कई तरह के जहर आजमाए मुझपर दुश्मन ने मेरे
शायद उसे पता नहीं था दवा और दुआ थे वो मेरे लिए
कृष्णधर शर्मा 26.03.23
नमस्कार,आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757
कई तरह के जहर आजमाए मुझपर दुश्मन ने मेरे
शायद उसे पता नहीं था दवा और दुआ थे वो मेरे लिए
कृष्णधर शर्मा 26.03.23
मैं अमीर नहीं हूँ। बहुत कुछ समझदार भी नहीं हूँ। पर मैं परले दरजे
का माँसाहारी हूँ। मैं रोज़ जंगल को जाता हूँ और एक-आध हिरन को मार लाता हूँ। यही
मेरा रोज़मर्रा का काम है। मेरे घर में रुपये-पैसे की कमी नहीं। मुझे कोई फ़िकर भी
नहीं। इसी सबब से हर रोज़ मैं शिकार के पीछे पड़ा रहता हूँ। मुझे शिकार का बड़ा
भारी शौक़ है। यहाँ तक कि मैं उसके सामने अपने माँ, बाप, पुत्र, कलत्र और प्यारे प्राणों को भी कोई
चीज़ नहीं समझता हूँ। आप लोग मेरे कहने को अगर झूठ समझते हों तो आप एक दिन के
शिकार का मेरा वृत्तांत सुन लीजिए। उस वृत्तांत को सुनकर मुझे भरोसा है कि आप यह
अनुमान कर सकेंगे कि मुझे शिकार ज़्यादा प्यारा है कि अपना प्राण। अच्छा, अब उस वृत्तांत को सुनिए—
मेरे यहाँ आदमियों की कमी नहीं है। अगर मैं चाहूँ तो शिकार को जाते
वक़्त एक की जगह कई आदमी ले जा सकता हूँ। लेकिन मेरी आदत कुछ ऐसी पड़ गई है कि चोर
की तरह अकेले जाना ही मुझे अच्छा लगता है। शिकार के हाथ लग जाने पर मुझे उतनी ही
ख़ुशी होती है जितनी कि चोर को मनमाना माल मिल जाने से होती है।
एक दिन की बात सुनिए। गर्मी का मौसम था। पल-पल पर गर्मी बढ़ती जाती
थी और आदमी पानी-पानी चिल्लाकर अपने गले को और भी ज़्यादा सुखाते जाते थे। ऐसे
वक़्त में मेरे गाँव के कुछ आदमी मेरे पास आए। उन्होंने कहा कि गाँव के पास का
तालाब क़रीब-क़रीब बिलकुल सूख गया है। बीच में थोड़ा-सा पानी रह गया है। वही पानी
पीकर हम लोग किसी तरह से अपने प्राण बचाते हैं। पर कई दिनों से, रात के वक़्त, एक बहुत बड़ा जंगली सूअर वहाँ पर आता
है। वह उस कुंड से पानी भी पीता है और उसमें लोटकर बचे हुए पानी को कीचड़ कर देता
है। इस वजह से वह पानी हम लोगों के पीने के लायक़ नहीं रह जाता। आप इसका कुछ
बंद-ओ-बस्त कीजिए।
यह सुनकर मुझे बड़ी ख़ुशी हुई, क्योंकि मैं एक शौक़ीन शिकारी हूँ और निशाना भी बहुत अच्छा लगाता
हूँ। मैंने उन लोगों से कहा कि आज चाँदनी रात है। इसलिए आज ही मैं इस सूअर का
शिकार खेलना चाहता हूँ। तुम अभी जाकर तालाब के पास के पेड़ पर एक मचान बना दो। वे
तो यह चाहते ही थे। उन्होंने फ़ौरन ही एक मचान मेरे लिए तैयार कर दिया।
रात हुई। आठ बज गए। मैंने खाने को खाया; अपनी मामूली शिकारी पोशाक पहनी; बंदूक़ हाथ में उठाई और एक भाला और एक
पेशक़ब्ज़ भी हाथ में लिया। इस तरह साज-सामान से दुरुस्त होकर मैं उस तालाब की तरफ
रवाना हुआ। तालाब के पास पेड़ पर मचान को देखकर मैं ख़ुशी से फूल उठा। भाले को
मैंने उस मचान के ठीक नीचे गाड़ दिया और चढ़कर उसके ऊपर आसन जमाकर मैं बैठ गया।
वहाँ पर मैं बिलकुल अकेला था। मगर मैं बड़ा निडर हूँ। मुझे ज़रा भी
डर न लगा। वायु मंद-मंद चल रही थी। उसने नींद को झटपट मेरी आँखों के सामने लाकर
खड़ा कर दिया। मगर मैं उसके क़ाबू में आनेवाला आदमी नहीं। इसलिए उस बेचारी को
मुझसे दो गज़ दूर ही खड़ा रहना पड़ा।
