नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

बुधवार, 6 अप्रैल 2011

लाल पान की बेगम

 

‘क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या?’

बिरजू की माँ शकरकंद उबाल कर बैठी मन-ही-मन कुढ़ रही थी अपने आँगन में। सात साल का लड़का बिरजू शकरकंद के बदले तमाचे खा कर आँगन में लोट-पोट कर सारी देह में मिट्टी मल रहा था। चंपिया के सिर भी चुड़ैल मँडरा रही है... आधे-आँगन धूप रहते जो गई है सहुआइन की दुकान छोवा-गुड़ लाने, सो अभी तक नहीं लौटी, दीया-बाती की बेला हो गई। आए आज लौटके ज़रा! बागड़ बकरे की देह में कुकुरमाछी लगी थी, इसलिए बेचारा बागड़ रह-रह कर कूद-फाँद कर रहा था। बिरजू की माँ बागड़ पर मन का ग़ुस्सा उतारने का बहाना ढूँढ़ कर निकाल चुकी थी...पिछवाड़े की मिर्च की फूली गाछ! बागड़ के सिवा और किसने कलेवा किया होगा! बागड़ को मारने के लिए वह मिट्टी का छोटा ढेला उठा चुकी थी, कि पड़ोसिन मखनी फुआ की पुकार सुनाई पड़ी—‘क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या?’

 

‘बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पगहिया न हो तब न, फुआ!’

गर्म ग़ुस्से में बुझी नुकीली बात फुआ की देह में धँस गई और बिरजू की माँ ने हाथ के ढेले को पास ही फेंक दिया—‘बेचारे बागड़ को कुकुरमाछी परेशान कर रही है। आ-हा, आय... आय! हर्र-र-र! आय-आय!’

 

बिरजू ने लेटे-ही-लेटे बागड़ को एक डंडा लगा दिया। बिरजू की माँ की इच्छा हुई कि जा कर उसी डंडे से बिरजू का भूत भगा दे, किंतु नीम के पास खड़ी पनभरनियों की खिलखिलाहट सुन कर रुक गई। बोली, ‘ठहर, तेरे बप्पा ने बड़ा हथछुट्टा बना दिया है तुझे! बड़ा हाथ चलता है लोगों पर। ठहर!’

मखनी फुआ नीम के पास झुकी कमर से घड़ा उतार कर पानी भर कर लौटती पनभरनियों में बिरजू की माँ की बहकी हुई बात का इंसाफ़ करा रही थी—‘ज़रा देखो तो इस बिरजू की माँ को! चार मन पाट (जूट) का पैसा क्या हुआ है, धरती पर पाँव ही नहीं पड़ते! निसाफ़ करो! ख़ुद अपने मुँह से आठ दिन पहले से ही गाँव की गली-गली में बोलती फिरी है, ‘हाँ, इस बार बिरजू के बप्पा ने कहा है, बैलगाड़ी पर बिठा कर बलरामपुर का नाच दिखा लाऊँगा। बैल अब अपने घर है, तो हज़ार गाड़ी मँगनी मिल जाएँगी।’ सो मैंने अभी टोक दिया, नाच देखने वाली सब तो औन-पौन कर तैयार हो रही हैं, रसोई-पानी कर रहे हैं। मेरे मुँह में आग लगे, क्यों मैं टोकने गई! सुनती हो, क्या जवाब दिया बिरजू की माँ ने?’

 

मखनी फुआ ने अपने पोपले मुँह के होंठों को एक ओर मोड़ कर ऐठती हुई बोली निकाली—‘अर्-र्रे-हाँ-हाँ! बि-र-र-ज्जू की मै...या के आगे नाथ औ-र्र पीछे पगहिया ना हो, तब ना-आ-आ!’

जंगी की पुतोहू बिरजू की माँ से नहीं डरती। वह ज़रा गला खोल कर ही कहती है, ‘फुआ-आ! सरबे सित्तलर्मिटी (सर्वे सेटलमेंट) के हाकिम के बासा पर फूलछाप किनारी वाली साड़ी पहन के तू भी भंटा की भेंटी चढ़ाती तो तुम्हारे नाम से भी दु-तीन बीघा धनहर ज़मीन का पर्चा कट जाता! फिर तुम्हारे घर भी आज दस मन सोनाबंग पाट होता, जोड़ा बैल ख़रीदता! फिर आगे नाथ और पीछे सैकड़ो पगहिया झूलती!’

 

जंगी की पुतोहू मुँहज़ोर है। रेलवे स्टेशन के पास की लड़की है। तीन ही महीने हुए, गौने की नई बहू हो कर आई है और सारे कुर्मा टोली की सभी झगड़ालू सासों से एकाध मोर्चा ले चुकी है। उसका ससुर जंगी दाग़ी चोर है, सीड़किलासी है। उसका ख़सम रंगी कुर्मा टोली का नामी लठैत। इसीलिए हमेशा सींग घुमाती फिरती है जंगी की पुतोहू!

बिरजू की माँ के आँगन में जंगी की पुतोहू की गला-खोल बोली ग़ुलेल की गोलियों की तरह दनदनाती हुई आई थी। बिरजू की माँ ने एक तीख़ा जवाब खोज कर निकाला, लेकिन मन मसोस कर रह गई।...गोबर की ढेरी में कौन ढेला फेंके!

 

जीभ के झाल को गले में उतार कर बिरजू की माँ ने अपनी बेटी चंपिया को आवाज़ दी—‘अरी चंपिया-या-या, आज लौटे तो तेरी मूड़ी मरोड़ कर चूल्हे में झोंकती हूँ! दिन-दिन बेचाल होती जाती है!...गाँव में तो अब ठेठर-बैसकोप का गीत गाने वाली पतुरिया-पुतोहू सब आने लगी हैं। कहीं बैठके ‘बाजे न मुरलिया’ सीख रही होगी ह-र-जा-ई-ई! अरी चंपिया-या-या!’

जंगी की पुतोहू ने बिरजू की माँ की बोली का स्वाद ले कर कमर पर घड़े को सँभाला और मटक कर बोली, ‘चल दिदिया, चल! इस मुहल्ले में लाल पान की बेगम बसती है! नहीं जानती, दोपहर-दिन और चौपहर-रात बिजली की बत्ती भक्-भक् कर जलती है!’

 

भक्-भक् बिजली-बत्ती की बात सुन कर न जाने क्यों सभी खिलखिला कर हँस पड़ीं। फुआ की टूटी हुई दंत-पंक्तियों के बीच से एक मीठी गाली निकली—‘शैतान की नानी!’

बिरजू की माँ की आँखों पर मानो किसी ने तेज़ टार्च की रौशनी डाल कर चौंधिया दिया।...भक्-भक् बिजली-बत्ती! तीन साल पहले सर्वे कैंप के बाद गाँव की जलन-ढाही औरतों ने एक कहानी गढ़ के फैलाई थी, चंपिया की माँ के आँगन में रात-भर बिजली-बत्ती भुकभुकाती थी! चंपिया की माँ के आँगन में नाकवाले जूते की छाप घोड़े की टाप की तरह।...जलो, जलो! और जलो! चंपिया की माँ के आँगन में चाँदी-जैसे पाट सूखते देख कर जलने वाली सब औरतें खलिहान पर सोनोली धान के बोझों को देख कर बैंगन का भुर्ता हो जाएँगी।

 

मिट्टी के बरतन से टपकते हुए छोवा-गुड़ को उँगलियों से चाटती हुई चंपिया आई और माँ के तमाचे खा कर चीख़ पड़ी—‘मुझे क्यों मारती है-ए-ए-ए! सहुआइन जल्दी से सौदा नहीं देती है-एँ-एँ-एँ-एँ!’

‘सहुआइन जल्दी सौदा नहीं देती की नानी! एक सहुआइन की दुकान पर मोती झरते हैं, जो जड़ गाड़ कर बैठी हुई थी! बोल, गले पर लात दे कर कल्ला तोड़ दूँगी हरजाई, जो फिर कभी ‘बाजे न मुरलिया’ गाते सुना! चाल सीखने जाती है टीशन की छोकरियों से!’

 

बिरजू के माँ ने चुप हो कर अपनी आवाज़ अंदाज़ी कि उसकी बात जंगी के झोंपड़े तक साफ़-साफ़ पहुँच गई होगी।

बिरजू बीती हुई बातों को भूल कर उठ खड़ा हुआ था और धूल झाड़ते हुए बरतन से टपकते गुड़ को ललचाई निगाह से देखने लगा था।...दीदी के साथ वह भी दुकान जाता तो दीदी उसे भी गुड़ चटाती, ज़रुर! वह शकरकंद के लोभ में रहा और माँगने पर माँ ने शकरकंद के बदले... ‘ए मैया, एक अँगुली गुड़ दे दे बिरजू ने तलहथी फैलाई—दे ना मैया, एक रत्ती-भर!’

 

‘एक रत्ती क्यों, उठाके बरतन को फेंक आती हूँ पिछवाड़े में, जाके चाटना! नहीं बनेगी मीठी रोटी! ...मीठी रोटी खाने का मुँह होता है बिरजू की माँ ने उबले शकरकंद का सूप रोती हुई चंपिया के सामने रखते हुए कहा, ‘बैठके छिलके उतार, नहीं तो अभी...!’

दस साल की चंपिया जानती है, शकरकंद छीलते समय कम-से-कम बारह बार माँ उसे बाल पकड़ कर झकझोरेगी, छोटी-छोटी खोट निकाल कर गालियाँ देगी—‘पाँव फैलाके क्यों बैठी है उस तरह, बेलज्जी!’ चंपिया माँ के ग़ुस्से को जानती है।

 

बिरजू ने इस मौक़े पर थोड़ी-सी ख़ुशामद करके देखा—’मैया, मैं भी बैठ कर शकरकंद छीलूँ?’

‘नहीं?’ माँ ने झिड़की दी, ‘एक शकरकंद छीलेगा और तीन पेट में! जाके सिद्धू की बहू से कहो, एक घंटे के लिए कड़ाही माँग कर ले गई तो फिर लौटाने का नाम नहीं। जा जल्दी!’

 

मुँह लटका कर आँगन से निकलते-निकलते बिरजू ने शकरकंद और गुड़ पर निगाहें दौड़ाई। चंपिया ने अपने झबरे केश की ओट से माँ की ओर देखा और नज़र बचा कर चुपके से बिरजू की ओर एक शकरकंद फेंक दिया।...बिरजू भागा।

‘सूरज भगवान डूब गए। दीया-बत्ती की बेला हो गई। अभी तक गाड़ी...

 

‘चंपिया बीच में ही बोल उठी—‘कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी नहीं दी मैया! बप्पा बोले, माँ से कहना सब ठीक-ठाक करके तैयार रहें। मलदहिया टोली के मियाँजान की गाड़ी लाने जा रहा हूँ।’

सुनते ही बिरजू की माँ का चेहरा उतर गया। लगा, छाते की कमानी उतर गई घोड़े से अचानक। कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी मँगनी नहीं दी! तब मिल चुकी गाड़ी! जब अपने गाँव के लोगों की आँख में पानी नहीं तो मलदहिया टोली के मियाँजान की गाड़ी का क्या भरोसा! न तीन में न तेरह में! क्या होगा शकरकंद छील कर! रख दे उठा के!...यह मर्द नाच दिखाएगा। बैलगाड़ी पर चढ़ कर नाच दिखाने ले जाएगा! चढ़ चुकी बैलगाड़ी पर, देख चुकी जी-भर नाच... पैदल जाने वाली सब पहुँच कर पुरानी हो चुकी होंगी।

 

बिरजू छोटी कड़ाही सिर पर औंधा कर वापस आया—‘देख दिदिया, मलेटरी टोपी! इस पर दस लाठी मारने पर भी कुछ नहीं होता।’

चंपिया चुपचाप बैठी रही, कुछ बोली नहीं, ज़रा-सी मुस्कराई भी नहीं। बिरजू ने समझ लिया, मैया का ग़ुस्सा अभी उतरा नहीं है पूरे तौर से।

 

मढ़ैया के अंदर से बागड़ को बाहर भगाती हुई बिरजू की माँ बड़बड़ाई—‘कल ही पँचकौड़ी क़साई के हवाले करती हूँ राकस तुझे! हर चीज़ में मुँह लगाएगा। चंपिया, बाँध दे बागड़ को। खोल दे गले की घंटी! हमेशा टुनुर-टुनुर! मुझे ज़रा नहीं सुहाता है!’

‘टुनुर-टुनुर’ सुनते ही बिरजू को सड़क से जाती हुई बैलगाड़ियों की याद हो आई—‘अभी बबुआन टोले की गाड़ियाँ नाच देखने जा रही थीं... झुनुर-झुनुर बैलों की झुमकी, तुमने सु...’

 

‘बेसी बक-बक मत करो!’ बागड़ के गले से झुमकी खोलती बोली चंपिया।

‘चंपिया, डाल दे चूल्हे में पानी! बप्पा आवे तो कहना कि अपने उड़नजहाज़ पर चढ़ कर नाच देख आएँ! मुझे नाच देखने का सौख नहीं!...मुझे जगाइयो मत कोई! मेरा माथा दुख रहा है।’

 

मढ़ैया के ओसारे पर बिरजू ने फिसफिसा के पूछा, ‘क्यों दिदिया, नाच में उड़नजहाज़ भी उड़ेगा?’

चटाई पर कथरी ओढ़ कर बैठती हुई चंपिया ने बिरजू को चुपचाप अपने पास बैठने का इशारा किया, मुफ़्त में मार खाएगा बेचारा!

 

बिरजू ने बहन की कथरी में हिस्सा बाँटते हुए चुक्की-मुक्की लगाई। जाड़े के समय इस तरह घुटने पर ठुड्डी रख कर चुक्की-मिक्की लगाना सीख चुका है वह। उसने चंपिया के कान के पास मुँह ले जा कर कहा, ‘हम लोग नाच देखने नहीं जाएँगे?...गाँव में एक पंछी भी नहीं है। सब चले गए।’

चंपिया को तिल-भर भी भरोसा नहीं। संझा तारा डूब रहा है। बप्पा अभी तक गाड़ी ले कर नहीं लौटे। एक महीना पहले से ही मैया कहती थी, बलरामपुर के नाच के दिन मीठी रोटी बनेगी, चंपिया छींट की साड़ी पहनेगी, बिरजू पैंट पहनेगा, बैलगाड़ी पर चढ़ कर...

