नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

गुरुवार, 22 जुलाई 2021

कच्चे खपरैल वाले घरों में

 

कच्चे खपरैल वाले घरों में

रहती थी इतनी जगह

कि छुप सकें तेज बारिश में

गाय, बैलों के साथ-साथ

कुत्ते, बिल्ली, चूहे जैसे

और भी जीव, जंतु

जो नहीं कर सकते अपनी

व्यवस्था स्वयं के लिए

रहती थी इतनी जगह

घर के एक कोने में

कि रुक सके और बना सके

अपने हाथ से अपना भोजन

भिक्षा मांगने वाला गरीब ब्राह्मण

रहती थी इतनी कि

आ जाएं 5-10 मेहमान भी अगर

एक साथ, तो भी नहीं पड़ती थी

माथे पर कोई शिकन

उलटे बढ़ जाता था उत्साह

उन्हें खिलने-पिलाने का

उनकी आवभगत करने का

मगर टीवी और मोबाइल के

इस आधुनिक दौर में

नहीं बची है वह जगह

न घर में और न लोगों के दिलों में

नहीं बचा है वह उत्साह

न वह अपनापन

जो अपने लोगों के लिए होता था

न जाने किसकी नजर लगी है

कि रहना चाहते हैं सब अकेले ही

एक ही घर में अजनबी जैसे...

                 (कृष्णधर शर्मा 20.7.2021)

किसी के मर जाने से

 

रोजी-रोटी कमाने या

किसी जरूरी काम से

घर से निकलकर सड़क पर

चलते हुए अचानक से

किसी तेज रफ़्तार वाहन से

किसी के टकराकर

दुर्घटना में मर जाने से

नहीं रूकती है सड़क

और नहीं रुकते हैं ज्यादा देर तक

सड़क पर चलने वाले भी

मगर रुक जाती हैं कई जिंदगियां

मरने वाले के घर में

जो चलती थीं

मरनेवाले के चलते रहने से

           (कृष्णधर शर्मा 18.7.2021)

गुरुवार, 8 जुलाई 2021

रहमान का बेटा

 

क्रोध और वेदना के कारण उसकी वाणी में गहरी तलख़ी आ गई थी और वह बात-बात में चिनचिना उठता था। यदि उस समय गोपी न आ जाता, तो संभव था कि वह किसी बच्चे को पीट कर अपने दिल का ग़ुबार निकालता। गोपी ने आ कर दूर से ही पुकारा—“साहब सलाम भाई रहमान। कहो क्या बना रहे हो?”

रहमान के मस्तिष्क का पारा सहसा कई डिग्री नीचे आ गया, यद्यपि क्रोध की मात्रा अभी भी काफ़ी थी, बोला—“आओ गोपी काका। साहब सलाम।”

 

“बड़े तेज़ हो, क्या बात है?”

गोपी बैठ गया। रहमान ने उसके सामने बीड़ी निकाल कर रखी और फिर सुलगा कर बोला—“क्या बात होगी काका! आजकल के छोकरों का दिमाग़ बिगड़ गया है। जाने कैसी हवा चल पड़ी है। माँ-बाप को कुछ समझते ही नहीं।”

 

गोपी ने बीड़ी का लंबा कश खींचा और मुस्कुरा कर कहा—“रहमान, बात सदा ही ऐसी रही है। मुझे तो अपनी याद है। बाबा सिर पटक कर रह गए, मगर मैंने चटशाला में जाकर हाज़िरी ही नहीं दी। आज बुढ़ापे में वे दिन याद आते हैं। सोचता हूँ, दो अच्छर पेट में पड़ जाते तो...”

बीच में बात काट कर रहमान ने तेज़ी से कहा—“तो काका, नशा चढ़ जाता। अच्छरों में नाज़ से ज़ियादा नशा होवे है, यह दो अच्छर का नशा ही तो है जो सलीम को उड़ाए लिए जावे है। कहवे है इस बस्ती में मेरा जी नहीं लगे। सब गंदे रहते हैं। बात करने की तमीज़ नहीं। चोरी से नहीं चूकें...”

 

गोपी चौंक कर बोला—“सलीम ने कहा ऐसे?”

“जी हाँ, सलीम ने कहा ऐसे और कहा, हम इंसान नहीं हैं, हैवान हैं। फिर हम जैसे नाली में कीड़े बिलबिलाए हैं न, उसी तरह की हमारी ज़िंदगी है…” कहते-कहते रहमान की आँखें चढ़ गईं। बदन काँपने लगा। हुक्के को जिसे उसने अभी तक छुआ नहीं था, इतने ज़ोर से पैर से सरकाया कि चिलम नीचे गिर पड़ी और आग बिखर कर चारों ओर फैल गई। तेज़ी से पुकारा—“करीमन! ओ हरामज़ादी करीमन! कहाँ मर गई जा कर? ले जा इस हुक्के को। साला आज हमें गुंडा कहवे है...”

 

गोपी ने रहमान की तेज़ी देख कर कहा—“उसका बाप स्कूल में चपरासी था न…!”

“जी हाँ, वही असर तो ख़राब करे है। पढ़ा नहीं था तो क्या, हर वक़्त पढ़े-लिखे के बीच रहवे था। मगर साले ने किया क्या? भरी जवानी में पैर फैला कर मर गया। बीवी को कहीं का भी नहीं छोड़ा। न जाने किसके पड़ती, वह तो उसकी माँ ने मेरे आगे धरना दे दिया। वह दिन और आज का दिन, सिर पर रखा है। कह दे कोई, सलीम रहमान की औलाद नहीं है। पर वह बात है काका...”

 

आगे जैसे रहमान की आँख में कहीं से आ कर कुणक पड़ गई। ज़ोर-ज़ोर से मलने लगा। उसी क्षण शून्य में ताकते-ताकते गोपी ने कहा—“सलीम की माँ बड़ी नेकदिल औरत है।”

रहमान एकदम बोला—“काका, फ़रिश्ता है। ऐसी नेकदिल औरत कहाँ देखने को मिले है आजकल। क्या मजाल जो कभी पहले शौहर का नाम लिया हो! ऐसी जी-जान से ख़िदमत करे है कि बस सिर नहीं उठता। और काका उसी का नतीजा है। तुमसे कुछ छुपा है। कभी इधर-उधर देखा है मुझे?”

 

गोपी ने तत्परता से कहा—“कभी नहीं रहमान, मुँह देखे की नहीं ईमान की बात है। पाँच पंचों में कहने को तैयार हूँ।”

“और रही चोरी की बात! किसी के घर डाका मारने कौन जावे है। यूँ खेत में से घास-पात तुम भी लावो ही हो काका।”

 

गोपी बोला—“हाँ लावूँ हूँ। इसमें लुकाव की क्या बात है। और लावें क्यों न? हम क्या इतने से भी गए? बाबू लोग रोज़ जेब भर कर घर लौटे हैं। सच कहूँ रहमान! तनख़्वाह बाँटते वक़्त अँगूठा पहले लगवा लेवे हैं और पैसों के वक़्त किसी ग़रीब को ऐसी दुत्कार देवें कि बिचारा मुँह ताकता रह जावे है। इस सत्यानाशी राज में कम अंधेर नहीं है। पर बेमाता ने हमारी सरकार की क़िस्मत में न जाने क्या लिख दिया है, दिन-रात चौगुनी तरक़्क़ी होवे है। गाँधी बाबा की कुछ भी पेश नहीं आवे।”

रहमान ने सारी बातें बिना सुने उसी तेज़ी से कहा—“बाबू क्यों? वे जो अफ़सर होते हैं, साब बहादुर, वे क्या कम हैं? किसी चीज़ पर पैसा नहीं डालें हैं। और काका! यह कल का छोकरा सलीम हमें गुंडा बतावे है। गुंडे साले तो वे हैं। सच काका! कलब में सिवाय बदमाशी के वे करें क्या हैं। शराब वे पिएँ, जुआ वे खेलें और...।”

