नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शुक्रवार, 21 अप्रैल 2023

पगडंडी

 

तब मैं ऐसी नहीं थी। लोग समझते हैं मैं सदा की ऐसी ही हूँ—मोटी, चौड़ी, भारी-भरकम, क्षितिज की परिधि को चीरकर अनंत को शांत बनाती, संसार के एक सिरे से लेकर दूसरे सिरे तक लेटी हुई। वह पुराना इतिहास है। कोई क्या जाने!

तब मैं न तो इतनी लंबी थी, न इतनी चौड़ी। न चेहरे पर ईंटों की सुर्ख़ी की ललाई थी, न शरीर पर कंकड़ों के गहने। मेरे दाएँ-बाएँ वृक्षों की जो ये कतारें देख रहे हो, वे भी नहीं थी, न फुटपाथ था, न बिजली के खंभे। अप्सराओं की-सी सजी न ये दुकानें थीं, न अंगूठी के नगीने की तरह ये पार्क। तब मैं एक छोटी-सी पगडंडी थी—दुबली, पतली, सुकुमार, नटखट!

 

कब से मैं हूँ, इसकी तो याद नहीं आती; किंतु ऐसा जान पड़ता है कि अमराई के इस पार की कोई तरुणी नदी से जल लाने के लिए उस पार गई होगी; जैसे किसी छोटी-सी नगण्य घटना के बाद किसी प्रथा का जन्म हो जाता है और उसके बाद फिर एक धर्म भी निकल पड़ता है। उसी तरह एक तरुणी के जल भर लाने के बाद गाँव की सारी तरुणियाँ घड़े में जल लेकर भटकती, इठलाती एक ही पथ से आती रही होंगी और फिर वहीं से मेरे जीवन की कहानी बह निकली।

मेरे अतीत के आकाश के दो तारे अब भी मेरे जीवन के सूनेपन की अँधियारी में झलमला रहे हैं। यों तो सारी अमराई, सारा गाँव मेरे परिचितों से भरा था, किंतु घनिष्ठता थी केवल दो जनों से, एक बट दादा और दूसरा था रामी का कुँआ।

 

बट दादा अमराई के सभी वृक्षों में बूढ़े थे और सभी उन्हें श्रद्धा और आदर से बट दादा कहा करते थे। थे तो वे वृद्ध, लेकिन उनका हृदय बालकों से भी सरल और युवकों से भी सरस था। वे अमराई के कुलपति थे। उनमें तपस्वियों का तेज़ भी था और गृहस्थों की कोमलता भी। उनकी सघन छाया के नीचे लेटकर बीते हुए युगों की वेदना और आह्लाद से भरी कहानियाँ सुनना, रिमझिम-रिमझिम वर्षा में उनकी टहनियों में लुककर बैठ पक्षियों की सरस बरसाती का मज़ा लूटना आज भी याद करके मैं विह्वल हो उठती हूँ।

ठीक इन्हीं से सटा हुआ रामी का कुँआ था—पक्का, ठोस, सजल, स्वच्छ, गंभीर, उदार। साँझ-सबेरे गाँव की स्त्रियाँ झन-झन करती आती और अमराई को अपने कल-कंठ से मुखरित करके कुएँ से पानी भरकर मुझे भिगोती हुई, रौंदती हुई चली जाती।

 

मेरी चढ़ती हुई जवानी का आदि भी इन्हीं से होता है, मध्य भी इन्हीं से और अंत भी इन्हीं से। भूलने की चेष्टा करने पर भी क्या कभी मैं इन्हें भूल सकती हूँ?

मनुष्य के जीवन का इतिहास प्रायः अपने सगों से नहीं परायों से बनता है। ऐसा क्यों होता है समझ में नहीं आता, किंतु देखा जाता है कि अकस्मात कभी की सुनी हुई बोली, किंचित मात्र देखा हुआ स्वरूप, घड़ी-दो-घड़ी का परिचय, जीवन के इतिहास की अमर घटना, स्मृति की अमूल्य निधि बनकर रह जाते हैं और अपने सगों का समस्त समाज अपने जीवन का सारा वातावरण कमल के पत्ते के चारों ओर के पानी की तरह छल-छल करते रह जाते हैं, उछल-उछलकर आते हैं, बह जाते हैं। टिक नहीं पाते। मैं सोचती हूँ ऐसा क्यों होता है? पर समझ नहीं पाती।

 

जेठ के दिन थे। अलस दुपहरी। गर्म हवा अमराई के वृक्षों में लुढ़कती फिरती थी। बट दादा ऊँघ रहे थे। एक वृक्ष में लिपटी हुई दो लताओं में झगड़ा हो रहा था। मैं तन्मय हो उनका झगड़ा सुन रही थी, इतने में ही कुएँ ने पूछा- पगडंडी, सो गई क्या?

'नहीं तो'—मैंने कहा- इन लताओं का झगड़ा करना सुन रही हूँ।

 

कुएँ ने हँसकर पूछा- बात क्या है?

मैंने कहा- कुछ नहीं, नाहक़ का झगड़ा है—दोनों मूर्ख हैं।

 

कुएँ ने हँसकर कहा- संसार में मूर्ख कोई नहीं होता, परिस्थिति सबको मूर्ख बनाती है। इस अमराई में तुम अकेली हो, कल एक और पगडंडी बन जाए तो क्या यह संभव नहीं कि फिर तुम दोनों झगड़ने लग जाओ?

