाने की रिपोर्ट वहाँ लिखा दें। यह सोचने के
क़रीब पहुँचना ही बुरी तरह से बेचैन कर डालने वाला है कि उस समय पिताजी सिर्फ़
तिरिछ के ज़हर और धतूरे के नशे के ख़िलाफ़ ही नहीं लड़ रहे थे, बल्कि हमारे मकान को बचाने की चिंता भी
कहीं-न-कहीं उनके नशे की नींद में से बार-बार सिर उठा रही थी। शायद उन्हें अब तक
यह लगने लगा हो कि यह सब कुछ जो हो रहा है, सिर्फ़ एक सपना है,
पिताजी इससे जागने और बाहर निकलने की कोशिश भी करते रहे होंगे।
सवा दो बजे के आस-पास पिताजी को शहर के बिलकुल उत्तरी छोर पर बसी
सबसे संपन्न कॉलोनी-इतवारी कॉलोनी में घिसटते हुए देखा गया था। यह कॉलोनी सर्राफ़ा
के जौहरियों, पी.डब्ल्यू.डी.
के बड़े ठेकेदारों और रिटायर्ड अफ़सरों की कॉलोनी थी। कुछ समृद्ध पत्रकार-कवि भी
वहीं रहते थे। यह कॉलोनी हमेशा शाँत और घटनाहीन रहती थी। जिन लोगों ने यहाँ पिताजी
को देखा था, उन्होंने
बताया कि उस वक़्त तक उनके शरीर में सिर्फ़ एक पट्टेदार जाँघिया बचा था, जिसका नाड़ा शायद टूट गया था और वे उसे
अपने बाएँ हाथ से बार-बार सँभाल रहे थे। जिसने भी उन्हें वहाँ देखा, उसने यही समझा कि कोई पागल है। कुछ ने
कहा कि वे बीच-बीच में खड़े होकर ज़ोर-ज़ोर से गालियाँ बकने लगते थे। बाद में, उसी कॉलोनी में रहने वाले एक रिटायर्ड
तहसीलदार सोनी साहब और शहर के सबसे बड़े अख़बार के विशेष संवाददाता और कवि
सत्येंद्र थपलियाल ने बताया कि उन्होंने पिताजी के बोलने को ठीक से सुना था और
दरअसल वे गालियाँ नहीं बक रहे थे बल्कि बार-बार कह रहे थे—“मैं रामस्वारथ प्रसाद, एक्स स्कूल हेड मास्टर...एंड विलेज हेड
ऑफ...ग्राम बकेली...!” कवि पत्रकार थपलियाल साहब ने दुःख ज़ाहिर किया। दरअसल उसी
समय वे अमरीकी दूतावास की किसी ख़ास पार्टी में संगीत सुनने दिल्ली जा रहे थे
इसलिए जल्दबाज़ी में वे चले गए। हाँ तहसीलदार सोनी साहब का कहना था कि “मुझे उस
आदमी पर बहुत तरस आया और मैंने लड़कों को डाँटा भी। लेकिन दो-तीन लड़कों ने कहा कि
यह आदमी रामरतन सर्राफ़ की बीवी और साली पर हमला करने वाला था।” तहसीलदार ने कहा
कि ऐसा सुनने के बाद उन्हें भी लगा कि हो सकता है यह कोई बदमाश हो और नाटक कर रहा
हो। लड़के उन्हें तंग करने में लगे थे और पिताजी बीच-बीच में ज़ोर-ज़ोर से बोलते
थे, “मैं रामस्वारथ
प्रसाद...एक्स स्कूल हेडमास्टर...
