नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शनिवार, 9 मार्च 2019

पुरुष का अधिकार


पुरुष को नहीं है अधिकार, नैतिक रूप से
सबके सामने खुलकर रोने का
वैसे भी, घर में दादी, नानी, माँ सहित
तमाम बडे-बुजुर्गों का कहना यही रहा है
कि, पुरुषों का रोना अपशकुन होता है
या पुरुष भी कभी रोते हैं भला!
इन सब बातों का यह कत्तई मतलब नहीं है
कि, उसके पास आंसुओं की कमी है
या वह कम भावुक है बनिस्बत स्त्री के
इकठ्ठा होते-होते भर चुका होता है
उसके भी आंसुओं का बांध, मगर
वह जानता है कि उसके रोते ही
टूट सकती हैं कई सारी उम्मीदें
धराशायी हो सकते हैं सपनों के महल
जो एक ही रात में नहीं देखे गए हैं
वह नहीं कर पाता है साहस
उन सपनों को तोड़ पाने का
जिन्हें देखने में लगी हैं कई जोड़ी आँखें
और कितनी ही रातें
वह नहीं व्यक्त कर पाता
कभी-कभी अपनी थकन भी
क्योंकि दिनभर काम की
जद्दोजहद के बाद भी, उससे
रहती हैं कई अपेक्षाएं और आशाएं
बहुत ही मुश्किल लगता है उसे
उन्हें नजरंदाज कर पाना
फिर, वह बिखेरता है अपने चेहरे पर
एक बनावटी और सजावटी मुस्कान
ताकि, उसकी थकावट देखकर
थक न जाएं कितनी ही उम्मीदें
           (कृष्णधर शर्मा 05/02/2019)

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