नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

रविवार, 27 नवंबर 2011

तिरिछ

 

इस घटना का संबंध पिताजी से है। मेरे सपने से है और शहर से भी है। शहर के प्रति जो एक जन्म-जात भय होता है, उससे भी है।

पिताजी तब पचपन साल के हुए थे। दुबला शरीर। बाल बिलकुल मक्के के भुए जैसे सफ़ेद। सिर पर जैसे रुई रखी हो। वे सोचते ज़्यादा थे—बोलते बहुत कम। जब बोलते तो हमें राहत मिलती, जैसे देर से रुकी हुई साँस निकल रही हो। साथ-साथ हमें डर भी लगता। हम बच्चों के लिए वे एक बहुत बड़ा रहस्य थे। हमें पता था कि संसार के सारे ज्ञान की तिजोरी उनके पास है। हम जानते थे कि संसार की सारी भाषाएँ वे बोल सकते हैं। दुनिया उनको जानती है और हमारी तरह ही उनसे डरती हुई उनका सम्मान करती है।

 

हमें उनकी संतान होने का गर्व था।

कभी-कभी, वैसे ऐसा सालों में एकाध बार ही होता, वे शाम को हमें अपने साथ टहलाने कहीं बाहर ले जाते। चलने से पहले वे मुँह में तंबाकू भर लेते। तंबाकू के कारण वे कुछ बोल नहीं पाते थे। वे चुप रहते। यह चुप्पी हमें बहुत गंभीर, गौरवशाली, आश्चर्यजनक और भारी-भरकम लगती। छोटी बहन कभी उनसे रास्ते में कुछ पूछना चाहती तो फ़ौरन मैं उसका जवाब देने की कोशिश करता, जिससे पिताजी को न बोलना पड़े।

 

वैसे यह काम काफ़ी मुश्किल और जोखिम भरा होता। क्योंकि मैं जानता था कि अगर मेरा जवाब ग़लत हुआ तो पिताजी को बोलना पड़ जाएगा। बोलने में उन्हें परेशानी होती थी। एक तो उन्हें तंबाकू की पीक निकालनी पड़ती थी, फिर जिस दुनिया में वे रहते थे, वहाँ से निकलकर यहाँ तक आने में उन्हें एक कठिन दूरी तय करनी पड़ती थी। वैसे बहन के सवालों में कोई ख़ास बात होती नहीं थी। जैसे वह यही पूछ लेती कि सामने छिउले की सूखी टहनी पर बैठी उस चिड़िया को क्या कहते हैं? चूँकि सारी चिड़ियों को जानता था इसलिए बता सकता था कि वह नीलकंठ है और दशहरे के दिन से ज़रूर देखना चाहिए। मेरी पूरी कोशिश रहती कि पिताजी को आराम रहे और वे सोचते रहें।

मेरी और माँ की, दोनों की पूरी कोशिश रहती कि पिताजी अपनी दुनिया में सुख-चैन से रहें। वहाँ से उन्हें जबरन बाहर न निकाला जाए। वह दुनिया हमारे लिए बहुत रहस्यपूर्ण थी, लेकिन हमारे घर की और हमारे जीवन की बहुत-सी समस्याओं का अंत पिताजी वहीं रहते हुए करते थे। जैसे जब मेरी फ़ीस की बात आई, उस समय हमारे पास का आख़िरी गिलास भी गुम गया था और सब लोग लोटे में पानी पीते थे। पिताजी दो दिन तक बिलकुल चुप रहे। माँ को भी शक हुआ था कि पिताजी फ़ीस की बात बिलकुल भूल गए हैं या फिर इसका हल उनके वश की बात नहीं है। लेकिन तीसरे दिन, सुबह-सुबह, पिताजी ने मुझे एक पत्र लिफ़ाफ़े में रखकर दिया और शहर के डॉक्टर पंत के पास भेजा। मुझे बहुत आश्चर्य हुआ जब डॉक्टर ने मुझे शरबत पिलाई, घर के भीतर ले जाकर अपने बेटे से परिचय कराया और सौ-सौ के तीन नोट मुझे दिए।

 

हम पिताजी पर गर्व करते थे, प्यार करते थे, उनसे डरते थे और उनके होने का अहसास ऐसा था जैसे हम किसी क़िले में रह रहे हों। ऐसा क़िला, जिसके चारों ओर गहरी नहरें खुदी हुई हों, बुर्जे बहुत ऊँची हों, दीवारें सख़्त लाल चट्टानों की बनी हुई हों और हर बाहरी हमले के सामने हमारा क़िला अभेद्य हो।

पिताजी एक ख़ूब मज़बूत क़िला थे। उनके परकोटे पर हम सब कुछ भूलकर खेलते थे, दौड़ते थे। और, रात में ख़ूब गहरी नींद मुझे आती थी।

 

लेकिन उस दिन शाम को, जब पिताजी बाहर से टहलकर आए तो उनके टख़ने में पट्टी बँधी थी। थोड़ी देर में गाँव के कई लोग वहाँ आ गए। पता चला कि पिताजी को जंगल में तिरिछ (विषखापर, एक ज़हरीला लिज़ार्ड) ने काट लिया है।

हम सब जानते थे कि तिरिछ के काटने पर आदमी बच ही नहीं सकता। रात में, लालटेन की धुँधली-मटैली रौशनी में गाँव के बहुत से लोग हमारे आँगन में जमा हो गए थे। पिताजी उनके बीच थे, ज़मीन पर बैठे हुए। फिर पास के गाँव का चुटुआ नाई भी आया। वह अरंड के पत्ते और कंडे की राख से ज़हर उतारता था।

 

तिरिछ एक बार मैंने देखा था।

तालाब के किनारे जो बड़ी-बड़ी चट्टानों के ढेर थे, और जो दोपहर में ख़ूब गर्म हो जाते थे, उनमें से किसी चट्टान की दरार से निकलकर वह पानी पीने तालाब की ओर जा रहा था।

 

मेरे साथ थानू था। उसने बतलाया कि वह तिरिछ है, काले नाग से सौ गुना ज़्यादा उसमें ज़हर होता है। उसी ने बताया कि साँप तो तब काटता है, जब उसके ऊपर पैर पड़ जाए या कोई जब ज़बरदस्ती उसे तंग करे। लेकिन तिरिछ तो नज़र मिलते ही दौड़ता है। पीछे पड़ जाता है। उससे बचने के लिए कभी सीधे नहीं भागना चाहिए। टेढ़ा-मेढ़ा, चक्कर काटते हुए, गोल-मोल दौड़ना चाहिए।

दरअसल जब आदमी भागता है तो ज़मीन पर वह सिर्फ़ अपने पैरों के निशान ही नहीं छोड़ता, बल्कि हर निशान के साथ, वहाँ की धूल में, अपनी गंध भी छोड़ जाता है। तिरिछ इसी गंध के सहारे दौड़ता है। थानू ने बतलाया कि तिरिछ को चकमा देने के लिए आदमी को यह करना चाहिए कि पहले तो वह बिलकुल पास-पास क़दम रखकर, जल्दी-जल्दी कुछ दूर दौड़े फिर चार-पाँच बार ख़ूब लंबी-लंबी छलाँग दे। तिरिछ सूँघता हुआ दौड़ता आएगा, जहाँ पास-पास पैर के निशान होंगे, वहाँ उसकी रफ़्तार ख़ूब तेज़ हो जाएगी और जहाँ से आदमी ने छलाँग मारी होगी, वहाँ आकर वह उलझन में पड़ जाएगा। वह इधर-उधर तब तक भटकता रहेगा जब तक उसे अगले पैर का निशान और उसमें बसी गंध नहीं मिल जाती।

 

हमें तिरिछ के बारे में दो बातें और पता थीं। एक तो यह कि जैसे ही वह आदमी को काटता है, वैसे ही वह वहाँ से भागकर किसी जगह पेशाब करता है और उस पेशाब में लोट जाता है। अगर तिरिछ ने ऐसा कर लिया तो आदमी बच नहीं सकता। अगर उसे बचना है तो तिरिछ के पेशाब में लोटने के पहले ही, ख़ुद किसी नदी, कुएँ या तालाब में डुबकी लगा लेनी चाहिए या फिर तिरिछ के ऐसा करने के पहले ही उसे मार देना चाहिए।

दूसरी बात यह कि तिरिछ काटने के लिए तभी दौड़ता है, जब उससे नज़र टकरा जाए। अगर तिरिछ को देखो तो उससे कभी आँख मत मिलाओ। आँख मिलते ही वह आदमी की गंध पहचान लेता है और फिर पीछे लग जाता है। फिर तो आदमी चाहे पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा ले, तिरिछ पीछे-पीछे आता है।

 

मैं भी तमाम बच्चों की तरह उस समय तिरिछ से बहुत डरता था। मेरे दुःस्वप्न के सबसे ख़तरनाक पात्र दो ही थे—एक हाथी और दूसरा तिरिछ। हाथी तो फिर भी दौड़ता-दौड़ता थक जाता था और मैं पेड़ पर चढ़कर बच जाता था, या फिर उड़ने लगता था, लेकिन तिरिछ उसके सामने तो मैं किसी इंद्रजाल में बँध जाता था। मैं सपने में कहीं जा रहा होता तो अचानक ही किसी जगह वह मिल जाता, उसकी जगह तय नहीं होती थी। कोई ज़रूरी नहीं था कि वह चट्टानों की दरार में, पुरानी इमारतों के पिछवाड़े या किसी झाड़ी के पास दिखे—वह मुझे बाज़ार में, सिनेमा हाल में, किसी दुकान या मेरे कमरे में ही दिख सकता था।

मैं सपने में कोशिश करता कि उससे नज़र न मिलने पाए, लेकिन वह इतनी परिचित आँखों से मुझे देखता कि मैं अपने-आपको रोक नहीं पाता था और बस, आँख मिलते ही उसकी नज़र बदल जाती थी—वह दौड़ता था और मैं भागता था।

 

मैं गोल-गोल चक्कर लगाता, जल्दी-जल्दी पास-पास डग भरकर अचानक ख़ूब लंबी-लंबी छलाँगें लगाने लगता, उड़ने की कोशिश करता, किसी ऊँची जगह पर चढ़ जाता, लेकिन मेरी हज़ार कोशिशों के बावजूद वह चकमा नहीं खाता था। वह मुझे बहुत घाघ, समझदार, चतुर और ख़तरनाक लगता। मुझे लगता कि वह मुझे ख़ूब अच्छी तरह से जानता है। उसकी आँखों में मेरे लिए परिचय की जो चमक थी, उससे मुझे लगता कि वह मेरा ऐसा शत्रु है जिसे मेरे दिमाग़ में आने वाले हर विचार के बारे में पता है।

मेरा सबसे ख़ौफ़नाक, यातनादायक, भयाक्रांत और बेचैनी से भरा यही सपना था। भागते-भागते मेरा पूरा शरीर थक जाता, फेफड़े फूल जाते, मैं पसीने में लथ-पथ होकर बेदम होने लगता और एक बहुत ही डरावनी, सुन्न कर डालने वाली मृत्यु मेरे बिलकुल क़रीब आने लगती। मैं ज़ोरों से चीख़ता, रोने लगता। पिताजी को, थानू को या माँ को पुकारता और फिर मैं जान जाता कि यह सपना है। लेकिन यह पता चल जाने के बावजूद मैं अच्छी तरह से जानता कि तब भी मैं अपनी इस मृत्यु से नहीं बच सकता। मृत्यु नहीं—तिरिछ द्वारा अपनी हत्या से-और ऐसे में मैं सपने में ही कोशिश करता कि किसी तरह मैं जाग जाऊँ। मैं पूरी ताक़त लगाता, सपने के भीतर आँखें खोलकर फाड़ता, रौशनी को देखने की कोशिश करता और ज़ोर से कुछ बोलता। कई बार बिलकुल ऐन मौक़े पर मैं जागने में सफल भी हो जाता।

 

माँ बतलाती कि मुझे सपने में बोलने और चीख़ने की आदत है। कई बार उन्होंने मुझे नींद में रोते हुए भी देखा था। ऐसे में उन्हें मुझे जगा डालना चाहिए, लेकिन वे मेरे माथे को सहला कर मुझे रज़ाई से ढक देती थीं और मैं उसी ख़ौफ़नाक दुनिया में अकेला छोड़ दिया जाता था। अपनी मृत्यु-बल्कि अपनी हत्या से बचने की कमज़ोर कोशिश में भागता, दौड़ता चीख़ता।

वैसे, धीरे-धीरे मैंने अनुभवों से यह जान लिया था कि आवाज़ ही ऐसे मौक़े पर मेरा सबसे बड़ा अस्त्र है, जिससे मैं तिरिछ से बच सकता था। लेकिन दुर्भाग्य से, हर बार, इस अस्त्र की याद मुझे बिलकुल अंतिम समय पर आती थी। तब, जब वह मुझे बिलकुल पा लेने वाला होता। अपनी हत्या की साँसें मुझे छूने लगतीं, मौत के नशे से भरे एक निर्जीव लेकिन डरावने अँधेरे में मैं घिर जाता, लगता मेरे नीचे कोई ठोस आधार नहीं है−मैं हवा में हूँ और वह पल आ जाता, जब मेरे जीवन का अंत होने वाला होता। तभी, बिलकुल इसी एक बहुत ही छोटे और नाज़ुक पल में मुझे अपने इस अस्त्र की याद आती और मैं ज़ोर-ज़ोर से बोलने लगता और इस आवाज़ के सहारे मैं सपने से बाहर निकल आता। मैं जाग जाता।

 

कई बार माँ मुझसे पूछतीं भी कि मुझे क्या हो गया था। तब मेरे पास इतनी भाषा नहीं थी कि मैं उन्हें सब कुछ, एक-एक चीज़ उसी तरह बता पाता। अपनी इस असमर्थता के बारे में मुझे ख़ूब पता था और इसी वजह से मैं एक अजीब-से तनाव, बेचैनी और असहायता से भर जाता। अंत में हारकर इतना ही कह पाता कि “बहुत डरावना सपना था।”

जाने क्यों मुझे शक था कि पिताजी को उसी तिरिछ ने काटा था, जिसे मैं पहचानता था और जो मेरे सपने में आता था।

 

लेकिन एक अच्छी बात यह हुई थी कि जैसे ही वह तिरिछ पिताजी को काटकर भागा, पिताजी ने उसका पीछा करके उसे मार डाला था। तय था कि अगर वे फ़ौरन उसे नहीं मार पाते तो वह पेशाब करके उसमें ज़रूर लोट जाता। फिर पिताजी किसी हाल में न बचते। यही वजह थी कि पिताजी को लेकर मुझे उतनी चिंता नहीं रह गई थी। बल्कि एक तरह की राहत और मुक्ति की ख़ुशी मेरे भीतर धीरे-धीरे पैदा हो रही थी। कारण, एक तो यही कि पिताजी ने तिरिछ को तुरंत मार डाला था और दूसरा यह कि मेरा सबसे ख़तरनाक, पुराना परिचित शत्रु आख़िरकार मर चुका था। उसका वध हो गया था और अब मैं अपने सपने के भीतर, कहीं भी, बिना किसी डर के सीटी बजाता घूम सकता था।

उस रात देर तक हमारे आँगन में भीड़ रही आई। पिताजी की झाड़-फूँक चलती रही। काटे के ज़ख़्म को चीर कर ख़ून भी बाहर निकाला गया और कुएँ में डालने वाली लाल दवा (पोटेशियम परमैंगनेट) ज़ख़्म में भरा गया। मैं निश्चिंत था।

 

अगली सुबह पिताजी को शहर जाना था। अदालत में पेशी थी। उनके नाम सम्मन आया था। हमारे गाँव से लगभग दो किलोमीटर दूर से निकलने वाली सड़क से शहर के लिए बसें गुज़रती थीं। उनकी संख्या दिन भर में मुश्किल से दो या तीन थी। ग़नीमत थी कि पिताजी जैसे ही सड़क तक पहुँचे, शहर जाने वाला पास के गाँव का एक ट्रैक्टर उन्हें मिल गया। ट्रैक्टर में बैठे हुए लोग पहचान के थे। ट्रैक्टर दो-ढाई घंटे में शहर पहुँच जाने वाला था। यानी अदालत खुलने से काफ़ी पहले।

रास्ते में तिरिछ वाली बात चली। पिताजी ने अपना टख़ना उन लोगों को दिखलाया। ट्रैक्टर में पंडित राम औतार भी थे। उन्होंने बतलाया कि तिरिछ के ज़हर की एक ख़ासियत यह भी है कि कभी-कभी यह चौबीस घंटे बाद, ठीक उसी वक़्त, जिस वक़्त पिछले दिन तिरिछ काटता है, अपना असर दिखाता है। इसलिए अभी पिताजी को निश्चिंत नहीं होना चाहिए। ट्रैक्टर के लोगों ने पिताजी का ध्यान एक और बड़ी ग़लती की ओर खींचा। उनका कहना था कि यह तो पिताजी ने बहुत ठीक किया कि तिरिछ को फ़ौरन मार डाला, लेकिन इसके बाद भी तिरिछ को यूँही नहीं छोड़ देना चाहिए था। उसे कम-से-कम जला ज़रूर देना चाहिए था।

 

उन लोगों का कहना था कि बहुत-से कीड़े-मकोड़े और जीव-जंतु रात में चंद्रमा की रौशनी में दुबारा जी उठते हैं। चाँदनी में जो ओस और शीत होती है उसमें अमृत होता है और कई बार ऐसा देखा गया है कि जिस साँप को मरा हुआ समझकर रात में यूँ ही फेंक दिया जाता है, उसका शरीर चाँद की शीत में भीग कर दुबारा जी उठता है और वह भाग जाता है। फिर वह हमेशा बदला लेने की ताक में रहता है।

ट्रैक्टर के लोगों को शक था कि कहीं ऐसा न हो कि रात में जी उठने के बाद तिरिछ पेशाब करके उसमें लोट जाए। ऐसा हुआ तो चौबीस घंटे बीतते-बीतते, ठीक उसी घड़ी के आने पर, तिरिछ का जानलेवा ज़हर पिताजी पर चढ़ना शुरू हो जाएगा। उन लोगों ने सलाह भी दी कि पिताजी को वहीं से वापस लौट जाना चाहिए और अगर संयोग से, उस तिरिछ की लाश उसी जगह पड़ी हुई हो, तो उसे अच्छी तरह जलाकर राख कर देना चाहिए। लेकिन पिताजी ने उन्हें बताया कि पेशी कितनी ज़रूरी थी। यह तीसरा सम्मन थी। और अगर इस बार भी वे अदालत में हाज़िर न हुए तो ग़ैर-ज़मानती वारंट निकलने का डर था। पेशी भी हमारे उसी मकान को लेकर थी, जिसमें हमारा परिवार रह रहा था। वकील को पिछले दो बार की पेशी में फ़ीस भी नहीं दी जा सकी थी और कहीं अगर उसने लापरवाही दिखला दी और जज सनक गया तो वह हमारी कुड़की-डिक्री भी करवा सकता था।

 

विचित्र स्थिति थी कि अगर पिताजी उस तिरिछ की लाश को जलाने के लिए ट्रैक्टर से उतरकर, वहीं से, गाँव लौट आते तो ग़ैरज़मानती वारंट के तहत वे गिरफ़्तार कर लिए जाते और हमारा घर हमसे छिन जाता। अदालत हमारे ख़िलाफ़ हो जाती।

लेकिन पंडित राम औतार एक वैद्य भी थे। ज्योतिष पंचांग के अलावा उन्हें जड़ी-बूटियों की भी बड़ी गहरी जानकारी थी। उन्होंने सुझाया कि एक तरीक़ा ऐसा है, जिससे पिताजी पेशी में हाज़िर भी हो सकते हैं और तिरिछ के ज़हर से चौबीस घंटे के बाद बच भी सकते हैं। उन्होंने बताया कि चरक का निचोड़ इस सूत्र में है कि विष ही विष की औषधि होता है। अगर धतूरे के बीज कहीं मिल जाएँ तो वह तिरिछ के ज़हर की काट तैयार कर सकते हैं।

 