मैं तिनक गई। बोली- साधारण बात में भी मेरा ज़िक्र खींच लाने का तुम्हें क्या अधिकार है?

 

कुएँ ने पूछा- उन्हें मूर्ख कहने का तुम्हें क्या अधिकार है?

मैंने कहा- मैं सौ बार कहूँगी, हज़ार बार कहूँगी, वे दोनों मूर्ख हैं, तुम भी मूर्ख हो, सब मूर्ख हैं?

 

इतने में ही बट दादा भी जग पड़े, बोले- किसको मूर्ख बना रही है? बात रुक गई, कुआँ चुप हो गया। दो दिन तक बोल-चाल बंद रही। मैंने जान-बूझकर उससे झगड़ा क्यों किया, इसे वह समझ नहीं पाया। इसलिए मुझे संताप भी हुआ और ग्लानि भी। स्त्री प्रेम से विह्वल हो जाती है और अपने उच्छ्वासित हृदय के उद्गारों को जब निरुद्ध नहीं कर पाती, तब वह झगड़ा करती है। स्त्री का सबसे बड़ा बल है रोना, उसकी सबसे बड़ी कला है झगड़ा करना। झगड़ा करके तिनकना, रूठकर रोना, फिर दूसरे को रुलाकर मान जाना, नारी-हृदय का प्रियतम विषय है। पुरुष चाहे कितना भी पढ़ा-लिखा हो, साहित्यिक हो, दार्शनिक हो, तत्वज्ञानी हो, यदि वह इतनी सीधी-सीधी बात नहीं समझ पाता तो सचमुच मूर्ख है।

यह घटना कुछ नई नहीं थी, नित्य की थी। कोई छोटी-सी बात लेकर हम झगड़ पड़ते, आपस में कुछ कह-सुन देते, फिर हफ़्तों एक-दूसरे से नहीं बोलते। किंतु वह बात जिसके लिए मैं सब कुछ करती, सारा झगड़ा खड़ा करती, कभी नहीं होती। कुआँ मुझे कभी नहीं मनाता था। अंत में हारकर मुझे ही बोलना पड़ता, तब वह बोलने लगता मानो कुछ हुआ ही नहीं। मैं मन ही मन सोचती यह कैसा विचित्र जीव है कि न तो इसे रूठने से कोई वेदना होती है और न मनाने से कोई आह्लाद। स्वयं भी नहीं रूठता, केवल चुप हो रहता है। बोलती हूँ तो फिर बोलने लगता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। हे ईश्वर! अपनी रचना की हृदयहीनता की सारी थैली क्या मेरे ही लिए खोल रखी है?

 

इस घटना पर मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया, किंतु वह बात रह-रहकर मेरे कानों में गूँज उठती- ‘इस अमराई में तुम अकेली हो, कल एक पगडंडी और बन जाए तो क्या यह संभव नहीं कि फिर तुम दोनों भी झगड़ने लग जाओ?' इसका प्रतिवाद मैंने कैसे किया? उससे झगड़ा किया, उसे मूर्ख बनाया। कुआँ समझता है कि मैं स्त्री हूँ और स्त्री-जाति की कमज़ोरी मेरी भी कमज़ोरी है और इसका प्रतिवाद करने के बदले में स्वयं उसके तर्क का प्रतिपादन कर देती हूँ, फिर मूर्ख मैं हुई या वह?

मुझे रह-रहकर अपनी निर्बलता पर क्रोध आ जाता। यदि उसे मेरे लिए कोई सहानुभूति नहीं, मेरे रूठने की कोई चिंता नहीं, मुझे मनाने का आग्रह नहीं तो फिर मैं क्यों उसके लिए मरने लगी। यदि वह हृदयहीन है तो मैं भी हृदयहीन बन सकती हूँ। यदि वह आत्म-निग्रह कर सकता है तो मैं भी अपने-आप पर संयम रखना सीख सकती हूँ। मैंने क़सम खाई कि फिर उससे रूठूँगी ही नहीं और यदि रूठूँगी तो फिर बोलूँगी नहीं चाहे जो भी हो, प्रेम के लिए स्त्रीत्व को कलंकित नहीं करूँगी।

 

एक दिन की बात है। आश्विन का महीना था। बरसात अभी-अभी बीती थी। न कीचड़ था, न धूल। छोटी-हरी घासों और जंगली फूलों के बीच में होकर मैं अमराई के इस पार से उस पार तक लेटी थी। इस सघन हरियाली के बीच में मुझे देखकर जान पड़ता मानो किसी कुमारी कन्या का सीमंत हो। शरद मेरे अंग-अंग में प्रतिबिंबित हो रहा था। मैं कुछ सोच रही थी, सहसा कुएँ ने कहा- पगडंडी, सुनती हो?

मैंने अन्यमनस्क-सी होकर कहा- कहो।

 

उसने कहा- तुम दिनों-दिन मोटी होती जा रही हो।

मैं कुछ भी नहीं बोली।

 

कुछ ठहरकर वह फिर बोला- तुम पहले जब दुबली थी, अच्छी लगती थी।

मैंने कहा- अगर मैं मोटी हो गई हूँ, तो केवल तुम्हें अच्छी लगने के लिए मैं दुबली होने की नहीं।

 

कुएँ ने कहा- यह तो मैंने कहा नहीं कि दुबली होकर तुम मुझे अच्छी लगोगी।

मैंने पूछा- तब तुमने कहा क्या?

