क़त्ल कर शौक से मेरा तू ऐ बेरहम कातिल
गुनाह बताकर मारता तो मरने में भी मज़ा आता
कृष्णधर शर्मा 12.8.25
नमस्कार,आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757
क़त्ल कर शौक से मेरा तू ऐ बेरहम कातिल
गुनाह बताकर मारता तो मरने में भी मज़ा आता
कृष्णधर शर्मा 12.8.25
बचपन की यादें क्या बता पायेगा वह भला!
कि जो वक्त से पहले ही ज़िम्मेदार हो गया
कृष्णधर शर्मा 8.8.25
जाकर भी क्या हासिल उस गली में अब बता
कि छोड़ कर चले गए सब यार जिस गली को
कृष्णधर शर्मा 7.8.25
जाकर भी क्या हासिल उस गली में अब बता
कि छोड़ कर चले गए सब यार जिस गली को
कृष्णधर शर्मा 7.8.25
यूँ पुरखों की जमीन बेचकर शहरों में न जाया करो
कब छोड़ना पड़ जाए शहर! गाँव में भी घर बनाया करो
कृष्णधर
शर्मा 11.2.25
हमें अपनों से रिश्ता बचाना चाहिए
कभी-कभार बहस में हार जाना चाहिए
कृष्णधर शर्मा 11.2.25
बचपन कब बीता बुढ़ापे ने कब दस्तक दी!
जवानी दबकर रह गई जिम्मेदारियों के बोझ तले
कृष्णधर
शर्मा 28.12.24
कुल मिलाकर एक ही तो अच्छाई है मुझमें
नफरत करनेवालों से भी नफरत नहीं करता मैं
कोई लाख बुरा करले ये उसका करम
बदला लेने की कभी नीयत नहीं रखता मैं
कृष्णधर
शर्मा 26.12.24
मिल जाएं जब पुलिस और पंडे, फीके लगते हैं फिर गुंडे
डील-डौल से वजन में भारी, मांगते रहते सबसे रंगदारी
कृष्णधर शर्मा 30.11.24
किस्से तुम्हारे भी कुछ कम नहीं थे मेरे दोस्त
हमने तो अपने बता दिए तुम अपने छुपा गए
कृष्णधर शर्मा 26.11.24
यकीन मानिए जनाब मेरा आप
मजा माफ़ करने में भी बहुत आता है
कुछ गुनाहों की सजा छोड़ी भी जाती है
हर बात का बदला नहीं लिया जाता
कृष्णधर शर्मा 14.10.24
जिन्हें नहीं निभाने थे रिश्ते हमने भी उनको छोड़ दिया
जो न बन सके अपने कभी उनसे मुंह हमने भी मोड़ लिया
कृष्णधर शर्मा 25.9.24
चोट गहरी लगी होगी उसको जरुर यूँ ही कोई उदास नहीं होता
बात कुछ तो हुई होगी जरुर यूँ ही कोई मुस्कुराना नहीं छोड़ता
ये हमारी जबान ये तुम्हारी जबान
इसमें कहाँ खो गई इंसानी जबान
कृष्णधर शर्मा 23.5.24
कुछ तुमने मिलना कम किया कुछ हमने मिलना कम किया
इस तरह से एक रिश्ते को हमने मिलजुल कर खतम किया
कृष्णधर शर्मा 07.04.24
गिर जाते हैं भरभरा कर एक झटके में पुल बड़े-बड़े
नींव भी तो नहीं है हमारी बिसात ही फिर क्या
कृष्णधर शर्मा 02.11.23
मौत से बचकर भी पूरा कहाँ बच पाता है कोई
कुछ न कुछ ले ही जाती है वह छोड़ने के बदले
कृष्णधर शर्मा 22.05.23
रिश्ता भी निभाना बहुत जरुरी है आजकल के ज़माने में
समय तुम्हारे पास भी नहीं है, खाली हम भी नहीं बैठे हैं
कृष्णधर
शर्मा 17.04.23
कई तरह के जहर आजमाए मुझपर दुश्मन ने मेरे
शायद उसे पता नहीं था दवा और दुआ थे वो मेरे लिए
कृष्णधर शर्मा 26.03.23
सुकून ही देना चाहां हमेशा तुम्हें
दुश्वारियां ले लीं मैंने सारी की सारी
कृष्णधर शर्मा 12.03.23