नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

रविवार, 14 मई 2017

पिंजरा

 

शांति ने ऊब कर काग़ज़ के टुकड़े-टुकड़े कर दिए और उठकर अनमनी-सी कमरे में घूमने लगी। उसका मन स्वस्थ नहीं था, लिखते-लिखते उसका ध्यान बँट जाता था। केवल चार पंक्तियाँ वह लिखना चाहती थी; पर वह जो कुछ लिखना चाहती थी, उससे लिखा न जाता था। भावावेश में कुछ-का-कुछ लिख जाती थी। छ: पत्र वह फाड़ चुकी थी, यह सातवाँ था।

घूमते-घूमते, वह चुपचाप खिड़की में जा खड़ी हुई। संध्या का सूरज दूर पश्चिम में डूब रहा था। माली ने क्यारियों में पानी छोड़ दिया था और दिन-भर के मुरझाए फूल जैसे जीवन-दान पाकर खिल उठे थे। हल्की-हल्की ठंडी हवा चलने लगी थी। शांति ने दूर सूरज की ओर निगाह दौड़ाई—पीली-पीली सुनहरी किरणें, जैसे डूबने से पहले, उन छोटे-छोटे बच्चों के खेल में जी-भर हिस्सा ले लेना चाहती थीं, जो सामने के मैदान की हरी-भरी घास पर उन्मुक्त खेल रहे थे। सड़क पर दो कमीन युवतियाँ, हँसती चुहलें करती, उछलती-कूदती चली जा रही थीं। शांति ने एक दीर्घ निश्वास छोड़ा और मुड़कर उसने अपने इर्द-गिर्द एक थकी हुई निगाह दौड़ार्इ, छत पर बड़ा पंखा धीमी आवाज़ से अनवरत चल रहा था। दरवाज़ों पर भारी पर्दे हिल रहे थे और भारी कोच और उन पर रखे हुए रेशमी गद्दे, गलीचे और दरमियान में रखे हुए छोटे-छोटे अठकोने मेज़ और उन पर पीतल के नन्हें-नन्हें हाथी और फूलदान—और उसने अपने-आपको उस पक्षी-सा महसूस किया, जो विशाल, स्वच्छंद आकाश के नीचे, खुली स्वतंत्र हवा में आम की डाली से बँधे हुए पिंजरे में लटक रहा हो।

 

तभी नौकर उसके छोटे लड़के को जैसे बरबस खींचता-सा लाया। धोबी की लड़की के साथ वह खेल रहा था। आव देखा न ताव और शांति ने लड़के को पीट दिया—क्यों तू उन कमीनों के साथ खेलता है, क्यों खेलता है तू! इतने बड़े बाप का बेटा होकर! और उसकी आवाज़ चीख़ की हद को पहुँच गई। हैरान-से खड़े नौकर ने बढ़कर ज़बरदस्ती बच्चे को छुड़ा लिया। शांति जाकर धम-से कोच में धँस गई और उसकी आँखों से अनायास ही आँसू बह निकले!

तब वहीं बैठे-बैठे उसकी आँखों के सामने अतीत के कई चित्र फिर गए!

 

उसके पति तब लांडरी का काम करते थे। बाइबिल सोसाइटी के सामने, जहाँ आज एक दंदानसाज बड़े धड़ल्ले से लोगों के दाँत उखाड़ने में निमग्न रहते हैं; उनकी लांडरी थी। आय अच्छी थी; पर ख़र्च भी कम न था। 35 रुपया तो दुकान का किराया ही देना पड़ता था और फिर कपड़े धोने और इस्तरी करने के लिए जो तबेला ले रखा था, उसका किराया अलग था। इसके अतिरिक्त धोबियों को वेतन, कोयले, मसाला और सौ दूसरे पचड़े! इस सब ख़र्च की व्यवस्था के बाद जो थोड़ा-बहुत बचता था, उससे बड़ी कठिनाई के साथ घर का ख़र्च चलता था और घर उन्होंने दुकान के पीछे ही महीलाल स्ट्रीट में ले रखा था।

महीलाल स्ट्रीट जैसी अब है, वैसी ही तब भी थी। मकानों का रूप यद्यपि इन दस वर्षों में कुछ बदल गया है। किंतु मकानों में कुछ अधिक अंतर नहीं आया। अब भी इस इलाक़े में कमीन बसते हैं और तब भी बसते थे। सील-भरी अँधेरी कोठरियाँ चमारों, धीवरों और शुद्ध हिंदुओं का निवास स्थान थीं। एक ही कोठरी में रसोई, बैठक, शयन-गृह—और वह भी ऐसा, जिसमें सास-ससुर, बेटा-बहू, लड़कियाँ-लड़के, सब एक साथ सोते हों।

 

जिस मकान में शांति रहती थी, उसके नीचे टेंडी चमार अपने आठ लड़के-लड़कियों के साथ रहता था, दूसरी चौड़ी गली में मारवाड़ी की दुकान थी और जिधर दरवाज़ा था, उधर भंगी रहते थे। उनके दरवाज़े से ज़रा ही परे भंगियों ने तंदूर लगा रखा था, जिसका धुआँ सुबह-शाम उनकी रसोई में आ जाया करता था, जिससे शांति को प्राय: रसोई की खिड़की बंद रखनी पड़ती थी। दिन-रात वहाँ चारपाइयाँ बिछी रहती थीं और कपड़ा बचाकर निकलना प्रायः असंभव होता था।

गर्मियों के दिन थे और म्यूनिसिपैलिटी का नल काफ़ी दूर अनारकली के पास था, इसलिए ग़रीब लोगों की सहूलियत के ख़याल से शांति ने अपने पति की सिफ़ारिश पर नीचे डेवढ़ी के नल से उन्हें पानी लेने की इजाज़त दे दी; किंतु जब उन्हें उस मकान में आए कुछ दिन बीते, तो शांति को मालूम हो गया कि यह उदारता बड़ी महँगी पड़ेगी। एक दिन जब उसके पति नहाने के बाद साबुन की डिबिया नीचे ही भूल आए और शांति उसे उठाने गई, तो उसने उसे नदारद पाया, फिर कुछ दिन बाद तौलिया ग़ायब हो गया, और इसी तरह दूसरे-तीसरे कोई-न-कोई चीज़ गुम होने लगी। हारकर एक दिन शांति ने अपने पति के पीछे पड़कर नल की टोंटी पर लकड़ी का छोटा-सा बक्सा लगवा दिया और चाबी उसकी अपने पास रख ली।

 

दूसरे दिन, जब एक ही धोती से शरीर ढाँपे वह पसीने से निचुड़ती हुई, चूल्हे के आगे बैठी रोटी की व्यवस्था कर रही थी, तो उसने अपने सामने एक काली-सी लड़की को खड़ी पाया।

लड़की उसकी समवयस्क ही थी। रंग उसका बेहद काला था और शरीर पर उसने अत्यंत मैली-कुचैली धोती और बंडी पहन रखी थी। वह अपने गहरे काले बालों में सरसों ही का तेल डालती होगी, क्योंकि उसके मस्तक पर बालों के नीचे पसीने के कारण तेल में मिली हुई मैल की एक रेखा बन रही थी। चौड़ा-सा मुँह और चपटी-सी नाक! शांति के हृदय में क्रोध और घृणा का तूफ़ान उमड़ आया। आज तक घर में जमादारिन के अतिरिक्त नीचे रहने वाली किसी कमीन लड़की को ऊपर आने का साहस न हुआ था और न स्वयं ही उसने किसी से बातचीत करने की कोशिश की थी।

 

लड़की मुस्कुरा रही थी, और उसकी आँखों में विचित्र-सी चमक थी।

‘क्या बात है?’—जैसे आँखों-ही-आँखों में शांति ने क्रोध से पूछा। तनिक मुस्कुराते हुए लड़की ने प्रार्थना की कि बीबीजी, पानी लेना है।

 

‘हमारा नल भंगी-चमारों के लिए नहीं!’

‘हम भंगी हैं न चमार!...’

 

‘फिर कौन हो?’

