रविवार, 5 नवंबर 2017

नीलाभ की कुछ कवितायें

नाराज आदमी का बयान- १
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मुझे अब किसी भी चीज़ में
दिलचस्पी नहीं रह गई है
न दुनिया में
न उसके मूर्खतापूर्ण कारोबार में
मैं सिर्फ़ एक सीधी, सरल ज़िन्दगी
जीना चाहता हूँ
पसीने की गन्ध को
ताज़ा पानी से मिटाते हुए
दिन भर की थकान को
गा-बजा कर दूर करते हुए
भात की महक में
माँ के दूध का सोंधापन
और दाल में पड़ी खटाई की फाँक में
बचपन की साथिन के होंटों की सनसनी
महसूस करते हुए
सीधी, सरल ज़िन्दगी
जो बीसवीं सदी के
इन आख़िरी वर्षों में
सबसे कठिन चीज़ है
रहे शब्द
तो शैतान ले जाए उन्हें
वे मुझसे नहीं थके
पर मैं
उनसे ऊब गया हूँ

नाराज आदमी का बयान-२
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शब्दों से नाता अटूट है
शब्दों से मेरा नाता अटूट है
मैं उन्हें प्यार करता हूँ
लगातार
लड़ता हूँ झगड़ता हूँ उनसे
अपनी समझ से
उन्हें तरतीब देता रहता हूँ
यहाँ तक कि कई बार
खीझ उठता हूँ उन पर
बहुत बार
मैंने कहा है उनसे
क्यों तंग करते हो मुझे ?
भाई, अब तुम जाओ
कहीं और जा कर डेरा जमाओ
मेरे दिमाग़ को घोंसला मत बनाओ
मगर शब्द हैं कि लगातार
मेरा पीछा करते हैं
मेरे कानों में गूँजते हैं
मेरे दिमाग़ पर दस्तक देते रहते हैं
मैं जानता हूँ
मैं कई बार उन्हें
व्यक्त नहीं कर पाता
उनकी दस्तक के बावजूद
कई बार
मेरे दिमाग़ का कोई दरवाज़ा
नहीं खुल पाता
मैं कुछ और कहना चाहता हूँ
वे कुछ और सुझाते हैं
मैं तराशना चाहता हूँ उन्हें
वे बार-बार
मेरे हाथों को चुभ जाते हैं
कभी मैं आगे बढ़ जाता हूँ
कभी वे पीछे छूट जाते हैं
लेकिन न वे मुझे छोड़ते हैं
न मैं उन से पीछा छुड़ा पाता हूँ
उन्हीं के रिश्ते से मैं ख़ुद को
ज़िन्दगी से जुड़ा पाता हूँ
उन्हीं के रिश्ते से मैं ख़ुद को
ज़िन्दगी से जुड़ा पाता हूँ

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इस दौर में
हत्यारे और भी नफ़ीस होते जाते हैं
मारे जाने वाले और भी दयनीय
वह युग नहीं रहा जब बन्दी कहता था
वैसा ही सुलूक़ करो मेरे साथ
जैसा करता है राजा दूसरे राजा से
अब तो मारा जाने वाला
मनुष्य होने की भी दुहाई नहीं दे सकता
इसीलिए तो वह जा रहा है मारा
अनिश्चय के इस दौर में
सिर्फ़ बुराइयाँ भरोसे योग्य हैं
अच्छाइयाँ या तो अच्छाइयाँ नहीं रहीं
या फिर हो गयी हैं बाहर चलन से
खोटे सिक्कों की तरह
शैतान को अब अपने निष्ठावान पिट्ठुओं को
बुलाना नहीं पड़ता
मौजूद हैं मनुष्य ही अब
यह फ़र्ज़ निभाने को
पहले से बढ़ती हुई तादाद में

                                      (नीलाभ )

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