1.
घर एक जंतु है, फेफड़े जिसके
देह के बाहर हैं
इसीलिए उसको
बुख़ार आ जाता है
ज़रा-सी धूप
या ज़रा-सी सर्दी में
यूँ ही रही अगर आब-ओ-हवा ये
यह मर भी सकता है।
मैंने बनाया मकान
मिट्टी, पत्थर, लकड़ी और उधार से।
मिट्टी और पत्थर बह गए बारिश में।
लकड़ी को चट किया दीमक ने।
बचा है अब बस उधार
और मैं जी रहा
उसी को पटाने को।
कविता - के. सच्चिदानंदन
समाज की बात samajkibaat
कृष्णधरशर्मा Krishnadharsharma
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