नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

मंगलवार, 31 जनवरी 2017

भूटान : सादगी का वैभव


 प्रकृति की गोद में बसा भूटान एक ऐसा देश है जो खुशहाली पर जोर देता है। जहाँ पूरी दुनिया का जोर जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद पर होता है वहीँ भूटान अपने नागरिकों का जीवन स्तर जीएनएच यानी सकल राष्ट्रीय ख़ुशी से नापता है। यह एक बड़ा फर्क है जो भूटान को पूरी दुनिया से अलग करता है। भूटान की हवाओं में ऑक्सीजन की मात्रा इतनी अधिक है कि आप पूरे समय फ्रेश महसूस करते हैं, यहाँ की दीवारों और सडक़ों पर आपको इश्तेहार नहीं मिलेंगें और शहरों में ना तो भव्य शॉपिंग मॉल है और ना ही ट्रैफिक लाइट की जरूरत पड़ती है। इस मुल्क में सैनिकों से ज्यादा भिक्षु है। कोई भी व्यक्ति हड़बड़ी में नहीं दिखाई पड़ता है। भौतिकवादी दुनिया से बेफिक्र यह मुल्क आत्मसंतोष और अंदरूनी ख़ुशी को ज्यादा तरजीह देता है।


भारत और चीन के बीच घिरे इस छोटे से मुल्क की आबादी लगभग पौने 8 लाख है जिसमें ज्यादातर लोग बौद्ध धर्म को मानने वाले हैं, भूटान में लोकतंत्र और संवैधानिक राजशाही है। राजशाही यहाँ 1907 से है लेकिन 2008 में यहाँ के राजा ने खुद से आगे बढ़ कर लोकतंत्र की घोषणा की। शायद यही वजह है कि भूटानी अपने राजा को बहुत सम्मान की दृष्टि देखते हैं। भूटान के ‘पारो’ और ‘थिम्फू’ दो प्रमुख शहर हैं,जिसमें थिम्फू भूटान की राजधानी है, वही पारो तो जैसे सपनों का शहर है,शांत और ठहरा हुआ जो सुकून देता है। पारो घाटी से दिखने वाली सुंदरता आपको मदहोश कर देती है,यह एक ऐसा शहर है जहाँ की सादगी के वैभव में आप खो सकते हैं। पारो में भूटान का इकलौता हवाई अड्डा भी है । पारो में घुसते ही ऐसा महसूस होता है जैसे आप समय में कहीं पीछे चले गये हों, यह जाकर  किसी प्राचीन नगर का अहसास होता है । पूरे शहर के साथ एक नदी भी बहती है बिलकुल साफ, पारदर्शी और शांत। पारो शहर की खासियत यहाँ की हरियाली पहाड़ी घाटियाँ है। यह एक बेफिक्र शहर है जहाँ बहुमंजिला मकान नहीं है और शहर में ही खेती भी होती है। पारो अपने रहस्यमयी टाइगर नेस्ट के लिए भी मशहूर है, 3120 मीटर की ऊंचाईपर बना टाइगर नेस्ट भूटान के सबसे पवित्र बौद्ध मठों में से एक है पारो शहर से मठ की चढाई शुरू करने की जगह करीब 12 किलोमीटर दूर है यह मठ पारो से उत्तर दिशा में 12 किमी की दूर ताकसंग नामक स्थान  पर है, यहाँ से टाइगर नेस्ट तक जाने के लिए पैदल चलना पड़ता है आधे रास्ते तक घोड़े का भी इन्तेजाम हैं । लम्बी  चढ़ाई के बाद टाइगर नेस्ट तक पहुचने पर आपको अनोखी शांति और रोमांचक अहसास होता है मठ पर पहुंच कर अनोखी का एहसास होता है।

भूटानी अपनी संस्कृति व पर्यावरण को लेकर बहुत संवेदनशील हैं, यह शायद दुनिया का अकेला कार्बन यहाँ की नेगेटिव देश है जहाँ की 70 प्रतिशत जमीन पेड़-पौधों से ढकी है। इनके नीतियों और आदतों दोनों में पर्यावरण संरक्षण पर जोर दिया जाता है। भूटान के संविधान के अनुसार यहाँ के जमीन का 60 प्रतिशत हिस्सा जंगलों और पेड़ पौधों के लिए संरक्षित रखना अनिवार्य है, यहाँ प्राकृतिक सौंदर्य व संपदा के बदले  आर्थिक लाभों को महत्व नहीं दिया जाता है। साल 1999 से यहाँ प्लास्टिक की थैलियां भी प्रतिबंधित हैं। भूटानवासी भी पर्यावरण को लेकर बहुत सचेत होते हैं। पर्यावरण से प्रेम उन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है।
भूटान में बहुत कम संख्या में निजी वाहन है, ज्यादातर लोग पब्लिक ट्रांसर्पोट का उपयोग करते हैं। भूटान में चारो तरफ हरियाली ही हरियाली है इसके बावजूद भी लोग अपने घरों में अलग से बगीचा लगाते हैं और उसमें तरह तरह के रंगबिरंगी फूल उगाते हैं। भूटानी लोग प्रकृति का बहुत सम्मान करते हैं। उनका प्रकृति के प्रति प्रेम महसूस किया जा सकता है। वे इन पहाड़ों से दिल से जुड़े हुए हैं। अपने प्रकृति के प्रति प्रेम और संरक्षण को लेकर गर्व जताते हुए कोई भी आम भूटानी आपको यह बताते हुए मिल जाएगा कि ‘कैसे वे अपने देश के ज्यादातर भू-भाग में पेड़–पौधों के होने के बावजूद इनका दोहन करने के बदले लगातार नये पेड़ लगा रहे हैं और जब उनके राजा के घर बच्चे का जन्म हुआ तो पूरे देश ने 2 करोड़ पेड़ लगाये।’ भूटानी प्रकृति से जितना लेते हैं उससे कई गुना ज्यादा उसे लौटाने की कोशिश करते हैं और यही कारण है कि उनका देश काबर्न उत्सर्जन से पूरी तरह से मुक्त है जो दुनिया के दूसरे मुल्कों के लिए एक मिसाल है।



