नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

बुधवार, 20 अप्रैल 2011

इन्दुमती

 

इन्दुमती अपने बूढ़े पिता के साथ विंध्याचल के घने जंगल में रहती थी। जबसे उसके पिता वहाँ पर कुटी बनाकर रहने लगे, तब से वह बराबर उन्हीं के साथ रही; न जंगल के बाहर निकली, न किसी दूसरे का मुँह देख सकी। उसकी अवस्था चार-पाँच वर्ष की थी जबकि उसकी माता का परलोकवास हुआ और जब उसके पिता उसे लेकर वनवासी हुए। जबसे वह समझने योग्य हुई तबसे नाना प्रकार के बनैले पशु-पक्षियों, वृक्षावलियों और गंगा की धारा के अतिरिक्त यह नहीं जानती थी कि संसार वा संसारी सुख क्या है और उसमें कैसे-कैसे विचित्र पदार्थ भरे पड़े हैं। फूलों को बीन-बीन कर माला बनाना, हिरणों के संग कलोल करना, दिन-भर वन-वन घूमना और पक्षियों का गाना सुनना; बस यही उसका काम था। वह यह भी नहीं जानती थी कि मेरे बूढ़े पिता के अतिरिक्त और भी कोई मनुष्य संसार में है।

एक दिन वह नदी में अपनी परछाईं देखकर बड़ी मोहित हुई, पर जब उसने जाना कि यह मेरी परछाईं है, तब बहुत लज्जित हुई, यहाँ तक कि उस दिन से फिर कभी उसने नदी में अपना मुख नहीं निहारा।

 

गरमी की ऋतु-दोपहर का समय-जबकि उसके पिता अपनी कुटी में बैठे हुए गीता की पुस्तक देख रहे थे, वह नदी किनारे पेड़ों की ठंडी छाया में घूमती, फूलों को तोड़-तोड़ नदी में बहाती हुई कुछ दूर निकल गई थी, कि एकाएक चौंककर खड़ी हुई। उसने एक ऐसी वस्तु देखी, जिसका उसे स्वप्न में भी ध्यान न था और जिसके देखने से उसके आश्चर्य का कोई ठिकाना न रहा। उसने क्या देखा कि एक बहुत ही सुंदर बीस-बाईस वर्ष का युवक नदी के किनारे पेड़ की छाया में घास पर पड़ा सो रहा है। इन्दुमती ने आज तक बूढ़े पिता को छोड़ किसी दूसरे मनुष्य की सूरत तक नहीं देखी थी। वह अभी तक यही सोचे हुई थी कि यदि संसार में और भी मनुष्य होंगे तो वे भी मेरे पिता की भाँति ही होंगे और उनकी भी दाढ़ी-मूँछें पकी हुई होंगी। उसने जब अच्छी तरह आँखें फाड़-फाड़कर उस परम सुंदर युवक को देखा तो अपने मन में निश्चय किया कि 'मनुष्य तो ऐसा होता नहीं, हो-न-हो यह कोई देवता होंगे क्योंकि मेरे पिता जब देवताओं की कहानी सुनाते हैं तो उनके ऐसे ही रूप-रंग बतलाते हैं।' यह सोचकर वह मन में कुछ डरी और कुछ दूर हट पेड़ की ओट में खड़ी हो टकटकी बाँध उस युवक को देखने लगी। मारे डर के युवक के पास तक न गई और उसकी सुंदरता से मोहित हो कुटी की ओर भी अपना पैर न बढ़ा सकी। यूँही घंटों बीत गए, पर इन्दुमती को न जान पड़ा कि मैं कितनी देर से खड़ी-खड़ी इसे निहार रही हूँ। बहुत देर पीछे वह अपना जी कड़ा करके वृक्ष की ओट से निकल युवक के आगे बढ़ी। दो ही चार डग चली होगी कि एकाएक युवक की नींद खुल गई और उसने अपने सामने एक परम सुंदरी देवी-मूर्ति को देखा, जिसके देखने से उसके आश्चर्य की सीमा न रही। मन-ही-मन सोचने लगा कि 'इस भयानक घनघोर जंगल में ऐसी मनमोहिनी परम सुंदरी स्त्री कहाँ से आई? ऐसा रूप-रंग तो बड़े-बड़े राजाओं के रनिवास में भी दुर्लभ है, सो इस वन में कहाँ से आया? या तो मैं स्वप्न में स्वर्ग की सैर करता होऊँगा, या किसी देवकन्या या वनदेवी ने मुझे छलने के लिए दर्शन दिया होगा।' यही सब सोच-विचार करता हुआ वह भी पड़ा-पड़ा इन्दुमती की ओर निहारने लगा। दोनों की रह-रहकर आँखें चार हो जातीं, जिससे अचरज के अतिरिक्त और कोई भाव नहीं झलकता था। यूँही परस्पर देखाभाली होते-होते एकाएक इन्दुमती के मन में किसी अपूर्व भाव का उदय हो आया, जिससे वह इतनी लज्जित हुई कि उसकी आँखें नीची और मुख लाल हो गया। वह भागना चाहती थी। चट युवक उठकर उसके सामने खड़ा हो गया और कहने लगा, 'हे सुंदरी, तुम देवकन्या हो या वनदेवी हो? चाहे कोई हो, पर कृपा कर तुमने दर्शन दिया है तो ज़रा-सी दया करो, ठहरो, मेरी बातें सुनो, घबराओ मत। यदि तुम मनुष्य की लड़की हो तो डरो मत। क्षत्री लोग स्त्रियों की रक्षा करने के सिवा बुराई नहीं करते। सुनो, यदि तुम सचमुच वनदेवी हो तो कृपा कर मुझे इस वन से निकलने का सीधा मार्ग बता दो। मैं विपत्ति का मारा तीन दिन से इस वन में भटक रहा हूँ, पर निकलने का मार्ग नहीं पाता। और जो तुम मेरी ही भाँति मनुष्य जाति की हो तो मैं तुम्हारा 'अतिथि हूँ', मुझे केवल आज भर के लिए टिकने की जगह दो। और अधिक मैं कुछ नहीं चाहता।'

युवक की बातें सुनकर इन्दुमती ने मन में सोचा कि 'तो क्या ये देवता नहीं है? हम लोगों ही की भाँति मनुष्य हैं? हो सकता है, क्योंकि जो ये देवता होते तो ऐसी मीठी-मीठी बातें बनाकर अतिथि क्यों बनते। देवताओं को कमी किस बात की है, और वे क्या नहीं जानते जो हमसे वन का मार्ग पूछते। तो यह मनुष्य ही होंगे, पर क्या मनुष्य इतने सुंदर होते और ऐसी मीठी बातें करते हैं? अहा! एक दिन मैं जल में अपनी सुंदरता देखकर ऐसी मोहित हुई थी, किंतु इनकी सुंदरता के आगे तो मेरा रूप-रंग निरा पानी है।' इस तरह सोचते-विचारते उसने अपना सिर ऊँचा किया और देखा कि युवक अपनी बात का उत्तर पाने के लिए सामने एकटक लगा खड़ा है। यह देख वह बहुत ही अधीनताई और मधुर स्वर से बोली कि 'मैं अपने बूढ़े पिता के साथ इस घने जंगल के भीतर एक छोटी-सी कुटी में, जो एक सुहावनी पहाड़ी की चोटी पर बनी हुई है, रहती हूँ, यदि तुम मेरे अतिथि होना चाहते हो तो मेरी कुटी पर चलो, जो कुछ मुझसे बनेगा, कंदमूल, फल-फूल और जल से तुम्हारी सेवा करूँगी। मेरे पिता भी तुम्हें देखकर बहुत प्रसन्न होंगे।' इतना कहकर वह युवक को अपने साथ ले पहाड़ी पगडंडी से होती हुई अपनी कुटी की ओर बढ़ी।

 

उसने जो युवक से कहा था कि 'मेरे पिता भी तुम्हें देखकर बहुत प्रसन्न होंगे' सो केवल अपने स्वभाव के अनुसार ही कहा था, क्योंकि वह यही जानती थी कि ऐसी सुंदर मूर्ति को देख मेरे पिता भी मेरी भाँति आनंदित होंगे, परंतु कुटी के पास पहुँचते ही उसका सब सोचा-विचारा हवा हो गया, उसके सुख का सपना जाता रहा और वह जिस बात को ध्यान में भी नहीं ला सकती थी वही आगे आई। अर्थात वह बूढ़ा अपनी लड़की को पराए पुरुष के साथ आती हुई देखकर मारे क्रोध के आग हो गया और अपनी कुटी से निकल युवक के आगे खड़ा हो यूँ कहने लगा, 'अरे दुष्ट! तू कौन है? क्या तुझे अपने प्राणों का मोह नहीं है जो तू बेधड़क मेरी कन्या से बोला और मेरी कुटी पर चला आया? तू जानता नहीं कि जो मनुष्य मेरी आज्ञा के बिना इस वन में पैर रखता है उसका सिर काटा जाता है? अच्छा, ठहर, अब तुझे भी प्राणदंड दिया जाएगा।' इतना कह वह क्रोध से युवक की ओर घूरने लगा। बिचारी इन्दुमती की विचित्र दशा थी, उसने आज तक अपने पिता की ऐसी भयानक मूर्ति नहीं देखी थी। वह अपने पिता का ऐसा अनूठा क्रोध देख पहले तो डरी, फिर अपने ही लिए युवा बटोही बिचारे का प्राण जाते देख जी कड़ा कर बूढ़े के पैरों पर गिर पड़ी और रो-रो, गिड़गिड़ा-गिड़गिड़ाकर युवक के प्राण की भिक्षा माँगने लगी, और अपने पिता को अच्छी तरह समझा दिया कि, 'इसमें युवक का कोई दोष नहीं है, उसे मैं ही कुटी पर ले आई हूँ। यदि इसमें कोई अपराध हुआ तो उसका दंड मुझे मिलना चाहिए।' कन्या की ऐसी अनोखी विनती सुनकर बुड्ढा कुछ ठंडा हुआ और युवक की ओर देखकर बोला कि 'सुनो जी, इस अज्ञान लड़की की विनती से मैंने तुम्हारा प्राण छोड़ दिया, परंतु तुम यहाँ से जाने न पाओगे। क़ैदी की तरह जन्म-भर तुम्हें यहाँ रहकर हमारी ग़ुलामी करनी पड़ेगी, और जो भागने का मंसूबा बाँधोगे तो तुरंत मारे जाओगे।' इतना कहकर ज़ोर से बूढ़े ने सीटी बजाई, जिसकी आवाज़ दूर-दूर तक वन में गूँजने लगी और देखते-देखते बीस-पच्चीस आदमी हट्टे-कट्टे यमदूत की सूरत, हाथ में ढाल-तलवार लिए बुड्ढे के सामने आ खड़े हुए। उन्हें देखकर उसने कहा, 'सुनो वीरो, इस युवक को (अँगुली से दिखाकर) आज से मैंने अपना बँधुवा बनाया है। तुम लोग इस पर ताक लगाए रखना, जिससे यह भागने न पावे और इसकी तलवार ले लो। बस जाओ।' इतना सुनते ही वे सब के सब युवक से तलवार छीन, सिर झुकाकर चले गए पर इस नए तमाशे को देख इन्दुमती के होश-हवास उड़ गए। जबसे उसने होश सँभाला तब से आज तक बुड्ढे को छोड़ किसी दूसरे मनुष्य की सूरत तक नहीं देखी थी, पर आज एकाएक इतने आदमियों को अपने पिता के पास देख वह बहुत ही सकपकाई पर डर के मारे कुछ बोली नहीं। बुड्ढे ने युवक की ओर आँख उठाकर कहा, 'देखों, अब तुम मेरे बँधुवे हुए, अब से जो-जो मैं कहूँगा तुम्हें करना पड़ेगा। उनमें पहिला काम तुम्हें यह दिया जाता है कि तुम इस सूखे पेड़ को (दिखलाकर) काट-काटकर लकड़ी को कुटी के भीतर रखो। ध्यान रखो, यदि ज़रा भी मेरी आज्ञा टाली तो समझ लेना कि तुम्हारे धड़ पर विधाता ने सिर बनाया ही नहीं और इन्दुमती! तू भी कान खोलकर सुनले। इस युवक के साथ यदि किसी तरह की भी बातचीत करेगी तो तेरी भी वही दशा होगी।' इतना कहकर बुड्ढा कुटी के भीतर चला गया और फिर उसी गीता की पुस्तक को ले पढ़ने लगा।

बुड्ढे का विचित्र रंग-ढंग देखकर हमारे युवक के हृदय में कैसे-कैसे भावों की तरंगें उठी होंगी, इसे हम लिखने में असमर्थ हैं। पर हाँ इतना तो उसने अवश्य निश्चय किया होगा कि 'यदि सचमुच यह सुंदरी इस बुड्ढे की लड़की हो तो विधाता ने पत्थर से नवनीत पैदा किया है।'

 