 

“और क्या? हमारे साब के पास आए दिन कलब का चपरासी आवे है। कभी सौ, कभी डेढ़ सौ, सदा हारे ही हैं, पर रहमान, उसकी मेम बड़ी तक़दीर की सिकंदर है। जब जावे तब सौ-सवा सौ खींच लावे है।”

“मेम साब... काका, तुम क्या जानो। उसकी बात और है। जितने ये साब बहादुर हैं, और साब क्यों, बड़े-बड़े वकील, बलिस्टर, लाला, सभी आजकल कलब जावे हैं। मुसलमान को शराब पीना हराम है, पर वहाँ बैठ कर विस्की, ज़िन, पोरट, सेरी सब चढ़ा जावे हैं। औरतें ऐसी गिर गई हैं कि पराए मर्द के कमर में हाथ डाल कर लिए फिरे हैं, और वे हँस-हँस कर खिलर-खिलर बातें करे हैं। काका! जितनी देर वे वहाँ रहवे हैं, ये यही कहते रहे हैं—उसकी बीवी ख़ूबसूरत है। इसकी ज़ोरदार है। सरमा ख़ुशक़िस्मत है, रफ़ीक़ की लौंडिया उसके घर जावे। गुप्ता की बीवी उसके पास रहे है। सारा वक़्त यही घुसर-पुसर होती रहे और मौक़ा देख कोई किसी के साथ उड़ चला। उस दिन जीत की ख़ुशी में ड्रामा हुआ था। पुलिस के कप्तान लालाजी बने थे। वे लालाजी लोगों को हँसाते रहे और मेजर साहब उनकी बीवी को ले कर डाक बँगले की सैर करने चले गए। ये हैं, बड़े लोगन की चाल-चलन। ये हमारे आका... हमारे भाग की लकीर इन्हीं की क़लम से खिंचे है।”

 

गोपी ने फिर ज़ोर से बीड़ी का कश खींचा और गंभीरता से कहा—“रहमान! देखने में जितना बड़ा है, असल में वह उतना छोटा।”

“और खोटा भी।”

 

“और क्या।”

“ओर इन्हीं के लिए सलीम हमें बदतमीज़, बदसहूर, बेअक़ल, न जाने क्या कहवे है। मैंने भी सोच लिया है, आज उससे फ़ैसला करके रहूँगा। मैंने हमेशा उसे अपना समझा है। नहीं तो... नहीं तो...।”

 

गोपी ने अब अपना डंडा उठा लिया। बोला—“रहमान, कुछ भी हो, सलीम तेरा ही लड़का माना जावे है, जवान है, अबे-तबे से न बोलना। समझा, आजकल हवा ऐसी चल पड़ी है। और चली कब नहीं थी! फ़रक़ इतना है, पहले मार खा कर बोलते नहीं थे, अब सीधे जवाब देवे हैं...”

रहमान तेज़ ही था। कहा—“मैं उसके जवाबों की क्या परवा करूँ काका। जावे जहन्नुम में। मेरा लगे क्या है?... और काका। मैं उसे मारूँगा क्यों। मेरे क्या हाथ खुले हैं। मैं तो उससे दो बात पूछूँगा, रास्ता इधर या उधर। और काका, मुझे उस साले की ज़रा भी फ़िकर नहीं—फ़िकर उसकी माँ की है। यूँ तो औलाद और क्या कम हैं, पर ज़रा यही कुछ सहूरदार था... काका, सोचता था पढ़-लिख कर कहीं मुंशी बनेगा, ज़ात-बिरादरी में नाम होगा। लेकिन लिखा क्या किसी से मिटा है?”

 

गोपी बोला—“हाँ रहमान। लिखा किसी से नहीं मिटा! अब चाहे तो मालिक भी नहीं मेट सकता। ऐसी गहरी लकीर बेमाता ने खींची है। सो भइया अपनी इज़्ज़त अपने हाथ है। ज़ियादा कुछ मत कहना। पढ़ों-लिखों को ग़ैरत जल्दी आ जावे है। समझा...।”

“समझा काका।”

 

और फिर गोपी डंडा उठा, घास की गठरी कंधे पर डाल, साहब सलाम करके चला गया। रहमान कुछ देर वहीं शून्य में बैठा धुँधले होते वातावरण को देखता रहा। मन में उमड़-घुमड़ कर विचार आते और आपस में टकरा कर शीघ्रता से निकल जाते। वे झील के गिरते पानी के समान थे, गहरे और तेज़। इतने तेज़ कि उफन कर रह जाते। उनका तात्कालिक मूल्य कुछ नहीं था, इसीलिए उससे मन की झुँझलाहट और गहरी होती गई। करुणा और विषाद कोई उसे कम नहीं कर सका। आख़िर वह उठा और अंदर चला गया।

घर में सन्नाटा था। बच्चे अभी तक खेल कर नहीं लौटे थे। उसकी बीवी रोटियाँ सेंक रही थी। सालन की ख़ुश्बू उसकी नाक में भर उठी। उसने एक नज़र उठा कर अपनी बीवी को देखा—शांत-चित्त वह काम में लगी है। उसके कानों में लंबे बाले रोटी बढ़ाते समय वेग से हिलते हैं। उसके सिर का गंदा कपड़ा खिसक कर कंधे पर आ पड़ा है। यद्यपि जवानी बीत गई है, तो भी चेहरे का भराव अभी हल्का नहीं पड़ा है। गोरी न हो कर भी वह काली नहीं है। उसकी आँखों में एक अजीब नशा है। वही नशा उसे बरबस ख़ूबसूरत बना देता है। जिसकी ओर वह देख लेती है एक बार, तो वह ठिठक जाता है। रहमान सहसा ठिठका—उन दिनों इन्हीं आँखों ने मुझे बेबस बना दिया था। नहीं तो...

 

सहसा उसे देख कर उसकी बीवी बोल उठी—“इतने तेज़ क्यों हो रहे थे। ग़ैरों के आगे क्या इस तरह घर की बात कहते हैं?”

रहमान कुछ तलख़ी से बोला—“ग़ैरों के आगे क्या? पानी अब सर से उतर गया है। कल को जब घर से निकल जावेगा, तब क्या दुनिया कानों में रुई ठूँस लेगी या आँखें फोड़ लेगी?”

 

बीवी को दुख पहुँचा। बोली—“बाप-बेटे क्या दुनिया में कभी अलग नहीं होते?”

“कौन कहे कि वह मेरा बेटा है?”

 

“और किसका है?”

“मैं क्या जानूँ?”

 

“ज़रा देखना मेरी तरफ़! मैं भी तो सुनूँ।”

तिनक कर उसने कहा—“क्या सुनेगी? मेरा होता तो क्या इस तरह कहता? ज़बान खींच लेता साले की।”

 

“देखूँगी किस-किसकी ज़बान खींचोगे। अभी तक तो एक भी बात नहीं सराहता।”

“बच्चे और जवान बराबर होते हैं।”

 

“नहीं होवें पर पूत के पाँव पालने में नज़र आ जावे है। और फिर वही कौन-सा जवान है? अल्हड़ उमर है। एक बात मुँह से निकल गई, तो सिर पर उठा लिया। तुम्हारा नहीं तभी तो। अपना होता, तो क्या इस तरह ढोल पीटते। अपनों के हज़ार ऐब नज़र नहीं आवे है। दूसरों का एक ज़री-सा पहाड़ बन जावे है...”

