नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

बुधवार, 13 जुलाई 2011

वह खुली हँसी

देखते ही देखते  यह  क्या हो गया

हमारा प्यारा बचपन कहाँ खो गया

रास आती नहीं अब तो ये जिन्दगी

वो उन्मुक्त जीवन कहाँ सो गया

कहाँ वो खुला आसमां था

कहाँ ये तनावों भरी जिन्दगी

लगता है फिर से ना हँस पाएंगे

बचपन वाली वह खुली हँसी.
                                             [कृष्ण धर शर्मा] "1998"

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