 

उसने कहा- कवियों का कहना है कि दुबलापन स्त्रियों के सौंदर्य को बढ़ा देता है। मोटी होने से तुम कवियों की सौंदर्य की परिभाषा से दूर हट जाओगी।

मैंने खीझकर पूछा- तुम तो अपने को कवि नहीं समझते न?

 

उसने कहा- बिलकुल नहीं।

मैंने पूछा- फिर मोटी हो जाने पर मैं कवियों को अच्छी लगूँगी या बुरी, उससे तुम्हें मतलब?

 

उसने शांत भाव से कहा कुछ भी नहीं, केवल यही कि मैं उस परिभाषा को जानता हूँ और उसे तुम्हें भी बतला देना अपना कर्तव्य समझता हूँ।

मैने गंभीर होकर कहा- धन्यवाद।

 

स्त्री यदि वह सचमुच स्त्री है तो सब कुछ सह सकती है पर अपने रूप का तिरस्कार नहीं सह सकती। स्त्री चाहे घोर कुरूपा हो फिर भी पुरुष को उसे कुरूपा कहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं। स्त्री का स्त्रीत्व ही संसार का सबसे महान सौंदर्य है। उसके प्रति असुंदरता का संकेत करना भी उसके स्त्रीत्व को अपमानित करना है। स्त्री के स्वरूप का उपहास करना वैसा ही है जैसा पुरुष को कायर कहना। मैं समझ गई कि कुआँ मुझ पर मार्मिक आघात कर रहा है, नहीं उपहास करना चाहता है। मैंने मन-ही-मन प्रतिज्ञा की कि चाहे अंत जो भी हो, मैं भी नाज़ से युद्ध प्रारंभ करूँगी।

उसी दिन रात को चाँदनी खिली थी। रजनीगंधा के सौरभ से अमराई मस्त होकर झूम रही थी। बट दादा पक्षियों को सुलाकर अपने भी सोने का उपक्रम कर रहे थे। बोले- सो गई बेटी?

 

मैंने कहा- नहीं दादा, ऐसी चाँदनी क्या सदा रहती है? मेरे तो जी में आता है कि जीवन-भर ऐसे ही लेटे-लेटे चाँद को देखती रहूँ।

इतने ही में कुआँ बोला- दादा, अमराई में ब्याह के गीत अभी से गाने शुरू करवा दो।

 

दादा ने पूछा- कैसा ब्याह?

उसने कहा- देखते नहीं, प्रेम का पहला चरण प्रारंभ हो गया है, दूसरे चरण में कविताएँ बनेंगी, तीसरे चरण में पागलपन का अभिनय होगा, चौथे चरण में सगाई हो जाएगी।

 

मुझे मन-ही-मन गुदगुदी-सी जान पड़ने लगी। सोचा, आज इसे खिझाऊँगी।

मैंने हँसकर कहा- दादा, देखो, अपने-अपने भाग्य की बात है। ईश्वर ने तुम्हें इतना ऊँचा बनाया है। तुम अपनी असंख्य अंजलियों से सूर्य और चंद्रमा की किरणों का अजस्र पान करते हो और किसी एकांत से आती हुई वायु मे अनंत स्नान करके विस्तृताकाश में सिर उठाकर प्रकृति की अनंत विभूतियों का अनुशीलन करते हो। नक्षत्रों से भरी हुई रात में शत-शत पक्षियों को गोद में लिए हुए तुम चंद्रलोक की कहानी सुना करते हो, उषा और गोधूलि नित्य तुम्हें स्नेह से चूम लिया करते हैं, प्रकृति का अनंत भंडार तुम्हारे लिए उन्मुक्त हैं। मैं तुम्हारे जैसी ऊँची तो नहीं हूँ फिर भी दूर तक फैली हूँ। वसुंधरा अपनी सुषमा मेरे सामने बिखेर देती है, आकाश सूर्य और चंद्रमा की किरणों का जाल मेरे ऊपर फैला देता है। बसंत की मादकता, सावन की सजल हरियाली और शरद की स्वच्छ सुषमा मेरे जीवन में स्फूर्ति प्रदान करती हैं। मैं केवल जीती ही नहीं जीवन का उपभोग भी करती हूँ। किंतु मुझे दु:ख उन लोगों को देखकर होता है जिन्हें न तो सूर्य का प्रकाश मिलता है, न चंद्रमा की किरणें, अंधकार ही जिनके जीवन की भित्ति है और सूनापन ही जिनकी एक कहानी। वे आकाश को उतना ही बड़ा समझते हैं जितना उनके भीतर समाता है, वसुंधरा को उतनी ही दूर तक समझते हैं, जितना वे देख सकते हैं। दादा उनका अस्तित्व कैसा दयनीय है, तुमने कभी सोचा है?

 

दादा कुछ नहीं बोले, शायद सो गए थे। लेकिन कुआँ बोला- सुन रहे हो, दादा! पगडंडी कितना सच कह रही है। ऐसे लोगों से अधिक दयनीय जीवन किसका होगा? कुछ दिन पहले मैं भी यही सोचा करता था, किंतु मुझे जान पड़ा कि संसार में और भी अधिक दयनीय जीवन हो सकता है। ईश्वर ने जिसे सूर्य और चंद्रमा के आलोक से वंचित रखा, आकाश का विस्तार और वसुंधरा का वैभव जिसे देखने नहीं दिया, उस पर दया करके कम-से-कम उसे एक ऐसी चीज़ दे दी जिससे यह संसार का उपकार कर सकता है, जिसे वह अपना कह सकता है, जिसके द्वारा वह संसार का किसी-न-किसी रूप में लक्ष्य बन सकता है। किंतु उससे अधिक दयनीय तो वे हैं जिनके सामने सृष्टि का सारा वैभव बिखरा पड़ा है, किंतु जिनके पास अपना कहने को कुछ भी नहीं, रेखागणित की रेखा की तरह उनका अस्तित्व तो है, किंतु उनकी मुटाई, लम्बाई, चौड़ाई सब कुछ काल्पनिक है। उनका अस्तित्व किसी दूसरे के अस्तित्व में अंतर्निहित है! वे सभी के साधन हैं, किंतु लक्ष्य किसी के भी नहीं। ऐसे लोग भी दुनिया में हैं। दादा, क्या उन पर तुम्हें दया नहीं आती?