अगर हिसाब लगाया जाए तो मिनर्वा टाकीज के पास वाला चौराहा, जहाँ पिताजी ट्रैक्टर से सुबह दस बजकर
सात मिनट पर उतरे थे, वहाँ
से लेकर देशबंधु मार्ग का स्टेट बैंक फिर विजय स्तंभ के पास का थाना और शहर के
बाहरी उत्तरी छोर पर बसी इतवारी कॉलोनी को मिलाकर वे अब तक लगभग तीस-बत्तीस
किलोमीटर की दूरी तक भटक चुके थे। ये जगहें ऐसी हैं जो एक ही दिशा में नहीं है।
इसका मतलब यह हुआ कि पिताजी की दिमाग़ी हालत यह थी कि उन्हें ठीक-ठीक कुछ सूझ नहीं
रहा था और वे अचानक ही, किसी
भी तरफ़ चल पड़ते थे। जहाँ तक सर्राफ़ की पत्नी और साली पर उनके हमला करने की बात
है, जिसे थपलियाल
साहब सच मानते हैं, मेरा
अपना अनुमान है कि पिताजी उनके पास या तो पानी माँगने गए होंगे या बकेली जानेवाली
सड़क के बारे में पूछने। उस एक पल के लिए पिताजी को होश ज़रूर रहा होगा। लेकिन इस
हुलिए के आदमी को अपने इतना क़रीब देखकर वे औरतें डरकर चीख़ने लगी होंगी। वैसे, पिताजी की दाहिनी आँख के ऊपर भौंह पर
जो चोट लगी थी और जिसका ख़ून रिसकर उनकी आँख पर आने लगा था, वह चोट उनको इतवारी कॉलोनी में ही लगी
थी, क्योंकि बाद में
लोगों ने बताया कि लड़के उन्हें बीच-बीच में ढेले मार रहे थे।
वह जगह इतवारी कॉलोनी से बहुत दूर नहीं है, जिस जगह पिताजी को सबसे ज़्यादा चोटें
लगीं। नेशनल रेस्टोरेंट नाम के एक सस्ते से ढाबे के सामने की ख़ाली जगह पर पिताजी
घिर गए थे। इतवारी कॉलोनी से लड़कों का जो झुंड उनके पीछे पड़ गया था, उसमें कुछ बड़ी उम्र के लड़के भी शामिल
हो गए थे। नेशनल रेस्टोरेंट में काम करने वाले नौकर सत्ते का कहना था कि पिताजी ने
ग़लती यह की थी कि एक बार उन्होंने ग़ुस्से में आकर भीड़ पर ढेले मारने शुरू कर
दिए थे। शायद उन्हीं का एक बड़ा-सा ढेला सात-आठ साल के लड़के विकी अग्रवाल को लग
गया था, जिसे बाद में कई
टाँके लगे थे। सत्ते का कहना था कि इसके बाद झुंड ज़्यादा ख़तरनाक हो गया था। वे
हल्ला मचा रहे थे और चारों तरफ़ से पिताजी पर पत्थर मार रहे थे। ढाबे के मालिक
सरदार सतनाम सिंह ने बताया कि उस वक़्त पिताजी के जिस्म पर सिर्फ़ पट्टेवाली एक
चड्डी थी, दुबले
शरीर की हड्डियाँ और छाती के सफ़ेद बाल दिख रहे थे। पेट पिचका हुआ था। वे धूल और
मिट्टी में लिथड़े हुए थे, सिर
के सफ़ेद बाल बिखर गए थे, दाहिनी
आँख के ऊपर से और निचले होंठ से ख़ून बह रहा था। सतनाम सिंह ने दु:ख और पछतावे के
साथ कहा—“मेरे को क्या मालूम था कि यह आदमी सीधा-सादा, इज़्ज़तदार, साख-रसूख का इंसान है और नसीब के फेर
में इसकी ये हालत हो गई है।” वैसे ढाबे में कप-प्लेट धोने वाले नौकर हरी का कहना
था कि बीच-बीच में पिताजी भीड़ को अंड-बंड गालियाँ दे-देकर ढेले मारने लगते थे—“आओ
ससुरो...आओ...एक-एक को मार डालूँगा भोसड़ीवालो ...तुम्हारी माँ की...” लेकिन मुझे
संदेह है कि पिताजी ने ऐसी कोई गाली दी होगी। हमने कभी भी उन्हें गाली देते नहीं
सुना था।
मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ, क्योंकि पिताजी को मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ कि, इस समय तक, उन्हें कई बार लगा होगा कि उनके साथ जो
कुछ हो रहा है, वह
वास्तविकता नहीं है, एक
सपना है। पिताजी को ये सारी घटनाएँ ऊल-जलूल, ऊटपटाँग और बेमतलब लगी होंगी। वे इस सब पर अविश्वास करने लगे होंगे।
उन्होंने सोचा होगा कि यह सब क्या बकवास है? वे तो गाँव से शहर आए ही नहीं हैं, उन्हें किसी तिरिछ ने नहीं काटा है। बल्कि तिरिछ तो होता ही नहीं है, एक मनगढ़ंत और अंधविश्वास है...और धतूरे
का काढ़ा पीने की बात तो हास्यास्पद है, वह भी एक तेली के खेत में उसका पौधा खोजकर। उन्होंने सोचा होगा और
पाया होगा कि भला उन पर कोई मुक़दमा क्यों चलेगा? उन्हें अदालत जाने की क्या ज़रूरत है?