निदान बिचारा युवक अपने भाग्य पर भरोसा रखकर कुल्हाड़ा हाथ में ले पेड़ काटने लगा और इन्दुमती पास ही खड़ी-खड़ी टकटकी लगाए उसे देखने लगी। दो ही चार बार के टाँगा चलाने से युवक के अंग-अंग से पसीने की बूँदें टपकने लगीं और वह इतने ज़ोर से साँस लेने लगा जिससे जान पड़ता था कि यदि यूँही घंटे-दो घंटे यह टाँगा चलावेगा तो अपनी जान से हाथ धो बैठेगा। उसकी ऐसी दशा देखकर इन्दुमती ने उसके लिए फल और जल ला, आँखों में आँसू भरकर कहा, 'सुनो जी, ठहर जाओ, देखो यह फल और जल मैं लाई हूँ, इसे खा लो, ज़रा ठंडे हो लो, फिर काटना, छोड़ो, मान जाओ।' युवक ने उसकी प्रेम भरी बातों को सुन कर कहा, 'सुंदरी, मैं सच कहता हूँ कि तुम्हारा मुँह देखने से मुझे इस परिश्रम का कष्ट ज़रा भी नहीं व्यापता, यदि तुम यूँही मेरे सामने खड़ी रही तो मैं बिना अन्न-जल किए सारे संसार के पेड़ काटकर रख दूँ और सुनो तो सही, अपने पिता की बातें याद करो, क्यों नाहक मेरे लिए अपने प्राण संकट में डालती हो? यदि वे सुन लेंगे तो क्या होगा? और मैं जो सुस्ताने लगूँगा तो लकड़ी कौन काटेगा? जब वे देखेंगे कि पेड़ नहीं कटा तो कैसे उपद्रव करेंगे! इसलिए हे सुशीले! मुझे मेरे भाग्य पर छोड़ दो।'

युवक की ऐसी करुणा-भरी बातें सुनकर इन्दुमती की आँखों से आँसू बहने लगे। उसने बरज़ोरी युवक के हाथ से कुठार ले लिया और कहा, 'भई चाहे कुछ भी हो, पर ज़रा तो ठहर जाओ, मेरे कहने से मेरे लाए हुए फल खाकर ज़रा दम ले लो, तब तक तुम्हारे बदले मैं लकड़ी काटती हूँ।' युवक ने बहुत समझाया पर वह न मानी और अपने सुकुमार हाथों से कुठार उठा कर पेड़ पर मारने लगी। युवक ने जल्दी-जल्दी उसके बहुत कहने से कई एक फल खाकर दो घूँट जल पिया इतने ही में हाथ में नंगी तलवार लिए बुड्ढा कुटी से निकलकर युवक से बोला—

 

'क्यों रे नीच! तेरी इतनी बड़ी सामर्थ्य कि आप तो बैठा-बैठा सुस्ता रहा है और मेरी लड़की से पेड़ कटवाता है? रह, अभी तेरा सिर काटता हूँ।' फिर इन्दुमती की ओर घूमकर बोला, 'क्यों री ढीठ, तैंने मेरे मना करने पर भी इस दुष्ट से बातचीत की! रह जा, तेरा भी वध करता हूँ।'

बुड्ढे की बातें सुन युवक उसके पैरों पर गिर पड़ा और कहने लगा, 'महाशय, इस बिचारी का कोई अपराध नहीं है, इसे छोड़ दीजिए, जो कुछ दंड देना है वह मुझे दीजिए।'

 

इन्दुमती भी उसके पैर पर गिरकर कहने लगी, 'नहीं, नहीं, इसका कोई दोष नहीं है, मैंने बरज़ोरी इससे कुठार ले ली थी, इसलिए हे पिता! अपराधिनी मैं हूँ, मुझे दंड दीजिए, इन्हें छोड़ दीजिए।'

उन दोनों की ऐसी बातें सुनकर बुड्ढे ने कहा, 'अच्छा, आज तो मैं तुम दोनों को छोड़े देता हूँ, पर देखो फिर मेरी बातों का ध्यान न रखोगे तो मारे जाओगे।' इतना कह बूढ़ा कुटी में चला गया और वे दोनों एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। इन्दुमती बोली कि 'घबराओ मत, मेरे रहते तुम्हारा बाल भी बाँका न होगा।' और युवक ने कहा, 'प्यारी, क्यों व्यर्थ मेरे लिए कष्ट सहती हो? जाओ, कुटी में जाओ।' पर इन्दुमती उसके मुँह की ओर उदास हो देखने लगी और वह कुठार उठाकर पेड़ काटने लगा। इतने ही में फिर बाहर आकर बुड्ढा बोला, 'ओ छोकरे! संध्या भई, अब रहने दे। पर देख, कल दिन-भर में जो सारा पेड़ न काट डाला तो देखियो मैं क्या करता हूँ। और सुनती है, री इन्दुमती! इसे कुटी में ले जाकर सड़े-गले फल खाने को और गदला पानी पीने को दे। परंतु सावधान! मुख से एक अक्षर भी न निकलने पावे। और सुन बे लड़के! ख़बरदार, जो इससे कुछ भी बातचीत की तो जीता न छोडूँगा।' यह कहकर बूढा पहाड़ी पगडंडी से गंगा तट की ओर उतरने लगा और उसके जाने पर इन्दुमती मुस्काकर युवा का हाथ थामे हुई कुटी के भीतर गई और वहाँ जाकर उसने पिता की आज्ञा को मेट कर सड़े-गले फल और गदले पानी के बदल अच्छे-अच्छे मीठे फल और सुंदर साफ़ पानी युवक को दिया। और युवक के बहुत आग्रह करने पर दोनों ने साथ फलाहार किया। फिर दोनों बुड्ढे के आने में देर समझ बाहर चाँदनी में एक साथ ही चट्टान पर बैठकर बातें करने लगे।

 

आधी रात जा चुकी थी, वन में चारों ओर भयानक बनैले जंतुओं के गरजने की ध्वनि फेल रही थी। चार आदमी हाथ में तलवार और बरछा लिए कुटी के चारों ओर पहरा दे रहे थे। कुटी से थोड़ी ही दूर पर एक ढालुआँ चोटी पर दस-बारह आदमी बातें कर रहे थे। चलिए पाठक! देखिए ये लोग क्या बातें करते हैं। आहा! यह देखिए! इन्दुमती का पिता एक चटाई पर बैठा है और सामने दस-बारह आदमी हाथ बाँधे ज़मीन पर बैठे हैं। बड़ी देर सन्नाटा रहा, फिर बूढ़े ने कहा—

'सुनो भाइयो! इतने दिनों पीछे परमेश्वर ने हमारा मनोरथ पूरा किया। जो बात एक प्रकार से अनहोनी थी सो आपसे आप हो गई। यह परमेश्वर ने ही किया; नहीं तो बिचारी इन्दुमती का बेड़ा पार कैसे लगता। देखो, जिस युवक की रखवाली के लिए आज तीसरे पहर मैंने तुम लोगों से कहा था, वह अजयगढ़ का राजकुमार, या यूँ कहो कि अब राजा है। इसका नाम चंद्रशेखर है। इसके पिता राजशेखर को उसी बेईमान काफ़िर इब्राहीम लोदी ने दिल्ली में बुला, विश्वासघात कर मार डाला था; तब से यह लड़का इब्राहीम की घात में लगा था। अभी थोड़े दिन हुए जो बाबर से इब्राहीम की लड़ाई हुई है, उसमें चंद्रशेखर ने भेष बदल और इब्राहीम की सेना में घुसकर उसे मार डाला। यह बात कहीं एक सेनापति ने देख ली और उसने चंद्रशेखर का पीछा किया। निदान यह भागा और कई दिन पीछे उसे द्वंद्व युद्ध में मार अपने घोड़े को गँवा, राह भूलकर अपने राज्य की ओर न जाकर इस ओर आया और कल मेरी कन्या का अतिथि बना। आज उसने यह सब ब्योरा जलपान करते-करते इन्दुमती से कहा, जिसे मैंने आड़ में खड़े होकर सब सुना। वे दोनों एक-दूसरे को जी से चाहने लगे हैं। तो इस बात के अतिरिक्त और क्या कहा जाए कि परमेश्वर ही ने इन्दुमती का जोड़ा भेज दिया है और साथ ही उस दयामय ने मेरी भी प्रतिज्ञा पूरी की।' इतना सुनकर सभी ने जय ध्वनि के साथ हर्ष प्रकट किया और बूढ़ा फिर कहने लगा—'मेरी इन्दुमती सोलह वर्ष की हुई, अब उसे कुँआरी रखना किसी तरह उचित नहीं है और ऐसी अवस्था में जबकि मेरी प्रतिज्ञा भी पूरी हुई और इन्दुमती के योग्य सुपात्र वर भी मिला। उसने इन्दुमती से प्रतिज्ञा की है कि 'प्यारी, मैं तुम्हें प्राण से बढ़कर चाहूँगा और दूसरा विवाह भी न करूँगा, जिससे तुम्हें सौत की आग में न जलना पड़े।' भाइयो! देखो स्त्री के लिए इससे बढ़कर कौन बात सुख देनेवाली है! मैंने जो चंद्रशेखर को देखकर इतना क्रोध प्रकट किया था उसका आशय यही था कि यदि दोनों में सच्चा प्रीति का अंकुर जमेगा तो दोनों का ब्याह कर दूँगा, और जो ऐसा न हुआ तो युवक आप डर के मारे भाग जाएगा। परंतु यहाँ तो परमेश्वर को इन्दुमती का भाग्य खोलना था और ऐसा ही हुआ। बस, कल ही मैं दोनों का ब्याह करके हिमालय चला जाऊँगा और तुम लोग वर-कन्या को उनके घर पहुँचाकर अपने-अपने घर जाना। बारह वर्ष तक जो तुम लोगों ने तन-मन-धन से मेरी सेवा की इसका ऋण सदा मेरे सिर पर रहेगा और जगदीश्वर इसके बदले में तुम लोगों के साथ भलाई करेगा।' इतना कहकर बुड्ढा उठ खड़ा हुआ और वे लोग भी उठे। बुड्ढा कुटी की ओर घूमा और वे लोग पहाड़ी के नीचे उतर गए।

 

अहा! प्रेम!! तू धन्य है!!! जिस इन्दुमती ने आज तक देवता की भाँति अपने पिता की सेवा की, और भूलकर भी कभी आज्ञा न टाली, आज वह प्रेम के फंदे में फँसकर उसका उलटा बर्ताव करती है। वृद्ध ने लौटकर क्या देखा कि दोनों कुटी के पिछवाड़े चाँदनी में बैठे बातें कर रहे हैं। यह देख वह प्रसन्न हुआ और कुटी में जाकर सो रहा। पर हमारे दोनों नए प्रेमियों ने बातों ही में रात बिता दी। सवेरा होते ही युवक कुठार ले लकड़ी काटने लगा और इन्दुमती सारा काम छोड़कर खड़ी-खड़ी उसके मुख की ओर देखने लगी। थोड़ी ही देर में युवक के सारे शरीर से पसीना टपकने लगा और चेहरा लाल हो आया। इतने में वृद्ध ने आकर गरजकर कहा, 'ओ लड़के! बस, पेड़ पीछे काटियो, पहिले जो लकड़ियाँ काटी हैं, उन्हें उठाकर कुटी के पिछवाड़े ढेर लगा दे।' इतना कहकर बुड्ढा चला गया और युवक लकड़ी उठा-उठा कर कुटी के पीछे ढेर लगाने लगा। उसका इतना परिश्रम इन्दुमती से न देखा गया और बड़े प्रेम से वह उसका हाथ थामकर बोली, 'प्यारे, ठहरो, बस करो, बाक़ी लकडियाँ मैं रख आती हूँ। हाय, तुम्हारा परिश्रम देखकर मेरी छाती फटी जाती है। प्यारे, तुम राजकुमार होकर आज लकड़ी काटते हो, ठहरो, तुम सुस्ता लो।'

युवक ने मुस्कराकर कहा, 'प्यारी, सावधान, ऐसा भूलकर भी न करना। अपने पिता का क्रोध याद करो। अब की उन्होंने तुम्हें लकड़ी उठाते या हमसे बोलते देख लिया तो सर्वनाश हो जाएगा।'

 

इतना सुनकर इन्दुमती की आँखों में आँसू भर आए। वह बोली, 'प्यारे, मेरे पिता का तो बहुत अच्छा स्वभाव था, सो तुम्हें देखते ही एकदम से ऐसा बदल क्यों गया? वह तो ऐसे नहीं थे, अब उन्हें क्या हो गया? आज तक मैंने उन्हें कभी क्रोध करते नहीं देखा था। ख़ैर, जो होय, पर तुम ठहरो, दम ले लो, तब तक मैं इन लकड़ियों को फेंक देती हूँ।'

युवक ने कहा, 'प्यारी, क्या राक्षस हूँ कि अपनी आँखों के सामने तुम्हें लकड़ी ढोने दूँगा? हटो, ऐसा नहीं होगा। सच जानो तुम्हें देखने से मुझे कुछ भी कष्ट नहीं जान पड़ता।'

 

इन्दुमती ने उदास होकर कहा, 'हाय प्यारे, तुम्हारे दुःख देखकर मेरे हृदय में ऐसी वेदना होती है कि क्या कहूँ, जो तुम इसे जानते तो ऐसा न कहते।'