इतने में कुछ दूर पर मुझे आहट मालूम हुई। मैं समझ गया कि वराह महाराज
की सवारी आ गर्इ। मेरा यह अनुमान ठीक निकला। तालाब के पास एक गुफ़ा थी। वहीं पर वह
सूअर आकर कंद-मूल खोद-खोदकर खाने लगा। मैंने अपनी बंदूक़ सँभाली, और इस ताक में लगा, कि वह सूअर वहाँ से ज़रा और आगे बढ़े
तो मैं उसे अपनी गोली का निशाना बनाऊँ। इतने में एक और अजीब घटना हुई। जिस पेड़ पर
मैं था, उस पर एक बड़ा
ही भयानक साँप चढ़ा। साँप काला था। वह धीरे-धीरे मेरे मचान की तरफ बढ़ा और मेरे
ऊपर चढ़ आया। मैं काँप उठा। मैंने समझा कि मेरी मौत आ गई। मगर मैं चिल्लाया नहीं।
और न उस साँप को अपने शरीर से अलग फेंक देने ही की मैंने कोशिश की। मैंने सोचा कि
अगर मैं चिल्लाऊँगा, या
इस साँप को पकड़कर ज़मीन में पटकूँगा, तो आवाज़ सुनकर वह सूअर भाग जाएगा। अब आप समझ गए होंगे कि जैसा मैंने
ऊपर कहा है, मुझे
अपने प्राण उतने प्यारे नहीं है,
जितना कि मुझे शिकार प्यारा है।
मैं पत्थर का हो गया। ज़रा भी अपने आसन को मैंने नहीं हिलाया। वह
साँप पीठ से मेरे कंधे पर आया। और कंधे से पेट की तरफ़ नीचे उतरकर उसने अपना फ़न
मेरे पैर के अंगूठे और उसके पास की उँगली के बीच में डाला। अब मुझसे न रहा गया।
वहाँ पर मैंने उसके सिर को इस मज़बूती के साथ दबाया कि वह साँप एक ही मिनट में
फटक-फटक कर वहीं मर गया। मेरे शिकार का पहला कांड यहाँ पर ख़त्म हो गया।
शूकरराज अब तक उस गुफ़ा के पास खोद ही खाद में लगे थे, कि तालाब के पास पानी पीने के लिए एक
भयानक भालू आ पहुँचा। अगर मैं चाहता तो उसे वहीं पर मार गिराता। मगर सूअर के भाग
जाने के डर से मैंने ऐसा करना मुनासिब नहीं समझा। जाम्बुवान्नन्दन पानी पीकर तालाब
के पास खड़े-खड़े दम लेने लगे। इतने में एक बहुत बड़ा शेर आता हुआ दिखाई दिया। शेर
बहुत प्यासा था। इसलिए जल्दी-जल्दी क़दम बढ़ाता हुआ वह आ रहा था। रीछराज की नज़र
ज्योंही शेर पर पड़ी त्योंही आप पर क्वार के महीने की-सी जूड़ी चढ़ आई। आपको उस
वक़्त और कुछ न सूझा। आप काँपते हुए उसी पेड़ पर चढ़े जिसपर कि मैं बैठा हुआ था। मेरे
मचान के नीचे ही एक डाल थी। उसी पर वह आकर खड़ा हो गया और एक दूसरी डाल को अपने
अगले पैरों से उसने ख़ूब मज़बूती से पकड़ लिया। डर भी बुरा होता है। उस वक़्त मारे
डर के वह रीछ इतने ज़ोर से काँपता था कि वह उतना बड़ा पेड़ भी हिल रहा था। मैं आप
से कोई बात छिपाना नहीं चाहता। मेरा बदन पसीने-पसीने हो गया। मुझ पर ख़ौफ़ ग़ालिब
हो आया। मैंने कहा कि अगर मैं शोर करूँगा या कुछ भी हाथ-पैर हिलाऊँगा, तो यह रीछ फ़ौरन ही मुझ पर हमला करेगा।
इसलिए साहस करके मैं वहीं पर जमा हुआ बैठा रहा।
शेर तालाब के पास पहुँचा। पहुँचकर उसने अच्छी तरह पानी पिया। वह
किनारे पर बैठ गया, और
अपनी मूँछे सुधारने और धीरे-धीरे ग़ुर्राने लगा। शेर मेरे मचान के बिलकुल ही सामने
था। यह हालत देखकर उस पर वार करने के लिए मैंने अपनी बंदूक़ सँभाली। इस बीच में वह
सूअर गुफ़ा की तरफ़ से चला और तालाब के पास आया। अहा! वह सूअर था कि हाथी का
बच्चा! ऊँचाई में वह कोई छह फुट था। उसके दो दाँत हाथी के दाँतों के समान बाहर
निकले हुए थे वे इतने बड़े और मज़बूत थे कि तीन-चार फुट घेरे के तने वाले पेड़ को
