नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

रमणी का रहस्य

 

लड़कपन में वणिक्-पुत्र सुना करता कि सात समुद्र, नव द्वीप के पार एक स्फटिकमय भूमि है। वहाँ एक तपस्वी क्या जाने कब से अविराम तप कर रहा है और उसकी पवित्रता के कारण सूर्यनारायण निरंतर उसकी परिक्रमा किया करते हैं और उसके तेज़ से वहाँ कभी अंधकार नहीं होता।

उस यती के एक कन्या है—वही इस संसार में उसकी एकमात्र कुटुंबी है। वह कन्या प्रभात बेला के जैसी टटकी और कमनीय है तथा स्वाती की बूँद की तरह निर्मल, शीतल और दुर्लभ है।

 

उन दिनों वह सोचता कि मैं ऐसी अच्छी सखी पाऊँ, तो दिन-का-दिन उसके संग खेलता-कूदता रहूँ, ऊधम मचाता रहूँ। अपने प्रत्येक खेल-कूद में वह उसका स्थान नियत कर लेता और कल्पना से उसकी पूर्ति कर लेता।

किंतु, धीरे-धीरे कल्पनापूर्ण लड़कपन यथार्थता खोजने वाली युवावस्था में परिवर्तित हो गया और वणिक्-पुत्र के लिए जो बातें सच थी, अब लड़कपन का खिलवाड़ हो गईं। और उसे उस कुमारी को वस्तुतः प्राप्त करके अपनी जीवन-सहचरी बनाकर युवावस्था का अधूरापन दूर करने की चिंता दिन-रात सताने लगी।

 

धीरे-धीरे अनेक नगरों से उसके ब्याह की बातचीत आने लगी; किंतु ब्याह का नाम सुनते ही उसका मुँह लटक जाता। उसकी यह दशा देख उसके पिता ने एक दिन पूछा—हे वत्स! क्या कारण है कि विवाह का नाम सुनकर तुम अवसन्न हो जाते हो?

तब उस वणिक् पुत्र ने अपना तात्पर्य छिपाकर नम्रतापूर्वक पिता से कहा—तात! वैश्यकुल में मेरा जन्म हुआ है; अतः वाणिज्य मेरा धर्म है। सो मेरी इच्छा है कि अपने बाहुबल में कुछ अर्जन कर लूँ, तब गृहस्थाश्रम में प्रवेश करूँ; क्योंकि स्वार्जित वित्त के व्यय और उपभोग से मेरा आनंद, उत्साह और हृदय द्विगुण हो उठेगा।

 

‘पुत्र! तुमने बहुत उचित सोचा है और यद्यपि मेरा हृदय तुम्हें छोड़ना नहीं चाहता और तुम्हारे वियोग से तुम्हारी माता की वृद्धावस्था भार-रूप हो जाएगी, तो भी तुमने स्वधर्म की बात विचारी है, अतः मैं तुम्हें नहीं रोकूँगा। कल ही मैं तुम्हारे लिए सात पोत लदवाए देता हूँ, तुम उन्हें लेकर अपने परिकर समेत देश-देशांतर भ्रमण कर के यथेष्ट व्यापार और उपार्जन करो।’

आज्ञा पाकर उसके आनंद का पारावार न रहा और रात-दिन परिश्रम कर के सात दिन में वह अपनी यात्रा के लिए पूर्णतः तैयार हो गया।

 

आठवें दिन प्रातःकाल वह अपने माता-पिता से विदा हुआ। उस समय उनकी आँखों में आँसू भर जाने से उनकी दृष्टि धुंधली पड़ रही थी, अतः वे अपनी संतान को ठीक-ठीक देख भी न सके। यद्यपि वणिक्-पुत्र को उनका वियोग सहज न था, तो भी नए देशों के देखने का उत्साह और अपनी कल्पना की प्रेयसी के मिलने की प्रत्याशा से उसका हृदय आनंद से फड़क रहा था।

शीघ्र ही वह अपने जहाज़ पर बैठा और उसका, सातों जहाज़ों का बेड़ा, अनुकूल पवन पाता हुआ द्वीप-पर-द्वीप तय करता गया।

 

प्रत्येक द्वीप में व्यापार करते-करते उसने स्वर्ण की बड़ी भारी राशि बटोर ली थी और यों तीन वर्ष बीतने पर जब वह स्कंध नाम देश में पहुँचा, जहाँ के लोग भालू और सामुद्रिक सिंह की खाल पहनते हैं, तो उसने बड़ा उत्सव मनाया, क्योंकि उसे अनेक देश देखने का तथा अर्थ के लाभ का आनंद तो दिखाने-मात्र को था; उसको प्रसन्नता तो इस बात की थी कि वह अपने लक्ष्य-स्थान के पास पहुँच गया था, क्योंकि यहाँ से वह स्फटिक द्वीप केवल एक मास की दूरी पर था।

तब वणिक्-पुत्र ने अपने छ: जलयानों को और समस्त साथियों को वहीं छोड़ा और अकेला एक पोत पर अपने अभीष्ट स्थान की ओर चल पड़ा। उसके साथी न तो उसे रोकने में ही कृतकार्य हुए, न उसका यह उद्देश्य जानने में ही।

 

दो दिन में उसका जहाज़ उस समुद्र में पहुँच गया, जो ठीक शरद् के आकाश की नाईं है, क्योंकि वह वैसा ही प्रशस्त है, वैसा ही निर्मल है और वैसा ही नील है, साथ ही जैसे इसमें शुभ्र घन घूमा करते हैं, वैसे ही उसमें बड़े-बड़े बर्फ़ के पहाड़ तैर रहे थे। उन्हें देखकर माँझियों के छक्के छूट गए, किंतु वणिक्-पुत्र में ऐसी दृढ़ता आ गई थी कि उसने उन लोगों को पूरा धीरज बँधा दिया और स्वयं जहाज़ का मार्ग निर्दिष्ट करने लगा। सचमुच ही उसके निश्चय को उन विशालकाय हिम-पर्वतों ने मार्ग देना आरंभ किया और अपनी यात्रा के महीनवें दिन वह जहाज़ स्फटिक द्वीप के किनारे जा लगा।

अब वणिक्-पुत्र ने उन माँझियों से भी पिंड छुड़ाया और अकेला उस द्वीप पर एक ओर चल पड़ा! वास्तव में वह द्वीप भी बर्फ़ का ही था, और वह कुछ दूर भी नहीं गया होगा कि मारे शीत के उसके पैर निष्प्राण-से हो उठे, किंतु उसका साहस उसे घसीट ले चला और उसे एक झुंड ऐसे पक्षियों का आता दिखलाई पड़ा, जो क़रीब-क़रीब मनुष्य ही के जितने ऊँचे थे और झूमते हुए मोटे मनुष्य की तरह चल भी रहे थे! उनके संपूर्ण शरीर रोएँदार पर से ढँके हुए थे और अपनी भाषा में कुछ कहते हुए वे उसी की ओर बढ़े आ रहे थे।

 

वणिक्-पुत्र उनका कोलाहल तो न समझ सका, किंतु इतना जान गया कि वे उसकी सहायता के लिए आ रहे हैं, अतएव वह वहीं ठहर गया। कुछ क्षणों में वे उसके निकट आ गए और उसे चारों ओर से इस तरह घेर लिया कि उनकी गर्मी से शीघ्र ही वह स्वस्थ हो गया। फिर तो पक्षियों का वह झुंड, उसके साथ हो लिया और उसे बड़े सुख से मार्ग दिखाता हुआ उस तापस के आश्रम की ओर ले चला!

वह झुंड उसे गर्मी पहुँचाता था—जब बर्फ़ पड़ने लगती थी, तब अपने डैनों की आड़ में ले लेता था और रात्रि में अपने डैनों का ओढ़ना-बिछौना बनाकर उसे सुख की नींद सुलाता था, इतना ही नहीं, अपने में साहुत करके प्रति सातवें दिन उनमें से एक अपना प्राण दे देता था, जिससे एक सप्ताह तक वणिक्-पुत्र का उदर-पोषण होता था।

 

इस प्रकार इक्कीसवें दिन उसे तापस का आश्रम दिखलाई दिया। ज्यों-ज्यों वह उसके निकट पहुँचने लगा, त्यों-त्यों उसकी विचित्र दशा होती गई—उसके मन, प्राण और शरीर में एक ऐसा ज़बरदस्त तूफ़ान उठ खड़ा हुआ कि उसमें उसका आपा सर्वथा विलीन हुआ जा रहा था। यह अवस्था यहाँ तक बढ़ी कि उस आश्रम में पहुँचते ही ज्यों उस मुनि-कन्या पर उसकी दृष्टि पड़ी, वह पत्थर का हो उठा और मुनि-कन्या, जो ललककर उसके स्वागतार्थ बढ़ी थी, यह दशा देखकर एक चीख़ मार के बेहोश हो गई।

उसका आरव सुनकर तपस्वी अपने एकांत से उठ आया। उसने अपने तपोबल से वैश्य-कुमार को पुनरुज्जीवित किया, फिर परिचर्या द्वारा अपनी कन्या की मूर्च्छा भी दूर की। वैश्य-कुमार उस समय एक अद्भुत आनंद के समुद्र में डूब-उतरा रहा था; क्योंकि उसने मुनि-कन्या की अपने में जो कल्पना की थी, वह इसके सामने कोई चीज़ ही न थी। यह तो आशा के समान लावण्यवती थी और जब उसने पहले-पहल प्रश्न किया—तुम्हें क्या हो गया था?—तब उसे ऐसा जान पड़ा कि वीणा का स्वर—इस कंठ की छूँछी विडंबना मात्र है।