अगले गाँव सामतपुर में ट्रैक्टर रोक दिया गया और एक तेली के खेत में धतूरे के पौधे आख़िरकार खोज निकाले गए। धतूरे के बीजों को पीसकर उसे ताँबे के पुराने सिक्के के साथ उबालकर काढ़ा तैयार किया गया। काढ़ा बहुत कड़वा था इसलिए उसे चाय में मिलाया गया और पिताजी को वह चाय पिला दी गई। इसके बाद सभी निश्चिंत हो गए। एक बहुत बड़े ख़तरे से पिताजी को निकालने की कोशिश हो रही थी।

वैसे मुझे तिरिछ के बारे में तीसरी बात भी पता थी, जो पिताजी के जाने के कई घंटे बाद अचानक याद आ गई थी। यह बात साँप की उस बात से मिलती-जुलती थी, जिसके फलस्वरूप आगे चलकर कैमरे का आविष्कार हुआ था।

 

माना यह जाता था कि अगर कोई आदमी साँप को मार रहा हो तो अपने मरने से पहले वह साँप, अंतिम बार, अपने हत्यारे के चेहरे को पूरी तरह से, बहुत ग़ौर से देखता है। आदमी उसकी हत्या कर रहा होता है और साँप टकटकी बाँधकर उस आदमी के चेहरे की एक-एक बारीकी को अपनी आँख के भीतरी पर्दे में दर्ज कर रहा होता है। साँप की मृत्यु के बाद साँप की आँख के भीतरी पर्दे पर उस आदमी का चित्र स्पष्ट दर्ज हो जाता है।

बाद में, आदमी के जाने के बाद, उस साँप का दूसरा जोड़ा जाकर उस मरे हुए साँप की आँख के भीतर झाँकता है और इस तरह वह हत्यारा पहचान लिया जाता है। सारे साँप उसे पहचानने लगते हैं। फिर वह कहीं भी चला जाए, उससे बदला लेने की फ़िराक़ में वे रहते हैं। हर साँप उसका शत्रु होता है।

 

मुझे शक था कि मरे हुए तिरिछ की आँख के भीतरी पर्दे पर पिताजी का चेहरा दर्ज होगा। कोई दूसरा तिरिछ आकर उस लाश की आँख में से झाँकेगा और पिताजी वहाँ पहचान लिए जाएँगे। मेरे भीतर इस बात को लेकर बेचैनी पैदा हुई कि पिताजी ने यह सतर्कता क्यों नहीं बरती? उन्हें तिरिछ को मारने के साथ ही किसी पत्थर से उसकी दोनों आँखों को कुचलकर फोड़ देना चाहिए था। लेकिन अब क्या हो सकता था? पिताजी शहर जा चुके थे और मेरे सामने उलझन और चुनौती थी कि गाँव के पास फैले इतने बड़े जंगल में जिस जगह तिरिछ को मारकर उन्होंने छोड़ा था, वह जगह मैं खोज निकालूँ।

मैं थानू के साथ बोतल में मिट्टी का तेल, दियासलाई और डंडा लेकर जंगल में तिरिछ की खोज में भटकता रहा। मैं उसे अच्छी तरह से पहचानता था। बहुत अच्छी तरह। थानू निराश था।

 

फिर, मुझे अचानक ही लगने लगा कि इस जंगल को मैं अच्छी तरह से जानता हूँ। एक-एक पेड़ मेरा परिचित निकलने लगा। इसी जगह से कई बार सपने में मैं तिरिछ से बचने के लिए भागा था। मैंने ग़ौर से हर तरफ़ देखा—बिलकुल यही वह जगह थी। मैंने थानू को बताया कि एक सँकरा-सा नाला इस जगह से कितनी दूर दक्षिण की तरफ़ बहता है। नाले के ऊपर जहाँ बड़ी-बड़ी चट्टानें हैं, वहाँ कीकर का एक बहुत पुराना पेड़ है, जिस पर बड़े-बड़े शहद के छत्ते हैं। उन्हें देखकर लगता है कि वे कई शताब्दियों पुराने हैं। मैं उस भूरे रंग की चट्टान को जानता था, जो बरसात भर नाले के पानी में आधी डूबी रहती थी और बारिश के बीतने के बाद जब बाहर निकलती थी तो उसकी खोहों में कीचड़ भर जाती थी और अजीब-अजीब वनस्पतियाँ वहाँ से उग आती थीं। चट्टान के ऊपर हरी काई की एक पर्त-सी जम जाती थी। इसी चट्टान की सबसे ऊपर वाली दरार में तिरिछ रहता था। थानू इस बात को मेरी कल्पना मान रहा था।

लेकिन बहुत जल्द हमें वह नाला मिल गया। कीकर का वह बूढ़ा पेड़ भी, जिस पर शहद के छत्ते थे, और वह चट्टान भी। तिरिछ की लाश चट्टान से ज़रा हटकर, ज़मीन पर, घास के ऊपर चित्त पड़ी हुई थी। बिलकुल यह वही तिरिछ था। मेरे भीतर हिंसा और उत्तेजना और ख़ुशी की एक सनसनी दौड़ रही थी।

 

थानू ने और मैंने सूखे पत्ते और लकड़ियाँ इकट्ठी की, ख़ूब सारा मिट्टी का तेल उसमें डाला और आग लगा दी। तिरिछ उसमें जल रहा था। उसके जलने की चिरायंध गंध हवा में फैल रही थी। मेरा मन ज़ोर से चिल्लाने को हुआ लेकिन मैं डरा कि कहीं मैं जाग न जाऊँ और यह सब कुछ सपना न साबित हो जाए। मैंने थानू की ओर देखा। वह रो रहा था। वह मेरा बहुत अच्छा दोस्त था।

मेरे सपने में इसी जगह से निकलकर उस तिरिछ ने कई बार मेरा पीछा करना शुरू किया था। आश्चर्य था कि इतने लंबे अर्से से उसके अड्डे को इतनी अच्छी तरह से जानने के बावजूद कभी दिन में आकर मैंने उसे मारने की कोई कोशिश नहीं की थी।

 

मैं आज बेतहाशा ख़ुश था।

पंडित राम औतार ने बतलाया था कि ट्रैक्टर ने पौने दस बजे के लगभग शहर का चुंगीनाका पार किया था। वहाँ उन्हें नाके का टोल टैक्स चुकाने के लिए कुछ देर रुकना भी पड़ा था। वहाँ पर पिताजी ट्रैक्टर से उतरकर पेशाब करने गए थे। लौटने पर उन्होंने बताया था कि उनका सिर कुछ घूम-सा रहा है, तब तक पिताजी को धतूरे का काढ़ा पिए हुए तक़रीबन डेढ़ घंटा हो चुका था। ट्रैक्टर ने पिताजी को शहर में दस बजकर पाँच-सात मिनट के आसपास छोड़ दिया था। ट्रैक्टर में ही बैठे पलड़ा गाँव के मास्टर नंदलाल का कहना था कि जब शहर में, मिनर्वा टाकीज के पास वाले चौराहे पर पिताजी को ट्रैक्टर से उतारा गया, तब उन्होंने शिकायत की थी कि उनका गला कुछ सूख-सा रहा है। वे थोड़ा परेशान भी थे क्योंकि अदालत जाने का रास्ता उन्हें मालूम नहीं था और शहर के लोगों से पूछ-पूछकर कहीं जाने में उन्हें बहुत तकलीफ़ होती थी।

 

पिताजी के साथ एक दिक़्क़त यह भी थी कि गाँव या जंगल की पगडंडियाँ तो उन्हें याद रहती थीं, शहर की सड़कों को वे भूल जाते थे। शहर वे बहुत कम जाते थे। जाना ही पड़े तो अंतिम समय तक वे टालते रहते थे, तब तक, जब तक जाना बिलकुल ही ज़रूरी न हो जाए। कई बार तो ऐसा भी हुआ कि पिताजी सारा सामान लेकर शहर के लिए रवाना हुए और बस अड्डे से लौट आए। बहाना यह कि बस छूट गई। जब कि हम सब जानते थे कि ऐसा नहीं हुआ होगा। पिताजी ने बस को देखा होगा, फिर वे कहीं बैठ गए होंगे—पेशाब करने या पान खाने। फिर उन्होंने देखा होगा कि बस छूट रही है। उन्होंने ज़रा-सा और इंतिज़ार किया होगा। जब बस ने रफ़्तार पकड़ ली होगी—तब वे कुछ दूर तक दौड़े होंगे। फिर उनके क़दम धीमे पड़ गए होंगे और अफ़सोस और ग़ुस्सा प्रकट करते वे लौट आए होंगे। ऐसा करते हुए उन्हें स्वयं भी लगा होगा कि बस सचमुच छूट गई है। ऐसे में, जबकि हम मान चुके होते कि वे शहर जा चुके हैं, वह लौटकर हमें चकित कर देते।

ट्रैक्टर से मिनर्वा टाकीज के पास वाले चौराहे पर, सिंध वाच कंपनी के ठीक सामने लगभग दस बज कर सात मिनट पर उतरने के बाद से लेकर शाम छह बजे तक पिताजी के साथ शहर में जो कुछ भी हुआ, उसका सिर्फ़ एक धुँधला-सा अनुमान ही लगाया जा सकता है। यह जानकारी भी कुछ लोगों से बातचीत और पूछताछ के बाद मिली है। किसी की भी मृत्यु के बाद, अगर वह मृत्यु बहुत आकस्मिक और अस्वाभाविक ढंग से हुई हो, ऐसी जानकारियाँ मिल ही जाती है। उस दिन, बुधवार 17 मई, 1972 को सुबह दस-दस से लेकर शाम छह बजे तक, लगभग पौने आठ घंटे में पिताजी कहाँ-कहाँ गए, कहाँ-कहाँ उनके साथ क्या-क्या हुआ, इसका बहुत सही और विस्तृत ब्यौरा तो मिलना मुश्किल है। जो सूचनाएँ या जानकारियाँ बाद में मिली, उनके ज़रिए उन घटनाओं का सिर्फ़ अनुमान ही लगाया जा सकता है।

 

जैसा कि पलड़ा गाँव के मास्टर नंदलाल का कहना था कि जब पिताजी ट्रैक्टर से उतरे, तभी उन्होंने गला सूखने की शिकायत की थी। इसके पहले चुंगीनाका के पास, जब पेशाब करके पिताजी लौटे थे तो उन्होंने सिर घूमने की बात की थी। यानी पिताजी पर धतूरे के बीजों के काढ़े का असर होना शुरू हो गया था। वैसे भी शहर पहुँचने तक पिताजी को काढ़ा पिए हुए लगभग दो घंटे हो चुके थे। मेरा अनुमान है कि उस समय पिताजी को प्यास बहुत लगी होगी। गला भिगाने के लिए वे किसी होटल या ढाबे की तरफ़ गए भी होंगे, लेकिन जैसा कि मुझे उनके स्वभाव के बारे में पता है, वे वहाँ कुछ देर खड़े रहे होंगे, और फिर एक गिलास पानी माँगने का फैसला न कर सके होंगे। एक बार उन्होंने बताया भी था कि कुछ साल पहले गर्मियों के दिनों में जब उन्होंने किसी होटल में पानी माँगा था, तो वहाँ काम करने वाले नौकर ने उन्हें गाली दी थी। पिताजी बहुत संवेदनशील थे, इसलिए उन्होंने अपनी प्यास को दबाया होगा और वे वहाँ से चल पड़े होंगे।

सवा दस से लेकर लगभग ग्यारह बजे के बीच, पैंतालीस मिनट तक पिताजी कहाँ-कहाँ गए, इसकी कोई जानकारी कहीं से नहीं मिलती। इस बीच ऐसी कोई ख़ास घटना भी नहीं हुई, जिससे कोई कुछ कह सके। फिर शहर में सड़क पर आते-जाते लोगों में से किसी ने उन पर ध्यान दिया हो, उन्हें देखा हो, इसका पता लगाना भी मुश्किल है। वैसे मेरा अपना अंदाज़ा है कि इस बीच पिताजी ने कुछ लोगों से अदालत जाने का रास्ता पूछा होगा और उनके दिमाग़ में यह बात भी रही होगी कि वहाँ पहुँचकर वे अपने वकील एस.एन. अग्रवाल से पानी माँग लेंगे। लेकिन उनके पूछने पर या तो लोग चुप रह कर तेज़ी से आगे बढ़ गए होंगे या किसी ने इतनी बौखलाहट और जल्दबाज़ी में उन्हें कुछ बताया होगा, जो पिताजी ठीक से समझ नहीं सके होंगे और सिर्फ़ अपमानित, दुःखी और परेशान होकर रह गए होंगे। शहर में ऐसा होता ही है।

 

वैसे बीच के पौन घंटे के बारे में मेरा अपना अनुमान है कि इस बीच पिताजी पर काढ़े का असर काफी बढ़ गया होगा। मई की धूप और प्यास ने इस असर को और भी तेज, और भी गहरा कर दिया होगा। उनके पैर लड़खड़ाने भी लगे होंगे और बहुत संभव है कि एकाध बार, इस बीच, उन्हें चक्कर भी आ गए हों।

पिताजी ग्यारह बजे, शहर में देशबंधु मार्ग पर स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की इमारत में घुसे थे। वे वहाँ क्यों गए, इसकी वजह ठीक-ठीक समझ में नहीं आती। वैसे हमारे गाँव का रमेश दत्त शहर में भूमि विकास सहकारी बैंक में क्लर्क है। हो सकता है पिताजी के दिमाग में सिर्फ बैंक रहा हो और यहाँ से गुज़रते हुए अचानक उन्होंने स्टेट बैंक लिखा हुआ देखा हो और वे उधर घूम गए हों। उन्होंने अब तक पानी नहीं पिया था इसलिए उन्होंने सोचा होगा कि वे रमेश दत्त से पानी भी माँग लेंगे, अदालत जाने का रास्ता भी पूछ लेंगे और बता सकेंगे कि उनका सिर घूम-सा रहा है, यह भी कि कल शाम उन्हें तिरिछ ने काटा था। स्टेट बैंक के कैशियर अग्निहोत्री के अनुसार वह उस समय कैश रजिस्ट्री चेक कर रहा था। उसकी मेज़ पर लगभग अट्ठाइस हजार रुपयों की गड्डियाँ रखी हुई थीं। उस वक्त ग्यारह से दो-तीन मिनट ऊपर हुए होंगे, तभी पिताजी वहाँ आए। उनके चेहरे पर धूल लगी हुई थी, चेहरा डरावना था और अचानक ही उन्होंने जोर से कुछ कहा था। अग्निहोत्री का कहना था कि मैं अचानक डर गया। अमूमन ऐसे लोग बैंक के इतने भीतर, कैशियर की टेबिल तक नहीं पहुँच पाते। अग्निहोत्री का कहना यह भी था कि अगर वह पिताजी को एकाध मिनट पहले से अपनी ओर आता हुआ देख लेता, तब शायद न डरता। लेकिन हुआ यह कि वह पूरी तरह से कैश रजिस्टर के हिसाब-किताब में डूबा हुआ था, तभी अचानक ही पिताजी ने आवाज़ निकाली और सिर उठाते ही उन्हें देखकर वह डर गया और चीख पड़ा। उसने घंटी भी बजा दी।

 

बैंक के चपरासियों, दो चौकीदारों और दूसरे कर्मचारियों के अनुसार अचानक ही कैशियर की चीख और घंटी की आवाज से वे सब लोग चौंक गए और उस तरफ दौड़े, तब तक नेपाली चौकीदार थापा ने पिताजी को दबोच लिया था और मारता हुआ कॉमन रूप की तरफ़ ले जा रहा था। एक चपरासी रामकिशोर, जिसकी उम्र पैंतालीस के आस-पास थी, ने कहा कि उसने समझा कि कोई शराबी दफ़्तर में घुस आया है, या पागल और चूँकि उसकी ड्यूटी बैंक के मुख्य दरवाज़े पर थी इसलिए ब्रांच मैनेजर उसे चार्जशीट कर सकता था। लेकिन हुआ यह कि जब पिताजी को मारा जा रहा था, तभी उन्होंने अंग्रेजी में कुछ बोलना शुरू कर दिया। इसी वजह से चपरासियों का शक बढ़ गया। इसी बीच शायद असिस्टेंट ब्रांच मैनेजर मेहता ने यह कह दिया कि इस आदमी की अच्छी तरह से तलाशी ले लेना तभी बाहर निकलने देना। वैसे चपरासी रामकिशोर का कहना था कि पिताजी का चेहरा अजीब तरह से डरावना हो गया था। उस पर धूल जमा हो गई थी और उल्टी की बास आ रही थी। बैंक के चपरासियों ने पिताजी को ज़्यादा मारने-पीटने की बात से इनकार किया, लेकिन बैंक के बाहर, ठीक दरवाज़े के पास जो पान की दुकान है, उसमें बैठने वाले बुन्नू का कहना था कि जब साढ़े ग्यारह बजे के आस-पास पिताजी बैंक से बाहर आए तो उनके कपड़े फटे हुए थे और निचला होंठ कट गया था, जहाँ से ख़ून निकल रहा था। आँखों के नीचे सूजन और कत्थई चकत्ते थे। ऐसे चकत्ते बाद में बैंगनी या नीले पड़ जाते हैं।

इसके बाद, यानी साढ़े ग्यारह बजे से लेकर एक बजे के बीच पिताजी कहाँ-कहाँ गए, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। हाँ स्टेट बैंक के बाहर पान की दुकान लगाने वाले बुन्नू ने एक बात बताई थी हालाँकि इस बारे में वह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था, या हो सकता है कि स्टेट बैंक के कर्मचारियों से डर की वजह से वह साफ़-साफ़ बतलाने से कतरा रहा हो। बुन्नू ने बतलाया था कि स्टेट बैंक से बाहर निकलने पर शायद (वह ‘शायद’ पर बहुत ज़ोर डाल रहा था) पिताजी ने कहा था कि उनके रुपए और काग़ज़ात बैंक के चपरासियों ने छीन लिए हैं। लेकिन बुन्नू का कहना था कि हो सकता है पिताजी ने कोई और बात कही हो, क्योंकि वे ठीक से बोल नहीं पा रहे थे, उनका निचला होंठ काफ़ी कट गया था, मुँह से लार भी बह रही थी और उनका दिमाग़ सही नहीं था।

 

मेरा अपना अंदाज़ा है कि इस समय तक पिताजी पर काढ़े का असर बहुत ज़्यादा हो चुका था। हालाँकि पंडित राम औतार इस बात से इनकार करते हैं। उनका कहना था कि धतूरे के बीज तो होली के दिनों में भाँग के साथ भी घोटे जाते हैं, लेकिन कभी ऐसा नहीं होता कि आदमी पूरी तरह से पागल हो जाए। पंडित राम औतार का मानना है कि या तो तिरिछ का ज़हर उस समय पिताजी के शरीर में चढ़ना शुरू हो गया था और उसका नशा उनके दिमाग़ तक पहुँचने लगा था। या फिर बहुत संभव है कि जब स्टेट बैंक में पिताजी को थापा चौकीदार और चपरासियों ने मारा-पीटा था तब उनके सिर के पीछे की तरफ़ कोई चोट लग गई हो और उस धक्के से उनका दिमाग़ सनक गया हो। लेकिन मुझे लगता है कि उस समय तक पिताजी को थोड़ा-बहुत होश था और वे पूरी कोशिश कर रहे थे कि किसी तरह वे शहर से बाहर निकल जाएँ। शायद रुपए और अदालत के काग़ज़ात बैंक में छिन जाने की वजह से उन्होंने सोचा हो कि अब यहाँ रहने का कोई मतलब भी नहीं है। उन्होंने शायद एकाध बार सोचा भी होगा कि वापस स्टेट बैंक जाकर अपने काग़ज़ात तो कम-से-कम माँग लाएँ। फिर ऐसा करने की उनकी हिम्मत नहीं पड़ी होगी। वे डर गए होंगे। उन्हें उनके जीवन में पहली बार इस तरह से मारा गया था, इसलिए वे ठीक से सोच पाने में सफल नहीं हो पा रहे होंगे। उनका शरीर बहुत दुबला था और बचपन से ही उन्हें एपेंडिसाइटिस की शिकायत थी। यह भी हो सकता है कि उस वक़्त तक उन पर काढ़े का असर इतना ज़्यादा हो गया हो कि वे एक चीज़ पर देर तक सोच ही नहीं पा रहे हों और दिमाग़ में हर पल पैदा होने वाला, छोटे-छोटे बुलबुलों जैसे विचारों या नए-नए झटकों के वश में आकर इधर से उधर चल पड़ते रहे हों। लेकिन मैं यह जानता हूँ, मुझे अच्छी तरह से महसूस होता है कि उनके दिमाग़ में घर लौट आने और शहर से बाहर निकल जाने की बात-एक स्थाई, बार-बार कहीं अँधेरे से उभरने वाली, भले ही बहुत क्षीण और बहुत धुँधली बात-ज़रूर रही होगी।