मैं जानता हूँ कि सुरंग जैसा लंबा, सम्मोहक लेकिन डरावना सपना जैसा मुझे आता था, पिताजी को भी आता रहा होगा। मेरी और
उनकी बहुत-सी बातें बिलकुल मिलती-जुलती थीं। मुझे लगता है कि इस समय तक पिताजी
पूरी तरह से मान चुके होंगे कि यह जो कुछ हो रहा है सब झूठ और अवास्तविक है।
इसीलिए वे बार-बार उस सपने से जागने की कोशिश भी करते रहे होंगे। अगर वे बीच-बीच
में ज़ोर-ज़ोर से कुछ बोलने लगते थे, या शायद गालियाँ बकने लगते थे, तो इसी कठिन कोशिश में कि वे उस आवाज़ के सहारे उस दुःस्वप्न से बाहर
निकल आएँ। नेशनल रेस्टोरंट के नौकरों और मालिक सरदार सतनाम सिंह ने जैसा बताया था
उसके अनुसार उस जगह पर पिताजी को बहुत चोटें आई थीं। उनकी कनपटी, माथे, पीठ और शरीर के दूसरे हिस्सों पर कई ईंटें और ढेले आकर लग गए थे।
सड़क का ठेका लेने वाले ठेकेदार अरोड़ा के बीस-बाइस साल के लड़के संजू ने उन्हें
दो-तीन बार लोहे की रॉड से भी मारा था। सत्ते का तो कहना था कि इतनी चोटों से कोई
भी आदमी मर सकता था।
मुझे यह सोचकर एक अजीब-सी राहत मिलती है और मेरी फँसती हुई साँसें
फिर से ठीक हो जाती हैं कि उस समय पिताजी को कोई दर्द महसूस नहीं होता रहा होगा, क्योंकि वे अच्छी तरह से, पूरी तार्किकता और गहराई के साथ
विश्वास करने लग गए होंगे कि यह सब सपना है और जैसे ही वे जागेंगे, सब ठीक हो जाएगा। आँख खुलते ही आँगन
बुहारती माँ नज़र आ जाएगी या नीचे फ़र्श पर सोते हुए मैं और छोटी बहन दिख
जाएँगे...या गौरइयों का झुंड...हो सकता है कि उन्हें बीच-बीच में अपने इस
अजीब-ओ-ग़रीब सपने पर हँसी भी आई हो।
अगर पिताजी ने ग़ुस्से में लड़कों की तरफ़ ख़ुद भी ढेले मारने शुरू
कर दिए तो इसके पीछे पहली वजह तो यही थी कि उन्हें यह बहुत अच्छी तरह से पता था कि
ये ढेले सपने के भीतर जा रहे हैं और इससे किसी को कोई चोट नहीं आएगी। यह भी हो
सकता है कि पूरी ताक़त से ढेला मार कर वे उत्सुकता और बेचैनी से यह इंतिज़ार करते
रहे हों कि जैसे ही वह जाकर किसी लड़के के सिर से टकराएगा, उसका माथा नष्ट होगा और एक ही झटके में
इस दुःस्वप्न के टुकड़े-टुकड़े बिखर जाएँगे और चारों ओर से वास्तविक संसार की
बेतहाशा रौशनी अंदर आने लगेगी। उनका ज़ोर-ज़ोर से चीख़ना भी दरअसल ग़ुस्से के कारण
नहीं था, वे असल में मुझे, छोटी बहन को, माँ को या किसी को भी पुकार रहे थे कि
अगर वे अपने आप इस सपने से जाग पाने में सफल न भी हो पाएँ, तब भी कोई भी आकर उन्हें जगा दे।
एक सबसे बड़ी विडंबना भी इसी बीच हुई। हमारे गाँव की ग्राम पंचायत के