पीछे लता-मंडप में खड़े-खड़े वृद्ध ने दोनों की बातें सुनकर बड़ा सुख माना, पर अंतिम परीक्षा करने के अभिप्राय में नंगी तलवार ले सामने आ, गरजकर कहा, 'इन्दुमती, कल से आज तक तैंने मेरी सब बातों का उलट बर्ताव किया। फल और जल की बात याद कर, और तू फिर इससे बात करती है? देख अब तेरा सिर काटता हूँ।' कहकर ज्यों ही वह इन्दुमती की ओर बढ़ा कि चट युवक उसके पाँव पकड़कर कहने लगा, 'आप अपने क्रोध को दूर करने के लिए मुझे मारिए, सब दोष मेरा है, मैं दंड के योग्य हूँ। यह सब तरह निरपराधिनी है। मेरा सिर आपके पैरों पर है, काट लीजिए; पर मेरे सामने एक निरपराध लड़की के प्राण न लीजिए।'

 

वृद्ध ज्यों ही अपनी तलवार युवक की गर्दन पर रखना चाहता था कि इन्दुमती पागल की तरह उसके चरणों पर गिर बिलक-बिलककर रोने और कहने लगी- 'पिता, पिता, जो मारना ही है तो पहले मेरा सिर काट लो तो फिर पीछे जो जी में आवे सो करना।'

इतना सुन बुड्ढे ने तलवार दूर फेंक दी और दोनों को उठा गले लगाकर कहा, 'बेटी इन्दुमती! धीरज, धर और प्रिय वत्स! चंद्रशेखर! खेद दूर करो। मैंने केवल तुम दोनों के प्रेम की परीक्षा लेने के लिए सब प्रकार का क्रोध का भाव दिखलाया था। यदि तुम दोनों का सच्चा प्रेम न होता तो क्यों एक-दूसरे के लिए जान पर खेलकर क्षमा चाहते, और सुनो, मैंने छिपकर तुम्हारी सब बातें सुनी हैं। तुमसे बढ़कर संसार में दूसरा कौन राजकुमार है जो इन्दुमती के वर बनने योग्य होगा। सुनो, देवगढ़ मेरे पुरखाओं की राजधानी थी। जबकि इन्दुमती चार वर्ष की थी, पापी इब्राहीम ने मेरे नगर को घेर यह कहलाया कि 'या तो अपनी स्त्री (इन्दुमती की माँ) को भेज दो या जंग करो।' यह सुनकर मेरी आँखों में ख़ून उतर आया और उसके दूत को मैंने निकलवा दिया। फिर क्या पूछना था! सारा नगर यवन हत्यारों के हाथ से श्मशान हो गया। मेरी स्त्री ने आत्महत्या की और मैं उस यवन-कुल-कलंक से बदला लेने की इच्छा से चार वर्ष की अबोध लड़की को ले इस जंगल में आकर रहने लगा। मेरे कृतज्ञ सरदारों में से पचास आदमियों ने सर्वस्व त्यागकर मेरा साथ दिया और आज तक मेरे साथ हैं। उन्हीं लोगों में से कई आदमियों को तुमने कल देखा था। बेटा चंद्रशेखर! बारह वर्ष हो गए पर ऐसी सावधानी से मैंने इस लड़की का लालन-पालन किया और इसे पढ़ाया-लिखाया कि जिसका सुख तुम्हें आप आगे चलकर इसकी सुशीलता से जान पड़ेगा। और देखो, मैंने इसे ऐसे पहरे में रखा कि कल के सिवा और कभी इसने मुझे छोड़कर किसी दूसरे मनुष्य की सूरत न देखी। मैंने राजस्थान के सब राजाओं से सहायता माँगी और यह कहलाया कि जो कोई दुष्ट इब्राहीम का सिर काट लावेगा उसे अपनी लड़की ब्याह दूँगा। पर हा! किसी ने मेरी बात न सुनी और सभी मुझे पागल समझकर हँसने लगे। अंत में मैंने दुःखी होकर प्रतिज्ञा की कि जो कोई इब्राहीम को मारेगा उसीसे इन्दुमती ब्याही जाएगी, नहीं तो यह जन्म भर कुँआरी ही रहेगी। सो परमेश्वर ने तुम्हारे हृदय में बैठकर मेरी प्रतिज्ञा पूरी की। अब इन्दुमती तुम्हारी हुई। और आज मैं बड़े भारी बोझ को उतारकर आजन्म के लिए हलका हो गया।'

 

इतना कह बुड्ढे ने सीटी बजाई और देखते-देखते पचास जवान हथियारों से सजे, घोड़ों पर सवार आ खड़े हुए। उनके साथ एक सजा हुआ घोड़ा चंद्रशेखर के लिए और एक सुंदर पालकी इन्दुमती के लिए थी। उसी समय बुड्ढे ने दोनों का विवाह कर उन वीरों के साथ विदा किया और आप हिमालय की ओर चला गया।

अहा! जो इन्दुमती इतने दिनों तक वन-विहंगिनी थी, वह आज घर के पिंजरे में बंद होने चली। परमेश्वर की महिमा का कौन पार पा सकता है!

 

किशोरीलाल गोस्वामी

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बुधवार, 6 अप्रैल 2011

बीटी बीज फसलों के लिए खतरनाक भी हैं।

सरकार की जो प्रतिबद्धता किसान और खेती से जुड़े स्थानीय संसाधनों के प्रति दिखाई देनी चाहिए वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रति दिखाई दे रही है। इस मानसिकता से उपजे हालात कालांतर में देश की बहुसंख्यक आबादी की आत्मनिर्भरता को परावलंबी बना देंगे। बीते साल फरवरी में जब पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने बीटी बैंगन की खेती के जमीनी प्रयोगों को बंद करते हुए भरोसा जताया था कि जब तक इनके मानव स्वास्थ्य से जुड़े सुरक्षात्मक पहलुओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हो जाती, इनके उत्पादन को मंजूरी नहीं दी जाएगी। इसके बावजूद गोपनीय ढंग से मक्का के संकर बीजों का प्रयोग बिहार में किया गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जब यह पता चला तो उन्होंने सख्त आपत्ति जताते हुए केंद्रीय समिति में राज्य के प्रतिनिधि को भी शामिल करने की पैरवी की। नतीजतन पर्यावरण मंत्रालय ने बिहार में बीटी मक्का के परीक्षण पर रोक लगा दी। लेकिन यहां यह आशंका जरूर उठती है कि ये परीक्षण उन प्रदेशों में जारी होंगे, जहां कांग्रेस और संप्रग के सहयोगी दलों की सरकारें हैं।

गुपचुप जारी इन प्रयोगों से पता चलता है कि अमेरिका परस्त मनमोहन सरकार विदेशी कंपनियों के आगे इतनी दयनीय है कि उसे जनता से किए वादे से मुकरना पड़ रहा है। भारत के कृषि और डेयरी उद्योग पर नियंत्रण करना अमेरिका की पहली प्राथमिकताओं में है। इन बीजों की नाकामी साबित हो जाने के बावजूद इनके प्रयोगों का मकसद है मोंसेंटो, माहिको वालमार्ट और सिंजेटा जैसी कंपनियों के कृषि बीज और कीटनाशकों के व्यापार को भारत में जबरन स्थापित करना। बिहार में मक्का-बीजों की पृष्ठभूमि में मोंसेंटों ही थी। इसके पहले धारवाड़ में बीटी बैंगन के बीजों के प्रयोग के साथ इसकी व्यावसायिक खेती को प्रोत्साहित करने में माहिको का हाथ था। यहां तो ये प्रयोग कुछ भारतीय वैज्ञानिकों को लालच देकर कृषि विश्वविद्यालय, धारवाड़ और तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय कोयंबटूर में चल रहे थे। जीएम बैगन पहली ऐसी सब्जी थी जो भारत में ही नहीं दुनिया में पहली मर्तबा प्रयोग में लाई जाती। इसके बाद एक-एक कर कुल 56 फसलें वर्ण संकर बीजों से उगाई जानी थीं। लेकिन बीटी बैंगन खेती के देश में जबरदस्त विरोध के कारण पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसके प्रयोग व खेती पर प्रतिबंध लगा दिया था।

दरअसल आनुवंशिक बीजों (Genetically modified foods or GM foods) से खेती को बढ़ावा देने के लिए देश के शासन-प्रशासन को मजबूर होना पड़ रहा है। 2008 में जब परमाणु- करार का हो हल्ला संसद और संसद से बाहर चल रहा था तब अमेरिकी परस्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कृषि मंत्री शरद पवार और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश की तिगड़ी ने अमेरिका से एक ऐसा समझौता गुपचुप कर लिया था, जिस पर कतई चर्चा नहीं हुई थी। इसी समझौते के मद्देनजर बीटी बैंगन को बाजार का हिस्सा बनाने के लिए शरद पवार और जयराम रमेश ने आनुवंशिक बीजों को सही ठहराने के लिए देश के कई नगरों में जन-सुनवाई के नजरिये से मुहिम भी चलाई थी। लेकिन जनता और स्वयंसेवी संगठनों की जबरदस्त मुहिम के चलते राजनेताओं को इस जिद से तत्काल पीछे हटना पड़ा था। बीटी बैंगन मसलन संकर बीज ऐसा बीज है, जिसे साधारण बीज में एक खास जीवाणु के जीन को आनुवंशिक अभियांत्रिकी तकनीक से प्रवेश कराकर बीटी बीज तैयार किए जाते हैं। भारतीय वैज्ञानिकों का दावा है कि ये बीज स्थानीय और पारपंरिक फसलों के लिए भी खतरनाक हैं। राष्ट्रीय पोषण संस्थान, हैदराबाद के प्रसिद्ध जीव विज्ञानी रमेश भट्ट ने बीटी बैंगन के हल्ले के समय चेतावनी दी थी कि बीटी बैंगन की खेती शुरू होती है तो इसके प्रभाव से बैंगन की स्थानीय किस्म मट्टूगुल्ला प्रभावित होकर लगभग समाप्त हो जाएगी। [प्रमोद भार्गव]

लाल पान की बेगम

 

‘क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या?’

बिरजू की माँ शकरकंद उबाल कर बैठी मन-ही-मन कुढ़ रही थी अपने आँगन में। सात साल का लड़का बिरजू शकरकंद के बदले तमाचे खा कर आँगन में लोट-पोट कर सारी देह में मिट्टी मल रहा था। चंपिया के सिर भी चुड़ैल मँडरा रही है... आधे-आँगन धूप रहते जो गई है सहुआइन की दुकान छोवा-गुड़ लाने, सो अभी तक नहीं लौटी, दीया-बाती की बेला हो गई। आए आज लौटके ज़रा! बागड़ बकरे की देह में कुकुरमाछी लगी थी, इसलिए बेचारा बागड़ रह-रह कर कूद-फाँद कर रहा था। बिरजू की माँ बागड़ पर मन का ग़ुस्सा उतारने का बहाना ढूँढ़ कर निकाल चुकी थी...पिछवाड़े की मिर्च की फूली गाछ! बागड़ के सिवा और किसने कलेवा किया होगा! बागड़ को मारने के लिए वह मिट्टी का छोटा ढेला उठा चुकी थी, कि पड़ोसिन मखनी फुआ की पुकार सुनाई पड़ी—‘क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या?’

 

‘बिरजू की माँ के आगे नाथ और पीछे पगहिया न हो तब न, फुआ!’

गर्म ग़ुस्से में बुझी नुकीली बात फुआ की देह में धँस गई और बिरजू की माँ ने हाथ के ढेले को पास ही फेंक दिया—‘बेचारे बागड़ को कुकुरमाछी परेशान कर रही है। आ-हा, आय... आय! हर्र-र-र! आय-आय!’

 

बिरजू ने लेटे-ही-लेटे बागड़ को एक डंडा लगा दिया। बिरजू की माँ की इच्छा हुई कि जा कर उसी डंडे से बिरजू का भूत भगा दे, किंतु नीम के पास खड़ी पनभरनियों की खिलखिलाहट सुन कर रुक गई। बोली, ‘ठहर, तेरे बप्पा ने बड़ा हथछुट्टा बना दिया है तुझे! बड़ा हाथ चलता है लोगों पर। ठहर!’

मखनी फुआ नीम के पास झुकी कमर से घड़ा उतार कर पानी भर कर लौटती पनभरनियों में बिरजू की माँ की बहकी हुई बात का इंसाफ़ करा रही थी—‘ज़रा देखो तो इस बिरजू की माँ को! चार मन पाट (जूट) का पैसा क्या हुआ है, धरती पर पाँव ही नहीं पड़ते! निसाफ़ करो! ख़ुद अपने मुँह से आठ दिन पहले से ही गाँव की गली-गली में बोलती फिरी है, ‘हाँ, इस बार बिरजू के बप्पा ने कहा है, बैलगाड़ी पर बिठा कर बलरामपुर का नाच दिखा लाऊँगा। बैल अब अपने घर है, तो हज़ार गाड़ी मँगनी मिल जाएँगी।’ सो मैंने अभी टोक दिया, नाच देखने वाली सब तो औन-पौन कर तैयार हो रही हैं, रसोई-पानी कर रहे हैं। मेरे मुँह में आग लगे, क्यों मैं टोकने गई! सुनती हो, क्या जवाब दिया बिरजू की माँ ने?’