देश में संसाधन कम होने के बावजूद सरकार लोगों की बुनियादी जरूरतों के प्रति संवेदनशील है और शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं पर विशेष ध्यान देती है। यहाँ कानून व्यवस्था भी काफी अच्छी है और अपराध दर व भ्रष्टाचार भी बहुत कम है। कानून का कड़ाई से पालन भी किया जाता है।  भूटान के लोग बहुत मिलनसार और अपनत्व से भरे हुए होते हैं। वे मददगार भी होते हैं। लेकिन इनका भारतीयों के प्रति एक अलग ही अपनापन और लगाव देखने को मिलता है। वे भारतीयों को अपने से अलग नही मानते हैं। इसका प्रमुख कारण भूटान का भारत के साथ पुराना सांस्कृतिक रिश्ता है। भूटान में ज्यादातर जरूरत के सामान भी भारत से आते हैं।
इसी साल के मई माह में मुझे भूटान जाने का मौका मिला। मैंने भूटान में कई लोगों से हैप्पीनेंस इन्डेक्स के सबंध में बात की जिसको लेकर उनका कहना था कि ‘भूटान के लोगों के खुश रहने का प्रमुख कारण यह है कि वे भौतिक वस्तुओं के बदले वेल्यू को ज्यादा महत्व देते हैं।’ उनका कहना था कि ‘यहाँ हमें बचपन से ही सिखाया जाता है कि आपके पास जो नहीं है उससे परेशान रहने की जगह आपके पास जो हैं उसमें ही संतुष्टि और खुशी तलाश की जाए।’ यहाँ पारिवारिक संबंधों और रिश्तों को ज्यादा महत्त्व दिया जाता है। एक युवा लडक़ी ने बताया कि- मेरा बचपन का सपना है कि मैं एयरहोस्टेज बनू,इसके लिए मैं लम्बे समय से तैयारी भी कर रही थी और कुछ दिन पहले इसके लिए साक्षात्कार भी देकर आयी हूँ लेकिन एयरहोस्टेज के केवल 3 पद हैं जिसके लिए 500 लड़कियों ने साक्षात्कार दिया है अगर मेरा इसमें चयन नही होता तो मुझे दुख तो होगा परन्तु मेरा मानना है कि हर इंसान जो पैदा हुआ है उसके लिए प्रकृति ने कुछ न कुछ भूमिका सोची हुई है तो मैं मान कर चलूंगी कि इससे भी अच्छी नौकरी या भविष्य मेरे लिए है और ये सोच कर जीवन में आगे बढ़ जाऊंगीं। भूटान के लोग बुद्ध के मध्यम मार्ग के विचार को मानते हैं इसी वजह से वे ना ही बहुत सारी चीजों की चाहत रखते हैं और ऐसा भी नही होता कि उनके पास कुछ भी नही है। यही वह संतुलन से जिसे भूटानियों ने साध रखा है। हैप्पीनेंस इन्डेक्स के मूल में भी यही विचार है जिसे 1972 में वहां के सम्राट जिग्मे सिंग्ये वांगचुक सामने लाये थे। उसके बाद भूटान ने तय किया कि उनके देश में समृद्धि का पैमाना जीडीपी नहीं बल्कि उन चीज़ों को बनाया जाएगा जो नागिरकों को खुशी व इंसान और प्रकृति को सामंजस्य देते हों। यह एक जबर्दस्त विचार था लेकिन यह समय की धारा के विपरीत भी था जिसमें पूरी दुनिया प्रकृति का बेरहमी से दोहन करते हुए पूँजी कमाने को विकास मानती है। लेकिन इस विकास ने प्रकृति की अपूर्णनीय क्षति की है और गैर-बराबरी की खाई को भी बहुत चौड़ा कर दिया है। इस विकास मॉडल की एक सीमा और भी है, यहाँ सिर्फ भौतिक खुशहाली पर ही जोर है। लेकिन यही काफी नहीं है, जरूरी नहीं है कि पैसे से सब कुछ खरीद जा सके। हम अपने आस-पास ही समृद्ध लोगों को दुख, असंतोष, अवसाद और  निराशा में डूबे और आत्महत्या करते हुए देख सकते हैं।



भूटान ने अपने सकल राष्ट्रीय खुशहाली में मापक के तौर पर सामाजिक विकास, सांस्कृतिक संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण और गुडगवर्नेस जैसी बातों को शामिल किया  है। भूटान में 1972 से ग्रास हैप्पीनेस इंडेक्स लागू हुआ है तब से वहाँ जीने की दर बढ़ कर लगभग दुगनी हो गयी है और  शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं के पहुँच तकरीबन पूरी आबादी तक हुई है। भविष्य के लिए भूटान की योजनायें कम प्रभावी नहीं है  जिसमें 2030 तक नेट ग्रीन हाउस गैस को जीरो पहुँचाने और जीरो अपशिष्ट उत्पन्न करने जैसे लक्ष्य रखे गये हैं। इसके लिए अक्षय उर्जा जैसे- बायो गैस, हवा, और सोलर उर्जा पर जोर दिया जा रहा है और सभी गाडिय़ों को इलेक्ट्रिक गाडिय़ों से बदला जाना है। नये पेड़ लगाने का कार्यक्रम तो है ही।
लेकिन  भूटान की सबसे बड़ी सफलता तो कुछ और है। धीरे-धीरे ही सही विकास और ख़ुशी को लेकर दुनिया का नजरिया बदल रहा है।अब दुनिया भूटान के विचारों पर ध्यान दे रही है। तरक्की का पैमानों और असली खुशहाली के महत्व को समझा जा रहा है। 2010 में ब्रिटेन में भी ‘वेल बीईंग एंड हैप्पीनेस इंडेक्स’ की शुरुआत की गयी है। साल 2011 में संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा ने प्रस्ताव पारित कर हैप्पीनेस इंडेक्स के विचार को अपने एजेंडे में शामिल किया है और हर साल 20 मार्च को पूरी दुनिया में हैप्पीनेस डे मनाने का फैसला लिया गया है। इसी तरह से 2013 में वेनेजुएला में ‘मिनिस्ट्री ऑफ हैप्पीनेस’ बनाया गया है। यूएई ने ‘हैप्पीनेस और टॉलरेंस मिनिस्ट्री’ बनाई है। भारत में मध्य प्रदेश इस तरह का विभाग बनाने वाला देश का पहला राज्य बन गया है जहाँ ‘हैप्पीनेस डिपार्टमेंट यानी आनंद विभाग’ खोलने की घोषणा की गयी है।

आज दुनिया जिस रास्ते पर चल रही है वह तबाही का रास्ता है। पूरे ब्रह्माण्ड में पृथ्वी ही एक ऐसा ज्ञात ग्रह है जहाँ जीवन के फलने-फूलने का वातावरण है। लेकिन इस नीले ग्रह का सबसे अकलमंद प्राणी ही धरती के संतुलन को बिगाड़ता जा रहा है। पृथ्वी से अनेकों जीव-वनस्पति विलुप्त हो गए हैं, अगर यही हालत रहे तो आने वाले सालों में और जीव-वनस्पति और प्रजातियाँ इस धरती से लुप्त हो सकती हैं जिसमें खुद इंसान भी शामिल है। भूटान का माँडल दुनिया के भविष्य का माँडल है। इसे अपनाना आसान नहीं है लेकिन और कोई विकल्प भी तो नहीं बचा है। अगर कभी भूटान जाने का मौका मिले तो वहां प्रकृति से सामंजस्य बना कर खुश रहने का सबक लेना मत भूलियेगा। भूटान भविष्य है।
जावेद अनीस (साभार देशबंधु)