‘मैं बीबीजी, सामने के मंदिर के पुजारी की लड़की...।’

 

लेकिन शांति ने आगे न सुना था। उसे लड़की से बातें करते-करते घिन आती थी। धोती के छोर से चाबी खोलकर उसने फेंक दी।

इस काले-कलूटे शरीर में दिल काला न था। और शीघ्र ही शांति को इस बात का पता चल गया। रोज़ ही पानी लेने के वक़्त चाबी के लिए गोमती आती। गली में पूर्बियों का जो मंदिर था, वह उसके पुजारी की लड़की थी। अमीरों के मंदिरों के पुजारी भी मोटरों मे घूमते हैं। यह मंदिर था ग़रीब पूर्बियों का, जिनमें प्रायः सब चौकीदार, चपरासी, साईस अथवा मज़दूर थे। पुजारी का कुटुंब भी खुली गली के एक ओर भंगियों की चारपाइयों के सामने सोता था। और जब रात को कोई ताँगा उधर गुज़रता, तो प्रायः किसी-न-किसी की चारपाई उसके साथ घिसटती हुई चली जाती! मंदिर में कुआँ तो था; पर जब से इधर नल आया, उस पर डोल और रस्सी कभी ही रही और फिर जब समीप ही किसी की डेवढ़ी के नल से पानी मिल जाए, तो कुएँ पर बाज़ू तोड़ने की क्या ज़रूरत है, इसलिए गोमती पानी लेने और कुछ पानी लेने के बहाने बातें करने रोज़ ही सुबह-शाम आ जाती। बटलोही नल के नीचे रखकर जिसमें सदैव पान के कुछ पत्ते तैरा करते, वह ऊपर चली आती और फिर बातों-बातों में भूल जाती कि वह पानी लेने आई है और उस समय तक न उठती जब तक उसकी बुढ़िया दादी गली में अपनी चारपाई पर बैठी हुई चीख़-चीख़कर गालियाँ देती हुई उसे न पुकारती।

 

इसका यह मतलब नहीं, कि इस बीच में शांति और गोमती में मित्रता हो गई थी। हाँ, इतना अवश्य हुआ कि शांति जब रसोई में खाना बनाती अथवा अंदर कमरे में बैठी कपड़े सीती, तो उसको गोमती का सीढ़ियों में बैठकर बातें करते रहना बुरा नहीं लगता था। कई तरह की बातें होती—मुहल्ले के भंगियों की बातें, चमारों के घरेलू झगड़ों की बातें और फिर कुछ गोमती की निजी बातें। इस बीच में शांति को मालूम हो गया कि गोमती का विवाह हुए वर्षों बीत चुके हैं। पर उसने अपने पति की सूरत नहीं देखी! बेकार है, इसलिए न वह उसे लेने आता है और न उसके पिता उसे उसके साथ भेजते हैं।

कई बार छेड़ने की ग़र्ज़ से, या कई बार मात्र आनंद लेने की ग़र्ज़ से ही शांति उससे उसके पति के संबंध में और उसके अपने मनोभावों के संबंध में प्रश्न पूछती। उत्तर देते समय गोमती शरमा जाती थी।

 

किंतु इतना सब होते हुए भी उसकी जगह वहीं सीढ़ियों में ही बनी रही।

फिर किस प्रकार पुजारी की वह काली-कलूटी लड़की वहाँ से उठकर, उसके इतने समीप आ गई कि शांति ने एक बार अनायास आलिंगन में लेकर कह दिया—आज से तुम मेरी बहन हुई गोमती—वह सब आज भी शांति को स्मरण था।

 

सर्दियों की रात थी और अनारकली में सब ओर धुआँ-धुआँ हो रहा था। ऐसा प्रतीत होता था, जैसे लाहौर के समस्त तंदूरों, होटलों, घरों और कारख़ानों से सारे दिन उठने वाले धुएँ ने साँझ होते ही इकट्ठे होकर अनारकली पर आक्रमण कर दिया हो। शांति अपने नन्हें को कंधे से लगाए, हाथों में कुछ हल्के-फुल्के लिफ़ाफ़े थामे क्रय-विक्रय करके चली आ रही थी। वह कई दिन के अनुरोध के बाद अपने पति को इधर ला सकी थी और उन्होंने जी-भर खाया-पिया और ख़रीद किया था। अनारकली के मध्य बंगाली रसगुल्लों की जो दुकान है, वहाँ से रसगुल्ले खाने को शांति का बड़ा मन होता था; पर उसके पति को कभी इतनी फ़ुर्सत ही न हुई थी कि वहाँ तक सिर्फ़ रसगुल्ले खाने के लिए जा सकें। अस्पताल रोड के सिरे पर हलवाई के साथ चाट वाले की जो दुकान है, वहाँ से चाट खाने को शांति की बड़ी इच्छा थी; पर चाट—ऐसी निकम्मी चीज़ खाने के लिए काम छोड़कर जाने का अवकाश शांति के पति के पास कहाँ? कई दिनों से वह अपने उम्मी के लिए कुछ गर्म कपड़ों के टुकड़े ख़रीदना चाहती थी। सर्दी बढ़ रही थी और उसके पास एक भी कोट न था। और फिर गर्म कपड़ा न सही, वह चाहती थी कि कुछ ऊन ही मोल ले ली जाए, ताकि नन्हें का स्वेटर बुन दिया जाए; पर उसके पति 'हूँ'-'हाँ' करके टाल जाते थे, किंतु उस दिन वह निरंतर महीने भर तक अनुरोध करने के बाद उन्हें अपने साथ अनारकली ले जाने में सफल हुई थी। और उस दिन उन्होंने जी-भर बंगाली के रसगुल्ले और चाटवाले की चटपटी चाट खाई थी, बल्कि घलुए में मोहन के पकौड़े और मटरों वाले आलुओं के स्वाद भी चक्खे थे। फिर उम्मी के लिए कपड़ा भी ख़रीदा था और ऊन भी मोल ली थी और दो आने दर्जन ब्लेडों वाली गुडवोग की डिबिया तथा एक कोलगेट साबुन की दो आने वाली टिकिया उसके पति ने भी ख़रीदी थी। कई दिनों से वे उन्हीं पुराने ब्लेडों को शीशे के ग्लास में तेज़ करके नहाने वाले साबुन से ही हजामत बनाते आ रहे थे और उस दिन शांति ने यह सब ख़रीदने के लिए उन्हें विवश कर दिया था। और दोनों जने यह सब ख़रीदकर ख़र्च करने के आनंद की अनुभूति से पुलकित चले आ रहे थे।

दिसंबर का महीना था और सूखा जाड़ा पड़ रहा था। शांति ने अपने सस्ते, पर गर्म शाल को नन्हें के गिर्द और अच्छी तरह लपेटते हुए अचानक कहा—निगोड़ा सूखा जाड़ा पड़ रहा है। सुनती हूँ नगर में बीमारी फैल रही है।

 

पर उसके पति चुपचाप धुएँ के कारण कड़वी हो जाने वाली अपनी आँखों को रूमाल से मलते चले आ रहे थे।

शांति ने फिर कहा—हमारी अपनी गली में कई लोग बीमार हो गए हैं। परसों टेंडी चमार का लड़का निमोनिया से मर गया।

 

तभी शाल में लिपटा-लिपटा बच्चा हल्के-हल्के दो बार खाँसा और शांति ने उसे और भी अच्छी तरह शाल में लपेट लिया।

उसकी बात को सुनी-अनसुनी करके उसके पति ने कहा—आज बेहद बद-परहेज़ी की है, पेट में सख़्त गड़बड़ी हो रही है।

 

घर आकर शांति ने जब लड़के को चारपाई पर लिटाया और मस्तक पर हाथ फेरते हुए उसके बालों को पिछली तरफ़ किया, तो वह चौंककर पीछे हटी। उसने डरी हुई निगाहों से अपने पति की ओर देखा। वे सिर को हाथों में दबाए नाली पर बैठे थे।

उम्मी का माथा तो तवे की तरह तप रहा है—उसने बड़ी कठिनाई से गले को अचानक अवरुद्ध कर देने वाली किसी चीज़ को बरबस रोककर कहा।

 

लेकिन उसके पति को क़ै हुई।

शांति का कंठ अवरुद्ध-सा होने लगा था और उसकी आँखें भर-सी आर्इ थीं; पर अपने पति को क़ै करते देख बच्चे का ख़याल छोड़ वह उनकी ओर भागी। पानी लाकर उनको कुल्ला कराया। निढाल से होकर वे चारपाई पर पड़ गए; पर कुछ ही क्षण बाद उन्हें फिर क़ै हुई।

 

शांति के हाथ-पाँव फूल गए। घर में वह अकेली। सास, माँ पास नहीं, कोई दूसरा नाता-रिश्ता भी समीप नहीं और नौकर—नौकर रखने की गुंजाइश ही कभी नहीं निकली। वह कुछ क्षण के लिए घबरा गई। एक उड़ी-उड़ी-सी दृष्टि उसने अपने ज्वर से तपते हुए बच्चे और बदहज़मी से निढाल पति पर डाली। अचानक उसे गोमती का ख़याल आया। शांति अकेली कभी गली में नहीं उतरी थी। पर सब संकोच छोड़ वह भागी-भागी नीचे गई। अपनी कोठरी के बाहर, गली की ओर, मात्र ईटों के छोटे-से पर्दे की ओट से बने हुए, रसोईघर में बैठी गोमती रोटी बेल रही थी और चूल्हे की आग से उसका काला मुख चमक-सा रहा था। शांति ने देखा—उसका बड़ा भाई अभी खाना खाकर उठा है। तब आगे बढ़कर उसने इशारे से गोमती को बुलाया। तवे को नीचे उतार और लकड़ी को बाहर खींचकर गोमती उसी तरह भागी आर्इ। तब विनीत भाव से संक्षेप में शांति ने अपने पति तथा बच्चे की हालत का उल्लेख किया और फिर प्रार्थना की कि वह अपने भाई से कहकर तत्काल किसी डाक्टर को बुला दे। उनकी लांडरी के साथ ही जिस डाक्टर की दुकान है, वह सुना है पास ही लाजपति रोड पर रहता है, यदि वह आ जाए, तो बहुत ही अच्छा हो। और फिर साड़ी के छोर से पाँच रुपये का एक नोट खोल, शांति ने गोमती के हाथ में रख दिया कि फ़ीस पहले ही क्यों न देनी पड़े: पर डाक्टर को ले अवश्य आए। और फिर चलते-चलते उसने यह भी प्रार्थना की कि रोटी पकाकर संभव हो, तो तुम ही ज़रा आ जाना, उम्मी...।