 

चंपिया की भीगी पलकों पर एक बूँद आँसू आ गया।

बिरजू का भी दिल भर आया। उसने मन-ही-मन में इमली पर रहने वाले जिनबाबा को एक बैंगन कबूला, गाछ का सबसे पहला बैंगन, उसने ख़ुद जिस पौधे को रोपा है!...जल्दी से गाड़ी ले कर बप्पा को भेज दो, जिनबाबा!

 

मढ़ैया के अंदर बिरजू की माँ चटाई पर पड़ी करवटें ले रही थी। उँह, पहले से किसी बात का मनसूबा नहीं बाँधना चाहिए किसी को! भगवान ने मनसूबा तोड़ दिया। उसको सबसे पहले भगवान से पूछना है, यह किस चूक का फल दे रहे हो भोला बाबा! अपने जानते उसने किसी देवता-पित्तर की मान-मनौती बाक़ी नहीं रखी। सर्वे के समय ज़मीन के लिए जितनी मनौतियाँ की थीं... ठीक ही तो! महाबीर जी का रोट तो बाक़ी ही है। हाय रे दैव!... भूल-चूक माफ़ करो महाबीर बाबा! मनौती दूनी करके चढ़ाएगी बिरजू की माँ!...

बिरजू की माँ के मन में रह-रह कर जंगी की पुतोहू की बातें चुभती हैं, भक्-भक् बिजली-बत्ती!... चोरी-चमारी करने वाली की बेटी-पुतोहू जलेगी नहीं! पाँच बीघा ज़मीन क्या हासिल की है बिरजू के बप्पा ने, गाँव की भाईखौकियों की आँखों में किरकिरी पड़ गई है। खेत में पाट लगा देख कर गाँव के लोगों की छाती फटने लगी, धरती फोड़ कर पाट लगा है, बैसाखी बादलों की तरह उमड़ते आ रहे हैं पाट के पौधे! तो अलान, तो फलान! इतनी आँखों की धार भला फ़सल सहे! जहाँ पंद्रह मन पाट होना चाहिए, सिर्फ़ दस मन पाट काँटा पर तौल के ओजन हुआ भगत के यहाँ।...

 

‘इसमें जलने की क्या बात है भला!...बिरजू के बप्पा ने तो पहले ही कुर्मा टोली के एक-एक आदमी को समझा के कहा, ज़िंदगी-भर मज़दूरी करते रह जाओगे। सर्वे का समय आ रहा है, लाठी कड़ी करो तो दो-चार बीघे ज़मीन हासिल कर सकते हो। सो गाँव की किसी पुतखौकी का भतार सर्वे के समय बाबूसाहेब के ख़िलाफ़ खाँसा भी नहीं।...बिरजू के बप्पा को कम सहना पड़ा है! बाबूसाहेब ग़ुस्से से सरकस नाच के बाघ की तरह हुमड़ते रह गए। उनका बड़ा बेटा घर में आग लगाने की धमकी देकर गया।...आख़िर बाबूसाहेब ने अपने सबसे छोटे लड़के को भेजा। बिरजू की माँ को ‘मौसी’ कहके पुकारा—यह ज़मीन बाबू जी ने मेरे नाम से ख़रीदी थी। मेरी पढ़ाई-लिखाई इसी ज़मीन की उपज से चलती है।...और भी कितनी बातें। ख़ूब मोहना जानता है उत्ता ज़रा-सा लड़का। ज़मींदार का बेटा है कि...’

‘चंपिया, बिरजू सो गया क्या? यहाँ आ जा बिरजू, अंदर। तू भी आ जा, चंपिया!... भला आदमी आए तो एक बार आज!’

 

बिरजू के साथ चंपिया अंदर चली गई।

‘ढिबरी बुझा दे।... बप्पा बुलाएँ तो जवाब मत देना। खपच्ची गिरा दे।’

 

‘भला आदमी रे, भला आदमी! मुँह देखो ज़रा इस मर्द का!...बिरजू की माँ दिन-रात मंझा न देती रहती तो ले चुके थे ज़मीन! रोज़ आ कर माथा पकड़ के बैठ जाएँ, मुझे ज़मीन नहीं लेनी है बिरजू की माँ, मजूरी ही अच्छी।...जवाब देती थी बिरजू की माँ ख़ूब सोच-समझके, छोड़ दो, जब तुम्हारा कलेजा ही स्थिर नहीं होता है तो क्या होगा? जोरु-ज़मीन ज़ोर के, नहीं तो किसी और के!...’

बिरजू के बाप पर बहुत तेज़ी से ग़ुस्सा चढ़ता है। चढ़ता ही जाता है।...बिरजू की माँ का भाग ही ख़राब है, जो ऐसा गोबरगणेश घरवाला उसे मिला। कौन-सा सौख-मौज दिया है उसके मर्द ने? कोल्हू के बैल की तरह खट कर सारी उम्र काट दी इसके यहाँ, कभी एक पैसे की जलेबी भी ला कर दी है उसके खसम ने!...पाट का दाम भगत के यहाँ से ले कर बाहर-ही-बाहर बैल-हट्टा चले गए। बिरजू की माँ को एक बार नमरी लोट देखने भी नहीं दिया आँख से।...बैल ख़रीद लाए। उसी दिन से गाँव में ढिंढोरा पीटने लगे, बिरजू की माँ इस बार बैलगाड़ी पर चढ़ कर जाएगी नाच देखने!...दूसरे की गाड़ी के भरोसे नाच दिखाएगा!...

 

अंत में उसे अपने-आप पर क्रोध हो आया। वह ख़ुद भी कुछ कम नहीं! उसकी जीभ में आग लगे! बैलगाड़ी पर चढ़ कर नाच देखने की लालसा किस कुसमय में उसके मुँह से निकली थी, भगवान जाने! फिर आज सुबह से दोपहर तक, किसी-न-किसी बहाने उसने अठारह बार बैलगाड़ी पर नाच देखने की चर्चा छेड़ी है।...लो, ख़ूब देखो नाच! कथरी के नीचे दुशाले का सपना!...कल भोरे पानी भरने के लिए जब जाएगी, पतली जीभवाली पतुरिया सब हँसती आएँगी, हँसती जाएँगी।...सभी जलते है उससे, हाँ भगवान, दाढ़ी-जार भी! दो बच्चों की माँ हो कर भी वह जस-की-तस है। उसका घरवाला उसकी बात में रहता है। वह बालों में गरी का तेल डालती है। उसकी अपनी ज़मीन है। है किसी के पास एक घूर ज़मीन भी अपने इस गाँव में! जलेंगे नहीं, तीन बीघे में धान लगा हुआ है, अगहनी। लोगों की बिखदीठ से बचे, तब तो!

बाहर बैलों की घंटियाँ सुनाई पड़ीं। तीनों सतर्क हो गए। उत्कर्ण होकर सुनते रहे।

 

‘अपने ही बैलों की घंटी है, क्यों री चंपिया?’

चंपिया और बिरजू ने प्राय: एक ही साथ कहा, ‘हूँ-ऊँ-ऊँ!’

 

‘चुप बिरजू की माँ ने फिसफिसा कर कहा, शायद गाड़ी भी है, घड़घड़ाती है न?’

‘हूँ-ऊँ-ऊँ!’ दोनों ने फिर हुँकारी भरी।

 

‘चुप! गाड़ी नहीं है। तू चुपके से टट्टी में छेद करके देख तो आ चंपी! भागके आ, चुपके-चुपके।’

चंपिया बिल्ली की तरह हौले-हौले पाँव से टट्टी के छेद से झाँक आई—‘हाँ मैया, गाड़ी भी है!’

 

बिरजू हड़बड़ा कर उठ बैठा। उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़ कर सुला दिया—‘बोले मत!’

चंपिया भी गुदड़ी के नीचे घुस गई।

 

बाहर बैलगाड़ी खोलने की आवाज़ हुई। बिरजू के बाप ने बैलों को ज़ोर से डाँटा—‘हाँ-हाँ! आ गए घर! घर आने के लिए छाती फटी जाती थी!’

बिरजू की माँ ताड़ गई, ज़रुर मलदहिया टोली में गाँजे की चिलम चढ़ रही थी, आवाज़ तो बड़ी खनखनाती हुई निकल रही है।

 

‘चंपिया-ह!’ बाहर से पुकार कर कहा उसके बाप ने, ‘बैलों को घास दे दे, चंपिया-ह!’

अंदर से कोई जवाब नहीं आया। चंपिया के बाप ने आँगन में आ कर देखा तो न रोशनी, न चराग़, न चूल्हे में आग।...बात क्या है! नाच देखने, उतावली हो कर, पैदल ही चली गई क्या...!

 

बिरजू के गले में खसखसाहट हुई और उसने रोकने की पूरी कोशिश भी की, लेकिन खाँसी जब शुरु हुई तो पूरे पाँच मिनट तक वह खाँसता रहा।

‘बिरजू! बेटा बिरजमोहन!’ बिरजू के बाप ने पुचकार कर बुलाया, मैया ग़ुस्से के मारे सो गई क्या?...अरे अभी तो लोग जा ही रहे हैं।’

 

बिरजू की माँ के मन में आया कि कस कर जवाब दे, नहीं देखना है नाच! लौटा दो गाड़ी!

‘चंपिया-ह! उठती क्यों नहीं? ले, धान की पँचसीस रख दे। धान की बालियों का छोटा झब्बा झोंपड़े के ओसरे पर रख कर उसने कहा, ‘दीया बालो!’

 

बिरजू की माँ उठ कर ओसारे पर आई—‘डेढ़ पहर रात को गाड़ी लाने की क्या ज़रुरत थी? नाच तो अब ख़त्म हो रहा होगा।’

ढिबरी की रौशनी में धान की बालियों का रंग देखते ही बिरजू की माँ के मन का सब मैल दूर हो गया।...धानी रंग उसकी आँखों से उतर कर रोम-रोम में घुल गया।

 

‘नाच अभी शुरु भी नहीं हुआ होगा। अभी-अभी बलमपुर के बाबू की संपनी गाड़ी मोहनपुर होटिल-बँगला से हाकिम साहब को लाने गई है। इस साल आख़िरी नाच है।...पँचसीस टट्टी में खोंस दे, अपने खेत का है।’

‘अपने खेत का? हुलसती हुई बिरजू की माँ ने पूछा, पक गए धान?’

 

‘नहीं, दस दिन में अगहन चढ़ते-चढ़ते लाल हो कर झुक जाएँगी सारे खेत की बालियाँ!...मलदहिया टोली पर जा रहा था, अपने खेत में धान देख कर आँखें जुड़ा गईं। सच कहता हूँ, पँचसीस तोड़ते समय उँगलियाँ काँप रही थीं मेरी!’

बिरजू ने धान की एक बाली से एक धान ले कर मुँह में डाल लिया और उसकी माँ ने एक हल्की डाँट दी—‘कैसा लुक्क्ड़ है तू रे!...इन दुश्मनों के मारे कोई नेम-धरम बचे!’

 

‘क्या हुआ, डाँटती क्यों है?’

‘नवान्न के पहले ही नया धान जुठा दिया, देखते नहीं?’

 

‘अरे, इन लोगों का सब कुछ माफ़ है। चिरई-चुरमुन हैं यह लोग! दोनों के मुँह में नवान्न के पहले नया अन्न न पड़े?’

इसके बाद चंपिया ने भी धान की बाली से दो धान लेकर दाँतों-तले दबाए—‘ओ मैया! इतना मीठा चावल!’

 

‘और गमकता भी है न दिदिया?’ बिरजू ने फिर मुँह में धान लिया।

‘रोटी-पोटी तैयार कर चुकी क्या?’ बिरजू के बाप ने मुस्कुराकर पूछा।

 

‘नहीं!’ मान-भरे सुर में बोली बिरजू की माँ, ‘जाने का ठीक-ठिकाना नहीं... और रोटी बनाती!’

‘वाह! ख़ूब हो तुम लोग!...जिसके पास बैल है, उसे गाड़ी मँगनी नहीं मिलेगी भला? गाड़ीवालों को भी कभी बैल की ज़रुरत होगी।...पूछूँगा तब कोयरी-टोला वालों से!...ले, जल्दी से रोटी बना ले।’

 

‘देर नहीं होगी!’

‘अरे, टोकरी भर रोटी तो तू पलक मारते बना देती है, पाँच रोटियाँ बनाने में कितनी देर लगेगी!’

 

अब बिरजू की माँ के होंठों पर मुस्कुराहट खुल कर खिलने लगी। उसने नज़र बचा कर देखा, बिरजू का बप्पा उसकी ओर एकटक निहार रहा है।...चंपिया और बिरजू न होते तो मन की बात हँस कर खोलने में देर न लगती। चंपिया और बिरजू ने एक-दूसरे को देखा और ख़ुशी से उनके चेहरे जगमगा उठे—‘मैया बेकार ग़ुस्सा हो रही थी न!’

‘चंपी! ज़रा घैलसार में खड़ी हो कर मखनी फुआ को आवाज़ दे तो!’

 

‘ऐ फू-आ-आ! सुनती हो फूआ-आ! मैया बुला रही है!’

फुआ ने कोई जवाब नहीं दिया, किंतु उसकी बड़बड़ाहट स्पष्ट सुनाई पड़ी—‘हाँ! अब फुआ को क्यों गुहारती है? सारे टोले में बस एक फुआ ही तो बिना नाथ-पगहियावाली है।’

 

‘अरी फुआ!’ बिरजू की माँ ने हँस कर जवाब दिया, ‘उस समय बुरा मान गई थी क्या? नाथ-पगहियावाले को आ कर देखो, दोपहर रात में गाड़ी लेकर आया है! आ जाओ फुआ, मैं मीठी रोटी पकाना नहीं जानती।’

फुआ काँखती-खाँसती आई—‘इसी के घड़ी-पहर दिन रहते ही पूछ रही थी कि नाच देखने जाएगी क्या? कहती, तो मैं पहले से ही अपनी अँगीठी यहाँ सुलगा जाती।’

 

बिरजू की माँ ने फुआ को अँगीठी दिखला दी और कहा, ‘घर में अनाज-दाना वग़ैरह तो कुछ है नहीं। एक बागड़ है और कुछ बरतन-बासन, सो रात-भर के लिए यहाँ तंबाकू रख जाती हूँ। अपना हुक्का ले आई हो न फुआ?’

