गंगा...
महात्मा वेदव्यासजी ने महाभारत में लिखा है— गंगापुत्र भीष्म के पिता
श्री शांतनु महाराज को देखते ही बूढ़ा प्राणी जवान हो जाता था।
मगर, मैं
भूल कर रहा हूँ। वह भीष्म के पिताजी नहीं, दादाजी थे, जिनमें
उक्त गुणों का आरोप महाभारतकार ने किया है।
एक बार भीष्म पितामह के पितामहजी सुरसरि-तट पर, गंगा-तरंग-हिम-शीतल शिलाखंड पर
विराजमान भगवान् के ध्यान, तप
या योग में निरत थे। काफ़ी वय हो जाने पर भी वह तेजस्वी थे—बली—विशाल बाहु। ललाट
उज्ज्वल और उन्नत, आँखें
बड़ी और कमलवत। वह सुश्री दर्शनीय थे!
गंगा के मानस पर उनकी अद्भुत छवि ज्यों ही प्रतिफलित हुई, जीवन-तरंगें लहराने लगी। भीष्म के
दादाजी पर मुग्ध हो नवयुवती सुंदरी का रूप धर गंगा प्रकट ही तो हुईं। ध्यानावस्थित
राजर्षि की दाहिनी पलथी पर वह महाउन्मत्त हो जा बैठीं!
चमककर नेत्र खोलते ही तप में बाधा की तरह अपने आधे अंग पर गंगा को
मौजें मारते दादाजी ने देखा।
“कौन...औरत...?”—गंभीर
स्वर से प्रश्न हुआ।
“जी मैं गंगा हूँ,
महाराज! आपके दिव्य रूप को देखते ही—चंद्र पर चकोर की तरह—मैं पागल
हो उठी हूँ! अब मैं आपकी हूँ—हर तरह से।”
लज्जा से अनुरंजित हो गंगा ने अपनी गोरी बाँहें भीष्म के दादा के
सुकंठ की ओर बढ़ा दीं।
“मगर, सुंदरी...!
मैं नीतिज्ञ हूँ, विज्ञ
हूँ...।”
“तो, क्या
हुआ महाराज! मैं भी दिव्य हूँ, पवित्र
हूँ।”
“गंगे!”—दादाजी ने सतेज जवाब दिया—“तुम एकाएक मेरी दाहिनी जाँघ पर आ
बैठीं, जो बेटी या बहू
के बैठने का स्थान है। अब तुम्हें-पत्नी रूप में स्वीकार करने से सनातनी
आर्य-मर्यादा भंग हो जाएगी। मर्यादा—अपनी चाल—टूटने से कुल विनष्ट हो जाता है। कुल
के विनाश से पितरों को घोर नरक-यातना होती है, जिससे मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है।”
क्षत्रिय राजर्षि का तर्क उचित और मान्य—गंगा मारे लाज के पृथ्वी में
डूबती नज़र आने लगीं। हताश हो, सूखी-सी, वह दादाजी की गोद से नीचे सरक रहीं।
और गंगा-सी पवित्र,
दर्शनीया रमणी को लज्जित और निराश करने का क्षत्रिय महाराज के मन में
घोर खेद हुआ।
“महाराज!”—सजल गंगा बोलीं—“दैव विधानानुसार मैं माता बनना चाहती हूँ, इसी हेतु से तपोपूत, कुलीन जानकर आपकी सेवा में आई। लेकिन
आपने तो मुझको बेटी बना दिया!”
निराश न हो गंगे! कभी अवसर मिले, तो मेरे शांतनु से तुम अपनी इच्छा प्रकट कर सकती हो। मुझे इसमें ज़रा
भी आपत्ति न होगी; बल्कि
तुम-सी दिव्य वधू पाकर मेरी सात पीढ़ियाँ तर जाएँगी।”
“महाराज की जय हो!”—गंभीर वाणी से गंगा ने भीष्म के दादा को आशीर्वाद
दिया—“देवताओं का अभिप्राय पूरा हुआ। अब मैं देवव्रत की माता बन सकूँगी। आर्य!