सरपंच और पिताजी के बचपन के पुराने दोस्त पंडित कंधई राम तिवारी लगभग साढ़े तीन
बजे नेशनल रेस्टोरंट के सामने, सड़क
से गुज़रे थे। वे रिक्शे पर थे। उन्हें अगले चौराहे से बस लेकर गाँव लौटना था।
उन्होंने उस ढाबे के सामने इकट्ठी भीड़ को भी देखा और उन्हें यह पता भी चल गया कि
वहाँ पर किसी आदमी को मारा जा रहा है। उनकी यह इच्छा भी हुई कि वहाँ जाकर देखें कि
आख़िर मामला क्या है। उन्होंने रिक्शा रुकवा भी लिया। लेकिन उनके पूछने पर किसी ने
कहा कि कोई पाकिस्तानी जासूस पकड़ा गया है जो पानी की टंकी में ज़हर डालने जा रहा
था, उसे ही लोग मार
रहे हैं। ठीक इसी समय पंडित कंधई राम को गाँव जाने वाले बस आती हुई दिखी और
उन्होंने रिक्शेवाले से अगले चौराहे तक जल्दी-जल्दी रिक्शा बढ़ाने के लिए कहा।
गाँव जाने वाली यह आख़िरी बस थी। अगर उस बस के आने में तीन-चार मिनट की भी देरी हो
जाती तो वे निश्चित ही वहाँ जाकर पिताजी को देखते और उन्हें पहचान लेते। राज्य
परिवहन की वह बस हमेशा आधा-पौन घंटा लेट रहा करती थी, लेकिन उस दिन, संयोग से, वह बिलकुल सही समय पर आ रही थी।
सतनाम सिंह का कहना था कि वह भीड़ नेशनल रेस्टोरेंट के सामने से तब
हटी और लोग तितर-बितर हुए जब बड़ी देर तक पिताजी ज़मीन से उठे ही नहीं। ईंट का एक
बड़ा-सा ढेला उनकी कनपटी पर आकर लगा था। उनके मुँह से ख़ून आना शुरू हो गया था।
सिर में भी चोटें थीं। सतनाम ने बताया कि जब पिताजी बहुत देर तक नहीं हिले-डुले तो
लड़कों के झुंड में से किसी ने कहा कि लगता है यह मर गया। जब भीड़ छँटने के
दस-पंद्रह मिनट बाद भी पिताजी नहीं हिले-डुले तो सतनाम सिंह ने सत्ते से कहा था कि
वह उनके मुँह में पानी के छींटे मार कर देखे कि वे सिर्फ़ बेहोश हैं तो हो सकता है
कि उठ जाएँ। लेकिन सत्ते पुलिस की वजह से डर रहा था। बाद में सतनाम सिंह ने ख़ुद
ही एक बाल्टी पानी उनके ऊपर डाला था। दूर से पानी डालने के कारण ज़मीन की मिट्टी
गीली होकर पिताजी के शरीर से लिथड़ गई थी।
सरदार सतनाम सिंह और सत्ते दोनों का कहना था कि लगभग पाँच बजे तक
पिताजी उसी जगह पड़े हुए थे। तब तक पुलिस नहीं आई थी। फिर सतनाम सिंह ने सोचा कि
कहीं उसे पंचनामा और गवाही वग़ैरा में न फँसना पड़ जाए इसलिए उसने ढाबा बंद कर
दिया था और डिलाइट टाकीज में ‘आन मिलो सजना’ फिल्म देखने चला गया था।
उस समय लगभग छह बजे थे जब सिविल लाइंस की सड़क की पटरियों पर एक
क़तार में बनी मोचियों की दुकानों में से एक मोची गनेशवा की गुमटी में पिताजी ने
अपना सिर घुसेड़ा। उस समय तक उनके शरीर पर चड्डी भी नहीं रह गई थी, वे घुटनों के बल किसी चौपाए की तरह
