नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

रविवार, 2 फ़रवरी 2025

आदिवासी बच्चों का अनोखा स्कूल

मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले के ककराना गांव में ऐसा आवासीय स्कू ल है, जहां न केवल पलायन करने वाले आदिवासी मजदूरों के बच्चे पढ़ते हैं बल्कि हुनर भी सीखते हैं।

मध्यप्रदेश के अलीराजपुर जिले के ककराना गांव में ऐसा आवासीय स्कूल है, जहां न केवल पलायन करने वाले आदिवासी मजदूरों के बच्चे पढ़ते हैं बल्कि हुनर भी सीखते हैं। यहां उनकी पढ़ाई भिलाली, हिन्दी और अंग्रेजी भाषा में होती है। वे यहां खेती-किसानी से लेकर कढ़ाई, बुनाई, बागवानी और मोबाइल पर वीडियो बनाना सीखते हैं। आज के कॉलम में इस अनोखे स्कूल की कहानी सुनाना चाहूंगा, जिससे यह पता चले कि स्थानीय लोग भी स्कूल बना सकते हैं, चला सकते हैं और उनके बच्चों को शिक्षित कर सकते हैं।  

मैं इस स्कूल को देखने और समझने दो बार जा चुका हूं। स्कूल के अतिथि गृह में ठहरा हूं। इस दौरान शिक्षकों, छात्रों और ग्रामीणों से मिला हूं। कई गांवों में गया हूं। मुझे यह देखकर सुखद आश्चर्य हुआ कि यहां का स्कूल बहुत ही अनुशासित, व्यवस्थित और नियमित है। स्कूल के साथ-साथ प्रकृति से जुड़कर पढ़ाने पर जोर दिया जाता है। यहां के अधिकांश शिक्षक स्वयं आदिवासी हैं, और इनमें से एक-दो तो इसी स्कूल से पढ़े हैं।  

पश्चिमी मध्यप्रदेश का अलीराजपुर जिला सबसे कम साक्षरता वाले जिलों में से एक है। यहां के बाशिन्दे भील आदिवासी हैं। यहां की प्रमुख आजीविका खेती है। लेकिन चूंकि असिंचित और पहाड़ी खेती है, इसलिए अधिकांश लोग पलायन करते है। यहां के अधिकांश लोग राजस्थान और गुजरात में मजदूरी के लिए जाते हैं, इसलिए उनके बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पाती थी। लेकिन इस आवासीय स्कूल से बच्चों की पढ़ाई हो रही है। 

 इस इलाके में आदिवासियों के हक और सम्मान के लिए खेडुत मजदूर चेतना संगठन सक्रिय रहा है। शुरूआत में इस संगठन ने अनौपचारिक रूप से आदिवासी बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। लेकिन बाद में इसके कार्यकर्ता कैमत गवले व गांववासियों ने मिलकर ककराना गांव में आवासीय स्कूल की शुरूआत की। यह वर्ष 2000 की बात है। स्कूल का नाम रानी काजल जीवनशाला है। यह स्कूल, मध्यप्रदेश शिक्षा विभाग में पंजीकृत है और यहां माध्यमिक स्तर की शिक्षा दी जाती है।  

स्कूल के प्राचार्य निंगा सोलंकी बताते हैं कि वर्ष 2008 में हमने कल्पांतर शिक्षण एवं अनुसंधान केन्द्र समिति गठित की, जो स्कूल के संचालन के लिए वित्तीय मदद जुटाती है। हाल ही में महिला जगत लिहाज समिति नामक संस्था ने भी संचालन में सहयोग करना शुरू किया है,जिसकी मदद से नए भवन बने हैं और छात्रावास भी संचालित हो रहा है। स्कूल का सर्व सुविधायुक्त परिसर है, भवन हैं और 2 एकड़ जमीन है, जिसमें हरे-भरे पेड़-पौधों के साथ जैविक खेती भी होती है।  

यह परिसर पहाड़ियों से घिरा हुआ है। यहां मिट्टी-पानी का संरक्षण हो, यह सुनिश्चित किया जा रहा है। मिट्टी का क्षरण न हो और पानी की एक बूंद भी परिसर से बाहर न जाए, इसलिए परिसर में पेड़-पौधों का रोपण किया गया है। यहां सागौन, महुआ, शीशम, कटहल, बादाम, सीताफल, जाम, नीम, नींबू, अंजन जैसे करीब 2000 पौधे रोपे गए हैं। विद्यार्थी प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण व संवर्धन का काम करते हैं। परिसर में सैकड़ों तरह के पक्षियों का बसेरा भी है।  

वे आगे बताते हैं कि आदिवासी बच्चों के लिए आवासीय स्कूल की जरूरत है, क्योंकि उनके परिवार में पढ़ाई-लिखाई का कोई माहौल नहीं है। वे आजाद भारत में पहली पीढ़ी हैं, जो शिक्षित हो रहे हैं। हमने यह महसूस किया कि बच्चों को एक दिन के स्कूल की तुलना में ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। इसलिए आवासीय स्कूल का निर्णय लिया गया। दैनिक स्कूलों में कामकाज की समीक्षा से पता चला कि अशिक्षित माता-पिता के बच्चों के प्रभावी शिक्षण के लिए उन्हें नियमित स्कूली घंटों के अलावा भी पढ़ाने की जरूरत है। इन्हें जो शिक्षक पढ़ाते हैं, वे भी उनके बीच के हैं और परिसर में ही रहते हैं।  