आपके सद्व्यवहार और सदाचार से संतुष्ट हो मैं आपको अक्षय यौवन का वरदान देती हूँ।
आज से, आपके दर्शन करते
ही, बूढ़ा-से-बूढ़ा
प्राणी भी फ़ौरन नवयुवक हो जाएगा।”
राजर्षि को आश्चर्यचकित छोड़ गंगा, अपनी ही लहरों में लीन हो गई।
गंगदत्त...
उन्हीं दिनों पंडित गंगदत्त शर्मा नाम के एक मूर्ख विद्वान्
इंद्रप्रस्थ महानगर के निकटस्थ किसी ग्राम में रहा करते थे। पंडितजी को मूर्ख
विद्वान् लिखने में क़लम की कोई भूल नहीं; क्योंकि दुनिया में बहुत ऐसे प्राणी हैं, जो अक़्ल रखते हुए भी बेवक़ूफ़ी करते
हैं। पंडित गंगदत्त शर्मा वैसे लोगों के पुराणकालीन अगुआ थे, इसमें ज़रा भी शक-ओ-शुब्ह की गुंजाइश
नहीं है।
भीष्म पितामह के दादाजी की तरह पंडित गंगदत्तजी भी दादा स्वरूप हो गए
थे, मगर, गंगा के तट पर पद्मासनासीन योग, नहीं, घोर भोग-विलास की वासना उनके मन में अब भी लहरा रही थी।
पंडितजी के 55 लड़के थे और 52 लड़कियाँ। वह उन सब के नाम कहाँ तक याद
रखते! अतः 107 मनकों की एक माला उन्होंने तैयार करार्इ और प्रत्येक दाने पर एक-एक
नाम खुदा लिया 55 लड़के, 52
लड़कियों का जोड़ 107।
पंडित गंगदत्त ने सोचा, दो दाने और होने से सुमेर के साथ पूरी माला तैयार हो जाएगी। मगर अब!
गंगदत्तजी का शरीर शिथिल था। मन ही का कुनमुनाना नहीं रुकता था; अतः ...
“गांगी!”—अपनी धर्मपत्नी को संबोधित कर गंगदत्तजी बोले— “सुंदरी, दो बच्चों के अभाव से माला अधूरी रहती
है। यदि तू कृपा करे...!”
“चुप रहो!”—स्त्री सुलभ लज्जा से लाल और पति की पुरुष-दुर्लभ
निर्लज्जता से पीली पड़ कर गांगी बोली— ‘‘पौने दो सौ सालों से विलास करते आ रहे हो, और अब भी दो मनके बाक़ी हैं! हाथ हिलने
लगे—बयार में झोपड़ी से लटकते तिनके की तरह, झूलने लगी—रसोई-घर की छान के झाले की तरह, इन्द्रियाँ पड़ गई हैं शिथिल; नाक में पानी, आँख में पानी—कमर गई है झुक; लेकिन दो मनकों की अभी कमी है! महाराज!
अब तो रामराम!”
“शांत सुंदरी!”—अपनी 150 वर्ष की पत्नी के पोपले गालों को घोंघा-सा
मुँह बनाकर स्पर्श करते हुए गंगदत्तजी ने कहा—“राम-राम नहीं, मैं ‘शिव-शिव’ का उपासक हूँ। और भगवान्
शंकर ऐसे दयालु हैं कि भक्त को माँगते ही—मति गति भूति संपत्ति बड़ाई—फ़ौरन सौंप
देते हैं। मुझसे और भोला बाबा से मित्रता भी है। तुम ज़रा क्षमा करो—मुझे तप कर
आने दो! दो ही क्या सौ-सौ दाने बनाने की योग्यता—यौवन, सदाशिव से मैं वरदान माँग लाऊँ। जानती
हो, तप से आर्यों के
लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं।”
‘‘धिक्! ब्राह्मण’’—ब्राह्मणी ने सच कहा- ‘‘आर्यावर्त में रहते हुए
भी आप विज्ञानी नहीं, ज्ञानी
नहीं, कोरे अज्ञानी
हैं! आपके पुत्र हैं, पुत्रियाँ
हैं और हैं पुत्र-पुत्रियों के बच्चे...! फिर भी शंकर जैसे भगवान् को संतुष्ट कर
आप लेंगे केवल यौवन! रत्नाकर से माँगना पंक! हिमालय से भर आँख धूल की कामना! छि:!