दादा विलकुल सो गए थे। मैंने तैश में आकर कहा- रामी के कुआँ, यदि तुम समझते हो कि तुम संसार के लक्ष्य हो और मैं केवल साधन-मात्र तो यह तुम्हारी भूल है। संसार में जो कुछ है साधन ही है, लक्ष्य कुछ भी नहीं। लक्ष्य शब्द मनुष्य की उलझी हुई कल्पना का फल है। लक्ष्य एक भावना-मात्र है, स्थूल और प्रत्यक्ष रूप में जिस किसी का अस्तित्व है, वह साधन ही है, चाहे जिस रूप में हो।

 

कुएँ ने गंभीर स्वर में कहा- तुमने मेरा पूरा नाम लेकर पुकारा इसके लिए धन्यवाद! मैं उत्तर में केवल दो बातें कहूँगा। पहली तो यह कि हमारा और तुम्हारा कोई अपना झगड़ा नहीं है, मैं समझता हूँ व्यक्तिगत रूप से न तुमने मुझे कुछ कहा है, न मैं तुम्हें कुछ कह रहा हूँ। दूसरी बात यह है कि जैसा तुम कह रही हो लक्ष्य और साधन में प्राकारिक अंतर न होते हुए भी पारिमाणिक अंतर है। संसार में लक्ष्य नाम की कोई चीज़ नहीं। ठीक है यहाँ जो कुछ है किसी-न-किसी रूप में साधन ही है, यह भी ठीक है। फिर भी मानना पड़ेगा कि साधनों में कुछ साधन ऐसी अवस्था में हैं जिन्हें साधन के अतिरिक्त दूसरा कुछ कहा ही नहीं जा सकता और कुछ साधन ऐसी अवस्था में पहुँच गए हैं जिन्हें संसार अपनी सुविधा के लिए लक्ष्य ही कहना अधिक उपयुक्त समझता है। इसका प्रत्यक्ष स्थूल प्रमाण यह है कि कुछ लोगों के यहाँ संसार आता है, हाथ फैलाकर कुछ माँगता है और फिर चला जाता है। संसार की स्थूल व्यावहारिक भाषा में वे तो हुए लक्ष्य और कुछ लोग ऐसे हैं जिनके यहाँ संसार आता है, किंतु इसलिए नहीं कि वह उनसे कुछ लेना चाहता है बल्कि इसलिए कि उनके द्वारा वह अपने लक्ष्य के पास पहुँच सकता है। तुम्हारी सूक्ष्म दार्शनिक भाषा में ऐसे लोग हुए साधन। समझी?

मैं कुछ कहना ही चाहती थी कि उसने रोक दिया, कहा- देखो, तुम्हारी चाँदनी डूब गई, अब तो सो सकती हो या नहीं?

 

कुछ दिन और बीते। मेरे प्रेम की आग पर आत्माभिमान की राख पड़ने लगी। कुआँ संसार का लक्ष्य है, मैं केवल एक साधन हूँ। फिर मेरा उसका प्रेम कैसे हो सकता है। मैं कभी-कभी सोचती प्रेम में प्रतियोगिता कैसी? मान लो, वह संसार में सब कुछ है और मैं कुछ भी नहीं, फिर भी क्या यह यथेष्ट कारण है कि यदि मैं उससे प्रेम करूँ तो वह उसका प्रतिदान न दे? कुआँ अपने सांसारिक महत्त्व के गर्व में चूर है। वह समझता है कि उसके सामने मैं इतनी तुच्छ हूँ कि मुझसे प्रेम करना तो दूर रहा, भर-मुँह बोलना भी पाप है। वह मुझसे घृणा करता है, मेरा उपहास करता है, बात-बात में मुझे नीचा दिखाना चाहता है। बर्बर पुरुष जाति!

मैं दिनों-दिन उससे दूर हटने की चेष्टा करने लगी। उसके सामीप्य में मेरा दम घुटने लगा। वह महत्त्वशाली है, संसार उसके सामने भिखारी बनकर आता है और मैं? मेरा तो कोई अस्तित्व ही नहीं, किसी लक्ष्य तक पहुँचने का एक साधन-मात्र हूँ। मेरी उसकी क्या तुलना?

