नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शनिवार, 9 मार्च 2019

स्त्री ही ऐसी हो सकती

स्त्री में तुमने क्या देखा!
उसकी सुंदरता के सिवा
क्या देख सके वह कोमल मन
जिससे निकले है यह जीवन
क्या देख सके उसकी मेह्नत
जिससे सजे है तुम्हारा तन-मन
तैरते ही रहे सतहों में तुम 
गहराई में तो न उतर सके
फिर पाओगे कैसे मोती
कैसे संवरेगा तुम्हारा मधुबन
भोर भये से रात गये तक
लडती झंझावातों से
काम में अपने मगन ही रहती
हारती नहीं आघातों से
फिर भी तुम न पहचान सके
तो इसमें उसकी क्या गलती
दो जून की रोटी खाकर वह
वेतन बिन ही खटती रहती
तुम्हें खिलाये पूरा भोजन
जूठन खाकर भी खुश रहती
पुरुष नहीं हो सकता ऐसा
स्त्री ही ऐसी हो सकती...
            (कृष्णधर शर्मा 05/02/2019)
samaj ki baat 
समाज की बात 

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