सोमवार, 16 जनवरी 2017

चुनाव में धर्म, जाति, और भाषा का दुरुपयोग प्रतिबंधित

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर ने अपने पद से विदा देने के पूर्व एक अत्यधिक महत्वपूर्ण निर्णय किया। इस निर्णय से धर्मनिरपेक्षता पर आधारित हमारे गणतंत्र की नींव और मजबूत होगी। सर्वोच्च न्यायालय की एक सात सदस्यीय पीठ ने स्पष्ट निर्णय दिया है कि चुनावों में धर्म, जाति और भाषा का दुरुपयोग नहीं किया जा सकता।
वैसे तो हमारे जनप्रतिनिधित्व कानून में पहले से ही इस तरह का प्रावधान था परंतु उस प्रावधान के होते हुए भी अनेक पार्टियां धर्म का उपयोग चुनाव प्रचार में करती थीं। जैसे बाबरी मस्जिद के ध्वंस के पूर्व और ध्वंस के बाद खुलेआम भारतीय जनता पार्टी ने संपूर्ण देश के वातावरण को सांप्रदायिक बना दिया था। चुनाव के पहले और चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि ‘मंदिर वहीं बनेगा’ और यह कहने में भी नहीं हिचकिचाए कि ‘राम द्रोही, देश द्रोही’। चुनावी सभाओं में भी ‘जय श्रीराम’ के नारे लगते थे। यहां तक कि एक अवसर पर भारतीय जनता पार्टी के सर्वमान्य नेता लालकृष्ण आडवानी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि केन्द्र की सत्ता में आने का बहुत बड़ा श्रेय राम मंदिर आंदोलन को है।
यद्यपि पिछले लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी ने विकास का नारा दिया था परंतु मैदानी हकीकत यह थी कि अनेक मुद्दों पर सांप्रदायिक आधार पर प्रचार किया गया। अब चूंकि सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चुनावों में धर्म, जाति और भाषा का दुरुपयोग एक भ्रष्ट आचरण समझा जाएगा और इसके चलते अब शायद चुनाव में खड़ा कोई भी उम्मीदवार धर्म, जाति और भाषा के आधार पर चुनाव प्रचार करने का साहस नहीं करेगा।
अपना निर्णय देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि धर्म को सिर्फ व्यक्ति तक सीमित रखना चाहिए और उसका उपयोग किसी भी सार्वजनिक और विशेषकर राजनीति में कतई नहीं करना चाहिए। चूंकि चुनाव में धर्म के उपयोग से अनेक लोग वोट कबाडऩे में सफल हो जाते थे इसलिए पिछले दिनों इस प्रवृत्ति को बहुत बढ़ावा मिला।
आप कल्पना कीजिए कि यदि हमारी न्यायपालिका पूरी तरह से स्वतंत्र नहीं होती तो शायद उसके लिए इस तरह का निर्णय करना संभव नहीं होता। मोदी सरकार ने आते ही न्यायपालिका पर सरकार का नियंत्रण मजबूत करने के प्रयास प्रारंभ कर दिए थे। इसी प्रयास के चलते राष्ट्रीय न्यायिक आयोग बनाने का प्रस्ताव किया गया था। इस आयोग को सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करने का अधिकार देना प्रस्तावित था। इस आयोग के छह सदस्य प्रस्तावित किए गए थे इनमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के अतिरिक्त  दो और न्यायाधीश, केन्द्रीय कानून मंत्री और दो प्रतिष्ठित नागरिक थे। इस आयोग के निर्णय बहुमत के आधार पर होने थे। ये दो प्रतिष्ठित नागरिक कौन होंगे, इसे स्पष्ट नहीं किया गया था। इसी तरह पूर्व में कभी भी किसी भी आयोग का सदस्य मंत्री को नहीं बनाया गया था। स्पष्ट है कि ये तथाकथित प्रतिष्ठित सदस्य सत्ताधारी दल से जुड़े होते। उसके अतिरिक्तविधि मंत्री मिलाकर तीन सदस्य हो जाते और फिर किसी एक न्यायाधीश को अपने पक्ष में करके न्यायपालिका में सारी नियुक्तियां सरकार की मंशा के अनुसार होतीं। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने इस आयोग के प्रस्ताव को निरस्त कर दिया और इस तरह एक बहुत बड़े खतरे से देश को बचा लिया। उसके बाद भी अभी अन्य तरीकों से न्यायपालिका पर नियंत्रण पाने के प्रयास जारी हैं। जैसे उच्च न्यायालयों में अभी 430 से ज्यादा न्यायाधीशों के पद रिक्त हैं। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश टीएस ठाकुर ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि इन पदों को शीघ्र भरा जाए। परंतु केन्द्रीय सरकार ने इस संबंध में लगभग चुप्पी साध ली है और कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित न्यायाधीशों की नियुक्ति के प्रस्ताव पर अभी तक कुछ नहीं कहा है। इससे उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या लाखों तक पहुंच गई है।
न्यायमूर्ति टी.एस. ठाकुर ने अपने कार्यकाल के दौरान न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बारे में अपनी प्रतिबद्धता पूरी तरह से दिखाई। अपने विदाई समारोह में उन्होंने यहां तक कहा कि मेरी कामना है कि हमारे देश की न्यायपालिका स्वतंत्र और निष्पक्ष बनी रहे। उनके इन शब्दों की केन्द्रीय विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने सार्वजनिक रूप से आलोचना की। पूर्व में शायद ही कभी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के विचारों पर इस तरह की आलोचनात्मक टिप्पणी की गई हो।
चुनाव के संबंध में जो निर्णय सर्वोच्च न्यायालय ने दिया है उसे पूरी तरह से लागू करना अत्यधिक कठिन काम होगा। पूर्व में देखा गया है कि न्यायपालिका के अनेक ऐतिहासिक निर्णयों का क्रियान्वयन ईमानदारी ने नहीं हो पाता है। इस तरह के निर्णयों का ईमानदारी से क्रियान्वयन उसी समय संभव होगा जब जनचेतना जागृत की जाए और इस तरह के सभी संगठनों को जिनकी धर्मनिरपेक्षता पर आस्था है इस तरह की जनचेतना उत्पन्न करने का प्रयास करना चाहिए। क्योंकि अभी भी देश में ऐसे लोग हैं जो अत्यधिक आपत्तिजनक बातें सार्वजनिक रूप से कहते हैं। जैसे संघ परिवार और शिवसेना से जुड़े अनेक नेता सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि यदि उनका बस चले तो वे अल्पसंख्यकों के मताधिकार को समाप्त कर दें। इस तरह की भाषा भी हमारे देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को कमजोर करने वाली है। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय से इस तरह की बातें करना भी आपत्तिजनक और भ्रष्ट आचरण समझा जाएगा। क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में स्पष्ट कर दिया है कि धर्म, जाति और भाषा का उपयोग सार्वजनिक जीवन में नहीं किया जाना चाहिए, वह व्यक्ति तक ही सीमित रहना चाहिए। इसलिए इस बात की आवश्यकता है कि सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को अमलीजामा पहनाने के लिए उन सब लोगों को एकजुट हो जाना चाहिए जो चाहते हैं कि हमारे देश के लोकतंत्र का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप कायम रहे।
यह  सभी को ज्ञात है कि केन्द्र में जिस राजनीतिक दल की सरकार है उसका वैचारिक संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा हमारे देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने की है। यदि हिन्दू राष्ट्र बनाने के प्रयासों को शिकस्त देना है तो सारे देश को सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के समर्थन में खड़े हो जाना चाहिए और उसे लागू करवाने में एकजुट होकर प्रयास करना चाहिए।
 एल.एस. हरदेनिया