पिताजी लगभग सवा बजे शहर के पुलिस थाना पहुँचे थे। थाना शहर के बाहरी छोर पर सर्किट हाउस के पास बने विजय स्तंभ के पास है। आश्चर्य यह है कि थाने से बमुश्किल एक किलोमीटर दूर अदालत भी है। अगर पिताजी चाहते तो यहाँ से पैदल ही दस मिनट में अदालत पहुँच सकते थे। समझ में यह नहीं आता कि पिताजी अगर यहाँ तक पहुँचे थे, क्या तब तक उनके दिमाग़ में अदालत जाने की बात रह भी गई थी? उनके काग़ज़ात तो रह नहीं गए थे।

 

थाने के एस.एच.ओ. राघवेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि उस वक़्त एक बजकर पंद्रह मिनट हुए थे। वे घर से लाए गए टिफ़िन को खोलकर लंच लेने की तैयारी कर रहे थे। आज टिफ़िन में पराठों के साथ करेले रखे हुए थे। करेले वे खा नहीं पाते और इसी उलझन में थे कि अब क्या करें। तभी पिताजी वहाँ आए थे। उनके शरीर पर क़मीज़ नहीं थी, पैंट फटी हुई थी। लगता था कि वे कहीं गिरे होंगे या किसी वाहन ने उन्हें टक्कर मारी होगी। थाने में उस वक़्त एक ही सिपाही गजाधर प्रसाद शर्मा मौजूद था। सिपाही का कहना था कि उसने सोचा कि शायद कोई भिखमंगा थाने में घुस आया है। उसने आवाज़ भी दी लेकिन पिताजी तब तक एस.एच.ओ. राघवेंद्र प्रताप सिंह की टेबिल तक पहुँच चुके थे। एस.एच.ओ. ने कहा कि करेलों की वजह से वैसे भी उनका मूड ऑफ़ था। तेरह साल के विवाहित जीवन के बावजूद पत्नी यह नहीं जान पाई थी कि उन्हें कौन-सी चीज़ें बिलकुल नापसंद हैं, इतनी नापसंद कि वे उन चीज़ों से घृणा करते हैं। उन्होंने जैसे ही निवाला मुँह में रखा, पिताजी बिलकुल उनके क़रीब पहुँच गए। पिताजी के चेहरे और कंधों के नीचे उल्टी लगी हुई थी और उसकी बहुत तेज़ गंध उठ रही थी। एस.एच.ओ. ने पूछा कि क्या बात है। तो जवाब में पिताजी ने जो कुछ कहा उसे समझना बहुत मुश्किल था। एस.एच.ओ. राघवेंद्र सिंह बाद में पछता रहे थे कि अगर उन्हें मालूम होता कि यह आदमी बकेली ग्राम का प्रधान और भूतपूर्व अध्यापक है तो वे उसे थाने में ही कम-से-कम दो-चार घंटे बिठा लेते। बाहर न जाने देते। लेकिन उस समय उन्हें लगा कि यह कोई पागल है और उन्हें खाते हुए देखकर यहाँ तक घुस आया है इसीलिए उन्होंने सिपाही गजाधर शर्मा को ग़ुस्से में आवाज़ दी। सिपाही पिताजी को घसीटता हुआ बाहर ले गया। गजाधर शर्मा का कहना था कि उसने पिताजी के साथ कोई मार-पीट नहीं की और उसने देखा था कि जब वे थाने आए थे तब उनका निचला होंठ कटा था। ठुड्डी पर कहीं रगड़ा खाकर गिरने से खरोंच के निशान थे और कुहनियाँ छिली हुई थीं। वे कहीं-न-कहीं गिरे ज़रूर थे।

यह कोई नहीं जानता कि थाने से निकलकर लगभग डेढ़ घंटे पिताजी कहाँ-कहाँ भटकते रहे। सुबह दस बजकर सात मिनट पर, जब वे शहर आए थे और मिनर्वा टाकीज के पास वाले चौराहे पर ट्रैक्टर से उतरे थे, तब से लेकर अब तक उन्होंने कहीं पानी पिया था या नहीं, इसे जानना मुश्किल है। इसकी संभावना भी कम ही बनती है। हो सकता है तब तक उनका दिमाग़ इस क़ाबिल न रह गया हो कि वे प्यास को भी याद रख सकें। लेकिन अगर वे पुलिस थाने तक पहुँचे तो उनके मस्तिष्क में, नशे के बावजूद, कहीं बहुत कमज़ोर-सा, अँधेरे में डूबा यह ख़याल रहा होगा कि वे किसी तरह अपने गाँव जाने का रास्ता वहाँ पूछ लें, या उस ट्रैक्टर का पता पूछे या फिर अपने रुपए और अदालती काग़ज़ात छिन जाने की रिपोर्ट वहाँ लिखा दें। यह सोचने के क़रीब पहुँचना ही बुरी तरह से बेचैन कर डालने वाला है कि उस समय पिताजी सिर्फ़ तिरिछ के ज़हर और धतूरे के नशे के ख़िलाफ़ ही नहीं लड़ रहे थे, बल्कि हमारे मकान को बचाने की चिंता भी कहीं-न-कहीं उनके नशे की नींद में से बार-बार सिर उठा रही थी। शायद उन्हें अब तक यह लगने लगा हो कि यह सब कुछ जो हो रहा है, सिर्फ़ एक सपना है, पिताजी इससे जागने और बाहर निकलने की कोशिश भी करते रहे होंगे।

 

सवा दो बजे के आस-पास पिताजी को शहर के बिलकुल उत्तरी छोर पर बसी सबसे संपन्न कॉलोनी-इतवारी कॉलोनी में घिसटते हुए देखा गया था। यह कॉलोनी सर्राफ़ा के जौहरियों, पी.डब्ल्यू.डी. के बड़े ठेकेदारों और रिटायर्ड अफ़सरों की कॉलोनी थी। कुछ समृद्ध पत्रकार-कवि भी वहीं रहते थे। यह कॉलोनी हमेशा शाँत और घटनाहीन रहती थी। जिन लोगों ने यहाँ पिताजी को देखा था, उन्होंने बताया कि उस वक़्त तक उनके शरीर में सिर्फ़ एक पट्टेदार जाँघिया बचा था, जिसका नाड़ा शायद टूट गया था और वे उसे अपने बाएँ हाथ से बार-बार सँभाल रहे थे। जिसने भी उन्हें वहाँ देखा, उसने यही समझा कि कोई पागल है। कुछ ने कहा कि वे बीच-बीच में खड़े होकर ज़ोर-ज़ोर से गालियाँ बकने लगते थे। बाद में, उसी कॉलोनी में रहने वाले एक रिटायर्ड तहसीलदार सोनी साहब और शहर के सबसे बड़े अख़बार के विशेष संवाददाता और कवि सत्येंद्र थपलियाल ने बताया कि उन्होंने पिताजी के बोलने को ठीक से सुना था और दरअसल वे गालियाँ नहीं बक रहे थे बल्कि बार-बार कह रहे थे—“मैं रामस्वारथ प्रसाद, एक्स स्कूल हेड मास्टर...एंड विलेज हेड ऑफ...ग्राम बकेली...!” कवि पत्रकार थपलियाल साहब ने दुःख ज़ाहिर किया। दरअसल उसी समय वे अमरीकी दूतावास की किसी ख़ास पार्टी में संगीत सुनने दिल्ली जा रहे थे इसलिए जल्दबाज़ी में वे चले गए। हाँ तहसीलदार सोनी साहब का कहना था कि “मुझे उस आदमी पर बहुत तरस आया और मैंने लड़कों को डाँटा भी। लेकिन दो-तीन लड़कों ने कहा कि यह आदमी रामरतन सर्राफ़ की बीवी और साली पर हमला करने वाला था।” तहसीलदार ने कहा कि ऐसा सुनने के बाद उन्हें भी लगा कि हो सकता है यह कोई बदमाश हो और नाटक कर रहा हो। लड़के उन्हें तंग करने में लगे थे और पिताजी बीच-बीच में ज़ोर-ज़ोर से बोलते थे, “मैं रामस्वारथ प्रसाद...एक्स स्कूल हेडमास्टर...

अगर हिसाब लगाया जाए तो मिनर्वा टाकीज के पास वाला चौराहा, जहाँ पिताजी ट्रैक्टर से सुबह दस बजकर सात मिनट पर उतरे थे, वहाँ से लेकर देशबंधु मार्ग का स्टेट बैंक फिर विजय स्तंभ के पास का थाना और शहर के बाहरी उत्तरी छोर पर बसी इतवारी कॉलोनी को मिलाकर वे अब तक लगभग तीस-बत्तीस किलोमीटर की दूरी तक भटक चुके थे। ये जगहें ऐसी हैं जो एक ही दिशा में नहीं है। इसका मतलब यह हुआ कि पिताजी की दिमाग़ी हालत यह थी कि उन्हें ठीक-ठीक कुछ सूझ नहीं रहा था और वे अचानक ही, किसी भी तरफ़ चल पड़ते थे। जहाँ तक सर्राफ़ की पत्नी और साली पर उनके हमला करने की बात है, जिसे थपलियाल साहब सच मानते हैं, मेरा अपना अनुमान है कि पिताजी उनके पास या तो पानी माँगने गए होंगे या बकेली जानेवाली सड़क के बारे में पूछने। उस एक पल के लिए पिताजी को होश ज़रूर रहा होगा। लेकिन इस हुलिए के आदमी को अपने इतना क़रीब देखकर वे औरतें डरकर चीख़ने लगी होंगी। वैसे, पिताजी की दाहिनी आँख के ऊपर भौंह पर जो चोट लगी थी और जिसका ख़ून रिसकर उनकी आँख पर आने लगा था, वह चोट उनको इतवारी कॉलोनी में ही लगी थी, क्योंकि बाद में लोगों ने बताया कि लड़के उन्हें बीच-बीच में ढेले मार रहे थे।

 

वह जगह इतवारी कॉलोनी से बहुत दूर नहीं है, जिस जगह पिताजी को सबसे ज़्यादा चोटें लगीं। नेशनल रेस्टोरेंट नाम के एक सस्ते से ढाबे के सामने की ख़ाली जगह पर पिताजी घिर गए थे। इतवारी कॉलोनी से लड़कों का जो झुंड उनके पीछे पड़ गया था, उसमें कुछ बड़ी उम्र के लड़के भी शामिल हो गए थे। नेशनल रेस्टोरेंट में काम करने वाले नौकर सत्ते का कहना था कि पिताजी ने ग़लती यह की थी कि एक बार उन्होंने ग़ुस्से में आकर भीड़ पर ढेले मारने शुरू कर दिए थे। शायद उन्हीं का एक बड़ा-सा ढेला सात-आठ साल के लड़के विकी अग्रवाल को लग गया था, जिसे बाद में कई टाँके लगे थे। सत्ते का कहना था कि इसके बाद झुंड ज़्यादा ख़तरनाक हो गया था। वे हल्ला मचा रहे थे और चारों तरफ़ से पिताजी पर पत्थर मार रहे थे। ढाबे के मालिक सरदार सतनाम सिंह ने बताया कि उस वक़्त पिताजी के जिस्म पर सिर्फ़ पट्टेवाली एक चड्डी थी, दुबले शरीर की हड्डियाँ और छाती के सफ़ेद बाल दिख रहे थे। पेट पिचका हुआ था। वे धूल और मिट्टी में लिथड़े हुए थे, सिर के सफ़ेद बाल बिखर गए थे, दाहिनी आँख के ऊपर से और निचले होंठ से ख़ून बह रहा था। सतनाम सिंह ने दु:ख और पछतावे के साथ कहा—“मेरे को क्या मालूम था कि यह आदमी सीधा-सादा, इज़्ज़तदार, साख-रसूख का इंसान है और नसीब के फेर में इसकी ये हालत हो गई है।” वैसे ढाबे में कप-प्लेट धोने वाले नौकर हरी का कहना था कि बीच-बीच में पिताजी भीड़ को अंड-बंड गालियाँ दे-देकर ढेले मारने लगते थे—“आओ ससुरो...आओ...एक-एक को मार डालूँगा भोसड़ीवालो ...तुम्हारी माँ की...” लेकिन मुझे संदेह है कि पिताजी ने ऐसी कोई गाली दी होगी। हमने कभी भी उन्हें गाली देते नहीं सुना था।

मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ, क्योंकि पिताजी को मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूँ कि, इस समय तक, उन्हें कई बार लगा होगा कि उनके साथ जो कुछ हो रहा है, वह वास्तविकता नहीं है, एक सपना है। पिताजी को ये सारी घटनाएँ ऊल-जलूल, ऊटपटाँग और बेमतलब लगी होंगी। वे इस सब पर अविश्वास करने लगे होंगे। उन्होंने सोचा होगा कि यह सब क्या बकवास है? वे तो गाँव से शहर आए ही नहीं हैं, उन्हें किसी तिरिछ ने नहीं काटा है। बल्कि तिरिछ तो होता ही नहीं है, एक मनगढ़ंत और अंधविश्वास है...और धतूरे का काढ़ा पीने की बात तो हास्यास्पद है, वह भी एक तेली के खेत में उसका पौधा खोजकर। उन्होंने सोचा होगा और पाया होगा कि भला उन पर कोई मुक़दमा क्यों चलेगा? उन्हें अदालत जाने की क्या ज़रूरत है?

 

मैं जानता हूँ कि सुरंग जैसा लंबा, सम्मोहक लेकिन डरावना सपना जैसा मुझे आता था, पिताजी को भी आता रहा होगा। मेरी और उनकी बहुत-सी बातें बिलकुल मिलती-जुलती थीं। मुझे लगता है कि इस समय तक पिताजी पूरी तरह से मान चुके होंगे कि यह जो कुछ हो रहा है सब झूठ और अवास्तविक है। इसीलिए वे बार-बार उस सपने से जागने की कोशिश भी करते रहे होंगे। अगर वे बीच-बीच में ज़ोर-ज़ोर से कुछ बोलने लगते थे, या शायद गालियाँ बकने लगते थे, तो इसी कठिन कोशिश में कि वे उस आवाज़ के सहारे उस दुःस्वप्न से बाहर निकल आएँ। नेशनल रेस्टोरंट के नौकरों और मालिक सरदार सतनाम सिंह ने जैसा बताया था उसके अनुसार उस जगह पर पिताजी को बहुत चोटें आई थीं। उनकी कनपटी, माथे, पीठ और शरीर के दूसरे हिस्सों पर कई ईंटें और ढेले आकर लग गए थे। सड़क का ठेका लेने वाले ठेकेदार अरोड़ा के बीस-बाइस साल के लड़के संजू ने उन्हें दो-तीन बार लोहे की रॉड से भी मारा था। सत्ते का तो कहना था कि इतनी चोटों से कोई भी आदमी मर सकता था।

मुझे यह सोचकर एक अजीब-सी राहत मिलती है और मेरी फँसती हुई साँसें फिर से ठीक हो जाती हैं कि उस समय पिताजी को कोई दर्द महसूस नहीं होता रहा होगा, क्योंकि वे अच्छी तरह से, पूरी तार्किकता और गहराई के साथ विश्वास करने लग गए होंगे कि यह सब सपना है और जैसे ही वे जागेंगे, सब ठीक हो जाएगा। आँख खुलते ही आँगन बुहारती माँ नज़र आ जाएगी या नीचे फ़र्श पर सोते हुए मैं और छोटी बहन दिख जाएँगे...या गौरइयों का झुंड...हो सकता है कि उन्हें बीच-बीच में अपने इस अजीब-ओ-ग़रीब सपने पर हँसी भी आई हो।

 

अगर पिताजी ने ग़ुस्से में लड़कों की तरफ़ ख़ुद भी ढेले मारने शुरू कर दिए तो इसके पीछे पहली वजह तो यही थी कि उन्हें यह बहुत अच्छी तरह से पता था कि ये ढेले सपने के भीतर जा रहे हैं और इससे किसी को कोई चोट नहीं आएगी। यह भी हो सकता है कि पूरी ताक़त से ढेला मार कर वे उत्सुकता और बेचैनी से यह इंतिज़ार करते रहे हों कि जैसे ही वह जाकर किसी लड़के के सिर से टकराएगा, उसका माथा नष्ट होगा और एक ही झटके में इस दुःस्वप्न के टुकड़े-टुकड़े बिखर जाएँगे और चारों ओर से वास्तविक संसार की बेतहाशा रौशनी अंदर आने लगेगी। उनका ज़ोर-ज़ोर से चीख़ना भी दरअसल ग़ुस्से के कारण नहीं था, वे असल में मुझे, छोटी बहन को, माँ को या किसी को भी पुकार रहे थे कि अगर वे अपने आप इस सपने से जाग पाने में सफल न भी हो पाएँ, तब भी कोई भी आकर उन्हें जगा दे।

एक सबसे बड़ी विडंबना भी इसी बीच हुई। हमारे गाँव की ग्राम पंचायत के सरपंच और पिताजी के बचपन के पुराने दोस्त पंडित कंधई राम तिवारी लगभग साढ़े तीन बजे नेशनल रेस्टोरंट के सामने, सड़क से गुज़रे थे। वे रिक्शे पर थे। उन्हें अगले चौराहे से बस लेकर गाँव लौटना था। उन्होंने उस ढाबे के सामने इकट्ठी भीड़ को भी देखा और उन्हें यह पता भी चल गया कि वहाँ पर किसी आदमी को मारा जा रहा है। उनकी यह इच्छा भी हुई कि वहाँ जाकर देखें कि आख़िर मामला क्या है। उन्होंने रिक्शा रुकवा भी लिया। लेकिन उनके पूछने पर किसी ने कहा कि कोई पाकिस्तानी जासूस पकड़ा गया है जो पानी की टंकी में ज़हर डालने जा रहा था, उसे ही लोग मार रहे हैं। ठीक इसी समय पंडित कंधई राम को गाँव जाने वाले बस आती हुई दिखी और उन्होंने रिक्शेवाले से अगले चौराहे तक जल्दी-जल्दी रिक्शा बढ़ाने के लिए कहा। गाँव जाने वाली यह आख़िरी बस थी। अगर उस बस के आने में तीन-चार मिनट की भी देरी हो जाती तो वे निश्चित ही वहाँ जाकर पिताजी को देखते और उन्हें पहचान लेते। राज्य परिवहन की वह बस हमेशा आधा-पौन घंटा लेट रहा करती थी, लेकिन उस दिन, संयोग से, वह बिलकुल सही समय पर आ रही थी।

 

सतनाम सिंह का कहना था कि वह भीड़ नेशनल रेस्टोरेंट के सामने से तब हटी और लोग तितर-बितर हुए जब बड़ी देर तक पिताजी ज़मीन से उठे ही नहीं। ईंट का एक बड़ा-सा ढेला उनकी कनपटी पर आकर लगा था। उनके मुँह से ख़ून आना शुरू हो गया था। सिर में भी चोटें थीं। सतनाम ने बताया कि जब पिताजी बहुत देर तक नहीं हिले-डुले तो लड़कों के झुंड में से किसी ने कहा कि लगता है यह मर गया। जब भीड़ छँटने के दस-पंद्रह मिनट बाद भी पिताजी नहीं हिले-डुले तो सतनाम सिंह ने सत्ते से कहा था कि वह उनके मुँह में पानी के छींटे मार कर देखे कि वे सिर्फ़ बेहोश हैं तो हो सकता है कि उठ जाएँ। लेकिन सत्ते पुलिस की वजह से डर रहा था। बाद में सतनाम सिंह ने ख़ुद ही एक बाल्टी पानी उनके ऊपर डाला था। दूर से पानी डालने के कारण ज़मीन की मिट्टी गीली होकर पिताजी के शरीर से लिथड़ गई थी।

सरदार सतनाम सिंह और सत्ते दोनों का कहना था कि लगभग पाँच बजे तक पिताजी उसी जगह पड़े हुए थे। तब तक पुलिस नहीं आई थी। फिर सतनाम सिंह ने सोचा कि कहीं उसे पंचनामा और गवाही वग़ैरा में न फँसना पड़ जाए इसलिए उसने ढाबा बंद कर दिया था और डिलाइट टाकीज में ‘आन मिलो सजना’ फिल्म देखने चला गया था।

 

उस समय लगभग छह बजे थे जब सिविल लाइंस की सड़क की पटरियों पर एक क़तार में बनी मोचियों की दुकानों में से एक मोची गनेशवा की गुमटी में पिताजी ने अपना सिर घुसेड़ा। उस समय तक उनके शरीर पर चड्डी भी नहीं रह गई थी, वे घुटनों के बल किसी चौपाए की तरह रेंग रहे थे। शरीर पर कालिख और कीचड़ लगी हुई थी और जगह-जगह चोटें थीं।

गनेशवा हमारे गाँव के तालाब के पार वाले टोले का मोची है। उसने बताया कि मैं बहुत डर गया और मास्टर साहब को पहचान ही नहीं पाया। उनका चेहरा डरावना हो गया था और चिन्हाई में नहीं आता था। मैं डर कर गुमटी से बाहर निकल आया और शोर मचाने लगा। दूसरे मोचियों के अलावा वहाँ कुछ और लोग भी इकट्ठा हो गए थे। लोगों ने जब गनेशवा की गुमटी के भीतर जाकर झाँका तो गुमटी के अंदर, उसके सबसे अंतरे-कोने में, टूटे-फूटे जूतों, चमड़ों के टुकड़ों, रबर और चिथड़ों के बीच पिताजी दुबके हुए थे। उनकी साँसें थोड़ी-बहुत चल रही थीं। उन्हें वहाँ से खींच कर, बाहर, पटरी पर निकाला गया। तभी गनेशवा ने उन्हें पहचान लिया। गनेशवा का कहना था कि उसने पिताजी के कान में कुछ आवाज़ें भी लगाईं लेकिन वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे। बहुत देर बाद उन्होंने ‘राम स्वारथ प्रसाद...’ और ‘बकेली’ जैसा कुछ कहा था। फिर चुप हो गए थे।

 

पिताजी की मृत्यु सवा छह बजे के आसपास हुई थी। तारीख थी 17 मई, 1972, चौबीस घंटे पहले लगभग इसी वक़्त उन्हें जंगल में तिरिछ ने काटा था। चौबीस घंटे पहले क्या पिताजी इन घटनाओं और इस मृत्यु का अनुमान कर सकते थे?