शांति का गला भर आया था। गोमती ने कहा था—आप घबराएँ नहीं, मैं अभी भाई को भेज देती हूँ और मैं भी अभी आर्इ और यह कहकर वह भागती-सी चली गई थी।

 

शांति वापस मुड़ी, तो सीढ़ियाँ चढ़ते-चढ़ते उसने महसूस किया कि शंका और भय से उसके पाँव काँप रहे हैं और उसका दिल धक-धक कर रहा है।

ऊपर जाकर उसने देखा—उसके पति ऊपर से उतर रहे हैं। हाथ में उनके ख़ाली लोटा है, चेहरा पहले से भी पीला हो गया है, और माथे पर पसीना छूट गया है।

 

शांति के उड़े हुए चेहरे को देखकर उन्होंने हँसने का प्रयत्न करते हुए कहा—घबराओ नहीं, सर्दियों में हैज़ा नहीं होता।

शांति ने रोते हुए कहा—आप ऊपर क्यों गए, वहीं नाली पर बैठ जाते; किंतु जब पति ने नाली की ओर और फिर चारपाई पर पड़े हुए बीमार बच्चे की ओर इशारा किया, तो शांति चुप हो गई। उसने पहले सहारा देकर पति को बिस्तर पर लिटाया, फिर नाली पर पानी गिराया, फिर दूसरे कमरे में बिस्तर बिछा, बच्चे को उस पर लिटा आर्इ। तभी गोमती आ गई। खाना तो सब खा चुके थे, अपने हिस्से का आटा उठा, आग बुझा, वह भाग आर्इ थी।

 

शांति ने कहा—मैं उम्मी को उधर कमरे में लिटा आर्इ हूँ। मुझे डर है उसे सर्दी लग गई है। साँस उसे और भी कठिनाई से आने लगी है और खाँसी भी बढ़ गई है। निचली कोठरी में पड़े हुए पुराने लिहाफ़ से कपड़े ले लो और अँगीठी में कोयले डाल उसकी छाती पर ज़रा उससे सेंक दो। इनके पेट में गड़बड़ है। मैं इधर इसका कुछ उपचार करती हूँ। कुछ नहीं तो गर्म पानी करके बोतल ही फेरती हूँ।

गोमती ने कहा—इन्हें बीबीजी कोई हाज़मे की चीज़ दो। हमारे घर तुम्मे की अजवाइन है! मैं उसमें से कुछ लेती आर्इ हूँ, जब तक डाक्टर आए, उसे ही ज़रा गर्म पानी से इन्हें दे दो।

 

बिना किसी तरह की हिचकिचाहट के शांति ने मैली-सी पुड़िया में बँधी काली-सी अजवाइन ले ली थी और गोमती अँगीठी में कोयले डाल नीचे कपड़े लेने भाग गई थी।

बाहर शाम बढ़ चली थी। वहीं कमरे के अँधेरे में बैठे-बैठे शांति की आँखों के आगे चिंता और फ़िक्र के वे सब दिन-रात फिर गए। उनके पति को हैज़ा तो न था; किंतु गैस्ट्रोएन्टिराइटिस (Gastroenteritis) तीव्र क़िस्म का था। डाक्टर के आने तक शांति ने गोमती के कहने पर उन्हें तुम्मे की अजवाइन दी थी, प्याज़ भी सुँघाया था और गोमती अँगीठी उठाकर दूसरे कमरे में बच्चे की छाती पर सेंक देने चली गई थी। डाक्टर के आने पर मालूम हो गया था कि उसे निमोनिया हो गया है और अत्यंत सावधानी की आवश्यकता है।

 

शांति अपने पति और अपने बच्चे, दोनों की एक साथ कैसे तीमारदारी करती, उसने अपनी विवशता से गोमती की ओर देखा था; पर उसे होंठ हिलाने की ज़रूरत न पड़ी थी, बच्चे की सेवा-शुश्रूषा का समस्त भार गोमती ने अपने कंधों पर ले लिया था। शांति को मालूम भी न हुआ था कि वह कब घर जाती है, कब घरवालों को खाना खिलाती है या खाती है या खिलाती खाती भी है या नहीं। उसने तो जब देखा, उसे छाया की भाँति बच्चे के पास पाया। कई दिन तक एक ही जून खाकर गोमती ने बच्चे की तीमारदारी की थी।

दोपहर का समय था, उसके पति दुकान पर गए हुए थे। उम्मी को भी अब आराम था और वह उसकी गोद से लगा सोया पड़ा था और उसके पास ही फ़र्श पर टाट बिछाए गोमती पुराने ऊन के धागों से स्वेटर बुनना सीख रही थी। इतने दिनों की थकी-हारी-उनींदी शांति की पलकें धीरे-धीरे बंद हो रही थी, वह उन्हें खोलती थी; पर वे फिर बंद हो-हो जाती थी। आख़िर वह वैसी ही पड़ी-पड़ी सो गई थी। जब वह फिर उठी, तो उसने देखा, उम्मी रो रहा है, और गोमती उसे बड़े प्यार से सुरीली आवाज़ में थपक-थपककर लोरी दे रही है। शांति ने फिर आँखें बंद कर ली। उसने सुना गोमती धीमे-धीमे स्वर से गा रही थी—

 

‘आ री कक्को, जा री कक्को, जंगल पक्को बेर

भय्या हाथे ढेला, चिड़ैया उड़े जा।’

 

और फिर—

‘आ री चिड़ैया! दो पप्पड़ पकाए जा!

 

भय्या हाथे ढेला, चिड़ैया उड़े जा!’

बच्चा चुप कर गया था। लोरी ख़त्म करके उसने बच्चे को गले से लगाकर चूम लिया। शांति ने अर्ध-निमीलित आँखों से देखा, बच्चे के पीले ज़र्द सूखे-से मुख पर गोमती का काला स्वस्थ मुख झुका हुआ है। सुख के आँसू उसकी आँखों में उमड़ आए। उसने उठकर गोमती से बच्चे को ले लिया था और जब वह फिर टाट पर बैठने लगी थी, तो दूसरे हाथ से शांति ने उसका हाथ पकड़ चारपाई पर बिठाते हुए, उसे अपने बाज़ू से बाँध लिया था और कहा था—आज से तुम मेरी बहिन हुई गोमती!

 

आँखें बंद किए शांति इन्हीं स्मृतियों में गुम थी, उसकी आँखों से चुपचाप आँसू बह रहे थे कि अचानक उसके पति अंदर दाख़िल हुए। किसी ज़माने में लांडरी चलाने वाले और समय पड़ने पर, स्वयं अपने हाथ से इस्तरी गर्म करके कपड़ों को प्रेस करने में भी हिचकिचाहट न महसूस करने वाले ला० दीनदयाल और लाहौर की प्रसिद्ध फ़र्म 'दीनदयाल एण्ड सन्स' के मालिक प्रख्यात शेयर ब्रोकर लाला दीनदयाल में महान अंतर था। इस दस वर्ष के अर्से में उनके बाल यद्यपि पक गए थे, किंतु शरीर कहीं अधिक स्थूल हो गया था। ढीले-ढाले और प्रायः लांडरी के मालिक होते हुए भी मैले कपड़े पहनने की जगह अब उन्होंने अत्यंत बढ़िया क़िस्म का रेशमी सूट पहन रखा था और पाँवों में श्वेत रेशमी जुराबें तथा काले सेंडल पहने हुए थे।

शांति ने झट रूमाल से आँखें पोंछ ली।

 

बिजली का बटन दबाते हुए उन्होंने कहा—यहाँ अँधेरे में क्या पड़ी हो। उठो बाहर बाग़ में घूमो-फिरो और फिर बोले—इन्द्रानी का फ़ोन आया था कि बहिन यदि चाहें, तो आज सिनेमा देखा जाए।

बहिन—दिल-ही-दिल में विषाद से शांति मुस्कुरार्इ और उसके सामने एक ओर काली-कलूटी-सी लड़की का चित्र खिंच गया, जिसे कभी उसने बहिन कहा था। किंतु प्रकट उसने सिर्फ़ इतना कहा—मेरी तबीयत ठीक नहीं!