 

कुछ ही क्षणों में तापस अपने एकांत में चला गया और वे दोनों ऐसे घुल-मिल गए, मानो जन्म-जन्म के संगी हों, एवं विविध वार्तालाप करने लगे। इस प्रकार जब तीन प्रहर बीत गए, तब वह मुनि पुनः वहाँ आया और वणिक्-पुत्र से कहने लगा—

वत्स, मैंने जान लिया कि इस कुमारी का जन्म तुम्हारे लिए ही हुआ है, सो इसे ग्रहण करो, मैं इसे तुमको दूँगा। यद्यपि देवता तक इसकी आकांक्षा कर रहे हैं। किंतु मैंने उनसे स्पष्ट कह दिया है कि यह मर्त्यबाला है और मर्त्य से ही इसका संबंध शोभन होगा। परंतु, मेरी प्रतिज्ञा थी कि जो मर्त्य यहाँ तक पहुँच सकेगा, वही इसका अधिकारी होगा, सो आज तुम आ गए! अब शुभ-लग्न में मैं इसे तुमको दे दूँगा। चौबीस प्रहर तुम हमारा आतिथ्य स्वीकार करो, उसके बाद वह मुहूर्त्त आवेगा।

 

इतना कहकर वह तो चला गया और मुनि-कन्या, जो सिर नीचा किए हुए थी, उसी मुद्रा से उससे बोली—मेरी भी एक प्रतिज्ञा है, उसे तुम समझ लो, क्योंकि बिना उसके पूरा हुए तुम मुझे न पा सकोगे।

वणिक्-पुत्र कहने लगा—चारुहासिनी! वह कौन ऐसी बात है, जो मैं तुम्हारे लिए न कर सकूँगा! तुम उसके कहने में संकोच न करो, बस शीघ्र ही मुझे अपनी प्रतिज्ञा सुनाओ, क्योंकि मैं अधीर हो रहा हूँ।

 

तब वणिक्-पुत्र को अपनी चितवन की इन्दीवर माला पहनाते हुए उसने दृढ़ता से कहा—जो यहाँ बसने की प्रतिज्ञा करेगा, वही मुझे पा सकेगा, अन्यथा मैं विवाह न करूँगी; क्योंकि पिता को अकेला छोड़कर मैं नहीं जी सकती, कौन उनकी देख-रेख करेगा। पिता से अनुनय करके उन्हें उनके निश्चय से विरत करूँगी और आजन्म कुमारी रहने की अनुज्ञा प्राप्त करूँगी।

वैश्य-पुत्र ने समझा था कि कुमारी कोई बड़ी समस्या उपस्थित करेगी, किंतु उसकी बात सुनकर उसे अत्यंत आश्चर्य हुआ, क्योंकि उसे तो अपने देश की कोई सुध ही न रह गई थी—वह तो कुमारीमय हो रहा था।

 

अविलंब ही वह बोला—यह कौन बड़ी बात है—रम्य प्रेमा न जन्म-भूः। भला इससे बढ़कर कौन देश होगा, जहाँ सूर्य कभी अस्त ही नहीं होता और तुम्हारा पूर्ण चंद्रानन नित्य उदित रहता है।

यह सुनकर कुमारी ने अपनी मुस्कान का जादू उस पर फेर दिया।

 

बात करते चौबीस पहर बीत गए, क्योंकि यहाँ कभी सूर्यास्त न होने के कारण समय की गणना पहरों से ही होती थी और वह शुभ घड़ी आ पहुँची, जिसकी अभिलाषा वणिक्-पुत्र को जन्म से ही थी। योगी को मुक्ति से जो आनंद होता है, उसका उसे अनुभव-सा हो उठा और विवाह-कृत्य पूर्ण करके यती जब अपनी साधना में प्रवृत्त हुआ, तब दंपति हाथ-में-हाथ दिए हुए बर्फ़ के मैदान में टहलने के लिए निकल पड़े। उस समय वैश्य-पुत्र को ऐसा प्रतीत हुआ कि वह अपनी शची को लिए हुए नंदन कामन-बिहारी इंद्र है। प्रेमालाप करते हुए दोनों आगे बढ़े। वणिक्-पुत्र का मुँह दिव्य तेज़ से दमक रहा था, उसने कहा—सखि! मैं यहीं बर्फ़ काटकर तुम्हारे लिए एक ऐसी गुफ़ा बनाऊँगा कि तुम्हें उसमें शीत का लेश-मात्र कष्ट न होगा।

किंतु नवपरिणीता ने इसका कोई उत्तर न दिया। वह क्षितिज को एकटक देख रही थी। ऐसा जान पड़ता था कि उसकी दृष्टि उस पटल को बेधकर उसके पार के दृश्य देखने में निमग्न है।

 

कौतूहल से उसकी यह तन्मयता भंग करते हुए वैश्य-पुत्र ने पूछा—किस ध्यान में हो?

‘कुछ नहीं, सोच रही थी कि तुम्हारा देश कैसा होगा!’

 

क्यों?—पति ने उत्सुकता से पूछा।

इसीलिए कि वह तुम्हारा देश है। उसकी ममता ने उत्तर दिया।

 

सहसा आर्य-कुमार को जन्मभूमि की याद आ गई। माता-पिता की विकलता उसका हृदय सालने लगी। तो भी वह बड़ी कठिनता से अपने भावों को सफलतापूर्वक दबाए रहा; किंतु उसकी अर्धांगिनी उन भावों का स्वतः अनुभव कर रही थी। जी से बोली—उत्कट इच्छा होती है वहाँ चलने की; किंतु साथ ही उसने बेबसी से नहीं अपने पिता की प्रीति में पगकर कहा—ऐसा कहाँ संभव है!

पति पुलक उठा। उसने अपनी प्रेयसी को चूम लिया। यह चुंबन उस तापस-कन्या के जीवन में प्रणय का प्रथम चुंबन था। वह अपने को संभाल न सकी। उसका शरीर सनसना उठा, आँखें मुँद गईं; किंतु एक ही क्षण में उसकी अकृत्रिम, सरल, नर-नारी-भेद-विहीन उन्मुक्त प्रकृति जहाँ-की-तहाँ आ गई और उसने कहा—चलो, विवाह मंडप ज्यों-का-त्यों पड़ा है। उसका परिष्कार करना है।

 

दोनों लौट पड़े।

***

 

दो-तीन पहर बाद तापस अपनी साधना से विरत हुआ। नवदंपती कहीं एकांत में बैठे प्रेमालाप कर रहे थे। उसने उन्हें आवाज़ दी और वे उस ओर चले, किंतु पत्नी सकुच रही थी।

इस जोड़ी को देखकर उसके निराकुल हृदय में भी सांसारिकता की एक लहर आ गई, जिसके कारण उसकी प्रशांत दृष्टि हर्ष से चमकने लगी। प्रसन्नता का एक उच्छ्वास लेकर उसने जामाता से कहा—धनी! मेरी साधना में आज तक तेरी इस थाती की चिंता बाधक थी, आज उसे तुझको सौंपकर में पूर्णतः निर्मम हो गया। अब तुमको अपने देश जाना चाहिए।

 

मुनि-कन्या पति के पीछे आँखें नीची किए खड़ी थी। यह सुनकर उसका हृदय सिहर उठा। उसने कुछ कहना चाहा। पिता से आज तक उसे जो कहना हुआ था, उसने निधड़क कहा था, किंतु इस समय उसका हृदय धड़कने लगा, लाज ने उसका कंठ थाम लिया।

वैश्य-कुमार ने संभ्रम से पूछा—यहाँ आपकी सेवा...।

 

तपस्या और सेवा—ये दो विरुद्ध बातें हैं। तपस्वी को सेवा की क्या आवश्यकता! इसके यहाँ रहने पर मैं इससे परिचारित होता था, इसके ममत्व से सिंचित होता था, इसलिए नहीं कि मुझे उनकी आवश्यकता थी। नारी जगज्जननी हैं, उनका हृदय दया-मया, करुणा से निर्मित होता है। वहाँ से इनकी निरंतर वृष्टि हुआ करती है, जो इस धधकते हुए जगती-तल को शीतल और हरा-भरा बनाए रहती है। उसी वृष्टि को—इनके स्वभाव को—इसी दिन के लिए बनाए रखना मेरा कर्त्तव्य था। आज उसके उपयोग का समय आ गया है। अब अपने गृहक्षेत्र को उस वृष्टि से यह सींचे।—उस नवीन गृही को तत्त्वदर्शी ने समझाया।

तो क्या हम लोग आपको ऐसे ही छोड़ दें?—उसने शंका की।

 

तपस्वी ने उत्तर दिया—यही तो मेरी सबसे बड़ी सेवा होगी। तुम्हीं सोचो कि तुम लोगों के यहाँ रहने से मेरे मार्ग में विक्षेप के सिवा क्या होगा, गृही और गृहत्यागी का साथ नहीं हो सकता। मुझे तो एकांत दे दो।

वैश्य ने नतशिर होकर यह आदेश अंगीकार किया। और तपस्वी यह कहकर पुनः एकांत में चला गया कि—अब से डेढ़ पहर बाद तुम्हारे प्रस्थान का मुहूर्त्त है, उस समय आकर मैं तुम्हें विदा दे दूँगा।

 