सौ बार छि: ब्राह्मण!”
“तब यह माला पूरी कैसे होगी?”
गंगदत्त को ज्ञान का उतना ध्यान नहीं था। उन्हें तो माला पूरी करने
की चिंता थी। गंगदत्तजी की मूर्खता विकारहीन थी।
“माला पूरी होगी चिता पर... मेरे मुँह से कुभाषा न सुनिए! मैं कहे
देती हूँ—जप या तप से जवान बनकर अगर आप मेरे सामने आवेंगे, तो कह नहीं सकती, किस भाव से मैं आपका स्वागत करूँगी?”
“याने!”—तोते-सी गोल आँखें नचाकर आश्चर्य से गंगदत्त ने पूछा- “मैं
जवान हो जाऊँगा, तो
मुझे देखते ही तुम अहिंसा धर्म से निरत हो उठोगी?”
“मुझे विरत या निरत कुछ भी न होना होगा। सारी गृहस्थी की मैं मालकिन
हूँ। ये 107 बच्चे मेरे हैं। आपके जवान होने पर घर की जो परिस्थिति होगी, उसे काल ही जानता होगा।”
“गंगदत्तजी! ओ पंडित गंगदत्तजी!” बाहर से किसी ने पुकारा।
“कौन? आवाज़
तो ब्राह्मण मोहदत्त की मालूम पड़ती है सुंदरी!”—बुड्ढी से गंगदत्तजी ने कहा—“ज़रा
एक आसन तो लाओ। मेरा मित्र, ब्राह्मण
मोहदत्त, इंद्रप्रस्थ से
आया है...।”
तब तक एक निहायत जवान और गठीला, तेजस्वी ब्राह्मण कुटी के आँगन में आ धमका!
“हा-हा-हा! गंगदत्त! बूढ़े!”—आगंतुक ने कहा- ”तुमने मुझे पहचाना
नहीं! हा-हा-हा-हा! मैं इंद्रप्रस्थ के तपस्वी सम्राट् के दर्शन-मात्र से जवान हो
गया! हा हा हा हा!”
“क्या?”—आँखें
फाड़-फाड़कर गठीले ब्राह्मण को गंगदत्त ने देखा पहचाना था, वह मोहदत्त ही!
“क्या?”—ब्राह्मणी
बेचारी कुछ समझ ही न सकी—“तपस्वी राजा के दर्शनों से बूढ़ा मोहदत्त जवान हो गया!
अब तो मेरा ब्राह्मण यह आतुर मर्द बिना जवान बने शायद ही रहे! तो क्या जवानी
वाँछनीय है? तो
क्या राजा के दर्शन तथा यौवन-लाभ कोई सद्लाभ हैं?”—ब्राह्मणी व्याकुल विचारने लगी।
और गांगी नाम से पाठक यों न समझें कि द्वापर युग की वह ब्राह्मणी
मूर्खा थी! नहीं, वह
विदुषी थी, पूरी।
ब्राह्मणी का घर का नाम था मनोरमा,
मगर, पंडित
गंगदत्त ने उसको बदलकर गांगी इसलिए कर दिया था कि अर्धांगिनी का नाम भी अगर पति ही
की तरह हो तो परम उत्तम! ख़ैर...
“अरे मोहा...!”—गंगदत्त ने पूछा- “तू जवान कैसे हो गया? परसों तक तो तेरी गति थी—‘अंगं गलितं
पलितं मुण्डम्’; और
आज! क्या एक ही रात में तूने भगवान् शंकर को प्रसन्न कर लिया...? या... क्या?”