रहमान कुछ भी हो, इतना मूर्ख नहीं था। उसने समझ लिया, उसने बीवी के दिल को दुखाया है, पर वह क्या करे। सलीम से उसे क्या कम मोहब्बत है! पेट काट कर उसे रहमान ने ही तो स्कूल भेजा है। उसके लिए अब भी कभी बड़े बाबू, कभी डिप्टी, कभी बड़े साहब के आगे गिड़गिड़ाता रहता है। इतनी गहरी मोहब्बत है, तभी तो इतना दुख है। कोई ग़ैर होता तो...।

 

तभी उसके चारों बच्चे बाहर से शोर मचाते हुए आ पहुँचे। वे धूल-मिट्टी से लिथड़े पड़े थे। परंतु गंदे और अर्द्धनग्न होने पर भी प्रसन्न थे। सबसे बड़ी लड़की लगभग बारह वर्ष की थी। आते ही ख़ुशी-ख़ुशी बोली—“अम्मी! आज हम भइया की जगह गए थे।”

रहमान को कुछ अचरज हुआ, पर वह जला-भुना बैठा था। कड़क कर बोला—“कहाँ गई थी चुड़ैल?”

 

लड़की सहम गई। घबरा कर बोली—“भइया की जगह।”

“कौन-सी जगह?”

 

“जहाँ भइया जाते हैं। दूर...।”

छोटा लड़का जो दस बरस का था, अब एकदम बोला—“अब्बा, वहाँ बहुत सारे आदमी थे।”

 

तीसरा भी आठ बरस का लड़का। आगे बढ़ आया, कहा—“वहाँ लेक्चर हुए थे।”

रहमान अचकचाया—“लेक्चर?”

 

लड़की ने कहा—“हाँ, अब्बा! लेक्चर हुए थे। भइया भी बोले थे। लोगों ने बड़ी तालियाँ पीटीं।”

अम्मा का मुख सहसा खिल उठा। गर्व से एक बार उसने रहमान को देखा।

 

फिर बोली—“क्या कहा उसने?”

लड़की जो मुरझा चली थी, अब दुगने उत्साह से कहने लगी—“अम्मी, भइया ने बहुत-सी बातें कही थीं। हम गंदे रहते हैं, हम अनपढ़ हैं, हम चोरी करते हैं। हमें बोलना नहीं आता। हमें खाने को नहीं मिलता।”

 

रहमान चिहुँक कर बोला—“देखा तुमने।”

बीवी ने तिनक कर कहा—“सुनो तो। हाँ, और क्या लाली?”

 

लड़का बोला—“मैं बताऊँ अम्मी! भइया ने कहा था, इसमें हमारा ही क़ुसूर है।”

“हाँ,” लड़की बोली—“उन्होंने कहा था, बड़े लोग हमें जान-बूझ कर नीचे गिराते जावे हैं और हम बोलें ही नहीं।”

 

और फिर अब्बा की तरफ़ मुड़ कर बोली—“क्यों अब्बा, वे लोग कौन हैं?”

अब्बा तो बुत बने बैठे थे; क्या कहते?

 

लड़का कहने लगा—“अब्बा! और जो उनमें बड़े आदमी थे, सबने यही कहा—हम भी आदमी हैं। हम भी जिएँगे। हम अब जाग गए हैं।”

अम्मी ने एक लंबी साँस खींची। चेहरा प्रकाश से भर उठा—“सुनते हो सलीम की बातें।”

 

रहमान अब भी नहीं बोला। लड़की बोली—“और अम्मी। भइया ने मुझसे कहा था कि मैं अब घर नहीं आऊँगा।”

“नहीं आएगा?”

 

“हाँ, अम्मी।”

रहमान की निद्रा टूटी—“क्यों नहीं आएगा? क्योंकि हम गंदे...?”

 

“नहीं अब्बा!” लड़की आप ही आप कुछ गंभीरता से बोली—“भइया ने मुझसे कहा था कि अब इस घर में नहीं रहूँगा। नया घर लूँगा, बहुत साफ़। अब्बा से कह दीजो कि वहाँ रहने से गड़बड़ हो सकती है। हम लोगों के पीछे पुलिस लगी रहती है। वहाँ आएगी तो शायद अब्बा की नौकरी छूट जावेगी...?”

लेकिन अब्बा हों तो बोलें। उनके तो सिर में भूचाल आ गया है। वह घूम रहा है, रुकता नहीं...

 

विष्णु प्रभाकर

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शुक्रवार, 25 जून 2021

ये हैं भारत के वो 5 मशहूर चोर बाजार, जहां कम से कम में खरीद सकते हैं कपड़ों से लेकर इलेक्ट्रानिक का सामान

 

आपने कभी चोर बाजार से कोई अपना जरूरी सामान कम से कम दाम में खरीदा है? अगर नहीं, तो ये रहे भारत के 5 ऐसे मशहूर चोर बाजार जहां आप फर्नीचर, कपड़ों से लेकर गाड़ी के पार्ट्स तक खरीद सकते हैं।



भारत में ऐसे बहुत से लोग हैं, जिन्हें कम से कम दाम में चीजों को खरीदना बहुत पसंद होता है। ऐसे लोगों को अगर आप बोल दें, कि इस मार्किट में आज 50 परसेंट ऑफ मिल रहा है या सेल लगी है, तो वहां कुछ ही घंटों में आप इतनी भीड़ देख लेंगे, जहां पैर रखने की जगह नहीं होती। बहुत से लोग तो ऐसे होते हैं, जो ऑनलाइन में भी डिस्काउंट और सेल तलाश रहे होते हैं। लेकिन क्या आप ये बात जानते हैं? कि भारत में ऐसे कई चोर बाजार हैं, जहां आप चीजों को बहुत ही सस्ते दाम में खरीद सकते हैं। इन बाजारों में आप फर्नीचर, कपड़े, इलेक्ट्रानिक सामान से कार के पार्ट्स भी सस्ते दाम में खरीद सकते हैं। तो चलिए हम आपको उन बाजारों के बारे में बताते हैं -

मटन स्ट्रीट, मुंबई - Mutton Street, Mumbai 


मुंबई में एक मशहूर मटन स्ट्रीट नाम से एक चोर बाजार है, जो कि लगभग 150 साल से यही पर है। पहले इस बाजार का नाम शोर बाजार था, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि ब्रिटिश लोग इस शब्द को सही ढंग से नहीं बोल पाते थे, वो शोर बाजार को चोर बाजर कहते थे। यहां आप विंटेज मूवी पोस्टर्स से लेकर एंटीक फर्नीचर, सेकेंड हैंड कपड़े, लग्जरी ब्रांड के प्रोडक्ट्स की फर्स्ट कॉपी बहुत कम दाम में खरीद सकते हैं। अगर आपका कोई सामान चोरी हुआ है, तो आप यहां आकर अपने सामान को ढूंढ सकते हैं, क्योंकि कई बार लोगों को अपना खोया हुआ सामान यहां मिल 
जाता है।

चिकपेट मार्केट, बेंगलुरु - Chickpet Market, Bengaluru


चिकपेट मार्किट भी बेंगलुरु के सबसे लोकप्रिय चोर बाजार में आती है। चिकपेट एक ऐसा बाजार है, जहां आप कई तरह के आकर्षक सामान खरीद सकते हैं। यहां आपको कई सिल्क की साड़ियां देखने को मिल जाएंगी। इसके अलावा आप यहां बहुत कम दाम में कपड़े और आर्टिफिशियल गहने भी खरीद सकते हैं। अगर आप जिम का सामान खरीदने के लिए कोई सस्ती दूकान खरीद रहे हैं, तो आप यहां जा सकते हैं।

चांदनी चौक, पुरानी दिल्ली - Chandni Chowk, Old Delhi 



दिल्ली के चांदनी चौक बाजार को कौन नहीं जानता, देश के साथ-साथ यहां कई विदेशी लोग भी खरीदारी करने आते हैं। दिल्ली के इस बाजार में सबसे ज्यादा हलचल देखने को मिलती है। ये बाजार सबसे अधिक कपड़े और हार्डवेयर के लिए जाना जाता है। इस मार्किट में कई पुरानी दुकाने हैं, जिनसे आप बहुत ही कम दाम में सामान खरीद सकते हैं। यहां पर मिलने वाला सामान या तो सेकेंड हैंड होता है या फिर थोड़ा डिफेक्टिव होता है। आप बड़े ब्रांड से लेकर छोट-छोट ब्रांड के प्रोडक्ट्स यहां देख सकते हैं। चांदनी चौक के पास दरियागंज बाजार भी है, जहां से आप बहुत ही कम दाम में किताबें खरीद सकते हैं।