 

साँझ-सबेरे गाँव की स्त्रियाँ आती और पानी भर ले जाती। अलस दुपहरी में पथिक अमराई में विश्राम करने के लिए आते और कुएँ के पानी में सत्तू सानकर खाते फिर थोड़ी देर वृक्षों के नीचे लेटकर अपनी राह चले जाते। गाँव के छोटे-छोटे लड़के अमराई में आकर फल तोड़ते, कुएँ से पानी खींचते और फिर फल खाकर मुँह-हाथ धोकर चले जाते। जहाँ देखो, उसी की चर्चा, उसी की बात। मैं अपनी नगण्यता पर मन-ही-मन कुढ़कर जली-सी जाती। मुझे जान पड़ता मानो संसार मेरा उपहास कर रहा है, आकाश मेरा तिरस्कार कर रहा है, पृथ्वी मेरी अवहेलना कर रही है। मेरा अस्तित्व रेखागणित की रेखाओं और बिंदुओं का अस्तित्व है। मैं सबकी हूँ पर मेरा कोई नहीं, मैं भी अपनी नहीं, केवल संसार को किसी लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए साधन-सी बनकर जी रही हूँ। मुझे यहाँ से हटना ही पड़ेगा। चाहे जहाँ भी जाऊँ, जाऊँगी ज़रूर। हृदय की शांति की खोज में वन-वन भटकूँगी, वसुंधरा के एक छोर से लेकर दूसरे छोर तक के अनंत विस्तार को छान डालूँगी, यदि कहीं शांति नहीं मिली तो किसी मरुभूमि की विशाल सैकत राशि में जाकर विलीन हो जाऊँगी, या किसी विजन पर्वत-माला की अँधेरी गुफ़ा में जाकर सो रहूँगी, फिर भी यहाँ न रहूँगी। वहाँ से मैं हटने का उपक्रम करने लगी।

आधी रात थी। चाँदनी और अंधकार अमराई के वृक्षों के नीचे गाढ़ालिंगन में बंधे सो रहे थे। मुझे उस रात की सारी बातें अब भी याद हैं, मानो अभी कल ही की हो। मैं अपने अतीत जीवन की कितनी ही छोटी-छोटी स्मृतियाँ सहेज रही थी। इतने में कुएँ ने पुकारा- पगडंडी!

 

निशीथ के सूनेपन में उसकी आवाज़ गूँज उठी? मैं चौंक पड़ी। इतने दिनों के बाद आज कुआँ मुझे पुकार रहा है, मेरा कौतूहल उमड़ने लगा।

मैंने कहा- क्या है?

 

कुआँ थोड़ी देर चुप रहा, फिर पुकारा- पगडंडी!

शायद उसने मेरा बोलना सुना ही नहीं। मुझे आश्चर्य होने लगा, क्या आज कोई अभिनय होगा? मैंने संयत स्वर में कहा- क्या है?

 

कुआँ बोला- पगडंडी, मैं तुमसे एक बात पूछना चाहता हूँ।

मैंने कहा- पूछो।

 

वह बोला- शायद तुम यहाँ से कहीं जा रही हो?

उस समय बिजली भी गिर पड़ती तो मुझे उतना आश्चर्य न होता। इसे कैसे मालूम हुआ? यदि मान लूँ कि किसी तरह मालूम भी हो गया तो फिर इसे क्या मतलब? मैं क्षण-भर में ही न जाने क्या-क्या सोच गई, कितने ही भावों से मेरा हृदय उथल-पुथल हो उठा, किंतु मैंने सारा आवेग रोककर उदासीन स्वर में कहा- हाँ!

 

कुआँ थोड़ी देर चुप रहा, फिर बोला- तुम इस अमराई से जा रही हो, अच्छा है। मैं बहुत प्रसन्न हूँ।

मैं कुछ उत्तर देने जा रही थी, तब तक उसने रोक दिया- ठहरो, मेरी बात सुन लो। जब तुम पहले-पहल यहाँ आई थी तब जितना प्रसन्न मैं हुआ, उतना और कोई नहीं। आज जब तुम यहाँ से जा रही हो, तब भी जितनी ख़ुशी मुझे हो रही है, उतनी और किसी को नहीं। तुम इसका कारण जानती हो?

 

मैं कुछ नहीं बोली।

वह कहने लगा- मैं तुम्हें किसी दिन कहने वाला ही था! तुमने स्वयं जाने का निश्चय कर लिया। यह और भी अच्छा हुआ।

 

मैंने अन्यमनस्क-सी कहा- संसार में जो कुछ होता है, अच्छा होता है।

कुआँ बोला- पगडंडी, तुम यहाँ से जा रही हो, संभावना यही है कि फिर तुम कभी लौटकर नहीं आओगी। तुम्हारे जाने के पहले मैं तुमसे अपने हृदय की एक बात, एक चिरसचित बात कहूँगा, सुनोगी तो?

 

मेरे हृदय में उस समय दो धाराएँ बह रही थीं—एक संशय की, दूसरी विस्मय की। फिर भी इतना है कि संशय से अधिक मुझे विस्मय ही हुआ। मैंने सारा कौतूहल दबाकर कहा- कहते जाओ।

कुआँ कहने लगा- मुझे अधिक कुछ नहीं कहना है। केवल दो बातें हैं। मैंने तुमसे कभी नहीं कहा था। इसका कारण यह है कि अब तक कहने का समय नहीं आया था। तुम अब जा रही हो, जान पड़ता है वह समय आ गया, इसलिए कह रहा हूँ।

 