पिताजी का शव शहर के मुर्दाघर में पुलिस ने रखवा दिया था। पोस्टमार्टम में पता चला था कि उनकी हड्डियों में कई जगह फ्रैक्चर था, दाईं आँख पूरी तरह फूट चुकी थी, कॉलर बोन टूटा हुआ था। उनकी मृत्यु मानसिक सदमे और अधिक रक्तस्राव के कारण हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार उनका आमाशय ख़ाली था, पेट में कुछ नहीं था। इसका मतलब यही हुआ कि धतूरे के बीजों का काढ़ा उल्टियों द्वारा पहले ही निकल चुका था।

 

हालाँकि थानू कहता है कि अब तो यह तय हो गया कि तिरिछ के ज़हर से कोई नहीं बच सकता। ठीक चौबीस घंटे बाद उसने अपना करिश्मा दिखाया और पिताजी की मृत्यु हुई। पंडित राम औतार भी यही कहते हैं। हो सकता है कि पंडित राम औतार इसलिए ऐसा कहते हों कि वे ख़ुद को विश्वास दिलाना चाहते हों कि धतूरे के काढ़े का पिताजी की मृत्यु से कोई संबंध नहीं था।

मैं सोचता हूँ, अंदाज़ा लगाने की कोशिश करता हूँ कि शायद अंत में, जब गनेशवा ने अपनी गुमटी के बाहर, पिताजी के कान में आवाज़ दी होगी तो पिताजी सपने से जाग गए होंगे। उन्होंने मुझे, माँ को और छोटी बहन को देखा होगा—फिर वे दातून लेकर नदी की तरफ़ चले गए होंगे। नदी के ठंडे पानी से उन्होंने अपना चेहरा धोया होगा, कुल्ला किया होगा और इस लंबे दुःस्वप्न को वे भूल गए होंगे। उन्होंने अदालत जाने के बारे में सोचा होगा। हम लोगों के मकान की चिंता ने उन्हें परेशान किया होगा।

 

लेकिन मैं अपने सपने के बारे में बताना चाहता हूँ, जो मुझे अक्सर आता है। वह यूँ है—कि मैं खेतों की मेंड़, गाँव की पगडंडी से होता हुआ जंगल पहुँच गया हूँ। मैं रक्सा नाला, कीकर के पेड़ को देखता हूँ। वह भूरी चट्टान वहाँ उसी जगह है, जो सारी बारिश नाले के पानी में डूबी रहती है। मैं देखता हूँ कि तिरिछ की लाश उसके ऊपर पड़ी हुई है। मुझे एक बेतहाशा ख़ुशी अपने घेरे में ले लेती है। आख़िर वह मारा गया। मैं पत्थर लेकर तिरिछ को कुचलने लगता हूँ, ज़ोर-ज़ोर से उसे मारता हूँ। मेरे पास थानू मिट्टी का तेल और माचिस लिए खड़ा है। तभी, अचानक ही, मैं पाता हूँ कि मैं उस चट्टान पर नहीं हूँ। थानू भी वहाँ नहीं है, वहाँ कोई जंगल नहीं है बल्कि मैं दरअसल शहर में हूँ। मेरे कपड़े बहुत ही मैले, फटे और चिथड़ों जैसे हो गए हैं। मेरे गालों की हड्डियाँ निकली हैं। बाल बिखरे हैं। मुझे प्यास लगी है और मैं बोलने की कोशिश करता हूँ। शायद मैं बकेली, अपने घर जाने का रास्ता पूछना चाहता हूँ और तभी अचानक चारों ओर शोर उठता है...घंटियाँ बजने लगती हैं...हज़ारों-हज़ारों घंटियाँ...मैं भागता हूँ।

मैं भागता हूँ...मेरा पूरा शरीर बेदम होने लगता है, फेफड़े फूल जाते हैं। मैं पास-पास क़दम रख कर अचानक लंबी-लंबी छलाँगें लगाता हूँ, उड़ने की कोशिश करता हूँ। लेकिन भीड़ लगता है मेरे पास पहुँचने वाली होती है। एक अजीब-सी गर्म और भारी हवा मुझे सुन्न कर देती है। अपनी हत्या की साँसें मुझे छूने लगती हैं...और आख़िरकार वह पल आ जाता है, जब मेरे जीवन का अंत होने वाला होता है...

 

मैं रोता हूँ...भागने की कोशिश करता हूँ। मेरा पूरा शरीर नींद में ही पसीने में डूब जाता है। मैं ज़ोर-ज़ोर से बोल कर जागने की कोशिश करता हूँ...मैं विश्वास करना चाहता हूँ कि यह सब सपना है...और अभी आँख खोलते ही सब ठीक हो जाएगा...मैं सपने के भीतर अपनी आँखें फाड़ कर देखता हूँ...दूर तक...लेकिन वह पल आख़िर आ ही जाता है...

माँ बाहर से मुझे देखती है। मेरा माथा सहलाकर वह मुझे रज़ाई से ढाँप देती है और मैं वहाँ अकेला छोड़ दिया जाता हूँ। अपनी मृत्यु से बचने की कोशिश में जूझता, बेदम होता, रोता, चीख़ता और भागता।

 

माँ कहती हैं मुझे अभी भी नींद में बड़बड़ाने और चीख़ने की आदत है। लेकिन मैं पूछना चाहता हूँ और यही सवाल मुझे हमेशा परेशान करता है कि मुझे आख़िरकार अब तिरिछ का सपना क्यों नहीं आता?

 

उदय प्रकाश

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रविवार, 13 नवंबर 2011

मुहावरे (घ)

घंटा दिखाना : आवेदक या याचक को कोई वस्तु न देना, उसे निराश कर देना.

घट-घट में बसना : हर एक मनुष्य के हृदय में रहना.

घड़ियाँ गिनना : बहुत उत्कंठा के साथ प्रतीक्षा करना, मरणासन्न होना.

घड़ों पानी पड़ना : दूसरों के सामने हीन सिद्ध होने पर अत्यंत लज्जित होना.

घपले में पड़ना : किसी काम का खटाई में पड़ना.

घमंड में चूर होना : अत्यधिक अभिमान होना.

घर करना : बसना, रहना, निवास करना, जमना, बैठना.

घर का न घाट का : बेकाम, निकम्मा.

घर फूंककर तमाशा देखना : घर की दौलत उड़ाकर मौज करना.

घर में भूंजी भाँग न होना : घर में कुछ धन-दौलत न होना, अकिंचन होना, अत्यंत निर्धन होना.

घाट-घाट का पानी पीना : अनेक स्थलों का अनुभव प्राप्त करना. देश-देशान्तर के लोगों की जीवनचर्या की जानकारी प्राप्त करना.

घात में रहना : किसी को हानि पहुँचाने के लिए अनुकूल अवसर ढूँढते फिरना.

घाव पर नमक छिड़कना : दुख पर दुख देना, दुखी व्यक्ति को और यंत्रणा देना.

घाव पर मरहम रखना : सांत्वना देना, तसल्ली बंधाना.

घाव हरा होना : भूला हुआ दुख फिर याद आ जाना.

घास न डालना : प्रोत्साहन न देना, सहायता न करना.

घिग्घी बँध जाना : भय, क्षोभ या अन्य किसी संवेग के कारण मुंह से बोली न निकलना, कण्ठावरोध होना.

घी का चिराग जलाना : कार्य सिद्ध होने पर आनंद मनाना, प्रसन्न होना.

घी-खिचड़ी होना : आपस में अत्यधिक मेल होना.

घुट-घुट कर मरना : पानी या हवा के न मिलने से असह्य कष्ट भोगते हुए मरना.

घुटा हुआ : बहुत चालाक, धूर्त, छंटा हुआ बदमाश.

घुन लगना : शरीर का अंदर-अंदर क्षीण होना, चिंता होना.

घुल-मिल जाना : एक हो जाना.

घूंघट का पट खोलना : अज्ञान का परदा दूर करना.

घोड़ा बेंचकर सोना : खूब निश्चिंत होकर सोना.

घोलकर पी जाना : किसी चीज का अस्तित्व न रहने देना.

मंगलवार, 8 नवंबर 2011

गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर

नोबल पुरस्कार [साहित्य] विजेता गुरुदेव  रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म  7 मई, 1861 को कोलकाता के जोड़ासाँको ठाकुरबाड़ी में हुआ। वे देवेन्द्रनाथ टैगोर और शारदा देवी के पुत्र थे .
 उनकी पढ़ाई प्रतिष्ठित सेंट जेवियर स्कूल में हुई। बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री टैगोर सहज ही कला के कई स्वरूपों की ओर आकृष्ट हुए जैसे- साहित्य, कविता, नृत्य और संगीत। उन्होंने बैरिस्टर बनने की चाहत में 1878 में इंग्लैंड के ब्रिजटोन में पब्लिक स्कूल में नाम दर्ज कराया। उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय में कानून का अध्ययन किया लेकिन 1880 में बिना डिग्री हासिल किए ही स्वदेश वापस आ गए। सन् 1883 में मृणालिनी देवी के साथ उनका विवाह हुआ।
दुनिया की समकालीन सांस्कृतिक रुझान से वे भली-भाँति अवगत थे। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में टैगोर की चित्रकला यात्रा शुरू हुई। यह उनके कवित्य सजगता का विस्तार था। हालांकि उन्हें कला की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी उन्होंने एक सशक्त एवं सहज दृश्य शब्दकोश का विकास कर लिया था। श्री टैगोर की इस उपलब्धि के पीछे आधुनिक पाश्चात्य, पुरातन एवं बाल्य कला जैसे दृश्य कला के विभिन्न स्वरूपों की उनकी गहरी समझ थी। रबीन्द्रनाथ टैगोर को प्रकृति से बहुत प्यार था। वे गुरुदेव के नाम से लोकप्रिय थे। भारत आकर गुरुदेव ने फिर से लिखने का काम शुरू किया।
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रचनाएँ
रबीन्द्रनाथ ठाकुर एक बांग्ला कवि, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, नाटककार, निबंधकार और चित्रकार थे। जिन्हें 1913 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। टैगोर ने बांग्ला साहित्य में नए गद्य और छंद तथा लोकभाषा के उपयोग की शुरुआत की और इस प्रकार शास्त्रीय संस्कृत पर आधारित पारंपरिक प्रारूपों से उसे मुक्ति दिलाई। धर्म सुधारक देवेन्द्रनाथ टैगोर के पुत्र रबींद्रनाथ ने बहुत कम आयु में काव्य लेखन प्रारंभ कर दिया था। 1870 के दशक के उत्तरार्द्ध में वह इंग्लैंड में अध्ययन अधूरा छोड़कर भारत वापस लौट आए। भारत में रबींद्रनाथ टैगोर ने 1880 के दशक में कविताओं की अनेक पुस्तकें प्रकाशित की तथा मानसी (1890) की रचना की। यह संग्रह उनकी प्रतिभा की परिपक्वता का परिचायक है। इसमें उनकी कुछ सर्वश्रेष्ठ कविताएँ शामिल हैं, जिनमें से कई बांग्ला भाषा में अपरिचित नई पद्य शैलियों में हैं। साथ ही इसमें समसामयिक बंगालियों पर कुछ सामाजिक और राजनीतिक व्यंग्य भी हैं।

दो-दो राष्ट्रगानों के रचयिता रवीन्द्रनाथ टैगोर के पारंपरिक ढांचे के लेखक नहीं थे। वे एकमात्र कवि हैं जिनकी दो रचनाएँ दो देशों का राष्ट्रगान बनीं- भारत का राष्ट्र-गान जन गण मन और बांग्लादेश का राष्ट्रीय गान आमार सोनार बांग्ला गुरुदेव की ही रचनाएँ हैं। वे वैश्विक समानता और एकांतिकता के पक्षधर थे। ब्रह्मसमाजी होने के बावज़ूद उनका दर्शन एक अकेले व्यक्ति को समर्पित रहा। चाहे उनकी ज़्यादातर रचनाऐं बांग्ला में लिखी हुई हों। वह एक ऐसे लोक कवि थे जिनका केन्द्रीय तत्त्व अंतिम आदमी की भावनाओं का परिष्कार करना था। वह मनुष्य मात्र के स्पन्दन के कवि थे। एक ऐसे कलाकार जिनकी रगों में शाश्वत प्रेम की गहरी अनुभूति है, एक ऐसा नाटककार जिसके रंगमंच पर सिर्फ़ ‘ट्रेजडी’ ही ज़िंदा नहीं है, मनुष्य की गहरी जिजीविषा भी है। एक ऐसा कथाकार जो अपने आस-पास से कथालोक चुनता है, बुनता है, सिर्फ़ इसलिए नहीं कि घनीभूत पीड़ा के आवृत्ति करे या उसे ही अनावृत्त करे, बल्कि उस कथालोक में वह आदमी के अंतिम गंतव्य की तलाश भी करता है।
यहाँ पर उनकी दो लोकप्रिय रचनाएं प्रस्तुत हैं:-
                                             १.
आमार ए गान छेड़ेछे तार शॉकोल ऑलोंकार
तोमार कछे रखे नि आर शाजेर ऑहोंकार
ऑलोंकार जे माझे पॉड़े मिलॉनेते अड़ाल कॉरे,
तोमार कॉथा ढाके जे तार मुखॉरो झॉंकार ।

तोमार काछे खाटे ना मोर कोबिर गॉर्बो कॉरा,
मॉहाकोबि, तोमार पाये दिते जे चाइ धॉरा ।
जीबोन लोये जॉतोन कोरि जोदि शॉरोल बाँशि गॉड़ि,
आपोन शुरे दिबे भोरि सॉकोल छिद्रो तार ।
    