भी वह एक ही आघात में गिरा सकता था। उसे देखकर यह शंका होती थी कि कहीं प्रत्यक्ष
दूसरे वराहजी तो नहीं अवतार ले आए।
आपने शायद सुना होगा कि बड़े-बड़े जंगली सूअर शेर से नहीं डरते। सूअर
के पैने-पैने प्रकाशमान दाँतों को देखकर शेर को सूअर पर हमला करने का साहस नहीं
होता था। सूअर को सामने आता देख मेरे शिकारी जोश ने ज़ोर पकड़ा। उस भयानक अवस्था
में भी मैंने कंधे पर बंदूक़ रखी और सूअर को लक्ष्य करके गोली छोड़ दी। यकायक दन
की आवाज़ हुई। सूअर को गोली लगी। मगर उसने समझा कि सामने बैठे हुए ग़ुर्राने वाले
शेर ने मुझ पर यह चोट की है। बस,
एकदम वह शेर पर टूट पड़ा। दोनों में बड़ा भयानक युद्ध हुआ। आख़िरकार
वनराज को शूकरराज की कराल डाढ़ों का चबैना हो जाना पड़ा। इधर मेरी गोली के आघात से
वराहजी भी स्वर्गलोक को सिधारे। यहाँ पर मेरे शिकार का दूसरा भी कांड समाप्त हुआ।
आपसे मैं कह चुका हूँ कि एक भाला मैं घर से ले आया था और मचान के
नीचे ही उसे मैंने सीधा खड़ा कर दिया था। ज्योंही मेरी बंदूक़ से गोली छूटी और दन
से आवाज़ हुई, त्योंही
नीचे डाल पर बैठे हुए रीछ ने समझा कि वह उसी पर छोड़ी गई । इससे मारे डर के उसके
हाथ से वह डाल, जो
उसने हाथों से पकड़ रखी थी, सहसा
छूट गई। रीछ डाल से नीचे गिरा। मगर ज़मीन पर पहुँचने के पहले ही मेरा भाला उसकी
छाती को पार कर गया। ज़रा देर में उस रीछ का भी काम तमाम हो गया और उसके साथ मेरे
शिकार का यह तीसरा कांड भी तमाम हुआ।
इस बहादुरी के लिए आप चाहे मुझे शाबाशी दें, चाहे मेरी सिफ़ारिश करके गवर्नमेण्ट से
विक्टोरिया-क्रास का पदक दिलावें,
मगर अब मैं कभी बंदूक़ हाथ से न उठाऊँगा। मैंने शिकार करना एकदम छोड़
दिया है। मैं नहीं चाहता कि मैं अपनी जान को फिर इतने बड़े जोखों में डालूँ।
निज़ाम शाह
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सुकून ही देना चाहां हमेशा तुम्हें
दुश्वारियां ले लीं मैंने सारी की सारी
कृष्णधर शर्मा 12.03.23
वर्ष 2020 के मध्य तक भारत जनसंख्या के मामले में चीन को पीछे छोड़ देगा ऐसा अनुमान है। वर्ष 2060 में भारत की जनसंख्या 1.65 अरब होने का आकलन भी किया गया है और इस शिखर तक पहुंचने के बाद संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि भारत की जनसंख्या में गिरावट आने लगेगी।
कई रिपोट्र्स 2050 तकभारत की जनसंख्या के स्थिर होने और 2060 के बाद उसमें गिरावट का अनुमान लगा रहा है। भारत की जनसंख्या वृद्धि दर बीते कुछ दशकों में कम हुई है मगर जितनी अधिक जनसंख्या भारत में है वह अभी भी दुनिया के कई देशों की तुलना में ज्यादा है।
अनुमान है कि भारत 2050 तक दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन जाएगा। जनसंख्या पर नियंत्रण भी पाया जून 2019 में जारी संयुक्त राष्ट्र के 'वर्ल्ड पापुलेशन प्रॉस्पैक्ट्स 2019' के अनुसार एक दशक से भी कम समय में भारत चीन को पीछे छोड़ देगा, किंतु जबसे संयुक्त राष्ट्र ने यह जनसंख्या संबंधी अनुमान लगाना शुरू किया है तबसे अब तक 2011 में भारत की जनसंख्या वृद्धि दर सबसे कम रही है।