 

मखनी फुआ ने अपने पोपले मुँह के होंठों को एक ओर मोड़ कर ऐठती हुई बोली निकाली—‘अर्-र्रे-हाँ-हाँ! बि-र-र-ज्जू की मै...या के आगे नाथ औ-र्र पीछे पगहिया ना हो, तब ना-आ-आ!’

जंगी की पुतोहू बिरजू की माँ से नहीं डरती। वह ज़रा गला खोल कर ही कहती है, ‘फुआ-आ! सरबे सित्तलर्मिटी (सर्वे सेटलमेंट) के हाकिम के बासा पर फूलछाप किनारी वाली साड़ी पहन के तू भी भंटा की भेंटी चढ़ाती तो तुम्हारे नाम से भी दु-तीन बीघा धनहर ज़मीन का पर्चा कट जाता! फिर तुम्हारे घर भी आज दस मन सोनाबंग पाट होता, जोड़ा बैल ख़रीदता! फिर आगे नाथ और पीछे सैकड़ो पगहिया झूलती!’

 

जंगी की पुतोहू मुँहज़ोर है। रेलवे स्टेशन के पास की लड़की है। तीन ही महीने हुए, गौने की नई बहू हो कर आई है और सारे कुर्मा टोली की सभी झगड़ालू सासों से एकाध मोर्चा ले चुकी है। उसका ससुर जंगी दाग़ी चोर है, सीड़किलासी है। उसका ख़सम रंगी कुर्मा टोली का नामी लठैत। इसीलिए हमेशा सींग घुमाती फिरती है जंगी की पुतोहू!

बिरजू की माँ के आँगन में जंगी की पुतोहू की गला-खोल बोली ग़ुलेल की गोलियों की तरह दनदनाती हुई आई थी। बिरजू की माँ ने एक तीख़ा जवाब खोज कर निकाला, लेकिन मन मसोस कर रह गई।...गोबर की ढेरी में कौन ढेला फेंके!

 

जीभ के झाल को गले में उतार कर बिरजू की माँ ने अपनी बेटी चंपिया को आवाज़ दी—‘अरी चंपिया-या-या, आज लौटे तो तेरी मूड़ी मरोड़ कर चूल्हे में झोंकती हूँ! दिन-दिन बेचाल होती जाती है!...गाँव में तो अब ठेठर-बैसकोप का गीत गाने वाली पतुरिया-पुतोहू सब आने लगी हैं। कहीं बैठके ‘बाजे न मुरलिया’ सीख रही होगी ह-र-जा-ई-ई! अरी चंपिया-या-या!’

जंगी की पुतोहू ने बिरजू की माँ की बोली का स्वाद ले कर कमर पर घड़े को सँभाला और मटक कर बोली, ‘चल दिदिया, चल! इस मुहल्ले में लाल पान की बेगम बसती है! नहीं जानती, दोपहर-दिन और चौपहर-रात बिजली की बत्ती भक्-भक् कर जलती है!’

 

भक्-भक् बिजली-बत्ती की बात सुन कर न जाने क्यों सभी खिलखिला कर हँस पड़ीं। फुआ की टूटी हुई दंत-पंक्तियों के बीच से एक मीठी गाली निकली—‘शैतान की नानी!’

बिरजू की माँ की आँखों पर मानो किसी ने तेज़ टार्च की रौशनी डाल कर चौंधिया दिया।...भक्-भक् बिजली-बत्ती! तीन साल पहले सर्वे कैंप के बाद गाँव की जलन-ढाही औरतों ने एक कहानी गढ़ के फैलाई थी, चंपिया की माँ के आँगन में रात-भर बिजली-बत्ती भुकभुकाती थी! चंपिया की माँ के आँगन में नाकवाले जूते की छाप घोड़े की टाप की तरह।...जलो, जलो! और जलो! चंपिया की माँ के आँगन में चाँदी-जैसे पाट सूखते देख कर जलने वाली सब औरतें खलिहान पर सोनोली धान के बोझों को देख कर बैंगन का भुर्ता हो जाएँगी।

 

मिट्टी के बरतन से टपकते हुए छोवा-गुड़ को उँगलियों से चाटती हुई चंपिया आई और माँ के तमाचे खा कर चीख़ पड़ी—‘मुझे क्यों मारती है-ए-ए-ए! सहुआइन जल्दी से सौदा नहीं देती है-एँ-एँ-एँ-एँ!’

‘सहुआइन जल्दी सौदा नहीं देती की नानी! एक सहुआइन की दुकान पर मोती झरते हैं, जो जड़ गाड़ कर बैठी हुई थी! बोल, गले पर लात दे कर कल्ला तोड़ दूँगी हरजाई, जो फिर कभी ‘बाजे न मुरलिया’ गाते सुना! चाल सीखने जाती है टीशन की छोकरियों से!’

 

बिरजू के माँ ने चुप हो कर अपनी आवाज़ अंदाज़ी कि उसकी बात जंगी के झोंपड़े तक साफ़-साफ़ पहुँच गई होगी।

बिरजू बीती हुई बातों को भूल कर उठ खड़ा हुआ था और धूल झाड़ते हुए बरतन से टपकते गुड़ को ललचाई निगाह से देखने लगा था।...दीदी के साथ वह भी दुकान जाता तो दीदी उसे भी गुड़ चटाती, ज़रुर! वह शकरकंद के लोभ में रहा और माँगने पर माँ ने शकरकंद के बदले... ‘ए मैया, एक अँगुली गुड़ दे दे बिरजू ने तलहथी फैलाई—दे ना मैया, एक रत्ती-भर!’

 

‘एक रत्ती क्यों, उठाके बरतन को फेंक आती हूँ पिछवाड़े में, जाके चाटना! नहीं बनेगी मीठी रोटी! ...मीठी रोटी खाने का मुँह होता है बिरजू की माँ ने उबले शकरकंद का सूप रोती हुई चंपिया के सामने रखते हुए कहा, ‘बैठके छिलके उतार, नहीं तो अभी...!’

दस साल की चंपिया जानती है, शकरकंद छीलते समय कम-से-कम बारह बार माँ उसे बाल पकड़ कर झकझोरेगी, छोटी-छोटी खोट निकाल कर गालियाँ देगी—‘पाँव फैलाके क्यों बैठी है उस तरह, बेलज्जी!’ चंपिया माँ के ग़ुस्से को जानती है।

 

बिरजू ने इस मौक़े पर थोड़ी-सी ख़ुशामद करके देखा—’मैया, मैं भी बैठ कर शकरकंद छीलूँ?’

‘नहीं?’ माँ ने झिड़की दी, ‘एक शकरकंद छीलेगा और तीन पेट में! जाके सिद्धू की बहू से कहो, एक घंटे के लिए कड़ाही माँग कर ले गई तो फिर लौटाने का नाम नहीं। जा जल्दी!’

 

मुँह लटका कर आँगन से निकलते-निकलते बिरजू ने शकरकंद और गुड़ पर निगाहें दौड़ाई। चंपिया ने अपने झबरे केश की ओट से माँ की ओर देखा और नज़र बचा कर चुपके से बिरजू की ओर एक शकरकंद फेंक दिया।...बिरजू भागा।

‘सूरज भगवान डूब गए। दीया-बत्ती की बेला हो गई। अभी तक गाड़ी...

 

‘चंपिया बीच में ही बोल उठी—‘कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी नहीं दी मैया! बप्पा बोले, माँ से कहना सब ठीक-ठाक करके तैयार रहें। मलदहिया टोली के मियाँजान की गाड़ी लाने जा रहा हूँ।’

सुनते ही बिरजू की माँ का चेहरा उतर गया। लगा, छाते की कमानी उतर गई घोड़े से अचानक। कोयरी टोले में किसी ने गाड़ी मँगनी नहीं दी! तब मिल चुकी गाड़ी! जब अपने गाँव के लोगों की आँख में पानी नहीं तो मलदहिया टोली के मियाँजान की गाड़ी का क्या भरोसा! न तीन में न तेरह में! क्या होगा शकरकंद छील कर! रख दे उठा के!...यह मर्द नाच दिखाएगा। बैलगाड़ी पर चढ़ कर नाच दिखाने ले जाएगा! चढ़ चुकी बैलगाड़ी पर, देख चुकी जी-भर नाच... पैदल जाने वाली सब पहुँच कर पुरानी हो चुकी होंगी।

 

बिरजू छोटी कड़ाही सिर पर औंधा कर वापस आया—‘देख दिदिया, मलेटरी टोपी! इस पर दस लाठी मारने पर भी कुछ नहीं होता।’

चंपिया चुपचाप बैठी रही, कुछ बोली नहीं, ज़रा-सी मुस्कराई भी नहीं। बिरजू ने समझ लिया, मैया का ग़ुस्सा अभी उतरा नहीं है पूरे तौर से।

 

मढ़ैया के अंदर से बागड़ को बाहर भगाती हुई बिरजू की माँ बड़बड़ाई—‘कल ही पँचकौड़ी क़साई के हवाले करती हूँ राकस तुझे! हर चीज़ में मुँह लगाएगा। चंपिया, बाँध दे बागड़ को। खोल दे गले की घंटी! हमेशा टुनुर-टुनुर! मुझे ज़रा नहीं सुहाता है!’

‘टुनुर-टुनुर’ सुनते ही बिरजू को सड़क से जाती हुई बैलगाड़ियों की याद हो आई—‘अभी बबुआन टोले की गाड़ियाँ नाच देखने जा रही थीं... झुनुर-झुनुर बैलों की झुमकी, तुमने सु...’

 

‘बेसी बक-बक मत करो!’ बागड़ के गले से झुमकी खोलती बोली चंपिया।

‘चंपिया, डाल दे चूल्हे में पानी! बप्पा आवे तो कहना कि अपने उड़नजहाज़ पर चढ़ कर नाच देख आएँ! मुझे नाच देखने का सौख नहीं!...मुझे जगाइयो मत कोई! मेरा माथा दुख रहा है।’

 

मढ़ैया के ओसारे पर बिरजू ने फिसफिसा के पूछा, ‘क्यों दिदिया, नाच में उड़नजहाज़ भी उड़ेगा?’

चटाई पर कथरी ओढ़ कर बैठती हुई चंपिया ने बिरजू को चुपचाप अपने पास बैठने का इशारा किया, मुफ़्त में मार खाएगा बेचारा!

 

बिरजू ने बहन की कथरी में हिस्सा बाँटते हुए चुक्की-मुक्की लगाई। जाड़े के समय इस तरह घुटने पर ठुड्डी रख कर चुक्की-मिक्की लगाना सीख चुका है वह। उसने चंपिया के कान के पास मुँह ले जा कर कहा, ‘हम लोग नाच देखने नहीं जाएँगे?...गाँव में एक पंछी भी नहीं है। सब चले गए।’

चंपिया को तिल-भर भी भरोसा नहीं। संझा तारा डूब रहा है। बप्पा अभी तक गाड़ी ले कर नहीं लौटे। एक महीना पहले से ही मैया कहती थी, बलरामपुर के नाच के दिन मीठी रोटी बनेगी, चंपिया छींट की साड़ी पहनेगी, बिरजू पैंट पहनेगा, बैलगाड़ी पर चढ़ कर...

 

चंपिया की भीगी पलकों पर एक बूँद आँसू आ गया।

बिरजू का भी दिल भर आया। उसने मन-ही-मन में इमली पर रहने वाले जिनबाबा को एक बैंगन कबूला, गाछ का सबसे पहला बैंगन, उसने ख़ुद जिस पौधे को रोपा है!...जल्दी से गाड़ी ले कर बप्पा को भेज दो, जिनबाबा!

 

मढ़ैया के अंदर बिरजू की माँ चटाई पर पड़ी करवटें ले रही थी। उँह, पहले से किसी बात का मनसूबा नहीं बाँधना चाहिए किसी को! भगवान ने मनसूबा तोड़ दिया। उसको सबसे पहले भगवान से पूछना है, यह किस चूक का फल दे रहे हो भोला बाबा! अपने जानते उसने किसी देवता-पित्तर की मान-मनौती बाक़ी नहीं रखी। सर्वे के समय ज़मीन के लिए जितनी मनौतियाँ की थीं... ठीक ही तो! महाबीर जी का रोट तो बाक़ी ही है। हाय रे दैव!... भूल-चूक माफ़ करो महाबीर बाबा! मनौती दूनी करके चढ़ाएगी बिरजू की माँ!...

बिरजू की माँ के मन में रह-रह कर जंगी की पुतोहू की बातें चुभती हैं, भक्-भक् बिजली-बत्ती!... चोरी-चमारी करने वाली की बेटी-पुतोहू जलेगी नहीं! पाँच बीघा ज़मीन क्या हासिल की है बिरजू के बप्पा ने, गाँव की भाईखौकियों की आँखों में किरकिरी पड़ गई है। खेत में पाट लगा देख कर गाँव के लोगों की छाती फटने लगी, धरती फोड़ कर पाट लगा है, बैसाखी बादलों की तरह उमड़ते आ रहे हैं पाट के पौधे! तो अलान, तो फलान! इतनी आँखों की धार भला फ़सल सहे! जहाँ पंद्रह मन पाट होना चाहिए, सिर्फ़ दस मन पाट काँटा पर तौल के ओजन हुआ भगत के यहाँ।...