कफ़न

 

एक

झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अंदर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव-वेदना में पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अंधकार में लय हो गया था। घीसू ने कहा—“मालूम होता है, बचेगी नहीं। सारा दिन दौड़ते हो गया, जा देख तो आ।”

 माधव चिढ़कर बोला—”मरना ही है तो जल्दी मर क्यों नहीं जाती? देखकर क्या करूँ?”

तू बड़ा बेदर्द है बे! साल-भर जिसके साथ सुख-चैन से रहा, उसी के साथ इतनी बेवफ़ाई!”

 तो मुझसे तो उसका तड़पना और हाथ-पाँव पटकना नहीं देखा जाता।”

चमारों का कुनबा था और सारे गाँव में बदनाम। घीसू एक दिन काम करता तो तीन दिन आराम करता। माधव इतना कामचोर था कि आध घंटे काम करता तो घंटे भर चिलम पीता। इसलिए उन्हें कहीं मज़दूरी नहीं मिलती थी। घर में मुठ्ठी-भर भी अनाज मौजूद हो, तो उनके लिए काम करने की क़सम थी। जब दो-चार फ़ाक़े हो जाते तो घीसू पेड़ पर चढ़कर लकड़ियाँ तोड़ लाता और माधव बाज़ार से बेच लाता और जब तक वह पैसे रहते, दोनों इधर-उधर मारे-मारे फिरते। गाँव में काम की कमी न थी। किसानों का गाँव था, मेहनती आदमी के लिए पचास काम थे। मगर इन दोनों को उसी वक़्त बुलाते, जब दो आदमियों से एक का काम पाकर भी संतोष कर लेने के सिवा और कोई चारा न होता। अगर दोनो साधु होते, तो उन्हें संतोष और धैर्य के लिए, संयम और नियम की बिलकुल ज़रूरत न होती। यह तो इनकी प्रकृति थी। विचित्र जीवन था इनका! घर में मिट्टी के दो-चार बर्तन के सिवा कोई संपत्ति नहीं। फटे चीथड़ों से अपनी नग्नता को ढाँके हुए जिए जाते थे। संसार की चिंताओं से मुक्त! क़र्ज़ से लदे हुए। गालियाँ भी खाते, मार भी खाते, मगर कोई ग़म नहीं। दीन इतने कि वसूली की बिलकुल आशा न रहने पर भी लोग इन्हें कुछ-न-कुछ क़र्ज़ दे देते थे। मटर, आलू की फ़सल में दूसरों के खेतों से मटर या आलू उखाड़ लाते और भून-भानकर खा लेते या दस-पाँच ऊख उखाड़ लाते और रात को चूसते। घीसू ने इसी आकाश-वृत्ति से साठ साल की उम्र काट दी और माधव भी सपूत बेटे की तरह बाप ही के पद-चिह्नों पर चल रहा था, बल्कि उसका नाम और भी उजागर कर रहा था। इस वक़्त भी दोनों अलाव के सामने बैठकर आलू भून रहे थे, जो कि किसी खेत से खोद लाए थे। घीसू की स्त्री का तो बहुत दिन हुए, देहांत हो गया था। माधव का ब्याह पिछले साल हुआ था। जब से यह औरत आई थी, उसने इस ख़ानदान में व्यवस्था की नींव डाली थी और इन दोनों बे-ग़ैरतों का दोज़ख़ भरती रहती थी। जब से वह आई, यह दोनों और भी आलसी और आरामतलब हो गए थे। बल्कि कुछ अकड़ने भी लगे थे। कोई कार्य करने को बुलाता, तो निर्ब्याज भाव से दुगुनी मज़दूरी माँगते। वही औरत आज प्रसव-वेदना से मर रही थी और यह दोनों इसी इंतज़ार में थे कि वह मर जाए, तो आराम से सोएँ।

 घीसू ने आलू निकालकर छीलते हुए कहा—“जाकर देख तो, क्या दशा है उसकी? चुड़ैल का फिसाद होगा, और क्या? यहाँ तो ओझा भी एक रुपया माँगता है!”

माधव को भय था, कि वह कोठरी में गया, तो घीसू आलुओं का बड़ा भाग साफ़ कर देगा। बोला- “मुझे वहाँ जाते डर लगता है।”

 डर किस बात का है, मैं तो यहाँ हूँ ही।”

तो तुम्हीं जाकर देखो न?”

 मेरी औरत जब मरी थी, तो मैं तीन दिन तक उसके पास से हिला तक नहीं था! और फिर मुझसे लजाएगी कि नहीं? जिसका कभी मुँह नहीं देखा, आज उसका उघड़ा हुआ बदन देखूँ! उसे तन की सुध भी तो न होगी? मुझे देख लेगी तो खुलकर हाथ-पाँव भी न पटक सकेगी!”

मैं सोचता हूँ कोई बाल-बच्चा हो गया तो क्या होगा? सोंठ, गुड़, तेल, कुछ भी तो नहीं है घर में!”