इस शाला का नाम आदिवासियों की देवी रानी काजल के नाम पर रखा गया है। जिसके बारे में मान्यता है कि यह देवी महामारी व संकट के समय उनकी रक्षा करती है। स्कूल की फीस का ढांचा ऐसा है कि अभिभावक इसे वहन कर सकें।  प्राचार्य सोलंकी बतलाते हैं कि इस स्कूल का उद्देश्य आदिवासी पहचान और संस्कृति का संरक्षण करना भी है। इसमें दूसरी कक्षा तक भिलाली भाषा में बच्चों को पढ़ाया जाता है। और इसके बाद हिन्दी और अंग्रेजी भी पढ़ाई जाती है। कुछ भीली किताबों का अंग्रेजी और हिन्दी में भी अनुवाद किया गया है।  

वे आगे बताते हैं कि यहां पढ़ाई के साथ हाथ के हुनर व कारीगरी सिखाई जाती है। किसानी, लोहारी, बढ़ईगिरी, सिलाई और बागवानी इसमें प्रमुख हैं। पिछले वर्ष मध्यप्रदेश शिक्षा मंडल द्वारा आयोजित पांचवी और आठवीं कक्षा की परीक्षाओं में इस विद्यालय के विद्यार्थी जिले में अव्वल आए थे। कुछ अधिकारी और सरकारी नौकरियों में गए हैं। स्कूल के एक शिक्षक हैं, जो पहले इसी स्कूल के विद्यार्थी रह चुके हैं। पहली बार नर्मदा किनारे गांवों की लड़कियां पढ़ रही हैं, और उनमें से एक शिक्षिका भी बन गई हैं।  इसके अलावा, यहां आधुनिक रिकार्डिंग स्टूडियों भी है, जहां आदिवासी संस्कृति पर वीडियो बनाए जाते हैं, इसका भील वॉयस नामक एक यू ट्यूब चैनल भी है, जिसमें कार्यक्रम प्रसारित किए जाते हैं।  

स्कूल की शुरूआत में बिना पाठ्यपुस्तकों के ही पढ़ाई होती थी। भिलाली और हिन्दी में बच्चों को पढ़ना-लिखना सिखाया जाता था। लेकिन जल्द ही पाठ्यक्रम विकसित किया गया। अब तो मध्यप्रदेश के स्कूली पाठ्यक्रम के अलावा कौशल आधारित शिक्षा व प्रशिक्षण दिया जाता है।  

हर साल गर्मी की छुट्टियों के दौरान प्राचार्य निंगा सोलंकी और शिक्षिका रायटी बाई ने नई शिक्षण पद्धति अपनाई है। वे पाठ्यक्रम से संबंधित शैक्षणिक वीडियो व आडियो बनाते हैं, जिन्हें बाद में बच्चों के माता-पिता के मोबाइल पर साझा किया जाता है। इससे बच्चे परिसर के बाहर घर में भी उनकी पढ़ाई जारी रखते हैं। महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए फोन कॉल और संदेशों का आदान-प्रदान भी किया जाता है।  

प्राचार्य सोलंकी बतलाते हैं कि आदिवासियों की संस्कृति, बोलियां और जीवनशैली आधुनिक प्रभावों के कारण तेजी से बदल रही है। उनकी पारंपरिक जीवनशैली का अनूठापन लुप्त हो रहा है, इसलिए हमने भीली में यह कार्यक्रम शुरू किया है, जिससे उसका संरक्षण किया जा सके।  

इसके लिए अमेरिका में प्रवासीय भारतीय प्रोफेसर उत्तरन दत्ता ने सहयोग दिया है और उनके मार्गदर्शन में 15-20 बच्चों को मोबाइल वीडियोग्राफी और वीडियो संपादन का प्रशिक्षण दिया गया है। इसके माध्यम से लोकगीत, कहानियां और पारंपरिक उपचार विधियों और जंगलों के खान-पान व महत्व पर आधारित कार्यक्रम तैयार किए जाते हैं।  

कुल मिलाकर, यह आदिवासी मजदूर बच्चों का आवासीय स्कूल है, जिसमें न केवल पढ़ाई करते हैं, बल्कि गतिविधि आधारित शिक्षा भी हासिल करते हैं। प्रकृति अवलोकन, श्रम आधारित उत्पादन पद्धति से भी सीखते हैं। उनकी भीली-भिलाली भाषा में मौलिक अभिव्यक्ति भी करते हैं। इसके लिए उनका यू ट्यूब चैनल भी है। इस स्कूल के मूल्यों में एक आदिवासी पहचान,संस्कृति व अच्छी परंपराओं का संरक्षण करना भी है।  

इस स्कू ल की खास बात यह भी है कि स्कूली शिक्षक उनके बीच रहते हैं। जिज्ञासा, सवाल व समस्याओं के हल के लिए सहज ही उपलब्ध हैं। वे एक परिवार की तरह रहते हैं। बच्चों को तोतारटंत किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि श्रम के मूल्य साथ समझ विकसित करने की कोशिश की जाती है। इस स्कूल ने श्रम के मूल्य का बोध भी कराया है, जिसका पूरी शिक्षा व्यवस्था में लोप हो गया है। यह पूरी पहल सराहनीय होने के साथ अनुकरणीय भी है।