 

‘इसमें जलने की क्या बात है भला!...बिरजू के बप्पा ने तो पहले ही कुर्मा टोली के एक-एक आदमी को समझा के कहा, ज़िंदगी-भर मज़दूरी करते रह जाओगे। सर्वे का समय आ रहा है, लाठी कड़ी करो तो दो-चार बीघे ज़मीन हासिल कर सकते हो। सो गाँव की किसी पुतखौकी का भतार सर्वे के समय बाबूसाहेब के ख़िलाफ़ खाँसा भी नहीं।...बिरजू के बप्पा को कम सहना पड़ा है! बाबूसाहेब ग़ुस्से से सरकस नाच के बाघ की तरह हुमड़ते रह गए। उनका बड़ा बेटा घर में आग लगाने की धमकी देकर गया।...आख़िर बाबूसाहेब ने अपने सबसे छोटे लड़के को भेजा। बिरजू की माँ को ‘मौसी’ कहके पुकारा—यह ज़मीन बाबू जी ने मेरे नाम से ख़रीदी थी। मेरी पढ़ाई-लिखाई इसी ज़मीन की उपज से चलती है।...और भी कितनी बातें। ख़ूब मोहना जानता है उत्ता ज़रा-सा लड़का। ज़मींदार का बेटा है कि...’

‘चंपिया, बिरजू सो गया क्या? यहाँ आ जा बिरजू, अंदर। तू भी आ जा, चंपिया!... भला आदमी आए तो एक बार आज!’

 

बिरजू के साथ चंपिया अंदर चली गई।

‘ढिबरी बुझा दे।... बप्पा बुलाएँ तो जवाब मत देना। खपच्ची गिरा दे।’

 

‘भला आदमी रे, भला आदमी! मुँह देखो ज़रा इस मर्द का!...बिरजू की माँ दिन-रात मंझा न देती रहती तो ले चुके थे ज़मीन! रोज़ आ कर माथा पकड़ के बैठ जाएँ, मुझे ज़मीन नहीं लेनी है बिरजू की माँ, मजूरी ही अच्छी।...जवाब देती थी बिरजू की माँ ख़ूब सोच-समझके, छोड़ दो, जब तुम्हारा कलेजा ही स्थिर नहीं होता है तो क्या होगा? जोरु-ज़मीन ज़ोर के, नहीं तो किसी और के!...’

बिरजू के बाप पर बहुत तेज़ी से ग़ुस्सा चढ़ता है। चढ़ता ही जाता है।...बिरजू की माँ का भाग ही ख़राब है, जो ऐसा गोबरगणेश घरवाला उसे मिला। कौन-सा सौख-मौज दिया है उसके मर्द ने? कोल्हू के बैल की तरह खट कर सारी उम्र काट दी इसके यहाँ, कभी एक पैसे की जलेबी भी ला कर दी है उसके खसम ने!...पाट का दाम भगत के यहाँ से ले कर बाहर-ही-बाहर बैल-हट्टा चले गए। बिरजू की माँ को एक बार नमरी लोट देखने भी नहीं दिया आँख से।...बैल ख़रीद लाए। उसी दिन से गाँव में ढिंढोरा पीटने लगे, बिरजू की माँ इस बार बैलगाड़ी पर चढ़ कर जाएगी नाच देखने!...दूसरे की गाड़ी के भरोसे नाच दिखाएगा!...

 

अंत में उसे अपने-आप पर क्रोध हो आया। वह ख़ुद भी कुछ कम नहीं! उसकी जीभ में आग लगे! बैलगाड़ी पर चढ़ कर नाच देखने की लालसा किस कुसमय में उसके मुँह से निकली थी, भगवान जाने! फिर आज सुबह से दोपहर तक, किसी-न-किसी बहाने उसने अठारह बार बैलगाड़ी पर नाच देखने की चर्चा छेड़ी है।...लो, ख़ूब देखो नाच! कथरी के नीचे दुशाले का सपना!...कल भोरे पानी भरने के लिए जब जाएगी, पतली जीभवाली पतुरिया सब हँसती आएँगी, हँसती जाएँगी।...सभी जलते है उससे, हाँ भगवान, दाढ़ी-जार भी! दो बच्चों की माँ हो कर भी वह जस-की-तस है। उसका घरवाला उसकी बात में रहता है। वह बालों में गरी का तेल डालती है। उसकी अपनी ज़मीन है। है किसी के पास एक घूर ज़मीन भी अपने इस गाँव में! जलेंगे नहीं, तीन बीघे में धान लगा हुआ है, अगहनी। लोगों की बिखदीठ से बचे, तब तो!

बाहर बैलों की घंटियाँ सुनाई पड़ीं। तीनों सतर्क हो गए। उत्कर्ण होकर सुनते रहे।

 

‘अपने ही बैलों की घंटी है, क्यों री चंपिया?’

चंपिया और बिरजू ने प्राय: एक ही साथ कहा, ‘हूँ-ऊँ-ऊँ!’

 

‘चुप बिरजू की माँ ने फिसफिसा कर कहा, शायद गाड़ी भी है, घड़घड़ाती है न?’

‘हूँ-ऊँ-ऊँ!’ दोनों ने फिर हुँकारी भरी।

 

‘चुप! गाड़ी नहीं है। तू चुपके से टट्टी में छेद करके देख तो आ चंपी! भागके आ, चुपके-चुपके।’

चंपिया बिल्ली की तरह हौले-हौले पाँव से टट्टी के छेद से झाँक आई—‘हाँ मैया, गाड़ी भी है!’

 

बिरजू हड़बड़ा कर उठ बैठा। उसकी माँ ने उसका हाथ पकड़ कर सुला दिया—‘बोले मत!’

चंपिया भी गुदड़ी के नीचे घुस गई।

 

बाहर बैलगाड़ी खोलने की आवाज़ हुई। बिरजू के बाप ने बैलों को ज़ोर से डाँटा—‘हाँ-हाँ! आ गए घर! घर आने के लिए छाती फटी जाती थी!’

बिरजू की माँ ताड़ गई, ज़रुर मलदहिया टोली में गाँजे की चिलम चढ़ रही थी, आवाज़ तो बड़ी खनखनाती हुई निकल रही है।

 

‘चंपिया-ह!’ बाहर से पुकार कर कहा उसके बाप ने, ‘बैलों को घास दे दे, चंपिया-ह!’

अंदर से कोई जवाब नहीं आया। चंपिया के बाप ने आँगन में आ कर देखा तो न रोशनी, न चराग़, न चूल्हे में आग।...बात क्या है! नाच देखने, उतावली हो कर, पैदल ही चली गई क्या...!

 

बिरजू के गले में खसखसाहट हुई और उसने रोकने की पूरी कोशिश भी की, लेकिन खाँसी जब शुरु हुई तो पूरे पाँच मिनट तक वह खाँसता रहा।

‘बिरजू! बेटा बिरजमोहन!’ बिरजू के बाप ने पुचकार कर बुलाया, मैया ग़ुस्से के मारे सो गई क्या?...अरे अभी तो लोग जा ही रहे हैं।’

 

बिरजू की माँ के मन में आया कि कस कर जवाब दे, नहीं देखना है नाच! लौटा दो गाड़ी!

‘चंपिया-ह! उठती क्यों नहीं? ले, धान की पँचसीस रख दे। धान की बालियों का छोटा झब्बा झोंपड़े के ओसरे पर रख कर उसने कहा, ‘दीया बालो!’

 

बिरजू की माँ उठ कर ओसारे पर आई—‘डेढ़ पहर रात को गाड़ी लाने की क्या ज़रुरत थी? नाच तो अब ख़त्म हो रहा होगा।’

ढिबरी की रौशनी में धान की बालियों का रंग देखते ही बिरजू की माँ के मन का सब मैल दूर हो गया।...धानी रंग उसकी आँखों से उतर कर रोम-रोम में घुल गया।

 

‘नाच अभी शुरु भी नहीं हुआ होगा। अभी-अभी बलमपुर के बाबू की संपनी गाड़ी मोहनपुर होटिल-बँगला से हाकिम साहब को लाने गई है। इस साल आख़िरी नाच है।...पँचसीस टट्टी में खोंस दे, अपने खेत का है।’

‘अपने खेत का? हुलसती हुई बिरजू की माँ ने पूछा, पक गए धान?’

 

‘नहीं, दस दिन में अगहन चढ़ते-चढ़ते लाल हो कर झुक जाएँगी सारे खेत की बालियाँ!...मलदहिया टोली पर जा रहा था, अपने खेत में धान देख कर आँखें जुड़ा गईं। सच कहता हूँ, पँचसीस तोड़ते समय उँगलियाँ काँप रही थीं मेरी!’

बिरजू ने धान की एक बाली से एक धान ले कर मुँह में डाल लिया और उसकी माँ ने एक हल्की डाँट दी—‘कैसा लुक्क्ड़ है तू रे!...इन दुश्मनों के मारे कोई नेम-धरम बचे!’

 

‘क्या हुआ, डाँटती क्यों है?’

‘नवान्न के पहले ही नया धान जुठा दिया, देखते नहीं?’

 

‘अरे, इन लोगों का सब कुछ माफ़ है। चिरई-चुरमुन हैं यह लोग! दोनों के मुँह में नवान्न के पहले नया अन्न न पड़े?’

इसके बाद चंपिया ने भी धान की बाली से दो धान लेकर दाँतों-तले दबाए—‘ओ मैया! इतना मीठा चावल!’

 

‘और गमकता भी है न दिदिया?’ बिरजू ने फिर मुँह में धान लिया।

‘रोटी-पोटी तैयार कर चुकी क्या?’ बिरजू के बाप ने मुस्कुराकर पूछा।

 

‘नहीं!’ मान-भरे सुर में बोली बिरजू की माँ, ‘जाने का ठीक-ठिकाना नहीं... और रोटी बनाती!’

‘वाह! ख़ूब हो तुम लोग!...जिसके पास बैल है, उसे गाड़ी मँगनी नहीं मिलेगी भला? गाड़ीवालों को भी कभी बैल की ज़रुरत होगी।...पूछूँगा तब कोयरी-टोला वालों से!...ले, जल्दी से रोटी बना ले।’

 

‘देर नहीं होगी!’

‘अरे, टोकरी भर रोटी तो तू पलक मारते बना देती है, पाँच रोटियाँ बनाने में कितनी देर लगेगी!’

 

अब बिरजू की माँ के होंठों पर मुस्कुराहट खुल कर खिलने लगी। उसने नज़र बचा कर देखा, बिरजू का बप्पा उसकी ओर एकटक निहार रहा है।...चंपिया और बिरजू न होते तो मन की बात हँस कर खोलने में देर न लगती। चंपिया और बिरजू ने एक-दूसरे को देखा और ख़ुशी से उनके चेहरे जगमगा उठे—‘मैया बेकार ग़ुस्सा हो रही थी न!’

‘चंपी! ज़रा घैलसार में खड़ी हो कर मखनी फुआ को आवाज़ दे तो!’

 

‘ऐ फू-आ-आ! सुनती हो फूआ-आ! मैया बुला रही है!’

फुआ ने कोई जवाब नहीं दिया, किंतु उसकी बड़बड़ाहट स्पष्ट सुनाई पड़ी—‘हाँ! अब फुआ को क्यों गुहारती है? सारे टोले में बस एक फुआ ही तो बिना नाथ-पगहियावाली है।’

 

‘अरी फुआ!’ बिरजू की माँ ने हँस कर जवाब दिया, ‘उस समय बुरा मान गई थी क्या? नाथ-पगहियावाले को आ कर देखो, दोपहर रात में गाड़ी लेकर आया है! आ जाओ फुआ, मैं मीठी रोटी पकाना नहीं जानती।’

फुआ काँखती-खाँसती आई—‘इसी के घड़ी-पहर दिन रहते ही पूछ रही थी कि नाच देखने जाएगी क्या? कहती, तो मैं पहले से ही अपनी अँगीठी यहाँ सुलगा जाती।’

 

बिरजू की माँ ने फुआ को अँगीठी दिखला दी और कहा, ‘घर में अनाज-दाना वग़ैरह तो कुछ है नहीं। एक बागड़ है और कुछ बरतन-बासन, सो रात-भर के लिए यहाँ तंबाकू रख जाती हूँ। अपना हुक्का ले आई हो न फुआ?’

फुआ को तंबाकू मिल जाए, तो रात-भर क्या, पाँच रात बैठ कर जाग सकती है। फुआ ने अँधेरे में टटोल कर तंबाकू का अंदाज़ किया...ओ-हो! हाथ खोल कर तंबाकू रखा है बिरजू की माँ ने! और एक वह है सहुआइन! राम कहो! उस रात को अफ़ीम की गोली की तरह एक मटर-भर तंबाकू रख कर चली गई ग़ुलाब-बाग़ मेले और कह गई कि डिब्बी-भर तंबाकू है।

 

बिरजू की माँ चूल्हा सुलगाने लगी। चंपिया ने शकरकंद को मसल कर गोले बनाए और बिरजू सिर पर कड़ाही औंधा कर अपने बाप को दिखलाने लगा—‘मलेटरी टोपी! इस पर दस लाठी मारने पर भी कुछ नहीं होगा!’