 सब कुछ आ जाएगा। भगवान दें तो! जो लोग अभी एक पैसा नहीं दे रहे हैं, वे ही कल बुलाकर रुपए देंगे। मेरे नौ लड़के हुए, घर में कभी कुछ न था, मगर भगवान ने किसी-न-किसी तरह बेड़ा पार ही लगाया।”

जिस समाज में रात-दिन मेहनत करने वालों की हालत उनकी हालत से कुछ बहुत अच्छी न थी, और किसानों के मुक़ाबले में वे लोग, जो किसानों की दुर्बलताओं से लाभ उठाना जानते थे, कहीं ज़्यादा संपन्न थे, वहाँ इस तरह की मनोवृत्ति का पैदा हो जाना कोई अचरज की बात न थी। हम तो कहेंगे, घीसू किसानों से कहीं ज़्यादा विचारवान था और किसानों के विचार-शून्य समूह में शामिल होने के बदले बैठकबाज़ों की कुत्सित मंडली में जा मिला था। हाँ, उसमें यह शक्ति न थी, कि बैठकबाज़ों के नियम और नीति का पालन करता। इसलिए जहाँ उसकी मंडली के और लोग गाँव के सरगना और मुखिया बने हुए थे, उस पर सारा गाँव उँगली उठाता था। फिर भी उसे यह तसकीन तो थी ही कि अगर वह फटेहाल है तो कम-से-कम उसे किसानों की-सी जी-तोड़ मेहनत तो नहीं करनी पड़ती, और उसकी सरलता और निरीहता से दूसरे लोग बेजा फ़ायदा तो नहीं उठाते!

 दोनों आलू निकाल-निकालकर जलते-जलते खाने लगे। कल से कुछ नहीं खाया था। इतना सब्र न था कि ठंडा हो जाने दें। कई बार दोनों की ज़बानें जल गईं। छिल जाने पर आलू का बाहरी हिस्सा ज़बान, हलक और तालू को जला देता था और उस अंगारे को मुँह में रखने से ज़्यादा ख़ैरियत इसी में थी कि वह अंदर पहुँच जाए। वहाँ उसे ठंडा करने के लिए काफ़ी सामान थे। इसलिए दोनों जल्द-जल्द निगल जाते। हालाँकि इस कोशिश में उनकी आँखों से आँसू निकल आते।

घीसू को उस वक़्त ठाकुर की बरात याद आई, जिसमें बीस साल पहले वह गया था। उस दावत में उसे जो तृप्ति मिली थी, वह उसके जीवन में एक याद रखने लायक़ बात थी, और आज भी उसकी याद ताज़ा थी, बोला—“वह भोज नहीं भूलता। तब से फिर उस तरह का खाना और भरपेट नहीं मिला। लड़की वालों ने सबको भर पेट पूरियाँ खिलाई थीं, सबको! छोटे-बड़े सबने पूरियाँ खाईं और असली घी की! चटनी, रायता, तीन तरह के सूखे साग, एक रसेदार तरकारी, दही, चटनी, मिठाई, अब क्या बताऊँ कि उस भोज में क्या स्वाद मिला। कोई रोक-टोक नहीं थी, जो चीज़ चाहो, माँगो, जितना चाहो खाओ। लोगों ने ऐसा खाया, ऐसा खाया, कि किसी से पानी न पिया गया। मगर परोसने वाले हैं कि पत्तल में गर्म-गर्म, गोल-गोल सुवासित कचौरियाँ डाल देते हैं। मना करते हैं कि नहीं चाहिए, पत्तल पर हाथ रोके हुए हैं, मगर वह हैं कि दिए जाते हैं। और जब सबने मुँह धो लिया, तो पान-इलायची भी मिली। मगर मुझे पान लेने की कहाँ सुध थी? खड़ा हुआ न जाता था। चटपट जाकर अपने कंबल पर लेट गया। ऐसा दिल-दरियाव था वह ठाकुर!”

 माधव ने इन पदार्थों का मन-ही-मन मज़ा लेते हुए कहा—“अब हमें कोई ऐसा भोज नहीं खिलाता।”

अब कोई क्या खिलाएगा? वह ज़माना दूसरा था। अब तो सबको किफ़ायत सूझती है। शादी-ब्याह में मत ख़र्च करो, क्रिया-कर्म में मत ख़र्च करो। पूछो, ग़रीबों का माल बटोर-बटोरकर कहाँ रखोगे? बटोरने में तो कमी नहीं है। हाँ, ख़र्च में किफ़ायत सूझती है!”

 तुमने एक बीस पूरियाँ खाई होंगी?”

बीस से ज़ियादा खाई थीं!”

 मैं पचास खा जाता!”

पचास से कम मैंने न खाई होंगी। अच्छा पका था। तू तो मेरा आधा भी नहीं है।”

 आलू खाकर दोनों ने पानी पिया और वहीं अलाव के सामने अपनी धोतियाँ ओढ़कर पाँव पेट में डाले सो रहे। जैसे दो बड़े-बड़े अजगर गेंडुलियाँ मारे पड़े हों। और बुधिया अभी तक कराह रही थी।

दो

 सवेरे माधव ने कोठरी में जाकर देखा, तो उसकी स्त्री ठंडी हो गई थी। उसके मुँह पर मक्खियाँ भिनक रही थीं। पथराई हुई आँखें ऊपर टँगी हुई थीं। सारी देह धूल से लथपथ हो रही थी। उसके पेट में बच्चा मर गया था।

माधव भागा हुआ घीसू के पास आया। फिर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हाय-हाय करने और छाती पीटने लगे। पड़ोस वालों ने यह रोना-धोना सुना, तो दौड़े हुए आए और पुरानी मर्यादा के अनुसार इन अभागों को समझाने लगे।

 मगर ज़्यादा रोने-पीटने का अवसर न था। कफ़न की और लकड़ी की फ़िक्र करनी थी। घर में तो पैसा इस तरह ग़ायब था, जैसे चील के घोंसले में माँस?