2001 से 2011 तक तक भारत की जनसंख्या दर में गिरावट आई है। 1991 से 2001 तक यह 21.5 प्रतिशत रही थी तो 2001 से 2011 तक 17.7 प्रतिशत पर आ गई। भारत के 24 राज्यों औरकेंद्र शासित प्रदेशों ने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा प्रदर्शन किया है और यह इस बूते ही संभव हुआ है कि महिलाओं को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। इसमें वर्ष 2000 में बनी राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की भी अहम भूमिका रही है।
जनसंख्या वृद्धि दर इस तरह हुई कम
भारत की कुल जनसंख्या वृद्धि दर लगातार कम हुई है। कभी 1971 में एक स्त्री द्वारा औसतन 5.2 बच्चों को जन्म दिया जा रहा था। सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम 2017 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में यह दर लगातार कम हुई है। भारत प्रति स्त्री द्वारा 2.1 की संतोषजनक जन्म दर को अगले पांच वर्षों में प्राप्त कर सकता है। तब करीब-करीब 'यह हम दो हमारे दो' की स्थिति हो जाएगी।
2100 में देश में आधी आबादी को सहारे की जरूरत होगी संयुक्त राष्ट्र वर्ल्ड पापुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स के अनुसार वर्ष 1950 में भारत में प्रति 100 व्यक्तियों पर 6.4 बुजुर्ग थे। इस सदी के पूरा होने तक यानी 2100 में भारत में प्रति 100 व्यक्तियों में से 49.9 लोग ऐसे होंगे जो बुजुर्गावस्था में होंगे और उन्हें सहारे की जरूरत होगी। तब जितने लोग कामकाजी होंगे उतनी ही आबादी ऐसी भी होगी जिसे देखभालकी जरूरत होगी।
साभार- नयी दुनिया
केंद्र सरकार ने समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की दलीलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि पार्टनर के रूप में एक साथ रहना और समलैंगिक व्यक्तियों द्वारा यौन संबंध बनाना, जिसे अब अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है, भारतीय परिवार इकाई एक पति, एक पत्नी व उनसे पैदा हुए बच्चों के साथ तुलनीय नहीं है।
केंद्र ने जोर देकर कहा कि समलैंगिक विवाह सामाजिक नैतिकता और भारतीय लोकाचार के अनुरूप नहीं है। एक हलफनामे में, केंद्र सरकार ने कहा कि शादी की धारणा ही अनिवार्य रूप से विपरीत लिंग के दो व्यक्तियों के बीच एक संबंध को मानती है। यह परिभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक और कानूनी रूप से विवाह के विचार और अवधारणा में शामिल है और इसे न्यायिक व्याख्या से कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।
हलफनामे में कहा गया है कि विवाह संस्था और परिवार भारत में महत्वपूर्ण सामाजिक संस्थाएं हैं, जो हमारे समाज के सदस्यों को सुरक्षा, समर्थन और सहयोग प्रदान करती हैं और बच्चों के पालन-पोषण और उनके मानसिक और मनोवैज्ञानिक पालन-पोषण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। केंद्र ने जोर देकर कहा कि याचिकाकर्ता देश के कानूनों के तहत समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के मौलिक अधिकार का दावा नहीं कर सकते हैं।
हलफनामे में कहा गया है कि सामाजिक नैतिकता के विचार विधायिका की वैधता पर विचार करने के लिए प्रासंगिक हैं और आगे, यह विधायिका के लिए है कि वह भारतीय लोकाचार के आधार पर ऐसी सामाजिक नैतिकता और सार्वजनिक स्वीकृति का न्याय करे और उसे लागू करे।