बाबा मायाराम

साभार -देशबंधु 

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'स्वराज संवाद' की जरूरत

गांवों में ऐसी नीतियां व तकनीकें न आएं जिनसे किसानों की क्षति होती है व वे लूटे जाते हैं, अपितु ऐसी नीतियां आएं जिनसे किसानों का आधार मजबूत हो, खेती-किसानी व पशुपालन जैसी आजीविका अधिक समृद्ध व टिकाऊ बने। गांवों में हरियाली बढ़े, जल-संरक्षण हो, पर्यावरण की रक्षा हो। किसान अपने बीजों की रक्षा करें व महंगी तकनीकों के स्थान पर स्थानीय संसाधनों पर आधारित, पर्यावरण की रक्षा करने वाली सस्ती-से-सस्ती तकनीकों का बेहतर उपयोग कर अधिक व उचित उत्पादन प्राप्त करें।

 हमारे समाज में जो सबसे सार्थक व उपयोगी सोच अनेक दशकों से रही है, उसे निरंतर नई चुनौतियों से जोड़ते रहने व नए स्तर से अधिक उपयोगी बनाए रखने की जरूरत है। इस तरह यह सोच अधिक महत्वपूर्ण व सार्थक रूप से मौजूदा समाज, विशेषकर नई पीढ़ी के सरोकारों से भी जुड़ी रहेगी व उनकी समस्याओं के समाधान में अधिक उपयोगी सिद्ध होगी। 

 इस तरह का एक प्रयास हाल ही में एक राष्ट्रीय स्तर के 'स्वराज संवाद' के रूप में देखा गया जिसका विषय यह था, 'परंपरागत ग्रामीण व आदिवासी ज्ञान का बेहतर उपयोग जलवायु बदलाव के संकट के समाधान के लिए कैसे हो सकता है।' इस संवाद का आयोजन 'राईज क्लाईमेट अलायंस' व 'वागधारा' ने किया था। इस संवाद में टिकाऊ खेती, बीज संरक्षण, जल-संरक्षण, वैकल्पिक ऊर्जा, पंचायती राज व विकेन्द्रीकरण आदि के संदर्भ में बहुत प्रेरणादायक कार्यों व उस पर आधारित आगे के सुझावों को प्रस्तुत किया गया। इससे जलवायु बदलाव का संकट कम भी हो सकता है व ग्रामीण समुदाय उसका सामना करने के लिए बेहतर ढंग से तैयार भी हो सकते हैं। इस संवाद में यह भी सामने आया कि इन उपलब्धियों को प्राप्त करने के लिए विकेन्द्रीकरण, गांवों में बढ़ती आत्म-निर्भरता और स्वराज की राह अपनाने से बहुत मदद मिलती है। इस राह पर चलते हुए यदि परंपरागत ज्ञान का उपयोग टिकाऊ आजीविका को सुदृढ़ करने, ग्रामीण समुदायों, विशेषकर महिलाओं व आदिवासी समुदायों को सशक्त करने व जलवायु बदलाव के संकट के समाधानों के प्रयास एक साथ किए जाएं, तो यह बहुत रचनात्मक व उपयोगी हो सकता है व इसके बहुत उत्साहवर्धक परिणाम मिल सकते हैं। यह जलवायु बदलाव के समाधान की ऐसी राह होगी जो हमारे अपने ग्रामीण विकास व छोटे किसानों के हितों के अनुकूल है व अनेक अन्य विकासशील देशों को इसमें बहुत रुचि हो सकती है।  

स्वराज का महत्व केवल नीतियों, कार्यक्रमों या योजनाओं के संदर्भ में नहीं है, इसका महत्त्व सांस्कृतिक व वैचारिक संदर्भ में भी है। साम्राज्यवादी विचारधारा बड़ी चालाकी से और बहुत साधन-संपन्न तरीकों का उपयोग करते हुए हमारी सोच पर हावी होना चाहती है। उसका प्रयास है कि केवल साम्राज्यवादी, पूंजीवादी, कारपोरेट, बड़े बिजनेस की सोच ही हावी हो। अत: स्वराज का महत्व सामाजिक, सांस्कृतिक व वैचारिक क्षेत्रों में साम्राज्यवाद के विरोध को आगे बढ़ाने व अपनी आजादी की सोच को सही संदर्भ में रखने से भी जुड़ा है। स्वराज की सोच है कि हमारे साधनों को कोई नहीं लूटेगा, उनका बेहतर-से-बेहतर उपयोग हम अपने लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए करेंगे या पर्यावरण और विभिन्न तरह के जीवन की रक्षा के लिए करेंगे।  

गांवों में ऐसी नीतियां व तकनीकें न आएं जिनसे किसानों की क्षति होती है व वे लूटे जाते हैं, अपितु ऐसी नीतियां आएं जिनसे किसानों का आधार मजबूत हो, खेती-किसानी व पशुपालन जैसी आजीविका अधिक समृद्ध व टिकाऊ बने। गांवों में हरियाली बढ़े, जल-संरक्षण हो, पर्यावरण की रक्षा हो। किसान अपने बीजों की रक्षा करें व महंगी तकनीकों के स्थान पर स्थानीय संसाधनों पर आधारित, पर्यावरण की रक्षा करने वाली सस्ती-से-सस्ती तकनीकों का बेहतर उपयोग कर अधिक व उचित उत्पादन प्राप्त करें।  

