नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शनिवार, 6 मई 2017

मुझे क़दम-क़दम पर


मुझे क़दम-क़दम पर

चौराहे मिलते हैं

बाँहें फैलाए!!

एक पैर रखता हूँ

कि सौ राहें फूटतीं,

व मैं उन सब पर से गुज़रना चाहता हूँ;

बहुत अच्छे लगते हैं

उनके तज़ुर्बे और अपने सपने...

सब सच्चे लगते हैं;

अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,

मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,

जाने क्या मिल जाए!!

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में

चमकता हीरा है;

हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है,

प्रत्येक सुस्मित में विमल सदा नीरा है,

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में

महाकाव्य-पीड़ा है,

पल-भर में सबसे गुज़रना चाहता हूँ,

प्रत्येक उर में से तिर आना चाहता हूँ,

इस तरह खुद ही को दिए-दिए फिरता हूँ,

अजीब है ज़िंदगी!!

बेवक़ूफ़ बनने के ख़ातिर ही

सब तरफ़ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ;

और यह सब देख बड़ा मज़ा आता है

कि मैं ठगा जाता हूँ...

हृदय में मेरे ही,

प्रसन्न-चित्त एक मूर्ख बैठा है

हँस-हँसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,

कि जगत्...स्वायत्त हुआ जाता है।

कहानियाँ लेकर और

मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते

जहाँ ज़रा खड़े होकर

बातें कुछ करता हूँ...

 ...उपन्यास मिल जाते।

दु:ख की कथाएँ, तरह-तरह की शिकायतें

अहंकार-विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान,

ज़माने के जानदार सूरे व आयतें

सुनने को मिलती हैं!

कविताएँ मुस्कुरा लाग-डाँट करती हैं

प्यार बात करती हैं।

मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियाँ

श्रद्धाएँ चढ़ती हैं!!

घबराए प्रतीक और मुस्काते रूप-चित्र

लेकर मैं घर पर जब लौटता...

उपमाएँ, द्वार पर आते ही कहती हैं कि

सौ बरस और तुम्हें

जीना ही चाहिए।

घर पर भी, पग-पग पर चौराहे मिलते हैं,

बाँहें फैलाए रोज़ मिलती हैं सौ राहें,

शाखा-प्रशाखाएँ निकलती रहती हैं,

नव-नवीन रूप-दृश्यवाले सौ-सौ विषय

रोज़-रोज़ मिलते हैं...

और, मैं सोच रहा कि

जीवन में आज के

लेखक की कठिनाई यह नहीं कि

कमी है विषयों की

वरन् यह कि आधिक्य उनका ही

उसको सताता है,

और, वह ठीक चुनाव कर नहीं पाता है!!

 

गजानन माधव मुक्तिबोध

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