सोती गंज मेरठ - Soti Ganj, Meerut


सोती गंज भारत के प्रसिद्ध बाजारों में शामिल है। जो लोग वाहन प्रेमी हैं, उनके लिए ये मार्किट एकदम बेस्ट है। इस मार्किट में आप गाड़ी के सामान जैसे ईंधन टैंक और बहुत सी चीजें सबसे कम दाम में खरीद सकते हैं। सोती गंज, मेरठ में मौजूद है, जहां सस्ते में ऑटोमोबाइल पार्ट्स बेचे जाते हैं। आपको बता दें, दिल्ली/एनसीआर या उत्तरी शहरों से जो भी गाड़ी का सामान या कार चोरी होता है, उसे यही बेचा जाता है। इस बाजार में आप मारुति 800 से लेकर रोल्स रॉयस जैसे महंगी गाड़ियों के सामान तक खरीद सकते हैं।

पुदुपेट मार्केट, चेन्नई - Pudupet Market, Chennai




पुदुपेट मार्केट चेन्नई का एक मशहूर मार्किट है, जो दक्षिण के ऑटोमोबाइल प्रेमियों के लिए फेमस है। इस बाजार में आप स्पेयर ऑटो पार्ट्स से लेकर असेंबल और कस्टमाइज्ड कारों तक हर तरह के ऑटोमोबाइल पार्ट्स देख सकते हैं। ये बाजार बिल्कुल वैसा ही होता है, जैसा आप बॉलीवुड की फिल्मों में देखते हैं, जिनकी स्टोरी माफिया और तस्करी के आसपास घूमती हैं।

आलेख साभार- नवभारत टाइम्स (फोटो साभार : TOI)
समाज की बात Samaj Ki Baat KD Sharma कृष्णधर शर्मा 




सौर ऊर्जा एवं पम्प स्टोरेज से बनाइए साफ बिजली

 हम सौर ऊर्जा के साथ स्वतंत्र पम्प स्टोरेज परियोजनाएं लगाएं तो हम छह रुपये में रात की बिजली उपलब्ध करा सकते हैं जो कि थर्मल बिजली के मूल्य के बराबर होगा। इसके अतिरिक्त जब कभी-कभी अकस्मात ग्रिड पर लोड कम-ज्यादा होता है उस समय भी पम्प स्टोरेज परियोजनाओं से बिजली को बनाकर या बंद करके ग्रिड की स्थिरता को संभाला जा सकता है।

आज सम्पूर्ण विश्व बाढ़, तूफान, सूखा और कोविड जैसी समस्याओं से ग्रसित है। ये समस्याएँ कहीं न कहीं मनुष्य द्वारा पर्यावरण में अत्यधिक दखल करने के कारण उत्पन्न हुई दिखती है। इस दखल का एक प्रमुख कारण बिजली का उत्पादन है। थर्मल पावर को बनाने के लिए बड़े क्षेत्रों में जंगलों को काट कर कोयले का खनन किया जा रहा है। इससे वनस्पति और पशु प्रभावित हो रहे हैं। जलविद्युत के उत्पादन के लिए नदियों को अवरोधित किया जा रहा है और मछलियों की जीविका दूभर हो रही है। लेकिन मनुष्य को बिजली की आवश्यकता भी है। अक्सर किसी देश के नागरिकों के जीवन स्तर को प्रति व्यक्ति बिजली की खपत से आंका जाता है। अतएव ऐसा रास्ता निकालना है कि हम बिजली का उत्पादन कर सकें और पर्यावरण के दुष्प्रभावों को भी सीमित कर सकें।  अपने देश में बिजली उत्पादन के तीन प्रमुख स्रोत हैं। पहला है-थर्मल यानी कोयले से निर्मित बिजली। इसमें प्रमुख समस्या यह है कि अपने देश में कोयला सीमित मात्रा में ही उपलब्ध है। हमें दूसरे देशों से कोयला भारी मात्र में आयात करना पड़ रहा है। यदि कोयला आयात करके हम अपने जंगलों को बचा भी लें तो आस्ट्रेलिया जैसे निर्यातक देशों में जंगलों के कटने और कोयले के खनन से जो पर्यावरणीय दुष्प्रभाव होंगे वे हमें भी प्रभावित करेंगे ही। कोयले को जलाने में कार्बन का उत्सर्जन भारी मात्रा में होता है जिसके कारण धरती का तापमान बढ़ रहा है और तूफान, सूखा एवं बाढ़ जैसी आपदाएं उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही हैं। बिजली उत्पादन का दूसरा स्रोत जल विद्युत अथवा हाइड्रोपावर है। इस विधि को एक साफ-सुथरी तकनीक कहा जाता है चूंकि इससे कार्बन उत्सर्जन कम होता है।  थर्मल पावर में एक यूनिट बिजली बनाने में लगभग 900 ग्राम कार्बन का उत्सर्जन होता है जबकि जलविद्युत परियोजनाओं को स्थापित करने में जो सीमेंट और लोहा आदि का उपयोग होता है उसको बनाने में लगभग 300 ग्राम कार्बन प्रति यूनिट का उत्सर्जन होता है। जलविद्युत में कार्बन उत्सर्जन में शुद्ध कमी 600 ग्राम प्रति यूनिट आती है जो कि महत्वपूर्ण है। लेकिन जलविद्युत बनाने में दूसरे तमाम पर्यावरणीय दुष्प्रभाव पड़ते हैं। जैसे सुरंग को बनाने में विस्फोट किये जाते हैं जिससे जलस्रोत सूखते हैं और भूस्खलन होता है। बराज बनाने से मछलियों का आवागमन बाधित होता और जलीय जैव विविधिता नष्ट होती है। बड़े बांधों में सेडीमेंट जमा हो जाता है और सेडीमेंट के न पहुंचने के कारण गंगासागर जैसे हमारे तटीय क्षेत्र समुद्र की गोद में समाने की दिशा में हैं। पानी को टर्बाइन में मथे जाने से उसकी गुणवत्ता में कमी आती है। इस प्रकार थर्मल और हाइड्रो दोनों ही स्रोतों की पर्यावरणीय समस्या है।