फुआ को तंबाकू मिल जाए, तो रात-भर क्या, पाँच रात बैठ कर जाग सकती है। फुआ ने अँधेरे में टटोल कर तंबाकू का अंदाज़ किया...ओ-हो! हाथ खोल कर तंबाकू रखा है बिरजू की माँ ने! और एक वह है सहुआइन! राम कहो! उस रात को अफ़ीम की गोली की तरह एक मटर-भर तंबाकू रख कर चली गई ग़ुलाब-बाग़ मेले और कह गई कि डिब्बी-भर तंबाकू है।

 

बिरजू की माँ चूल्हा सुलगाने लगी। चंपिया ने शकरकंद को मसल कर गोले बनाए और बिरजू सिर पर कड़ाही औंधा कर अपने बाप को दिखलाने लगा—‘मलेटरी टोपी! इस पर दस लाठी मारने पर भी कुछ नहीं होगा!’

सभी ठठा कर हँस पड़े। बिरजू की माँ हँस कर बोली, ‘ताखे पर तीन-चार मोटे शकरकंद हैं, दे दे बिरजू को चंपिया, बेचारा शाम से ही...’

 

‘बेचारा मत कहो मैया, ख़ूब सचारा है’ अब चंपिया चहकने लगी, ‘तुम क्या जानो, कथरी के नीचे मुँह क्यों चल रहा था बाबू साहब का!’

‘ही-ही-ही!’

 

बिरजू के टूटे दूध के दाँतो की फाँक से बोली निकली, ‘बिलैक-मारटिन में पाँच शकरकंद खा लिया! हा-हा-हा!’

सभी फिर ठठाकर हँस पड़े। बिरजू की माँ ने फुआ का मन रखने के लिए पूछा, ‘एक कनवाँ गुड़ है। आधा दूँ फुआ?’

 

फुआ ने गदगद हो कर कहा, ‘अरी शकरकंद तो ख़ुद मीठा होता है, उतना क्यों डालेगी?’

जब तक दोनों बैल दाना-घास खा कर एक-दूसरे की देह को जीभ से चाटें, बिरजू की माँ तैयार हो गई। चंपिया ने छींट की साड़ी पहनी और बिरजू बटन के अभाव में पैंट पर पटसन की डोरी बँधवाने लगा।

 

बिरजू के माँ ने आँगन से निकल गाँव की ओर कान लगा कर सुनने की चेष्टा की—‘उँहुँ, इतनी देर तक भला पैदल जाने वाले रुके रहेंगे?’

पूर्णिमा का चाँद सिर पर आ गया है।...बिरजू की माँ ने असली रुपा का मँगटिक्का पहना है आज, पहली बार। बिरजू के बप्पा को हो क्या गया है, गाड़ी जोतता क्यों नहीं, मुँह की ओर एकटक देख रहा है, मानो नाच की लालपान की...

 

गाड़ी पर बैठते ही बिरजू की माँ की देह में एक अजीब गुदगुदी लगने लगी। उसने बाँस की बल्ली को पकड़ कर कहा, ‘गाड़ी पर अभी बहुत जगह है।...ज़रा दाहिनी सड़क से गाड़ी हाँकना।’

बैल जब दौड़ने लगे और पहिया जब चूँ-चूँ करके घरघराने लगा तो बिरजू से नहीं रहा गया—‘उड़नजहाज़ की तरह उड़ाओ बप्पा!’

 

गाड़ी जंगी के पिछवाड़े पहुँची। बिरजू की माँ ने कहा, ‘ज़रा जंगी से पूछो न, उसकी पुतोहू नाच देखने चली गई क्या?’

गाड़ी के रुकते ही जंगी के झोंपड़े से आती हुई रोने की आवाज़ स्पष्ट हो गई। बिरजू के बप्पा ने पूछा, ‘अरे जंगी भाई, काहे कन्न-रोहट हो रहा है आँगन में?’

 

जंगी घूर ताप रहा था, बोला, ‘क्या पूछते हो, रंगी बलरामपुर से लौटा नहीं, पुतोहिया नाच देखने कैसे जाए! आसरा देखते-देखते उधर गाँव की सभी औरतें चली गई।’

‘अरी टीशनवाली, तो रोती है काहे!’ बिरजू की माँ ने पुकार कर कहा, ‘आ जा झट से कपड़ा पहन कर। सारी गाड़ी पड़ी हुई है! बेचारी!...आ जा जल्दी!’

 

बग़ल के झोंपड़े से राधे की बेटी सुनरी ने कहा, ‘काकी, गाड़ी में जगह है? मैं भी जाऊँगी।’

बाँस की झाड़ी के उस पार लरेना खवास का घर है। उसकी बहू भी नहीं गई है। गिलट का झुमकी-कड़ा पहन कर झमकती आ रही है।

 

‘आ जा! जो बाक़ी रह गई हैं, सब आ जाएँ जल्दी!’

जंगी की पुतोहू, लरेना की बीवी और राधे की बेटी सुनरी, तीनों गाड़ी के पास आई। बैल ने पिछला पैर फेंका। बिरजू के बाप ने एक भद्दी गाली दी—‘साला! लताड़ मार कर लँगड़ी बनाएगा पुतोहू को!’

 

सभी ठठाकर हँस पड़े। बिरजू के बाप ने घूँघट में झुकी दोनों पुतोहूओं को देखा। उसे अपने खेत की झुकी हुई बालियों की याद आ गई।

जंगी की पुतोहू का गौना तीन ही मास पहले हुआ है। गौने की रंगीन साड़ी से कड़वे तेल और लठवा-सिंदूर की गंध आ रही है। बिरजू की माँ को अपने गौने की याद आई। उसने कपड़े की गठरी से तीन मीठी रोटियाँ निकाल कर कहा, ‘खा ले एक-एक करके। सिमराहा के सरकारी कूप में पानी पी लेना।’

 

गाड़ी गाँव से बाहर हो कर धान के खेतों के बग़ल से जाने लगी। चाँदनी, कातिक की!...खेतों से धान के झरते फूलों की गंध आती है। बाँस की झाड़ी में कहीं दुद्धी की लता फूली है। जंगी की पुतोहू ने एक बीड़ी सुलगा कर बिरजू की माँ की ओर बढ़ाई। बिरजू की माँ को अचानक याद आई चंपिया, सुनरी, लरेना की बीवी और जंगी की पुतोहू, ये चारों ही गाँव में बैसकोप का गीत गाना जानती हैं।...ख़ूब!

गाड़ी की लीक धन-खेतों के बीच हो कर गई। चारों ओर गौने की साड़ी की खसखसाहट-जैसी आवाज़ होती है।...बिरजू की माँ के माथे के मँगटिक्के पर चाँदनी छिटकती है।

 

‘अच्छा, अब एक बैसकोप का गीत गा तो चंपिया!...डरती है काहे? जहाँ भूल जाओगी, बग़ल में मासटरनी बैठी ही है!’

दोनों पुतोहुओं ने तो नहीं, किंतु चंपिया और सुनरी ने खखासकर कर गला साफ़ किया।

 

बिरजू के बाप ने बैलों को ललकारा—‘चल भैया! और ज़रा ज़ोर से!...गा रे चंपिया, नहीं तो मैं बैलों को धीरे-धीरे चलने को कहूँगा।’

जंगी की पुतोहू ने चंपिया के कान के पास घूँघट ले जा कर कुछ कहा और चंपिया ने धीमे से शुरु किया—‘चंदा की चाँदनी...’

 

बिरजू को गोद में ले कर बैठी उसकी माँ की इच्छा हुई कि वह भी साथ-साथ गीत गाए। बिरजू की माँ ने जंगी की पुतोहू को देखा, धीरे-धीरे गुनगुना रही है वह भी। कितनी प्यारी पुतोहू है! गौने की साड़ी से एक ख़ास क़िस्म की गंध निकलती है। ठीक ही तो कहा है उसने! बिरजू की माँ बेगम है, लालपान की बेगम! यह तो कोई बुरी बात नहीं। हाँ, वह सचमुच लाल पान की बेगम है!

बिरजू की माँ ने अपनी नाक पर दोनों आँखों को केंद्रित करने की चेष्टा करके अपने रुप की झाँकी ली, लाल साड़ी की झिलमिल किनारी, मँगटिक्का पर चाँद।...बिरजू की माँ के मन में अब और कोई लालसा नहीं। उसे नींद आ रही है।

 

फणीश्वरनाथ रेणु

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सोमवार, 4 अप्रैल 2011

एक अनवरत लड़ाई का नायक

उमाशंकर तमिलनाडु के किसी राजनेता से कम लोकप्रिय नहीं हैं. राजनीति और अफशरशाही के गलियारे में लोग उनका नाम सम्मान से लेते हैं. वे इन दिनों तमिलनाडु के चुनाव में व्यस्त हैं. वे चुनाव नहीं लड़ रहे, उनके जिम्मे चुनाव कराना है. इस चुनाव का परिणाम चाहे जो भी आये लेकिन इतना तय है कि उमाशंकर के जीवन में हार-जीत का खेल चलता रहेगा.
भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी लड़ाई कभी आसान नहीं होती. यह बात उमाशंकर से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. तमिलनाडु के दलित आईएएस अधिकारी सी उमाशंकर पर जैसे भ्रष्टाचार से लड़ने का एक जुनून है और इस लड़ाई की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ती है. सत्ता के खिलाफ एक के बाद एक लड़ाई के कारण उमाशंकर का तबादला होता रहता है या निलंबन. हालांकि कुछ समय पहले ही उमाशंकर की फिर से नौकरी में वापसी हुई है लेकिन कौन जाने, किस राजनीतिक दल की निगाह कब उन पर टेढ़ी हो जाये.

सी उमाशंकर 1990 में नौकरी में आए. नौकरी को अभी पांच साल ही हुए थे, जब 1995 में डीआरडीए (डिस्ट्रीक्ट रुरल डेवलपमेन्ट एजेन्सी) के अंदर बतौर परियोजना अधिकारी पिछड़ी जाति और जनजाति के लिए इस्तेमाल होने वाले श्माशान के शेड्स के नाम पर हुए पैसे के दुरुपयोग पर उन्होंने सवाल उठाया. उमाशंकर ने ना सिर्फ सवाल उठाया बल्कि इसके खिलाफ वे लोक हित याचिका लेकर चेन्नई उच्च न्यायालय में भी गए. इस मामले की सीबीआई जांच हुई और दोषियों को सजा मिली.

1996 में डीएमके की सरकार आई. सरकार ने उमाशंकर को संयुक्त सतर्कता आयुक्त के पद पर बिठाया. उमाशंकर ने आयुक्त रहते हुए अपने कार्यकाल में दो सौ करोड़ के साउथ इंडिया शिपिंग कॉरपोरेशन शेयर विनिवेश घोटाला, एक हजार करोड़ का ग्रेनाइट खदान लीज घोटाला, भूखंडों और तमिलनाडु हाउसिंग बोर्ड के मकानों का फर्जी व्यक्तियों के नाम पर आवंटन का मामला, पैंतालिस हजार टीवी एंटिना और बुस्टर की खरीद, कोयम्बटूर मेडिकल कॉलेज की 20 एकड़ जमीन को पट्टे पर महिलाओं और बच्चों के विकास के नाम पर स्टार होटल और क्लब के लिए दे दिए जाने का मामला, वह भी साधारण किराए पर दिये जाने जैसे कितने ही मामले में उन्होंने भ्रष्टाचारियों को निशाना बनाया.

उमाशंकर के अनुसार उन्होंने अपने कार्यकाल में कई बड़े नामों को भ्रष्टाचार का दोषी पाया, जिसमें मुख्य सचिव स्तर के और वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर आसीन अधिकारी और कुछ पूर्व मंत्री भी शामिल थे.

बकौल उमाशंकर- “ मैं काफी निराश था. मैंने पाया कि उन लोगों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होती है, जो ऊंचा रसूख रखते हैं, चाहे वे भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हों. इस स्थिति को देखकर मैंने सरकार से निवेदन किया कि वह मुझे संयुक्त सतर्कता आयुक्त के पद से मुक्त करे.”
फरवरी 1999 में उमाशंकर जिलाधिकारी के तौर पर तिरुवरुर में नियुक्त हुए. यहां वे अपने जिले में ई-गवर्नेंस लेकर आए. पूरे भारत में किसी जिले के अंदर यह पहला प्रयोग था. एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने उस वक्त खबर बनाई कि ई-गवर्नेंस के कदम के बाद तिरुवरुर जिला देश भर के अन्य जिलों से बीस साल आगे निकल चुका है. एक पत्रिका ने उसके बाद सदी का नायक बनाकर उमाशंकर को पेश किया.

मई 2006 में डीएमके फिर सत्ता में आई. उमाशंकर को एलकॉट (ईएलसीओटी) का कार्यकारी निदेशक बनाया गया. यह राज्य सरकार के स्वामित्व वाली कंपनी थी. उस समय उमाशंकर ने ई-टेंडर लाकर कांट्रेक्ट देने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की बड़ी कोशिश की. वे निविदा मूल्यांकन (टेंडर इवेल्यूशन) की नई प्रक्रिया लेकर आए, जिसमें बोली लगाने वाले ठेकेदारों की भी भूमिका थी.

उमाशंकर के अनुसार जब उन पर एलकॉट की जिम्मेवारी थी, उस दौरान मुख्यमंत्री एम के करुणानिधि की तीसरी पत्नी राजथी अम्माल ने उन्हें अलवारपेट स्थित अपने दफ्तर में बुलाया. उमाशंकर के अनुसार उन्होंने इस बुलावे के बाद मिलना उचित नहीं समझा और कायदे से उन्हें इंकार भी कर देना चाहिए लेकिन वे शिष्टाचार के नाते मिलने चले गए.

वहीं राजथी अम्माल ने उन्हें एक खास आदमी को मछुआरों के लिए खरीदे जाने वाले 45,000 वायरलेस सेट का टेंडर देने की बात कही. उमाशंकर का पक्ष स्पष्ट था कि यह टेंडर, ई-टेंडर की प्रक्रिया से ही तय होगा, जिसे वे नहीं छेड़ना चाहते.

एलकॉट, एक दूसरी निजी लिमिटेड कंपनी न्यू इरा टेक्नोलॉजिज लिमिटेड जो थिंगराजा चेटियार द्वारा नियंत्रित था, दोनों कंपनियां ने मिलकर एलनेट टेक्नालॉजी के नाम से एक साथ काम शुरु किया. जिसमें एलकॉट का हिस्सा 26 फीसदी का था और न्यू इरा टेक्नालॉजी की हिस्सेदारी 24 फीसदी थी और बाकि बचे शेयर आम जनता के लिए थे.