गांवों के हितों की रक्षा हो सके, इसके लिए गांवों में स्वशासन मजबूत हो। पंचायत राज में जरूरी सुधार किए जाएं। ग्रामसभा व वार्डसभा को सशक्त किया जाए। पंचायतों व ग्रामसभाओं को समुचित अधिकार व संसाधन मिलें यह जरूरी है, पर साथ में यह भी जरूरी है कि जो गांवों में अभी तक सबसे कमजोर व निर्धन रहे हैं उनके अधिकारों व हितों की रक्षा का विशेष प्रयास हो।  

जिन गांवों में पहले से समानता है, वहां तो विकेंद्रीकरण से लाभ-ही-लाभ हैं क्योंकि ग्रामसभा में सब परिवार समान रूप में भागीदारी कर सकेंगे, पर जहां चंद सामन्ती व धनी तत्त्वों का दबदबा है या कुछ अपराधी छवि के व्यक्ति हावी हैं, उनकी कुचेष्टा यह होगी कि निर्धन व कमजोर परिवारों को ग्रामसभा के स्तर पर भी दबा दिया जाए व अपनी सामंतशाही ही चलाई जाए।  ऐसे में पंचायतों में भी कमजोर वर्ग के हितों की रक्षा के विशेष प्रयास जरूरी हैं। साथ में व्यापक स्तर पर समानता लाने, निर्धन भूमिहीनों को भूमि देने व उनकी बेहतरी के अन्य प्रयासों की विशेष जरूरत है। ऐसा नहीं होगा तो भूमि व अन्य संसाधनों के अभाव में सबसे निर्धन परिवार 'स्वराज' से वंचित ही रहेंगे। 'स्वराज' उन्हें भी मिले इसलिए सबसे गरीब व कमजोर लोगों के हित में व्यापक प्रयास जरूरी है - गांवों में भी और शहरों में भी।  

इस तरह स्वराज के साथ समता की सोच भी अनिवार्य तौर से जुड़ी है। यदि स्वराज के साथ समता को नहीं जोड़ा गया तो देश के सबसे जरूरतमंद लोग 'स्वराज' से वंचित ही रह जाते हैं। आदिवासियों के संदर्भ में स्वराज का विशेष महत्त्व है क्योंकि अब तक वे देश के सबसे उपेक्षित समुदायों में रहे हैं तथा उनके जल, जंगल, जमीन पर बड़ा हमला भी हो रहा है। स्वराज की सोच में आदिवासी अधिकारों की रक्षा का भी अपना विशेष महत्त्व है।  इस तरह एक ओर स्वराज की व्यापक स्तर पर सोच साम्राज्यवाद की अगुवाई वाले भूमंडलीकरण के विरोध से जुड़ी है तो दूसरी ओर यह जमीनी स्तर पर विकेंद्रीकरण को मजबूत करने व हर स्तर पर समतावादी सोच अपनाने से भी जुड़ी है। 'स्वराज संवाद' में देश के लगभग सभी राज्यों के लगभग 500 प्रतिनिधियों ने भाग लिया। उम्मीद है कि इस माध्यम से नए संदर्भों में भी स्वराज संदेश फैल सकेगा व जलवायु बदलाव के ऐसे समाधानों की सोच अधिक व्यापक बनेगी जो टिकाऊ विकास, किसानी संकट के समाधान व ग्रामीण समुदायों के सशक्तीकरण से भी जुड़े हैं।

भारत डोगरा

साभार-देशबंधु 

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कब करें गूगल मैप पर भरोसा

 गूगल मैप की वजह से न जाने कितने लोग हर रोज अपने सही ठिकाने पर पहुंचते हैं। जब रास्ता न पता हो तो यही काम में आता है, लेकिन इस बार गूगल मैप का इस्तेमाल करना तीन लोगों के लिए मौत का कारण बन गया। 

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के फरीदपुर थाना क्षेत्र में जीपीएस पर सही जानकारी न अपडेट होने की वजह से यह हादसा हुआ। ऐसे में गूगल मैप का इस्तेमाल करते समय कुछ जरूरी बातों का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। मैप इस्तेमाल करते वक्त सावधान भले ही गूगल मैप ज्यादातर सही जानकारी देता है, लेकिन कई बार इस पर भरोसा करना रिस्की भी साबित हो जाता है। 

कुछ दिन पहले दो दोस्त मैप की वजह से गलत रास्ते पर चले गए। जिसकी वजह से हादसा हो गया।  गूगल मैप से कहीं जा रहे हैं, तो चलने से पहले एक बार चेक कर लें कि मैप पर कोई गलत गतिविधी तो नहीं होती दिख रही। कई बार मैप नदी, अनजान या सुनसान रास्ते दिखाने लगता है और कुछ लोग इन पर चल निकलते हैं, लेकिन ऐसा करना रिस्की हो सकता है। इसलिए ऐसा करने से बचना चाहिए। मैप न समझ आए तो कोशिश करें कि लोकल लोगों की मदद ले ली जाए। इसमें आपके कुछ मिनटों का समय तो खर्च होगा, लेकिन जानकारी सही मिल जाएगी। 