सौर ऊर्जा को आगे बढ़ाने से इन दोनों के बीच रास्ता निकल सकता है। भारत सरकार ने इस दिशा में सराहनीय कदम उठाए हैं। अपने देश में सौर ऊर्जा का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है। विशेष यह कि सौर ऊर्जा से उत्पादित बिजली का दाम लगभग तीन रुपये प्रति यूनिट आता है जबकि थर्मल बिजली का छह रुपये और जलविद्युत का आठ रुपये प्रति यूनिट। इसलिए सौर ऊर्जा हमारे लिए हर तरह से उपयुक्त है। यह सस्ती भी है और इसके पर्यावरणीय दुष्प्रभाव भी तुलना में कम हैं। लेकिन सौर ऊर्जा में समस्या यह है कि यह केवल दिन के समय में बनती है। रात में और बरसात के समय बादलों के आने जाने के कारण इसका उत्पादन अनिश्चित रहता है। ऐसे में हम सौर ऊर्जा से अपनी सुबह, शाम और रात की बिजली की जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते हैं।  इसका उत्तम उपाय है कि 'स्टैंड अलोन' यानि कि 'स्वतंत्र' पम्प स्टोरेज विद्युत परियोजनायें बनाई जाएं। इन परियोजनायों में दो बड़े बनाये जाते हैं। एक तालाब ऊंचाई पर और दूसरा नीचे बनाया जाता है। दिन के समय जब सौर ऊर्जा उपलब्ध होती है तब नीचे के तालाब से पानी को ऊपर के तालाब में पम्प करके रख लिया जाता है। इसके बाद सायंकाल और रात में जब बिजली की जरूरत होती है तब ऊपर से पानी को छोड़ कर बिजली बनाते हुए नीचे के तालाब में लाया जाता है। अगले दिन उस पानी को पुन: ऊपर पंप कर दिया जाता है। वही पानी बार-बार ऊपर-नीचे होता रहता है। इस प्रकार दिन की सौर ऊर्जा को सुबह, शाम और रात की बिजली में परिवर्तित किया जा सकता है।  विद्यमान जलविद्युत परियोजनाओं को ही पम्प स्टोरेज में ही तब्दील किया जा सकता है। जैसे टिहरी बांध के नीचे कोटेश्वरर जलविद्युत परियोजनाओं को पम्प स्टोरेज में परिवर्तित कर दिया गया है। दिन के समय इस परियोजना से पानी को नीचे से ऊपर टिहरी झील में वापस डाला जाता है और रात के समय उसी टिहरी झील से पानी को निकाल कर पुन: बिजली बनाई जाती है। विद्यमान जलविद्युत परियोजनाओं को पम्प स्टोरेज में परिवर्तित करके दिन की बिजली को रात की बिजली में बदलने का खर्च मात्र 40 पैसे प्रति यूनिट आता है। इसलिए तीन रुपये की सौर ऊर्जा को हम 40 पैसे के अतिरिक्त खर्च से सुबह शाम की बिजली में परिवर्तित कर सकते हैं। लेकिन इसमें समस्या यह है कि टिहरी और कोटेश्वर जल विद्युत परियोजनाओं से जो पर्यावरणीय दुष्प्रभाव होते हैं वे तो होते ही रहते हैं। कुएं से निकले और खाई में गिरे। सौर ऊर्जा को बनाया लेकिन उसे रात की बिजली बनाने में पुन: नदियों को नष्ट किया।

इस समस्या का उत्तम विकल्प यह है कि हम स्वतंत्र पम्प स्टोरेज परियोजना बनाएं जैसा ऊपर बताया गया है। इन परियोजना को नदी के पाट से अलग बनाया जा सकता है। किसी भी पहाड़ के ऊपर और नीचे उपयुक्त स्थान देख कर दो तालाब बनाये जा सकते हैं। ऐसा करने से नदी के बहाव में व्यवधान पैदा नहीं होगा। ऐसी स्वतंत्र पम्प स्टोरेज परियोजना से दिन की बिजली को रात की बिजली में परिवर्तित करने में मेरे अनुमान से तीन रुपये प्रति यूनिट का खर्चा आएगा। अत: यदि हम सौर ऊर्जा के साथ स्वतंत्र पम्प स्टोरेज परियोजनाएं लगाएं तो हम छह रुपये में रात की बिजली उपलब्ध करा सकते हैं जो कि थर्मल बिजली के मूल्य के बराबर होगा। इसके अतिरिक्त जब कभी-कभी अकस्मात ग्रिड पर लोड कम-ज्यादा होता है उस समय भी पम्प स्टोरेज परियोजनाओं से बिजली को बनाकर या बंद करके ग्रिड की स्थिरता को संभाला जा सकता है। इसलिए हमें थर्मल और जल विद्युत के मोह को त्यागकर सौर एवं स्वतंत्र पम्प स्टोरेज के युगल को अपनाना चाहिये। जंगल और नदियां देश की धरोहर और प्रकृति एवं पर्यावरण की संवाहक हैं। इन्हें बचाते हुए बिजली के अन्य विकल्पों को अपनाना चाहिए।

भरत झुनझुनवाला  (साभार- देशबंधु)

समाज की बात Samaj Ki Baat KD Sharma कृष्णधर शर्मा 

सोमवार, 24 मई 2021

रेल की रात

 

गाड़ी आने के समय से बहुत पहले ही महेंद्र स्टेशन पर जा पहुँचा था। गाड़ी के पहुँचने का ठीक समय मालूम न हो, यह बात नहीं कही जा सकती। जिस छोटे शहर में वह आया हुआ था, वहाँ से जल्दी भागने के लिए वह ऐसा उत्सुक हो उठा था कि जान-बूझ कर भी अज्ञात मन से शायद किसी अबोध बालक की तरह वह समझा था कि उसके जल्दी स्टेशन पर पहुँचने से संभवत: गाड़ी भी नियत समय से पहले ही आ जाएगी।

होल्डाल में बँधे हुए बिस्तरे और चमड़े के एक पुराने सूटकेस को प्लेटफ़ार्म के एक कोने पर रखवा कर वह चिंतित तथा अस्थिर-सा अन्यमनस्क भाव से टहलते हुए टिकट-घर की खिड़की के खुलने का इंतिज़ार करने लगा।

 

महेंद्र की आयु बत्तीस-तैंतीस वर्ष के लगभग होगी। उसके क़द की ऊँचाई साढ़े पाँच फ़ीट से कम नहीं मालूम होती थी। उसके शरीर का गठन देखने से उसे दुबला तो नहीं कहा जा सकता, तथापि मोटा वह नाम का भी न था। रंग उसका गेहुँआ था, कपोल कुछ चौड़ा, भौंहें कुछ मोटी किंतु तनी हुई, आँखें छोटी पर लंबी, काली मूँछें घनी पर पतली और दोनों सिरों पर कुछ ऊपर को उठी थीं। वह खद्दर का एक लंबा कुरता और खद्दर की धोती पहने था। सर पर टोपी नहीं थी। पाँवों में घड़ियाल के चमड़े के बने हुए चप्पल थे। उसके व्यक्तित्व में आकर्षण अवश्य था, पर वह आकर्षण सब समय सब व्यक्तियों की दृष्टि को अपनी ओर नहीं खींचता था।

सूरज बहुत पहले डूब चुका था और शुक्ल पक्ष का अपूर्ण गोलाकार चंद्रमा अपने किरण-जाल से दिग्-दिगंत को स्निग्ध आलोक-छटा से विभासित करने लगा था। स्टेशन पर अधिक भीड़ न थी। प्लेटफ़ार्म पर टहलते-टहलते पूर्व की ओर क़दम निकल जाने पर ऐसा मालूम होने लगता था कि चाँदनी दीर्घ-विस्तृत समतल भूमि पर अलस क्लांति की तरह पड़ी हुई है। झिल्ली-झनकार का एकांतिक मर्मर स्वर इस अलसता की वेदना को निर्मम भाव से जगा रहा था, जिससे महेंद्र के हृदय की सुप्त व्याकुलता तिलमिला उठती थी।

 

सिगनल डाउन हो गया था। टिकट-घर खुल गया था। थर्ड क्लास का टिकट ख़रीद कर महेंद्र गाड़ी का इंतिज़ार करने लगा। थोड़ी देर में दूर ही से सर्चलाइट के प्रखर प्रकाश से तिमिर-विदारण करती हुई गाड़ी दिखाई दी और झक-झक करती हुई स्टेशन पर आ खड़ी हुई।

सामने के कंपार्टमेंट में केवल दो व्यक्ति बैठे थे और वे भी उतरने की तैयारी कर रहे थे। महेंद्र एक हाथ में बिस्तर की गठरी और दूसरे हाथ से सूटकेस पकड़ कर उसी में जा घुसा। जो दो व्यक्ति कंपार्टमेंट में थे, उनके उतरते ही एक चश्माधारी सज्जन ने दो महिलाओं के साथ भीतर प्रवेश किया। कुली ने आ कर नवागंतुक महाशय का सामान भीतर रख दिया और मजूरी के संबंध में काफ़ी हुज्जत करने के बाद पैसे ले कर चला गया। चश्माधारी सज्जन महिलाओं के साथ महेंद्र के सामने वाले बेंच पर बड़े आराम से बैठ गए। मालूम होता था कि वह बड़ी हड़बड़ी के साथ गाड़ी के आने के कुछ ही समय पहले स्टेशन पहुँचे थे और घबराहट में थे, कि महिलाओं को साथ ले कर यदि किसी कंपार्टमेंट में जगह न मिली, तो क्या हाल होगा। वह अभी तक हाँफ रहे थे, जिससे उनकी अब तक की परेशानी स्पष्ट व्यक्त होती थी। अब जब आराम से बैठने को ख़ाली जगह मिल गई, तो एक लंबी साँस ले कर चश्मा उतार कर रूमाल से मुँह का पसीना पोंछने लगे। पसीना पोंछते-पोंछते महेंद्र की ओर देख कर उन्होंने प्रश्न किया, ‘शिकोहाबाद कै बजे गाड़ी पहुँचेगी, आप बता सकते हैं?’