बाप-बेटे रोते हुए गाँव के ज़मींदार के पास गए। वह इन दोनों की सूरत से नफ़रत करते थे। कई बार इन्हें अपने हाथों से पीट चुके थे। चोरी करने के लिए, वादे पर काम पर न आने के लिए। पूछा—“क्या है बे घिसुआ, रोता क्यों है? अब तो तू कहीं दिखलाई भी नहीं देता! मालूम होता है, इस गाँव में रहना नहीं चाहता।”

 घीसू ने ज़मीन पर सिर रखकर आँखों में आँसू भरे हुए कहा—“सरकार! बड़ी विपत्ति में हूँ। माधव की घरवाली रात को गुज़र गई। रात-भर तड़पती रही सरकार! हम दोनों उसके सिरहाने बैठे रहे। दवा-दारू जो कुछ हो सका, सब कुछ किया, मुदा वह हमें दग़ा दे गई। अब कोई एक रोटी देने वाला भी न रहा मालिक! तबाह हो गए। घर उजड़ गया। आपका ग़ुलाम हूँ, अब आपके सिवा कौन उसकी मिट्टी पार लगाएगा। हमारे हाथ में तो जो कुछ था, वह सब तो दवा-दारू में उठ गया। सरकार ही की दया होगी, तो उसकी मिट्टी उठेगी। आपके सिवा किसके द्वार पर जाऊँ।”

ज़मींदार साहब दयालु थे। मगर घीसू पर दया करना काले कंबल पर रंग चढ़ाना था। जी में तो आया, कह दें, चल, दूर हो यहाँ से। यूँ तो बुलाने से भी नहीं आता, आज जब ग़रज़ पड़ी तो आकर ख़ुशामद कर रहा है। हरामख़ोर कहीं का, बदमाश! लेकिन यह क्रोध या दंड देने का अवसर न था।

 जी में कुढ़ते हुए दो रुपए निकालकर फेंक दिए। मगर सांत्वना का एक शब्द भी मुँह से न निकला। उसकी तरफ़ ताका तक नहीं। जैसे सिर का बोझ उतारा हो।

जब ज़मींदार साहब ने दो रुपए दिए, तो गाँव के बनिए-महाजनों को इनकार का साहस कैसे होता? घीसू ज़मींदार के नाम का ढिंढोरा भी पीटना ख़ूब जानता था। किसी ने दो आने दिए, किसी ने चारे आने। एक घंटे में घीसू के पास पाँच रुपए की अच्छी रक़म जमा हो गई। कहीं से अनाज मिल गया, कहीं से लकड़ी। और दोपहर को घीसू और माधव बाज़ार से कफ़न लाने चले। इधर लोग बाँस-वाँस काटने लगे।

 गाँव की नर्म दिल स्त्रियाँ आ-आकर लाश देखती थीं और उसकी बेकसी पर दो बूँद आँसू गिराकर चली जाती थीं।

तीन

 बाज़ार में पहुँचकर घीसू बोला—“लकड़ी तो उसे जलाने-भर को मिल गई है, क्यों माधव!”

माधव बोला—“हाँ, लकड़ी तो बहुत है, अब कफ़न चाहिए।”

 तो चलो, कोई हलक़ा-सा कफ़न ले लें।”

हाँ, और क्या! लाश उठते-उठते रात हो जाएगी। रात को कफ़न कौन देखता है?”

 कैसा बुरा रिवाज़ है कि जिसे जीते जी तन ढाँकने को चीथड़ा भी न मिले, उसे मरने पर नया कफ़न चाहिए।”

कफ़न लाश के साथ जल ही तो जाता है।”

 और क्या रखा रहता है? यही पाँच रुपए पहले मिलते, तो कुछ दवा-दारू कर लेते।”

दोनों एक-दूसरे के मन की बात ताड़ रहे थे। बाज़ार में इधर-उधर घूमते रहे। कभी इस बाज़ार की दूकान पर गए, कभी उसकी दूकान पर! तरह-तरह के कपड़े, रेशमी और सूती देखे, मगर कुछ जँचा नहीं। यहाँ तक कि शाम हो गई। तब दोनों न जाने किस दैवी प्रेरणा से एक मधुशाला के सामने जा पहुँचे। और जैसे किसी पूर्व निश्चित व्यवस्था से अंदर चले गए। वहाँ ज़रा देर तक दोनों असमंजस में खड़े रहे। फिर घीसू ने गद्दी के सामने जाकर कहा—“साहूजी, एक बोतल हमें भी देना।”

 इसके बाद कुछ चिखौना आया, तली हुई मछली आईं और दोनों बरामदे में बैठकर शांतिपूर्वक पीने लगे।

कई कुज्जियाँ ताबड़तोड़ पीने के बाद दोनों सरूर में आ गए। घीसू बोला—“कफ़न लगाने से क्या मिलता? आख़िर जल ही तो जाता। कुछ बहू के साथ तो न जाता।”

 माधव आसमान की तरफ़ देखकर बोला, मानों देवताओं को अपनी निष्पापता का साक्षी बना रहा हो—“दुनिया का दस्तूर है, नहीं लोग बामनों को हज़ारों रुपए क्यों दे देते हैं? कौन देखता है, परलोक में मिलता है या नहीं!”

बड़े आदमियों के पास धन है, फूँके। हमारे पास फूँकने को क्या है?”

 लेकिन लोगों को जवाब क्या दोगे? लोग पूछेंगे नहीं, कफ़न कहाँ है?”

घीसू हँसा—“अबे, कह देंगे कि रुपए कमर से खिसक गए। बहुत ढूँढ़ा, मिले नहीं। लोगों को विश्वास न आएगा, लेकिन फिर वही रुपए देंगे।”

 माधव भी हँसा, इस अनपेक्षित सौभाग्य पर बोला—“बड़ी अच्छी थी बेचारी! मरी तो ख़ूब खिला-पिलाकर!”

आधी बोतल से ज़्यादा उड़ गई। घीसू ने दो सेर पूरियाँ मँगाई। चटनी, अचार, कलेजियाँ। शराबख़ाने के सामने ही दूकान थी। माधव लपककर दो पत्तलों में सारे सामान ले आया। पूरा डेढ़ रुपया ख़र्च हो गया। सिर्फ़ थोड़े से पैसे बच रहे।

 दोनों इस वक़्त इस शान में बैठे पूरियाँ खा रहे थे जैसे जंगल में कोई शेर अपना शिकार उड़ा रहा हो। न जवाबदेही का ख़ौफ़ था, न बदनामी की फ़िक्र। इन भावनाओं को उन्होंने बहुत पहले ही जीत लिया था।

घीसू दार्शनिक भाव से बोला—“हमारी आत्मा प्रसन्न हो रही है तो क्या उसे पुन्न न होगा?”

 माधव ने श्रद्धा से सिर झुकाकर तसदीक़ की—“ज़रूर से ज़रूर होगा। भगवान, तुम अंतर्यामी हो। उसे बैकुंठ ले जाना। हम दोनों हृदय से आशीर्वाद दे रहे हैं। आज जो भोजन मिला वह कभी उम्र-भर न मिला था।”

एक क्षण के बाद माधव के मन में एक शंका जागी। बोला—“क्यों दादा, हम लोग भी एक-न-एक दिन वहाँ जाएँगे ही?”

 घीसू ने इस भोले-भाले सवाल का कुछ उत्तर न दिया। वह परलोक की बातें सोचकर इस आनंद में बाधा न डालना चाहता था।

जो वहाँ वह हम लोगों से पूछे कि तुमने हमें कफ़न क्यों नहीं दिया तो क्या कहोगे?”