मैप के नए फीचर्स से खुद को अपडेट रखना बहुत जरूरी है, ताकि मुश्किल में फंसने पर इन फीचर्स की मदद ली जा सके। कहीं भी निकलने से पहले मैप को अपडेट करना भी बहुत जरूरी है।

कब करें गूगल मैप पर भरोसा

मैप पर आंख बंद करके भरोसा करना सही नहीं है। आप गूगल मैप की मदद ले सकते हैं, लेकिन उसके भरोसे नहीं रह सकते हैं। अगर आप किसी बड़ी सड़क पर जा रहे हैं, तो यहां मैप सही काम करता है, कमजोर इंटरनेट होने की स्थिति में गूगल मैप आपको परेशानी में डाल सकता है। इसलिए हमेशा दुरुस्त इंटरनेट कनेक्शन रखें। साथ ही मैप को इस्तेमाल करते समय सतर्क रहना बहुत जरूरी है।

कहां होता है रिस्की अक्सर देखा गया है कि मैप ऐसी जगह पर गलत रास्ते दिखाता है, जो ज्यादा आम नहीं होती हैं और नई होती हैं। ऐसी स्थिति में सबसे अच्छा तरीका होता है कि वहां के लोगों से रास्ते के बारे में सही जानकारी ले ली जाए। 

साभार-जागरण 

समाज की बात  Samaj Ki Baat 

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शुक्रवार, 10 जनवरी 2025

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम

 

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम (15 अक्टूबर, 1931 - 27 जुलाई, 2015) एक उल्लेखनीय भारतीय वैज्ञानिक और नेता थे, जिन्होंने भारत के मिसाइल और परमाणु कार्यक्रमों के विकास का नेतृत्व करके देश की रक्षा पर बहुत बड़ा प्रभाव डाला। वे 2002 से 2007 तक भारत के राष्ट्रपति बने और अपनी सादगी, दूरदर्शिता और देश के प्रति समर्पण के लिए उन्हें बहुत प्यार मिला। अपने वैज्ञानिक योगदान के लिए "मिसाइल मैन" और जनता के साथ अपने जुड़ाव के लिए "लोगों के राष्ट्रपति" के रूप में जाने जाने वाले, उनकी जीवन कहानी लाखों लोगों को बड़े सपने देखने और अपने लक्ष्यों के लिए कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है।

डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम का जन्म एक गरीब तमिल मुस्लिम परिवार में हुआ था। वह अपने परिवार के साथ तमिलनाडु के मंदिर शहर रामेश्वरम में रहते थे, जहाँ उनके पिता जैनुलाब्दीन के पास एक नाव थी और वह एक स्थानीय मस्जिद के इमाम थे। वहीं, उनकी माँ आशिअम्मा एक गृहिणी थीं। कलाम के परिवार में चार भाई और एक बहन थीं, जिनमें से वह सबसे छोटे थे। कलाम के पूर्वज धनी व्यापारी और ज़मींदार थे और उनके पास बहुत सारी ज़मीन और संपत्ति थी। लेकिन समय के साथ, तीर्थयात्रियों को लाने-ले जाने और किराने का सामान बेचने के उनके व्यवसाय को पंबन ब्रिज के खुलने की वजह से भारी नुकसान उठाना पड़ा। नतीजतन, कलाम का परिवार अपर्याप्त हो गया और जीवनयापन के लिए कड़ी मेहनत करनी पड़ी। छोटी सी उम्र में, कलाम को अपने परिवार की आय बढ़ाने के लिए अख़बार बेचना पड़ा।

डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की शिक्षा यात्रा उनके समर्पण और सीखने के प्रति प्रेम को दर्शाती है, भले ही स्कूल में उनके ग्रेड औसत रहे हों। वह एक मेहनती छात्र थे और गणित में उनकी गहरी रुचि थी। श्वार्ट्ज हायर सेकेंडरी स्कूल में अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज में दाखिला लिया, जहाँ उन्होंने 1954 में भौतिकी में डिग्री हासिल की। ​​1955 में, वह मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग करने के लिए मद्रास चले गए, जो उनके करियर में एक महत्वपूर्ण कदम था।

स्नातक करने के बाद, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम 1958 में एक वैज्ञानिक के रूप में DRDO में शामिल हुए, जहाँ उन्होंने एक छोटा होवरक्राफ्ट डिज़ाइन किया, लेकिन अपनी भूमिका से असंतुष्ट थे। 1969 में, वे इसरो में चले गए और भारत के पहले उपग्रह वाहन के सफल प्रक्षेपण का नेतृत्व किया, जिसने 1975 में रोहिणी उपग्रह को कक्षा में स्थापित किया। 1970-90 के दशक के दौरान, उन्होंने इंदिरा गांधी से गुप्त धन प्राप्त करते हुए प्रोजेक्ट डेविल और प्रोजेक्ट वैलिएंट जैसी प्रमुख मिसाइल परियोजनाओं का निर्देशन किया। 1992 में, वे रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार बने और बाद में भारत के 1998 के परमाणु परीक्षणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके "टेक्नोलॉजी विज़न 2020" का उद्देश्य भारत को प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा के माध्यम से एक विकसित राष्ट्र में बदलना था।