 

महेंद्र ने उत्तर दिया, ‘जहाँ तक मेरा ख़याल है, बारह बजे के क़रीब पहुँचेगी।’

महेंद्र कनखियों से महिलाओं की ओर देख रहा था। महिलाएँ उसके एकदम सामने बैठी थीं और यदि दृष्टि सीधी करके स्वाभाविक रूप से उन्हें देखता रहता, तो भी शायद न तो चश्माधारी सज्जन को और न महिलाओं को कोई आपत्ति होती, पर उसे अपनी स्वाभाविक संकोचशीलता के कारण उनकी ओर स्थिर दृष्टि से देखने का साहस नहीं होता था। दोनों महिलाएँ बेपर्दा बैठी थीं। उनमें एक की अवस्था प्राय: पैंतीस वर्ष की होगी, वह एक सफ़ेद चादर ओढ़े खड़ी थी, दूसरी बाईस-तेईस वर्ष की जान पड़ती थी, वह एक गुलाबी रंग की सुंदर, सुरुचिपूर्ण साड़ी पहने थी। दोनों यथेष्ट सभ्य और सुशील जान पड़ती थीं। ज्येष्ठा के देखने से ऐसा अनुमान लगाया जा सकता था कि किसी समय वह सुंदर रही होगी, पर अब अस्वस्थता के कारण उसका मुखमंडल बिलकुल निस्तेज जान पड़ता था। कनिष्ठा यद्यपि सौंदर्य-कला की दृष्टि से सुंदरी नहीं थी, तथापि उसके मुख की व्यंजना में एक ऐसी सरल मधुरिमा वर्तमान थी, जो बरबस आँखों को आकर्षित कर लेती थी।

 

आज कई कारणों से महेंद्र का जी दिन भर अच्छा नहीं रहा। गाड़ी में बैठने तक वह चिंतित, अन्यमनस्क तथा उदास था। पर गाड़ी में बैठते ही शिष्ट, सुशील तथा सुंदरी महिलाओं के साहचर्य से उसके खिन्न मन में एक सुखद सरलता छा गई। यद्यपि वह संकोच के कारण कुछ कम घबराया हुआ न था, तथापि चश्माधारी सज्जन की भोली आकृति तथा सरल भाव-भंगिमाओं से और महिलाओं की शालीनता से उसे इस बात पर धीरे-धीरे विश्वास होने लगा था कि उनके बीच किसी प्रकार का संकोच अनावश्यक ही नहीं बल्कि अशोभन भी है।

चश्माधारी सज्जन ने चश्मा उतार कर एक रूमाल से उसे पोंछते हुए पूछा, ‘आप क्या शिकोहाबाद जा रहे हैं?’

 

‘जी नहीं, मैं दिल्ली जा रहा हूँ। क्या आप शिकोहाबाद में ही रहते हैं?’

‘जी नहीं, मुझे टुँडला जाना है। मैं वहाँ कोर्ट में प्रैक्टिस करता हूँ। इधर कुछ दिनों के लिए घर आया हुआ था। अब अपनी ‘वाइफ़’ को और ‘सिस्टर’ को ले कर वापस जा रहा हूँ। ‘सिस्टर’ की तबीअत ठीक नहीं रहती, इसलिए उसे हवा-बदली के लिए ले जा रहा हूँ।’

 

एक साधारण-से प्रश्न के उत्तर में इतनी बातों से परिचित होने पर महेंद्र को नवपरिचित सज्जन की बे-तकल्लुफ़ी पर आश्चर्य हुआ और वह मन ही मन मुस्कराने लगा। उसने अनुमान लगाया कि ज्येष्ठा महिला ‘सिस्टर’ होगी और कनिष्ठा ‘वाइफ़’।

थोड़ी देर में गाड़ी चलने लगी। कोई दूसरा यात्री उस डिब्बे में न आया।

 

चश्माधारी महाशय गाड़ी चलने के कुछ देर बाद ऊँघने लगे। वे रह न सके और बँधे हुए बिस्तर को तकिया बना कर एक दूसरे बेंच पर लेट गए और लेटते ही ख़र्राटे लेने लगे। न जाने क्यों, महेंद्र के मन में यह विश्वास जम गया कि इन नवपरिचित महाशय का जीवन बड़ा सुखी है। उनकी बे-तकल्लुफ़ी तथा उनके मुख का आत्म-संतोषपूर्ण भाव देख कर उनके मन में यह विश्वास जमने लगा था और जब उसने उन्हें निश्चिंत सोते हुए तथा ख़र्राटे भरते देखा, तो उसकी यह धारणा दृढ़ हो गई।

ज्येष्ठा महिला ने भी थोड़ी देर में ऊँघना शुरू कर दिया। वह ऊँघती जाती थी और बीच-बीच में जब ज़बर्दस्त हिचकोला खाती थी तो जाग पड़ती थी। केवल कनिष्ठा महिला पूर्णत: सजग थी। वह कभी खिड़की के बाहर झाँक कर चाँदनी के उज्ज्वल आलोक में शायद ‘पल-पल परिवर्तित’ प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेती थी, कभी ऊँघने वाली महिला की ओर देखती थी, कभी ख़र्राटे भरने वाले महाशय, शायद अपने पति को एक बार सरसरी निगाह से देख लेती थी और कभी महेंद्र को स्निग्ध किंतु विस्मय की उत्सुकता से पूर्ण आँखों से देखने लगती थी। उन आँखों की स्थिर दृष्टि जब महेंद्र पर आ कर पड़ती थी तो, उसे ऐसा मालूम होने लगता कि मोहाविष्ट हुआ जा रहा है और उसकी सारी आत्मा, यहाँ तक कि सारा शरीर भी अपना रूप बदल रहा है और यह किसी अव्यक्त तथा अतींद्रिय मायावी स्पर्श से कुछ का कुछ हुआ जा रहा है। वह उस स्थिर दृष्टि का तेज़ सहन न कर सकने के कारण आँखें फिरा लेता था।

 

गाड़ी टटर-टट्ट-टटर-टट्ट शब्द से चली जा रही थी। जाग्रत महिला की गुलाबी साड़ी का आँचल हवा के झोंके से नीचे खिसक कर उसके लहराते हुए घनकुंचित काले केशों की बहार दिखा रहा था। गुलाबी साड़ी भी हवा के ज़ोर से फ़र-फ़र फ़हरा रही थी। महेंद्र पूर्ण जाग्रत अवस्था में स्वप्न देखने लगा। उसे यह भी भ्रम होने लगा कि यह महिला, जो इसके पहले उसके लिए एकदम अज्ञात थी और निश्चय ही सदा अज्ञात रहेगी, न जाने किस चिदानंदमय लोक से अकस्मात आविर्भूत हो कर उसके पास आ बैठी है और गुलाबी रंग की पताका फ़हरा कर विश्व-विजय को निकली है और वह उसका सारथी बन कर उस अनंतगामी रेल रूपी रथ पर चला जा रहा है। सारा विश्व, समस्त मानवी तथा मानसी सृष्टि उसके लिए उस कंपार्टमेंट के भीतर समा गई थी, जिसमें ऊँघनेवाली महिला तथा सोए हुए सज्जन का कोई अस्तित्व नहीं था, और उसके बाहर क्षण-क्षण में परिवर्तित होने वाले अस्थिर माया जगत का चिर चंचल रूप एकदम असत्य सत्ताहीन-सा लगता था।