“भाई गंगदत्त!”—मोहदत्त ने समझाया- “देर न करो! बुढ़ापे में एक क्षण
भी काटना नरकवास है! ब्राह्मणी को संग लो और चलो मेरे साथ इंद्रप्रस्थ! महाराज के
दर्शन कर मुक्त हो जाओ जरा के जाल से।”
“हाँ, हाँ”—आतुर
गंगदत्त ने ब्राह्मणी की ओर देखते हुए कहा- चलो प्रिये! रथ भी मेरा मित्र मोहदत्त
लेता आया है। जो वक़्त पर काम आवे वही मित्र। वाह भाई मोहदत्त! आज यह संवाद, ऐसी सदिच्छा से यहाँ लाकर तुमने हमें
कृतार्थ कर दिया! चलो देर न करो!”—ब्राह्मणी को उन्होंने पुनः ललकारा।
मगर, वह
आर्या टस से मस न हुई...
“जवानी, ऐसी
नारकीय अवस्था के लिए मैं न तो किसी देव से वरदान माँगूगी, न ही परपुरुष का मुँह ताकती फिरूँगी।”
“जवानी-नारकीय कैसे?”
स्त्री के हठ से चिढ़कर गंगदत्त ने पूछा।
“इसे मैं जानती हूँ। 107 बार माता बनने में जो नारकीय कष्ट मुझे
भोगने पड़े, वे
क्यों? इसी जवानी के
लिए। बचपन में अज्ञान है, बुढ़ापे
में ज्ञान। मगर, इस
जवानी में ज्ञानाज्ञान का ऐसा गोरखधंधा है, जिसमें पड़ कर धोखा खाए बिना शायद ही कोई बचा हो। ज्ञान ही की तरह, मैं तो, शुद्ध अज्ञान को भी दिव्य मानती हूँ। मगर, भ्रम से है मुझे घृणा। और भ्रम ही में
जवानी सबकी मचलती चलती है।”
“यौवन-ऐसी देवदुर्लभ अवस्था को यह मूर्खा ब्राह्मणी भ्रम और नरक का
फाटक कह रही है। देखते हो मोहदत्त..., स्त्री-बुद्धिः प्रलयंकरी!”
“अच्छा, इन्हें
बूढ़ी ही रहने दीजिए!”—मोहृदत्त ने मित्र को राय दी—“आप तो चलकर महाराज के दर्शन
प्राप्त कीजिए और प्राप्त कीजिए अप्राप्य यौवन—अनायास! मेरे कहने का अभिप्राय यह
कि जो चीज़ अनायास मिले, उसे
ग्रहण कर भोग लेने में ब्राह्मण के लिए शास्त्रानुसार भी कोई दोष नहीं।”
“क्षमा, आर्य
मोहदत्त!”—नम्रता से ब्राह्मणी ने व्यंग किया—“अनायास अगर मैला मिल जाए, तो क्या ब्राह्मण उसका शास्त्रानुसार
भोग करेगा? अ—हँ!
आप दोनों सज्जन मेरे तर्क पर नाक फुला रहे हैं। मैं सच कहती हूँ—और ब्राह्मणी सच
ही कहती है—यौवन मानव जीवन का मैला है।”
“अरी मूर्खा! क्रोध मुझे न दिला!”—बिगड़े अब पंडित गंगदत्तजी—“चरक
भगवान् ने लिखा है कि मैला पेट में न रहे, तो आदमी जी नहीं सकता! मनुष्य के अंग-अंग से, रोम-रोम से, क्या प्रकट होता है?—मैला! इस मैले संसार में वही मोटा नज़र
आवेगा, जो पुष्ट हो, जिसमें मैले ज़्यादा हो। यौवन? हाँ, है मैला। यह, जिसकी
सफ़ाई होते ही मनुष्य जीवन की भी सफ़ाई हो जाती है—चौका लग जाता है। मैले का
महत्त्व तुझको समझाना होगा नारी...?”
इसके बाद मोहदत्त से,
दुखित भावेन गंगदत्त ने कहा— ‘‘जाओ भाई! मैं इस औरत के वश में हूँ।
बिना अर्धांगिनी की इच्छा—कोई भी काम शास्त्र के मत से मैं नहीं कर सकता। चलो
बाहर। इस कुटी की वायु में मुझे जरा और मरण भयंकर नज़र आ रहे हैं।”
कुटी के बाहर आते ही मोहदत्त ने देखा उनके रथ को घेरकर कोई सौ-सवा सौ
नर-नारियों की भीड़ खड़ी है। कुछ साफ़ न समझ उन्होंने गंगदत्त से पूछा— ‘‘क्यों? क्या ये लोग आपके दर्शनार्थ आए
हैं...या शिष्य हैं, कि
यजमान?’’