थोड़ा रुककर, फिर अपने स्वाभाविक दार्शनिक ढंग से उसने कहना शुरू किया-

पहली बात यह है कि तुम्हारे प्रति अगाध प्रेम होते हुए भी आज तक मैंने ज़ाहिर क्यों नहीं होने दिया। मुझे याद है जिस दिन आकाश के ज्योतिष्पथ की तरह तुम पहले-पहल इस अमराई में आकर बिछ गईं, उस दिन मैंने दादा से पूछा- दादा, यह कौन है? दादा ने विनोद से कहा- तुम्हारी बहू! मैं झेंप गया। तब से लेकर आज तक एक युग बीत गया! कितने बसंत आए, कितनी बरसातें आईं, इस अमराई की सघन छाया में हम दोनों ने कितनी कहानियाँ सुनी, कितने गीत सुनकर फिर भूल गए और कितनी बार हम आपस में लड़े-झगड़े हैं। इस अतीत जीवन की छोटी-से-छोटी घटना भी मेरे स्मृति-पट पर अमर-रेखा बनकर खिंच गई है और उन टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं को जोड़कर जो अक्षर बनते हैं उसका एक मात्र अर्थ यही निकलता है कि इस अमराई में छोटी, पतली-सी जो एक पगडंडी है, उस पगडंडी के सूने उपेक्षित जीवन का जो निष्कर्ष है वह किसी एक युग या एक देश का नहीं, विश्व-भर के अनंतकाल के लिए आलोक-स्तंभ बन सकता है। वह न रहे, किंतु उसकी कृपा युग-युग तक कल्पना-लोक के विस्तृताकाश में स्त्रीत्व का आदर्श बन आकाश-दीप-सी झिलमिलाती रहेगी।

 

किंतु इतना होते हुए भी आज तक मैंने तुमसे कभी कुछ कहा क्यों नहीं?

इतना ही नहीं, मैंने अब तक तुम्हारे प्रति केवल उदासीनता और कठोरता के भाव ही प्रकाशित किए। नीरस उपेक्षा, आलोचनात्मक विनोद, इसके अतिरिक्त मुझे याद नहीं मैं और भी तुम्हें कुछ दे सका हूँ या नहीं। किंतु क्यों? केवल एक ही कारण था।

 

पगडंडी, मैं तुम्हें जानता था, तुम्हारे हृदय को अच्छी तरह पहचानता था। मैं तुम्हारे जीवन का दार्शनिक अध्ययन कर रहा था। मैं जानता था संसार के कल्याण के किस अभिप्राय को लेकर तुम्हारे जीवन का निर्माण हुआ है। मैं जानता था किस लक्ष्य को लेकर विश्व की रचनात्मक शक्ति ने तुम्हें स्वर्ग से लाकर इस अमराई की घासों और पत्ती की सेज पर सुला दिया है। मैं यह भी जानता था कि तुम्हारे अवतरण का जो अंतर्निहित अभिप्राय है, वह किस पथ पर चलकर तुम अधिक-से-अधिक प्राप्त कर सकती हो।

जिस महान उद्देश्य को लेकर तुम जन्मी हो, उसे मैं जानता हूँ, इच्छा रहते हुए भी मैं तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता। किंतु हाँ, एक बात कर सकता हूँ। गायक अपनी तान को आरोह-अवरोह के बीच में नचाता हुआ ले जाकर सम पर बिठा देता है। सुनने वाले उसे सहायता नहीं दे सकते फिर भी अंत में सम पर एक बार सिर हिला देते हैं। तान लौटकर घर आ गई, सबका सिर हिल गया। पगडंडी, अपने जीवन के उच्चादर्श को तुम्हें अकेले ही निभाना पड़ेगा, मैं केवल इतना ही कर सकूँगा कि जिस दिन तुम्हारे जीवन की तान लौटकर घर आ जाएगी, उस दिन उस संगीत में अपने को बहाकर सिर हिला दूँगा! तुम्हारे जीवन-संगीत के सम पर अपने को निछावर कर दूँगा, बस।

 

प्रेम से स्वर्ग मिलता है, किंतु उससे भी ऊँचा, उससे भी पवित्र एक स्थान है। उसका वही पथ है जिस पर तुम जा रही हो, सेवा। प्रेम सभी कर सकते हैं, किंतु सेवा सभी नहीं कर सकते। प्रेम करना संसार का स्वभाव है, किंतु सेवा एक साधना है। प्रेम हृदय की सारी कोमल भावनाओं का आकुंचन है, सेवा उनका प्रसार। प्रेम में स्वयं लक्ष्य बनकर अपना एक कोई लक्ष्य बनाना पड़ता है, सेवा में अपने को संसार का साधन बनाकर संसार को अपनी साधनाओं की तपोभूमि बना देना पड़ता है। प्रेम यज्ञ है और सेवा तपस्या। प्रेम से प्रेमिक मिलता है और सेवा से ईश्वर।

जन्म से लेकर आज तक तुम सेवा के पथ पर ही रही हो और अब भी उत्तरोत्तर उसी पर आगे बढ़ती जा रही हो। तुम्हारे मार्ग में जो सबसे वड़ा विघ्न बनकर खड़ा हो सकता है वह है प्रेम। प्रेम मनुष्यत्व है और सेवा देवत्व। तुम्हारी आत्मा स्वर्गिक होते हुए भी तुम्हारा शरीर भौतिक है। आत्मा और शरीर का द्वंद्व संसार की अमर कहानी है। बसंत जब अपना मधु-कलश पृथ्वी पर उड़ेल देता है, वर्षा जब वन-वन में हरियाली बिखरा देती है, शरद् के शुभ्राभ्र-खंड जब आकाश में तैरने लगते हैं, तब आत्मा की साधनाओं में शरीर छोटे-छोटे सपने छींट देता है, सामवेद की मधुर गंभीर ध्वनि में मेघ-मल्लार की मस्तानी ताने भीन जाती हैं, सोमरस में कादंब की बूँदें चू पड़ती हैं, कैलाश में बसंत आ जाता है। यह बहुत पुरानी कथा है। युग-युगांतर से यही होता आया है और यही होता रहेगा। फिर भी सभी इसे भूल जाते हैं। आँखे झप जाती हैं, तपस्या के शुभ्र प्रत्यूष में अनुराग की अरुण उषा छिटक पड़ती है, साधना की बर्फ़ गलने लगती है, लगन की आग मँझाने लगती है, हृदय की एकांतता में किसी की छाया घुस पड़ती है, जागृति में अंगड़ाई भर जाती है, स्वप्नों में मादकता भीन जाती है, और...और जब आँखें खुलती हैं तब कहीं कुछ नहीं रहता। फिर से नई कहानी शुरू होती है—नई यात्रा होती है, नया प्रस्थान होता है, इसी तरह यह संसार चलता है।