रेंग रहे थे। शरीर पर कालिख और कीचड़ लगी हुई थी और जगह-जगह चोटें थीं।
गनेशवा हमारे गाँव के तालाब के पार वाले टोले का मोची है। उसने बताया
कि मैं बहुत डर गया और मास्टर साहब को पहचान ही नहीं पाया। उनका चेहरा डरावना हो
गया था और चिन्हाई में नहीं आता था। मैं डर कर गुमटी से बाहर निकल आया और शोर
मचाने लगा। दूसरे मोचियों के अलावा वहाँ कुछ और लोग भी इकट्ठा हो गए थे। लोगों ने
जब गनेशवा की गुमटी के भीतर जाकर झाँका तो गुमटी के अंदर, उसके सबसे अंतरे-कोने में, टूटे-फूटे जूतों, चमड़ों के टुकड़ों, रबर और चिथड़ों के बीच पिताजी दुबके
हुए थे। उनकी साँसें थोड़ी-बहुत चल रही थीं। उन्हें वहाँ से खींच कर, बाहर, पटरी पर निकाला गया। तभी गनेशवा ने उन्हें पहचान लिया। गनेशवा का
कहना था कि उसने पिताजी के कान में कुछ आवाज़ें भी लगाईं लेकिन वे कुछ बोल नहीं पा
रहे थे। बहुत देर बाद उन्होंने ‘राम स्वारथ प्रसाद...’ और ‘बकेली’ जैसा कुछ कहा
था। फिर चुप हो गए थे।
पिताजी की मृत्यु सवा छह बजे के आसपास हुई थी। तारीख थी 17 मई, 1972, चौबीस घंटे पहले लगभग इसी वक़्त उन्हें जंगल में तिरिछ ने काटा था।
चौबीस घंटे पहले क्या पिताजी इन घटनाओं और इस मृत्यु का अनुमान कर सकते थे?
पिताजी का शव शहर के मुर्दाघर में पुलिस ने रखवा दिया था।
पोस्टमार्टम में पता चला था कि उनकी हड्डियों में कई जगह फ्रैक्चर था, दाईं आँख पूरी तरह फूट चुकी थी, कॉलर बोन टूटा हुआ था। उनकी मृत्यु
मानसिक सदमे और अधिक रक्तस्राव के कारण हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार उनका आमाशय
ख़ाली था, पेट
में कुछ नहीं था। इसका मतलब यही हुआ कि धतूरे के बीजों का काढ़ा उल्टियों द्वारा
पहले ही निकल चुका था।
हालाँकि थानू कहता है कि अब तो यह तय हो गया कि तिरिछ के ज़हर से कोई
नहीं बच सकता। ठीक चौबीस घंटे बाद उसने अपना करिश्मा दिखाया और पिताजी की मृत्यु
हुई। पंडित राम औतार भी यही कहते हैं। हो सकता है कि पंडित राम औतार इसलिए ऐसा
कहते हों कि वे ख़ुद को विश्वास दिलाना चाहते हों कि धतूरे के काढ़े का पिताजी की
मृत्यु से कोई संबंध नहीं था।
मैं सोचता हूँ, अंदाज़ा
लगाने की कोशिश करता हूँ कि शायद अंत में, जब गनेशवा ने अपनी गुमटी के बाहर, पिताजी के कान में आवाज़ दी होगी तो पिताजी सपने से जाग गए होंगे।
उन्होंने मुझे, माँ
को और छोटी बहन को देखा होगा—फिर वे दातून लेकर नदी की तरफ़ चले गए होंगे। नदी के
ठंडे पानी से उन्होंने अपना चेहरा धोया होगा, कुल्ला किया होगा और इस लंबे दुःस्वप्न को वे भूल गए होंगे। उन्होंने