 

मुँह फुलाए हुए ला० दीनदयाल बाहर चले गए।

तब आँखों को फिर एक बार पोंछकर और तनिक स्वस्थ होकर, शांति मेज़ के पास आर्इ और कुर्सी पर बैठ, पैड अपनी ओर को खिसका, क़लम उठाकर उसने लिखा—

 

बहिन गोमती,

तुम्हारी बहिन अब बड़ी बन गई है। बड़े आदमी की बीबी है। बड़े आदमियों की बीबियाँ अब उसकी बहनें है। पिंजरे में बंद पक्षी को कब इजाज़त होती है कि स्वच्छंद, स्वतंत्र विहार करने वाले अपने हमजोलियों से मिले? मैंने तुम्हें कल फिर आने के लिए कहा था; पर अब तुम कल न आना। अपनी इस बंदिनी बहिन को भूलने की कोशिश करना।

 

—शांति

इस बार उसने एक पंक्ति भी नहीं काटी और न काग़ज़ ही फाड़ा। हाँ, एक बार लिखते-लिखते फिर आँखें भर आने से जो एक-दो आँसुओं की बूँदें पत्र पर अनायास ही गिर पड़ी थीं, उन्हें उसने ब्लाटिंग पेपर से सुखा दिया था। फिर पत्र को लिफ़ाफ़े में बंद करके उसने नौकर को आवाज़ दी और उसके हाथ में लिफ़ाफ़ा देकर कहा कि महीलाल स्ट्रीट में पूर्बियों के मंदिर के पुजारी की लड़की गोमती को दे आए। और फिर समझाते हुए कहा—गोमती, कुछ ही दिन हुए अपनी ससुराल से आई है।

 

पत्र लेकर नौकर चला ही था कि शांति ने उसे फिर आवाज़ दी और पत्र उसके हाथ से लेकर फाड़ डाला। फिर धीरे से उसने कहा—तुम गोमती से कहना कि बीबी अचानक आज मैके जा रही है और दो महीने तक वापस न लौटेंगी।

यह कहकर वह फिर खिड़की में जा खड़ी हुई और अस्त हो जाने वाले सूरज के स्थान पर ऊपर की ओर बढ़ते हुए अँधेरे को देखने लगी।

 

बात इतनी ही थी कि आज दोपहर को जब वे ब्रिज खेल रहे थे, तब नौकर ने आकर ख़बर दी थी कि महीलाल स्ट्रीट के पुजारी की लड़की गोमती आई है। तब खेल को बीच ही में छोड़कर, और भूलकर कि उसके पार्टनर राय साहब लाला बिहारीलाल है, वह भाग गई थी और उसने गोमती को अपनी भुजाओं में भींच लिया था और फिर वह उसे अपने कमरे में ले गई थी, तब दोनों बहुत देर तक अपने दुःख-सुख की बातें करती रही थीं। शांति ने जाना था कि किस प्रकार गोमती का पति काम करने लगा, उसे ले गया और उसे चार बच्चों की माँ बना दिया और गोमती ने उम्मी का और दूसरे बच्चों का हाल पूछा था। ला० दीनदयाल इस बीच में कई बार बुलाने आए थे, पर वह न गई थी और जब दूसरे दिन आने का वादा लेकर उसने गोमती को विदा किया था, तो उसके पति ने कहा था—तुम्हें शर्म नहीं आती, उस उजड्ड और गँवार औरत को लेकर तुम बैठी रहीं, तुम्हें मेरी इज़्ज़त का ज़रा भी ख़याल नहीं। उसे बग़ल में लिए उन सबके सामने से गुज़र गईं। राय साहब और उनकी पत्नी हँसने लगे और आख़िर प्रतीक्षा कर-करके चले गए...!

इसके बाद उन्होंने और भी बहुत कुछ कहा था, लेकिन शांति ने तो फ़ैसला कर लिया था कि वह पिंजरे को पिंजरा ही समझेगी और उड़ने का प्रयास न करेगी।

उपेंद्रनाथ अश्क

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शनिवार, 6 मई 2017

मुझे क़दम-क़दम पर


मुझे क़दम-क़दम पर

चौराहे मिलते हैं

बाँहें फैलाए!!

एक पैर रखता हूँ

कि सौ राहें फूटतीं,

व मैं उन सब पर से गुज़रना चाहता हूँ;

बहुत अच्छे लगते हैं

उनके तज़ुर्बे और अपने सपने...

सब सच्चे लगते हैं;

अजीब-सी अकुलाहट दिल में उभरती है,

मैं कुछ गहरे में उतरना चाहता हूँ,

जाने क्या मिल जाए!!

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक पत्थर में

चमकता हीरा है;

हर-एक छाती में आत्मा अधीरा है,

प्रत्येक सुस्मित में विमल सदा नीरा है,

मुझे भ्रम होता है कि प्रत्येक वाणी में

महाकाव्य-पीड़ा है,

पल-भर में सबसे गुज़रना चाहता हूँ,

प्रत्येक उर में से तिर आना चाहता हूँ,

इस तरह खुद ही को दिए-दिए फिरता हूँ,

अजीब है ज़िंदगी!!

बेवक़ूफ़ बनने के ख़ातिर ही

सब तरफ़ अपने को लिए-लिए फिरता हूँ;

और यह सब देख बड़ा मज़ा आता है

कि मैं ठगा जाता हूँ...

हृदय में मेरे ही,

प्रसन्न-चित्त एक मूर्ख बैठा है

हँस-हँसकर अश्रुपूर्ण, मत्त हुआ जाता है,

कि जगत्...स्वायत्त हुआ जाता है।

कहानियाँ लेकर और

मुझको कुछ देकर ये चौराहे फैलते

जहाँ ज़रा खड़े होकर

बातें कुछ करता हूँ...

 ...उपन्यास मिल जाते।

दु:ख की कथाएँ, तरह-तरह की शिकायतें

अहंकार-विश्लेषण, चारित्रिक आख्यान,

ज़माने के जानदार सूरे व आयतें

सुनने को मिलती हैं!

कविताएँ मुस्कुरा लाग-डाँट करती हैं

प्यार बात करती हैं।

मरने और जीने की जलती हुई सीढ़ियाँ

श्रद्धाएँ चढ़ती हैं!!

घबराए प्रतीक और मुस्काते रूप-चित्र

लेकर मैं घर पर जब लौटता...

उपमाएँ, द्वार पर आते ही कहती हैं कि

सौ बरस और तुम्हें

जीना ही चाहिए।

घर पर भी, पग-पग पर चौराहे मिलते हैं,

बाँहें फैलाए रोज़ मिलती हैं सौ राहें,

शाखा-प्रशाखाएँ निकलती रहती हैं,

नव-नवीन रूप-दृश्यवाले सौ-सौ विषय

रोज़-रोज़ मिलते हैं...

और, मैं सोच रहा कि

जीवन में आज के

लेखक की कठिनाई यह नहीं कि

कमी है विषयों की

वरन् यह कि आधिक्य उनका ही

उसको सताता है,

और, वह ठीक चुनाव कर नहीं पाता है!!

 

गजानन माधव मुक्तिबोध

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#कृष्णधरशर्मा #Krishnadharsharma कृष्णधरशर्मा Krishnadharsharma 

 

 

मंगलवार, 11 अप्रैल 2017

दलाई लामा कुछ वर्ष अरुणाचल क्यों नहीं रहते?


