मन योगी तन भस्म भया
तू कैसो हर्फ़ कमाया
अज़ल के योगी ने फूँक जो मारी
इश्क़ का हर्फ़ अलाया...
धूनी तपती मेरे मौला वाली
मस्तक नाद सुनाई दे
अंतर में एक दीया जला
आस्मान तक रोशनाई दे
कैसो रमण कियो रे जोगी!
किछु न रहियो पराया
मन योगी तन भस्म भया
तू ऐसी हर्फ़ कमाया...
अमृता प्रीतम
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