                     २.
धोने धान्ये पुष्पे भोरा, आमादेईर बसुन्धरा
ताहार माझे आछे देशेक सकोल देशेर शेरा
ओ जे स्वप्नों दिये तोइरी शे देश स्मृति दिये घेरा
ऐमोन देशटि कोथाये खुंजे पाबे नाको तुमि
सकोल देशेर रानी शे जे आमार जन्मोभूमि ।
चन्द्रो सुरजो ग्रोहो तारा कोथाये उजलो ऐमोन धारा
कोथाये ऐमोन खालेय तोरीर ऐमोन कालो मेघेय
ओ तार पाखिरे डाके घूमिये पोडी पाखिर डाके जागेय ।
एतो स्निग्धो नदी काहार कोथाये ऐमोन धूम्र पाहाड़
कोथाये ऐमोन होरित खेत्रो, आकाश तौलेय मेशे
ऐमोन धानेर ओपोर ढेऊ खेलेय जाय बाताश काहार देशे ।
पुष्पे पुष्पे भोरा साखी कुंजेय कुंजेय गाहेय पाखी
गूंजरिया आशेय ओली पूंजेय पूंजेय धेये
तारा फोलेर उपौर घूमिये पावरेय फुलेर मोधु खेये ।
ओ माँ तोमार चरोन दूटी बोक्खे आमार धोरी
आमार एई देशेतेय जन्मो जेनो एई देशेतेय मोरी ।
सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ
सियालदह और शजादपुर स्थित अपनी ख़ानदानी जायदाद के प्रबंधन के लिए 1891में टैगोर ने 10 वर्ष तक पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांगला देश) में रहे, वहाँ वह अक्सर पद्मा नदी (गंगा नदी) पर एक हाउस बोट में ग्रामीणों के निकट संपर्क में रहते थे और उन ग्रामीणों की निर्धनता व पिछड़ेपन के प्रति टैगोर की संवेदना उनकी बाद की रचनाओं का मूल स्वर बनी। उनकी सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ, जिनमें ‘दीन-हीनों’ का जीवन और उनके छोटे-मोटे दुख’ वर्णित हैं, 1890 के बाद की हैं और उनकी मार्मिकता में हल्का सा विडंबना का पुट है। जो टैगोर की निजी विशेषता है तथा जिसे निर्देशक सत्यजित राय अपनी बाद की फ़िल्मों में कुशलतापूर्वक पकड़ पाए हैं।
गल्पगुच्छ की तीन जिल्दों में उनकी सारी चौरासी कहानियाँ संगृहीत हैं,जिनमें से केवल दस प्रतिनिधि कहानियाँ चुनना टेढ़ी खीर है। 1891 से 1895 के बीच का पाँच वर्षों का समय रवीन्द्रनाथ की साधना का महान काल था। वे अपनी कहानियाँ सबुज पत्र (हरे पत्ते)में छपाते थे। आज भी पाठकों को उनकी कहानियों में ‘हरे पत्ते’ और ‘हरे गाछ’ मिल सकते हैं। उनकी कहानियों में सूर्य, वर्षा, नदियाँ और नदी किनारे के सरकंडे, वर्षा ऋतु का आकाश, छायादार गाँव, वर्षा से भरे अनाज के प्रसन्न खेत मिलते हैं। उनके साधारण लोग कहानी खत्म होते-होते असाधारण मनुष्यों में बदल जाते हैं। महानता की पराकाष्ठा छू आते हैं। उनकी मूक पीड़ा की करुणा हमारे हृदय को अभिभूत कर लेती है।
उनकी कहानी पोस्टमास्टर इस बात का सजीव उदाहरण है कि एक सच्चा कलाकार साधारण उपकरणों से कैसी अद्भुत सृष्टि कर सकता है। कहानी में केवल दो सजीव साधारण-से पात्र हैं। बहुत कम घटनाओं से भी वे अपनी कहानी का महल खड़ा कर देते हैं। एक छोटी लड़की कैसे बड़े-बड़े इंसानों को अपने स्नेह-पाश में बाँध देती हैं। ‘क़ाबुलीवाला’ भी इस बात का जीता-जागता उदाहरण है। रवीन्द्रनाथ ने पहली बार अपनी कहानियों में साधारण की महिमा का बखान किया।
रवीन्द्रनाथ की कहानियों में अपढ़ ‘क़ाबुलीवाला’ और सुसंस्कृत बंगाली भूत भावनाओं में एक समान हैं। उनकी क़ाबुलीवाला, मास्टर साहब और ‘पोस्टमास्टर’ कहानियाँ आज भी लोकप्रिय कहानियाँ हैं-लोकप्रिय और सर्वश्रेष्ठ भी और बनी रहेंगी। उनकी कहानियाँ सर्वश्रेष्ठ होते हुए भी लोकप्रिय हैं और लोकप्रिय होते हुए भी सर्वश्रेष्ठ हैं।
अपनी कल्पना के पात्रों के साथ रवीन्द्रनाथ की अद्भुत सहानुभूतिपूर्ण एकात्मकता और उसके चित्रण का अतीव सौंदर्य उनकी कहानी को सर्वश्रेष्ठ बना देते हैं जिसे पढ़कर द्रवित हुए बिना नहीं रहा जा सकता। उनकी कहानियाँ फ़ौलाद को मोम बनाने की क्षमता रखती हैं।
अतिथि का तारापद रवीन्द्रनाथ की अविस्मरणीय सृष्टियों में है। इसका नायक कहीं बँधकर नहीं रह पाता। आजीवन ‘अतिथि’ ही रहता है। क्षुधित पाषाण, आधी रात में (निशीथे) तथा ‘मास्टर साहब’ प्रस्तुत संग्रह की इन तीन कहानियों में दैवी तत्त्व का स्पर्श मिलता है। इनमें पहली ‘क्षुधित पाषाण’ में कलाकार की कल्पना अपने सुंदरतम रूप में व्यक्त हुई है। यहाँ अतीत वर्तमान के साथ वार्तालाप करता है-रंगीन प्रभामय अतीत के साथ नीरस वर्तमान। समाज में महिलाओं का स्थान तथा नारी जीवन की विशेषताएँ उनके लिए गंभीर चिंता के विषय थे और इस विषय में भी उन्होंने गहरी अंतर्दृष्टि का परिचय दिया है।
संगीत
राष्‍ट्रगान (जन गण मन) के रचयिता टैगोर को बंगाल के ग्राम्यांचल से प्रेम था और इनमें भी पद्मा नदी उन्हें सबसे अधिक प्रिय थी। जिसकी छवि उनकी कविताओं में बार-बार उभरती है। उन वर्षों में उनके कई कविता संग्रह और नाटक आए, जिनमें सोनार तरी (1894; सुनहरी नाव) तथा चित्रांगदा (1892) उल्लेखनीय है। वास्तव में टैगोर की कविताओं का अनुवाद लगभग असंभव है और बांग्ला समाज के सभी वर्गों में आज तक जनप्रिय उनके 2,000 से अधिक गीतों, जो ‘रबींद्र संगीत’ के नाम से जाने जाते हैं, पर भी यह लागू होता है।
चित्रकला
साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में टैगोर की चित्रकला यात्रा शुरू हुई। यह उनके कवित्य सजगता का विस्तार था। हालांकि उन्हें कला की कोई औपचारिक शिक्षा नहीं मिली थी उन्होंने एक सशक्त एवं सहज दृश्य शब्दकोष का विकास कर लिया था। श्री टैगोर की इस उपलब्धि के पीछे आधुनिक पाश्चात्य, पुरातन एवं बाल्य कला जैसे दृश्य कला के विभिन्न स्वरूपों की उनकी गहरी समझ थी। एक अवचेतन प्रक्रिया के रूप में आरंभ टैगोर की पांडुलिपियों में उभरती और मिटती रेखाएं ख़ास स्वरूप लेने लगीं। धीरे-धीरे टैगोर ने कई चित्रों को उकेरा जिनमें कई बेहद काल्पनिक एवं विचित्र जानवरों, मुखौटों, रहस्यमयी मानवीय चेहरों, गूढ़ भू-परिदृश्यों, चिड़ियों एवं फूलों के चित्र थे। उनकी कृतियों में फंतासी, लयात्मकता एवं जीवंतता का अद्भुत संगम दिखता है। कल्पना की शक्ति ने उनकी कला को जो विचित्रता प्रदान की उसकी व्याख्या शब्दों में संभव नहीं है। कभी-कभी तो ये अप्राकृतिक रूप से रहस्यमयी और कुछ धुंधली याद दिलाते हैं। तकनीकी रूप में टैगोर ने सर्जनात्मक स्वतंत्रता का आनंद लिया। उनके पास कई उद्वेलित करने वाले विषय थे जिनको लेकर बेशक कैनवस पर रंगीन रोशनाई से लिपा-पुता चित्र बनाने में भी उन्हें हिचक नहीं हुई। रोशनाई से बने उनके चित्र में एक स्वच्छंदता दिखती है जिसके तहत कूची, कपड़ा, रूई के फाहों, और यहाँ तक कि अंगुलियों के बख़ूबी इस्तेमाल किए गए हैं। टैगोर के लिए कला मनुष्य को दुनिया से जोड़ने का माध्यम है। आधुनिकवादी होने के नाते टैगोर विशेष कर कला के क्षेत्र में पूरी तरह समकालीन थे।
राष्ट्रगान (जन गण मन) के रचयिता टैगोर को बंगाल के ग्राम्यांचल से प्रेम था और इनमें भी पद्मा नदी उन्हें सबसे अधिक प्रिय थी। जिसकी छवि उनकी कविताओं में बार-बार उभरती है। उन वर्षों में उनके कई कविता संग्रह और नाटक आए, जिनमें सोनार तरी (1894; सुनहरी नाव) तथा चित्रांगदा (1892) उल्लेखनीय है।

टैगोर की कविताओं की पांडुलिपि को सबसे पहले विलियम रोथेनस्टाइन ने पढ़ा था और वे इतने मुग्ध हो गए कि उन्होंने अँग्रेज़ी कवि यीट्स से संपर्क किया और पश्चिमी जगत के लेखकों, कवियों, चित्रकारों और चिंतकों से टैगोर का परिचय कराया। उन्होंने ही इंडिया सोसायटी से इसके प्रकाशन की व्यवस्था की। शुरू में 750 प्रतियाँ छापी गईं, जिनमें से सिर्फ़ 250 प्रतियाँ ही बिक्री के लिए थीं। बाद में मार्च 1913 में मेकमिलन एंड कंपनी लंदन ने इसे प्रकाशित किया और 13 नवंबर 1913 को नोबेल पुरस्कार की घोषणा से पहले इसके दस संस्करण छापने पड़े। यीट्स ने टैगोर के अँग्रेज़ी अनुवादों का चयन करके उनमें कुछ सुधार किए और अंतिम स्वीकृति के लिए उन्हें टैगोर के पास भेजा और लिखाः ‘हम इन कविताओं में निहित अजनबीपन से उतने प्रभावित नहीं हुए, जितना कि यह देखकर कि इनमें तो हमारी ही छवि नज़र आ रही है।’ बाद में यीट्स ने ही अँग्रेज़ी अनुवाद की भूमिका लिखी। उन्होंने लिखा कि कई दिनों तक इन कविताओं का अनुवाद लिए मैं रेलों, बसों और रेस्तराओं में घूमा हूँ और मुझे बार-बार इन कविताओं को इस डर से पढ़ना बंद करना पड़ा है कि कहीं कोई मुझे रोते-सिसकते हुए न देख ले। अपनी भूमिका में यीट्स ने लिखा कि हम लोग लंबी-लंबी किताबें लिखते हैं जिनमें शायद एक भी पन्ना लिखने का ऐसा आनंद नहीं देता है। बाद में गीतांजलि का जर्मन, फ्रैंच, जापानी, रूसी आदि विश्व की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद हुआ और टैगोर की ख्याति दुनिया के कोने-कोने में फैल गई।
शांतिनिकेतन
1901 में टैगोर ने पश्चिम बंगाल के ग्रामीण क्षेत्र में स्थित शांतिनिकेतन में एक प्रायोगिक विद्यालय की स्थापना की। जहाँ उन्होंने भारत और पश्चिमी परंपराओं के सर्वश्रेष्ठ को मिलाने का प्रयास किया। वह विद्यालय में ही स्थायी रूप से रहने लगे और 1921 में यह विश्व भारती विश्वविद्यालय बन गया। 1902 तथा 1907 के बीच उनकी पत्नी तथा दो बच्चों की मृत्यु से उपजा गहरा दुख उनकी बाद की कविताओं में परिलक्षित होता है, जो पश्चिमी जगत में गीतांजली, साँग ऑफ़रिंग्स (1912) के रूप में पहुँचा। शांति निकेतन में उनका जो सम्मान समारोह हुआ था उसका सचित्र समाचार भी कुछ ब्रिटिश समाचार पत्रों में छपा था। 1908 में कोलकाता में हुए कांग्रेस अधिवेशन के सभापति और बाद में ब्रिटेन के प्रथम लेबर प्रधानमंत्री रेम्जे मेक्डोनाल्ड 1914 में एक दिन के लिए शांति निकेतन गए थे। उन्होंने शांति निकेतन के संबंध में पार्लियामेंट के एक लेबर सदस्य के रूप में जो कुछ कहा वह भी ब्रिटिश समाचार पत्रों में छपा। उन्होंने शांति निकेतन के संबंध में सरकारी नीति की भर्त्सना करते हुए इस बात पर चिंता व्यक्त की थी कि शांति निकेतन को सरकारी सहायता मिलना बंद हो गई है। पुलिस की ब्लेक लिस्ट में उसका नाम आ गया है और वहाँ पढ़ने वाले छात्रों के माता-पिता को धमकी भरे पत्र मिल रहे हैं। पर ब्रिटिश समाचार पत्र बराबर रवीन्द्रनाथ ठाकुर के इस प्रकार प्रशंसक नहीं रहे।
ब्रिटेन में गुरुदेव
रवीन्द्रनाथ ठाकुर 1878 से लेकर 1930 के बीच सात बार इंग्लैंड गए। 1878 और 1890 की उनकी पहली दो यात्राओं के संबंध में ब्रिटेन के समाचार पत्रों में कुछ भी नहीं छपा क्योंकि तब तक उन्हें वह ख्याति नहीं मिली थी कि उनकी ओर किसी विदेशी समाचार पत्र का ध्यान जाता। उस समय तो वे एक विद्यार्थी ही थे।
पहली पुस्तक का प्रकाशन
जब वे तीसरी बार 1912 में लंदन गए तब तक उनकी कविताओं की पहली पुस्तक का अंग्रेज़ी में अनुवाद प्रकाशित हो चुका था, अत: उनकी ओर ब्रिटेन के समाचार पत्रों का ध्यान गया। उनकी यह तीसरी ब्रिटेन यात्रा वस्तुत: उनके प्रशंसक एवं मित्र बृजेन्द्रनाथ सील के सुझाव एवं अनुरोध पर की गई थी और इस यात्रा के आधार पर पहली बार वहाँ के प्रमुख समाचार पत्र ‘द टाइम्स’ में उनके सम्मान में दी गई एक पार्टी का समाचार छपा जिसमें ब्रिटेन के कई प्रमुख साहित्यकार यथा डब्ल्यू.बी.यीट्स, एच.जी.वेल्स, जे.डी. एण्डरसन और डब्ल्यू.रोबेन्सटाइन आदि उपस्थित थे।
इसके कुछ दिन बाद ‘द टाइम्स’ में ही उनके काव्य की प्रशंसा में तीन पैराग्राफ लम्बा एक समाचार भी छपा और फिर उनकी मृत्यु के समय तक ब्रिटेन के समाचार पत्रों में उनके जीवन और कृतित्व के संबंध में कुछ-न-कुछ बराबर ही छपता रहा। इस पुस्तक से यह भी पता चलता है कि किस प्रकार परम्परागत रूप से भारत विरोधी समाचार पत्र उनके संबंध में चुप्पी ही लगाए रहे पर निष्पक्ष और भारत के प्रति सहानुभूति रखने वाले समाचार पत्रों ने बड़ी उदारता से उनके संबंध में समाचार, लेख आदि प्रकाशित किए। उदाहरणत: ब्रिटेन के कट्टर रुढ़िवादी कंजरवेटिव समाचार पत्र ‘डेली टेलीग्राफ’ ने उन्हें नोबेल पुरस्कार मिलने की सूचना तक प्रकाशित करना उचित नहीं समझा जबकि उस दिन के अन्य सभी समाचार पत्रों में इस सूचना के साथ ही पुरस्कृत कृति ‘गीतांजलि’ के संबंध में वहाँ के समीक्षकों की सम्मति भी प्रकाशित हुई।

‘गीतांजलि’ का अंग्रेज़ी अनुवाद प्रकाशित होने के एक सप्ताह के अंदर लंदन से प्रकाशित होने वाले प्रसिद्ध साप्ताहिक ‘टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट’ में उसकी समीक्षा प्रकाशित हुई थी और बाद में आगामी तीन माह के अंदर तीन समाचार पत्रों में भी उसकी समीक्षा प्रकाशित हुई। रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नोबेल पुरस्कार मिलने के संबंध में ब्रिटिश समाचार पत्रों में मिश्रित प्रतिक्रिया हुई। इस संबंध में ‘द टाइम्स’ ने लिखा था कि ‘स्वीडिश एकेडेमी’ के इस अप्रत्याशित निर्णय पर कुछ समाचार पत्रों में आश्चर्य व्यक्त किया गया है’ पर इस पत्र के स्टाकहोम स्थित संवाददाता ने अपने डिस्पेच में लिखा था कि स्वीडन के प्रमुख कवियों और लेखकों ने स्वीडिश कमेटी के सदस्यों की हैसियत से नोबेल कमेटी के इस निर्णय पर पूर्ण संतोष व्यक्त किया है। इसी संबंध में ब्रिटेन के प्रतिष्ठित समाचार पत्र ‘मेन्चेस्टर गार्डियन’ ने लिखा था कि रवीन्द्रनाथ टैगोर को नोबेल पुरस्कार मिलने की सूचना पर कुछ लोगों को आश्चर्य अवश्य हुआ पर असंतोष नहीं। टैगोर एक प्रतिभाशाली कवि हैं। बाद में ‘द केरसेण्ट मून’ की समीक्षा करते हुए एक समाचार पत्र ने लिखा था कि इस बंगाली (यानी रवीन्द्रनाथ ठाकुर) का अंग्रेज़ी भाषा पर जैसा अधिकार है वैसा बहुत कम अंग्रेज़ों का होता है।
जलियाँवाला काँड की निंदा
1919 में हुए जलियाँवाला काँड की जब रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने निंदा की तो ब्रिटिश समाचार पत्रों का रुख एकाएक बदल गया। रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने जलियाँवाला काण्ड के विरोध स्वरूप अपना ‘सर’ का खिताब लौटाते हुए वाइसराय को जो पत्र लिखा वह भी ब्रिटिश समाचार पत्रों ने छापना उचित नहीं समझा। पर लॉर्ड माण्टेग्यू ने पार्लियामेंट में जब घोषणा की कि ‘सर रवीन्द्रनाथ को दिया गया खिताब वापिस नहीं लिया गया है’ तो यह समाचार ब्रिटिश समाचार पत्रों में अवश्य छपा। ‘डेली टेलीग्राफ’ ने तो व्यंग्यपूर्वक यह भी लिखा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के अंग्रेज़ी प्रकाशक मेकमिलन्स उनके नाम के साथ अभी भी ‘सर’ छाप रहे हैं। 1941 में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मृत्यु पर ब्रिटिश समाचार पत्रों ने जो कुछ लिखा उससे जान पड़ता है मानो उनके सिर पर से एक बहुत बड़ा भारी बोझ हट गया है। एक समाचार पत्र ने उनके मृत्यु लेख में लिखा कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर को इस बात के लिए मनाने की कोशिश की गई थी कि वे अपने ‘सर’ के खिताब को वापिस करने के निर्णय पर पुनर्विचार करें।
‘द टाइम्स’ ने हाउस ऑफ़ कॉमन्स की कार्यवाही का उल्लेख करते हुए लिखा कि अंडर सेक्रेटरी फ़ॉर इंडिया ने यह माना था कि उनकी पुस्तक ‘रूस के पत्र’ के अनुवाद में एक पूरे परिच्छेद में तथ्यों को जानबूझकर तोड़ा-मरोड़ा गया था जिससे भारत में ब्रिटिश शासन की निंदा हो। इस प्रकार तथ्यों को तोड़े-मरोड़े जाने और तरह-तरह के आरोपों के बावज़ूद अधिकांश समाचार पत्रों में रवीन्द्रनाथ ठाकुर के संबंध में प्राय: प्रशंसात्मक लेख ही छपते रहे। 1921 में छपे एक समाचार से पता चलता है कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की लंदन से पेरिस की पहली हवाई यात्रा का पूरा खर्च चेकोस्लावाकिया की सरकार ने दिया था।
जनसंहार की प्रतिक्रियाएँ

रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने इस हत्याकाण्ड के मुखर विरोध किया और विरोध स्वरूप अपनी ‘नाइटहुड’ की उपाधि को वापस कर दिया था। आज़ादी का सपना ऐसी भयावह घटना के बाद भी पस्त नहीं हुआ। इस घटना के बाद आज़ादी हासिल करने की इच्छा और ज़ोर से उफन पड़ी। यद्यपि उन दिनों संचार के साधन कम थे, फिर भी यह समाचार पूरे देश में आग की तरह फैल गया। ‘आज़ादी का सपना’ पंजाब ही नहीं, पूरे देश के बच्चे-बच्चे के सिर पर चढ़ कर बोलने लगा। उस दौरान हज़ारों भारतीयों ने जलियांवाला बाग़ की मिट्टी से माथे पर तिलक लगाकर देश को आज़ाद कराने का दृढ़ संकल्प लिया।

सम्मान
टैगोर के गीतांजली (1910) समेत बांग्ला काव्य संग्रहालयों से ली गई कविताओं के अंग्रेज़ी गद्यानुवाद की इस पुस्तक की डब्ल्यू.बी.यीट्स और आंद्रे जीद ने प्रशंसा की और इसके लिए टैगोर को 1913 में नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया।
विदेशी यात्रा
1912 में टैगोर ने लंबी अवधि भारत से बाहर बिताई, वह यूरोप, अमेरिका और पूर्वी एशिया के देशों में व्याख्यान देते व काव्य पाठ करते रहे और भारत की स्वतंत्रता के मुखर प्रवक्ता बन गए। हालांकि टैगोर के उपन्यास उनकी कविताओं और कहानियों जैसे असाधारण नहीं हैं, लेकिन वह भी उल्लेखनीय है। इनमें सबसे ज़्यादा लोकप्रिय है गोरा (1990) और घरे-बाइरे (1916; घर और बाहर), 1920 के दशक के उत्तरार्द्ध में टैगोर ने चित्रकारी शुरू की और कुछ ऎसे चित्र बनाए, जिन्होंने उन्हें समकालीन अग्रणी भारतीय कलाकारों में स्थापित कर दिया।

उनके विषय में अनेक उल्लेखनीय बाते हैं जैसे कि -

उन्होंने एक हजार से भी अधिक कविताओं तथा दो हजार से भी अधिक गीतों की रचना की है!
वे एक संगीतकार, अभिनेता, गायक और जादूगर भी थे!
उनके लिखे गीत दो देशों के राष्ट्रगान हैं – एक भारत का और दूसरा बँगलादेश का!
आज भी बंगाल में उनके गीत-संगीत के बगैर कोई समारोह शुरू नहीं होता!