 चीन का एक अद्र्ध सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने भारत को नसीहत के साथ-साथ नाकाबिले बर्दाश्त की भी धमकी दी है। वजह दलाई लामा हैं, जिनके अरुणाचल जाने पर चीन को आपत्ति है। तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा 10 अप्रैल तक अरुणाचल प्रदेश में रहेंगे। परम पावन कोई पहली बार अरुणाचल नहीं आये हैं। हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में बस जाने के बाद वे सातवीं बार अरुणाचल भ्रमण पर आये हैं। 24 मार्च से 6 मई 1983 को परम पावन का पहला अरुणाचल दौरा था, तब भी चीन काफी उछला-कूदा था। दलाई लामा का दूसरा दौरा 7 से 16 दिसंबर 1996, तीसरा 7 से 21 अक्टूबर 1997 को हुआ था। 2003 में दो बार 29 अप्रैल से 9 मई, और 11 से 17 दिसंबर को तिब्बती धर्मगुरु का अरुणाचल आना हुआ था। दलाई लामा का छठा अरुणाचल दौरा 8 से 15 नवंबर 2009 को संपन्न हुआ था। चीन, दलाई लामा के हर अरुणाचल दौरे पर भारत को धमका चुका है। उसकी गीदड़ भभकी को क्या गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है?
चीन दलाई लामा के हर अरुणाचल दौरे पर दो कारणों से उछलता है। पहला, 1914 का शिमला कन्वेंशन है, जिसके मुताबिक तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने माना था कि दक्षिणी तिब्बत के पड़ोस में बसा तवांग और संपूर्ण अरुणाचल भारत का हिस्सा है। चीन 1914 के शिमला कन्वेंशन को मानने से इंकार करता रहा है। दूसरा, 1959 में विद्रोह के तुरंत बाद दलाई लामा का तिब्बत से महाभिनिष्क्रमण हुआ। 30 मार्च 1959 को वे तवांग आये, और फिर 18 अप्रैल को असम के तेजपुर पहुंचे। कुछ महीने बाद कोई 80 हजार शरणार्थियों के साथ धर्मशाला में तिब्बत की निर्वासित सरकार की स्थापना हुई। अरुणाचल का तवांग एक तारीखी स्थान है, जब भी दलाई लामा इस सूबे में आते हैं, तवांग जरूर जाकर अपनी याद ताजा करते हैं। चीन के इस दर्द को बदस्तूर जारी रखने के लिए दलाई लामा को चाहिए कि वे अरुणाचल ही कुछ वर्ष रहें।
एक आम फहम है कि तिब्बत की निर्वासित सरकार की स्थापना पंडित नेहरू की वजह से हुई। मगर, सच यह है कि इस पूरे खेल को सीआईए के ‘स्पेशल एक्टिविटी डिवीजन’ ने अंजाम दिया था। 1942 से पहले तिब्बत में अंदरूनी दांव-पेंच से शेष दुनिया अनजान थी। तिब्बत में पीत वस्त्र धारी गेलुग (जिसके धर्मगुरु 14वें दलाई लामा हैं), ‘काग्यु’, ‘न्यींगमां’, और शाक्य मत को मानने वाले ग्यालपो धर्मगुरु विभिन्न मठों के जरिये अपना अखंड राज चला रहे थे। 1642 से 1950 तक ल्हासा से लेकर तिब्बत पठार के बड़े हिस्से पर एक से चौदहवें दलाई लामाओं ने राज किया है। बीच में 1705 से 1750 की अवधि को छोडक़र, जब मांचु और छिंग राजाओं का शासन तिब्बत में था।
चीन का मकसद था, बहुसंख्यक गेलुग मतावलंबियों को कमजोर करना। उसने दलाई लामा के विकल्प के रूप में पणछेन लामाओं को तैयार किया। यह किस्सा 1933 का है, जब तेरहवें दलाई लामा की मृत्यु हो चुकी थी। उन दिनों नौवें पणछेन लामा थुब्तेन चोक्यी न्यीमा पांच सौ चीनी सैनिकों और कुछ समर्थक लामाओं के साथ खाम आये और कमजोर मठों को दबाकर सत्ता पर काबिज हो गये। 1942 के बाद च्यांग काई शेक ने तिब्बत में विस्तार देने की नीयत से और भी साजिशें कराईं। फिर भी गेलुग लामा उनके काबू नहीं आ रहे थे।
22 फरवरी 1940 को जब ल्हासा में 14वें दलाई लामा तेन्जिंग ग्यात्सो का राज्याभिषेक हुआ तब वे पांच साल के बालक थे। 17 नवंबर 1950 को वे पन्द्रह वर्ष के हो चुके थे, उस दिन उन्हें गेलुग शासन के राजनीतिक फैसले लेने का अधिकार मिल चुका था। तिब्बत स्वायत्तशासी क्षेत्र के शासक की हैसियत से दलाई लामा के कई पत्र ‘पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना’ को भेजे जाते रहे। 27 सितंबर 1954 को चीनी संसद ‘नेशनल पीपुल्स कांग्रेस’ की स्टैंडिंग कमेटी के ‘वॉइस चेयरमैन’ दलाई लामा बनाये गये। यह दर्शाता है कि तत्कालीन चीनी सरकार दलाई लामा को तिब्बत में बहैसियत शासक की मान्यता दे रही थी। लेकिन च्यांगकाई शेक तिब्बत पर प्रतिरूपी प्रशासक नहीं, प्रत्यक्ष चीनी आधिपत्य चाहते थे।
14वें दलाई लामा को तख्ता पलट का अंदाजा हो चुका था। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से इस वास्ते 1956 में मदद भी मांगी थी। परंतु पंडित नेहरू ने 1954 में चीन से हुई संधि का हवाला देकर, प्रत्यक्ष मदद देने से इंकार कर दिया था। पंडित नेहरू नहीं चाहते थे, कि इसे लेकर चीन से टकराव आरंभ हो जाए। इस बीच सीआईए का ‘स्पेशल एक्टिविटी डिवीजन’(एसएडी) ने दलाई लामा का तिब्बत से पलायन का इंतजाम किया। उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहॉवर संभवत: पंडित नेहरू को समझा पाने में सफल हुए थे कि तिब्बत की निर्वासित सरकार भविष्य में चीन पर अंकुश का काम करेगी। बाद में जनवरी 1961 में राष्ट्रपति निक्सन सत्ता में आये, तो तिब्बत की निर्वासित सरकार को और भी फंड व ताकत मिली। 1959, 1961, और 1965 में संयुक्त राष्ट्र महासभा में तिब्बत से संबंधित तीन प्रस्ताव पास किये गये। 21 सितंबर 1987 को अमेरिकी कांग्रेस में तिब्बत को शांति क्षेत्र बनाने संबंधी पांच सूत्री प्रस्ताव पर भी मुहर लगी। इसे लेकर चीन की भृकुटि तनी रही।
तिब्बत को केंद्र में रखकर सीआईए जो कुछ कर रही थी, उसे रूसी एजेंसियां ‘काउंटर’ तो नहीं कर पा रही थीं, मगर समय-समय पर उन गतिविधियों पर से पर्दा उठाने का काम क्रेमलिन की तरफ से होता रहा। रूसी इतिहासकार दिमित्रि बर्खोतुरोव ने कई सारे दस्तावेजों के आधार पर खुलासा किया कि यूएस कांग्रेस ने 1 लाख 80 हजार डॉलर 1964 के ड्राफ्ट बजट में आबंटित किया था। तिब्बत आंदोलन में सीआईए की कितनी गहरी दिलचस्पी रही है, उसका सबसे बड़ा उदाहरण पश्चिमी नेपाल सीमा से लगा तिब्बत का खाम प्रदेश है, जहां 1959 में खंफा युद्ध हुआ था। इसके लिए अमेरिका के कोलराडो स्थित कैंप हाले में 2100 खंफा लड़ाके लाये गये और उन्हें गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग देकर नेपाल के बरास्ते वापिस खाम भेजा गया। इस पूरे कार्यक्रम में नौ लाख डॉलर के खर्चे की मंजूरी अमेरिकी कांग्रेस से ली गई थी। जिसमें चार लाख डॉलर कैम्प हाले में व्यय किया गया था।
 बदलते वक्त के साथ तिब्बतियों को सीआईए का सहयोग धीरे-धीरे कम होता गया। 1968 में सूचना मिली कि सीआईए के जरिये तिब्बतियों को बजटीय सहयोग कम करके 11 लाख, 65 हजार डॉलर कर दिया गया था। कुछ कूटनीतिक मानते हैं कि इस सारे खेल के पीछे चीन के प्रथम नाभिकीय परीक्षण को पटरी से उतारना था, जो 16 अक्टूबर 1964 को लोप नूर में संपन्न हुआ था। लोप नूर तिब्बत से सटे शिन्चियांग में हैं, जहां के उईगुर अलगाववादी चीन को चुनौती देते रहे हैं। चीनी मामलों के जानकार जोनाथन मिस्की ने सूचना दी कि 1972 में राष्ट्रपति निक्सन के चीन दौरे के बाद ‘खंफा ऑपरेशन’ के बाद के काम को भी स्थगित कर दिया गया।
6 जुलाई 2017 को 14 वें दलाई लामा 82 साल के हो जाएंगे। उनके तेवर, उम्र के साथ ढीले पडऩे लगे हैं। उनमें बदलाव दो दशक पहले से आरंभ था। 21 सितंबर 1987 को जर्मनी के श्ट्राशबुर्ग में परम पावन ने पांच सूत्री मध्य मार्ग का प्रस्ताव दिया था। जिसमें पूरे तिब्बत को शांति क्षेत्र घोषित करने, चीनी मूल के हान वंशियों को कहीं और शिफ्ट करने, तिब्बत में मानवाधिकार, तिब्बत को नाभिकीय कचरे का ठिकाना बनाने से परहेज करने जैसे लीपापोती वाले प्रस्ताव थे। ऐसे प्रस्ताव से तिब्बत स्वतंत्र हो जाएगा, ऐसा दलाई लामा का कोई अंधभक्त ही सोच सकता है।
दलाई लामा कुछ वर्षों से धर्मगुरु का ब्रांड लेकर विचरण करते रहे हैं। लेकिन उनकी धार्मिक यात्रा पर भी चीन को आपत्ति है। बड़ा सवाल यह है कि इस समय सीआईए तिब्बत के मामले में कितना सक्रिय है? और ट्रंप प्रशासन दलाई लामा के बारे में क्या सोचता है? ट्रंप व्यापारी नेता हैं, और वे स्पष्ट कर चुके हैं कि दुनिया का राजनीतिक मानचित्र बदलने के लिए अमेरिकी टैक्स पेयर्स का पैसा अब और नहीं गलाएंगे। दलाई लामा यों भी चीन के विरूद्ध हथियार डाल चुके हैं। एक-दो मौकों पर जब दलाई लामा ने बयान दिया कि वे ‘वन चाइना पॉलिसी’ का समर्थन करते हैं, तो उन बचे-खुचे लोगों को आश्चर्य हुआ, जिन्होंने तिब्बत की आजादी के वास्ते बड़ी कुर्बानियां दी थीं। क्या दलाई लामा बदल चुके हैं? इस प्रश्न पर निष्पक्ष रूप से चिंतन की आवश्यकता है।
 चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने बयान दिया कि दलाई लामा के अरुणाचल दौरे से चीन की ‘वन चाइना पॉलिसी’ को धक्का पहुंचा है, और इससे भारत-चीन संबंध प्रभावित होते हैं। तो क्या हम अरुणाचल की कीमत पर ‘वन चाइना पॉलिसी’ को समर्थन दें? अरुणाचल भारत का अभिन्न अंग है, और रहेगा। भाड़ में जाए वन चाइना पॉलिसी! इसके लिए चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग प्रधानमंत्री मोदी के साथ अगली बार झूला झुलने से मना कर दें, तो उसकी परवाह नहीं करनी चाहिए।
चीनी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने 6 अप्रैल को नुमाया संपादकीय ‘इंडिया यूज दलाई लामा कार्ड’ को बड़े ही नकारात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। उसकी टिप्पणी थी, ‘एनएसजी का सदस्य नहीं बन पाने, और यूएन में मसूद अजहर को आतंकी लिस्ट में शामिल न करा पाने का हिसाब भारत दलाई लामा के जरिये चुकता कर रहा है।’ संपादकीय लिखने वाला जैसे सीमा पर खड़ा ललकार रहा हो, ‘अगर नई दिल्ली ‘साइनो-इंडिया’ संबंध को खराब करता है, और दोनों देश प्रतिद्वंद्वी के रूप में आमने-सामने होते हैं, तो क्या भारत उसके दुष्परिणामों को झेल पायेगा? इसलिए राष्ट्रवादी मित्रों, इस देश में सिर्फ एक बार चीनी माल की बिक्री संपूर्ण रूप से बंद करा दीजिए। चीन इस आर्थिक झटके को झेल नहीं पायेगा!