महेंद्र सोचने लगा कि उसने जीवन में कितनी ही स्त्रियों को विभिन्न रूपों तथा विचित्र परिस्थितियों में देखा है, पर आज का यह बिलकुल साधारण-सा अनुभव उसे क्यों ऐसा अपूर्व तथा अनुपम लग रहा है। वह सोच ही रहा था कि फिर उस विश्व-विजयिनी ने अपनी सुंदर विस्मित आँखों की रहस्यमयी उत्सुकता से भरी स्थिर दृष्टि से उसकी ओर देखा। वह मन ही मन संबोधित करते हुए कहने लगा, चिर अज्ञाता, चिर अपरिचिता देवी! तुम मुझसे क्या चाहती हो। तुम्हारी इस मर्मभेदिनी दृष्टि का क्या अर्थ है? दैवयोग से महाकाल के इस नगण्यतम क्षण में, जिसकी सत्ता महासागर में एक क्षुद्रतम बुदबुदे के बराबर भी नहीं है, हम दोनों का आकस्मिक मिलन घटित हुआ है, और महासागर में बुदबुदे की तरह यह क्षण सदा के लिए विलीन हो जाएगा। तथापि इतने ही अर्से में क्या तुम हम दोनों के जन्मांतर के संबंध से परिचित हो गई अथवा यह सब कुछ नहीं है? तुम्हारी आँखों की उत्सुकता का कोई मूल्य नहीं है, मेरी विह्वल भावुकता का कोई महत्व नहीं है! महत्वपूर्ण जो कुछ है, वह है तुम्हारे पास लेटे हुए व्यक्ति का ख़र्राटे भरना।

 

शिकोहाबाद पहुँचने पर चश्माधारी सज्जन की नींद न टूटी और ज्येष्ठा महिला ऊँघती रही। पर महेंद्र की विश्व-विजयिनी की आँखों में एक क्षण के लिए भी निद्रा-रसावेश का लेश नहीं दिखाई दिया। वह बीच-बीच में अपनी मर्म-भेदिनी दृष्टि की प्रखर उत्सुकता से उसके हृदय को अकारण निर्मम रूप से बिद्ध करती चली जाती थी। फलस्वरूप महेंद्र की गुलाबी मोहकता भी शिकोहाबाद पहुँचने तक अखंड बनी रही।

शिकोहाबाद पहुँचने पर विश्व-विजयिनी ने चश्माधारी सज्जन के किंचित स्थूल शरीर को हाथ से हिलाते हुए जगाया। ऊँघती हुई महिला भी सँभल कर बैठ गई। कुलियों से सामान उतरवा कर चारों व्यक्ति उतर पड़े। दिल्ली वाली गाड़ी जिस प्लेटफ़ार्म पर लगने वाली थी, वहाँ को जाने के लिए पुल पार करना पड़ा। पुल पार करके वे लोग जिस प्लेटफ़ार्म पर आए, वहाँ कहीं एक भी बत्ती जली हुई नहीं थी। पर चूँकि सर्वत्र निर्मल चाँदनी छिटक रही थी, इसलिए बत्ती की कोई आवश्यकता न जान पड़ी। गाड़ी के आने में अभी डेढ़ घंटे की देर थी। चश्माधारी महाशय एक बेंच पर बिस्तर फैला कर लेट गए। दोनों महिलाएँ भी नीचे रखे हुए सामान के ऊपर बैठ गईं।

 

चश्माधारी सज्जन ने महेंद्र से कहा, ‘आप भी किसी बेंच पर बिस्तर बिछा कर लेट जाइए।’

पर कोई बेंच ख़ाली नहीं थी और न महेंद्र सोने के लिए ही उत्सुक था। आज की रेलवे यात्रा की चंद्रोज्ज्वल रात्रि उसे चिरजाग्रत तथा चिरजीवित स्वप्न-लोक में विचरण का अवसर दे रही थी। वह प्लेटफ़ार्म पर टहलते हुए अपने अंतर्मन में नवोद्घाटित जीवन-वैचित्र्य की चहल-पहल देख कर विस्मित हो रहा था। उसे ऐसा अनुभव हो रहा था कि वह जीवन की मधुरिमा से आज प्रथम बार परिचित हो रहा था। रेलवे लाइन के उस पार दिगंत विस्तृत ज्योत्स्ना-राशि अपने आवेश में स्वयं पुलकित हो रही थी और सामने काफ़ी दूर पर दो रक्तरंजित गोलाकार प्रकाश-चिह्न आकाश-दीप की तरह मानो आनंदोज्ज्वल रंगीन जीवन का मार्ग उसके लिए इंगित कर रहे थे। रेलगाड़ी में हो कर वह अनेक बार आया था और गया था और कितनी ही बार उसे रात के समय स्टेशनों पर गाड़ी के इंतिज़ार में ठहरना पड़ा था, पर आज की ऐंद्रजालिक उल्लासपूर्ण अनुभूति उसके लिए एकदम नई थी। इस बार इंद्रजाल के उद्घाटन का श्रेय जिसको था, वह मायाविनी इस समय टीन की छत के नीचे की छाया में बैठी हुई थी और अंधकार में उसकी आँखों के जादू का चलना बंद हो गया था। पर वहाँ पर मात्र उसका अस्तित्व ही महेंद्र की आत्मा में मायालोक की मोहकता का सृजन करने के लिए पर्याप्त था।

 

वह टहलते-टहलते न मालूम किन निरुद्देश्य स्वप्नों की माया के फेर में पड़ा हुआ था कि अचानक चश्माधारी महाशय ने बेंच पर से पुकारते हुए कहा, ‘अरे जनाब, कब तक टहलिएगा। अगर लेटना नहीं चाहते, तो यहाँ पर बैठ तो जाइए। नींद तो अब आवेगी नहीं। इसलिए गाड़ी के आने तक गप-शप ही रहे।’ महाशयजी पहले ही काफ़ी सो चुके थे इसलिए अब नींद नहीं आ रही थी। महेंद्र मुस्कराता हुआ उनके पास अपने सूटकेस के ऊपर बैठ गया।

महाशयजी ने कहा, ‘आप दिल्ली में कहीं मुलाज़िम हैं?’

 

‘जी नहीं।’

‘तब आप क्या करते हैं, आप खद्दर पहने हैं, क्या आप राजनीतिज्ञ हैं?’

 

‘पहले था, अब नहीं के बराबर हूँ।’

‘वह कैसे?’

 

इस प्रश्न के उत्तर में महेंद्र ने परम क्लांति का भाव दिखाते हुए कहा, ‘अरे साहब, सुन के क्या कीजिएगा। व्यर्थ में आपके संस्कारों को आघात पहुँचेगा। इस चर्चा को हटाइए और किसी अच्छे विषय की चर्चा चलाइए।’

स्वभावत: चश्माधारी का कौतूहल बढ़ा। उन्होंने आग्रह के साथ कहा, ‘फिर भी ज़रा सुनें तो सही। आख़िर कौन-सी ऐसी बात हो गई।’

 