तापस-कन्या रो रही थी। अतीत वर्तमान बनकर उसके सामने अभिनय करने लगा।

तुम उदास क्यों हो रही हो इतना?—वैश्य-पुत्र उसका पाणि-पीड़न करते हुए समझाने लगा।

 

कुछ नहीं, अतीत की स्मृति बड़ी दुखदार्इ होती है।—उसने अनमनेपन से उत्तर दिया।

हाँ, वह वर्तमान को भी विगत बना देती है।—कुछ गंभीर होकर उसके पति ने कहा।

 

सो तो जानती हूँ, किंतु क्या कीजिएगा! प्राण जो रोते हैं!—उसने मृदुलता से कहा, एक लंबी साँस लेकर।

हृदय छोटा न करो—वैश्य-पुत्र ने ढाढ़स दिया।

 

तुम पुरुषों में इतनी निर्ममता हो और तुम्हीं पर नारी ममता करे, यह भी एक विधि-विडंबना है!—उदासीनता से रुदिता ने कहा।

पति ने सफ़ाई दी—मुझसे तुम्हारे आँसू नहीं देखे जाते।

 

क्योंकि तुम पुरुष हो। तुम रूप रखना जानते हो और नारी से भी उसी की प्रत्याशा करते हो। तभी तो कहती हूँ कि तुम निर्मम होते हो। मैं जानती हूँ कि यहाँ अब मेरा कुछ नहीं। अब तो वही मेरा देश है, वहीं मेरा संसार है; वहीं के लिए उपजी हूँ, फिर भी हृदय नहीं मानता, वह तड़पता है, मैं रोती हूँ। यदि मैं पुरुष होती और रूप रखे होती, तो तुम्हें शांति मिलती।

वणिक् अवाक हो गया। उसे यह रहस्य अवगत हो उठा कि नारी का प्रकृत रूप उसकी मुस्कान में नहीं, उसके आँसुओं में प्रत्यक्ष होता है।

 

वैश्य-बाला रोती रही।

***

 

डेढ़ पहर बीत गया। तपस्वी पुनः आया। कन्या उसके पाँव पकड़कर रुदन करने लगी। पिता ने उठा लिया। सिर पर हाथ फेरते हुए रुद्ध कंठ से उसने कहा—वत्से! क्यों अपने पिता की ममता को बाँध रही है। इस अकिंचन के पास एक वही तो तुझे दहेज देने को बची है। उसे भी अपनी ममता के अपार भंडार में मिला ले और उसका भूरि-भूरि उपहार उन्हें जाकर दे, जो वहाँ तुम्हारी बाट जोह रहे हैं।

उसने अपनी बेटी से इतनी भीख माँगी; किंतु कामना करके भी वह उसे प्रदान न कर सकी। उलटे इस असमर्थता ने उसकी करुणा को और भी विगलित कर दिया।

 

तपस्वी पुनः प्रशांत हो गया। गंभीर होकर बोला—बेटी! तेरी इतने दिनों की साधना का यह शुभ फल मुझे मिला है, अब जिस आश्रम का द्वार तेरे लिए उन्मुक्त हुआ है, उसमें प्रवेश करके उसकी सिद्धि कर। यही परंपरा तो तुझे पूर्णता तक पहुँचावेगी। अब देर न कर, मुहूर्त्त बीत रहा है।

बेटी की रोते-रोते हिचकियाँ बँध गई थीं। उसने चुपचाप पिता के चरण छुए। वैश्य का भी हृदय गद्गद् हो रहा था, उसने भी उनके चरणों पर अपने आँसू चढ़ाए। तपस्वी ने दोनों की पीठ पर हाथ रखकर असीसा—जाओ तुम्हारा संसार सुखी और भरा-पूरा हो।

 

***

तपस्वी वहीं ज्यों-का-त्यों खड़ा था। उसके दोनों हाथ वक्षस्थल पर मुद्रित थे, दाहिना पंजा बाँयी और बायाँ दाहिनी काँख के नीचे दबा हुआ था। वह एकटक शून्य दृष्टि से उसी ओर देख रहा था, जिधर नवदंपती चले जा रहे थे। उस वीतराग की ममता ही उनका एकमात्र असबाब था। प्रस्थिता के पैर लड़खड़ा रहे थे, मानो पीछे पड़ते हों। वह अपने को संभाल न सकती थी—उसका स्वामी उसे सहारा दे रहा था।

 

देखते-ही-देखते वे ओझल हो गए और उसी क्षण उस निर्मम की आँखों से ममता की दो बूँदें टपक पड़ीं।

 

राय कृष्णदास

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शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

आकाशदीप

 

(एक)

“बंदी!”

 

“क्या है? सोने दो।”

“मुक्त होना चाहते हो?”

 

“अभी नहीं, निद्रा खुलने पर, चुप रहो।”

“फिर अवसर न मिलेगा।”

 

“बड़ा शीत है, कहीं से एक कंबल डालकर कोई शीत से मुक्त करता।”

“आँधी की संभावना है। यही अवसर है। आज मेरे बंधन शिथिल हैं।”

 

“तो क्या तुम भी बंदी हो?”

“हाँ, धीरे बोलो, इस नाव पर केवल दस नाविक और प्रहरी हैं।”

 

“शस्त्र मिलेगा?”

“मिल जाएगा। पोत से संबद्ध रज्जु काट सकोगे?”

 

“हाँ।”

समुद्र में हिलोरें उठने लगीं। दोनों बंदी आपस में टकराने लगे। पहले बंदी ने अपने को स्वतंत्र कर लिया। दूसरे का बंधन खोलने का प्रयत्न करने लगा। लहरों के धक्के एक-दूसरे को स्पर्श से पुलकित कर रहे थे। मुक्ति की आशा—

 

स्नेह का असंभावित आलिंगन। दोनों ही अंधकार में मुक्त हो गए। दूसरे बंदी ने हर्षातिरेक से उसको गले से लगा लिया। सहसा उस बंदी ने कहा- “यह क्या? तुम स्त्री हो?”

“क्या स्त्री होना कोई पाप है?”—अपने को अलग करते हुए स्त्री ने कहा।

 

“शस्त्र कहाँ है? तुम्हारा नाम?”

“चंपा।”

 

तारक-खचित नील अंबर और समुद्र के अवकाश में पवन ऊधम मचा रहा था। अंधकार से मिलकर पवन दुष्ट हो रहा था। समुद्र में आंदोलन था। नौका लहरों में विकल थी। स्त्री सतर्कता से लुढ़कने लगी। एक मतवाले नाविक के शरीर से टकराती हुई सावधानी से उसका कृपाण निकालकर, फिर लुढ़कते हुए, बंदी के समीप पहुँच गई। सहसा पोत से पथ-प्रदर्शक ने चिल्लाकर कहा- “आँधी!”

आपत्ति-सूचक तूर्य बजने लगा। सब सावधान होने लगे। बंदी युवक उसी तरह पड़ा रहा। किसी ने रस्सी पकड़ी, कोई पाल खोल रहा था। पर युवक बंदी ढुलककर उस रज्जु के पास पहुँचा, जो पोत से संलग्न थी। तारे ढँक गए। तरंगें उद्वेलित हुईं, समुद्र गरजने लगा। भीषण आँधी, पिशाचिनी के समान नाव को अपने हाथों में लेकर कंदुक-क्रीड़ा और अट्टहास करने लगी।

 

एक झटके के साथ ही नाव स्वतंत्र थी। उस संकट में भी दोनों बंदी खिलखिला कर हँस पड़े। आँधी के हाहाकार में उसे कोई न सुन सका।

(दो)

 

अनंत जलनिधि में ऊषा का मधुर आलोक फूट उठा। सुनहली किरणों और लहरों की कोमल सृष्टि मुस्कुराने लगी। सागर शांत था। नाविकों ने देखा, पोत का पता नहीं। बंदी मुक्त हैं।

नायक ने कहा- “बुधगुप्त! तुमको मुक्त किसने किया?”

 

कृपाण दिखाकर बुधगुप्त ने कहा- “इसने।”

नायक ने कहा- “तो तुम्हें फिर बंदी बनाऊँगा।”

 

“किसके लिए? पोताध्यक्ष मणिभद्र अतल जल में होगा, नायक! अब इस नौका का स्वामी मैं हूँ।”

“तुम? जलदस्यु बुधगुप्त? कदापि नहीं।”—चौंककर नायक ने कहा और अपना कृपाण टटोलने लगा! चंपा ने इसके पहले उस पर अधिकार कर लिया था। वह क्रोध से उछल पड़ा।

 

“तो तुम द्वंद्व युद्ध के लिए प्रस्तुत हो जाओ; जो विजयी होगा, वह स्वामी होगा।”—इतना कहकर बुधगुप्त ने कृपाण देने का संकेत किया। चंपा ने कृपाण नायक के हाथ में दे दिया।

भीषण घात-प्रतिघात आरंभ हुआ। दोनों कुशल, दोनों त्वरित गति वाले थे। बड़ी निपुणता से बुधगुप्त ने अपना कृपाण दाँतों से पकड़कर अपने दोनों हाथ स्वतंत्र कर लिए। चंपा भय और विस्मय से देखने लगी। नाविक प्रसन्न हो गए। परंतु बुधगुप्त ने लाघव से नायक का कृपाण वाला हाथ पकड़ लिया और विकट हुँकार से दूसरा हाथ कटि में डाल, उसे गिरा दिया। दूसरे ही क्षण प्रभात की किरणों में बुधगुप्त का विजयी कृपाण हाथों में चमक उठा। नायक की कातर आँखें प्राण-भिक्षा माँगने लगीं।

 

बुधगुप्त ने कहा- “बोलो, अब स्वीकार है कि नहीं?”