अदालत जाने के बारे में सोचा होगा। हम लोगों के मकान की चिंता ने उन्हें परेशान
किया होगा।
लेकिन मैं अपने सपने के बारे में बताना चाहता हूँ, जो मुझे अक्सर आता है। वह यूँ है—कि
मैं खेतों की मेंड़, गाँव
की पगडंडी से होता हुआ जंगल पहुँच गया हूँ। मैं रक्सा नाला, कीकर के पेड़ को देखता हूँ। वह भूरी
चट्टान वहाँ उसी जगह है, जो
सारी बारिश नाले के पानी में डूबी रहती है। मैं देखता हूँ कि तिरिछ की लाश उसके
ऊपर पड़ी हुई है। मुझे एक बेतहाशा ख़ुशी अपने घेरे में ले लेती है। आख़िर वह मारा
गया। मैं पत्थर लेकर तिरिछ को कुचलने लगता हूँ, ज़ोर-ज़ोर से उसे मारता हूँ। मेरे पास थानू मिट्टी का तेल और माचिस
लिए खड़ा है। तभी, अचानक
ही, मैं पाता हूँ कि
मैं उस चट्टान पर नहीं हूँ। थानू भी वहाँ नहीं है, वहाँ कोई जंगल नहीं है बल्कि मैं दरअसल शहर में हूँ। मेरे कपड़े बहुत
ही मैले, फटे और चिथड़ों
जैसे हो गए हैं। मेरे गालों की हड्डियाँ निकली हैं। बाल बिखरे हैं। मुझे प्यास लगी
है और मैं बोलने की कोशिश करता हूँ। शायद मैं बकेली, अपने घर जाने का रास्ता पूछना चाहता हूँ और तभी अचानक चारों ओर शोर
उठता है...घंटियाँ बजने लगती हैं...हज़ारों-हज़ारों घंटियाँ...मैं भागता हूँ।
मैं भागता हूँ...मेरा पूरा शरीर बेदम होने लगता है, फेफड़े फूल जाते हैं। मैं पास-पास क़दम
रख कर अचानक लंबी-लंबी छलाँगें लगाता हूँ, उड़ने की कोशिश करता हूँ। लेकिन भीड़ लगता है मेरे पास पहुँचने वाली
होती है। एक अजीब-सी गर्म और भारी हवा मुझे सुन्न कर देती है। अपनी हत्या की
साँसें मुझे छूने लगती हैं...और आख़िरकार वह पल आ जाता है, जब मेरे जीवन का अंत होने वाला होता
है...
मैं रोता हूँ...भागने की कोशिश करता हूँ। मेरा पूरा शरीर नींद में ही
पसीने में डूब जाता है। मैं ज़ोर-ज़ोर से बोल कर जागने की कोशिश करता हूँ...मैं
विश्वास करना चाहता हूँ कि यह सब सपना है...और अभी आँख खोलते ही सब ठीक हो
जाएगा...मैं सपने के भीतर अपनी आँखें फाड़ कर देखता हूँ...दूर तक...लेकिन वह पल
आख़िर आ ही जाता है...
माँ बाहर से मुझे देखती है। मेरा माथा सहलाकर वह मुझे रज़ाई से ढाँप
देती है और मैं वहाँ अकेला छोड़ दिया जाता हूँ। अपनी मृत्यु से बचने की कोशिश में
जूझता, बेदम होता, रोता, चीख़ता और भागता।
माँ कहती हैं मुझे अभी भी नींद में बड़बड़ाने और चीख़ने की आदत है।
लेकिन मैं पूछना चाहता हूँ और यही सवाल मुझे हमेशा परेशान करता है कि मुझे
आख़िरकार अब तिरिछ का सपना क्यों नहीं आता?
उदय प्रकाश
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