सभी ठठा कर हँस पड़े। बिरजू की माँ हँस कर बोली, ‘ताखे पर तीन-चार मोटे शकरकंद हैं, दे दे बिरजू को चंपिया, बेचारा शाम से ही...’

 

‘बेचारा मत कहो मैया, ख़ूब सचारा है’ अब चंपिया चहकने लगी, ‘तुम क्या जानो, कथरी के नीचे मुँह क्यों चल रहा था बाबू साहब का!’

‘ही-ही-ही!’

 

बिरजू के टूटे दूध के दाँतो की फाँक से बोली निकली, ‘बिलैक-मारटिन में पाँच शकरकंद खा लिया! हा-हा-हा!’

सभी फिर ठठाकर हँस पड़े। बिरजू की माँ ने फुआ का मन रखने के लिए पूछा, ‘एक कनवाँ गुड़ है। आधा दूँ फुआ?’

 

फुआ ने गदगद हो कर कहा, ‘अरी शकरकंद तो ख़ुद मीठा होता है, उतना क्यों डालेगी?’

जब तक दोनों बैल दाना-घास खा कर एक-दूसरे की देह को जीभ से चाटें, बिरजू की माँ तैयार हो गई। चंपिया ने छींट की साड़ी पहनी और बिरजू बटन के अभाव में पैंट पर पटसन की डोरी बँधवाने लगा।

 

बिरजू के माँ ने आँगन से निकल गाँव की ओर कान लगा कर सुनने की चेष्टा की—‘उँहुँ, इतनी देर तक भला पैदल जाने वाले रुके रहेंगे?’

पूर्णिमा का चाँद सिर पर आ गया है।...बिरजू की माँ ने असली रुपा का मँगटिक्का पहना है आज, पहली बार। बिरजू के बप्पा को हो क्या गया है, गाड़ी जोतता क्यों नहीं, मुँह की ओर एकटक देख रहा है, मानो नाच की लालपान की...

 

गाड़ी पर बैठते ही बिरजू की माँ की देह में एक अजीब गुदगुदी लगने लगी। उसने बाँस की बल्ली को पकड़ कर कहा, ‘गाड़ी पर अभी बहुत जगह है।...ज़रा दाहिनी सड़क से गाड़ी हाँकना।’

बैल जब दौड़ने लगे और पहिया जब चूँ-चूँ करके घरघराने लगा तो बिरजू से नहीं रहा गया—‘उड़नजहाज़ की तरह उड़ाओ बप्पा!’

 

गाड़ी जंगी के पिछवाड़े पहुँची। बिरजू की माँ ने कहा, ‘ज़रा जंगी से पूछो न, उसकी पुतोहू नाच देखने चली गई क्या?’

गाड़ी के रुकते ही जंगी के झोंपड़े से आती हुई रोने की आवाज़ स्पष्ट हो गई। बिरजू के बप्पा ने पूछा, ‘अरे जंगी भाई, काहे कन्न-रोहट हो रहा है आँगन में?’

 

जंगी घूर ताप रहा था, बोला, ‘क्या पूछते हो, रंगी बलरामपुर से लौटा नहीं, पुतोहिया नाच देखने कैसे जाए! आसरा देखते-देखते उधर गाँव की सभी औरतें चली गई।’

‘अरी टीशनवाली, तो रोती है काहे!’ बिरजू की माँ ने पुकार कर कहा, ‘आ जा झट से कपड़ा पहन कर। सारी गाड़ी पड़ी हुई है! बेचारी!...आ जा जल्दी!’

 

बग़ल के झोंपड़े से राधे की बेटी सुनरी ने कहा, ‘काकी, गाड़ी में जगह है? मैं भी जाऊँगी।’

बाँस की झाड़ी के उस पार लरेना खवास का घर है। उसकी बहू भी नहीं गई है। गिलट का झुमकी-कड़ा पहन कर झमकती आ रही है।

 

‘आ जा! जो बाक़ी रह गई हैं, सब आ जाएँ जल्दी!’

जंगी की पुतोहू, लरेना की बीवी और राधे की बेटी सुनरी, तीनों गाड़ी के पास आई। बैल ने पिछला पैर फेंका। बिरजू के बाप ने एक भद्दी गाली दी—‘साला! लताड़ मार कर लँगड़ी बनाएगा पुतोहू को!’

 

सभी ठठाकर हँस पड़े। बिरजू के बाप ने घूँघट में झुकी दोनों पुतोहूओं को देखा। उसे अपने खेत की झुकी हुई बालियों की याद आ गई।

जंगी की पुतोहू का गौना तीन ही मास पहले हुआ है। गौने की रंगीन साड़ी से कड़वे तेल और लठवा-सिंदूर की गंध आ रही है। बिरजू की माँ को अपने गौने की याद आई। उसने कपड़े की गठरी से तीन मीठी रोटियाँ निकाल कर कहा, ‘खा ले एक-एक करके। सिमराहा के सरकारी कूप में पानी पी लेना।’

 

गाड़ी गाँव से बाहर हो कर धान के खेतों के बग़ल से जाने लगी। चाँदनी, कातिक की!...खेतों से धान के झरते फूलों की गंध आती है। बाँस की झाड़ी में कहीं दुद्धी की लता फूली है। जंगी की पुतोहू ने एक बीड़ी सुलगा कर बिरजू की माँ की ओर बढ़ाई। बिरजू की माँ को अचानक याद आई चंपिया, सुनरी, लरेना की बीवी और जंगी की पुतोहू, ये चारों ही गाँव में बैसकोप का गीत गाना जानती हैं।...ख़ूब!

गाड़ी की लीक धन-खेतों के बीच हो कर गई। चारों ओर गौने की साड़ी की खसखसाहट-जैसी आवाज़ होती है।...बिरजू की माँ के माथे के मँगटिक्के पर चाँदनी छिटकती है।

 

‘अच्छा, अब एक बैसकोप का गीत गा तो चंपिया!...डरती है काहे? जहाँ भूल जाओगी, बग़ल में मासटरनी बैठी ही है!’

दोनों पुतोहुओं ने तो नहीं, किंतु चंपिया और सुनरी ने खखासकर कर गला साफ़ किया।

 

बिरजू के बाप ने बैलों को ललकारा—‘चल भैया! और ज़रा ज़ोर से!...गा रे चंपिया, नहीं तो मैं बैलों को धीरे-धीरे चलने को कहूँगा।’

जंगी की पुतोहू ने चंपिया के कान के पास घूँघट ले जा कर कुछ कहा और चंपिया ने धीमे से शुरु किया—‘चंदा की चाँदनी...’

 

बिरजू को गोद में ले कर बैठी उसकी माँ की इच्छा हुई कि वह भी साथ-साथ गीत गाए। बिरजू की माँ ने जंगी की पुतोहू को देखा, धीरे-धीरे गुनगुना रही है वह भी। कितनी प्यारी पुतोहू है! गौने की साड़ी से एक ख़ास क़िस्म की गंध निकलती है। ठीक ही तो कहा है उसने! बिरजू की माँ बेगम है, लालपान की बेगम! यह तो कोई बुरी बात नहीं। हाँ, वह सचमुच लाल पान की बेगम है!

बिरजू की माँ ने अपनी नाक पर दोनों आँखों को केंद्रित करने की चेष्टा करके अपने रुप की झाँकी ली, लाल साड़ी की झिलमिल किनारी, मँगटिक्का पर चाँद।...बिरजू की माँ के मन में अब और कोई लालसा नहीं। उसे नींद आ रही है।

 

फणीश्वरनाथ रेणु

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सोमवार, 4 अप्रैल 2011

एक अनवरत लड़ाई का नायक

उमाशंकर तमिलनाडु के किसी राजनेता से कम लोकप्रिय नहीं हैं. राजनीति और अफशरशाही के गलियारे में लोग उनका नाम सम्मान से लेते हैं. वे इन दिनों तमिलनाडु के चुनाव में व्यस्त हैं. वे चुनाव नहीं लड़ रहे, उनके जिम्मे चुनाव कराना है. इस चुनाव का परिणाम चाहे जो भी आये लेकिन इतना तय है कि उमाशंकर के जीवन में हार-जीत का खेल चलता रहेगा.
भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी लड़ाई कभी आसान नहीं होती. यह बात उमाशंकर से बेहतर कोई नहीं समझ सकता. तमिलनाडु के दलित आईएएस अधिकारी सी उमाशंकर पर जैसे भ्रष्टाचार से लड़ने का एक जुनून है और इस लड़ाई की कीमत भी उन्हें चुकानी पड़ती है. सत्ता के खिलाफ एक के बाद एक लड़ाई के कारण उमाशंकर का तबादला होता रहता है या निलंबन. हालांकि कुछ समय पहले ही उमाशंकर की फिर से नौकरी में वापसी हुई है लेकिन कौन जाने, किस राजनीतिक दल की निगाह कब उन पर टेढ़ी हो जाये.

सी उमाशंकर 1990 में नौकरी में आए. नौकरी को अभी पांच साल ही हुए थे, जब 1995 में डीआरडीए (डिस्ट्रीक्ट रुरल डेवलपमेन्ट एजेन्सी) के अंदर बतौर परियोजना अधिकारी पिछड़ी जाति और जनजाति के लिए इस्तेमाल होने वाले श्माशान के शेड्स के नाम पर हुए पैसे के दुरुपयोग पर उन्होंने सवाल उठाया. उमाशंकर ने ना सिर्फ सवाल उठाया बल्कि इसके खिलाफ वे लोक हित याचिका लेकर चेन्नई उच्च न्यायालय में भी गए. इस मामले की सीबीआई जांच हुई और दोषियों को सजा मिली.

1996 में डीएमके की सरकार आई. सरकार ने उमाशंकर को संयुक्त सतर्कता आयुक्त के पद पर बिठाया. उमाशंकर ने आयुक्त रहते हुए अपने कार्यकाल में दो सौ करोड़ के साउथ इंडिया शिपिंग कॉरपोरेशन शेयर विनिवेश घोटाला, एक हजार करोड़ का ग्रेनाइट खदान लीज घोटाला, भूखंडों और तमिलनाडु हाउसिंग बोर्ड के मकानों का फर्जी व्यक्तियों के नाम पर आवंटन का मामला, पैंतालिस हजार टीवी एंटिना और बुस्टर की खरीद, कोयम्बटूर मेडिकल कॉलेज की 20 एकड़ जमीन को पट्टे पर महिलाओं और बच्चों के विकास के नाम पर स्टार होटल और क्लब के लिए दे दिए जाने का मामला, वह भी साधारण किराए पर दिये जाने जैसे कितने ही मामले में उन्होंने भ्रष्टाचारियों को निशाना बनाया.

उमाशंकर के अनुसार उन्होंने अपने कार्यकाल में कई बड़े नामों को भ्रष्टाचार का दोषी पाया, जिसमें मुख्य सचिव स्तर के और वरिष्ठ प्रशासनिक पदों पर आसीन अधिकारी और कुछ पूर्व मंत्री भी शामिल थे.

बकौल उमाशंकर- “ मैं काफी निराश था. मैंने पाया कि उन लोगों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं होती है, जो ऊंचा रसूख रखते हैं, चाहे वे भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हों. इस स्थिति को देखकर मैंने सरकार से निवेदन किया कि वह मुझे संयुक्त सतर्कता आयुक्त के पद से मुक्त करे.”
फरवरी 1999 में उमाशंकर जिलाधिकारी के तौर पर तिरुवरुर में नियुक्त हुए. यहां वे अपने जिले में ई-गवर्नेंस लेकर आए. पूरे भारत में किसी जिले के अंदर यह पहला प्रयोग था. एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र ने उस वक्त खबर बनाई कि ई-गवर्नेंस के कदम के बाद तिरुवरुर जिला देश भर के अन्य जिलों से बीस साल आगे निकल चुका है. एक पत्रिका ने उसके बाद सदी का नायक बनाकर उमाशंकर को पेश किया.

मई 2006 में डीएमके फिर सत्ता में आई. उमाशंकर को एलकॉट (ईएलसीओटी) का कार्यकारी निदेशक बनाया गया. यह राज्य सरकार के स्वामित्व वाली कंपनी थी. उस समय उमाशंकर ने ई-टेंडर लाकर कांट्रेक्ट देने की प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की बड़ी कोशिश की. वे निविदा मूल्यांकन (टेंडर इवेल्यूशन) की नई प्रक्रिया लेकर आए, जिसमें बोली लगाने वाले ठेकेदारों की भी भूमिका थी.

उमाशंकर के अनुसार जब उन पर एलकॉट की जिम्मेवारी थी, उस दौरान मुख्यमंत्री एम के करुणानिधि की तीसरी पत्नी राजथी अम्माल ने उन्हें अलवारपेट स्थित अपने दफ्तर में बुलाया. उमाशंकर के अनुसार उन्होंने इस बुलावे के बाद मिलना उचित नहीं समझा और कायदे से उन्हें इंकार भी कर देना चाहिए लेकिन वे शिष्टाचार के नाते मिलने चले गए.

वहीं राजथी अम्माल ने उन्हें एक खास आदमी को मछुआरों के लिए खरीदे जाने वाले 45,000 वायरलेस सेट का टेंडर देने की बात कही. उमाशंकर का पक्ष स्पष्ट था कि यह टेंडर, ई-टेंडर की प्रक्रिया से ही तय होगा, जिसे वे नहीं छेड़ना चाहते.