सर कलाम भारत के 11वें राष्ट्रपति बनने के हकदार थे। 25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007 तक का उनका कार्यकाल 2002 में भारी मतों के अंतर से राष्ट्रपति चुनाव जीतकर हासिल हुआ था। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने उन्हें राष्ट्रपति पद के लिए नामित किया और समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी ने इसका समर्थन किया। उन्हें प्यार से लोगों का राष्ट्रपति कहा जाता था क्योंकि उन्होंने लोगों के कल्याण और पूरे देश के लिए अनगिनत काम किए थे।

 

वे निर्णय लेने और उन्हें लागू करने के लिए काफी साहसी थे, चाहे वह कठिन हो या संवेदनशील या अत्यधिक विवादास्पद। "लाभ का पद" शायद वह कठिन अधिनियम था जिस पर उन्हें हस्ताक्षर करना पड़ा। 1701 में अंग्रेजी अधिनियम के अनुसार "लाभ का पद", यह स्पष्ट करता है कि कोई भी व्यक्ति जिसके पास शाही परिवार के तहत पेशेवर व्यवस्था है, जिसके पास राजकुमार से किसी तरह का प्रावधान है या जो पेंशन ले रहा है, उसे "हाउस ऑफ कॉमन्स" के लिए काम करने का अधिकार नहीं है। इससे शाही परिवार का प्रशासनिक स्थितियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। 2005 में बिहार में राष्ट्रपति शासन लगाने के कारण वे सबसे चर्चित राष्ट्रपतियों में से एक बन गए थे। कलाम ने एक बार फिर इस पद को संभालने की इच्छा जताई थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपना मन बदल लिया। पद से विदाई लेने के बाद, वे शिलांग में भारतीय प्रबंधन संस्थान में विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। उन्होंने अन्ना विश्वविद्यालय, तमिलनाडु में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। उन्होंने अपनी उपस्थिति और ज्ञान से भारतीय संस्थान इंदौर, भारतीय संस्थान बैंगलोर जैसे शैक्षणिक संस्थानों को भी रोशन किया। सर कलाम ने तिरुवनंतपुरम में भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी संस्थान के चांसलर के रूप में कार्य किया। 2012 में, उन्होंने देश से भ्रष्टाचार को खत्म करने के विषय पर ध्यान केंद्रित करते हुए “मैं क्या दे सकता हूँ?” नामक एक कार्यक्रम शुरू किया।

अब्दुल कलाम हमारी तरह ही एक नश्वर इंसान थे, लेकिन देश के लिए उनके योगदान के लिए वे लोगों के दिलों में अमर रहे। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ऐसी ही एक शख्सियत थे, जिनका 83 साल की उम्र में निधन हो गया। यह पूरे देश के लिए एक चौंकाने वाली खबर थी क्योंकि एक पवित्र आत्मा हमेशा के लिए हमसे दूर चली गई। अब्दुल कलाम आईआईएम शिलांग में एक कार्यक्रम में युवाओं के लिए भाषण दे रहे थे। भाषण के बीच में ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वे बेहोश हो गए। हालांकि उन्हें शिलांग के सबसे अच्छे अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके।

 

फिर उनके पार्थिव शरीर को गुगती ले जाया गया और वहां से एयरफोर्स के विमान से नई दिल्ली ले जाया गया। उनके राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और कुछ अन्य नेताओं ने उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। फिर उनके पार्थिव शरीर को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज में लपेटा गया और उनके गृहनगर लाया गया। उनके अंतिम संस्कार में लगभग 35000 लोग शामिल हुए और ऐसी महान आत्मा के लिए प्रार्थना की।

डॉ. अब्दुल कलाम एक ऐसे व्यक्ति थे जो न केवल एक महान राजनीतिक नेता थे, बल्कि एक अच्छे शिक्षक और लेखक भी थे। उनमें कई नाजुक गुण और दूरदर्शी थे। उन्होंने हमेशा देश के विकास के लिए एक शानदार सपना देखा और महसूस किया कि युवा क्रांति ला सकते हैं। अपने विश्वविद्यालय के करियर के दौरान, उन्होंने अपने प्रेरक भाषण और जबरदस्त दूरदर्शिता के माध्यम से कई छात्रों को प्रेरित किया। इसके अलावा, डॉ. कलाम एक महान लेखक भी थे। उन्होंने कई किताबें लिखी हैं, जो मुख्य रूप से राष्ट्र के सशक्तिकरण के लिए हैं। उनका भारत 2020 का निर्माण हमारे लिए एक उपहार की तरह था, और उनके पास भारत को महाशक्ति बनाने की सभी रणनीतियाँ थीं। इस पुस्तक में, उन्होंने मुख्य रूप से कृषि क्षेत्र में खाद्य और विकास, बेहतर स्वास्थ्य देखभाल सुविधाएँ, उन्नत सूचना और संचार प्रणाली, अच्छा बुनियादी ढाँचा, बिजली उत्पादन में पर्याप्तता, कुछ उन्नत तकनीकों में आत्मनिर्भरता जैसे कुछ कारकों पर ध्यान केंद्रित किया था।