पुष्परंजन
pushpr1@rediffmail.com)

रविवार, 9 अप्रैल 2017

हार की जीत

 

माँ को अपने बेटे, साहूकार को अपने देनदार और किसान को अपने लहलहाते खेत देखकर जो आनंद आता है, वही आनंद बाबा भारती को अपना घोड़ा देखकर आता था। भगवत-भजन से जो समय बचता, वह घोड़े को अर्पण हो जाता। वह घोड़ा बड़ा सुंदर था, बड़ा बलवान। उसके जोड़ का घोड़ा सारे इलाक़े में न था। बाबा भारती उसे “सुलतान” कह कर पुकारते, अपने हाथ से खरहरा करते, ख़ुद दाना खिलाते और देख-देखकर प्रसन्न होते थे। ऐसे लगन, ऐसे प्यार, ऐसे स्नेह से कोई सच्चा प्रेमी अपने प्यारे को भी न चाहता होगा। उन्होंने अपना सब-कुछ छोड़ दिया था, रुपया, माल, असबाब, ज़मीन, यहाँ तक कि उन्हें नागरिक जीवन से भी घृणा थी। अब गाँव से बाहर एक छोटे-से मंदिर में रहते और भगवान का भजन करते थे; परंतु सुलतान से बिछुड़ने की वेदना उनके लिए असह्य थी। मैं इसके बिना नहीं रह सकूँगा, उन्हें ऐसी भ्रांति-सी हो गई थी। वे उसकी चाल पर लट्टू थे। कहते, ऐसे चलता है जैसे मोर घन-घटा को देखकर नाच रहा हो। गाँवों के लोग इस प्रेम को देखकर चकित थे, कभी-कभी कनखियों से इशारे भी करते थे, परंतु बाबा भारती को इसकी परवा न थी। जब तक संध्या-समय सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन न आता।

खड्गसिंह उस इलाक़े का प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनकर काँपते थे। होते-होते सुलतान की कीर्ति उसके कानों तक भी पहुँची। उसका हृदय उसे देखने के लिए अधीर हो उठा। वह एक दिन दोपहर के समय बाबा भारती के पास पहुँचा और नमस्कार करके बैठ गया।

 

बाबा भारती ने पूछा, “खड्गसिंह, क्या हाल है?”

खड्गसिंह ने सिर झुकाकर उत्तर दिया, “आपकी दया है।”


“कहो, इधर कैसे आ गए?”

“सुलतान की चाह खींच लाई।”

 

“विचित्र जानवर है। देखोगे तो प्रसन्न हो जाओगे।”

“मैंने भी बड़ी प्रशंसा सुनी है।”

 

“उसकी चाल तुम्हारा मन मोह लेगी!”

“कहते हैं देखने में भी बहुत सुंदर है।”

 

“क्या कहना! जो उसे एक बार देख लेता है, उसके हृदय पर उसकी छवि अंकित हो जाती है।”

“बहुत दिनों से अभिलाषा थी, आज उपस्थित हो सका हूँ।”

 

बाबा और खड्गसिंह दोनों अस्तबल में पहुँचे। बाबा ने घोड़ा दिखाया घमंड से, खड्गसिंह ने घोड़ा देखा आश्चर्य से। उसने सैकड़ों घोड़े देखे थे, परंतु ऐसा बाँका घोड़ा उसकी आँखों से कभी न गुज़रा था। सोचने लगा, भाग्य की बात है। ऐसा घोड़ा खड्गसिंह के पास होना चाहिए था। इस साधु को ऐसी चीज़ों से क्या लाभ? कुछ देर तक आश्चर्य से चुपचाप खड़ा रहा। इसके पश्चात् हृदय में हलचल होने लगी। बालकों की-सी अधीरता से बोला, “परंतु बाबाजी, इसकी चाल न देखी तो क्या?”

बाबा जी भी मनुष्य ही थे। अपनी वस्तु की प्रशंसा दूसरे के मुख से सुनने के लिए उनका हृदय अधीर हो गया। घोड़े को खोलकर बाहर लाए और उसकी पीठ पर हाथ फेरने लगे। एकाएक उचककर सवार हो गए। घोड़ा वायु-वेग से उड़ने लगा। उसकी चाल देखकर, उसकी गति देखकर खड्गसिंह के हृदय पर साँप लोट गया। वह डाकू था और जो वस्तु उसे पसंद आ जाए उस पर अपना अधिकार समझता था। उसके पास बाहुबल था और आदमी भी। जाते-जाते उसने कहा, “बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।”

 

बाबा भारती डर गए। अब उन्हें रात को नींद न आती थी। सारी रात अस्तबल की रखवाली में कटने लगी। प्रतिक्षण खड्गसिंह का भय लगा रहता, परंतु कई मास बीत गए और वह न आया। यहाँ तक कि बाबा भारती कुछ लापरवाह हो गए और इस भय को स्वप्न के भय की नाई मिथ्या समझने लगे।

संध्या का समय था। बाबा भारती सुलतान की पीठ पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। इस समय उनकी आँखों में चमक थी, मुख पर प्रसन्नता। कभी घोड़े के शरीर को देखते, कभी उसके रंग को, और मन में फूले न समाते थे।

 

सहसा एक ओर से आवाज़ आई, “ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।”

आवाज़ में करुणा थी। बाबा ने घोड़े को रोक लिया। देखा, एक अपाहिज वृक्ष की छाया में पड़ा कराह रहा है। बोले, “क्यों तुम्हें क्या कष्ट है?”

 

अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा, “बाबा, मैं दुखियारा हूँ। मुझ पर दया करो। रामाँवाला यहाँ से तीन मील है, मुझे वहाँ जाना है। घोड़े पर चढ़ा लो, परमात्मा भला करेगा।”

“वहाँ तुम्हारा कौन है?”

 

“दुर्गादत्त वैद्य का नाम आपने सुना होगा। मैं उनका सौतेला भाई हूँ।”

बाबा भारती ने घोड़े से उतरकर अपाहिज को घोड़े पर सवार किया और स्वयं उसकी लगाम पकड़कर धीरे-धीरे चलने लगे।

 

सहसा उन्हें एक झटका-सा लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होंने देखा कि अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। उनके मुख से भय, विस्मय और निराशा से मिली हुई चीख़ निकल गई। वह अपाहिज डाकू खड्गसिंह था।

बाबा भारती कुछ देर तक चुप रहे और कुछ समय पश्चात् कुछ निश्चय करके पूरे बल से चिल्लाकर बोले, “ज़रा ठहर जाओ।”

 

खड्गसिंह ने यह आवाज़ सुनकर घोड़ा रोक लिया और उसकी गरदन पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “बाबाजी, यह घोड़ा अब न दूँगा।”

“परंतु एक बात सुनते जाओ।”

 

खड्गसिंह ठहर गया। बाबा भारती ने निकट जाकर उसकी ओर ऐसी आँखों से देखा जैसे बकरा क़साई की ओर देखता है और कहा, “यह घोड़ा तुम्हारा हो चुका है। मैं तुमसे इसे वापस करने के लिए न कहूँगा। परंतु खड्गसिंह, केवल एक प्रार्थना करता हूँ। इसे अस्वीकार न करना, नहीं तो मेरा दिल टूट जाएगा।”

“बाबाजी, आज्ञा कीजिए। मैं आपका दास हूँ, केवल यह घोड़ा न दूँगा।”

 

“अब घोड़े का नाम न लो। मैं तुमसे इस विषय में कुछ न कहूँगा। मेरी प्रार्थना केवल यह है कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।”

खड्गसिंह का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। उसका विचार था कि उसे घोड़े को लेकर यहाँ से भागना पड़ेगा, परंतु बाबा भारती ने स्वयं उसे कहा कि इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना। इससे क्या प्रयोजन सिद्ध हो सकता है? खड्गसिंह ने बहुत सोचा, बहुत सिर मारा, परंतु कुछ समझ न सका। हारकर उसने अपनी आँखें बाबा भारती के मुख पर गड़ा दीं और पूछा, “बाबाजी, इसमें आपको क्या डर है?”