एलकॉट, एक दूसरी निजी लिमिटेड कंपनी न्यू इरा टेक्नोलॉजिज लिमिटेड जो थिंगराजा चेटियार द्वारा नियंत्रित था, दोनों कंपनियां ने मिलकर एलनेट टेक्नालॉजी के नाम से एक साथ काम शुरु किया. जिसमें एलकॉट का हिस्सा 26 फीसदी का था और न्यू इरा टेक्नालॉजी की हिस्सेदारी 24 फीसदी थी और बाकि बचे शेयर आम जनता के लिए थे.

दो कंपनियों के संयुक्त उद्यम एलनेट ने इटीएल इन्फ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड नाम की कंपनी शुरु की, इस सोच के साथ कि चेन्नई के पालिकारानाई में एक सूचना प्रोद्योगिकी पार्क सह विशेष आर्थिक क्षेत्र शुरु करेंगे.
इसी सोच के साथ कंपनी ने 26 एकड़ जमीन खरीद ली, जिसे भारत सरकार से सूचना प्रोद्योगिकी विशेष आर्थिक क्षेत्र का दर्जा मिल गया. कंपनी ने अठारह लाख स्क्वायर फीट की एक आईटी बिल्डिंग उस जमीन पर तैयार की. इस संपति की कुल कीमत 700 करोड़ के आस पास होगी. लेकिन बाद में रहस्यमय तरीके से यह कंपनी एलनेट और एलकॉट के नियंत्रण से बाहर हो गई.

जाहिर है, यह सब राजनीति की बड़ी ताकतों और एलकॉट के पूर्व अध्यक्ष की साझेदारी से ही संभव हुआ.

उमाशंकर के अनुसार “इस पूरे आयोजन के कार्यकारी निदेशक और एलनेट के अध्यक्ष के नाते से मैं उस समय की उन परिस्थितियों की जांच करना चाहता था, जिनमें एलनेट और एलकॉट ने इटीएल इंफ्रास्ट्रक्चर के ऊपर से अपना नियंत्रण खो दिया.”

इसके बाद उमाशंकर ने इस घोटाले के संबंध में ‘ सात सौ करोड़ से अधिक कीमत वाली ईटीएल इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड कंपनी; रहस्यमयी ढंग से लापता’ नाम से एक विशेष रिपोर्ट सरकार के पास भेजी. उमाशंकर इस मामले में प्रशासनिक अधिकारी विवेक हरिनारायाणन और डा सी चन्द्रमॉली की भूमिका की जांच करना चाहते थे.

अभी यह मामला चल ही रहा था कि उमाशंकर का तबादला कर दिया गया. उन्हें एलकॉट से निकालकर टीआईआईसी (तमिलनाडु इन्डस्ट्रीयल इन्वेस्टमेन्ट कॉरपोरेशन लिमिटेड) में कार्यकारी निदेशक बनाकर भेज दिया गया. उमाशंकर के अनुसार- “ मेरे पास इस विश्वास के लिए पर्याप्त कारण हैं कि मेरा तबादला धोखाधड़ी पूर्ण था.”

टीआईआईसी में काम करने के दौरान मारन बंधुओं के बीच सन टीवी ग्रुप ऑफ टेलीविजन नेटवर्क पर अधिकार को लेकर कलह चल रहा था. मारन बंधु की ताकत को पूरा देश जानता है, वे देश के गिने चुने धनी लोगों में से एक हैं. इसी बीच एक दिन मुख्यमंत्री डॉ. कलियंगनार करुणानिधि ने उमाशंकर को मिलने के लिए बुलाया और आरसू केबल टीवी नेटवर्क का कार्यकारी निदेशक बनाकर काम करने का आदेश जारी किया.

उमाशंकर ने वहां अपनी परेशानी बताई कि यहां उनके अधिकारी डा चन्द्रमॉली होंगे, जिनके खिलाफ उमाशंकर ने ईटीएल इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड के मामले में रिपोर्ट दाखिल की हुई थी. उसके बाद चन्द्रमॉली का इन्फॉरमेशन टेक्नॉलॉजी सेक्रेटरी सह अध्यक्ष आरसू केबल टीवी कॉरपोरेशन लिमिटेड के पद से तबादला कर दिया गया. उनकी जगह पीडब्ल्यूसी देवीदार आ गए. उमाशंकर को आरसू केबल में बतौर एमडी नियुक्ति मिली.

उमाशंकर ने यहां पाया कि सुमंगली केबल टीवी जो मारन बंधुओं द्वारा नियंत्रित था, वह बड़े पैमाने पर आरसू केबल के ऑप्टिक फाइबर केबल को नुक्सान पहुंचाने में लिप्त था. सुमंगली केबल विजन अपना मोनोपॉली बाजार में बनाए रखना चाहता था. उस समय उमाशंकर ने सुमंगली केबल विजन के इस आपराधिक गतिविधि की तरफ सरकार का ध्यान दिलाया और साथ में यह भी सरकार को बताया कि सरकार की एक कंपनी को नुक्सान पहुंचाने की गतिविधि में सरकार के एक मंत्री भी शामिल हैं. उमाशंकर ने इस संबंध में कई रिपोर्ट सरकार को भेजी और यह सुझाव भी दिया कि कानून सम्मत तरिके से मारन बंधुओं की गिरफ्तारी के प्रयास होने चाहिए.

इधर तमिलनाडु की राजनीति के इतिहास में मारन बंधुओं और करुणानिधि परिवार के बीच के विवाद में समझौते की कहानी लिखी जा रही थी. भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी के नाते उस वक्त उमाशंकर चाहते थे कि मारन बंधुओं को उनके अपराध की सजा भारतीय दंड संहिता के मुताबिक मिले.

इस घटना के बाद उमाशंकर आरसू केबल टीवी कॉरपोरेशन से भी बाहर हो चुके थे. अब उनका स्थानान्तरण कमिश्नर ऑफ स्मॉल सेविंग के तौर हो गया था और आरसू केबल टीवी कॉरपोरेशन लिमिटेड नाम का सरकारी प्रकल्प अपनी समाप्ति की घोषणा पर था.

उमाशंकर के अनुसार “इस समय मारन बंधु और माननीय मुख्यमंत्री बदला लेने की मुद्रा में आ चुके थे. वे मुझे परेशान करना चाहते थे.” 21 जुलाई 2010 को उमाशंकर को निलंबित कर दिया गया. सरकार ने उमाशंकर द्वारा दिया गया दलित समुदाय के प्रमाण पत्र की सच्चाई पर सवाल उठाया था.

उमाशंकर के अनुसार उन्होंने अपना समुदाय प्रमाणपत्र संघ लोक सेवा आयोग के पास जमा करा दिया था- “जब संघ लोक सेवा आयोग द्वारा ऑल इंडिया सर्विसेज इक्जामिनेशन का परिणाम जारी किया गया था. उस वक्त मेरा परिणाम रोका गया था, समुदाय प्रमाणपत्र की सत्यता की जांच के लिए. बाद में उसकी जांच हुई और उसके बाद ही मेरा परिणाम प्रकाशित हुआ.”

उमाशंकर खिन्न होकर कहते हैं, “सरकार कभी भी भ्रष्ट लोगों के खिलाफ कदम नहीं उठाती. सरकार के कदम मेरे खिलाफ उठे हैं क्योंकि मैंने हमेशा ईमानदारी के साथ काम किया है.”

राजनीतिक गलियारे में रहने वाले लोगों का मानना है कि सी उमाशंकर की वापसी इसलिये हो पाई है क्योंकि सरकार दलित वोटों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती थी. लेकिन जब उमाशंकर सरकार को परेशान करेंगे तो जाहिर है, उमाशंकर का एक बार फिर तबादला कर दिया जायेगा और औद्योगिक-राजनीतिक गठजोड़ तो कोई भी आरोप लगा कर उन्हें निलंबित करवाने की ताकत रखता ही है. [साभार-रविवार.कॉम]

बुधवार, 23 मार्च 2011

280 लाख करोड़ का सवाल

280 लाख करोड़ का सवाल
है ...
भारतीय गरीब है
लेकिन भारत देश कभी गरीब नहीं रहा" ये कहना है स्विस बैंक के
डाइरेक्टर
का.
स्विस बैंक के डाइरेक्टर ने यह भी कहा है कि भारत का लगभग 280
लाख
करोड़ रुपये (280 ,000 ,000 ,000 ,000) उनके स्विस बैंक में जमा है. ये रकम
इतनी
है कि भारत का आने वाले 30 सालों का बजट बिना टैक्स के बनाया जा सकता है.
या
यूँ कहें कि 60 करोड़ रोजगार के अवसर दिए जा सकते है. या यूँ भी कह सकते
है
कि भारत के किसी भी गाँव से दिल्ली तक 4 लेन रोड बनाया जा सकता है.
ऐसा भी कह
सकते है कि 500 से ज्यादा सामाजिक प्रोजेक्ट पूर्ण किये जा
सकते है. ये रकम
इतनी ज्यादा है कि अगर हर भारतीय को 2000 रुपये हर
महीने भी दिए जाये तो 60
साल तक ख़त्म ना हो. यानी भारत को किसी वर्ल्ड
बैंक से लोन लेने कि कोई जरुरत
नहीं है. जरा सोचिये ...

हमारे
भ्रष्ट राजनेताओं और नौकरशाहों ने कैसे देश को लूटा है और
ये लूट का
सिलसिला अभी तक 2011 तक जारी है. इस सिलसिले को अब रोकना
बहुत ज्यादा
जरूरी हो गया है. अंग्रेजो ने हमारे भारत पर करीब 200 सालो तक राज
करके
करीब 1 लाख करोड़ रुपये लूटा. मगर आजादी के केवल 64 सालों में हमारे
भ्रष्टाचार  ने
२८० लाख करोड़ लूटा है. एक तरफ 200 साल में 1 लाख
करोड़ है और दूसरी तरफ केवल 64
सालों में 280 लाख करोड़ है. यानि हर साल
लगभग 4.37 लाख करोड़, या हर महीने
करीब 36 हजार करोड़ भारतीय मुद्रा
स्विस बैंक में इन भ्रष्ट लोगों द्वारा जमा
करवाई गई है. भारत को किसी
वर्ल्ड बैंक के लोन की कोई दरकार नहीं है. सोचो की
कितना पैसा हमारे
भ्रष्ट राजनेताओं और उच्च अधिकारीयों ने ब्लाक करके रखा हुआ
है. हमे
भ्रष्ट  राजनेताओं और भ्रष्ट अधिकारीयों के खिलाफ जाने का पूर्ण अधिकार
है.
हाल ही में हुए  घोटालों का आप सभी को पता ही है - CWG घोटाला, २ जी
स्पेक्ट्रुम
घोटाला, आदर्श होउसिंग घोटाला ... और ना जाने कौन कौन से घोटाले
अभी
उजागर होने वाले है ........

मंगलवार, 22 मार्च 2011

इस सत्याग्रह से कौन पिघला?

पिछले एक दशक से मणिपुर घाटी की एक युवा महिला का अनशन जारी है। पुलिस और डॉक्टर प्लास्टिक ट्यूब  के जरिए भोजन देकर उन्हें जीवित रखे हुए हैं। इन दस सालों का बड़ा हिस्सा उन्होंने अस्पताल में पुलिस के कड़े पहरे के बीच बिताया है। एक दुर्लभ साक्षात्कार में उन्होंने स्वीकारा कि अस्पताल में अगर उन्हें किसी चीज की सबसे ज्यादा कमी खलती है तो वह है अपने लोगों का साथ। बीते एक दशक से उन्होंने अपनी मां का चेहरा नहीं देखा है। उन्होंने अपनी निरक्षर मां के साथ यह अनुबंध कर लिया है कि जब तक वे अपने राजनीतिक लक्ष्यों को अर्जित नहीं कर लेतीं, तब तक एक-दूसरे से भेंट नहीं करेंगी।

इरोम शर्मिला की जिद यह है कि जब तक भारत सरकार मणिपुर से आम्र्ड फोर्सेस (स्पेशल पॉवर्स) एक्ट 1958 (एएफएसपीए) को वापस नहीं लेती, तब तक वे अपना अनशन जारी रखेंगी। पुलिस बार-बार उन्हें आत्महत्या के प्रयास के आरोप में गिरफ्तार कर लेती है, जिसके लिए अधिकतम सजा एक साल की कैद है। हर बार रिहाई के फौरन बाद उन्हें फिर गिरफ्तार कर लिया जाता है। अहिंसक राजनीतिक प्रतिरोध की ऐसी मिसाल दुनियाभर में कोई और नहीं है। इरोम शर्मिला एक ऐसे कानून को वापस लेने की मांग कर रही हैं, जो उनके अनुसार वर्दीधारियों को बिना किसी सजा के भय के बलात्कार, अपहरण और हत्या करने के अधिकार मुहैया करा देता है। वर्ष 1958 में यह कानून इस लक्ष्य के साथ लागू किया गया था कि नगालैंड में सशस्त्र विद्रोहों का प्रभावी सामना करने के लिए भारतीय सशस्त्र बलों को अधिक शक्तियां प्रदान की जा सकें। 1980 में यह कानून मणिपुर में भी लागू हो गया।