मृत्यु
भारत के राष्ट्रगान के प्रसिद्ध रचयिता रबीन्द्रनाथ ठाकुर की मृत्यु 7 अगस्त, 1941 को कलकत्ता में हुई थी।
[साभार– भारत कोश व अन्य]

शुक्रवार, 4 नवंबर 2011

हमारे समाज में हो रहे बदलाव

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आज जिस तरह से हमारे समाज में बदलाव हो रहे हैं ऐसे हालात में अच्छे और बुरे में पहचान करना बहुत ही कठिन कार्य हो गया है.
हमारे इस आधुनिक समाज में पढ़ाई-लिखाई को बहुत महत्व दिया जा रहा है मगर पढ़े-लिखे लोग ही अच्छे लोग हों यह जरूरी नहीं है. बहुत अफसोस की बात है कि हमें जो पढ़ाया जा रहा है वह व्यावहारिक नहीं है और यह किताबी पढ़ाई हमें आदमी से मशीन बना रही है व हमें एक दूसरे के सुख-दुख से दूर करती जा रही है.
हम सभ्य और विकसित होने का दावा तो करते हैं मगर किसी के दुख या परेशानी में शामिल होने के लिये हमारे पास समय नहीं है. हमारे समाज में आज सीधे-सादे और अच्छे लोगों की कोई इज्जत नही होती है और उन्हें परेशान किया जाता है जबकि भ्रष्ट और दुराचारी लोगों का सम्मान किया जाता है.
आज के इस आधुनिक समाज में सादगी और सदाचारी की जगह बनावटी और भ्रष्टाचारी लोगों का का राज है जो जनता के सामने तो सदाचार और नैतिकता की बातें करते हैं मगर पीठ पीछे दुराचार और अनैतिक बातों में लगे रहते हैं.
हम आज जिस आधुनिक समाज में रह रहे हैं वह हमें अपने अधिकारों के बारे में तो हमें बताता है मगर हमें अपने कर्तव्यों के बारे में जागरूक नहीं करता जैसे कि हमारे पूर्वजों ने जो पेड़ लगाये थे उन पेड़ों से हमें शुद्ध और ताजी हवा मिलती है, मीठे फल मिलते हैं और ठंडी छांव मिलती है. हम लोग अपने पूर्वजों के लगाये हुये पेड़ तो अपनी जरूरतों के लिये काट देते हैं मगर अपनी आने वाली पीढ़ी के लिये पेड़ नहीं लगाते जिसकी वजह से आने वाली पीढि़यों को शुद्ध और ताजी हवा, मीठे फल और ठंडी छांव कैसे मिल पायेगी इसके बारे में हम नहीं सोचते.
आज हमें जरूरत है ऐसी पढ़ाई की जो हमें अपने अधिकारों के बारे में तो पढ़ाये ही और साथ ही हमे अपने कर्तव्यों के बारे में जागरूक भी बनाये जिससे हम पढ़ें-लिखें और साथ में एक अच्छे इंसान भी बन सकें.[कृष्ण धर शर्मा] 

सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

गोवर्धन पर्वत [गिरीराज]

मथुरा से कुछ दूरी पर स्थित है गोवर्धन पर्वत यह पावन धाम हिंदुओं का प्रसिद्ध तीर्थ स्थल है. जहां भगवान श्री कृष्ण ने अनेक लीलाएं की थी. अपने पौराणिक महत्व के फलस्वरूप यह पर्वत सभी के लिए पूजनिय धाम बना है. गोवर्धन पर्वत जिसे गिरीराज के नाम से भी जाना जाता है . 
गोवर्धन पर्वत पर अनेक पवित्र स्थल मौजूद हैं जो जिनका दर्शन पाकर सभी धन्य होते हैं. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की तिथी को गोवर्धन पूजा की जाती है इस दिन अन्न कुट, मार्गपाली आदि का आयोजन किया जाता है. यह ब्रज का मुख्य त्यौहार होता है. 
अन्नकुट जिसे गोवर्धन पूजा भी कहा जाता बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है़ इस दिन गाय बैल का पूजन किया जाता है उन्हें फूल माला, चन्दन आदि लगाया जाता है.  गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर उसका पूजन होता है तथा परिक्रमा की जाती है. 

  
    

गोवर्धन पर्वत कथा

इस पर्वत के साथ अनेक कथाएं जुड़ी हुई हैं. कहते हैं कि यह पर्वत रोज कम होता जाता है. 
किंवदंती अनुसार एक बार मुनी पुलस्थय भ्रमण करते हुए गोवर्धन पर्वत जा पहूँचे,  वहां का सुंदर मनोहर नजारा देखकर उनका हृदय प्रसन्न हो गया उनके मन में  गोरिराज को अपने साथ ले जाने का विचार उत्पन्न हुआ. 
मुनी ने राजा से ओरोंकल गोवर्धन ले जाने की बात रखी उन्हों ने कहा की वह जहां से आए हैं वहां पर एक भी सुंदर पर्वत नहीं है अत: आप इस अनमोल रत्न को मुझे सौंप दें. परंतु राजा ने मुनी को कुछ और मांगने को कहा वह उसे नही देना चाहते थे. यह सब बातें गोवर्धन ने सुन ली और मुनी से कहा की मैं आपके साथ जाने के लिए तैयार हूं किंतु मेरी एक शर्त है कि आप मुझे जहां भी रखेगें मै वहीं पर रूक जाऊंगा और वहां से हिलूंगा भी नही. 
मुनी ने यह बात स्वीकार कर ली. पुलस्थय मुनि गोवर्धन को अपने दायें हाथ पर रख कर कली के लिए निकल पडे़. जब मुनी ब्रज से गुजर रहे थे तब मुनी साधना के लिए रूक गए और उन्होंने गोवर्धन को भूल वश वहीं रख दिया तथा जब मुनी की अराधना समाप्त हुई तो उन्होंने पर्वत को उठाना चाहा परंतु गोवर्धन तो वहीं पर स्थिर हो चुका था. 
उन्हें गोवर्धन की कही बात याद आई परंतु ऋषि न माने और हठ करने लगे इतने पर भी जब पर्वत अपने स्थान से नही हिला तो उन्हें बहुत क्रोध आया ओर क्रोधवश उन्होंने पर्वत को शाप देते हुए कहा कि गोवर्धन तुम घरती में धसते चले जाओंग ओर एक दिन पूर्ण रुप से धरती के गर्भ में समा जाओगे. इसी कारण गोवर्धन प्रतिदिन नीचे धसते चले जा रहे हैं. 
इसके अतिरिक्त कहते हैं कि गोवर्धन पर्वत को भगवान कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा अँगुली पर उठा लिया था और इन्द्र के प्रकोप से ब्रज वासियों की रक्षा की थी तब से गोवर्धन पूजा की जाती है.
कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की तिथी को गोवर्धन पूजा की जाती है इस दिन अन्न कुट, मार्गपाली आदि का आयोजन किया जाता है. यह ब्रज का मुख्य त्यौहार होता है. अन्नकुट जिसे गोवर्धन पूजा भी कहा जाता बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है़ इस दिन गाय बैल का पूजन किया जाता है उन्हें फूल माला, चन्दन आदि लगाया जाता है.  गोबर से गोवर्धन पर्वत बनाकर उसका पूजन होता है तथा परिक्रमा की जाती है. 

 

गोवर्धन धार्मिक स्थल

गोवर्धन में अनेक रमणीय स्थल देखने को मिलते हैं इसकी परिक्रमा करते समय रास्ते में प्रमुख स्थल देखे जा सकते हैं जिनका अपना एक इतिहास है और कुछ भगवान की लीलाओं का आधार रहे. मार्ग मे अनेक कुण्ड दिखाई पड़ते है जिसमें से कुछ प्रमुख स्थल इस प्रकार हैं 

दान घाटी

  गोवर्धन के मार्ग पर  यह मन्दिर स्थित है यहां पर एक सुंदर मंदिर स्थापित है और जब गोवर्धन परिक्रमा की शुरूआत की जाती है तब इसी मंदिर से आरंम्भ होते हुए यहीं पर समाप्त भी होती है. मान्यता है कि इसी स्थान पर कृष्ण भगवान ने दानी बनकर गोपीयों से दान मांगा था ओर राधा ने दान दिया था.
कृष्ण की इस लीला का वर्णन अनेक कवियों ने अपने ग्रंथों में किया है. इस मन भावन लीला का वर्णन गौडी़य संप्रदाय के लोग भक्ति रस के गीतों मे करते रहे हैं वहीं  दानकेलि कौमुदी आदि ग्रन्थों में इस प्रेम लीला का वर्णन मिलता है. इस प्रसंग के कारण ही इस जगह को दान घाटी के नाम से जाना जाता है तथा मंदिर में विराजमान गोवर्धन  शीला का दूधाभिषेक किया जाता.
 

जतीपुरा


जतीपुरा जो गोपालपुरा के नाम से भ जाना जाता था में श्रीनाथ भगवान का मंदिर है कहते हैं यहीं पर कृष्ण के परम भक्त कवि सूरदास जी भगवान के गितों को गाया करते थे तथा कीर्तन किया करते थे. यह स्थल बल्लभ सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र रहा है यहां  बल्लभ सम्प्रदाय के अनेक मन्दिर देखे जा सकते हैं. यहीं मुखारबिन्द है. बिलछू कुण्ड , ढाक, श्याम, हरजी कुण्ड, गोविन्द स्वामी की कदम्ब खण्डी आदि ऐतिहासिक स्थान भी हैं. 

श्रीलौठाजी मन्दिर


गोवर्धन से कुछ दूरी पर स्थित है पूंछरी गांव जो परिक्रमा मार्ग में आता है यहां  श्रीलौठाजी का मन्दिर स्थापित है मान्यता है कि भगवान कृष्ण के एक मित्र थे लौठा जब भगवान ब्र्ज छोड़कर जा रहे थे तोउन्होंने लौठा को भी अपने साथ चलने को कहा परंतु उन्होंने मना कर दिया और कहा की जब तक तुम वापस ब्रज नहीं आते तब तक मै अन्न जल ग्रहण नहीं करूंगा ओर अपने प्राण त्याग दूंगा.
इस पर श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया की तुम्हे कुछ नही होगा तुम जीवित रहोगे. तभी से लौठाजी तपस्या मे लीन हैं और उन्हें यकीन है कि भगवान यहां वापस जरूर आएंगे अत: यहां श्रीलौठाजी का मन्दिर स्थापित है. सभी भक्त लोग यहां आकर अदभुत शांति का अनुभव करते हैं एक भक्त की अनूठी श्रद्धा का प्रतीक है यह मंदिर. 

मानसी गंगा


गोवर्धन गाँव के बीच में श्री मानसी गंगा है इस पर एक कथा प्रचलित है एक बार सभी ब्रजवासी गंगा स्नान करने के लिए गंगा धाम जाने लगे संध्या समय वे गोवर्धन पहुँचे ओर वहीं पर रात्रि व्यतीत करने का विचार व्यक्त किया भगवान कृष्ण मन में विचारते है. 
ब्रज तो तीर्थों का स्थल है यहां से कहीं ओर जाने की क्या आवश्यकता है. अत: इस विचार के आते ही गंगा जी मानसी रुप में गोवर्धन पर्वत की तलहटी में प्रकट हो गईं. और जब प्रात समय ब्रजवासियों ने वहां गंगा जी के दर्शन किए तो सभी चकित रह गए ओर श्री कृष्ण के कहने पर सभी ने वहीं पर गंगा स्नान किया एवं पवित्र गंगा जल में दीप दान किया.
 श्री कृष्ण के मन से उत्पन्न (आविर्भूत) होने के कारण गंगाजी को मानसीगंगा कहा जाता है. यहां मानसी गंगा स्नान का महत्व गंगा स्नान जितना ही है भक्तगण यहाँ पर स्नान पूजा-अर्चना करते हैं । भाग्यवान भक्तों को कभी-कभी इसमें दूध की धारा का दर्शन होता है.मानसी गंगा के किनारे पर मुखारविन्द मन्दिर स्थित है.

कुसुम सरोवर
17:40, 26 सितम्बर 2009 के समय के संस्करण का थम्ब प्रारूप।
गोवर्धन से लगभग 2 किलोमीटर दूर राधाकुण्ड के निकट स्थापत्य कला के नमूने का एक समूह जवाहर सिंह द्वारा अपने पिता सूरजमल ( ई.1707-1763) की स्मृति में बनवाया गया। ई. 1675 से पहले यह कच्चा कुण्ड था जिसे ओरछा के राजा वीर सिंह ने पक्का कराया उसके बाद राजा सूरजमल ने इसे अपनी रानी किशोरी के लिए बाग़-बगीचे का रूप दिया और इसे अधिक सुन्दर और मनोरम स्थल बना दिया

 

राधाकुण्ड और कृष्ण कुण्ड

 
एक समय भगवान कृष्ण अपनी गायों को चराने के लिए जा रहे थे उसी समय एक राक्षस उनकी गायों मे गाय का रूप बना कर आ गया और उत्पात मचाने लगा। भगवान कृष्ण ने उसे पहचान लिया और उसका वध कर उसकी करनी का दण्ड दिया। वध करने के पश्‍चात भगवान कृष्ण राधा से मिलने गये। राधा ने कहा कि मैं  आपसे नहीं मिलूगी. और आपको गौ हत्या का पाप लग गया है। 
कहा की उन पर गौ हत्या का पाप लगा है जब तक आप इस पाप से मुक्ति नहीं पा लेते तब तक मुझसे नहीं मिल पाओगे अत: भगवान ने  प्रायश्चित स्वरूप वहां पर एक कुण्ड का निर्माण किया तथा समस्त  तीर्थों को आह्वान किया व उन्हें जलरूप द्वारा कुण्ड में प्रवेश करवाया तत्पश्चात पवित्र निर्मल जल मे स्नान कर पाप से मुक्ति प्राप्त कि किन्तु राधा उस कुण्ड से भी सुन्दर कुण्ड का निर्माण करके सभी को चकित करना चाहती थी
इसलिए उन्होंने अपने कंगन से एक मनोहर कुण्ड का निर्माण कर दिया और वह कुण्ड भी सब तीर्थों के जल से परिपूर्ण हो गया. इस प्रकार इन कुण्डों का निर्माण हुआ जिस कारण यह स्थल पवित्र पावन स्थल माना जाता है. और कार्तिक मास की कृष्णाष्टमी के दिन असंख्य श्रद्धालु यहां पर स्नान  करते हैं.

उद्धव कुण्ड


गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर स्थित है उद्धव कुण्ड यह भगवान के सखा एवं भक्त उद्धव के नाम से प्रसिद्ध है. अनेक ग्रंथों मे इसके बारे में उल्लेख प्राप्त होते हैं. कहते हैं की वज्रनाभ समेत शाण्डिल्य ऋषि के द्वारा यहाँ उद्धव कुण्ड का निर्माण हुआ था.
स्कन्द पुराण में इसका वर्णन मिलता है माना जाता है कि उद्धव जी यहाँ हमेशा निवास करते हैं. और यहीं पर जब कृष्ण सभी से विछोह कर  चले गए थे तो उद्धव जी ने महिषियों को सांत्वना दी.
इसी प्रकार गोवर्धन पर्वत मार्ग में अन्य कई महत्वपूर्ण स्थान आते हैं आन्यौर, कुसुम सरोवर है जो बहुत ही सुंदर एवं मनहर स्थल है यहां पर मंदिर भी स्थापित है एकचक्रेश्वर महादेव का मंदिर है  मानसी गंगा के समीप मुखारविन्द बना है 
आषाढ़ पूर्णिमा तथा कार्तिक माह की अमावस्या को यहां मेले का आयोजन किया जाता है. गोवर्द्धन में सुरभि गाय, ऐरावत हाथी तथा एक शिला पर भगवान के  चरणचिह्न मौजूद हैं. इसके साथ ही यहां श्री लक्ष्मीनारायण मन्दिर, श्री हरिदेव मंदिर, दानबिहारी मंदिर श्री राधा मदनमोहन मंदिर, विश्वकर्मा मंदिर, वेंकटेश्वर मंदिर, श्यामसुन्दर मंदिर तथा चकलेश्वर महादेव मंदिर इत्यादि पवित्र स्थल हैं.  

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

मुहावरे (ग)

गच्चा खाना : किसी फेर में पड़ धोखा खाना।
चौधरी उसे धक्का देकर, नारी जाति पर बल का प्रयोग करके गच्चा खा चुका था।

गज भर की छाती होना : बहुत अधिक उत्साह होना।
जब राणा प्रताप ने देखा कि शक्तिसिंह उनकी सहायता को आ रहा है तब उनकी गजभर की छाती हो गई।
गंगा नहाना : कर्तव्य और दायित्व पूरा करके निश्चिंत होना, सब झंझटों से छुटकारा पाना।

गाँठ बाँधना : याद रखना।
अच्छे लड़के अपने बड़ों की शिक्षा को गाँठ बाँध लेते हैं।

गरदन दबाना : कुछ करने, देने, हानि सहने आदि के लिए विवश करना.
ऐसे आदमियों से हम मिल जाते हैं और उनकी मदद से दूसरे आदमियों की गरदन दबाते हैं.

गरदन रेतना : धोखा देकर रुपया लेना, ठगना.
मालूम होता है कि आजकल कहीं कोई रकम मुफ्त हाथ आ गई है. सच कहना, किसकी गरदन रेती है?

गली-गली मारे फिरना : इधर-उधर व्यर्थ घूमना, जीविका के लिए इधर-उधर भटकना.
जब हमको मेहनताना देना ही है तो क्या यही एक वकील है? गली-गली तो मारे-मारे फिरते हैं.

गले पड़ना : किसी व्यक्ति की इच्छा के विरुद्ध उसके पास किसी का रहना, उसके पीछे पड़े रहना.

गले बाँधना : इच्छा के विरुद्ध सौंपना.
गृहस्थी का सारा काम भाइयों ने मेरे गले मढ़ दिया है.

गहरा पेट : गंभीर हृदय जिसका भेद न मिले.
अच्छा तो तुम्हीं अब तक मेरे साथ यह त्रिया-चरित्र खेल रही थीं. मैं जानती तो तुम्हें यहाँ बुलाती ही नहीं. ओफ्फोह, बड़ा गहरा पेट है तुम्हारा.

गाँठ का पूरा : धनी.
आँख के अंधों और गाँठ के पूरी की तलाश आपको भी उतनी ही है जितनी मुझको.

गाँठ खोलना : समस्या का निराकरण करना, कठिनाई - अड़चन दूर करना.

गागर में सागर : थोड़े-से शब्दों में बहुत अधिक भाव-विचार व्यक्त करना, थोड़े-से शब्दों में बड़ी महत्वपूर्ण बात कहना.
मुक्तक की रचना में कवि को गागर में सागर भरना पड़ता है.

गाड़ी अटकना : चलते-चलते काम बंद होना, रुकावट आना.

गाढ़ी छनना : घनिष्ठ मित्रता, बहुत अधिक मेल-जोल होना.

गाढ़ी कमाई : कड़ी मेहनत से कमाया हुआ पैसा, धन.

गाल बजाना : डींग मारना, बढ़-चढ़कर बातें करना.

गाली खाना : दुर्वचन सुनना.
ब्याह करूँगा तो जन्म भर गालियाँ खाने को मिलेंगी.

गाली गाना : विवाह आदि के शुभ अवसर पर गाली के गीत गाना.

गिरगिट की तरह रंग बदलना : अपनी बातों को सदा बदलते रहना, अपना मत, व्यवहार, वृत्ति बदलते रहना, कभी कुछ और कभी कुछ बनना.

गुजर जाना : मर जाना. कई दिन हुए वे गुजर गए.

गुड़ गोबर कर देना : बना-बनाया काम बिगाड़ देना.

गुड़ियों का खेल : बहुत आसान काम.

गुरु घंटाल : दुष्टों का नेता, धूर्तों का सरताज. वह अंधकार का गीदड़, वह दुर्गन्धमय राक्षस, जो इन सभी दुरात्माओं का गुरु घंटाल था.

गुल करना : दीपक या चिराग बुझा देना. वह चिराग गुल करके सो गया.

गुल खिलना : कोई अजीब बात, घटना होना. अचानक कोई बखेड़ा होना, भेद खुलना.

गुलछर्रे उड़ाना : मौज करना, आमोद-प्रमोद करना.

गुस्सा उतारना : क्रोध की शांति के लिए किसी पर बिगड़ना, मारना. क्रोध एक व्यक्ति पर हो और दूसरे को डांट-फटकार कर या दण्ड देकर अपने दिल को शांत करना.

गूंगे का गुड़ : वह आनंदानुभूति, सुख का अनुभव जिसका वर्णन न किया जा सके. भक्त को भगवान के चिंतन में जो आनंद मिलता है वह कहा नहीं जा सकता. वह तो गूंगे का गुड़ ही रहेगा.

गूलर का कीड़ा : कूपमंडूक, अल्पज्ञ व्यक्ति.

गोता खाना : डूबना, धोखा खाना. उसकी चिकनी-चुपड़ी बातों से मैं गोता खा गया.

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

बिल नहीं भरोगे तो काट देंगे

कस्टमर-हेलो!  मुझे फोन पर धमकियां मिल रही है।

पुलिस- कौन है?  जो आपको धमकियां दे रहा है?