अब्दुल कलाम एक सुनहरे दिल वाले व्यक्ति थे, जिन्होंने अपने जीवन के दौरान कई पुरस्कार प्राप्त किए और कई उपलब्धियाँ हासिल कीं। 1981 में अब्दुल कलाम को प्रतिष्ठित पद्म भूषण पुरस्कार मिला। 1990 में उन्हें पद्म भूषण पुरस्कार मिला। राष्ट्र के प्रति उनके जबरदस्त प्रयास के कारण प्रसिद्ध व्यक्तित्व को 1997 में भारत रत्न मिला। उसी वर्ष उन्हें राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने 1998 में कलाम को वीर सावरकर पुरस्कार से सम्मानित किया। कला, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उनके योगदान के कारण उन्हें 2000 में SASTRA रामानुजन पुरस्कार मिला। अंत में, वर्ष 2013 में, प्रतिष्ठित व्यक्तित्व को राष्ट्रीय अंतरिक्ष सोसायटी द्वारा वॉन ब्रौन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

यह जटिल व्यक्तित्व एक उल्लेखनीय शोधकर्ता था जिसने विशाल और अनंत विज्ञान और यांत्रिक अभिनव कार्य को प्रदर्शित किया। यह वह व्यक्ति था जिसने हमारे देश को उसके सबसे वास्तविक अर्थों में परमाणु बनाया। वर्ष 1974 में, डॉ. कलाम की देखरेख में, भारत ने अपना सबसे यादगार परमाणु परीक्षण किया। इसके बाद वर्ष 1988 में पोखरण-II हुआ। इन परमाणु परीक्षणों के माध्यम से डॉ. कलाम ने दुनिया को परमाणु नवाचार में भारत की स्थिति और शक्ति दिखाई।

उनके कामों के लिए उन्हें भारत सरकार से तीन महान सम्मान मिले, जिनमें पद्म भूषण, पद्म विभूषण और भारत रत्न शामिल हैं। वर्ष 1997 में कलाम को राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार भी दिया गया। उन्हें वर्ष 1980 में वीर सावरकर पुरस्कार और वर्ष 2000 में रामानुजन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कलाम को दुनिया भर के 40 कॉलेजों से डॉक्टरेट की उपाधि मिली।

वे "इंडिया 2010", "टच्ड ऑफ माइंड्स", "मिशन इंडिया", "द ल्यूमिनस स्पार्क्स", "विंग्स ऑफ फायर" और "मूविंग थॉट्स" जैसी कई प्रेरक पुस्तकों के लेखक थे।

 उनका जीवन, कार्य और विश्वास आदर्शों और प्रेरणाओं से भरा पड़ा है। वे हमें अनंत काल तक प्रेरित करते रहेंगे। इसके अलावा, यही असली वजह है कि 27 जुलाई 2015 को IIM शिलांग में उनके दुखद अंत पर आम जनता के हर वर्ग के लोग इस अविश्वसनीय व्यक्ति के प्रति प्यार क्यों दिखाते हैं।

 इस महान और वफादार आत्मा को परलोक में खुशी मिले!

 आइए अब डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के बारे में कुछ रोचक तथ्यों का अध्ययन करें:

 उनका पूरा नाम अवुल पाकिर जैनुलाब्दीन अब्दुल कलाम था।

 उनका जन्म एक तमिल मुस्लिम परिवार में हुआ था।

 कलाम शाकाहारी थे। उनके शब्दों में "मुझे आर्थिक तंगी के कारण शाकाहारी बनने के लिए मजबूर होना पड़ा, लेकिन अंततः मुझे इसका आनंद आने लगा।" आज मैं पूर्ण शाकाहारी हूँ”

 वे भारत के ‘पहले अविवाहित राष्ट्रपति’ थे।

 वे बच्चों के बीच बहुत लोकप्रिय थे।

 कलाम की आत्मकथा ‘विंग्स ऑफ फायर’ शुरू में अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित हुई थी, लेकिन बाद में 13 अन्य भाषाओं में प्रकाशित हुई।

 हालाँकि अब्दुल कलाम का जीवन संघर्षों और कठिनाइयों से भरा था, लेकिन वे आधुनिक भारत के महानतम वैज्ञानिकों में से एक बनने के लिए प्रतिकूल परिस्थितियों से ऊपर उठे। राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका को आने वाली पीढ़ियों तक याद किया जाएगा।

 

सारांश

अब्दुल कलाम 2002 में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी और तत्कालीन प्रतिस्पर्धी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सहायता से भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति के रूप में चुने गए थे। उन्हें व्यापक रूप से “पीपुल्स प्रेसिडेंट” के रूप में जाना जाता है। उन्होंने वैज्ञानिक और विज्ञान प्रशासक के रूप में चार दशक बिताए, विशेष रूप से रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) पर, और भारत के नागरिक अंतरिक्ष कार्यक्रम और सेना मिसाइल सुधार प्रयासों से जुड़े।

 

अब्दुल कलाम स्कूली शिक्षा, लेखन और राजनीति की अपनी नागरिक जीवनशैली में वापस आ गए। एक ही कार्यकाल के बाद सार्वजनिक करियर में उनका प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा। अपने प्रतिष्ठित कार्य के लिए उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम (A.P.J. Abdul Kalam) ने अपने जीवन में बहुत सी विपरीत परिस्थितियों का सामना किया था। लेकिन जीवन में उन्होंने कभी भी कठिन परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानी। यही वजह है कि उनका जीवन आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्त्रोत हैं। डॉ. कलाम को उनके कार्यों के लिए बहुत से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया था। जिन्हें नीचे दिए गए टेबल में बताया जा रहा हैं:-