1 नवंबर 2000 को असम रायफल्स अर्धसैन्य बल ने मणिपुर घाटी के मालोम कस्बे में बस की प्रतीक्षा कर रहे दस निर्दोष नागरिकों को गोलियों से भून डाला। इनमें एक किशोर लड़का और एक बूढ़ी महिला भी थी। हादसे की दर्दनाक तस्वीरें अगले दिन अखबारों में छपीं। 28 वर्षीय सामाजिक कार्यकर्ता, पत्रकार और कवयित्री इरोम शर्मिला ने भी ये तस्वीरें देखीं। असम रायफल्स ने अपने बचाव में तर्क दिया कि आत्मरक्षा के प्रयास में क्रॉस फायर के दौरान ये नागरिक मारे गए, लेकिन आक्रोशित नागरिक स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग कर रहे थे। इसकी अनुमति नहीं दी गई, क्योंकि असम रायफल्स को एएफएसपीए के तहत ओपन फायर के अधिकार प्राप्त थे। शर्मिला ने शपथ ली कि वे इस कानून के अत्याचार से अपने लोगों को मुक्त कराने के लिए संघर्ष करेंगी। उनके सामने अनशन के अलावा और कोई चारा नहीं था। उन्होंने अपनी मां का आशीर्वाद लिया और 4 नवंबर 2000 को अनशन की शुरुआत की। एक दशक बीतने के बाद भी कानून यथावत है और शर्मिला का अभियान भी जारी है।

इस दौरान एक बार रिहाई की क्षणिक अवधि में वे दिल्ली पहुंचने में सफल रहीं। उन्होंने अपने आदर्श महात्मा गांधी की समाधि पर आदरांजलि अर्पित की, लेकिन जल्द ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। दिल्ली के एक अस्पताल में कुछ समय बिताने के बाद उन्हें फिर इम्फाल के हाई सिक्योरिटी अस्पताल वार्ड में भेज दिया गया, जहां वे अब भी हैं। महात्मा गांधी का विश्वास था कि अहिंसक सत्याग्रह के जरिए अत्याचारियों के मन में संवेदनाएं जगाई जा सकती हैं, लेकिन बीते एक दशक में ऐसा कोई सबूत नहीं मिलता कि इस युवा महिला के सत्याग्रह ने भारतीय राजनीतिक तंत्र की संवेदनाओं को झकझोरा हो। वर्ष 2004 में भारत सरकार ने इस बात की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जीवन रेड्डी की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन किया कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए क्या इस कानून में संशोधन की आवश्यकता है या उसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए। 2005 में आयोग ने अनुशंसा की कि कानून को समाप्त कर दिया जाना चाहिए और इसके कई प्रावधानों को अन्य कानूनों में समायोजित कर लिया जाना चाहिए, लेकिन सरकार ने आयोग की इस अनुशंसा की अनदेखी कर दी।

शर्मिला द्वारा अनशन प्रारंभ किए जाने के बाद घाटी की कई महिलाओं ने अहिंसक प्रतिरोध के कई अन्य स्वरूप ईजाद किए। वर्ष 2004 में राजनीतिक कार्यकर्ता थंगियम मनोरमा के साथ किए गए सामूहिक बलात्कार और फिर उनकी नृशंस हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया। घाटी में जनाक्रोश चरम पर पहुंच गया। मणिपुरी महिलाएं असम रायफल्स के मुख्यालय कांगला फोर्ट के द्वार पर एकत्र हुईं और निर्वस्त्र होकर विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाली एक महिला तुनुरी ने बताया यह दृश्य देखकर सैनिक शर्मसार होकर फोर्ट में लौट गए। निर्वस्त्र महिलाएं आधे घंटे तक विरोध प्रदर्शन करती रहीं। अगले दिन इस प्रदर्शन के समाचारों ने पूरे देश का ध्यान मणिपुर की स्थितियों की ओर खींचा। सरकार ने असम रायफल्स को ऐतिहासिक कांगला फोर्ट खाली कर देने का आदेश दिया। रायफल्स के मुख्यालय को घाटी के दूरस्थ क्षेत्रों में स्थापित कर दिया गया और न्यायिक जांच के आदेश दिए गए। लेकिन असम रायफल्स ने मनोरमा के साथ किए गए बलात्कार और उसकी नृशंस हत्या को एक तरह से उचित ठहराते हुए बयान जारी किया कि वह पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की एक आतंकवादी थी।

वर्ष 2008 के बाद से रोज लगभग सात से दस महिलाएं इरोम शर्मिला के साथ एक दिन का उपवास कर रही हैं। इम्फाल में मेरी भेंट इन प्रदर्शनकारी महिलाओं से हुई। वे अपने परिजनों से दूर रहकर शिविरों में जीवन बिताते हुए अपनी नायिका शर्मिला के आंदोलन को जारी रखे हुए हैं। इरोम शर्मिला के अनशन और कारावास के दस वर्ष पूरे होने पर देशभर से सामाजिक कार्यकर्ता और कलाकार इम्फाल में एकजुट हुए। यहां हमने कविता, गीत, नृत्य और चित्रकला की अद्भुत प्रस्तुतियां देखीं, जो मणिपुर के लोगों के आंदोलन की नायिका इरोम शर्मिला के प्रति आदरांजलि थी।

इम्फाल में अपने अस्पताल के वार्ड से इरोम शर्मिला लिखती हैं : मेरे पैरों को मुक्त कर दो उन बंधनों से/जो कांटों की बेड़ियों की तरह हैं/एक तंग कोठरी के भीतर/कैद हैं मेरे तमाम दोष और अवगुण/और मैं/एक पक्षी की तरह..

हर्ष मंदर
लेखक राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य हैं।
[साभार- भास्कर.कॉम]

शनिवार, 29 जनवरी 2011

भारत के नंगे अमीर

मीडिया में अद्भुत दृश्य चल रहा है। टाटा से लेकर अनिल अम्बानी तक ,देशी-विदेशी राजनयिकों से लेकर अमेरिका के महान ताकतवर लोगों तक सबको आप मीडिया में नंगा देख सकते हैं। अमीर इस तरह नंगे कभी नहीं हुए। टाटा ने जनसंर्पक अधिकारी नीरा राडिया के साथ हुई बातचीत का टेप बाहर आने पर सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगायी है कि उनकी प्राइवेसी का हनन हुआ है। वहीं उनकी प्रतिक्रिया आते ही केन्द्र ने तत्काल जांच के आदेश दे दिए हैं। 2जी स्पेक्ट्रम के मामले में सारी पार्टियां परेशान हैं, और केन्द्र सरकार के सभ्य प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की साख तो मिट्टी में ही मिल गयी है।
उधर अमेरिकी प्रशासन परेशान है ढ़ाई लाख केबिल मेल के लीक होने से। जिस वेबसाइट ने लीक किया है उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने के बारे में अमेरिकी अधिकारी विचार कर रहे हैं।
टाटा से लेकर अनिल अम्बानी तक समस्त कारपोरेट घराने कम से कम आज बेईमानी-धोखाधड़ी आदि के मामलों में जन अदालत में नंगे खड़े हैं। उनके खिलाफ प्रमाण थे। इसे कांग्रेस पार्टी जानती थी। प्रधानमंत्री जानते थे। वे चुप रहे। कल जब संचारमंत्री कपिल सिब्बल प्रेस कॉफ्रेस करके 85 संचार कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी कर रहे थे तो वे वस्तुतः नव्य आर्थिक उदार नीतियों की ओट में चल रहे सत्ता और कारपोरेट घरानों के पापी भ्रष्ट गठबंधन को स्वीकार कर रहे थे।
कपिल सिब्बल प्रच्छन्नतः यह भी संदेश दे रहे थे परवर्ती पूंजीवाद में कारपोरेट घराने सार्वजनिक संपदा को खुलेआम लूट रहे हैं। कारपोरेट घराने ईमानदारी से कारोबार नहीं कर रहे। वे संकेतों में कह रहे थे कारपोरेटतंत्र महाभ्रष्ट तंत्र है। उनके यहां कोई पारदर्शिता नहीं है। साथ में प्रच्छन्नतः बिना बोले बता रहे थे प्रधानमत्री मनमोहन सिंह कारपोरेट घरानों के आर्थिक अपराधों पर पर्दा ड़ालते रहे हैं।
जिन कंपनियों को नोटिस भेजे गए हैं वे लंबे समय से धडल्ले से काम कर रही हैं। वे यह प्रच्छन्नतः बता रहे थे दूरसंचार कंपनियां सबसे घटिया किस्म की कारपोरेट कारोबारी संस्कृति लेकर आयी हैं। ये ऐसी कारपोरेट संस्कृति है जिसका लक्ष्य सिर्फ व्यापार करना ही नहीं है बल्कि वे भारत की राजनीति के भी फैसले ले रही हैं। कौन सा मंत्रालय किसे मिले यह फैसला प्रधानमंत्री नहीं कर रहे बल्कि कारपोरेट घराने कर रहे हैं। आप कल्पना करें सीएजी की रिपोर्ट में 2जी स्पेक्ट्रम का घोटाला उजागर नहीं हुआ होता ,संसद को विपक्ष ने ठप्प नहीं किया होता तो क्या इतने बड़े कारपोरेट घपले और सार्वजनिक संपदा की इस खुली लूट के खिलाफ कपिल सिब्बल कारण बताओ नोटिस जारी करते ?
कपिल सिब्बल ने 2जी स्पेक्ट्रम के मामले में 85 कंपनियों को नोटिस भेजा है। साथ ही उन 119 कंपनियों को भी कारण बताओ नोटिस भेजा है जिनके नाम दूरसंचार सेवाएं प्रदान करने का लाइसेंस जारी किया गया था लेकिन वे अभी तक अपनी सेवाएं आरंभ नहीं कर पायी हैं । दूरसंचार का घपला कैसे चल रहा है इस पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने वोडाफोन को करचोरी के लिए दोषी पाया है। पहले भी रिलाएंस कंपनी को दूरसंचार नियमों की अवहेलना के चक्कर में मोटी रकमजुर्माने के तौर पर देनी पड़ी है।
उल्लेखनीय है दूरसंचार के कंधों पर ही सवार होकर नव्य उदार नीतियां बड़े लंबे-चौड़े वायदों के साथ लायी गयी थीं। उस समय वामदलों ने इन नीतियों का जमकर विरोध किया था। उस समय वामदलों को छोड़कर सभी दल एकजुट हो गए थे आज नव्य उदार नीतियों का भ्रष्टतमरूप हमारे सामने है और भारत की अधिकांश बड़ी कारपोरेट कंपनियां इसमें लिप्त हैं।
नव्य उदार नीतियों के प्रति वामदलों का बुनियादी नजरिया और जिन संभावनाओं को उन्होंने संसद और बाहर व्यक्त किया था सही साबित हुआ है। वामदलों का बुनियादी तौर पर कहना था कि नव्य उदार नीतियों के नाम पर कारपोरेट घरानों के हाथों देश की संपदा को नियमों, संप्रभुता और आत्मनिर्भरता को ताक पर रखकर गिरवी रखा जा रहा है और इन नीतियों की आड़ में सार्वजनिक संपदा की लूट को वैधता प्रदान करने की कोशिश की जा रही है। सार्वजनिक संपदा की लूट का यह सिलसिला दूरसंचार के विनियमन से होता हुआ हर्षद मेहता घोटाला मार्ग से चलकर 2जी स्पेक्ट्रम और कॉमनवेल्थ गेम घोटालों तक चरमोत्कर्ष पर पहुँचा है।
संयोग की बात है हर्षद मेहता घोटाले के समय मनमोहन सिंह वित्तमंत्री थे और 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के समय प्रधानमंत्री हैं। इन सभी अवसरों पर घोटालों की राजनीतिक जिम्मेदारी लेने से वे बचते रहे हैं। वे कारपोरेट घरानों और अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पसंदीदा राजनेता हैं। हर समय कारपोरेट घराने उन पर ही दांव लगाते रहे हैं। वे वफादार कारपोरेट सेवक साबित हुए हैं।
आश्चर्य की बात है कि विपक्ष उनके इस्तीफे की मांग नहीं कर रहा ? घोटालों का सवाल राजनीतिक है। यह तकनीकी और आर्थिक नहीं है। केन्द्र सरकार के ऊपर इन घोटालों की राजनीतिक जिम्मेदारी और जबाबदेही है। हम यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि मीडिया के द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का इस्तीफा क्यों नहीं मांगा जा रहा ? मीडिया मनमोहन सिंह को क्यों बचाना चाहता है ? क्या मीडिया की आलोचना के दायरे में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नहीं आते ? मनमोहन सिंह ने ऐसा कौन सा पुण्य का काम किया है कि उनको राजनीतिक मुखिया होने के कारण जिम्मेदारी से बरी कर दिया जाए ?
लेखक-जगदीश्वर चतुर्वेदी
[जगदीश्वर चतुर्वेदी जाने माने मार्क्सवादी साहित्यकार और विचारक हैं. इस समय कोलकाता विश्व विद्यालय में प्रोफ़ेसर ]