मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ।
एक शब्द वह जो न कभी जिह्वा पर लाऊँ,
और दूसरा : जिसे कह सकूँ
किंतु दर्द मेरे से जो ओछा पड़ता हो।
और तीसरा : खरा धातु,
पर जिसको पाकर पूछूँ—
क्या न बिना इसके भी काम चलेगा? और मौन रह जाऊँ।
मुझे तीन दो शब्द कि मैं कविता कह पाऊँ।
अज्ञेय
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