केंद्र ने कहा कि एक जैविक पुरुष और एक जैविक महिला के बीच विवाह या तो व्यक्तिगत कानूनों या संहिताबद्ध कानूनों के तहत होता है, जैसे कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955, ईसाई विवाह अधिनियम, 1872, पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 या विशेष विवाह अधिनियम, 1954 या विदेशी विवाह अधिनियम, 1969। यह प्रस्तुत किया गया है कि भारतीय वैधानिक और व्यक्तिगत कानून शासन में विवाह की विधायी समझ बहुत विशिष्ट है। केवल एक जैविक पुरुष और एक जैविक महिला के बीच विवाह, यह कहा।
इसमें कहा गया है कि विवाह में शामिल होने वाले पक्ष एक ऐसी संस्था का निर्माण करते हैं, जिसका अपना सार्वजनिक महत्व होता है, क्योंकि यह एक सामाजिक संस्था है, जिससे कई अधिकार और दायित्व प्रवाहित होते हैं। हलफनामे में कहा गया है, शादी के अनुष्ठान/पंजीकरण के लिए घोषणा की मांग करना साधारण कानूनी मान्यता की तुलना में अधिक प्रभावी है। पारिवारिक मुद्दे समान लिंग से संबंधित व्यक्तियों के बीच विवाह की मान्यता और पंजीकरण से परे हैं।
केंद्र की प्रतिक्रिया हिंदू विवाह अधिनियम, विदेशी विवाह अधिनियम और विशेष विवाह अधिनियम और अन्य विवाह कानूनों के कुछ प्रावधानों को इस आधार पर असंवैधानिक बताते हुए चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आई कि वे समान लिंग वाले जोड़ों को विवाह करने से वंचित करते हैं। केंद्र सरकार ने समलैंगिक विवाह को मान्यता देने की दलीलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से कहा है कि पार्टनर के रूप में एक साथ रहना और समलैंगिक व्यक्तियों द्वारा यौन संबंध बनाना, जिसे अब अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया गया है।
केंद्र ने कहा कि हिंदुओं के बीच, यह एक संस्कार है, एक पुरुष और एक महिला के बीच पारस्परिक कर्तव्यों के प्रदर्शन के लिए एक पवित्र मिलन और मुसलमानों में, यह एक अनुबंध है, लेकिन फिर से केवल एक जैविक पुरुष और एक जैविक महिला के बीच ही परिकल्पित किया जाता है। इसलिए, धार्मिक और सामाजिक मानदंडों में गहराई से निहित देश की संपूर्ण विधायी नीति को बदलने के लिए शीर्ष अदालत की रिट के लिए प्रार्थना करने की अनुमति नहीं होगी।
केंद्र ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी समाज में, पार्टियों का आचरण और उनके परस्पर संबंध हमेशा व्यक्तिगत कानूनों, संहिताबद्ध कानूनों या कुछ मामलों में प्रथागत कानूनों/धार्मिक कानूनों द्वारा शासित और परिचालित होते हैं। किसी भी राष्ट्र का न्यायशास्त्र, चाहे वह संहिताबद्ध कानून के माध्यम से हो या अन्यथा, सामाजिक मूल्यों, विश्वासों, सांस्कृतिक इतिहास और अन्य कारकों के आधार पर विकसित होता है और विवाह, तलाक, गोद लेने, रखरखाव, आदि जैसे व्यक्तिगत संबंधों से संबंधित मुद्दों के मामले में या तो इसमें कहा गया है कि संहिताबद्ध कानून या पर्सनल लॉ क्षेत्र में व्याप्त है।
यह प्रस्तुत किया गया है कि समान लिंग के व्यक्तियों के विवाह का पंजीकरण भी मौजूदा व्यक्तिगत के साथ-साथ संहिताबद्ध कानूनी प्रावधानों का उल्लंघन करता है। हलफनामे में कहा गया है कि एक पुरुष और महिला के बीच विवाह के पारंपरिक संबंध से ऊपर कोई भी मान्यता, कानून की भाषा के लिए अपूरणीय हिंसा का कारण बनेगी।
साभार-देशबंधु.इन