“मैं अनुचर हूँ, वरुणदेव की शपथ। मैं विश्वासघात नहीं करूँगा।” बुधगुप्त ने उसे छोड़ दिया।

 

चंपा ने युवक जलदस्यु के समीप आकर उसके क्षतों को अपनी स्निग्ध दृष्टि और कोमल करों से वेदना विहीन कर दिया। बुधगुप्त के सुगठित शरीर पर रक्त-बिंदु विजय-तिलक कर रहे थे।

विश्राम लेकर बुधगुप्त ने पूछा- “हम लोग कहाँ होंगे?”

 

“बालीद्वीप से बहुत दूर, संभवत: एक नवीन द्वीप के पास, जिसमें अभी हम लोगों का बहुत कम आना-जाना होता है। सिंहल के वणिकों का वहाँ प्राधान्य है।”

“कितने दिनों में हम लोग वहाँ पहुँचेंगे?”

 

“अनुकूल पवन मिलने पर दो दिन में। तब तक के लिए खाद्य का अभाव न होगा।”

सहसा नायक ने नाविकों को डाँड़ लगाने की आज्ञा दी, और स्वयं पतवार पकड़कर बैठ गया। बुधगुप्त के पूछने पर उसने कहा- “यहाँ एक जलमग्न शैलखंड है। सावधान न रहने से नाव टकराने का भय है।”

 

(तीन)

“तुम्हें इन लोगों ने बंदी क्यों बनाया?”

 

“वणिक मणिभद्र की पाप-वासना ने।”

“तुम्हारा घर कहाँ है?”

 

“जाह्नवी के तट पर। चंपा-नगरी की एक क्षत्रिय बालिका हूँ। पिता इसी मणिभद्र के यहाँ प्रहरी का काम करते थे। माता का देहावसान हो जाने पर मैं भी पिता के साथ नाव पर ही रहने लगी। आठ बरस से समुद्र ही मेरा घर है। तुम्हारे आक्रमण के समय मेरे पिता ने ही सात दस्युओं को मारकर जल-समाधि ली। एक मास हुआ, मैं इस नील नभ के नीचे, नील जलनिधि के ऊपर, एक भयानक अनंतता में निस्सहाय हूँ, अनाथ हूँ। मणिभद्र ने मुझसे एक दिन घृणित प्रस्ताव किया। मैंने उसे गालियाँ सुनाईं। उसी दिन से बंदी बना दी गई।”—चंपा रोष से जल रही थी।

“मैं भी ताम्रलिप्ति का एक क्षत्रिय हूँ, चंपा! परंतु दुर्भाग्य से जलदस्यु बन कर जीवन बिताता हूँ। अब तुम क्या करोगी?”

 

“मैं अपने अदृष्ट को अनिर्दिष्ट ही रहने दूँगी। वह जहाँ ले जाए।”—चंपा की आँखें निस्सीम प्रदेश में निरुद्देश्य थी। किसी आकांक्षा के लाल डोरे न थे। धवल अपांगों में बालकों के सदृश विश्वास था। हत्या-व्यवसायी दस्यु भी उसे देखकर काँप गया। उसके मन में एक सम्भ्रमपूर्ण श्रद्धा यौवन की पहली लहरों को जगाने लगी। समुद्र-वक्ष पर विलंबमयी राग-रंजित संध्या थिरकने लगी। चंपा के असंयत कुंतल उसकी पीठ पर बिखरे थे। दुर्दांत दस्यु ने देखा, अपनी महिमा में अलौकिक एक तरुण बालिका! वह विस्मय से अपने हृदय को टटोलने लगा। उसे एक नई वस्तु का पता चला। वह थी— कोमलता!

उसी समय नायक ने कहा- “हम लोग द्वीप के पास पहुँच गए।”

 

बेला से नाव टकराई। चंपा निर्भीकता से कूद पड़ी। माँझी भी उतरे। बुधगुप्त ने कहा- “जब इसका कोई नाम नहीं है, तो हम लोग इसे चंपा-द्वीप कहेंगे।”

चंपा हँस पड़ी।

 

(चार)

पाँच बरस बाद—

 

शरद के धवल नक्षत्र नील गगन में झलमला रहे थे। चंद्र की उज्ज्वल विजय पर अंतरिक्ष में शरदलक्ष्मी ने आशीर्वाद के फूलों और खीलों को बिखेर दिया।

चंपा के एक उच्चसौध पर बैठी हुई तरुणी चंपा दीपक जला रही थी। बड़े यत्न से अभ्रक की मंजूषा में दीप धरकर उसने अपनी सुकुमार उँगलियों से डोरी खींची। वह दीपाधार ऊपर चढ़ने लगा। भोली-भोली आँखें उसे ऊपर चढ़ते बड़े हर्ष से देख रही थीं। डोरी धीरे-धीरे खींची गई। चंपा की कामना थी कि उसका आकाश-दीप नक्षत्रों से हिलमिल जाए; किंतु वैसा होना असंभव था। उसने आशाभरी आँखें फिरा लीं।

 

सामने जल-राशि का रजत शृंगार था। वरुण बालिकाओं के लिए लहरों से हीरे और नीलम की क्रीड़ा शैल-मालाएँ बन रही थीं और वे मायाविनी छलनाएँ अपनी हँसी का कलनाद छोड़कर छिप जाती थीं। दूर-दूर से धीवरों का वंशी-झनकार उनके संगीत-सा मुखरित होता था। चंपा ने देखा कि तरल संकुल जल-राशि में उसके कंडील का प्रतिबिंब अस्त-व्यस्त था! वह अपनी पूर्णता के लिए सैकड़ों चक्कर काटता था। वह अनमनी होकर उठ खड़ी हुई। किसी को पास न देखकर पुकारा—“जया!”

एक श्यामा युवती सामने आकर खड़ी हुई। वह जंगली थी। नील नभोमंडल के मुख में शुद्ध नक्षत्रों की पंक्ति के समान उसके दाँत हँसते ही रहते। वह चंपा को रानी कहती; बुधगुप्त की आज्ञा थी।

 

“महानाविक कब तक आवेंगे, बाहर पूछो तो।” चंपा ने कहा। जया चली गई।

दूरागत पवन चंपा के अँचल में विश्राम लेना चाहता था। उसके हृदय में गुदगुदी हो रही थी। आज न जाने क्यों वह बेसुध थी। वह दीर्घकाल दृढ़ पुरुष ने उसकी पीठ पर हाथ रख चमत्कृत कर दिया। उसने फिरकर कहा- “बुधगुप्त!”

 

“बावली हो क्या? यहाँ बैठी हुई अभी तक दीप जला रही हो, तुम्हें यह काम करना है?”

“क्षीरनिधिशायी अनंत की प्रसन्नता के लिए क्या दासियों से आकाश-दीप जलवाऊँ?”

 

“हँसी आती है। तुम किसको दीप जलाकर पथ दिखलाना चाहती हो? उसको, जिसको तुमने भगवान् मान लिया है?”

“हाँ, वह भी कभी भटकते हैं, भूलते हैं, नहीं तो, बुधगुप्त को इतना ऐश्वर्य क्यों देते?”

 

“तो बुरा क्या हुआ, इस द्वीप की अधीश्वरी चंपा रानी?”

“मुझे इस बंदी-गृह से मुक्त करो। अब तो बाली, जावा और सुमात्रा का वाणिज्य केवल तुम्हारे ही अधिकार में है महानाविक! परंतु मुझे उन दिनों की स्मृति सुहावनी लगती है, जब तुम्हारे पास एक ही नाव थी और चंपा के उपकूल में पण्य लादकर हम लोग सुखी जीवन बिताते थे, इस जल में अगणित बार हम लोगों की तरी आलोकमय प्रभात में तारिकाओं की मधुर ज्योति में थिरकती थी। बुधगुप्त! उस विजन अनंत में जब माँझी सो जाते थे, दीपक बुझ जाते थे, हम-तुम परिश्रम से थककर पालों में शरीर लपेटकर एक-दूसरे का मुँह क्यों देखते थे? वह नक्षत्रों की मधुर छाया...”