कस्टमर- टेलीफोन वाले बोलते है‍ कि बिल नहीं भरोगे तो काट देंगे।

शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय"

सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" (७ मार्च, १९११- ४ अप्रैल, १९८७) को प्रतिभासम्पन्न कवि, शैलीकार, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देनेवाले कथाकार, ललित-निबन्धकार, सम्पादक और सफल अध्यापक के रूप में जाना जाता है। इनका जन्म ७ मार्च १९११ को उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर नामक ऐतिहासिक स्थान में हुआ। बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास में बीता। बी.एस.सी. करके अंग्रेजी में एम.ए. करते समय क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़कर फरार हुए और १९३० ई. के अन्त में पकड़ लिए गये। अज्ञेय प्रयोगवाद एवं नई कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं। अनेक जापानी हाइकु कविताओं को अज्ञेय ने अनूदित किया। बहुआयामी व्यक्तित्व के एकान्तमुखी प्रखर कवि होने के साथ-साथ वे एक अच्छे फोटोग्राफर और सत्यान्वेषी पर्यटक भी थे।
शिक्षा का प्रारम्भ संस्कृत-मौखिक परम्परा से हुआ 1915 से ’19 तक श्रीनगर और जम्मू में। यहीं पर संस्कृत पंडित से रघुवंश रामायण, हितोपदेश, फारसी मौलवी से शेख सादी और अमेरिकी पादरी से अंग्रेजी की शिक्षा घर पर शुरू हुई। शास्त्री जी को स्कूल शिक्षा में विश्वास नहीं था। बचपन में व्याकरण के पण्डित से मेल नहीं हुआ। घर पर धार्मिक अनुष्ठान स्मार्त ढंग से होते थे। बड़ी बहन जो लगभग आठ की थीं, जितना अधिक स्नेह करती थीं। उतना ही दोनों बड़े भाई (ब्रह्मानन्द और जीवानन्द जो’ 34 में दिवंगत हो गए) प्रतिस्पर्धा रखते थे। छोटे भाई वत्सराज के प्रति सच्चिदानन्द का स्नेह बचपन से ही था, 1919 में पिता के साथ नालन्दा आए, इसके बाद’ 25 तक पिता के ही साथ रहे, पिता जी ने हिन्दी सिखाना शुरू किया। वे सहज और संस्कारी भाषा के पक्ष में थे। हिन्दुस्तानी के सख़्त ख़िलाफ़ थे। नालन्दा से शास्त्री जी पटना आए और वहीं स्व- काशी प्रसाद जायसवाल और स्व. राखालदास वन्द्योपाध्याय से इस परिवार का सम्बन्ध हुआ, पटना में ही अंग्रेजी से विद्रोह का बीज सच्चिदानन्द के मन में अंकुरित हुआ।

शास्त्रीजी के पुराने मित्र रायबहादुर हीरालाल ही उनकी हिन्दी भाषा की लिखाई की जाँच करते। राखालदास के सम्पर्क में आने से बंग्ला की लिखाई की जाँच करते। राखालदास के संपर्क में आने से बंग्ला सीखी और इसी अवधि में इण्डियन प्रेस से छपी बाल रामायण बाल महाभारत, बालभोज इन्दिरा (बकिमचन्द्र) जैसी पुस्तकें पढ़ने को मिलीं और हरिनारायण आप्टे और राखालदास वन्द्योपाध्याय के ऐतिहासिक उपन्यास इसी अवधि में पढ़े गए। 1921-’25 तक ऊटकमंड में रहे यहां नीलिगिरि की श्यामल उपत्यका ने बहुत अधिक प्रभाव डाला। 1921 में उडिपी के मध्याचार्य के द्वारा इनका यज्ञोपवीत संस्कार हुआ। इसी मठ के पण्डित ने छः महीने तक संस्कृत और तमिल की शिक्षा दी। इस समय ‘भड़ोत’ से ‘वात्स्यायन’ में परिवर्तन भी हुआ, जो प्राचीनतम संस्कार के नये उत्साह से जीने का एक संकल्प था। पिता ने संकीर्ण प्रदेशिका से ऊपर उठकर गोत्रनाम का प्रचलन कराया। इसी समय पहली बार गीता पढ़ी।

पिताजी के आग्रह से अन्य धर्मों के ग्रन्थ भी पढ़े और घर पर ही पिताजी के पुस्तकालयों का सदुपयोग शुरू किया। वर्ड्सवर्थ, टेनिसन, लांगफेलो और व्हिटमैन की कविताएं इस अवधि में पढ़ीं। शेक्सियर, मारलो, वेब्स्टर के नाटक तथा लिटन, जार्ज एलियट, थैकरे, गोल्डस्मिथ, तोल्स्तोय, तुर्गनेव, गोगोल, विक्टर ह्यूगो तथा मेलविल के उपन्यास भी पढ़े गये। लयबद्ध भाषा के कारण टेनिसन का प्रभाव बड़ा गहरा पड़ा। टेनिसन के अनुकरण में, अंग्रेजी में ढेरों कविताएं भी लिखीं। उपन्यासकारों में ह्यूगो का प्रभाव, विशेषकर उनकी रचना टॉयलर ऑफ़ द सी का बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। इसी अवधि में विश्वेश्वर नाथ रेऊ तथा गौरीचन्द हीराचन्द ओझा की हिन्दी में लिखी इतिहास की रचनाएं पढ़ने को मिलीं तथा मीरा, तुलसी के साहित्य का अध्ययन भी इन्होंने किया। साहित्यिक कृतित्व के नाम पर इस अवधि की देन है आनन्द बन्धु जो इस परिवार की निजी पत्रिका थी। इस पत्रिका के समीक्षक थे हीरालाल जी और डॉ.. मौद्गिल। इस अवधि में एक छोटा उपन्यास भी लिखा और इसी अवधि में जब मैट्रिक की तैयारी ये कर रहे थे, मां के साथ इन्होंने जलियावाला बाग-काण्ड की घटना के आसपास पंजाब की यात्रा की थी और अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विरुद्ध विद्रोह की भावना ने जन्म लिया था। इनके पिताजी स्वयं अंग्रेजी की अधीनता की चुभन कभी-कभी व्यक्त करते थे।

एक घटना भी ब्लैकस्टोन नामक अंग्रेजी अधिकारी के साथ घट चुकी थी। वह शास्त्रीजी और राखालदास के साथ यात्रा कर रहा था। डिब्बे में राखालदास की पत्नी भी थीं। वह स्नानकक्ष से अर्धनग्न डिब्बे के भीतर आया। शास्त्रीजी ने उस से पूछा, ‘‘क्या इस रूप में तुम किसी अंग्रेज महिला के सामने आ सकते थे ?’ उत्तर में वह कुछ बोला नहीं, हंसता रहा। शास्त्रीजी ने उसे उठाकर डिब्बे से बाहर फेंक दिया। उसने आजीवन शत्रुता निभाई, यहां तक कि पिता द्वारा किए गए इस अपमान का बदला पुत्र से चुकाया, जब वे लाहौर किले में नज़रबन्द हुए। दूसरी घटना ऊटी में स्वंय सच्चिदानन्द के साथ घटी थी, जब वे दो-तीन महीने अंग्रेज़ों के साथ स्कूल में पढ़ने गए। वहां अंग्रेज लड़कों की मरम्मत करके ही इन्हें स्कूल में कार्ड मिला, जिसे फेंक कर ये घर चले आए। 1925 में पंजाब से मैट्रिक की प्राइवेट परीक्षा दी और उसी वर्ष इण्टरमीडिएट साइंस पढ़ने मद्रास क्रिश्चियन कालेज में दाखिल हुए। यहाँ उन्होंने गणित, भौतिकशास्त्र और संस्कृत विषय लिए थे। यहां इनके अंग्रेजी प्रोफेसर हेण्डरसन ने (जिन्हें त्रिशंकु समर्पित की गई) साहित्य के अध्ययन की प्रेरणा दी।

ये स्वयं भारत के भक्त थे। इन्हीं के साथ टैगोर अध्ययन-मण्डल की स्थापना की और रस्किन के सौन्दर्यशास्त्र तथा आचरणशास्त्र का अध्ययन किया। कला-क्षेत्रों के बीच घूमते-घूमते स्थाप्तय और शिल्प दोनों का राग-बोध परिपक्व होता गया। दक्षिण के मन्दिर और नीलगिरि के दृश्य ने उनके व्यक्तित्व में प्रकृति-प्रेम और कलाप्रेम को निखार दिया। मद्रास में सामाजिक विषमता की चेतना जगने लगी थी और जाति के विरुद्ध विद्रोह मन में इसी अवधि में उमड़ना शुरू हुआ। शास्त्रीजी स्वयं जाति में विश्वास न कर के वर्ण में विश्वास करते थे और पुत्रों से आशा करते थे कि ब्राह्मणवर्ण का स्वभाव—त्याग, अभय और सत्य—उन्हें कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

बचपन से किशोरावस्था तक की यह अवधि उलझन और आकुलता के बीच कठिन अध्यवसाय की अवधि है। एक ओर परिवार के और बाहर के अनेक प्रकार के प्रिय-अप्रिय प्रभावों ने उनके चित्त को उद्वेलित किया, तो दूसरी ओर पिता के कठिन अनुशासन ने परिश्रम में लगातार लगाए रख कर मन और शरीर को संयम में ढाला। बचपन में इन्हें ‘सच्चा’ के नाम से पुकारा जाता था और जब-जब इनकी सच्चाई पर विश्वास नहीं किया गया, इन्होंने मौन विद्रोह किया। एक बार की घटना ऐसी है कि बड़े भाई और इनमें होड़ लगी कि चौदह रोटी कौन खा सकता है ? बड़े भाई ने कहा कि तुम खाओ तो तुम्हें मैं इनाम दूँगा। ये खाने बैठे, पिता जी को इसकी सूचना मिली, उन्होंने बड़े भाई को डांटा और इनसे कहा कि तुम न खाओ, उठ जा। ये चौदह के आस-पास तक पहुंच रहे थे, अपने मन से उठे नहीं, इसलिए उन्होंने भाई से इनाम मांगा। उन्होंने देने से इन्कार किया तो मौन विरोध में इन्होंने खाना ही कम कर दिया इस प्रकार का आत्मपीड़क क्रोध इनमें बहुत दिनों तक रहा है। और अब भी किसी न किसी रूप में कभी न कभी उभर आता है। इसी क्रोध में आकर इन्होंने अपनी आर्थिक बर्बादी भी कम नहीं की।

1927 में लाहौर फॉरमन कॉलेज में ये बी. एस-सी. में भर्ती हुए। इसी कालेज में नवजवान भारत-सभा के सम्पर्क में आए और हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी के प्रमुख सदस्य आज़ाद, सुखदेव और भगवतीचरण बोहरा से परिचय हुआ। इस कालेज में बी.एस-सी. तक तो ये सक्रिय रूप से कान्तिकारी आन्दोलन में प्रविष्ट नहीं हुए थे, यद्यपि 1929 में पं. मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में कांग्रेस का जो अधिवेशन लाहौर में हुआ, उस में ये स्वयं सेवक अफसर के रूप में मौजूद थे। यहीं इन्हीं के स्वयं सेवक दल ने उन लोगों को जबरदस्ती स्वयंसेवक कैम्प में बन्द रखा था, जो गांधीजी के उस प्रस्ताव का अप्रिय रूप में विरोध करने वाले थे, जो उन्होंने इरविन को बधाई देने के लिए रखा था। इसी स्वयंसेवक शिविर में कदाचित पहली बार कांग्रेस के मंच से ‘इन्कलाब ज़िन्दाबाद’ का नारा लगाया गया था।

1929 में बी.एस-सी. करके अंग्रेजी एम.ए. में दाखिल हुए। इसी साल से ये क्रान्तिकारी दल में भी प्रविष्ट हुए इनके साथ थे देवराज, कमलकृष्ण और वेदप्रकाश नन्दा। कालेज में जिन दो अध्यापकों ने सबसे अधिक इन्हें प्रभावित किया, वे थे, जे.एम. बनेड और डेनियल। जे.एम.बनेड ने तो इनके जेल जाने पर भी अपना स्नेह सम्बन्ध बनाए रखा। बनेड ने ही (यद्यपि वे भौतिकशास्त्र के अध्यापक थे) विभिन्न धर्मों के तुलनात्मक अध्ययन की प्रेरणा दी। प्रो. डेनियल ने इन्हें ब्राउनिंग की ओर उन्मुख किया। इनके क्रान्तिकारी जीवन की अवधि 1929 से आरम्भ होकर 1936 तक है। इस अवधि का अधिकांशतः इतिहास देश के इतिहास से सम्बद्ध है। उसमें कहने की इतनी बातें हैं कि यहां उन पर विस्तार से विचार करना अनावश्यक है। घटनाक्रम कुल यह है कि पहला क्रर्यक्रम इन का और इनके साथियों का भगतसिंह को छुड़ाने का हुआ। इस बीच में भगवती चरण वोहरा एक दुर्घटना में शहीद हुए और यह कार्यक्रम स्थगित हो गया।

दूसरा कार्यक्रम दिल्ली-हिमालयन-टॉयलेट्स फैक्ट्री के बहाने बम बनाने का कारखाना कायम करने का था। उस फैक्ट्री में अज्ञेय वैज्ञानिक के रूप में सलाहकार थे। तीसरा कार्यक्रम अमृतसर में पिस्तौल की मरम्मत और कारतूस भरने का कारखाना कायम करने का शुरू हुआ और यहीं देवराज और कमलकृष्ण के साथ 15 नवम्बर, 1930 को गिरफ्तार हुए। गिरफ्तारी के बाद एक महीने लाहौर किले में, फिर अमृतसर की हवालात में। यहीं से यातना शुरू हुई। आर्म्स ऐक्ट वाले मुकदमें में ये छूटे, पर दिल्ली में 1931 में नया मुकदमा शुरू किया गया। यह मुकदमा 1933 तक चलता रहा। दिल्ली जेल में ही काल-कोठरी में बन्द रहे और यहीं रह कर छायावाद से मनोविज्ञान, राजनीति अर्थशास्त्र और कानून—ये सारे विषय पढ़े। यहीं रहकर चिन्ता, विपथगा की अनेक कहानियां और शेखर लिखा; पर यह पूरी अवधि कुल ले-देकर घोर आत्ममन्थन, शारीरिक यातना और स्वप्नभंग की पीड़ा की अवधि रही।

1934 की फरवरी में छूटे, फिर लाहौर में दूसरे कानून के अन्तर्गत नज़रबन्द किये गये। यहीं रह कर कोठरी की बात और चिन्ता की रचना की और इसी अवधि में कहानियों का छपना शुरू हुआ। 1934 के मध्य में घर के अन्दर नज़रबन्द हो गई और घर आने पर एक साथ छोटे भाई और माता की मृत्यु और पिता जी की नौकरी से निवृत्ति—इन सभी घटनाओं ने रोते चित्त में नये उद्वेलन पैदा किए नज़रबन्दी हटने तक ये डलहौजी़ और लाहौर रहे। सात साल के इस अर्से ने कई छाप छोड़ी हैं। रावी के पुल से छलांग मारने पर घुटने की टोपी उतरी और वह दर्द मौका पाते ही आज भी लौट आता है। क्रान्तिकारी जीवन के साथियों में जो लोग आदर्शच्युत हुए या जो टूटने लगे उनके कारण घोर आत्मपीड़न का भाव जाग गया और एकाकीपन का अभ्यास जो बढ़ा, वह अभी भी नहीं छूटा। अज्ञेय को अत्यधिक सामाजिकता इतनी असह्य है, इसका प्रमाण मैं स्वयं दे सकता हूं। कभी-कभी वे स्वागत-समारोहों के बाद लौटने पर ऐसा अनुभव करते हैं कि किसी यन्त्रणा से गुजर कर आए हैं। पर सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण छाप इस जीवन की उनकी राग अनुभूति को सघन बनाने में है। इस जीवन में प्रखर शक्ति और ताप जिस स्रोत से मिला था, उसके आकस्मिक निधन की चोट बड़ी गहरी पड़ी है।

यह वियोग उन्हीं के शब्दों में ‘स्थायी वियोग’ है। उस ‘अत्यन्तगता’ की स्मृति एक अमूल्य थाती है। इसी के सहारे हारिल का धर्म निभाना सबसे बड़ा पार्थिव धर्म उन्होंने जाना है। यह उन्होंने जाना और अपनी ‘मांग को स्वंय अपना खंडन’ माना। ‘आहुति बनकर’ ही उन्होंने प्रेम को ‘यज्ञ की ज्वाला’ के रूप में देखा। ‘वंचनाओं के दुर्ग के रुद्ध सिंहद्वार खोल कर मुक्त आकाश’ के लिए जो अदम्य आशा उनके चित्त में हमेशा भरती रहती है अपने को तटस्थ और एकाकी रख सकने का वह लम्बा अभ्यास। यह सही है कि शिल्प की दृष्टि से और भाषा की दृष्टि से इस अवधि की कविताओं पर छायावाद का गहरा प्रभाव है, पर साथ ही यह भी निर्विवाद है कि कथ्य छायावाद की भूमिका से बिलकुल अलग है। उसका आधार अरूप प्रेम नहीं, न मिटने वाली प्यास नहीं, रहस्य-अन्वेषण नहीं, है ऊर्जस्वी और मांसल प्रेम, प्रत्यंचा तोड़ धनुष का सन्धान (शक्ति के परे आत्मोत्सर्ग) और एक दुर्निवार ऊर्ध्वग ज्वाल। इस दृष्टि से इस अवधि को भट्ठी में गलाई की अवधि कहा जा सकता है।

गदहपचीसी पार करके 1936 में जब जीविका के लिए कर्मक्षेत्र में उतरे तो पहले एक आश्रम खोलने की बात सोची। पर पिता की एक डांट ने इस भिखमंगी से इन्हें विरत कर दिया। फिर सैनिक के सम्पादन-मण्डल में आए और वहां साल-भर रहे। इसी समय मेरठ के किसान आन्दोलन में भी काम किया और इस अवधि में रामविलास शर्मा, प्रकाश चन्द्र गुप्त, भारतभूषण अग्रवाल, प्रभाकर माचवे और नेमिचन्द्र जैन से परिचय हुआ। राजनैतिक विचारों में भी उथल-पुथल शुरू हुई। गांधीजी के प्रति जहां श्रद्धा बिलकुल नहीं थी, वहां आदर-भाव जगा, पर कांग्रेस के मन्त्रिमण्डल में सम्मिलित न होने के पक्ष में न होते हुए भी, और सुभाष चन्द्र बसु के साथ त्रिपुरी में न्याय नहीं हुआ यह मानते हुए भी, सुभाष बाबू के लिए श्रद्धा न कर सके। जवाहरलाल नेहरू के खतरनाक विचार और खतरनाक जीवन के नारे ने पहले बहुत प्रभावित किया था, बाद में उनकी बौद्धिक सच्चाई की ही छाप मन में अधिक गहरी पड़ी।

1937 के अन्त में बनारसीदास चतुर्वेदी के आग्रह से विशाल भारत में गये। लगभग डेढ़ वर्ष कलकत्ता रहे। यहां सुधीन्द्र दत्त, बुद्धदेव बसु, हजारी प्रसाद द्विवेदी, बलराज साहनी और पुलिन सेन परिचय की परिधि में आए। कलकत्ता के महानगर का पहला अनुभव बहुत तीखा रहा। इसके विमानवीकृत पहलू ने इनके संवेदनशील चित्त को बहुत व्यथित किया। विशाल भारत को व्यक्तिगत कारणों से इन्होंने छोड़ा और 1939 में पिताजी के पास बड़ौदा गये। पिताजी ने विदेश जाकर अध्ययन पूरा करने के लिए कहा। इतने में ही महायुद्ध छिड़ गया और दिल्ली आल इण्डिया रेडियो में नौकरी करने चले आये। इसी अन्तराल में हिन्दी साहित्य के अनेकानेक आयामों और चक्रों से तो परिचित हुए ही, पत्रकारिता के आदर्श और व्यवहार के वैषम्य का भी साक्षात् अनुभव प्राप्त किया। इन आकाशवृत्तियों के लाभ मुख्यतः दो हुए। एक तो हिन्दी की साहित्यिक परिधि के भीतर पैठ और दूसरा-अपना जीवन-पथ निर्माण करने का एक विश्वास। यह विश्वास कुछ आवश्यकता से अधिक ही हुआ और इसी के कारण 1940 में एक बहुत बड़ी गलती सिविल मैरेज करके इन्होंने की। यह शादी बहुत बड़ी चुभन बनी। इस चुभन के कारण, कुछ अपने फ़ासिस्ट-विरोधी विश्वास के उफान में इन्होंने 1942 के आन्दोलन को उपयोगी न समझा और उसी साल दिल्ली में अखिल भारतीय फ़ासिस्ट-विरोधी सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन के बाद में प्रगतिशील लेखक संघ का एक अलग गुट बन गया।
हस्ताक्षर:Hastaksharagyeya.jpg