दो कंपनियों के संयुक्त उद्यम एलनेट ने इटीएल इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी शुरु की, इस सोच के साथ कि चेन्नई के पालिकारानाई में एक सूचना प्रोद्योगिकी पार्क सह विशेष आर्थिक क्षेत्र शुरु करेंगे.
इसी सोच के साथ कंपनी ने 26 एकड़ जमीन खरीद ली, जिसे भारत सरकार से सूचना प्रोद्योगिकी विशेष आर्थिक क्षेत्र का दर्जा मिल गया. कंपनी ने अठारह लाख स्क्वायर फीट की एक आईटी बिल्डिंग उस जमीन पर तैयार की. इस संपति की कुल कीमत 700 करोड़ के आस पास होगी. लेकिन बाद में रहस्यमय तरीके से यह कंपनी एलनेट और एलकॉट के नियंत्रण से बाहर हो गई.

जाहिर है, यह सब राजनीति की बड़ी ताकतों और एलकॉट के पूर्व अध्यक्ष की साझेदारी से ही संभव हुआ.

उमाशंकर के अनुसार “इस पूरे आयोजन के कार्यकारी निदेशक और एलनेट के अध्यक्ष के नाते से मैं उस समय की उन परिस्थितियों की जांच करना चाहता था, जिनमें एलनेट और एलकॉट ने इटीएल इंफ्रास्ट्रक्चर के ऊपर से अपना नियंत्रण खो दिया.”

इसके बाद उमाशंकर ने इस घोटाले के संबंध में ‘ सात सौ करोड़ से अधिक कीमत वाली ईटीएल इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी; रहस्यमयी ढंग से लापता’ नाम से एक विशेष रिपोर्ट सरकार के पास भेजी. उमाशंकर इस मामले में प्रशासनिक अधिकारी विवेक हरिनारायाणन और डा सी चन्द्रमॉली की भूमिका की जांच करना चाहते थे.

अभी यह मामला चल ही रहा था कि उमाशंकर का तबादला कर दिया गया. उन्हें एलकॉट से निकालकर टीआईआईसी (तमिलनाडु इन्डस्ट्रीयल इन्वेस्टमेन्ट कॉरपोरेशन लिमिटेड) में कार्यकारी निदेशक बनाकर भेज दिया गया. उमाशंकर के अनुसार- “ मेरे पास इस विश्वास के लिए पर्याप्त कारण हैं कि मेरा तबादला धोखाधड़ी पूर्ण था.”

टीआईआईसी में काम करने के दौरान मारन बंधुओं के बीच सन टीवी ग्रुप ऑफ टेलीविजन नेटवर्क पर अधिकार को लेकर कलह चल रहा था. मारन बंधु की ताकत को पूरा देश जानता है, वे देश के गिने चुने धनी लोगों में से एक हैं. इसी बीच एक दिन मुख्यमंत्री डॉ. कलियंगनार करुणानिधि ने उमाशंकर को मिलने के लिए बुलाया और आरसू केबल टीवी नेटवर्क का कार्यकारी निदेशक बनाकर काम करने का आदेश जारी किया.

उमाशंकर ने वहां अपनी परेशानी बताई कि यहां उनके अधिकारी डा चन्द्रमॉली होंगे, जिनके खिलाफ उमाशंकर ने ईटीएल इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के मामले में रिपोर्ट दाखिल की हुई थी. उसके बाद चन्द्रमॉली का इन्फॉरमेशन टेक्नॉलॉजी सेक्रेटरी सह अध्यक्ष आरसू केबल टीवी कॉरपोरेशन लिमिटेड के पद से तबादला कर दिया गया. उनकी जगह पीडब्ल्यूसी देवीदार आ गए. उमाशंकर को आरसू केबल में बतौर एमडी नियुक्ति मिली.

उमाशंकर ने यहां पाया कि सुमंगली केबल टीवी जो मारन बंधुओं द्वारा नियंत्रित था, वह बड़े पैमाने पर आरसू केबल के ऑप्टिक फाइबर केबल को नुक्सान पहुंचाने में लिप्त था. सुमंगली केबल विजन अपना मोनोपॉली बाजार में बनाए रखना चाहता था. उस समय उमाशंकर ने सुमंगली केबल विजन के इस आपराधिक गतिविधि की तरफ सरकार का ध्यान दिलाया और साथ में यह भी सरकार को बताया कि सरकार की एक कंपनी को नुक्सान पहुंचाने की गतिविधि में सरकार के एक मंत्री भी शामिल हैं. उमाशंकर ने इस संबंध में कई रिपोर्ट सरकार को भेजी और यह सुझाव भी दिया कि कानून सम्मत तरिके से मारन बंधुओं की गिरफ्तारी के प्रयास होने चाहिए.

इधर तमिलनाडु की राजनीति के इतिहास में मारन बंधुओं और करुणानिधि परिवार के बीच के विवाद में समझौते की कहानी लिखी जा रही थी. भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के नाते उस वक्त उमाशंकर चाहते थे कि मारन बंधुओं को उनके अपराध की सजा भारतीय दंड संहिता के मुताबिक मिले.

इस घटना के बाद उमाशंकर आरसू केबल टीवी कॉरपोरेशन से भी बाहर हो चुके थे. अब उनका स्थानान्तरण कमिश्नर ऑफ स्मॉल सेविंग के तौर हो गया था और आरसू केबल टीवी कॉरपोरेशन लिमिटेड नाम का सरकारी प्रकल्प अपनी समाप्ति की घोषणा पर था.

उमाशंकर के अनुसार “इस समय मारन बंधु और माननीय मुख्यमंत्री बदला लेने की मुद्रा में आ चुके थे. वे मुझे परेशान करना चाहते थे.” 21 जुलाई 2010 को उमाशंकर को निलंबित कर दिया गया. सरकार ने उमाशंकर द्वारा दिया गया दलित समुदाय के प्रमाण पत्र की सच्चाई पर सवाल उठाया था.

उमाशंकर के अनुसार उन्होंने अपना समुदाय प्रमाणपत्र संघ लोक सेवा आयोग के पास जमा करा दिया था- “जब संघ लोक सेवा आयोग द्वारा ऑल इंडिया सर्विसेज इक्जामिनेशन का परिणाम जारी किया गया था. उस वक्त मेरा परिणाम रोका गया था, समुदाय प्रमाणपत्र की सत्यता की जांच के लिए. बाद में उसकी जांच हुई और उसके बाद ही मेरा परिणाम प्रकाशित हुआ.”

उमाशंकर खिन्न होकर कहते हैं, “सरकार कभी भी भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कदम नहीं उठाती. सरकार के कदम मेरे खिलाफ उठे हैं क्योंकि मैंने हमेशा ईमानदारी के साथ काम किया है.”

राजनीतिक गलियारे में रहने वाले लोगों का मानना है कि सी उमाशंकर की वापसी इसलिये हो पाई है क्योंकि सरकार दलित वोटों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती थी. लेकिन जब उमाशंकर सरकार को परेशान करेंगे तो जाहिर है, उमाशंकर का एक बार फिर तबादला कर दिया जायेगा और औद्योगिक-राजनीतिक गठजोड़ तो कोई भी आरोप लगा कर उन्हें निलंबित करवाने की ताकत रखता ही है. [साभार-रविवार.कॉम]

बुधवार, 23 मार्च 2011

280 लाख करोड़ का सवाल

280 लाख करोड़ का सवाल
है ...
भारतीय गरीब है
लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा" ये कहना है स्विस बैंक के
डाइरेक्टर
का.
स्विस बैंक के डाइरेक्टर ने यह भी कहा है कि भारत का लगभग 280
लाख
करोड़ रुपये (280 ,000 ,000 ,000 ,000) उनके स्विस बैंक में जमा है. ये रकम
इतनी
है कि भारत का आने वाले 30 सालों का बजट बिना टैक्स के बनाया जा सकता है.
या
यूँ कहें कि 60 करोड़ रोजगार के अवसर दिए जा सकते है. या यूँ भी कह सकते
है
कि भारत के किसी भी गाँव से दिल्ली तक 4 लेन रोड बनाया जा सकता है.
ऐसा भी कह
सकते है कि 500 से ज्यादा सामाजिक प्रोजेक्ट पूर्ण किये जा
सकते है. ये रकम
इतनी ज्यादा है कि अगर हर भारतीय को 2000 रुपये हर
महीने भी दिए जाये तो 60
साल तक ख़त्म ना हो. यानी भारत को किसी वर्ल्ड
बैंक से लोन लेने कि कोई जरुरत
नहीं है. जरा सोचिये ...

हमारे
भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों ने कैसे देश को लूटा है और
ये लूट का
सिलसिला अभी तक 2011 तक जारी है. इस सिलसिले को अब रोकना
बहुत ज्यादा
जरूरी हो गया है. अंग्रेजो ने हमारे भारत पर करीब 200 सालो तक राज
करके
करीब 1 लाख करोड़ रुपये लूटा. मगर आजादी के केवल 64 सालों में हमारे
भ्रष्टाचार  ने
२८० लाख करोड़ लूटा है. एक तरफ 200 साल में 1 लाख
करोड़ है और दूसरी तरफ केवल 64
सालों में 280 लाख करोड़ है. यानि हर साल
लगभग 4.37 लाख करोड़, या हर महीने
करीब 36 हजार करोड़ भारतीय मुद्रा
स्विस बैंक में इन भ्रष्ट लोगों द्वारा जमा
करवाई गई है. भारत को किसी
वर्ल्ड बैंक के लोन की कोई दरकार नहीं है. सोचो की
कितना पैसा हमारे
भ्रष्ट राजनेताओं और उच्च अधिकारीयों ने ब्लाक करके रखा हुआ
है. हमे
भ्रष्ट  राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारीयों के खिलाफ जाने का पूर्ण अधिकार
है.
हाल ही में हुए  घोटालों का आप सभी को पता ही है - CWG घोटाला, २ जी
स्पेक्ट्रुम
घोटाला, आदर्श होउसिंग घोटाला ... और ना जाने कौन कौन से घोटाले
अभी
उजागर होने वाले है ........

मंगलवार, 22 मार्च 2011

इस सत्याग्रह से कौन पिघला?

पिछले एक दशक से मणिपुर घाटी की एक युवा महिला का अनशन जारी है। पुलिस और डॉक्टर प्लास्टिक ट्यूब  के जरिए भोजन देकर उन्हें जीवित रखे हुए हैं। इन दस सालों का बड़ा हिस्सा उन्होंने अस्पताल में पुलिस के कड़े पहरे के बीच बिताया है। एक दुर्लभ साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकारा कि अस्पताल में अगर उन्हें किसी चीज की सबसे ज्यादा कमी खलती है तो वह है अपने लोगों का साथ। बीते एक दशक से उन्होंने अपनी मां का चेहरा नहीं देखा है। उन्होंने अपनी निरक्षर मां के साथ यह अनुबंध कर लिया है कि जब तक वे अपने राजनीतिक लक्ष्यों को अर्जित नहीं कर लेतीं, तब तक एक-दूसरे से भेंट नहीं करेंगी।

इरोम शर्मिला की जिद यह है कि जब तक भारत सरकार मणिपुर से आम्र्ड फोर्सेस (स्पेशल पॉवर्स) एक्ट 1958 (एएफएसपीए) को वापस नहीं लेती, तब तक वे अपना अनशन जारी रखेंगी। पुलिस बार-बार उन्हें आत्महत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार कर लेती है, जिसके लिए अधिकतम सजा एक साल की कैद है। हर बार रिहाई के फौरन बाद उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया जाता है। अहिंसक राजनीतिक प्रतिरोध की ऐसी मिसाल दुनियाभर में कोई और नहीं है। इरोम शर्मिला एक ऐसे कानून को वापस लेने की मांग कर रही हैं, जो उनके अनुसार वर्दीधारियों को बिना किसी सजा के भय के बलात्कार, अपहरण और हत्या करने के अधिकार मुहैया करा देता है। वर्ष 1958 में यह कानून इस लक्ष्य के साथ लागू किया गया था कि नगालैंड में सशस्त्र विद्रोहों का प्रभावी सामना करने के लिए भारतीय सशस्त्र बलों को अधिक शक्तियां प्रदान की जा सकें। 1980 में यह कानून मणिपुर में भी लागू हो गया।

1 नवंबर 2000 को असम रायफल्स अर्धसैन्य बल ने मणिपुर घाटी के मालोम कस्बे में बस की प्रतीक्षा कर रहे दस निर्दोष नागरिकों को गोलियों से भून डाला। इनमें एक किशोर लड़का और एक बूढ़ी महिला भी थी। हादसे की दर्दनाक तस्वीरें अगले दिन अखबारों में छपीं। 28 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और कवयित्री इरोम शर्मिला ने भी ये तस्वीरें देखीं। असम रायफल्स ने अपने बचाव में तर्क दिया कि आत्मरक्षा के प्रयास में क्रॉस फायर के दौरान ये नागरिक मारे गए, लेकिन आक्रोशित नागरिक स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग कर रहे थे। इसकी अनुमति नहीं दी गई, क्योंकि असम रायफल्स को एएफएसपीए के तहत ओपन फायर के अधिकार प्राप्त थे। शर्मिला ने शपथ ली कि वे इस कानून के अत्याचार से अपने लोगों को मुक्त कराने के लिए संघर्ष करेंगी। उनके सामने अनशन के अलावा और कोई चारा नहीं था। उन्होंने अपनी मां का आशीर्वाद लिया और 4 नवंबर 2000 को अनशन की शुरुआत की। एक दशक बीतने के बाद भी कानून यथावत है और शर्मिला का अभियान भी जारी है।

इस दौरान एक बार रिहाई की क्षणिक अवधि में वे दिल्ली पहुंचने में सफल रहीं। उन्होंने अपने आदर्श महात्मा गांधी की समाधि पर आदरांजलि अर्पित की, लेकिन जल्द ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। दिल्ली के एक अस्पताल में कुछ समय बिताने के बाद उन्हें फिर इम्फाल के हाई सिक्योरिटी अस्पताल वार्ड में भेज दिया गया, जहां वे अब भी हैं। महात्मा गांधी का विश्वास था कि अहिंसक सत्याग्रह के जरिए अत्याचारियों के मन में संवेदनाएं जगाई जा सकती हैं, लेकिन बीते एक दशक में ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता कि इस युवा महिला के सत्याग्रह ने भारतीय राजनीतिक तंत्र की संवेदनाओं को झकझोरा हो। वर्ष 2004 में भारत सरकार ने इस बात की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए क्या इस कानून में संशोधन की आवश्यकता है या उसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए। 2005 में आयोग ने अनुशंसा की कि कानून को समाप्त कर दिया जाना चाहिए और इसके कई प्रावधानों को अन्य कानूनों में समायोजित कर लिया जाना चाहिए, लेकिन सरकार ने आयोग की इस अनुशंसा की अनदेखी कर दी।