 

“तो चंपा! अब उससे भी अच्छे ढंग से हम लोग विचर सकते हैं। तुम मेरी प्राणदात्री हो, मेरी सर्वस्व हो।”

“नहीं-नहीं, तुमने दस्युवृत्ति छोड़ दी परंतु हृदय वैसा ही अकरुण, सतृष्ण और ज्वलनशील है। तुम भगवान के नाम पर हँसी उड़ाते हो। मेरे आकाश-दीप पर व्यंग कर रहे हो, नाविक! उस प्रचंड आँधी में प्रकाश की एक-एक किरण के लिए हम लोग कितने व्याकुल थे। मुझे स्मरण है, जब मैं छोटी थी, मेरे पिता नौकरी पर समुद्र में जाते थे—मेरी माता, मिट्टी का दीपक बाँस की पिटारी में भागीरथी के तट पर बाँस के साथ ऊँचे टाँग देती थी। उस समय वह प्रार्थना करती- ‘भगवान! मेरे पथ-भ्रष्ट नाविक को अंधकार में ठीक पथ पर ले चलना।’ और जब मेरे पिता बरसों पर लौटते तो कहते- ‘साध्वी! तेरी प्रार्थना से भगवान् ने संकटों में मेरी रक्षा की है।’ वह गद्गद हो जाती। मेरी माँ? आह नाविक! यह उसी की पुण्य-स्मृति है। मेरे पिता, वीर पिता की मृत्यु के निष्ठुर कारण, जलदस्यु! हट जाओ।”—सहसा चंपा का मुख क्रोध से भीषण होकर रंग बदलने लगा। महानाविक ने कभी यह रूप न देखा था। वह ठठाकर हँस पड़ा।

 

“यह क्या, चंपा? तुम अस्वस्थ हो जाओगी, सो रहो।”—कहता हुआ चला गया। चंपा मुठ्ठी बाँधे उन्मादिनी-सी घूमती रही।

(पाँच)

 

निर्जन समुद्र के उपकूल में वेला से टकराकर लहरें बिखर जाती थीं। पश्चिम का पथिक थक गया था। उसका मुख पीला पड़ गया। अपनी शांत गंभीर हलचल में जलनिधि विचार में निमग्न था। वह जैसे प्रकाश की उन्मलिन किरणों से विरक्त था।

चंपा और जया धीरे-धीरे उस तट पर आकर खड़ी हो गईं। तरंग से उठते हुए पवन ने उनके वसन को अस्त-व्यस्त कर दिया। जया के संकेत से एक छोटी-सी नौका आई। दोनों के उस पर बैठते ही नाविक उतर गया। जया नाव खेने लगी। चंपा मुग्ध-सी समुद्र के उदास वातावरण में अपने को मिश्रित कर देना चाहती थी।

 

“इतना जल! इतनी शीतलता! हृदय की प्यास न बुझी। पी सकूँगी? नहीं! तो जैसे वेला में चोट खाकर सिंधु चिल्ला उठता है, उसी के समान रोदन करूँ? या जलते हुए स्वर्ण-गोलक सदृश अनंत जल में डूबकर बुझ जाऊँ?”—चंपा के देखते-देखते पीड़ा और ज्वलन से आरक्त बिंब धीरे-धीरे सिंधु में चौथाई-आधा, फिर संपूर्ण विलीन हो गया। एक दीर्घ निश्वास लेकर चंपा ने मुँह फेर लिया। देखा, तो महानाविक का बजरा उसके पास है। बुधगुप्त ने झुककर हाथ बढ़ाया। चंपा उसके सहारे बजरे पर चढ़ गर्इ। दोनों पास-पास बैठ गए।

“इतनी छोटी नाव पर इधर घूमना ठीक नहीं। पास ही वह जलमग्न शैल खंड है। कहीं नाव टकरा जाती या ऊपर चढ़ जाती, चंपा तो?”

 

“अच्छा होता, बुधगुप्त! जल में बंदी होना कठोर प्राचीरों से तो अच्छा है।”

आह चंपा, तुम कितनी निर्दय हो! बुधगुप्त को आज्ञा देकर देखो तो, वह क्या नहीं कर सकता। जो तुम्हारे लिए नए द्वीप की सृष्टि कर सकता है, नई प्रजा खोज सकता है, नए राज्य बना सकता है, उसकी परीक्षा लेकर देखो तो...। कहो, चंपा! वह कृपाण से अपना हृदय-पिंड निकाल अपने हाथों अतल जल में विसर्जन कर दे।”—महानाविक—जिसके नाम से बाली, जावा और चंपा का आकाश गूँजता था, पवन थर्राता था, घुटनों के बल चंपा के सामने छलछलाई आँखों से बैठा था।

 

सामने शैलमाला की चोटी पर हरियाली में विस्तृत जल-देश में, नील पिंगल संध्या, प्रकृति की सहृदय कल्पना, विश्राम की शीतल छाया, स्वप्नलोक का सृजन करने लगी। उस मोहिनी के रहस्यपूर्ण नीलजाल का कुहक स्फुट हो उठा। जैसे मदिरा से सारा अंतरिक्ष सिक्त हो गया। सृष्टि नील कमलों में भर उठी। उस सौरभ से पागल चंपा ने बुधगुप्त के दोनों हाथ पकड़ लिए। वहाँ एक आलिंगन हुआ, जैसे क्षितिज में आकाश और सिंधु का। किंतु उस परिरंभ में सहसा चैतन्य होकर चंपा ने अपनी कंचुकी से एक कृपाण निकाल लिया।

“बुधगुप्त! आज मैं अपने प्रतिशोध का कृपाण अतल जल में डुबा देती हूँ। हृदय ने छल किया, बार-बार धोखा दिया!”—चमककर वह कृपाण समुद्र का हृदय बेधता हुआ विलीन हो गया।

 

“तो आज से मैं विश्वास करूँ, क्षमा कर दिया गया?”—आश्चर्यचकित कंपित कंठ से महानाविक ने पूछा।

'विश्वास? कदापि नहीं, बुधगुप्त! जब मैं अपने हृदय पर विश्वास नहीं कर सकी, उसी ने धोखा दिया, तब मैं कैसे कहूँ? मैं तुम्हें घृणा करती हूँ, फिर भी तुम्हारे लिए मर सकती हूँ। अँधेर है जलदस्यु। तुम्हें प्यार करती हूँ।” चंपा रो पड़ी।

 

वह स्वप्नों की रंगीन संध्या, तम से अपनी आँखें बंद करने लगी थी। दीर्घ निश्वास लेकर महानाविक ने कहा- “इस जीवन की पुण्यतम घड़ी की स्मृति में एक प्रकाश-गृह बनाऊँगा, चंपा! चंपा यहीं उस पहाड़ी पर। संभव है कि मेरे जीवन की धुँधली संध्या उससे आलोकपूर्ण हो जाए।”

(छः)

 

चंपा के दूसरे भाग में एक मनोरम शैलमाला थी। वह बहुत दूर तक सिंधु-जल में निमग्न थी। सागर का चंचल जल उस पर उछलता हुआ उसे छिपाए था। आज उसी शैलमाला पर चंपा के आदि-निवासियों का समारोह था। उन सबों ने चंपा को वनदेवी-सा सजाया था। ताम्रलिप्ति के बहुत से सैनिक नाविकों की श्रेणी में वन-कुसुम-विभूषिता चंपा शिविकारूढ़ होकर जा रही थी।

शैल के एक उँचे शिखर पर चंपा के नाविकों को सावधान करने के लिए सुदृढ़ दीप-स्तंभ बनवाया गया था। आज उसी का महोत्सव है। बुधगुप्त स्तंभ के द्वार पर खड़ा था। शिविका से सहायता देकर चंपा को उसने उतारा। दोनों ने भीतर पदार्पण किया था कि बाँसुरी और ढोल बजने लगे। पंक्तियों में कुसुम-भूषण से सजी वन-बालाएँ फूल उछालती हुई नाचने लगीं।

 

दीप-स्तंभ की ऊपरी खिड़की से यह देखती हुई चंपा ने जया से पूछा- “यह क्या है जया? इतनी बालिकाएँ कहाँ से बटोर लाईं?”

“आज रानी का ब्याह है न?”—कहकर जया ने हँस दिया।

 

बुधगुप्त विस्तृत जलनिधि की ओर देख रहा था। उसे झकझोरकर चंपा ने पूछा- “क्या यह सच है?”

“यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो यह सच भी हो सकता है, चंपा! कितने वर्षों से मैं ज्वालामुखी को अपनी छाती में दबाए हूँ।”

 

“चुप रहो, महानाविक! क्या मुझे निस्सहाय और कंगाल जानकर तुमने आज सब प्रतिशोध लेना चाहा?”

“मैं तुम्हारे पिता का घातक नहीं हूँ, चंपा! वह एक दूसरे दस्यु के शस्त्र से मरे।”

 

“मैं इसका विश्वास कर सकती। बुधगुप्त, वह दिन कितना सुंदर होता, वह क्षण कितना स्पृहणीय! आह! तुम इस निष्ठुरता में भी कितने महान होते।”

जया नीचे चली गई थी। स्तंभ के संकीर्ण प्रकोष्ठ में बुधगुप्त और चंपा एकांत में एक दूसरे के सामने बैठे थे।

 

बुधगुप्त ने चंपा के पैर पकड़ लिए। उच्छ्वसित शब्दों में वह कहने लगा- “चंपा, हम लोग जन्मभूमि-भारतवर्ष से कितनी दूर इन निरीह प्राणियों में इंद्र और शची के समान पूजित हैं। पर न जाने कौन अभिशाप हम लोगों को अभी तक अलग किए है। स्मरण होता है वह दार्शनिकों का देश! वह महिमा की प्रतिमा! मुझे वह स्मृति नित्य आकर्षित करती है; परंतु मैं क्यों नहीं जाता? जानती हो, इतना महत्त्व प्राप्त करने पर भी मैं कंगाल हूँ! मेरा पत्थर-सा हृदय एक दिन सहसा तुम्हारे स्पर्श से चन्द्रकांतमणि की तरह द्रवित हुआ।

चंपा! मैं ईश्वर को नहीं मानता, मैं पाप को नहीं मानता, मैं दया को नहीं समझ सकता, मैं उस लोक में विश्वास नहीं करता। पर मुझे अपने हृदय के एक दुर्बल अंश पर श्रद्धा हो चली है। तुम न जाने कैसे एक बहकी हुई तारिका के समान मेरे शून्य में उदित हो गई हो। आलोक की एक कोमल रेखा इस निविड़तम में मुस्कुराने लगी। पशु-बल और धन के उपासक के मन में किसी शांत और एकांत कामना की हँसी खिलखिलाने लगी; पर मैं न हँस सका!