‘‘अरे वाह!”—गंगदत्त ने मुँह पसारकर उत्तर दिया—“ब्राह्मण! तुम मेरे
परिवार को भूल गए? मैं
कुल मिलाकर 107 आदमियों का पिता हूँ। ये सब मेरे बच्चे! आपके रथ की कलामयी कारीगरी
देख रहे हैं।”
“हा-हा-हा! भाई गंगदत्त! पहली जवानी में जब तुमने इतनी सृष्टि रच दी, तो एक बार और जवान होने से तुम्हारा
नाम प्रजापति दक्ष (द्वितीय) मशहूर होगा।”
“यह बुड्ढी ब्राह्मणी माने तब तो। मैं प्रजापति को भी, सृष्टि में क्रांति दिखा दूँ, मगर मेरी औरत, जरठ होने से, बुद्धिहीन हो गई!”—दुख-कातर गंगदत्त ने
उत्तर दिया। वह मुँह में पानी भरकर अपने मित्र का नवयौवन निहारने लगे। तब तक दोनों
रथ के निकट आ रहे। भीड़ छँट गई।
“वाह!”—रथ के सफ़ेद घोड़ों की तारीफ़ करते हुए गंगदत्त ने कहा-
“मोहदत्त! घोड़े तो बड़े बाँके हैं।”
‘‘घोड़े मैंने श्वेत द्वीप से मँगाए हैं। मुझे रथ का बड़ा शौक़
है।’’—मस्त मोहदत्त ने रास सँभाली—वह बैठ भी गया रथ पर— ‘‘आओ गंगदत्त मित्र!
इंद्रप्रस्थ से होते आओ। औरत के फेर में स्वर्गलाभ से वंचित न हो!’’
“हाँ!”—उछलकर आतुर और बूढ़ा ब्राह्मण अब अपने मित्र के पार्श्व में
डट गया—“सारथी का काम आश्रम में मैंने भी सीखा है—ये घोड़े—वाह! रास ज़रा मुझे तो
देना—!”
और गंगदत्त ने मोहदत्त के रथ के बाँके घोड़ों को इशारा किया! और
क्षण-भर बाद, दोनों
मित्र, इंद्रप्रस्थ की
ओर सनकते नज़र आने लगे।
कोई ज़्यादा दूर जाना तो था नहीं। शाम होने से पहले ही राजधानी में
मोहदत्त का रथ गंगदत्त हाँकते दिखाई पड़े।
याने, मनोरथ
उन्होंने अपना पूरा किया अविलंब दर्शन लाभ कर महाराजर्षि के, जिन्हें अनंत यौवन का वरदान गंगा ने
दिया था!
और लो, ब्राह्मण
गंगदत्त भी मोहदत्त की तरह पूर्ण नव यौवन पा गए।
यौवन पाते ही गंगदत्त ने अपने मित्र का साथ छोड़ दिया और छोड़ दिया
स्वार्थपूर्ण उजलत से! उन्हें बड़ी इच्छा हुई, पहले दर्पण में मुँह देखने की। मगर, वहाँ दर्पण कहाँ। इंद्रप्रस्थ के बाज़ार में बिकते होंगे बीसियों, लेकिन पैसे—? ब्राह्मण के पास पैसे कहाँ! गंगदत्त ने
सोचा—तो किसी तालाब के पानी मे मुँह देखना चाहिए। मगर, रात का ध्यान आते ही यह विचार भी छोड़
देना पड़ा।
नवयुवक ब्राह्मण गंगदत्तजी रात अधिक बीत जाने तक राजधानी की सड़कों
पर चक्कर काटते रहे। मगर, आईना
पाने की सूरत उन्हें न दिखाई पड़ी। आख़िर हताश हो, ज्यों ही वह अपनी कुटी की ओर लौटना चाहते थे, त्यों ही, नर्तकी रामा के घर की ओर उनकी नज़र गई।
रामा अपनी रमणीक बैठक में बैठी (प्राचीन चीन के) दर्पण में मुँह देख
रही थी। कंचन की चौकी पर रत्न का एक दीपक पास ही जल रहा था।
ब्राह्मण ने विचार किया—यदि किसी तरह इस नर्तकी के दर्पण में मैं
अपना मुँह देख पाता!