 

आत्मा के ऊपर शरीर का सबसे बड़ा प्रभाव है संशय। जब संसार में सभी किसी-न-किसी से प्रेम करते हैं, सभी का कोई-न-कोई एक अपना है, जब किसी से प्रेम करना, किसी के प्रेम का पात्र बनना प्राणिमात्र का अधिकार है, तब फिर मैं—केवल मैं ही—क्यों इससे वंचित रहूँ? यह जीव की अमर समस्या है, शाश्वत प्रश्न है।

किंतु सत्य क्या है, लोग यह समझने की बहुत कम चेष्टा करते हैं। जिनके पैर हैं वे ज़मीन पर चलते है, किंतु जिन्हे पंख मिले हैं यदि वे भी ज़मीन पर ही चले तो यह अपनी शक्तियों का दुरुपयोग है। जिन्हें ईश्वर ने आकाश में उड़ने के लिए बनाया है, उनके लिए पृथ्वी पर चलना अपने महत्व की उपेक्षा करना है, अपने आपको भूलना है।

 

प्रेम करने की योग्यता सबमें है, किंतु सेवा करने की शक्ति किसी-किसी को ही मिलती है। सेवा करने की योग्यता रखना दंड नहीं, ईश्वर का आशीर्वाद है जिसे ईश्वर ने संसार में अकेला बनाया है, धन-वैभव नहीं दिया है, सुख में प्रसन्न होने वाला और दुःख में गले लगाकर रोने वाला साथी नहीं दिया है, संसार के शब्दों में जिसे उसने दुखिया बनाया है, उसके जीवन में उसने एक महान अभिप्राय भर दिया है, शक्ति का एक अमर, स्रोत, बेचैनी की तड़फड़ाती हुई आँधी, उसके अंतर में संजोकर रख दी है। हो सकता है वह इसे न समझे, शायद संसार भी इसे न समझे; फिर भी वह नहीं है, ऐसी बात नहीं; वह है, आवश्यकता है केवल उसे समझने की।

पगडंडी, तुम ईश्वर की उन्हीं रचनाओं में से एक हो। तुम्हारा निर्माण इसलिए नहीं हुआ है कि तुम एक की होकर रहो, एक के लिए जियो और एक के लिए मरो। नहीं, तुम पृथ्वी पर एक बहुत बड़ा उद्देश्य लेकर आई हो। जेठ की धधकती हुई लू में, भादों की अजस्त्र वर्षा में और शिशिर के तुषार-पात में इसी तरह लेटी रहकर तुम्हें असंख्य मनुष्यों को घर से बाहर और बाहर से घर पहुँचाना पड़ेगा। सभ्यता के विस्तार के लिए, जीवन के सौख्य के लिए, संसार के कल्याण के लिए, तुम्हें बड़ा-से-बड़ा त्याग करना पड़ेगा। तुम्हारा कोई नहीं है, इसलिए कि सभी तुम्हारे हैं, तुम किसी की नहीं हो, इसलिए कि तुम सभी की हो। तुम अपने जीवन का उपभोग नहीं करती हो, तुम विश्व की अक्षय विभूति हो।

 

आज के पहले मैंने तुमसे कभी कुछ नहीं कहा था, कारण यह था—पगडंडी, मेरी स्पष्टवादिता को क्षमा करना कि तुम्हारी आत्मा सोई हुई थी,केवल शरीर जगा था। तुम नहीं समझती थी कि तुम कौन हो, किसलिए यहाँ आई हो, तुम संसार के पुराने पथ पर चलना चाहती थी। आज, चाहे जिस कारण से हो तुम्हें अपने वर्तमान जीवन से असंतोष हो गया है, तुम्हें अपने से घृणा हो आई है। आज तुम अनंत में कूदने जा रही हो, संसार में कुछ करने जा रही हो, तुम्हारी आत्मा जग उठी है। इन बातों को कहने का मुझे आज ही अवसर मिला है।

पगडंडी, तुम ऐसा न समझना कि मैं तुमसे स्नेह नहीं करता, उससे भी अधिक मैं तुम्हारी पूजा करता हूँ। फिर भी अपने व्यक्तित्व को तुम्हारे पथ में खड़ा करके मैं तुम्हारी आत्मा की प्रगति को रोकना नहीं चाहता। मैं तुम्हारी चेतना में अपनी छाया डालकर उसे मलिन नहीं करना चाहता। तुम्हारी संगीत-लहरी में अपवादी स्वर बनकर उसे बेसुरा बनाना नहीं चाहता। मैं बड़े उल्लास से तुम्हें यहाँ से विदा करता हूँ। जाओ—संसार में जहाँ तुम्हारा अधिक उपयोग हो सके, वहाँ जाओ और अपने जीवन को सार्थक बनाओ यही मेरी कामना है, यही मेरा संदेश है, यही मेरा...क्षमा करना...आशीर्वाद है।