 

चलोगी चंपा? पोतवाहिनी पर असंख्य धनराशि लादकर राजरानी-सी जन्मभूमि के अंक में? आज हमारा परिणय हो, कल ही हम लोग भारत के लिए प्रस्थान करें। महानाविक बुधगुप्त की आज्ञा सिंधु की लहरें मानती हैं। वे स्वयं उस पोत-पुंज को दक्षिण पवन के समान भारत में पहुँचा देंगी। आह चंपा! चलो।”

चंपा ने उसके हाथ पकड़ लिए। किसी आकस्मिक झटके ने एक पलभर के लिए दोनों के अधरों को मिला दिया। सहसा चैतन्य होकर चंपा ने कहा- “बुधगुप्त! मेरे लिए सब भूमि मिट्टी है; सब जल तरल है; सब पवन शीतल है। कोई विशेष आकांक्षा हृदय में अग्नि के समान प्रज्वलित नहीं। सब मिलाकर मेरे लिए एक शून्य है। प्रिय नाविक! तुम स्वदेश लौट जाओ, विभवों का सुख भोगने के लिए, और मुझे, छोड़ दो इन निरीह भोले-भाले प्राणियों के दु:ख की सहानुभूति और सेवा के लिए।”

 

“तब मैं अवश्य चला जाऊँगा, चंपा! यहाँ रहकर मैं अपने हृदय पर अधिकार रख सकूँ— इसमें संदेह है। आह! उन लहरों में मेरा विनाश हो जाए।”—महानाविक के उच्छ्वास में विकलता थी। फिर उसने पूछ- “तुम अकेली यहाँ क्या करोगी?”

“पहले विचार था कि कभी-कभी इस दीप-स्तंभ पर से आलोक जलाकर अपने पिता की समाधि का इस जल से अन्वेषण करूँगी। किंतु देखती हूँ, मुझे भी इसी में जलना होगा, जैसे आकाश-दीप।”

 

(सात)

एक दिन स्वर्ण-रहस्य के प्रभात में चंपा ने अपने दीप-स्तंभ पर से देखा—सामुद्रिक नावों की एक श्रेणी चंपा का उपकूल छोड़कर पश्चिम-उत्तर की ओर महा जल-व्याल के समान संतरण कर रही है। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।

 

यह कितनी ही शताब्दियों पहले की कथा है। चंपा आजीवन उस दीप-स्तंभ में आलोक जलाती रही। किंतु उसके बाद भी बहुत दिन, दीपनिवासी, उस माया-ममता और स्नेह-सेवा की देवी की समाधि-सदृश पूजा करते थे।

एक दिन काल के कठोर हाथों ने उसे भी अपनी चंचलता से गिरा दिया।

 

जयशंकर प्रसाद

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बुधवार, 8 अगस्त 2012

हेमधर शर्मा के कविता संग्रह ‘मां के लिये’ का लोकार्पण समारोह



हर कवि अपने अनुभव जगत के सहारे रचनाओं में अपना समाज बनाता है. युवा कवियों उमेश और हेमधर ने भी कविताओं में अपने अनुभवों को प्रामाणिकता के साथ रखा है. महत्वपूर्ण यह है कि ऐसा करते हुए वे आत्ममुग्धता का शिकार नहीं हुए हैं. यही चीज उनकी कविताओं को सार्वजनीन बनाती है. यह बात प्रतिष्ठित कवि एवं महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के प्रति कुलपति श्री ए. अरविंदाक्षन ने कही. वे हेमधर शर्मा  के कविता संग्रह ‘मां के लिये’ और उमेश यादव के कविता संग्रह ‘अम्मी के घर आना परी’ के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए बोल रहे थे.

रविवार 5 अगस्त को नागपुर के पत्रकार भवन में ‘फाल्गुन विश्व’ की ओर से आयोजित कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि के रूप में कथाकार जयशंकर सहित वक्ता के रूप में कला समीक्षक गोपाल नायडू तथा लेखिका डॉ. गीता सिंह की उपस्थिति थी.

आरंभ में डॉ. गीता सिंह ने हेमधर शर्मा और गोपाल नायडू ने उमेश यादव के काव्य संग्रह की विस्तृत समीक्षा की. जयशंकर ने कहा दोनों युवा कवियों की रचनाओं में उनके स्वभाव की ही तरह निर्मलता और विनम्रता है. उनकी प्रामाणिकता कविता के भविष्य के प्रति आशा जगाती है. साथ ही उन्होंने दोनों कवियों को खूब अध्ययन करते हुए अपने पूर्ववर्ती देशी-विदेशी कवियों के अनुभव से लाभ उठाने की सलाह दी.

कार्यक्रम का संचालन साप्ताहिक ‘फाल्गुन विश्व’ के संपादक पुष्पेंद्र फाल्गुन ने किया. कार्यक्रम में दोनों कविता संग्रहों के आवरण के चित्रकार सुभाष तुलसीता एवं मुद्रक रवि शेंडे का शाल-श्रीफल एवं पुष्पगुच्छ देकर सम्मान किया गया. इस अवसर पर वरिष्ठ सम्पादक प्रकाश चंद्रायण, युवा कवि बसंत त्रिपाठी, कथाकार मनोज रूपड़ा, कवि डॉ. लोकेंद्र सिंह सहित शहर के बुद्धिजीवी उपस्थित थे.



सोमवार, 30 जुलाई 2012

पत्नी ने उलाहने भरे स्वर में कहा, 'अगर तुम अक्ल से काम लेते तो हर महीने इतनी बचत कर लेते कि मेरे लिए कम से कम दो साड़ियां अवश्य खरीद लेते।'
पति ने मुस्कुरा के जवाब दिया,'अगर मैं अक्ल से काम लेता तो मुझे साड़ियां खरीदने की कभी नौबत ही नहीं आती।'

ससुर और असुर

रितेश: पत्नी के पिता को हम ससुर कहते हैं तो गर्लफ्रेंड के पिता को क्या कहेंगे?
मितेश: अगर शादी के लिए 'हां' कर दे तो ससुर और 'ना' कर दे तो असुर!!!

उसने आत्महत्या कर ली

टीचर: 'उसने आत्महत्या कर ली' और 'उसे आत्महत्या करनी पड़ी', दोनों का अंतर बताओ।
छात्र: पहला बेरोजगार था और दूसरा शादीशुदा!!!

काश तुम मेसेज होते!

गर्लफ्रेंड: जानू, काश तुम मेसेज होते! मैं तुमको सेव करके रखती और जब चाहे पढ़ती।
बॉयफ्रेंड: कंजूस कहीं की। सेव करके ही रखती या किसी सहेली को फॉरवर्ड भी करती।

सिर्फ दोस्‍त नहीं होता

अपनी बेटी को घर छोड़ने आए लड़के को देख, लड़की की मां ने पूछा, ' तुम्‍हारा मेरी बेटी से क्‍या रिश्‍ता है?'
लड़का : हम दोनों सिर्फ अच्‍छे दोस्‍त हैं।
मां : बेटा, हमने दुनिया देखी है, दो लीटर पेट्रोल जला कर लड़की को घर छोड़ने आने वाला सिर्फ दोस्‍त नहीं होता।

शनिवार, 21 जुलाई 2012

गाँव में बिजली


दिन भर खेतों में काम करके 
मिटाने अपनी थकान 
लोग बैठा करते थे शाम को 
गाँव की चौपाल में 
या बरगद या नीम के पेड़ के नीचे 
बने हुए कच्चे चबूतरों पर 
और होती थी आपस में 
सुख-दुःख की बातें
और हो जाती थी कुछ 
हंसी-ठिठोली भी 
महिलायें भी मिल लेती थीं आपस में 
पनघट पर पानी भरने के बहाने 
और कर लेती थीं साझा
अपना-अपना सुख-दुःख
मगर अब गाँव में 
बिजली आ जाने से   
बदल गए हैं हालात 
और सूने से रहने लगे हैं 
चौपाल और चबूतरे
अब नहीं होती हैं पनघट पर 
आपस में सुख-दुःख की बातें 
गाँव में बिजली आ जाने से 
अब आ गए हैं टेलीविजन 
लग गए हैं नल भी अब घरों में 
ख़त्म हो गए हैं बहाने 
अब घर से निकलने के 
गर्मी लगने पर चला लेते हैं पंखे 
नहीं बैठते नीम के पेड़ के नीचे
फुर्सत भी अब किसे है
किसी के पास बैठने की 
अब टी वी पर आते हैं इतने प्रोग्राम 
चौपाल जाने की जरूरत ही नहीं लगती 
पहले होली पर जहाँ 
गाये जाते थे फाग-गीत 
और जाते थे लोग 
एक-दूसरे के घर मिलने 
होली के बहाने 
अब रहते हैं अपने ही घरों में 
बजा लेते हैं लाउडस्पीकर 
पर ही फाग-गीत 
और अगर कोई गाना भी चाहे
तो दबकर रह जाती है उसकी आवाज़ 
बेतहाशा बजते हुए कानफोडू 
लाउडस्पीकर के बीच 
सचमुच बिजली आने से
कितना बदल गया है हमारा गाँव- कृष्ण धर शर्मा 2012