आख़िर आतुर गंगदत्तजी,
विवेकहीन हो, दबे
पाँव, नर्तकी के पीछे
जा खड़े हुए और चोरों की तरह उन्होंने दर्पण में झाँका!
“अहो! अहो! धन्य! धन्य!”—अपना नवस्वरूप देखते ही गंगदत्त पागलों की
तरह प्रसन्नता से नाच और चिल्ला उठे।
नर्तकी रामा चौंककर मारे भय के घिघियाने लगी—बचाओ! चोर, उचक्का!
सैकड़ों नागरिक जुट गए और विकल ब्राह्मण यज्ञोपवीत दिखाकर
पिटते-पिटते बचा!
कुटी की ओर लौटते हुए गंगदत्त ने सोचा बेशक मैं जवान हो गया। क्योंकि
जवानी की पहली निशानी अविवेक मुझमें प्रकट हो गया! नर्तकी के दर्पण में मैंने अपना
मुँह देखा आतुर होकर—बचा पीठ की पूजा पाते-पाते! वाह!
वाह!—नवब्राह्मण ने सोचा—वेश्या वह युवती...? मेरी पत्नी भी अगर महाराज के दर्शन कर
ले, तो वह भी इसी
वेश्या-सी नवेली—आह!—गंगदत्त का मुँह प्राचीन उच्छृङखल होने से पुनः बिचका—मैं...
ब्राह्मण अपनी पत्नी की समता वेश्या के यौवन से! है न अविवेक? वाह! अब मैं जवान हो गया—बेशक!
और गंगदत्त का पूरा कुल एक ही जगह पर बसा हुआ था—उनकी कुटी के
चौगिर्द। अधिक रात हो जाने के कारण सभी सो गए थे। ब्राह्मणों के घृत के दीपक भी
बुझ चुके थे। ऐसे अवसर पर गंगदत्त चुपचाप अपनी झोपड़ी में घुसे।
“कौन...?”—सजग
ब्राह्मणी ने खाँसकर पूछा।
“मैं हूँ... सुंदरी!”—निर्भय और प्रसन्न गंगदत्त ने कहा।
पति की आवाज़ पहनानते ही ब्राह्मणी ने अग्निहोत्र की आग से दीपक
प्रज्वलित किया और देखा।
“अरे, ज्ञानदत्त!
पुत्र!”—देखते ही ब्राह्मणी बिगड़ी- “पापी! इस रात में अपनी माता को तू 'सुंदरी' पुकारने यहाँ आया है?
क्या तूने आज सुरा पी है? निकल, तेरी
कुटी उधर है... हाय रे, मेरा
ब्राह्मण रथ पर चढ़कर कहाँ चला गया?”
“मैं—मैं ही हूँ वह ब्राह्मण तुम्हारा सुंदरी!”—गंगदत्त ने पुनः
समझाना चाहा—“मैं जवान हो गया हूँ—राजर्षि के दर्शन कर। डरो मत। भागो मत! मैं
तुम्हारा पति हूँ।”
“बाप रे! दौड़ो रे!”—ब्राह्मणी अधिक अपमान न सह सकी—“बचाओ! मेरा
पुत्र पागल हो गया है?
और सारा कुल—अँधेरी रात में उल्काएँ हाथों में लिए—कुटी के चारों ओर
इकट्ठा हो गया!
भारी कोलाहल मचा—कौन लड़का है? कौन ऐसा नालायक़ है?
मारो! इसकी हत्या कर दो! सभी झपटे अपने बेचारे ब्राह्मण बाप पर, उसके कायाकल्प से अज्ञात।
अब गंगदत्त बड़े फेर में पड़े। किसी को उनकी बात पर एतबार ही न आया।
उन्हीं के अनेक लड़के इस वक़्त देखने में गंगदत्तजी के चचा मालूम पड़ते थे!