 

केवल एक बात और कहनी है। मेरी हृदयहीनता को भूल जाना—हो सके तो क्षमा कर देना। मेरे भी हृदय है, उसमें भी थोड़ा रस है, पर मैंने जान-बूझकर उसे सुखा दिया, उसे आँखों में नहीं आने दिया, ओठों पर से पोंछ डाला। तुम्हारे कर्तव्य-पथ को मैं अपने आँसुओं से गीला नहीं बनाना चाहता—पगडंडी, मेरी कथा समझने की कोशिश करना, यदि न समझ पाओ तो... तो फिर सब कुछ भूल जाना।

संसार तुम्हारी राह देख रहा है, अनंत तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। जाओ, अपना कर्तव्य पालन करो। संसार तुम्हें कुचले तो तड़पना नहीं, भूल जाए तो सिसकना नहीं? भूले हुए पथिकों को घर पहुँचा देना जो घर छोड़कर विदेश जाना चाहते हों उनकी सहायता करना। जब तक जीना, ख़ुश रहना, कभी किसी के लिए रोना नहीं और—एक बात और—यदि तुम्हारे हृदय में कभी प्रेम की भावना आ जाए तो कोशिश करके अपने अस्तित्व का सारा बल लगाकर उसे निकाल डालना। यदि न निकाल सको तो फिर वहाँ से कहीं दूर—बहुत दूर—चली जाना।

 

पगडंडी! विदा! तुम अपने ज्योतिर्मय भविष्य में अपने धुंधले अतीत को डुबो देना। सब कुछ भूल जाना—बट दादा और रामी के कुआँ को भी भूल जाना! केवल यही याद रखना कि तुम कौन हो और तुम्हारा कर्तव्य क्या है—बस जाओ, विदा!—ईश्वर तुम्हें बल दे।

कुआँ चुप हो गया। आधी रात की स्वप्निल नीरवता में जान पड़ता था, उसका स्वर अब भी गूंज रहा हो, शब्द अंतरिक्ष में अब भी घुमड़ते फिरते हो। मैं कुछ बोल नहीं सकी, सोच भी नहीं सकी। तन्द्रा-सी छा गई, काठ-सा मार गया। उसके अंतिम शब्द अर्द्धरात्रि के शून्य अंधकार में बिजली के अक्षरों में मानो चारों ओर लिखे हुए से उग रहे थे—बस जाओ, विदा, ईश्वर तुम्हें बल दे।

 

ठीक-ठीक याद नहीं आता, कितने दिन हुए, फिर भी एक युग-सा बीत गया। मेरी आँखों के सामने वह स्वरूप आज भी रह-रहकर नाच उठता है, कानों में वे शब्द अब भी रह-रहकर गूंज उठते हैं।

अब मैं राजधानी का राजमार्ग हूँ। दोनों ओर सहेलियों की तरह दो फुट-पाथ हैं, धूप और वर्षा से बचाने के लिए दोनों ओर वृक्षों की क़तारें हैं, रौशनी के लिए बिजली के खंभे हैं, और न-जाने विभव-विलास की कितनी चीज़ें हैं। नित्य मेरा शृंगार होता है, मेरी देख-रेख में हज़ारों रुपये ख़र्च किए जाते हैं, राजमहिषी की तरह मेरा सत्कार होता है, जहाँ तक दृष्टि जाती है—बस, मैं ही मैं हूँ।

 

उत्तरदायित्व भी कम नहीं है। मैं शहर की धमनी हूँ, इसका रक्त-प्रवाह मुझी से होकर चारों ओर दौड़ता है। मैं सभ्यता का स्तंभ हूँ, राज-सत्ता का प्राण हूँ। इतनी भीड़ रहती है कि सोचने की फ़ुर्सत भी नहीं मिलती। जनसमुद्र की अनंत लहरें मुझे कुचलती हुई एक ओर से दूसरी ओर निकल जाती हैं, मैं उफ़ तक नहीं करती। इतनी भीड़ में मुझे अपना कहने वाला एक भी नहीं, एक क्षण के लिए भी मेरा होने वाला कोई नहीं। मेरे जलते हुए निर्विश्राम जीवन पर सहानुभूति की दो बूँद छिड़क दे, ऐसा कोई नहीं। फिर भी मैं व्यथित नहीं होती, ख़ुश रहने की कोशिश करती हूँ। वेदना के शोलों पर मुस्कुराहट की राख बिखेरती रहती हूँ, ओठों में हृदय को छिपाए रखती हूँ। जहाँ तक होता है, उसने जो कुछ कहा था, सब करती हूँ। केवल एक ही बात नहीं होती, उसे भूल नहीं पाती!

अमराई की छाया में घासों और पत्तों पर वह जीवन, पक्षियों के गाने, लताओं का झगड़ा, बट दादा की कहानियाँ, और...और क्या कहूँ? कितनी बातें हैं जो भुलाई नहीं जा सकती? मेरे जीवन-संगीत की तान लौटकर सम पर आती है, आकर फिर लौट जाती है, पर किसी का सिर नहीं हिलता?

 

यह पुराना इतिहास है। कोई क्या जाने? एक समय था जब मैं ऐसी नहीं थी।

 

कमलाकांत वर्मा

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