सड़क मेरे गाँव में

आखिर सड़क आ ही गई मेरे भी गाँव में 
जहाँ पर गूंजती थी अभी तक 
कोयल की कूकें और चिड़ियों की चहचहाहट
महकता था सारा गाँव आम की बौरों 
और महुए की मदमस्त खुशबू से 
सुनाई देती हैं अब वहां 
बेलगाम वाहनों और कानफोडू हार्न
की कर्कश आवाजें 
सुरमई वातावरण में फैली है अब 
डीजल और पेट्रोल की खुशबू!
अब दब जाती है कोयल की कूकें 
और चरवाहे की बांसुरी की तान भी 
लद गए हैं दिन बैलगाड़ी के भी 
जिस पर बैठ कर गाये जाते थे लोकगीत 
बाजार-हाट या कहीं नाते-रिश्तेदारी जाते हुए 
आसान तो बहुत हो गया जीवन अब 
चुकानी पड़ी है मगर कीमत भी हमें 
अपने मूल्यों की तिलांजलि देकर-  कृष्ण धर शर्मा 2012  

शनिवार, 7 जुलाई 2012

क्यूबा:शिक्षा की क्रांति और क्रांति की शिक्षा

भारत व अन्य देशों में 'काम और शिक्षा' के नाम पर मात्र पूंजीवाद के लिए कुशल मजदूर तैयार करने की मंशा होती है। दरअसल इन नए सुधारों  व प्रयोगों से क्यूबा की शिक्षा गांधी की 'नयी तालीम' की भावना के नजदीक हो चली है। क्यूबा अब खेती (जैविक खेती, खेती में मशीनों की जगह घोड़ों-बैलों का उपयोग आदि) की तरह शिक्षा में भी जो प्रयोग कर रहा है, वे हमें जाने-अनजाने मार्क्स और गांधी के एक अद्भुत मेल की तरफ  ले जा रहे हैं।
क्यूबा ने आज स्वयं को एक ऐसे देश में परिवर्तित कर लिया है, जो तीसरी दुनिया के देशों के लिए आदर्श है। शिक्षा को क्रांति का माध्यम बनाने की सोच ने यह साबित कर दिया है कि किस तरह एक देश पूर्ण शिक्षित होकर अपने अनुरूप समाज तैयार कर सकता है।
क्यूबा आधुनिक पूंजीवादी युग का एक चमत्कार है। उत्तरी और दक्षिणी अमरीका महाद्वीपों के बीच एक छोटे से द्वीप में स्थित यह देश दुनिया की सबसे बड़ी पूंजीवादी-साम्रायवादी महाशक्ति संयुक्त राय अमरीका के बिलकुल बगल में स्थित है और पिछले 53 वर्षों से उसके विरोध, प्रतिबंधों, आर्थिक घेराबंदी तथा प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हमलों के बावजूद वहां एक साम्यवादी व्यवस्था चली आ रही है।
सन् 1959 में वहां क्रांति हुई और फिदेल कास्त्रो क्रांति से लेकर अब तक वहां के निर्विवाद करिश्माई नेता रहे हैं। हालांकि अस्वस्थता के कारण कुछ समय से उन्होंने राष्ट्रपति पद अपने भाई राउल कास्त्रो को सौंप दिया है। ांति के साथ ही वहां निजी संपत्ति की संस्था को खतम कर दिया गया था (कुछ समय से बहुत सीमित रुप में खेती और मकान के रुप में निजी संपत्ति की शुरुआत हुई है) पूरी अर्थव्यवस्था का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया था और वहां एक ही पार्टी का शासन है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास आदि की जिम्मेदारी पूरी तरह सरकार की है और इस क्षेत्र में क्यूबा की उपलब्धियां गजब की हैं। डॉक्टर-आबादी अनुपात (प्रति दस हजार आबादी पर डॉक्टरों की संख्या) वहां पूरी दुनिया में सबसे अच्छा है और वहां की स्वास्थ्य सेवाएं दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मानी गई हैं।
क्रांति के समय शिक्षा के नजरिये से क्यूबा की हालत बहुत खराब थी। आधे से भी कम बच्चे स्कूल जाते थे। देश का औसत शैक्षिक स्तर तीसरी कक्षा से भी कम था। एक तरफ हजारों कक्षाओं में शिक्षक नहीं थे, दूसरी तरफ हजारों शिक्षक बेरोजगार घूम रहे थे। क्रांति के बाद शिक्षा नयी ांतिकारी सरकार की पहली प्राथमिकता बनी। युध्द स्तर पर साक्षरता अभियान चला जो दुनिया का सबसे तेज व सफल साक्षरता अभियान था। एक लाख से यादा  स्वयंसेवक लालटेन और साक्षरता की किताबें लेकर सुदूर इलाकों में पहुंचे और दो साल के बाद 1961 में संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूनेस्को ने प्रमाणित किया कि क्यूबा का हर नागरिक पढ़ना-लिखना सीख चुका है। क्यूबा के शिक्षकों ने पढ़ना-लिखना सीखने के लिए एक नयी पध्दति विकसित की है जिसे 'हां, मैं कर सकता हूं'  नाम दिया गया है। यह ब्राजील के क्रांतिकारी शिक्षाशास्त्री पालो फ्रेरे के विचारों पर आधारित है जिसमें स्थानीय लोगों के कामों व जरुरतों से जोड़कर, उनके साथ मिलकर, उन्हें 'शब्द और विश्व' को पढ़ना सिखाया जाता है। इसी का एक सफल प्रयोग हाल में वेनेजुएला में हुआ है जिसे भी यूनेस्को ने निरक्षरता-मुक्त देश घोषित कर दिया है। बोलीविया, निकारागुआ, हैती, इक्वेडोर आदि 20 देशों में क्यूबा की मदद से साक्षरता कार्यम चल रहे हैं।
दो साल में शत-प्रतिशत साक्षरता हासिल करने के बाद क्यूबा ने लक्ष्य रखा कि देश का हर व्यक्ति कम से कम प्राथमिक शिक्षा हासिल करे। विभिन्न पाठयपुस्तकों की लाखों प्रतियां छापी गई, जिन्हें बहुत ही सस्ती कीमतों पर उपलब्ध कराया गया। हर जगह स्कूल खोले गए और हजारों शिक्षकों की नियुक्ति की गई। फिर माध्यमिक व उच्च शिक्षा पर जोर दिया गया। सबको शिक्षित करने का यह काम साम्यवादी क्यूबा के लिए यादा मुश्किल भी था। संयुक्त राय अमरीका के बहिष्कार व प्रतिबंधों के कारण क्यूबा को कागज, उपकरण, भवन निर्माण सामग्री एवं अन्य शैक्षणिक सामग्री दूर-दराज के देशों से अधिक लागत पर आयात करनी पड़ी। संयुक्त राष्ट्र संघ ने दुनिया के हिस्सों के लिए शिक्षा व साक्षरता के संबंध में जो 'सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य' तय किए हैं, वे क्यूबा में आधी सदी पहले हासिल कर लिए गए थे।
उच्च शिक्षा में भी क्यूबा ने 'सबके लिए विश्वविद्यालय' कार्यम चलाया है। क्रांति के तुरंत बाद राजधानी हवाना में अमीरों (जो देश छोड़कर भाग गए थे) के आलीशान भवनों को गरीब विद्यार्थियों के छात्रावासों में बदल दिया गया। आज भी वे छात्रावास चल रहे हैं। गरीबी के कारण उच्च शिक्षा बीच में छोड़ने वाले विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्तियां शुरु करने का काम क्रांतिकारी सरकार के शुरुआती कदमों में ही था। शिक्षा के तरीकों, पाठयमों और पाठयपुस्तकों को भी नए सिरे से रचा गया।
चिकित्सा शिक्षा नयी शिक्षा व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। क्रांति के समय देश में एक ही चिकित्सा महाविद्यालय (राजधानी हवाना में) था और देश के छ: हजार डॉक्टरों में से आधे संयुक्त राय अमरीका चले गए थे। आज क्यूबा के हर प्रांत में कम से कम एक विश्वविद्यालय और एक चिकित्सा महाविद्यालय है। चिकित्सा शिक्षा पूरी तरह मुफ्त है और देश की चिकित्सा सेवाएं भी देश के हर हिस्से में व हर नागरिक के लिए पूरी तरह मुफ्त हैं। क्यूबा के लाखों डॉक्टर दुनिया के अन्य देशों में भी मुफ्त सेवाएं देते हैं। हवाना के पश्चिम में एक 'लातीनी अमरीकी चिकित्सा विद्यालय' भी खोला गया है, जिसमें दूसरे देशों के युवाओं को चिकित्सा शिक्षा दी जाती है। क्यूबा ने चिकित्सा में अनुसंधान केन्द्र भी खोले हैं, जिन्होंने टीकों, दवाईयों और चिकित्सा उपकरणों की खोज, उत्पादन व निर्यात का महत्वपूर्ण काम किया है।
हवाना में हर साल लातीनी अमरीका और दुनिया के अन्य हिस्सों से शिक्षाविद इकट्ठे होते हैं जो दुनिया की शिक्षा में आ रही चुनौतियों व समस्याओं पर चर्चा करते हैं। पिछले दो दशकों से क्यूबा के हर हिस्से में पुस्तक मेले आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें लाखों लोग भाग लेते हैं। इनमें सस्ती किताबों की बिी के साथ लेखकों व कलाकारों के साथ संवाद भी होता है। क्यूबा के पांच  राष्ट्रीय टीवी चैनलों में से दो शिक्षा को समर्पित हैं। जबरदस्त संकट या बहिष्कार ने क्यूबा के शासकों, बुध्दिजीवियों और आम लोगों को कई चीजों पर नए सिरे से विचार करने, समीक्षा करने और नए प्रयोग करने को मजबूर किया। इसमें शिक्षा भी शामिल थी। किन्तु शिक्षा की पध्दति और विषय सामग्री पर जरुर पुनर्विचार हुआ। 1986 से ही महसूस और मंजूर किया जाने लगा था कि शिक्षा में सोवियत संघ का अनुकरण करने से नकारात्मक प्रवृत्तियां पैदा हो रही हैं तथा अराजनीतिकरण हो रहा है और उसमें रटने, ज्ञान को ठूंसने तथा परीक्षा-परिणामों पर बहुत जोर दिया जा रहा था। कक्षाएं कुछ अधिनायकवादी बन गई थीं और पढ़ाई रस्मी बनने लगी थी। कक्षा और समाज के बीच भी अंतर्विरोध दिखाई दे रहे थे। इन सब की आलोचना व समीक्षा हुई। इसके बाद क्यूबा लातीनी अमरीकी क्रांतिकारी चेग्वारा (जिसकी क्यूबा की क्रांति में भी महत्वपूर्ण भूमिका थी) की ओर मुड़ा, जो कि शिक्षा को मुक्ति का बुनियादी पहलू मानते थे और इंसान की रचनात्मक व मानवीय क्षमताओं के खिलने एवं विकसित होने की कुंजी मानते थे। अब क्यूबा में शिक्षण के रचनात्मक तरीके अपनाने तथा शिक्षा में विद्यार्थियों, शिक्षकों और लोगों की सयि भागीदारी पर जोर दिया जा रहा है। शिक्षा की वैचारिक-राजनैतिक भूमिका पर भी जोर है, किन्तु नारों और समाजवादी मूल्यों की रस्मी अनालोचनात्मक घुट्टी पिलाने के बजाय आग्रह है कि कक्षाओं में इन पर बहस हो, इन मूल्यों पर अमल हो तथा विद्यार्थी इन्हें गहराई से सीखें। शैक्षणिक प्रशासन का विकेन्द्रीकरण भी किया जा रहा है और स्कूलों को ज्यादा स्वायत्तता दी जा रही है। क्यूबा में शिक्षा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग पढ़ाई और काम, ज्ञान और श्रम, स्कूल व समाज के समन्वय का चल रहा है। इसके तहत शिक्षा को सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ने की कोशिश होती है। विद्यार्थियों को कक्षा के अंदर व बाहर कई तरह के सामाजिक कामों में लगाया जाता है जैसे हवाना को डेंगू-मच्छरों से मुक्त करने के अभियान में भागीदारी, जुलाई माह में तूफानी मौसम से पहले की बचाव तैयारियों में भाग लेना, पुस्तकों की मरम्मत, स्कूल व नगर की सफाई आदि।
भारत व अन्य देशों में 'काम और शिक्षा' के नाम पर मात्र पूंजीवाद के लिए कुशल मजदूर तैयार करने की मंशा होती है। दरअसल इन नए सुधारों  व प्रयोगों से क्यूबा की शिक्षा गांधी की 'नयी तालीम' की भावना के नजदीक हो चली है। क्यूबा अब खेती (जैविक खेती, खेती में मशीनों की जगह घोड़ों-बैलों का उपयोग आदि) की तरह शिक्षा में भी जो प्रयोग कर रहा है, वे हमें जाने-अनजाने मार्क्स और गांधी के एक अद्भुत मेल की तरफ ले जा रहे हैं।
(सुनील)
(शिक्षा से अर्थशास्त्री सुनील मध्यप्रदेश में होशंगाबाद जिले के केसला आदिवासी क्षेत्र में 'किसान आदिवासी संगठन' एवं समाजवादी जन परिषद के साथ पिछले कई वर्षों से सयि रहने के अलावा लगातार आर्थिक एवं अन्य सम-सामयिक विषयों पर लिखते रहते हैं।)
 साभार- देशबन्धु परिशिष्ट अवकाश अंक