2014 डॉक्टर ऑफ़ साइंस

2012 डॉक्टर ऑफ़ लॉज़ (मानद उपाधि)

 2011 आई.ई.ई.ई. मानद सदस्यता

 2010 डॉक्टर ऑफ इंजीनियरिंग

 2009 मानद डॉक्टरेट

 2009 हूवर मेडल

 2009 वॉन कार्मन विंग्स अन्तर्राष्ट्रीय अवार्ड

 2008 डॉक्टर ऑफ इन्जीनियरिंग (मानद उपाधि)

 2008 डॉक्टर ऑफ साइन्स (मानद उपाधि)

 2007 डॉक्टर ऑफ साइन्स एण्ड टेक्नोलॉजी की मानद उपाधि

 2007 किंग चार्ल्स II मेडल

 2007 डॉक्टर ऑफ साइन्स की मानद उपाधि

 2000 रामानुजन पुरस्कार

 1998 वीर सावरकर पुरस्कार

 1997 इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय एकता पुरस्कार

 1997 भारत रत्न

 1994 विशिष्ट शोधार्थी

 1990 पद्म विभूषण

 1981 पद्म भूषण 

 यहाँ डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का जीवन परिचय (APJ Abdul Kalam Ka Jivan Parichay) के साथ ही उनके द्वारा लिखित कुछ पुस्तकों के बारे में बताया जा रहा है। जिन्हें आप नीचे दिए गए बिंदुओं में देख सकते हैं:-

पुस्तक 

प्रकाशन वर्ष 

इंडिया 2020: ए विजन फॉर द न्यू मिलेनियम 

वर्ष 1998

विंग्स ऑफ फायर: एन ऑटोबायोग्राफी 

वर्ष 1999

इगनाइटेड माइंड्स: अनलीजिंग द पॉवर विदिन इंडिया

वर्ष 2002

द ल्यूमिनस स्पार्क्स: ए बायोग्राफी इन वर्स एंड कलर्स

वर्ष 2004

मिशन ऑफ इंडिया: ए विजन ऑफ इंडियन यूथ

वर्ष 2005

द लाइफ ट्री, पोयम्स

वर्ष 2005

इनडोमिटेबल स्पिरिट

वर्ष 2006

हम होंगे कामयाब

वर्ष 2006

अदम्य साहस

वर्ष 2006

इन्स्पायरिंग थॉट्स: कोटेशन सीरिज

वर्ष 2007

यू आर बॉर्न टू ब्लॉसम (सहलेखन – अरुण तिवारी)

वर्ष 2008

द फैमिली एंड द नेशन (सहलेखन – महाप्रज्ञ)

वर्ष 2008

स्प्रिट ऑफ इंडिया

वर्ष 2010

फोर्ज योर फ्यूचर: केन्डिड, फोर्थराइट, इन्स्पायरिंग

वर्ष 2014

बियॉन्ड 2020: ए विजन फॉर टुमोरोज इंडिया

वर्ष 2014

गवर्नेंस फॉर ग्रोथ इन इंडिया

वर्ष 2014

ट्रांसडेंस: माई स्प्रीचुअल एक्स्पीरिएंस विद प्रमुख स्वामीजी (सहलेखन – अरुण तिवारी)

वर्ष 2015

लर्निंग हाउ टू फ्लाई

वर्ष 2016

एनलाइटेंड माइंड्स

वर्ष 2017

फेलियर इस द बेस्ट टीचर

वर्ष 2018

 यहाँ डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के जीवन परिचय (APJ Abdul Kalam Biography in Hindi) के साथ ही उनके कुछ अनमोल विचारों के बारे में भी बताया जा रहा है। जिन्हें आप नीचे दिए गए बिंदुओं में देख सकते हैं:-

शिक्षण एक बहुत ही महान पेशा है जो किसी व्यक्ति के चरित्र, क्षमता, और भविष्य को आकार देता हैं। अगर लोग मुझे एक अच्छे शिक्षक के रूप में याद रखते हैं, तो मेरे लिए ये सबसे बड़ा सम्मान होगा। 

महान शिक्षक ज्ञान, जूनून और करुणा से निर्मित होते हैं।

अगर तुम सूरज की तरह चमकना चाहते हो तो पहले सूरज की तरह जलो।

सपने वो नहीं है जो आप नींद में देखे, सपने वो है जो आपको नींद ही नहीं आने दे।

महान सपने देखने वालों के महान सपने हमेशा पूरे होते हैं।

मैं इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार था कि मैं कुछ चीजें नहीं बदल सकता।

अपने मिशन में कामयाब होने के लिए, आपको अपने लक्ष्य के प्रति एकचित्त निष्ठावान होना पड़ेगा।

शिखर तक पहुँचने के लिए ताकत की जरूरत होती है, चाहे वो माउंट एवरेस्ट का शिखर हो या आपके पेशे का।

किसी भी मिशन की सफलता के लिए, रचनात्मक नेतृत्व आवश्यक हैं।

जब तक भारत दुनिया के सामने खड़ा नहीं होता, कोई हमारी इज्जत नहीं करेगा। इस दुनिया में, डर की कोई जगह नहीं है। केवल ताकत ही ताकत का सम्मान करती हैं।

 

साभार- leverageedu.com/ vedantu.com/

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