 कहेंगे तुम्हारा सिर!”

पूछेगी तो ज़रूर!”

 तू कैसे जानता है कि उसे कफ़न न मिलेगा? तू मुझे ऐसा गधा समझता है? साठ साल क्या दुनिया में घास खोदता रहा हूँ? उसको कफ़न मिलेगा और बहुत अच्छा मिलेगा!”

माधव को विश्वास न आया। बोला—“कौन देगा? रुपए तो तुमने चट कर दिए। वह तो मुझसे पूछेगी। उसकी माँग में तो सेंदुर मैंने डाला था।”

 कौन देगा, बताते क्यों नहीं?”

वही लोग देंगे, जिन्होंने अबकी दिया। हाँ, अबकी रुपए हमारे हाथ न आएँगे।”

 ज्यों-ज्यों अँधेरा बढ़ता था और सितारों की चमक तेज़ होती थी, मधुशाला की रौनक भी बढ़ती जाती थी। कोई गाता था, कोई डींग मारता था, कोई अपने संगी के गले लिपटा जाता था। कोई अपने दोस्त के मुँह में कुल्हड़ लगाए देता था।

वहाँ के वातावरण में सुरूर था, हवा में नशा। कितने तो यहाँ आकर एक चुल्लू में मस्त हो जाते थे। शराब से ज़्यादा यहाँ की हवा उन पर नशा करती थी। जीवन की बाधाएँ यहाँ खींच लाती थीं और कुछ देर के लिए यह भूल जाते थे कि वे जीते हैं या मरते हैं। या न जीते हैं, न मरते हैं।

 और यह दोनों बाप-बेटे अब भी मज़े ले-लेकर चुसकियाँ ले रहे थे। सबकी निगाहें इनकी ओर जमी हुई थीं। दोनों कितने भाग्य के बली हैं! पूरी बोतल बीच में है।

भरपेट खाकर माधव ने बची हुई पूरियों का पत्तल उठाकर एक भिखारी को दे दिया, जो खड़ा इनकी ओर भूखी आँखों से देख रहा था। और देने के गौरव, आनंद और उल्लास का अपने जीवन में पहली बार अनुभव किया।

 घीसू ने कहा—“ले जा, ख़ूब खा और आशीर्वाद दे! जिसकी कमाई है, वह तो मर गई। मगर तेरा आशीर्वाद उसे ज़रूर पहुँचेगा। रोएँ-रोएँ से आशीर्वाद दो, बड़ी गाढ़ी कमाई के पैसे हैं!”

माधव ने फिर आसमान की तरफ़ देखकर कहा—“वह बैकुंठ में जाएगी दादा, बैकुंठ की रानी बनेगी।”

 घीसू खड़ा हो गया और जैसे उल्लास की लहरों में तैरता हुआ बोला—“हाँ, बेटा बैकुंठ में जाएगी। किसी को सताया नहीं, किसी को दबाया नहीं। मरते-मरते हमारी ज़िंदगी की सबसे बड़ी लालसा पूरी कर गई। वह न बैकुंठ जाएगी तो क्या ये मोटे-मोटे लोग जाएँगे, जो ग़रीबों को दोनों हाथों से लूटते हैं, और अपने पाप को धोने के लिए गंगा में नहाते हैं और मंदिरों में जल चढ़ाते हैं?

श्रद्धालुता का यह रंग तुरंत ही बदल गया। अस्थिरता नशे की ख़ासियत है। दु:ख और निराशा का दौरा हुआ।

 माधव बोला—“मगर दादा, बेचारी ने ज़िंदगी में बड़ा दुख भोगा। कितना दुख झेलकर मरी!”

वह आँखों पर हाथ रखकर रोने लगा। चीखें मार-मारकर।

 घीसू ने समझाया—“क्यों रोता है बेटा, ख़ुश हो कि वह माया-जाल से मुक्त हो गई, जंजाल से छूट गई। बड़ी भाग्यवान थी, जो इतनी जल्द माया-मोह के बंधन तोड़ दिए।

और दोनों खड़े होकर गाने लगे—

 ठगिनी क्यों नैना झमकावे! ठगिनी!”

पियक्कड़ों की आँखें इनकी ओर लगी हुई थीं और यह दोनों अपने दिल में मस्त गाए जाते थे। फिर दोनों नाचने लगे। उछले भी, कूदे भी। गिरे भी, मटके भी। भाव भी बनाए, अभिनय भी किए। और आख़िर नशे में मदमस्त होकर वहीं गिर पड़े।

प्रेमचंद 

#समाजकीबात #samajkibaat

#कृष्णधरशर्मा #Krishnadharsharma 

रविवार, 15 जनवरी 2017

टॉकिंग पेन के साथ तैयार होता भविष्य

संसाधन केंद्र-केरल द्वारा विकसित टॉकिंग पेन जेएसएस के विद्या कार्यक्रम का हिस्सा है, जो जिले के अनुसूचित जाति के लोगों के लिए एक व्यापक विकास परियोजना है। साक्षरता कार्यक्रमों के लिए मोबाइल कंप्यूटर लैब, एलसीडी प्रोजेक्टर्स सहित कई उन्नत प्रौद्योगिकी टूल्स इस्तेमाल किए जाते हैं। जनजातीय भाषा पनिया सहित हिंदी, अंग्रेजी, मलयालम और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में दिशा-निर्देशों की पेशकश की जाती है। किताबों को समुदायल की स्थानीय भाषा में लिखा गया है और ब्रेललिपि में भी उपलब्ध है। ब्रेली लिटरेसी सामग्री राज्य संसाधन केंद्र-केरल और केरल राज्य साक्षरता मिशन के सहयोग से जेएसएस द्वारा विकसित की गई है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 341 नेत्रहीन लाभार्थियों को ब्रेललिपि साक्षरता के साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए गए हैं।
चैरियालग्राम पंचायत में पलक्कयम कॉलोनी की 80 वर्षीय आदिवासी महिला मनियम्मा को अपने साक्षर बनने के प्रयास में किताबों और स्लेट के साथ जूझना पड़ता था। लेकिन एक ‘टॉकिंग पेन’ जो लिखे गए विवरण की आवाज पैदा करता है, से उनके और आसपास के कई लोगों के लिए काम आसान हो गया है। उन लोगों के लिए इलेक्ट्रॉनिक पेन से अल्फाबेट्स और शब्दों के गाने सुनकर और सीखना आसान हो गया है। मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा प्रायोजित एक एनजीओ के जन शिक्षण संस्थान, मलाप्पुरम में मनियम्मा सहित क्षेत्र के 320 जनजातीय लोग पढऩे के लिए जाते हैं और अक्षर व शिक्षा लेते हैं। वे यहां न सिर्फ अक्षर ज्ञान लेते हैं, बल्कि स्वास्थ्य, स्वच्छता, बुरी आदतों, वित्तीय साक्षरता और कौशल विकास कार्यक्रमों से जुड़े सबक लेते हैं। यह टॉकिंग पेन है और साक्षरता तथा कौशल विकास कार्यक्रमों की दिशा में किए जा रहे प्रयासों से जन शिक्षण संस्थान (जेएसएस), मलाप्पुरम को यूनेस्को कनफ्यूसियस प्राइज फॉर लिटरेसी, 2016 हासिल करने में खासी मदद मिली।
यूनेस्को द्वारा हर साल साक्षरता के लिए दिया जाने वाला कन्यूसियस प्राइज एक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार है, जिसके माध्यम से दुनिया में साक्षरता के क्षेत्र में किए जाने वाले उत्कृष्ट और प्रेरणादायी प्रयासों को सम्मान दिया जाता है। मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने जेएसएस चेयरमैन और राज्यसभा एमपी अब्दुल वहाब व जेएसएस निदेशक वी उमरकोया के साथ पेरिस में बीते महीने एक कार्यक्रम के दौरान यूनेस्को की महानिदेशक इरीना बोकोवा के हाथों यह पुरस्कार ग्रहण किया। यह चौथी बार है जब भारत के किसी संगठन को यह पुरस्कार मिला है। जेएसएस मलाप्पुरम को मिला यह पुरस्कार पहला नहीं है। संगठन को भारत सरकार के साक्षर भारत पुरस्कार (2014) जैसे कई पुरस्कार मिल चुके हैं।
 

