नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

बुधवार, 17 सितंबर 2025

कविताएँ लिखनी चाहिए

 

जैसा कि एक कवि कहता है कि मातृभाषा में ही लिखी जा सकती है कविता

तो मातृभाषा को याद रखने के लिए लिखी जानी चाहिए कविता

 

और इसलिए भी कि यह समझ धुँधली न हो

कि पिता पहला तानाशाह होते हैं

 

और जैसा कि मैं कह गया हूँ माँएँ पहला कम्युनिस्ट

पड़ोसियों ने फ़ासिस्ट न होने की गारंटी कभी नहीं दी

 

इलाहाबाद से दिल्ली के सफ़र के शुरू में

एक आदमी ने सीट को एक्सचेंज करने का प्रस्ताव रखा

 

फिर उसने कहा कि और क्या एक्सचेंज किया जा सकता है

मैंने कहा कि मैं किसी को अपना कोहराम नहीं देने वाला

 

जाते-जाते वह कह गया कि झूठ पर फ़िल्म बनाने के बहुत पैसे मिलते हैं

मैंने ग़ायब होने के पहले कहा

 

कि जो संरक्षण संविधान में कवि को मिलना चाहिए था वह गाय को मिल गया

पान खाते हुए वह हँस पड़ा और उसका सारा थूक मेरे मुँह पर पड़ गया

 

कविताएँ लिखनी चाहिए ताकि कवि नैतिक अल्पसंख्यक न रह जाएँ

कविताएँ लिखी जानी चाहिए ताकि मुक्केबाज़ के तौर पर मोहम्मद अली की याद रहे

 

और देश के तौर पर वियतनाम की

और बसने के लिए फ़िलिस्तीन से बेहतर कोई देश न लगे

 

और वेमुला होना सबसे ज़्यादा मनुष्य होना लगे

कविताएँ लिखनी चाहिए क्योंकि ऋतुओं और बहनों के बग़ल से गुज़रने को

 

कविताएँ ही रजिस्टर करती हैं और पत्तों और आदमी के गिरने को

कविताएँ लिखी जानी चाहिए क्योंकि कवि ही करते हैं वापस पुरस्कार

 

और उन्हें ही आती है अख़लाक़ पर कविताएँ लिखते हुए रो पड़ने की अप्रतिम कला

 

देवी प्रसाद मिश्र

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