 

सुनकर बाबा भारती ने उत्तर दिया, “लोगों को यदि इस घटना का पता लग गया तो वो किसी ग़रीब पर विश्वास न करेंगे।”

और यह कहते-कहते उन्होंने सुलतान की ओर से इस तरह मुँह मोड़ लिया जैसे उनका उससे कभी कोई संबंध ही न रहा हो। बाबा भारती चले गए। परंतु उनके शब्द खड्गसिंह के कानों में उसी प्रकार गूँज रहे थे। सोचता था, कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से प्रेम था, इसे देखकर उनका मुख फूल की नाई खिल जाता था। कहते थे, “इसके बिना मैं रह न सकूँगा।” इसकी रखवाली में वे कई रात सोए नहीं। भजन-भक्ति न कर रखवाली करते रहे। परंतु आज उनके मुख पर दुःख की रेखा तक दिखाई न पड़ती थी। उन्हें केवल यह ख़याल था कि कहीं लोग ग़रीबों पर विश्वास करना न छोड़ दें। उन्होंने अपनी निज की हानि को मनुषयत्व की हानि पर न्योछावर कर दिया। ऐसा मनुष्य, मनुष्य नहीं देवता है।

 

रात्रि के अंधकार में खड्गसिंह बाबा भारती के मंदिर पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था। आकाश पर तारे टिमटिमा रहे थे। थोड़ी दूर पर गाँवों के कुत्ते भौंक रहे थे। मंदिर के अंदर कोई शब्द सुनाई न देता था। खड्गसिंह सुलतान की बाग पकड़े हुए था। वह धीरे-धीरे अस्तबल के फाटक पर पहुँचा। फाटक किसी वियोगी की आँखों की तरह चौपट खुला था। किसी समय वहाँ बाबा भारती स्वयं लाठी लेकर पहरा देते थे, परंतु आज उन्हें किसी चोरी, किसी डाके का भय न था। हानि ने उन्हें हानि की तरफ़ से बे-परवाह कर दिया था। खड्गसिंह ने आगे बढ़कर सुलतान को उसके स्थान पर बाँध दिया और बाहर निकलकर सावधानी से फाटक बंद कर दिया। इस समय उसकी आँखों में नेकी के आँसू थे।

अंधकार में रात्रि ने तीसरा पहर समाप्त किया, और चौथा पहर आरंभ होते ही बाबा भारती ने अपनी कुटिया से बाहर निकल ठंडे जल से स्नान किया। उसके पश्चात्, इस प्रकार जैसे कोई स्वप्न में चल रहा हो, उनके पाँव अस्तबल की ओर मुड़े। परंतु फाटक पर पहुँचकर उनको अपनी भूल प्रतीत हुई। साथ ही घोर निराशा ने पाँवों को मन-मन-भर का भारी बना दिया। वे वहीं रुक गए।

 

घोड़े ने स्वाभाविक मेघा से अपने स्वामी के पाँवों की चाप को पहचान लिया और ज़ोर से हिनहिनाया।

बाबा भारती दौड़ते हुए अंदर घुसे, और अपने घोड़े के गले से लिपटकर इस प्रकार रोने लगे, जैसे बिछुड़ा हुआ पिता चिरकाल के पश्चात् पुत्र से मिलकर रोता है। बार-बार उसकी पीठ पर हाथ फेरते, बार-बार उसके मुँह पर थपकियाँ देते और कहते थे “अब कोई ग़रीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।”

 

थोड़ी देर के बाद जब वह अस्तबल से बाहर निकले, तो उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे। ये आँसू उसी भूमि पर ठीक उसी जगह गिर रहे थे, जहाँ बाहर निकलने के बाद खड्गसिंह खड़ा रोया था।

दोनों के आँसुओं का उसी भूमि की मिट्टी पर परस्पर मिलाप हो गया।

सुदर्शन

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शुक्रवार, 17 मार्च 2017


आमेर का किला जयपुर 
राजस्थान का  उपनगर आमेर  4 वर्ग किलोमीटर (1.5 वर्ग मीटर) में फैला एक शहर है जो भारत के राजस्थान राज्य के जयपुर से 11 किलोमीटर दुरी पर स्थित है. यह किला ऊँचे पर्वतो पर बना हुआ है, असल में आमेर शहर को मीनाओ ने बनवाया था और बाद में राजा मान सिंह प्रथम ने वहा शासन किया. यह जयपुर के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है, जो कि पहाड़ी पर स्थित है। आमेर दुर्ग का निर्माण राजा मान सिंह-प्रथम ने करवाया था। आमेर दुर्ग हिन्दू तत्वों की अपनी कलात्मक शैली के लिए जाना जाता है। अपनी विशाल प्राचीर, दरवाजों की श्रंखला और लम्बे सर्पिलाकार रास्ते के साथ यह अपने सामने की ओर स्थित मावठा झील की ओर देखता हुआ खड़ा है।
इस अजेय दुर्ग का सौंदर्य इसकी चारदीवारी के भीतर मौजूद इसके चार स्तरीय लेआउट प्लान में स्पष्ट दिखाई पड़ता है, जिसमें लाल बलुआ पत्थर और संगमरमर से निर्मित दीवान-ऐ-आम या "आम जनता के लिए विशाल प्रांगण", दीवान-ऐ-ख़ास या "निजी प्रयोग के लिए बना प्रांगण", भव्य शीश महल या जय मंदिर तथा सुख निवास शामिल हैं, जिन्हें गर्मियों में ठंडा रखने के लिए दुर्ग के भीतर ही कृत्रिम रूप से बनाये गए पानी के झरने इसकी समृद्धि की कहानी कहते हैं। इसीलिये, यह आमेर दुर्ग "आमेर महल" के नाम से भी जाना जाता है। राजपूत महाराजा अपने परिवारों के साथ इस महल में रहा करते थे। महल के प्रवेश द्वार पर, किले के गणेश द्वार के साथ चैतन्य सम्प्रदाय की आराध्य माँ शिला देवी का मंदिर स्थित है।
यह आमेर का किलाजयगढ़ दुर्ग के साथ, अरावली पर्वत श्रृंखला पर चील के टीले के ठीक ऊपर इस प्रकार स्थित है कि ये दो अलग अलग किले होते हुए भी समग्र रूप में एक विशाल संरचना का रूप लेते हुए दिखाई पड़ते हैं क्योंकि दोनों किले ना सिर्फ एक दूसरे के बेहद करीब स्थित हैं, बल्कि एक सुरंग के रास्ते से दोनों एक दूसरे से जुड़े हुए भी हैं। आमेर के किले से जयगढ़ के किले तक की यह सुरंग इस उद्देश्य से बनायी गयी थी कि युद्ध के समय में राज परिवार के लोग आसानी से आमेर के किले से जयगढ़ के किले में पहुँच सकें, जो कि आमेर के किले की तुलना में अधिक दुर्जेय है।
यह मुगलों और हिन्दूओं के वास्तुशिल्प का मिलाजुला और अद्वितीय नमूना है। जयपुर से पहले कछवाहा राजपूत राजवंश की राजधानी आमेर ही थी। राजा मानसिंह जी ने वर्ष १५९२ में इसका निर्माण आरंभ किया था। पहाड़ी पर बना यह महल टेढ़े मेढ़े रास्तों और दीवारों से पटा पड़ा है। महल के पीछे से जयगढ दिखाई देता है। महल को बनाने में लाल पत्थरों और सफ़ेद मार्बल का बहुत अच्छे से उपयोग किया गया है। महल के कई अनुभाग देखने योग्य हैं।

महल में जय मंदिर, शीश महल, सुख निवास और गणेश पोल देखने और घूमने के अच्छे स्थान हैं। इन्हें समय-समय पर राजा मानसिंह ने दो सदी के शासन काल के दौरान बनवाया था। आमेर का पुराना नगर महल के पास नीचे की ओर बसा था। यहाँ का जगत शिरोमणि मंदिर, नरसिंह मंदिर देखने योग्य हैं।

आमेर का किला, कला का एक सुंदर नमूना भी है। यहाँ पर बहुत सी फिल्मों की शूटिंग भी होती है।






आमेर का किला विश्व धरोहर
राजस्थान सरकार ने जनवरी २०११ को राजस्थान के कुछ किलों को विश्व धरोहर में शामिल करने के लिए प्रस्ताव भेजा था। उसके बाद यूनेस्को टीम की आकलन समिति के दो प्रतिनिघि जयपुर आए और एएसआई व राज्य सरकार के अघिकारियों के साथ बैठक की। इन सबके पश्चात मई २०१३ में इसे विश्व धरोहर में शामिल कर लिया गया।