समान मौके देने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण

भले ही केरल देश में सबसे ज्यादा साक्षरता वाला राज्य है, लेकिन इस सफलता का लाभ पारंपरिक तौर पर वंचित समूहों जैसे महिलाओं, अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जनजातियों और प्रवासियों को नहीं मिल पाता है, जो अक्सर वित्तीय तौर पर कमजोर और सीमांत समुदाय होते हैं। जेएसएस जैसे एनजीओ इसी बदलाव की दिशा में काम कर रहे हैं। जेएसएस मलाप्पुरम नव-साक्षर को अनौपचारिक शिक्षा देता है और साक्षर बनने के इच्छुक वयस्कों को विभिन्न व्यावसायिक कौशल का प्रशिक्षण देता है। संगठन लोगों को काम तलाशने या उद्यम शुरू करने में भी लाभार्थियों की मदद करता है। अभी तक 41000 महिलाओं सहित 53000 लोगों को प्रशिक्षित किया जा चुका है।
राज्य संसाधन केंद्र-केरल द्वारा विकसित टॉकिंग पेन जेएसएस के विद्या कार्यक्रम का हिस्सा है, जो जिले के अनुसूचित जाति के लोगों के लिए एक व्यापक विकास परियोजना है। साक्षरता कार्यक्रमों के लिए मोबाइल कंप्यूटर लैब, एलसीडी प्रोजेक्टर्स सहित कई उन्नत प्रौद्योगिकी टूल्स इस्तेमाल किए जाते हैं। जनजातीय भाषा पनिया सहित हिंदी, अंग्रेजी, मलयालम और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में दिशा-निर्देशों की पेशकश की जाती है। किताबों को समुदायल की स्थानीय भाषा में लिखा गया है और ब्रेललिपि में भी उपलब्ध है। ब्रेली लिटरेसी सामग्री राज्य संसाधन केंद्र-केरल और केरल राज्य साक्षरता मिशन के सहयोग से जेएसएस द्वारा विकसित की गई है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत 341 नेत्रहीन लाभार्थियों को ब्रेललिपि साक्षरता के साथ व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए गए हैं।
 

उल्लासम से उन्नति: टिकाऊ विकास के लिए सिलाई परियोजनाएं

जेएसएस मलाप्पुरम में ऐसे कई व्यावसायिक प्रशिक्षण कोर्स हैं, जिनका उद्देश्य सीमांत लोगों के लिए टिकाऊ और भागीदारी पूर्ण विकास है। ऐसी ही परियोजनाओं में उल्लासम (खुश रहकर काम) शामिल है, यह ऐसा उपक्रम है जो पांच दिन तक काम की पेशकश करता है जिसमें एक दिन योग और ध्यान के लिए है। इसके लिए विधवाओं, 40 साल से ज्यादा उम्र की अविवाहित महिलाओं और तलाकशुदा महिलाओं में से विशेष रूप से 250 लाभार्थियों का चयन किया गया है। इस योजना के अंतर्गत कपड़े के बैग, बच्चों के बिस्तर, शॉपर्स, मच्छरदानी आदि बनाए जाते हैं। इस स्कीम के लाभार्थी इस कार्यक्रम के माध्यम से 5000-10000 रुपए महीने कमा रहे हैं। इस योजना के दौरान योग और ध्यान से तनाव कम करने में मदद मिलती है। ‘स्पर्शम’ विभिन्न सक्षम लाभार्थियों के विकास के लिए तैयार एक अन्य नवीन परियोजना है।
‘इनसाइट’ (अंतर्दृष्टि) जेएसएस मलाप्पुरम द्वारा केरल फेडरेशन ऑफ ब्लाइंड के सहयोग से शुरू किया गया विशेष कार्यक्रम है। ग्रामीण आबादी में सब्जियों के उत्पादन में आत्म निर्भर बनाने के लिए जेएसएस ने ‘दालम’ परियोजना की शुरुआत की थी। जेएसएस परिवार के सदस्य अपने घरों के अहाते में सब्जियां पैदा करते हैं और सब्जियों के पौधों का वितरण करते हैं। जेएसएस ने ऐसे मरीजों की क्षमता बढ़ाने के लिए पेन एंड पैलिएटिव सोसाइटी के सहयोग से एक अन्य कार्यक्रम ‘रिलीफ’ (राहत) शुरू किया है, जो लकवा और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं।
जेएसएस ने आदिवासी युवाओं को मदद करने के लिए सरकारी एजेंसियों के सहयोग से विशेष कार्यक्रम कॉम्प्रिहेंसिव रिस्पॉन्सिबल डेवलपमेंट थ्रू एजुकेशन एंड स्किल ट्रेनिंग (सीआरडीईएसटी) डिजाइन किया। इस परियोजना के माध्यम से सौ युवाओं की पहचान की गई है। इस योजना के तहत युवाओं को विभिन्न विषयों में एक सप्ताह की आवासीय कोचिंग प्रदान की जाती है।
बिपिन एस. नाथ 
( लेखक पत्र सूचना कार्यालय, कोच्चि में सूचना सहायक हैं। )