शर्मिला द्वारा अनशन प्रारंभ किए जाने के बाद घाटी की कई महिलाओं ने अहिंसक प्रतिरोध के कई अन्य स्वरूप ईजाद किए। वर्ष 2004 में राजनीतिक कार्यकर्ता थंगियम मनोरमा के साथ किए गए सामूहिक बलात्कार और फिर उनकी नृशंस हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। घाटी में जनाक्रोश चरम पर पहुंच गया। मणिपुरी महिलाएं असम रायफल्स के मुख्यालय कांगला फोर्ट के द्वार पर एकत्र हुईं और निर्वस्त्र होकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाली एक महिला तुनुरी ने बताया यह दृश्य देखकर सैनिक शर्मसार होकर फोर्ट में लौट गए। निर्वस्त्र महिलाएं आधे घंटे तक विरोध प्रदर्शन करती रहीं। अगले दिन इस प्रदर्शन के समाचारों ने पूरे देश का ध्यान मणिपुर की स्थितियों की ओर खींचा। सरकार ने असम रायफल्स को ऐतिहासिक कांगला फोर्ट खाली कर देने का आदेश दिया। रायफल्स के मुख्यालय को घाटी के दूरस्थ क्षेत्रों में स्थापित कर दिया गया और न्यायिक जांच के आदेश दिए गए। लेकिन असम रायफल्स ने मनोरमा के साथ किए गए बलात्कार और उसकी नृशंस हत्या को एक तरह से उचित ठहराते हुए बयान जारी किया कि वह पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की एक आतंकवादी थी।

वर्ष 2008 के बाद से रोज लगभग सात से दस महिलाएं इरोम शर्मिला के साथ एक दिन का उपवास कर रही हैं। इम्फाल में मेरी भेंट इन प्रदर्शनकारी महिलाओं से हुई। वे अपने परिजनों से दूर रहकर शिविरों में जीवन बिताते हुए अपनी नायिका शर्मिला के आंदोलन को जारी रखे हुए हैं। इरोम शर्मिला के अनशन और कारावास के दस वर्ष पूरे होने पर देशभर से सामाजिक कार्यकर्ता और कलाकार इम्फाल में एकजुट हुए। यहां हमने कविता, गीत, नृत्य और चित्रकला की अद्भुत प्रस्तुतियां देखीं, जो मणिपुर के लोगों के आंदोलन की नायिका इरोम शर्मिला के प्रति आदरांजलि थी।

इम्फाल में अपने अस्पताल के वार्ड से इरोम शर्मिला लिखती हैं : मेरे पैरों को मुक्त कर दो उन बंधनों से/जो कांटों की बेड़ियों की तरह हैं/एक तंग कोठरी के भीतर/कैद हैं मेरे तमाम दोष और अवगुण/और मैं/एक पक्षी की तरह..

हर्ष मंदर
लेखक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य हैं।
[साभार- भास्कर.कॉम]

शनिवार, 29 जनवरी 2011

भारत के नंगे अमीर

मीडिया में अद्भुत दृश्य चल रहा है। टाटा से लेकर अनिल अम्बानी तक ,देशी-विदेशी राजनयिकों से लेकर अमेरिका के महान ताकतवर लोगों तक सबको आप मीडिया में नंगा देख सकते हैं। अमीर इस तरह नंगे कभी नहीं हुए। टाटा ने जनसंर्पक अधिकारी नीरा राडिया के साथ हुई बातचीत का टेप बाहर आने पर सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगायी है कि उनकी प्राइवेसी का हनन हुआ है। वहीं उनकी प्रतिक्रिया आते ही केन्द्र ने तत्काल जांच के आदेश दे दिए हैं। 2जी स्पेक्ट्रम के मामले में सारी पार्टियां परेशान हैं, और केन्द्र सरकार के सभ्य प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साख तो मिट्टी में ही मिल गयी है।
उधर अमेरिकी प्रशासन परेशान है ढ़ाई लाख केबिल मेल के लीक होने से। जिस वेबसाइट ने लीक किया है उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के बारे में अमेरिकी अधिकारी विचार कर रहे हैं।
टाटा से लेकर अनिल अम्बानी तक समस्त कारपोरेट घराने कम से कम आज बेईमानी-धोखाधड़ी आदि के मामलों में जन अदालत में नंगे खड़े हैं। उनके खिलाफ प्रमाण थे। इसे कांग्रेस पार्टी जानती थी। प्रधानमंत्री जानते थे। वे चुप रहे। कल जब संचारमंत्री कपिल सिब्बल प्रेस कॉफ्रेस करके 85 संचार कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर रहे थे तो वे वस्तुतः नव्य आर्थिक उदार नीतियों की ओट में चल रहे सत्ता और कारपोरेट घरानों के पापी भ्रष्ट गठबंधन को स्वीकार कर रहे थे।
कपिल सिब्बल प्रच्छन्नतः यह भी संदेश दे रहे थे परवर्ती पूंजीवाद में कारपोरेट घराने सार्वजनिक संपदा को खुलेआम लूट रहे हैं। कारपोरेट घराने ईमानदारी से कारोबार नहीं कर रहे। वे संकेतों में कह रहे थे कारपोरेटतंत्र महाभ्रष्ट तंत्र है। उनके यहां कोई पारदर्शिता नहीं है। साथ में प्रच्छन्नतः बिना बोले बता रहे थे प्रधानमत्री मनमोहन सिंह कारपोरेट घरानों के आर्थिक अपराधों पर पर्दा ड़ालते रहे हैं।
जिन कंपनियों को नोटिस भेजे गए हैं वे लंबे समय से धडल्ले से काम कर रही हैं। वे यह प्रच्छन्नतः बता रहे थे दूरसंचार कंपनियां सबसे घटिया किस्म की कारपोरेट कारोबारी संस्कृति लेकर आयी हैं। ये ऐसी कारपोरेट संस्कृति है जिसका लक्ष्य सिर्फ व्यापार करना ही नहीं है बल्कि वे भारत की राजनीति के भी फैसले ले रही हैं। कौन सा मंत्रालय किसे मिले यह फैसला प्रधानमंत्री नहीं कर रहे बल्कि कारपोरेट घराने कर रहे हैं। आप कल्पना करें सीएजी की रिपोर्ट में 2जी स्पेक्ट्रम का घोटाला उजागर नहीं हुआ होता ,संसद को विपक्ष ने ठप्प नहीं किया होता तो क्या इतने बड़े कारपोरेट घपले और सार्वजनिक संपदा की इस खुली लूट के खिलाफ कपिल सिब्बल कारण बताओ नोटिस जारी करते ?
कपिल सिब्बल ने 2जी स्पेक्ट्रम के मामले में 85 कंपनियों को नोटिस भेजा है। साथ ही उन 119 कंपनियों को भी कारण बताओ नोटिस भेजा है जिनके नाम दूरसंचार सेवाएं प्रदान करने का लाइसेंस जारी किया गया था लेकिन वे अभी तक अपनी सेवाएं आरंभ नहीं कर पायी हैं । दूरसंचार का घपला कैसे चल रहा है इस पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने वोडाफोन को करचोरी के लिए दोषी पाया है। पहले भी रिलाएंस कंपनी को दूरसंचार नियमों की अवहेलना के चक्कर में मोटी रकमजुर्माने के तौर पर देनी पड़ी है।
उल्लेखनीय है दूरसंचार के कंधों पर ही सवार होकर नव्य उदार नीतियां बड़े लंबे-चौड़े वायदों के साथ लायी गयी थीं। उस समय वामदलों ने इन नीतियों का जमकर विरोध किया था। उस समय वामदलों को छोड़कर सभी दल एकजुट हो गए थे आज नव्य उदार नीतियों का भ्रष्टतमरूप हमारे सामने है और भारत की अधिकांश बड़ी कारपोरेट कंपनियां इसमें लिप्त हैं।
नव्य उदार नीतियों के प्रति वामदलों का बुनियादी नजरिया और जिन संभावनाओं को उन्होंने संसद और बाहर व्यक्त किया था सही साबित हुआ है। वामदलों का बुनियादी तौर पर कहना था कि नव्य उदार नीतियों के नाम पर कारपोरेट घरानों के हाथों देश की संपदा को नियमों, संप्रभुता और आत्मनिर्भरता को ताक पर रखकर गिरवी रखा जा रहा है और इन नीतियों की आड़ में सार्वजनिक संपदा की लूट को वैधता प्रदान करने की कोशिश की जा रही है। सार्वजनिक संपदा की लूट का यह सिलसिला दूरसंचार के विनियमन से होता हुआ हर्षद मेहता घोटाला मार्ग से चलकर 2जी स्पेक्ट्रम और कॉमनवेल्थ गेम घोटालों तक चरमोत्कर्ष पर पहुँचा है।
संयोग की बात है हर्षद मेहता घोटाले के समय मनमोहन सिंह वित्तमंत्री थे और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के समय प्रधानमंत्री हैं। इन सभी अवसरों पर घोटालों की राजनीतिक जिम्मेदारी लेने से वे बचते रहे हैं। वे कारपोरेट घरानों और अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पसंदीदा राजनेता हैं। हर समय कारपोरेट घराने उन पर ही दांव लगाते रहे हैं। वे वफादार कारपोरेट सेवक साबित हुए हैं।
आश्चर्य की बात है कि विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग नहीं कर रहा ? घोटालों का सवाल राजनीतिक है। यह तकनीकी और आर्थिक नहीं है। केन्द्र सरकार के ऊपर इन घोटालों की राजनीतिक जिम्मेदारी और जबाबदेही है। हम यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि मीडिया के द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस्तीफा क्यों नहीं मांगा जा रहा ? मीडिया मनमोहन सिंह को क्यों बचाना चाहता है ? क्या मीडिया की आलोचना के दायरे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नहीं आते ? मनमोहन सिंह ने ऐसा कौन सा पुण्य का काम किया है कि उनको राजनीतिक मुखिया होने के कारण जिम्मेदारी से बरी कर दिया जाए ?
लेखक-जगदीश्वर चतुर्वेदी
[जगदीश्वर चतुर्वेदी जाने माने मार्क्सवादी साहित्यकार और विचारक हैं. इस समय कोलकाता विश्व विद्यालय में प्रोफ़ेसर ]