प्रमुख कृतियां

  • कविता संग्रह: भग्नदूत, चिन्ता, इत्यलम्, हरी घास पर क्षण भर, बावरा अहेरी, इंद्रधनु रौंदे हुए ये, अरी ओ करूणा प्रभामय, आँगन के पार द्वार, पूर्वा (इत्यलम् तथा हरी घास पर क्षण भर), सुनहले शैवाल, कितनी नावों में कितनी बार, क्योंकि मैं उसे जानता हूँ, सागर-मुद्रा, पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ, महावृक्ष के नीचे, नदी की बाँक पर छाया, प्रिज़न डेज़ एण्ड अदर पोयम्स (अंग्रेजी में) और ऐसा कोई घर आपने देखा है।
  • कहानी-संग्रह: विपथगा, परंपरा, कोठरी की बात, शरणार्थी, जयदोल, ये तेरे प्रतिरूप |
  • उपन्यास: शेखर: एक जीवनी, नदी के द्वीप, अपने अपने अजनबी।
  • यात्रा वृत्तांत: अरे यायावर रहेगा याद, एक बूंद सहसा उछली।
  • निबंध संग्रह : सबरंग, त्रिशंकु, आत्मनेपद, आधुनिक साहित्य: एक आधुनिक परिदृश्य, आलवाल,
  • संस्मरण: स्मृति लेखा
  • डायरियां: भवंती, अंतरा और शाश्वती।
  • विचार गद्य: संवत्‍सर
  • नाटक: उत्तरप्रियदर्शी
उनका लगभग समग्र काव्य सदानीरा (दो खंड) नाम से संकलित हुआ है तथा अन्यान्य विषयों पर लिखे गए सारे निबंध सर्जना और सन्दर्भ तथा केंद्र और परिधि नामक ग्रंथो में संकलित हुए हैं। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के संपादन के साथ-साथ अज्ञेय ने तारसप्तक, दूसरा सप्तक, और तीसरा सप्तक जैसे युगांतरकारी काव्य संकलनों का भी संपादन किया तथा पुष्करिणी और रूपांबरा जैसे काव्य-संकलनों का भी। वे वत्सलनिधि से प्रकाशित आधा दर्जन निबंध- संग्रहों के भी संपादक हैं। प्रख्यात साहित्यकार अज्ञेय ने यद्यपि कहानियां कम ही लिखीं और एक समय के बाद कहानी लिखना बिलकुल बंद कर दिया, परंतु हिन्दी कहानी को आधुनिकता की दिशा में एक नया और स्थायी मोड़ देने का श्रेय भी उन्हीं को प्राप्त है। निस्संदेह वे आधुनिक साहित्य के एक शलाका-पुरूष थे जिसने हिंदी साहित्य में भारतेंदु के बाद एक दूसरे आधुनिक युग का प्रवर्तन किया।

बुधवार, 19 अक्टूबर 2011

चश्मा लगने के बाद मै पढ़ तो पाउँगा ना?

संता [डॉक्टर  बंता से] - डॉक्टर साहब! चश्मा लगने के बाद मै पढ़ तो पाउँगा ना?
डॉक्टर बंता - हाँ भाई  जरूर  पढ़ पाओगे.
संता - तब ठीक है, वर्ना अनपढ़ आदमी की जिंदगी भी कोई जिंदगी है क्या!

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

मुहावरे (ख)

खटाई में पड़ना : काम रुक जाना, टल जाना।
दुल्हन यदि बैलगाड़ी से जाती तो कहारों का पैसा खटाई में पड़ जाता।

खड़ी पछाड़ें खाना : खड़े हो-होकर गिर पड़ना।
पति की मृत्यु का समाचार पाते ही विमला खड़ी पछाड़ें खाने लगी।

खरी-खरी सुनाना : सच्ची बात कहना चाहे किसी को भला लगे या बुरा लगे।

खाक फाँकना : इधर-उधर मारा-मारा फिरना।
वह नौकरी की तलाश में चारों तरफ खाक फाँकता था।

खाट से लगना : इतना बीमार पड़ना कि चारपाई से उठ न सके। अत्यन्त दुर्बल हो जाना।

खीस निपोरना : दीनभाव से कृपा अथवा अनुग्रह की प्रार्थना करना।

खुदा की पनाह : ईश्वर बचाए।
बीबी की जूती पैजार से खुदा की पनाह।

खून के आँसू रुलाना : बहुत अधिक सताना।
स्वर्ग का रास्ता बन्द पाकर राजा साहब अपनी रियासत को ही खून के आँसू रुलाना चाहते थे।

खून-खच्चर होना : लड़ाई-झगड़ा, मार-पीट होना।
तुमने बहुत अच्छा किया जो उनके साथ न हुए, नहीं तो खून-खच्चर हो जाता।

खून लगाकर शहीद होना : थोड़ा-सा दिखावटी काम करके बड़े आदमियों में शामिल होने का प्रयत्न।

खेलने खाने के दिन : बचपन या जवानी का समय जब मनुष्य चिन्तामुक्त जीवन व्यतीत करता है।

खोद-खोदकर पूछना : तर्क, शंका में अनेक सवाल पूछना।
उसने खोद-खोद कर पूछने की चेष्टा तो बहुत की परन्तु उसके पल्ले कुछ नहीं पड़ा।

खोपड़ी भिनभिनाना : तंग आना।
बच्चों का शोर सुनकर मेरी खोपड़ी भिनभिना उठी।

शनिवार, 8 अक्टूबर 2011

'क्यों भई, तुम यहां क्या कर रहे हो?'

एक दुकान के बाहर लिखा था: 'इन्सानों की तरह बात करने वाला कुत्ता बिकाऊ है.'

एक आदमी दुकानदार से जाकर बोला: 'मैं उस कुत्ते को देखना चाहता हूं...' दुकानदार ने कहा: 'साथ के कमरे में बैठा है, जा कर मिल लो।'

ग्राहक उस कमरे में गया। कुर्सी पर एक हट्टा-कट्टा कुत्ता बैठा था. पूछा: 'क्यों भई, तुम यहां क्या कर रहे हो?'
कुत्ते ने बताया: 'कर तो मैं बहुत कुछ सकता हूं, लेकिन आजकल इस दुकान की रखवाली करता हूं. इससे पहले अमेरिका के जासूसी महकमे में काम करता था और कई खूंखार आतंकवादियों को पकड़वाया... फिर मैं इंग्लैंड चला गया जहां पुलिस के लिए मुखबरी करता था. एक साल बाद यहां आ गया.'

उस आदमी ने दुकानदार से पूछा: 'इतने गुणवान कुत्ते को आप बेचना क्यों चाहते हैं?'

'अव्वल नम्बर का झूठा है...' जवाब मिला.
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गधों को इंसान बनाया है
पप्पू क्लास में एक गधा ले कर आया।
टीचर: इसको क्यों लाये हो?
पप्पू: आपने ही तो कहा था कि आपने कई गधों को इंसान बनाया है, अब बनाओ।

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

मुहावरे (क)

कंघी - चोटी करना : श्रृंगार करना, बनाव-सिंगार करना।
आज सबेरे से मेरी ही सेवा में लगी रही। नहलाया-धुलाया, कंघी-चोटी की, कपड़े-बपड़े पहनाये, सभी उसी ने किया।

कंचन बरसना : बहुत अधिक लाभ होना।
सुजान की खेती में कई साल से कंचन बरस रहा था।

कच्चा चबाना : कठोर दण्ड देना।
नारायणी भी तो आने वाली थी, कब आएगी? उसे भी तो तेरी भाभी कच्चा ही चबा जाएगी।

कच्ची गोली खेलना : अनाड़ीपन, ऐसा काम करना जिससे विफलता हाथ लगे।
आप शायद चाहते होंगे, जब आपको राजा साहब से रुपये मिल जाते तो आप मुझे दो हजार रुपये दे देते तो मैं ऐसी कच्ची गोली नहीं खेलता।

कट जाना : बहुत लज्जित होना।
जब मैं स्त्रियों के ऊपर दया दिखाने का उत्साह पुरुषों में देखती हूँ तो जैसे कट जाती हूँ।

कठपुतली की तरह नचाना : दूसरों से अपनी इच्छा के अनुसार काम कराना।
यही लोग उन बेचारों को कठपुतली की तरह नचा रहे हैं।

कढ़ी का - सा उबाल : शीघ्र ही समाप्त हो जाने वाला जोश।
मैं उस पर विश्वास नहीं कर सकता, क्योंकि उसमें कढ़ी का-सा उबाल आता है।

कतरब्योंत से : हिसाब से, समझ-बूझकर।
वह ऐसी कतरब्योंत से चलते हैं कि थोड़ी आमदनी में अपनी प्रतिष्ठा बनाए हुए हैं।

कन्नी काटना : कतराकर, बचकर किनारे से निकल जाना।

कब्र में पाँव लटकाना : मौत के निकट आना।
अब मुझे अम्मा कब्र में पैर लटकाए दीख पड़ती थीं।

कबाब में हड्डी : सुखोपभोग में बाधक होना।
एक बार तो मेरे जी में आया कि चलो लौट चलो, क्यों खामखाह किसी के कबाब में हड्डी बन रहे हो।

करम फूटना : अभागा होना, भाग्य बिगड़ना।
मेरे तो करम फूटे हैं ही।

कमर कसना : तैयार होना।
उसने निश्चय किया कि वह कमर कसकर नए सिरे से अपना जीवन-संघर्ष आरम्भ करेगा।

कलई खुलना : रहस्य प्रकट होना, वास्तविक बात ज्ञात होना।
उन्हें सबसे विषम वेदना यही थी कि मेरे मनोभावों की कलई खुल गई।

कलेजा बैठना : घोर दु:ख या ग्लानि होना, उत्साह मंद पड़ना।
यह याद करके मेरा कलेजा बैठा जा रहा है कि अब मैं आप लोगों के लिए कुछ भी न कर सकूँगा।

कलेजे पर पत्थर रखना : जी कड़ा करना।
यह सशंकिता विधवा अपने कलेजे पर पत्थर रखकर अपनी इस प्यारी संतान को त्याग देने के लिए बाध्य हुई।

कलेजा पसीजना : दया आना।
उसका करुण क्रन्दन सुनकर सबका कलेजा पसीज गया।

कलेजे का टुकड़ा : पुत्र।
वे अपने ही कलेजे के टुकड़े हैं।

कलेजे में आग लगना : दु:ख देना।
यह शब्द उसके कलेजे में चुभ गए थे।

कसौटी पर कसना : अच्छी तरह जाँच करना, परीक्षा लेना।
निस्सन्देह कृष्ण भगवान ने मुझे प्रेम-कसौटी पर कसा और मैं खोटी निकली।

कहा-सुनी हो जाना : झगड़ा, वाद-विवाद होना।
प्राय: बच्चों के पीछे पति-पत्नी में कहा-सुनी हो जाती थी।

कहानी समाप्त होना : मृत्यु हो जाना।
जिस समय उसने जबरदस्ती मुझे अपनी विशाल भुजाओं में घेर लिया उस समय मैंने सोचा कि कहानी समाप्त हो गई।

कहीं का न रखना : किसी काम का न छोड़ना, निराश्रय कर देना।
आपने सारी जायदाद चौपट कर दी, हम लोगों को कहीं का न रखा।

काँटा निकालना : बाधा या खटका दूर करना।
यह न समझो कि मैं अपने लिए, अपने पहलू का काँटा निकालने के लिए तुमसे ये बातें कर रही हूँ।

काँटा बोना : अनिष्ट, बुराई करना।
मैं ऐसा पागल नहीं हूँ कि जो मुझे काँटे बोये, मैं उसके लिए फूल बोता फिरूँ।

काँटों में घसीटना : बहुत दुख देना।
वह हाथ में आ जाता तो काँटों में ऐसा घसीटता कि उसे होश आ जाता।

काँव-काँव करना : शोरगुल, हल्ला मचाना।
बिरादरी का झंझट जो है, सारा गाँव काँव-काँव करने लगेगा।

काग़ज की नाव : अस्थायी, क्षणिक, न टिकने वाली वस्तु।
हमारा शरीर काग़ज की नाव है, अतएव इस पर गर्व नहीं करना चाहिए।

काग़जी घोड़े दौड़ाना : लिखा-पढ़ी करना, केवल काग़जी कार्रवाई करना।
आप क्या करते हैं, सिर्फ कागजी घोड़े दौड़ाते हैं।

काटो तो खून नहीं : स्तब्ध हो जाना, सन्न हो जाना।
मुझे काटो तो खून नहीं, तब क्या बात सचमुच ही यहाँ तक बढ़ गई थी?

कान का कच्चा : बिना सोचे-बिचारे दूसरों की बातों पर विश्वास कर
लेने वाला।
पन्तजी ऐसे पहले महाकवि नहीं थे जो ऐसे मामलों में कान के कच्चे थे।

कान काटना : चालाकी, धूर्तता आदि में किसी से बढ़कर होना।
मान गया बहू जी तुम्हें, वाह, क्या हिकमत निकाली है। हम सबके कान काट लिए।

कान पर जूँ न रेंगना : बार-बार कहने पर भी बात को ध्यान में न
बच्चे लाख चीखें, रोएँ-चिल्लाएँ, उस सहिष्णु जननी के कान पर कभी जूँ नहीं रेंगती।

कान भरना : शिकायत करना।
वह मेरे विरुद्ध गुरुजी के कान भरता है।

काना-फूँसी करना : चुपके-चुपके, बहुत धीरे-धीरे बात करना
कुछ लोग आपस में काना-फूँसी कर रहे थे, माया शंकर कितना भाग्यवान लड़का है।

कानून छाँटना : व्यर्थ की दलीलें देना, निरर्थक तर्क उपस्थित करना

कानों में अंगुली डालना : किसी बात को न सुनने का प्रयास करना, सुनने की इच्छा न होना।

काफूर हो जाना : एकाएक गायब हो जाना
द्वारकादास की नैराश्य उत्पादक दशा से तारा की कठोरता काफूर हो गई।

काया पलट होना : रूप, गुण, दशा, स्थिति आदि का पूर्णतया बदल जाना, और का और हो जाना
अभी यह मेरे साथ बैठा हुआ कैसी-कैसी बातें कर रहा था। इतनी ही देर में इसकी ऐसी कायापलट हो गई कि मेरी जड़ खोदने पर तुला हुआ है।

कारूँ का खजाना : कुबेर का कोष अतुल धनराशि।

काला धन : बेईमानी और तस्करी आदि से पैदा किया हुआ धन।
मैं उनके काले धन का हिसाब रखा करता था।

काला बाजार : वह बाजार जहाँ चोरी और तस्करी आदि की चीजों का क्रय-विक्रय होता है।
आजादी के बाद आया फूट, असंगठन, विलास,व्यभिचार, लूट, डाके, खून और काले बाजार काजमाना।

कालिख पोतना : कलंकित करना।
अब मेरी जान बख्शो, क्यों मेरे मुँह में कालिख पोत रहीहो?

काले कोसों : बहुत दूर।
सुबह दस बजे इसे तरकारी लाने के वास्ते भेजा था और वह भी काले कोसों नहीं।

काले पानी भेजना : देश निकाले का दंड देना, अंडमान द्वीप मेंभेजना जहाँ पहले आजीवन कैद का दंड पाने वालेअपराधी भेजे जाते थे।

किताबी कीड़ा : जो मनुष्य केवल पुस्तक पढ़ता रहता हो,जिसके पास केवल किताबों का ज्ञान हो, बुद्धि तथा अनुभव न हो।
मेरे जैसे किताब के कीड़े को कौन औरत पसन्द करेगी?

किला फतह करना : अत्यन्त कठिना काम करना।
यह कहकर मानों उन्होंने किला फतह कर लिया।

किस मुँह से : अपनी हीनता, अयोग्यता आदि का विचारकरके, अपने को दीन-हीन समझते हुए।
बहू से अब वह कहती भी तो किस मुँह से?

किसी के आगे पानी भरना : किसी की तुलना में अति तुच्छहोना, फीका पड़ना।
उन पाँच दिनों क्या ठाट रहते हैं वोटर के, बारात कादूल्हा भी उसके आगे पानी भरे।

किसी के घर में आग लगाकर अपना हाथ सेंकना : अपने काम केलिए दूसरों को भारी हानि पहुँचाना।
डॉक्टर साहब उन लोगों में हैं जो दूसरों के घर में आग लगाकरअपना हाथ सेकते हैं।

किसी के साथ मुँह काला करना : किसी के साथ व्यभिचार करना।
सारा दोष बुढ़िया का है, अरे दिन-दहाड़े जो यह डॉक्टरनीउसके बेटे के साथ मुँह काला किए फिर रही है, उससे अच्छायह नहीं है कि इसे बहू बना ले?

किसी को न गिनना : सबको तुच्छ, नगण्य समझना।
इस सफलता से मनीराम का सिर फिर गया था, वह किसी कोन गिनता था।

किसी खूंटे से बाँधना : किसी के साथ विवाह करना।
तेरी दीदी तो ऐसी गऊ है जिसे हमें ही किसी खूंटे से बाँधना
होगा।

किसी पर बरस पड़ना : एकाएक किसी से क्रोधपूर्ण बातें करना।
उनके जाते ही वह अपनी माँ पर बरस पड़ी।

किसी पर हाथ छोड़ देना : किसी को मारना-पीटना।
कभी-कभी हरसिंह अपनी बीवी पर हाथ छोड़ देता था।

किस्मत का फेर : अभाग्य, दुर्भाग्य, जमाने का उलट-फेर।
किस्मत का फेर देखिए, जो राजा थे वे रंक हो गए और जो रंक थे वे राजा हो गए।

कीड़े काटना : बेचैनी होना, जी उकताना।
दस मिनट पढ़ने के बाद उसे कीड़े काटने लगते हैं।

कुएँ का मेढ़क : बहुत अल्पज्ञ या कम अनुभव का व्यक्ति।

कुएँ में बाँस डालना : बहुत खोज करना।
उसके लिए कुओं में बाँस डाले गए, पर उसका पता नहीं चला।

कुएँ में भाँग पड़ना : सबकी बुद्धि मारी जाना, सबका पागल, मूर्खजैसा व्यवहार करना।

कुत्ता काटना : पागल होना।
क्या हमें कुत्ते ने काटा है जो हम इतनी रात को वहाँजाएँगे?

कुप्पा होना : फूल जाना, अत्यंत प्रसन्न होना।
जिस समय वह परीक्षा में पास होने की बात सुनेगाफूलकर कुप्पा हो जाएगा।

कुरसी देना : सम्मान करना।
बड़े-बड़े हाकिम उसे कुरसी देते हैं।

कोढ़ में खाज : दुख पर दुख, संकट पर संकट।

कोर-कसर न रखना : हर संभव प्रयास करना।
वह भिन्न-भिन्न प्रकृति और संस्कृति की इन युक्तियों को संघर्ष से बचाने और प्रेम से रखने में कुछ कोर-कसर न रखती थी।

कोरा जवाब देना : साफ इन्कार करना।
अगर सोफिया को क्लर्क से प्रेम न था, तो क्या वह उन्हें कोरा जवाब न दे सकती थी?

कोल्हू का बैल : बहुत अधिक परिश्रम करना वाला व्यक्ति।
कोल्हू के बैल की तरह खटकर सारी उम्र काट दी इसके यहाँ, कभी एक पैसे की जलेबी भी लाकर दी है इसके खसम ने?

कौड़ियों के मोल बिकना : बहुत ही सस्ते या कम दाम पर बिकना।