नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शनिवार, 15 जून 2024

गोली दाग़ो पोस्टर

 

यह उन्नीस सौ बहत्तर की बीस अप्रैल है या

किसी पेशेवर हत्यारे का दायाँ हाथ या किसी जासूस

 

का चमड़े का दस्ताना या किसी हमलावर की दूरबीन पर

टिका हुआ धब्बा है

 

जो भी हो—इसे मैं केवल एक दिन नहीं कह सकता!

जहाँ मैं लिख रहा हूँ

 

यह बहुत पुरानी जगह है

यहाँ आज भी शब्दों से अधिक तंबाकू का

 

इस्तेमाल होता है

आकाश यहाँ एक सूअर की ऊँचाई भर है

 

यहाँ जीभ का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है

यहाँ आँख का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है

 

यहाँ कान का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है

यहाँ नाक का इस्तेमाल सबसे कम हो रहा है

 

यहाँ सिर्फ़ दाँत और पेट हैं

मिट्टी में धँसे हुए हाथ हैं

 

आदमी कहीं नहीं है

केवल एक नीला खोखल है

 

जो केवल अनाज माँगता रहता है—

एक मूसलाधार बारिश से

 

दूसरी मूसलाधार बारिश तक

यह औरत मेरी माँ है या

 

पाँच फ़ीट लोहे की एक छड़

जिस पर दो सूखी रोटियाँ लटक रही हैं—

 

मरी हुई चिड़ियों की तरह

अब मेरी बेटी और मेरी हड़ताल में

 

बाल भर भी फ़र्क़ नहीं रह गया है

जबकि संविधान अपनी शर्तों पर

 

मेरी हड़ताल और मेरी बेटी को

तोड़ता जा रहा है

 

क्या इस आकस्मिक चुनाव के बाद

मुझे बारूद के बारे में

 

सोचना बंद कर देना चाहिए?

क्या उन्नीस सौ बहत्तर की इस बीस अप्रैल को

 

मैं अपने बच्चे के साथ

एक पिता की तरह रह सकता हूँ?

 

स्याही से भरी दवात की तरह—

एक गेंद की तरह

 

क्या मैं अपने बच्चों के साथ

एक घास भरे मैदान की तरह रह सकता हूँ?

 

वे लोग अगर अपनी कविता में मुझे

कभी ले भी जाते हैं तो

 

मेरी आँखों पर पट्टियाँ बाँधकर

मेरा इस्तेमाल करते हैं और फिर मुझे

 

सीमा से बाहर लाकर छोड़ देते हैं

वे मुझे राजधानी तक कभी नहीं पहुँचने देते हैं

 

मैं तो ज़िला-शहर तक आते-आते जकड़ लिया जाता हूँ!

सरकार ने नहीं—इस देश की सबसे

 

सस्ती सिगरेट ने मेरा साथ दिया

बहन के पैरों के आस-पास

 

पीले रेंड़ के पौधों की तरह

उगा था जो मेरा बचपन—

 

उसे दारोग़ा का भैंसा चर गया

आदमीयत को जीवित रखने के लिए अगर

 

एक दरोग़ा को गोली दाग़ने का अधिकार है

तो मुझे क्यों नहीं?

 

जिस ज़मीन पर

मैं अभी बैठकर लिख रहा हूँ

 

जिस ज़मीन पर मैं चलता हूँ

जिस ज़मीन को मैं जोतता हूँ

 

जिस ज़मीन में बीज बोता हूँ और

जिस ज़मीन से अन्न निकाल कर मैं

 

गोदामों तक ढोता हूँ

उस ज़मीन के लिए गोली दाग़ने का अधिकार

 

मुझे है या उन दोग़ले ज़मींदारों को जो पूरे देश को

सूदख़ोर का कुत्ता बना देना चाहते हैं

 

यह कविता नहीं है

यह गोली दाग़ने की समझ है

 

जो तमाम क़लम चलाने वालों को

तमाम हल चलाने वालों से मिल रही है।

 

आलोकधन्वा

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