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011

जाति प्रथा का विनाश

जाति-व्‍यवस्‍था पर फिर से सवाल उठ रहे हैं। नए सिरे से मूल्‍यांकन हो रहा है। जाति-व्‍यवस्‍था को लेकर सबसे अधिक आरोपों का सामने करने वाली संस्‍था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने स्‍पष्‍ट तौर पर कहा है कि हिंदू जाति-व्यवस्था की दीवारों को ढहा दें। इस व्‍यवस्‍था पर सबसे अधिक सुगठित प्रहार डॉ. भीमराव आंबेडकर ने किया था। उन्‍होंने जाति व्‍यवस्‍था के दंश को झेला भी था। आंबेडकर ने जाति-पांत तोड़क मंडल के लाहौर अधिवेशन के लिए एक लिखित भाषण प्रस्‍तुत किया था। इस भाषण की काफी चर्चा हुई है। वास्‍तव में यह समरस समाज बनाने की दिशा में प्रकाशस्‍तंभ की तरह है।
मित्रों,
जात-पांत तोड़कर  मंडल के जिन सदस्‍यों ने कृपापूर्वक मुझे इस सम्‍मेलन का सभापति चुना है, मुझे चिंता है, उन लोगों से मेरे चुनाव के संबंध में अनेकों प्रश्‍न किए जाएंगे। उनसे पूछा जा सकता है, क्‍या लाहौर में कोई योग्‍य पुरूष नहीं था जो सभापति चुनने के लिए बंबई दौड़ गए। मैं हिंदू धर्म का आलोचक हूं, मैंने महात्‍मा जी के सिद्धांतों की भी, जिन पर हिंदुओं की श्रद्धा है, आलोचना की है, जिससे वे मुझे अपनी वाटिका का सर्प समझते हैं। मैं समझता हूं शायद राजनीतिक हिंदू भी मंडल से जवाब तलब करेंगे कि उसने इस आदरणीय पद के लिए मुझे चुनकर हिंदुओं का अपमान क्‍यों किया। सामान्‍य हिंदुओं को तो यह पसंद नहीं आएगा, क्‍योंकि सवर्ण हिंदुओं की सभा में संबोधन के लिए एक अंत्‍यज का चुना जाना शास्‍त्रीय मर्यादा को भंग करना है। अंत्‍यज कितना भी अनुभवी क्‍यों न हो, शास्‍त्र उसे ‘उपदेष्‍टा’ स्‍वीकार करने की आज्ञा नहीं दे सकते। शास्‍त्रानुसार ब्राह्मण ही तीनों वर्णों का उपदेष्‍टा और गुरु है। हिंदू-राज्‍य के संस्‍थापक शिवाजी के गुरु संत रामदास जी ने अपने मराठी ग्रंथ ‘दासबोध’ में हिंदुओं से प्रश्‍न किया है कि क्‍या तुम किसी अंत्‍यज को, जो तुम्‍हारे सभी प्रश्‍नों का उत्तर दे सकता है, अपना गुरु स्‍वीकार कर सकते हो। यही प्रश्‍न यदि मैं करूं, तो मंडल के पास इसका क्‍या उत्तर होगा। उस कारण को तो मंडल ही जानता है, जिसने उसे बंबई भेजा और जिसने उसे मेरे जैसे व्‍यक्ति को, जो हिंदू धर्म का इतना विरोधी और अंत्‍यज है, मर्यादा के विरुद्ध सवर्ण हिंदुओं को संबोधन करने के लिए सभापति चुना।
अपने संबंध में, मैं आपसे यह कहने की अनुमति चाहता हूं कि मैंने आपके निमंत्रण को अपनी एवं अपने अछूत साथियों की इच्‍छा से स्‍वीकार नहीं किया। मैं जानता हूं, हिंदू मुझसे और मेरे भाइयों से घृणा करते हैं, इसलिए मैंने सदा अपने को उनसे अलग रखा और अपने विचारों का प्रकाश अपने प्‍लेटफार्म पर करता रहा। हिंदुओं के प्‍लेटफार्म पर अपनी बातें सुनाकर अपने को उनके ऊपर रखने की मैंने कभी इच्‍छा नहीं की। यहां भी मैं अपनी इच्‍छा से नहीं, आपके चुनाव से आया हूं। मैंने इससे इनकार करना इसलिए उचित नहीं समझा, क्‍योंकि मुझे बताया गया कि इस सम्‍मेलन का उद्देश्‍य सामाजिक सुधार है, और समाज सुधार एक ऐसा विषय है जिससे मुझे मोह है- विशेषत: उस दशा में, जबकि आप समझते हों कि इस काम से मैं आपकी कुछ सहायता कर सकता हूं, उस समस्‍या के हल के लिए आप कहां तक ग्रहण कर सकेंगे।
इस प्राक्‍कथन के साथ अब मैं मुख्‍य विषय पर अपने विचार आपके सामने रखने की अनुमति चाहता हूं।
कांग्रेस और समाज सुधार
भारत में समाज सुधार का काम निर्वाण-प्राप्ति के मार्ग के समान अनेक कठिनाइयों से पूर्ण हैं। कारण, भारत में समाज सुधार के मित्र थोड़े और शत्रु बहुत अधिक हैं। इंडियन नेशनल कांग्रेस देश की बहुत बड़ी संस्‍था है, किंतु समाज सुधार के साथ उसका व्‍यवहार कैसा रहा है, पहले इसी पर नजर डालिए।
पश्चिमी विद्वानों के संपर्क में जब यह देश आया, तो लोग मानने लगे कि कु‍रीतियों से आक्रांत हिंदू समाज में सामाजिक चेतना नहीं रही। अत: कुरीतियों को मिटाने का प्रयास निरंतर होना चाहिए। इस सत्‍य को स्‍वीकार कर लेने के कारण ही ‘कांग्रेस’ के जन्‍म के साथ, सोशल कान्‍फ्रेंस(समाज सुधार सम्‍मेलन) की भी नींव रखी गई। और कांग्रेस अधिवेशन के साथ ही, उसी पंडाल में ‘सोशल कान्‍फ्रेंस’ का भी अधिवेशन होने लगा। किंतु सामाजिक सुधार की चर्चा चलने पर जब हिंदू समाज व्‍यवस्‍था की तीव्र आलोचना होने लगी, तो यह बात ब्राह्मणों और कट्टर हिंदुओं को बर्दाश्‍त नहीं हुई और कांग्रेस के पूना अधिवेशन में, पूना के ब्राह्मणों के अनुरोध से, जब लोकमान्‍य बाल गंगाधर तिलक ने इसका विरोध किया, तो कांग्रेस ने ‘समाज सुधार सम्‍मेलन’ को अपना पंडाल नहीं दिया और सामाजिक सम्‍मेलन के प्रेमियों ने जब अपना पंडाल अलग बनाना चाहा, तो विरोधियों ने उसे जला डालने की धमकी दी। कांग्रेस के इलाहाबाद अधिवेशन के सभापति मि. डब्‍ल्‍यू. सी. बनर्जी ने ‘समाज सुधार सम्‍मेलन’ के विरुद्ध अपने भाषण में कहा-
‘’मैं उन लोगों से सहमत नहीं हूं जो कहते हैं कि जब तक हम अपनी सामाजिक पद्धति में सुधार नहीं करते, तब तक हम राजनैतिक सुधार के योग्‍य नहीं हैं। मुझे इन दोनों के बीच कोई संबंध नहीं दिखाई देता। क्‍या हम राजनैतिक सुधार के योग्‍य इसलिए नहीं हैं क्‍योंकि हमारी विधवाओं का पुनर्विवाह नहीं होता और हमारी लड़कियों की शादी कम उम्र में हो जाती है या हमारी पत्नियां और पुत्रियां हमारे साथ गाड़ी में बैठकर हमारे मित्रों से मिलने नहीं जाती। क्‍योंकि हम अपनी बेटियों को ऑक्‍सफोर्ड और कैम्ब्रिज में पढ़ने के लिए नहीं भेजते। (हर्षध्‍वनि)
मि. बनर्जी के इन आक्षेपों के पर्याप्‍त उत्तर हैं। उनसे पूछा जा सकता है, क्‍या आपको यह मालूम है कि हिंदू समाज व्‍यवस्‍था ने देश की पंचमांश जनसंख्‍या को ‘अछूत’ बना रखा है। पेशवाओं के शासनकाल में, महाराष्‍ट्र में, इन अछूतों को उस सड़क पर चलने की आज्ञा नहीं थी जिस पर कोई सवर्ण हिंदू चल रहा हो। इनके लिए आदेश था कि ये अपनी कलाई में या गले में काला धागा बांधें, ताकि हिंदू इन्‍हें भूल से छू न लें। पेशवाओं की राजधानी पूना में तो इन अछूतों के लिए यह आदेश था कि वे कमर में झाड़ बांध कर चलें ताकि इनके पैरों के चिन्‍ह झाड़ से मिट जाएं और कोई हिंदू इसके पद-चिन्‍हों पर पैर रखकर अपवित्र न हो जाए, अछूत अपने गले में हांड़ी बांधकर चलें, और जब थूकना हो तो उसी में थूकें, भूमि पर पड़े हुए अछूत के थूक पर किसी हिंदू का पैर पड़ जाने से वह अपवित्र हो जाएगा। अछूत भी मनुष्‍य है, पेशवा ब्राह्मण भी मनुष्‍य है। एक मनुष्‍य का दूसरे मनुष्‍य के साथ यह व्‍यवहार।
इसी तरह मध्‍य भारत में गरीब बलाई जाति के विरुद्ध वहां के कालोटों, राजपूतों और ब्राह्मणों ने इंदौर जिले के 15 गांवों में ऐसे अमानवीय कानून बनाए थे, जिनका पालन न कर सकने के कारण बलाइयों को स्‍त्री-बच्‍चों सहित उन चारों को छोड़कर, जहां उनके बाप-दादे पीढि़यों से रहते आए थे, धार, देवास, बागली, भोपाल, ग्‍वालियर और दूसरे निकटवर्ती राज्‍यों के सुनसान गांवों में चला जाना पड़ा, और इन नए घरों में उनके साथ जैसी बीती, वह अवर्णनीय है। बलाई भी मनुष्‍य हैं और ब्राह्मण-राजपूत भी मनुष्‍य हैं। (टाइम्‍स ऑफ इंडिया, 4 जनवरी 1920)
गुजरात के अंतर्गत कविथा ग्राम की घटना अभी पिछले साल की है। कविथा के हिंदुओं के अछूतों के बच्‍चों को सरकारी स्‍कूलों में पढ़ने नहीं दिया। अहमदाबाद के ‘जन’ नामक गांव की नवंबर 1935 की घटना है कि वहां के अछूतों की स्त्रियों पर सवर्ण हिंदुओं ने इस कारण आक्रमण किया क्‍योंकि वे धातु के बर्तनों में पानी लाने लगी थीं। जयपुर राज्‍य के चकवारा गांव की ताजा घटना है कि वहां एक अछूत ने तीर्थयात्रा से लौटकर अपने भाइयों को पकवान का भो‍ज दिया। बेचारे अछूत मेहमान भोजन कर ही रहे थे कि सैकड़ों हिंदू लाठी लेकर उन पर टूट पड़े और उनका भोजन खराब कर दिया, क्‍योंकि वे लोग घी के बने पकवान खा रहे थे। उन्‍होंने अतिथि बन कर घी खाने की ढिठाई क्‍यों की। घी तो हिंदुओं का खाद्य है, अछूतों को घी खाने का अधिकार नहीं।
प्रश्‍न होता है, जिस समाज में मनुष्‍य दुर्बलों पर इस तरह के क्रूर, गर्हित और अमानवी आचरण करते हों, वहां समाज सुधार की आवश्‍यकता क्‍यों नहीं है।
समाज सुधार के दो अर्थ है: एक पारिवारिक सुधार और दूसरा, समाज का पुनर्गठन। विधवा विवाह, बाल विवाह, स्‍त्री शिक्षा आदि पारिवारिक सुधार के अंतर्गत हैं तथा समाज में ऊंच-नीच, छूत-अछूत का अधिकार-भेद, वर्ण भेद या जाति भेद मिटाना सामाजिक सुधार है। हमारे देश में जो सांप्रदायिक बंटवारा(कम्‍यूनल अवार्ड) हुआ, वह सामाजिक सुधार न होने के कारण हुआ। यदि देश की सामाजिक व्‍यवस्‍था ठीक होती, तो सांप्रदायिक बंटवारे का प्रश्‍न ही न उठता। (एक भारत के दो खंड सामाजिक कुव्‍यवस्‍था का फल है।)
इतिहास इस बात का समर्थन करता है कि समुन्‍नत देशों में राजनैतिक क्रांतियों से पहले सामाजिक और धार्मिक क्रांतियां हुई हैं। लूथर द्वारा किया हुआ धार्मिक सुधार यूरोपीय लोगों के राजनैतिक उद्धार का पूर्व लक्षण था। प्‍यूरीटिनिज्‍म एक धार्मिक सुधार था और इसने नए संसार की नींव रखी, अमेरिकी स्‍वतंत्रता का युद्ध जीता। हजरत मुहम्‍मद द्वारा धार्मिक क्रांति होने के बाद ही अरबों ने राजनैतिक शक्ति प्राप्‍त की। भगवान बुद्ध द्वारा की हुई धार्मिक क्रांति के फलस्‍वरूप ही चंद्रगुप्‍त और अशोक जैसे सम्राट हुए। साधु-संतों द्वारा की हुई धार्मिक क्रांति के बाद ही शिवाजी हिंदू राष्‍ट्र की स्‍थापना कर सके। गुरु नानक द्वारा पैदा की गई धार्मिक क्रांति के फलस्‍वरूप ही सिखों ने राजनैतिक शक्ति प्राप्‍त की। तब कैसे कहा जा सकता है कि शक्तिशाली और सुदृढ़ राष्‍ट्र को बनाने के लिए धार्मिक और सामाजिक क्रांति की आवश्‍यकता नहीं है।
कम्‍युनिस्‍ट और समाज सुधार
कांग्रेस के बाद राजनीतिज्ञों का दूसरा दल कम्‍युनिस्‍टों(साम्‍यवादियों) का है। इस दल के सिद्धांत सामाजिक अवस्‍था के अनुरूप स्थिर हुए। कम्‍युनिस्‍टों का ध्‍येय धार्मिक असमानता को मिटाकर समाज में समता लाना है। कम्‍युनिस्‍ट कहते हैं-‘मनुष्‍य एक आर्थिक प्राणी है। उसकी आकांक्षाएं और चेष्‍टाएं आर्थिक तथ्‍यों से बंधी हुई है।‘ ये लोग वर्ण भेद और जाति भेद मिटाकर सामाजिक समता पर ही सारी शक्ति लगा देते हैं। इनके मत में धार्मिक और सामाजिक सुधार भ्रम-मात्र है। साम्‍पत्तिक शक्ति ही एकमात्र शक्ति है, इस बात को मानव समाज का अध्‍ययन करनेवाला कोई भी मनुष्‍य स्‍वीकार नहीं करेगा।
साधु-संतों का सर्वसाधारण पर जो शासन होता है, वह इस विचार का अपवाद है। भारत के करोड़ों लोग लंगोटधारी संपत्तिहीन साधु-संतों की आज्ञा मानते हैं और अपना अंगूठी-छल्‍ला बेचकर काशी, मक्‍का आदि तीर्थों के दर्शनों को जाते हैं। ऐसा क्‍यों होता है। भारत का इतिहास बताता है कि धर्म एक बड़ी शक्ति है। भारत में पुरोहितों का शासन मजिस्‍ट्रेट से भी बढ़कर है। यहां काउंसिलों के चुनाव और हड़तालों को भी आसानी से धार्मिक रंगत मिल जाती है। भारत ही नहीं, यूरोप के इतिहास में भी धर्म की प्रबलता पाई जाती है। रोम के प्रजातंत्री शासन काल में एक काउंसिल (प्रतिनिधि) दूसरे काउंसिल के काम को रद्द कर देता था। वहां प्‍लोवियनों और पेट्रीशियनों का संघर्ष था। रोम की जनता का यह धार्मिक विश्‍वास था कि कोई भी अफसर वहां किसी पद को ग्रहण नहीं कर सकता, जब तक डेल्‍फी देवी की देववाणी उसे स्‍वीकार न करे। डेल्‍फा देवी के पुरोहित पेट्रीशियन थे, इसलिए जब कभी प्‍लेवियन ऐस व्‍यक्ति को अपना नेता चुनते, जो पेट्रीशियनों के विरूद्ध पार्टीमैन होता, तो देववाणी सदा विघोषित कर देती कि डेल्‍फी देवी उसे स्‍वीकार नहीं करतीं। इस कारण प्‍लेवियनों को अपने में कभी ऐसा प्रतिनिधि न मिल सका, जो पेट्रोशियनों का मुकाबला करता। प्‍लेवियन लोग इस ठगी को इसलिए स्‍वीकार कर लेते, क्‍योंकि उनका अपना भी विश्‍वास था कि देवी की स्‍वीकृति आवश्‍यक है, केवल जनता द्वारा चुना जान ही पर्याप्‍त नहीं है। धार्मिक विश्‍वास छोड़ने के बदले प्‍लेवियनों ने अपना लौकिक नाम छोड़ दिया। क्‍या इससे यह सिद्ध नहीं होता कि प्‍लेवियन संपत्ति की अपेक्षा धर्म को अधिक महत्‍व देते थे।