सोमवार, 18 जून 2012

क्योँकि विकेट कीपर ठाकुर था

शोले की टीम ने IPL मेँ हिस्सा लिया !
गब्बर के गेँदबाजोँ ने 20 ओवर मे 10 रन
दिये और एक्स्ट्रा मेँ 250 रन दिये !
क्योँ ??
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नही पता..
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क्योँकि विकेट कीपर ठाकुर था !/?/?

Girl- "मैं तुमसे I Love You कहूँ तो तुम
क्या करोगे?".. 
Boy- "खुशी से मर ही जाऊँगा"..
Girl-
"जा पगले, नहीं कहती, जी ले..जिंदगी ना मिलेगी दोबारा..!!"

सोमवार, 7 मई 2012

एक टोकरी-भर मिट्टी

 किसी श्रीमान ज़मींदार के महल के पास एक ग़रीब अनाथ विधवा की झोंपड़ी थी। ज़मींदार साहब को अपने महल का अहाता उस झोंपड़ी तक बढ़ाने की इच्छा हुई, विधवा से बहुतेरा कहा कि अपनी झोंपड़ी हटा ले, पर वह तो कई ज़माने से वहीं बसी थी; उसका प्रिय पति और इकलौता पुत्र भी उसी झोंपड़ी में मर गया था। पतोहू भी एक पाँच बरस की कन्याउ को छोड़कर चल बसी थी। अब यही उसकी पोती इस वृद्धाकाल में एकमात्र आधार थी। जब उसे अपनी पूर्वस्थिति की याद आ जाती तो मारे दु:ख के फूट-फूट कर रोने लगती थी और जबसे उसने अपने श्रीमान पड़ोसी की इच्छा का हाल सुना, तबसे वह मृतप्राय हो गई थी। उस झोंपड़ी में उसका मन लग गया था कि बिना मरे वहाँ से वह निकलना नहीं चाहती थी। श्रीमान के सब प्रयत्न निष्फनल हुए, तब वे अपनी ज़मींदारी चाल चलने लगे। बाल की खाल निकालने वाले वकीलों की थैली गरम कर उन्हों ने अदालत से झोंपड़ी पर अपना क़ब्ज़ान करा लिया और विधवा को वहाँ से निकाल दिया। बिचारी अनाथ तो थी ही, पास-पड़ोस में कहीं जाकर रहने लगी।

एक दिन श्रीमान उस झोंपड़ी के आसपास टहल रहे थे और लोगों को काम बतला रहे थे कि वह विधवा हाथ में एक टोकरी लेकर वहाँ पहुँची। श्रीमान ने उसको देखते ही अपने नौकरों से कहा कि इसे यहाँ से हटा दो। पर वह गिड़गिड़ाकर बोली, ''महाराज, अब तो यह झोंपड़ी तुम्हावरी ही हो गई है। मैं उसे लेने नहीं आई हूँ। महाराज क्षमा करें तो एक विनती है।'' ज़मींदार साहब के सिर हिलाने पर उसने कहा, ''जब से यह झोंपड़ी छूटी है, तब से मेरी पोती ने खाना-पीना छोड़ दिया है। मैंने बहुत कुछ समझाया पर वह एक नहीं मानती। यही कहा करती है कि अपने घर चल। वहीं रोटी खाऊँगी। अब मैंने यह सोचा कि इस झोंपड़ी में से एक टोकरी-भर मिट्टी लेकर उसी का चूल्हाा बनाकर रोटी पकाऊँगी। इससे भरोसा है कि वह रोटी खाने लगेगी। महाराज कृपा करके आज्ञा दीजिए तो इस टोकरी में मिट्टी ले आऊँ!'' श्रीमान ने आज्ञा दे दी।

 

विधवा झोंपड़ी के भीतर गई। वहाँ जाते ही उसे पुरानी बातों का स्मिरण हुआ और उसकी आँखों से आँसू की धारा बहने लगी। अपने आंतरिक दु:ख को किसी तरह सँभाल कर उसने अपनी टोकरी मिट्टी से भर ली और हाथ से उठाकर बाहर ले आई। फिर हाथ जोड़कर श्रीमान से प्रार्थना करने लगी, ''महाराज, कृपा करके इस टोकरी को ज़रा हाथ लगाइए जिससे कि मैं उसे अपने सिर पर धर लूँ।'' ज़मींदार साहब पहले तो बहुत नाराज़ हुए। पर जब वह बार-बार हाथ जोड़ने लगी और पैरों पर गिरने लगी तो उनके मन में कुछ दया आ गई। किसी नौकर से न कहकर आप ही स्वपयं टोकरी उठाने आगे बढ़े। ज्यों ही टोकरी को हाथ लगाकर ऊपर उठाने लगे त्योंआही देखा कि यह काम उनकी शक्ति के बाहर है। फिर तो उन्होंोने अपनी सब ताक़त लगाकर टोकरी को उठाना चाहा, पर जिस स्था न पर टोकरी रखी थी, वहाँ से वह एक हाथ भी ऊँची न हुई। वह लज्जित होकर कहने लगे, ''नहीं, यह टोकरी हमसे न उठाई जाएगी।''

यह सुनकर विधवा ने कहा, ''महाराज, नाराज़ न हों, आपसे एक टोकरी-भर मिट्टी नहीं उठाई जाती और इस झोंपड़ी में तो हजारों टोकरियाँ मिट्टी पड़़ी है। उसका भार आप जन्मस-भर क्योंऔकर उठा सकेंगे? आप ही इस बात पर विचार कीजिए।

 

ज़मींदार साहब धन-मद से गर्वित हो अपना कर्तव्य भूल गए थे पर विधवा के उपर्युक्तर वचन सुनते ही उनकी आँखें खुल गईं। कृतकर्म का पश्चा्ताप कर उन्होंएने विधवा से क्षमा माँगी और उसकी झोंपड़ी वापिस दे दी।

माधवराव सप्रे

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