नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

सोमवार, 30 मई 2016

साहित्यकार और पुरस्कार


फर्क तो होता ही है
एक अमीर साहित्यकार और
एक गरीब साहित्यकार में
लिखते दोनों ही अच्छा हैं
मगर वातानुकूलित कमरे में
पुरसुकून सोफे पर बैठकर
चाय-काफी की चुस्कियां लेते हुए
52 इंच की टीवी स्क्रीन पर
चल रही किसानों की
आत्महत्या की ख़बरों को देखकर
दुखी होते हुए
उनके बारे में लिखना
आसान तो नहीं होता होगा न!
शायद तभी तो मिल जाते हैं
ढेरों पुरस्कार और सम्मान
उन लेखकों और उनकी रचनाओं को
जबकि गरीब साहित्यकार को
नहीं खोजने पड़ते हैं विषय
कुछ भी लिखने के लिए
वह तो अनायास ही मिल जाते हैं उसे
कभी खचाखच भरी हुई बस में या रेल में
कभी मेले की रेलमपेल में
कभी खेत में या खलिहान में
कभी अस्पताल में या गाँव के श्मशान में
कभी बेटे कि जिद में
कभी पत्नी की उदास आँखों में
कभी बगीचे की अमराइयों में
कभी रात कि तनहाइयों में
नदी किनारे हरी घास पर बैठकर
पानी की लहरों और मछुआरे के
जाल को देखते हुए
रची जाती हैं कितनी ही
सार्थक और जरूरी रचनाएं
एक गरीब रचनाकार के द्वारा
मगर जीवन की आपाधापी
और संसाधनों के अभाव में
नहीं पहुँच पाती हैं वह आमजन तक
पुरस्कार और सम्मान तो
दूर की कौड़ी है उसके लिए!
                   (कृष्ण धर शर्मा, २०१६)

सब को बचाने के लिए


हवा को बचाना है, पानी को बचाना है

पृथ्वी को बचाना है, जीवों को बचाना है 

पेड़ को बचाना है, जंगल को बचाना है

जंगल में रहनेवाले जानवरों को बचाना है

झरने को बचाना है, नदी को बचाना है

बह सके जिसमें नदी, उस पहाड़ को बचाना है

बेटी को बचाना है, बूढ़े माँ-बाप को बचाना है

तेजी से बिखरते हुए, समाज को बचाना है

मानव को बचाना है, मानवता को बचाना है

मगर देखना मरने न पाए तुम्हारी आँखों का पानी

क्योंकि इन सब को बचाने के लिए जरूरी  

तुम्हारी आँखों के कोरों में पानी को बचाना है

                   (कृष्ण धर शर्मा, २०१६)

दुःस्वप्न


पत्नी को नहीं पसंद आता है अब
कच्ची घानी का सरसों तेल
नहीं पसंद आता है चक्की का पिसा आटा
नहीं पसंद आता है अब
घरेलू नाश्ता या खाना बनाना
नहीं भाता है अब हलवा या पोहा
चीला या दालपूरी या कढ़ी
भाते हैं अब इडली और दोसे
चाइनीज, पास्ता और बर्गर
नहीं पसंद आता है अब
घर में मेहमानों का आना
या फिर अपने पुराने दोस्तों को
मिलना या अपने घर बुलाना
नहीं पसंद आता है
अपने प्रियजनों को कुछ भी देना
नहीं पसंद है मेरी दयालुता
किसी भी जीव के प्रति
नहीं पसंद है मेरी मेहनत और  
मेरी ईमानदारी की नौकरी
नहीं पसंद है मेरी मूछें भी
तो फिर बचा क्या है अब मुझमें!
अचानक खुल जाती मेरी नींद
पसीने से तरबतर शरीर
और बेकाबू होती धडकनों को
सँभालते हुए याद करता हूँ
वह भयावह दुस्वप्न
जिसने मेरी तो जान ही ले ली थी

                  (कृष्ण धर शर्मा, २०१६)

शुक्रवार, 20 मई 2016

नदी के द्वीप

 

हम नदी के द्वीप हैं।
हम नहीं कहते कि हमको छोड़कर स्रोतस्विनी बह जाए।
वह हमें आकार देती है।
हमारे कोण, गलियाँ, अंतरीप, उभार, सैकत-कूल
सब गोलाइयाँ उसकी गढ़ी हैं।

माँ है वह! है, इसी से हम बने हैं।
किंतु हम हैं द्वीप। हम धारा नहीं हैं।
स्थिर समर्पण है हमारा। हम सदा से द्वीप हैं स्रोतस्विनी के।
किंतु हम बहते नहीं हैं। क्योंकि बहना रेत होना है।
हम बहेंगे तो रहेंगे ही नहीं।
पैर उखड़ेंगे। प्लवन होगा। ढहेंगे। सहेंगे। बह जाएँगे।

और फिर हम चूर्ण होकर भी कभी क्या धार बन सकते?
रेत बनकर हम सलिल को तनिक गँदला ही करेंगे।
अनुपयोगी ही बनाएँगे।

द्वीप हैं हम! यह नहीं है शाप। यह अपनी नियति है।
हम नदी के पुत्र हैं। बैठे नदी की क्रोड़ में।
वह वृहत भूखंड से हम को मिलाती है।
और वह भूखंड अपना पितर है।
नदी तुम बहती चलो।
भूखंड से जो दाय हमको मिला है, मिलता रहा है,
माँजती, संस्कार देती चलो। यदि ऐसा कभी हो -

तुम्हारे आह्लाद से या दूसरों के,
किसी स्वैराचार से, अतिचार से,
तुम बढ़ो, प्लावन तुम्हारा घरघराता उठे -
यह स्रोतस्विनी ही कर्मनाशा कीर्तिनाशा
घोर काल प्रवाहिनी बन जाए -
तो हमें स्वीकार है वह भी। उसी में रेत होकर
फिर छनेंगे हम। जमेंगे हम। कहीं फिर पैर टेकेंगे।
कहीं फिर भी खड़ा होगा नए व्यक्तित्व का आकार।
मात:, उसे फिर संस्कार तुम देना।

 

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय'

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