धर्म, सामाजिक स्थिति और संपत्ति, ये तीनों प्रभुता के स्रोत हैं। आज के यूरोपीय समाज में संपत्ति की प्रमुखता है, किंतु भारत में धर्म और सामाजिक व्‍यवस्‍था का सुधार किए बिना आप आर्थिक सुधार नहीं कर सकते। क्‍या भारत का सर्वहारा वर्ग ऐसी क्रांति लाने के लिए इकट्ठा हो जाएगा। इसके लिए उसे प्रेरणा तभी मिल सकती है जब उसे विश्‍वास हो जाए कि जिनके साथ वह काम कर रहा है, वे समता, बंधुता और न्‍याय के लिए ही संघर्ष कर रहे हैं तथा क्रांति के बाद वर्ण, जाति और धर्म का कोई भेद न रहेगा। कम्‍युनिस्‍टों का केवल यह कहना काफी नहीं है कि ‘मैं जादि भेद को नहीं मानता।‘ भारत में जहां साधारण जनता धनी और निर्धन, ब्राह्मण और शूद्र एवं ऊंच-नीच के भेद को मानती है और इसे पूर्व जन्‍म के कर्मों का फल, विधाता का विधान अथवा तकदीर समझती है, वहां केवल धनवानों के विरुद्ध कैसे इकट्ठी हो सकती है। और यदि नहीं इकट्ठी हो सकती, तो ऐसी आर्थिक क्रांति का होना ही असंभव है। यदि किसी कारण ऐसी क्रांति हो भी गई, तो ब्राह्मण-शूद्र, ऊंच-नीच और वर्ण जाति के भेद-भाव को उत्‍पन्‍न करनेवाले पक्षपातों से युद्ध किए बिना मार्क्‍सवादी शासन वहां चल सकना संभव नहीं। आप किसी भी ओर मुंह कीजिए वर्ण भेद और जाति भेद एक ऐसा राक्षस है जो सब ओर से आपका मार्ग रोके हुए है। जब तक आप इस राक्षस को वध नहीं करते, आप न यहां राजनैतिक सुधार कर सकते हैं और न आर्थिक सुधार।
क्‍या चातुर्वर्ण श्रम का विभाजन है
कुछ लोग कहा करते हैं कि चातुर्वर्ण व्‍यवस्‍था श्रम का विभाजन है। परंतु वह बात निराधर है। वस्‍तुत: चातुर्वर्ण व्‍यवस्‍था का आधार भोगेश्‍वर्य की सुलभता, समाज पर प्रभुता और श्रेष्‍ठता, श्रम से बचना, आराम और लौकिक सुविधा का स्‍वार्थ है। यही कारण है कि इसे राष्‍ट्रीयता विघातक समझते हुए भी सवर्ण हिंदू नेता इसका विध्‍वंस सहन नहीं कर पाते। धनी और निर्धन की विषमता मिटाकर सापेक्षिक समता लाने का राग अलापनेवाला सोशलिस्‍ट हिंदू भी यहां चातुर्वर्णी मर्यादा की रक्षा के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाता देखा जाता है। सवर्ण हिंदू को मानो जन्‍म में ऊंचाई का पट्टा मिला हुआ है, जिसके भोग में यह ऐसा प्रसक्‍त है कि वह शूद्रों के अभाव-ग्रसित कष्‍टमय जीवन का अनुभव ही नहीं कर सकता। एक अहीर या चमार-मजदूर ब्राह्मण-मजदूर के शाप से डर कर उसका पूजन करता एवं उसकी गाली, डींगें और बदतमीजी बर्दाश्‍त करता है। ब्राह्मण और भंगी के बीच परंपरागत धार्मिक कुसंस्‍कारों के कारण कल्पित उच्‍चता और पवित्रता की दीवार खड़ी है। खेद है, भारत में आज तक जितने सुधारक हुए, वे सब भी सवर्ण हिंदुओं में ही पैदा हुए। यही कारण है कि वर्ण व्‍यवस्‍था द्वारा होनेवाली घोर हानि की वे अनुभूति नहीं कर सके।
वर्ण व्‍यवस्‍था और जाति भेद वस्‍तुत: श्रम का नहीं, श्रमिकों का विभाजन है। यही कारण है कि यहां नीचे गिराई गई जाति का मनुष्‍य ऊपरवाली जाति का पेशा नहीं कर सकता। यहां भंगी हलवाई का काम नहीं कर सकता, परचूनी नहीं कर सकता, चाय और पान की दुकान नहीं रख सकता। पुरोहित नहीं बन सकता। ऐसा कोई सामाजिक कार्य नहीं, जिसमें भंगी से ब्राह्मण तक समान भाव से लग सकें। हिंदुओं को एकता या एक-राष्‍ट्रीयता के सूत्र में बांधनेवाली एक भी बात नहीं, सब अपने को अलग-अलग अनुभव करते हैं। हिंदू का जन्‍म से मरण पर्यंत सारा जीवन अपने वर्ण और जाति की तंग चहारदीवारी के भीतर ही सीमित रहता है। एक जाति और एक वर्ण का मनुष्‍य दूसरी जाति और दूसरे वर्ण से घृणा और द्वेष रखता है। यहां तक कि लोगों ने एक-दूसरे की जाति के विरुद्ध निंदा और घृणापूर्ण कहावतें बना रखी हैं। जैसे कि –
बनिया, बंदर, अग्नि, जल, कुटी, कटक, कलार।
ये दशों अपने नहीं, सूची सुधा सुनार।
बनिया किसका यार, उसको दुश्‍मन क्‍या दरकार।
अहिर मिताई तब करै जब सबै मीत मर जाएं।
पसिया मीत बबुर की छाहीं, छिन मां आपन छिन मां नाहीं।
जहां चार अहिर तहां बात गहिर, जहां चार कोरी तहां बात मोरी।
जाट मरा तब जानिए जब तेरहवीं होय।
यह कायथ की खोपड़ी मरे पै धोखा देय।
करिया बाम्‍हन गोर चमार, इनके साथ न उतरे पार।
ठाकुर मानें कहे-सुने ते, बाम्‍हन मानै खाये।
कागज मानें लिहे-दिहे ते, सूद जाति लतियाये।
बाम्‍हन कुत्ता हाथी, नहीं किसी के साथी।
खत्री-पुत्रं कभी न मित्रं, जब मित्रं तब दगिमदगा।
गगरी दाना, सूद बताना।
ढोल, गंवार, सूद्र, पशु, नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी।
इस दुनिया में तीन कसाई, खटमल पिस्‍सू, बाम्‍हन भाई।
जे वर्णाधम तेलि कुम्‍हारा, स्‍वपच किरात कौल कलवारा।
अंग्रेजों के पूर्वज भी ‘वार ऑफ रोजेज’ और क्रामवेल के युद्ध में एक-दूसरे के विरुद्ध लड़े थे, परंतु उनके वंशजों में अब किसी प्रकार का बैर भाव नहीं है। इसके विरुद्ध भारत का ब्राह्मणेतर आज भी ब्राह्मणों को किसी प्रकार क्षमा करने को तैयार नहीं, क्‍योंकि उनके पूर्वजों ने शिवाजी का अपमान किया था-तेली, कुम्‍हार, कलवार, कायस्‍थ और अहीर को वर्णाधम, शूद्र और अधरूप लिखा। इन अनुलोम-प्रतिलोम वर्ण भेद और जाति भेद ने हिंदू समाज को पारस्‍परिक कलह, घृणा और भिन्‍नता के भावों से ऐसा जर्जरित बना रखा है कि हिंदू एक जाति या एक राष्‍ट्र के रूप में संगठित नहीं हो सकते।
आर्य समाज की वर्ण व्‍यवस्‍था
आर्य समाज ने वर्ण व्‍यवस्‍था को आकर्षक बनाने के लिए यह दावा पेश किया कि वर्ण जन्‍म से नहीं, गुण-कर्म-स्‍वभाव से होता है। वह यह भी कहता है कि भारत की चार हजार जातियों और उपजातियों को गलाकर चार वर्णों में ढाल देना चाहिए। ये दोनों बोतें सम्‍भव नहीं हैं। पहली यह है कि यदि व्‍यक्ति को गुणों के अनुसार समाज में आदर मिलता है, तो फिर चार वर्णों का आग्रह कैसा। ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्‍य-शूद्र नाम के गंदे लेबलों की आवश्‍यकता क्‍यों। वर्णों का लेबुल न लगाने से क्‍या समाज में सम्‍मान नहीं मिल सकता। दूसरा यह कि गुण क्‍या चार ही हैं। यदि चार ही हैं, तो यदि एक ही व्‍यक्ति में ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्‍य-शूद्र चारों के गुणों का विकास हो, तो वह किस वर्ण में रहेगा। फिर, ऊंचे वर्ण में जनमे व्‍यक्ति को क्‍या गुण-कर्म के अनुसार नीचे वर्ण में जनमे व्‍यक्ति को गुण-कर्म के अनुसार ऊंचे वर्ण का माना जाने के लिए क्‍या समाज को मजबूर किया जा सकेगा। अत: चार हजार जातियों को चार वर्णों में ढालना असंभव-सा है। फिर गुणों के अनुसार चार वर्णों का विभाग करने के लिए क्‍या म्‍युनिसिपैलिटी और काउंसिलों के इलेक्‍शन की तरह वर्णों का इलेक्‍शन हुआ करेगा अथावा परीक्षाएं लेकर यूनिवर्सिटी से वर्णों का सर्टिफिकेट बंटा करेगा।
इसके सिवाय समाज में आधी आबादी स्त्रियों की है। क्‍या आज भी समस्‍त नारी जाति को ‘शूद्रा’ बनाकर रखा जा सकता है। यदि नहीं, तो क्‍या चातुर्वर्ण के अनुसार कुछ स्त्रियां पुरोहित बनेंगी, कुछ सिपाही का काम करेंगी और कुछ सेठ बनकर व्‍यापारी का काम करेंगी। इतिहास-प्रसिद्ध प्‍लेटों ने भी गुणों के अनुसार विचारक, शूर और बणिक व श्रमिक-तीन श्रेणियों मे समाज को बांटने की व्‍यवस्‍था की थी, किंतु उसकी व्‍याख्‍या भंग हो गई। यह सिद्ध हो गया कि किन्‍हीं दो मनुष्‍यों को भी सदा एक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, क्‍योंकि गुण और स्‍वभाव परिवर्तनशील होते हैं। अतएव आर्य समाजी कल्‍पना से उद्भूत गुणों के अनुसार चातुर्वर्ण व्‍यवस्‍था हानिकर और अस्‍वाभाविक ही नहीं, वरन मूखर्तापूर्ण और असम्‍भव भी है।
वस्‍तुत: चातुर्वर्णी व्‍यवस्‍था चाहे गुण-कर्म के अनुसार हो, चाहे जन्‍म के आधार पर, दोनों रूपों में अस्‍वाभाविक है। स्‍वतंत्र मानव समाज को चार वर्णों में केवल कठोर कानून और राज-दंड के भय से ही ठूंसा जा सकता है, जैसा कि चातुर्वर्ण के रक्षक राम ने शूद्र हो कर तप करने के कारण शंबूक का शिरच्‍छेदन कर दिया। आज बीसवीं शताब्‍दी के स्‍वछन्‍द मानव समाज को मनुस्‍मृति की अंधकारयुगीन दण्‍डनाओं से अनुशासित नहीं किया जा सकता।
वर्ण व्‍यवस्‍था असाध्‍य और हानिकारक
चातुर्वर्ण व्‍यवस्‍था मानव समाज के लिए असाध्‍य ही नहीं, हानिकर भी है। इसका अर्थ है, कुछ इने-गिने मनुष्‍यों के प्रभुत्‍व के लिए बहुत-से लोगों को सर्वहारा बना दिया जाए। थोड़े-से लोगों के जीवन के विकास और प्रकाश के लिए बहुत-से लोगों को प्रवंचित, नि:सत्‍व और अंधकारमय बना दिया जाए। भारत में यही हुआ। इस राक्षसी व्‍यवस्‍था ने यहां के बहुसंख्‍यक लोगों को निर्जीव और पंगु बना दिया। यही कारण है कि दूसरे समुन्‍नत देशों की तरह यहां कभी सा‍माजिक क्रांति नहीं हुई। यहां का खेतिहर हल के सिवाय तलवार नहीं चला सकता था। जनता के पास संगीनें न थीं। क्रांति के द्वारा दासता से मुक्‍त होने का कोई साधन न था। उसे समझाया गया था कि परमेश्‍वर ने ही तुम्‍हारे भाग्‍य में दासता लिखी है। इसके फलस्‍वरूप शूद्र बनाई गई जनता घोर दासता का दु:ख भोगती थी। भारतीय इतिहास में केवल मौर्य साम्राज्‍य का काल ही वह काल था, जब चातुर्वर्ण विध्‍वंस हो गया था, शूद्र औश्र दास होश में आ गए थे और देश के शासक बन गए थे।
महाभारत और पुराण ब्राह्मण-क्षत्रियों के संघर्ष से पूर्ण हैं। कभी ब्राह्मण क्षत्रियों का विनाश करते पाए जाते हैं और कभी क्षत्रिय ब्राह्मणों का। यदि क्षत्रिय और ब्राह्मण गली में मिल जाएं तो कौन किसको पहले प्रणाम करे या रास्‍ता छोड़ दे, ऐसी छोटी बातों पर भी लड़ पड़ते थे। क्षत्रिय और ब्राह्मण एक-दूसरे की आंख के कांटा थे। भागवत में स्‍पष्‍ट लिखा है कि कृष्‍ण का अवतार क्षत्रियों का विनाश करने के लिए हुआ था और ब्रह्म-हत्‍या निवारण के लिए ही राम को अश्‍वमेघ यज्ञ करना पड़ा था। इन सब बातों से सिद्ध हो जाता है कि चातुर्वर्ण व्‍यवस्‍था आदर्श रूप में कभी सफल नहीं हुई।
स्‍वेच्‍छा से व्‍यवसाय न चुन सकने का परिणाम यह होता है कि लोगों को अपने पैतृक कामों से अरुचि उत्‍पन्‍न हो जाती है। इस अरुचि का कारण व्‍यवसायों पर लगा हुआ कलंक तथा इसे करनेवालों के प्रति ऊंच-नीच की सामाजिक भावनाएं होती हैं। इस सबका परिणाम यह होता है कि उस व्‍यवसाय की उन्‍नति नहीं होती।
वर्ण भेद और प्रजनन विज्ञान
वर्ण भेद के हिमायती कुछ लोग इसे रक्‍त की पवित्रता और वंश की विशुद्धि कायम रखने का साधन कहते हैं, किंतु डॉ. भंडारकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्‍तक ‘फॉरेन एलिमेन्‍ट्स इन द हिंदू पॉपुलेशन’ (हिंदू लोगों में विदेशी तत्‍व) पुस्‍तक में तर्क और प्रमाणों ने सिद्ध कर दिया है कि भारत में ऐसी कोई श्रेणी नहीं जिसमें विजातीय अंश न हो। लड़ाकू राजपूत और मराठों में ही नहीं, ब्राह्मणों में भी शुद्ध रक्‍त नहीं है। वर्ण भेद वस्‍तुत: विभिन्‍न जातियों के रक्‍त और संस्‍कृति-सम्मिश्रण के बहुत पीछे बना। पंजाब और मद्रास के ब्राह्मणों अथवा बंगाल और मद्रास के अस्‍पृश्‍यों में ही एक वंश या एक ही रक्‍त नहीं है। वस्‍तुत: पंजाब के ब्राह्मण और पंजाब के चमार एवं मद्रास के बाह्मण और मद्रास के चमार में रक्‍त और वंश की एकता है। यदि विभिन्‍न वर्णों के लोगों में वर्णांतर विवाह होने दिया जाए, तो इससे हानि की अपेक्षा लाभ ही अधिक होगा। हां, पशु और मनुष्‍य में भेद अवश्‍य है। मनुष्‍य-मनुष्‍य में भेद नहीं है, क्‍योंकि विभिन्‍न वर्णों के विवाहों से संतान पैदा होती है, स्त्रियां बांझ नहीं हो जातीं। थोड़ी देर के लिए यदि मान लिया जाए कि रक्‍त सम्मिश्रण की रूकावट सुप्रजजन या रक्‍त शुद्धि की दृष्टि से है, तो विभिन्‍न वर्णों के पारस्‍परिक सहयोग की रूकावट का उद्देश्‍य क्‍या है।
वर्ण भेद यदि सुप्रजनन शास्‍त्र के मौलिक सिद्धांतों के अनुसार होता, तो इस पर अधिक आपत्तियां न होतीं, क्‍योंकि जब उसका उद्देश्‍य उत्तम संतान उत्‍पन्‍न कर नस्‍ल का सुधार करना होता। परंतु ऐसा पाया नहीं जाता। वृक्ष अपने फल से पहचाना जाता है। वर्ण भेद ने ऐसी नस्‍ल पैदा की जिसका न लंबा कद है, न बलिष्‍ठ शरीर। शारीरिक दृष्टि से हिंदू ठिगने और बौने लोगों की जाति है। एक ऐसी नस्‍ल, जिसका दसवां भाग सैनिक सेवा के अयोग्‍य है। ऐसी दशा में यह स्‍वीकार नहीं किया जा सकता कि वर्ण व्‍यवस्‍था का आधार वैज्ञानिक सुप्रजजन शास्‍त्र है। यह तो एक ऐसी सामाजिक पद्धति‍ है जिसमें इसके व्‍यवस्‍थापकों का घमंड और स्‍वार्थ भरा है। इन्‍हें ऐसी शक्ति प्राप्‍त हो गई थी, जिससे ये ऐसा गर्हित व्‍यवस्‍था अपने से छोटों पर लाद सकें। इसने हिंदुओं को पूर्णत: असंगठित और नीति-भ्रष्‍ट बना दिया है।

