नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

अमृता प्रीतम - मन योगी तन भस्म भया

 

मन योगी तन भस्म भया

तू कैसो हर्फ़ कमाया


अज़ल के योगी ने फूँक जो मारी

इश्क़ का हर्फ़ अलाया...

 

धूनी तपती मेरे मौला वाली

मस्तक नाद सुनाई दे

 

अंतर में एक दीया जला

आस्मान तक रोशनाई दे

 

कैसो रमण कियो रे जोगी!

किछु न रहियो पराया

 

मन योगी तन भस्म भया

तू ऐसी हर्फ़ कमाया...

 

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समाज की बात samajkibaat

कृष्णधरशर्मा Krishnadharsharma

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