आमेर जयपुर नगर सीमा मे ही स्थित उपनगर है, इसे मीणा राजा आलन सिंह ने बसाया था, कम से कम 967 ईस्वी से यह नगर मौजूद रहा है, इसे 1037 ईस्वी मे राजपूत जाति के कच्छावा कुल ने जीत लिया था। आमेर नगरी और वहाँ के मंदिर तथा किले राजपूती कला का अद्वितीय उदाहरण है। यहाँ का प्रसिद्ध दुर्ग आज भी ऐतिहासिक फिल्मों के निर्माताओं को शूटिंग के लिए आमंत्रित करता है। मुख्य द्वार गणेश पोल कहलाता है, जिसकी नक्काशी अत्यन्त आकर्षक है। यहाँ की दीवारों पर कलात्मक चित्र बनाए गए थे और कहते हैं कि उन महान कारीगरों की कला से मुगल बादशाह जहांगीर इतना नाराज़ हो गया कि उसने इन चित्रों पर प्लास्टर करवा दिया। ये चित्र धीरे-धीरे प्लास्टर उखड़ने से अब दिखाई देने लगे हैं। आमेर में ही है चालीस खम्बों वाला वह शीश महल, जहाँ माचिस की तीली जलाने पर सारे महल में दीपावलियाँ आलोकित हो उठती है। हाथी की सवारी यहाँ के विशेष आकर्षण है, जो देशी सैलानियों से अधिक विदेशी पर्यटकों के लिए कौतूहल और आनंद का विषय है।





नाम का स्रोत

प्राचीन काल में आमेर को अम्बावती, अमरपुरा तथा अमरगढ़ के नाम से जाना जाता था। कुछ लोगों को कहना है कि अम्बकेश्वर भगवान शिव के नाम पर यह नगर "आमेर" बना, परन्तु अधिकांश लोग और तार्किक अर्थ अयोध्या के राजा भक्त अम्बरीश के नाम से जोड़ते हैं। कहते हैं भक्त अम्बरीश ने दीन-दुखियों के लिए राज्य के भरे हुए कोठार और गोदाम खोल रखे थे। सब तरफ़ सुख और शांति थी परन्तु राज्य के कोठार दीन-दुखियों के लिए खाली होते रहे। भक्त अम्बरीश से जब उनके पिता ने पूछताछ की तो अम्बरीश ने सिर झुकाकर उत्तर दिया कि ये गोदाम भगवान के भक्तों के गोदाम है और उनके लिए सदैव खुले रहने चाहिए। भक्त अम्बरीश को राज्य के हितों के विरुद्ध कार्य करने के लिए आरोपी ठहराया गया और जब गोदामों में आई माल की कमी का ब्यौरा अंकित किया जाने लगा तो लोग और कर्मचारी यह देखकर दंग रह गए कि कल तक जो गोदाम और कोठार खाली पड़े थे, वहाँ अचानक रात भर में माल कैसे भर गया।

भक्त अम्बरीश ने इसे ईश्वर की कृपा कहा। चमत्कार था यह भक्त अम्बरीश का और उनकी भक्ति का। राजा नतमस्तक हो गया। उसी वक्त अम्बरीश ने अपनी भक्ति और आराधना के लिए अरावली पहाड़ी पर इस स्थान को चुना, उनके नाम से कालांतर में अपभ्रंश होता हुआ अम्बरीश से "आमेर" या "आम्बेर" बन गया।







देवी मंदिर



आम्बेर देवी के मंदिर के कारण देश भर में विख्यात है। शीला-माता का प्रसिद्ध यह देव-स्थल भक्तों की मनोकामना पूर्ण करने, देवी चमत्कारों के कारण श्रद्धा का केन्द्र है। शीला-माता की मूर्ति अत्यंत मनोहारी है और शाम को यहाँ धूपबत्तियों की सुगंध में जब आरती होती है तो भक्तजन किसी अलौकिक शक्ति से भक्त-गण प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। देवी की आरती और आह्वान से जैसे मंदिर का वातावरण एकदम शक्ति से भर जाता है। रोमांच हो आता है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं और एक अजीब सी सिहरन सारे शरीर में दौड़ जाती है। पूरा माहौल चमत्कारी हो जाता है। निकट में ही वहाँ जगत शिरोमणि का वैष्णव मंदिर है, जिसका तोरण सफ़ेद संगमरमर का बना है और उसके दोनों ओर हाथी की विशाल प्रतिमाएँ हैं।
 शीश महल


इसकी भीतरी दीवारों, गुम्बदों और छतों पर शीशे के टुकड़े इस प्रकार जड़े गए हैं कि केवल कुछ मोमबत्तियाँ जलाते ही शीशों का प्रतिबिम्ब पूरे कमरे को प्रकाश से जगमग कर देता है।
आम्बेर का किला अपने शीश महल के कारण भी प्रसिद्ध है। इसकी भीतरी दीवारों, गुम्बदों और छतों पर शीशे के टुकड़े इस प्रकार जड़े गए हैं कि केवल कुछ मोमबत्तियाँ जलाते ही शीशों का प्रतिबिम्ब पूरे कमरे को प्रकाश से जगमग कर देता है। सुख महल व किले के बाहर झील बाग का स्थापत्य अपूर्व है।
भक्ति और इतिहास के पावन संगम के रूप में स्थित आमेर नगरी अपने विशाल प्रासादों व उन पर की गई स्थापत्य कला की आकर्षक पच्चीकारी के कारण पर्यटकों के लिए आकर्षण का केन्द्र बना हुआ है। पत्थर के मेहराबों की काट-छाँट देखते ही बनती है। यहाँ का विशेष आकर्षण है डोली महल, जिसका आकार उस डोली (पालकी) की तरह है, जिनमें प्राचीन काल में राजपूती महिलाएँ आया-जाया करती थीं। इन्हीं महलों में प्रवेश द्वार के अन्दर डोली महल से पूर्व एक भूल-भूलैया है, जहाँ राजे-महाराजे अपनी रानियों और पट्टरानियों के साथ आँख-मिचौनी का खेल खेला करते थे। कहते हैं महाराजा मान सिंह की कई रानियाँ थीं और जब राजा मान सिंह युद्ध से वापस लौटकर आते थे तो यह स्थिति होती थी कि वह किस रानी को सबसे पहले मिलने जाएँ। इसलिए जब भी कोई ऐसा मौका आता था तो राजा मान सिंह इस भूल-भूलैया में इधर-उधर घूमते थे और जो रानी सबसे पहले ढूँढ़ लेती थी उसे ही प्रथम मिलन का सुख प्राप्त होता था।
यह कहावत भी प्रसिद्ध है कि अकबर और मानसिंह के बीच एक गुप्त समझौता यह था कि किसी भी युद्ध से विजयी होने पर वहाँ से प्राप्त सम्पत्ति में से भूमि और हीरे-जवाहरात बादशाह अकबर के हिस्से में आएगी तथा शेष अन्य खजाना और मुद्राएँ राजा मान सिंह की सम्मति होगी। इस प्रकार की सम्पत्ति प्राप्त करके ही राजा मान सिंह ने समृद्धशाली जयपुर राज्य का संचलन किया था। आमेर के महलों के पीछे दिखाई देता है नाहरगढ़ का ऐतिहासिक किला, जहाँ अरबों रुपए की सम्पत्ति ज़मीन में गड़ी होने की संभावना और आशंका व्यक्त की जाती है।




आमेर किले की कुछ रोचक बाते

1. आमेर का नामकरण अम्बा माता से हुआ था, जिन्हें मीनाओ की देवी भी कहा जाता था.
2.
आमेर किले की आतंरिक सुंदरता में महल में बना शीश महल सबसे बड़ा आकर्षण है.
राजपूतो के सभी किलो और महलो में आमेर का किला सबसे रोमांचक है.
3.
आमेर किले की परछाई मौटा झरने में पड़ती है, जो एक चमत्कारिक परियो के महल की तरह ही दीखता है.
4.
किले का सबसे बड़ा आकर्षण किले के निचे है जहा हाथी आपको आमेर किले में ले जाते है. हाथी की सैर करना निश्चित ही सभी को आकर्षित करता है.
5.
अम्बेर में स्थापित, जयपुर से 11 किलोमीटर की दुरी पर स्थित आमेर किला कछवाह राजपूतो की राजधानी हुआ करती थी, लेकिन जयपुर के बनने के बाद जयपुर उसकी राजधानी बन गयी थी.
6.
महल का एक और आकर्षण चमत्कारिक फूल भी है, जो एक मार्बल का बना हुआ है और जिसे साथ अद्भुत आकारो में बनाया गया है. मार्बल द्वारा बनी यह आकृति सभी का दिल मोह लेती है.
7.
महल का एक और आकर्षण प्रवेश द्वार गणेश गेट है, जिसे प्राचीन समय की कलाकृतियों और आकृतियों से सजाया गया है.
8.
जयगढ़ किले और आमेर किले के बीच एक 2 किलोमीटर का गुप्त मार्ग भी बना हुआ है. पर्यटक इस रास्ते से होकर एक किले से दूसरे किले में जा सकते है.



साभार- विकिपीडिया व् अन्य स्रोत