आदिवासी और जातिभेद
देश में आदिवासियों की एक खासी संख्‍या है, जो मानव समाज से अलग असभ्‍य जंगली हालत में पाए जाते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी हैं जो विवश हो ‘जरायमपेशा’ हो गए हैं। हिंदू डींगे मारते हैं कि उनके वेद में सारे विश्‍व को ‘आर्य’ बनाने का आदेश है, तो फिर अपने ही देश में रहनेवाले इन आदिवासियों को उन्‍होंने अब तक सभ्‍य आर्य क्‍यों नहीं बनाया। क्‍या यह शर्म की बात नहीं है।
हिंदुओं ने इन आदिवासी मानवों को सभ्‍य बनाने का प्रयत्‍न क्‍यों नहीं किया, इसका सही उत्तर यह है कि हिंदू वर्ण और जाति के अहंकार से ग्रसित हैं, इसलिए वह इनसे संपर्क स्‍थापित नहीं कर सकता। इन्‍हें सभ्‍य बनाने में उसे इनके बीच बसना, इनसे प्रेम व सहानुभूति पैदा करना एवं इन्‍हें अपनाना पड़ता। यह सब उनके लिए संभव न था, क्‍योंकि ऐसा करने में हिंदू में वर्ण और जाति की पवित्रता नष्‍ट हो जाती। इसलिए वह इनसे दूर रहा। हिंदुओं को यह कल्‍पना नहीं हुई कि यदि अहिंदुओं ने इन जातियों को सुधार कर इन्‍हें अपने धर्म का साझीदार बना लिया, तो ये बहुसंख्‍यक आदिवासी उनके शत्रुओं की संख्‍या बढ़ा देंगे और तब हिंदुओं को अपने जाति भेद और वर्णभेद को ही धन्‍यवाद देना पड़ेगा।
केवल यही नहीं कि हिंदुओं ने इन जंगलियों को सभ्‍य बनाने का यत्‍न नहीं किया, ऊंचे वर्णवाले हिंदुओं ने अपने से नीचे वर्णवालों के सांस्‍कृतिक विकास को रोका है। महाराष्‍ट्र के सुनारों और पठारे प्रभुओं के साथ बलपूर्वक ऐसा किया गया। बेचारे सुनारों को शौक हुआ कि वे भी ब्राह्मणों की तरह चुनी धोती और त्रिपुंड धारण कर परस्‍पर ‘नमस्‍कार’ किया करें, तो उन्‍हें पेशवाओं ने दबाव डाल कर ऐसा करने से रोक दिया और पठारे प्रभु जब ब्राह्मणों की नकल कर विधवाओं को बिठलाने लगे(क्‍योंकि विधवा विवाह अनार्य प्रथा है, आर्य हिंदुओं में विधवा विवाह नहीं होता), तो कानूनन रोका गया।
हिंदू लोग मुसलमानों और ईसाइयों की हमेशा निंदा किया करते हैं, किंतु ये दोनों धर्म मानवता के अधिक निकट पाए जाते हैं। ये गिरे हुओं को उठाते और ज्ञान का प्रकाश फैलाकर लोगों की लोगों की उन्‍नति का मार्ग खोलते हैं, जबकि हिंदुओं का जातीय राग-द्वेष दुर्बलों को सदा अज्ञानांधकार में रखकर उन्‍हें दासता का सबक सिखाने और उन्‍हें दलित व पीडि़त, प्रवंचित या शोषित करने में ही अपना परम पुरूषार्थ समझता है।
शुद्धि और संगठन
ईसाई मिशनरियों की देखा-देखी हिंदुओं में भी विधर्मियों की शुद्धि करके संख्‍या बढ़ाने का शौक पैदा हुआ। उन्‍होंने यह नहीं सोचा कि हिंदू धर्म मिशनरी(प्रचारक) धर्म नहीं है, अत: शुद्धि आंदोलन एक मूर्खता और व्‍यर्थ चेष्‍टा सिद्ध होगा।
वस्‍तुत: हिंदू समाज वर्णों और उपवर्णों (जातियों) का संग्रह मात्र होने से प्रत्‍येक वर्ण एक ऐसा संगठित संघ है, जिसमें बाहर से भीतर आने का द्वार बंद है। हिंदू संस्‍कृति के अनुसार किसी जाति विशेष में जन्‍म लेनेवाला ही उस जाति का सदस्‍य माना जा सकता है। किंतु जब कोई व्‍यक्ति किसी दूसरे धर्म में जाता है, तो उसके सामने केवल सिद्धांतों और दर्शनों को ही दिमाग में ठूंस लेने का प्रश्‍न नहीं होता, वह यह भी देखता है कि उस समाज में प्रवेश करने पर उसका स्‍थान क्‍या होगा, वह कहां रखा जाएगा, किस बिरादरी में उसे जगह मिलेगी, किन लोगों में उसके बच्‍चों के ब्‍याह होंगे, इत्‍यादि। हिंदुओं का जाति भेद इन प्रश्‍नों का उत्तर देने में विमूड़ है।
जिन कारणों से शुद्धि संभव नहीं है, प्राय: उन्‍हीं कारणों से संगठन भी असंभव है। जातिवाद होने से हिंदू शारीरिक शक्ति रखते हुए भी भीरु, कायर, दब्‍बू और अकेला है। उसे विश्‍वास नहीं है कि संकट पड़ने पर दूसरी जाति का हिंदू उसकी सहायता करेगा। मुसलमानों और सिखों की तरह वह किसी संकटग्रस्‍त को अपने घर में छिपाकर रोटी नहीं खिला सकता, न विभिन्‍न जातियों के हिंदू एक परिवार की तरह संगठित होकर एक घर में रह सकते हैं। यही कारणा है कि जब एक हिंदू पिटता या लुटता है, तो दूसरा उसे बचाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालने की हिम्‍मत नहीं करता। किसी हिंदू लड़की का अपहरण हो जाने पर हिंदू उसे वापस लाने में इसलिए उदासीन रहता है‍ कि उसकी शादी कहां करेगा। बिरादरी में तो उसे कोई अच्‍छा घर-वर मिलेगा नहीं।
वर्ण भेद और जाति भेद से ग्रस्‍त होने के कारण हिंदू समझता है कि भाग्‍य ने उसे अकेला पैदा किया है। हिंदू के रहन-सहन, खान-पान और पूजा-उपासना में कोई ऐसी बात नहीं है, जो उसे मुसलमानों और सिखों की तरह एकनिष्‍ठ करके परस्‍पर सहानुभूति उत्‍पन्‍न करे, न ऐसा कोई सामाजिक बंधन है जिससे एक हिंदू दूसरे हिंदू को अपना भाई समझे। इसीलिए हिंदू संगठित भी नहीं हो पाता।
जाति भेद और सदाचार
वर्णवाद और जातिवाद ने इस देश में मानवी सदाचार का भी संहार कर दिया है, जो अत्‍यंत खेदजनक है। मानवीय सदाचार का अर्थ है सार्वजनिक सद्गुण और सार्वजनिक सदाचार। मनुष्‍यों के केवल दो विभाग किए जा सकते हैं: अच्‍छे और बुरे, ज्ञानी और अज्ञानी, धर्मात्‍मा और धर्महीन, विद्वान और मूर्ख। किंतु वर्ण और जाति की भावना ने हिंदुओं की दृष्टि को ऐसा संकुचित बना दिया है कि अन्‍य मनुष्‍य कितना ही सद्गुणी और सदाचारी क्‍यों न हो, यदि वह किसी वर्ण-विशेष या जाति-विशेष का व्‍यक्ति नहीं है, तो उसकी कोई सुनेगा ही नहीं। एक ब्राह्मण किसी अब्राह्मण को अपना नेता और गुरु नहीं मानेगा। इसी तरह कायस्‍थ कायस्‍थ को और बनिया बनिए को ही अपना नेता मानेगा। वर्ण और जाति का विचार छोड़कर मनुष्‍यों के सद्गुणों की कद्र वह तभी करेगा, जब वह व्‍यक्ति उसका जाति-भाई हो। वहां मानवीय सदाचार ‘कबायली सदाचार’ बन गया है। सद्गुण और सदाचार की प्रधानता नहीं है, वर्ण और जाति की प्रधानता है। (महात्‍मा गांधी भी तभी तक ‘राष्‍ट्रपिता’ रहे थे, जब तक आजादी नहीं मिली थी। आजादी मिल जाने पर उनकी एक नहीं चली, और अंत में वह एक ब्राह्मण की गोली का निशाना बन गए।)
मेरा आदर्श समाज
आप पूछ सकते हैं, यदि आप वर्ण और जाति नहीं चाहते, तो आपका आदर्श समाज क्‍या है। मैं कहूंगा, एक ऐसा समाज, जिसमें न्‍याय, बन्‍धुता, समता और स्‍वतंत्रता हो। मैं समझता हूं, किसी भी विचारवान को इससे इन्‍कार न होना चाहिए। बन्‍धुता का अर्थ यह है कि देश में उत्‍पन्‍न सभी व्‍यक्ति परस्‍पर भाई-भाई हैं और सभी का पिता की संपत्ति की भांति देश की संपत्ति पर समान अधिकार है। जीवन के लिए आवश्‍यक भोजन, वसन, औ‍षधि और शिक्षा के लिए सभी बराबर के हकदार हैं। इसी का नाम बन्‍धुता या भाईचारा है। इसका दूसरा नाम है जनतंत्र या लोकतंत्र।
‘समता’ शब्‍द पर फ्रांसीसी राज्‍य क्रांति के समय बहुत विवाद हुआ, क्‍योंकि सब मनुष्‍य समान नहीं होते। कोई प्रतिभाशाली है। कोई जड़-बुद्धि, कोई कलाकार है, कोई लंठ, कोई बलिष्‍ठ है, कोई दुर्बल, कोई वीर है, कोई भीरु, कोई पुरुषार्थी है, कोई आलसी, कोई कर्मिष्‍ठ है और कोई आरामतलब, कोई सर्वांग-सुन्‍दर है और कोई कुरूप इत्‍यादि। प्राकृतिक असमानता के कारण व्‍यवहार में भी असमानता न्‍यायसंगत है। किंतु प्रत्‍येक व्‍यक्ति को, उसके अन्‍दर निहित शक्ति के पूर्ण विकास में, समान भाव से प्रोत्‍साहन और सुविधा मिलना आवश्‍यक है। इसमें जाति, वंश, खानदान, पारिवारिक ख्‍याति, सामाजिक संबंध इत्‍यादि बातें बाधक नहीं होनी चाहिए। जनतंत्र में वोट सबके समान होते हैं, वोटों का वर्गीकरण नहीं होता। अत: सबके उन्‍नति के अधिकार और व्‍यवहार में भी समता होना अनिवार्यत: आवश्‍यक है।
स्‍वतंत्रता समय की मांग और युग-धर्म है। जैसे उठने-बैठने, चलने-फिरने, हिलने-डुलने, सोने-जागने की स्‍वतंत्रता सभी को प्राप्‍त है, उसी तरह प्रत्‍येक व्‍यक्ति को अपनी इच्‍छानुसार व्‍यवसाय चुनने और आचरण करने की स्‍वतंत्रता होनी चाहिए। दूसरों की इच्‍छानुसार जीविका अर्जन करने और अपने जीवन का कर्तव्‍य स्थिर करने की विवशता होना तो दासता है। वर्ण विधान अर्थात् कल्पित वर्णों के अनुसार कर्मों की व्‍यवस्‍‍था तो एक वैधानिक ‘दास प्रथा’ मात्र है। खान-पान, रहन-सहन, धर्माचरण, चिंतन-भाषण, लेखन-मुद्रण इत्‍यादि की स्‍वतंत्रता सभी को होनी चाहिए।
इस प्रकार न्‍याय, बन्‍धुता, समता और स्‍वतंत्रता से युक्‍त समाज ही मेरा आदर्श समाज है।भीमराव आंबेडकर
[साभार प्रवक्ता.कॉम]