गंगदत्तजी ने एक-एक का नाम लेकर परिचय दिया। बहुत-सी घरेलू बातें
बताई। यहाँ तक कि सारे कुल को उन्होंने अपने पीछे का एक धब्बा भी खोलकर दिखाया—मगर, फिर भी किसी ने विश्वास न किया।
तब, मारे
झुँझलाहट, खीझ
और लाचारी के नौजवान गंगदत्त ब्राह्मण बालकों की तरह रो पड़े।
“हाय रे! जवानी लेकर मैंने कहाँ का पाप ख़रीदा...मेरी सारी शांति
नष्ट हो गई।”
मगर, सारा
कुल इतना क्षुब्ध हो उठा कि अगर भाग न जाते तो गंगदत्तजी की हत्या उन्हीं के
परिवार के लोग उस रात में ज़रूर कर देते!
गांगी...
उक्त घटना के कई दिनों बाद तक जब पंडित गंगदत्तजी का कोई पता
कुलवालों को न लगा तब ब्राह्मणी विकल हो उठी। उसने अपने पुत्रों को राजधानी में
भेजकर मोहदत्त से पता लगाया, तो
भेद सारा खुल गया! अब मालूम हुआ गंगदत्त के कुल को कि उस रात में जो नवयुवक
पिटते-पिटते बचा, उसकी
बातें सच थीं। वह और कोई नहीं—पंडित गंगदत्त स्वयं थे, जो राजाधिराज के दर्शन से युवक बन गए
थे।
अब तो सारे कुल में स्यापा छा गया! ब्राह्मणी दहाड़ मार-मारकर रोने
लगी। पति के अपमान से जो नरक उसे परलोक में भोगना पड़ेगा, उसकी कल्पनामात्र से वह काँप-काँप उठी!
“आह!”—उसने सोचा—“पतिदेव इसलिए भाग गए कि बूढ़ी मैं उनके योग्य नहीं, बल्कि दुःख का कारण हूँ। तो? क्या मैं भी पर-पुरुष से आँखें मिलाकर
नवयुवती बनूँ और पतिदेव को सुखी करूँ, जो आर्या का परम धर्म है? मगर नहीं, पर-पुरुष
की ओर मैं कदापि न देखूँगी। मैं...!”—गांगी गंभीर हो सोचने लगी—“मैं तपस्विनी
बनूँगी। पति के प्रसन्नतार्थ यौवन पाने के लिए माता गौरी पार्वती की तपस्या
करूँगी।”
और ब्राह्मणी, दृढ़, दूसरे ही दिन उठ भोर, सारी मोह-माया त्याग तप करने हिमालय
चली गई।
और उसने ऐसी तपस्या की कि ऐसी तपस्विनी से माता पार्वती प्रसन्न हो
प्रकट हो गर्इं! उन्होंने ब्राह्मणी को फ़ौरन युवती बना दिया!
फिर भी, यह
सब करते-कराते ग्यारह महीने बीत ही गए। ग्यारह महीने बाद, जवान बनकर, गांगी एक रात, अपनी कुटी में लौट आई और माता पार्वती
के प्रसाद से, उसी
रात, गांगी के पतिदेव
भी पुनः झोपड़ी पर पधारे—“गांगी! देवी! लो शंकर की तपस्या कर मैं फिर से बूढ़ा
बनकर आ गया! तुम बूढ़ी—मैं बूढ़ा! प्रिये! हम में द्वैध अब नहीं—हम एकाकार है! आग
लगे ऐसी कायाकल्पित नवजवानी में जिसके कारण मैं पिटते-पिटते, मरते-मरते बचा—अरे!”
इसी समय, कुटी
के बाहर आती गांगी नवयौवना को गंगदत्त ने ग़ौर से गुरेर कर ताका।
“कौन? ब्राह्मणी? क्या तू भी राजर्षि के दर्शन कर आई?”
“हम स्त्रियाँ माता गौरी की कृपा से नवयौवन, जीवन, तन, मन, धन पाती हैं साजन!”
गौरी की कृपा से रसीली गांगी ने, शंकर के वरदान से सूखे गंगदत्त के हिलते हिमशीतल हाथों को प्रेम से
पुलकित हो अपनी मृणाल-सी बाहु में लपेट लिया।
पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र'
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