महेंद्र की सुप्त स्मृतियाँ तिलमिला उठीं थीं। कनखियों से उसने देखा, प्राय: अंधकार में बैठी हुई मायाविनी महिला का ध्यान उसी की ओर था। पल में उसके मानसिक चक्षुओं के आगे उसके सारे विगत जीवन के व्यर्थता के दु:खद संस्मरणों की झाँकी चित्रपट पर क्रम से परिवर्तित होने वाले चित्रों की तरह भासमान होने लगी। भाव के आवेश में आ कर उसने कहा, ‘अच्छा तो सुनिए। ग्यारह वर्ष से ले कर तीस वर्ष तक की अवस्था तक गाँधी के सिद्धांतों के पीछे पागल हो कर, भूखों रह कर, पग-पग ठोकरें खा कर, समाज तथा परिवार की फटकारें सह कर, जीवन के सब सुखों को अपने ध्येय के लिए तिलांजलि दे कर, राष्ट्रीय आदर्श को ब्रह्मतत्व से भी अधिक महत्व दे कर सच्ची लगन से अपनी सारी आत्मा को निमज्जित करके देश का काम किया। तीन बार काफ़ी अवधि के लिए जेल में सड़ता रहा, बार-बार पुलिस के डंडे सर पर पड़ते रहे। ज़मीन-जायदाद कुर्क हो गई, माता-पिता अपनी कपूत संतान के कारण तबाह हो कर मानसिक और शारीरिक पीड़ा की पराकाष्ठा भोग कर चल बसे, पत्नी तड़प-तड़प कर अपने भाग्य को कोसती हुई मर गई। फिर भी मैं राष्ट्र से कल्याण के परम ध्येय को स्त्री, परिवार, आत्मा और परमात्मा से बहुत ऊँचा मानता हुआ सच्ची लगन से काम करता रहा। जब अंतिम बार जेलख़ाने में बंदी मियाद पूरी करने के बाद थका-माँदा मन तथा शरीर से क्लिष्ट और क्लांत हो कर मैं बाहर आया, तब एक-एक करके उन स्नेही जनों की स्मृतियाँ मेरे मन में उदित हो-हो कर व्यक्त होने लगीं, जिनकी मैं सदा अवज्ञा करता आया था। अपनी पत्नी से मैंने जीवन में शायद दो दिन भी घनिष्ठता से बातें न की होंगी। जब मैं बाहर रहता था, तो उसके पत्र बराबर मेरे पास आते रहते थे और मैं सरसरी दृष्टि से पढ़ कर अवज्ञा से फाड़ कर फेंक देता था। एक या दो बार से अधिक मैंने उसके पत्रों का उत्तर नहीं दिया और दो बार जो उत्तर दिया था, वह भी चार पंक्तियों में बिल्कुल रूखे-सूखे ढंग से। अब जब मैं अपने को सारे संसार में अकेला, स्नेह तथा संवेदना से वंचित, असहाय तथा निरुपाय अनुभव करने लगा तो उसकी भोली-भाली, सकरुण, स्नेह की वेदना से भरी सहज सलोनी मूर्ति प्रतिपल मेरी आँखों के आगे भासित होने लगी। उसके पत्रों में सरल शब्दों में वर्णित कातर व्याकुलता के हाहाकार की पुकार मानो मेरी स्मृति के अतुल गह्वर में दीर्घ सुप्ति की घोर जड़ता के बाद अकस्मात जागरित हो कर मेरे हृदय पर जलते हुए अंगारों के गोलों से आघात करने लगी। अपने जीवन में कभी किसी बात पर नहीं रोया था। माता-पिता तथा पत्नी, किसी की मृत्यु पर आँसू की एक बूँद मेरी आँखों से न निकली थी। अब रह-रह कर उन लोगों की याद में बिलख-बिलख कर मैं बार-बार रो पड़ता। मेरी स्नेहशील पतिपरायण पत्नी की करुण पुण्यछवि उज्ज्वल नक्षत्र की तरह मेरी आँखों के आगे स्पष्ट भासमान होने लगी। रह-रह कर मेरा जी विकल हो उठता था और मुझे ऐसा प्रतीत होने लगता, जैसे मेरे हृदय में किसी के निष्कलंक सुकुमार प्राणों की पैशाचिक हत्या का अपराध पाषाण-भार की तरह पड़ा हो। बहुत दिनों तक इस नृशंस अपराध की भयंकर अनुभूति का भूत मेरी आत्मा को अत्यंत निष्ठुरता से दबाता रहा। अब भी यह भौतिक आतंक कभी-कभी मेरे मन में जागरित हो उठता है। फिर भी अब मैंने अपने मन को बहुत समझा लिया है और जीवन को एक नई दृष्टि से नए रूप में देखने लगा हूँ और साधारण से साधारण घटना भी कभी-कभी मेरे मन में एक अलौकिक आनंद का आश्चर्य उत्पन्न करने लगती है। किसी स्त्री को देखते ही अब मेरे हृदय में एक श्रद्धा-पूर्ण उत्सुकता का भाव जाग पड़ता है। ऐसा मालूम होने लगता है, जैसे अपने जीवन में पहले स्त्री को देखा भी न हो, अब पहली बार इस आनंददायिनी रहस्यमयी जाति के अस्तित्व का अनुभव मुझे हुआ हो।’

महेंद्र का लंबा लेक्चर समाप्त होते ही चश्माधारी सज्जन ‘हा हा’ करके ठठा कर हँसते हुए बोले, ‘आप भी बड़े मज़े के आदमी हैं। ख़ूब!’ यह कह कर वह बेंच पर आराम से लेट गए और उन्होंने आँखें बंद कर लीं। थोड़ी देर बाद वह ज़ोरों से ख़र्राटे लेने लगे।

 

एक लंबी साँस लेते हुए महेंद्र ने प्राय: अंधकार में अस्पष्ट झलकती हुई गुलाबी साड़ी की ओर देखा। दो आँखों की मार्मिक दृष्टि से तीव्र मोहकता उस अर्द्ध अंधकार में भी विस्मित वेदना की उत्सुक उज्ज्वल रेखाओं को विकीरित कर रही थी। महेंद्र पुलक-विह्वल हो कर मंत्र-मुग्ध-सा बैठा रहा।

घंटी बजी, दिल्ली को जाने वाली गाड़ी के आने की सूचना देते हुए सिग्नल डाउन हुआ। सामने रक्त आकाश-द्वीप के बदले हरे रंग का प्रकाश जल उठा। यह हरित आलोक महेंद्र के मानसपट में साड़ी के गुलाबी रंग के साथ मिल कर एक स्निग्ध-शुचि सौंदर्य-लोक का सृजन करने लगा।

 

थोड़ी देर में दूर ही से गाड़ी का सर्चलाइट दिखाई दिया। चश्माधारी महाशय महेंद्र के जगाने पर फड़फड़ाते हुए उठे। कुलियों ने सामान सँभाल लिया। भक-भक करती हुई गाड़ी प्लेटफ़ार्म पर आ लगी। बड़ी भीड़ थी। चश्माधारी सज्जन को महिलाओं के साथ कुली लोग इंजन के उल्टी ओर बहुत दूर तक ले गए। कहीं स्थान न पा कर अंत में एक डिब्बे में ज़बर्दस्ती घुस गए। महेंद्र भी उन लोगों के साथ-साथ जा रहा था पर जिस डिब्बे में वे लोग घुसे, उस डिब्बे में स्थान का निपट अभाव देख कर वह विवश हो कर एक दूसरे डिब्बे में चला गया। वहाँ भी काफ़ी भीड़ थी। किसी प्रकार उसने अपने बैठने के लिए थोड़ा-सा स्थान बनाया।

गार्ड ने सीटी दी। गाड़ी चल पड़ी। महेंद्र के मस्तिष्क में नाना अस्पष्ट भावनाएँ चक्कर काटने लगीं। दो दिन से उसे नींद नहीं आई थी। आज भी वह अभी तक सो नहीं पाया। इसलिए सोचते-सोचते वह ऊँघने लगा। ऊँघते हुए उसने देखा कि गुलाबी रंग की साड़ी द्रौपदी के चीर की तरह फैलती हुई अकारण सारे आकाश में छा गई है। सहसा दो स्थानों पर वह गगनव्यापी साड़ी फटी और उन दो छिद्रों से हो कर दो वेदनाशील, तीक्ष्ण, उज्ज्वल आँखें तीर की तरह प्रखर वेग से उसकी ओर धावित हो कर एक रूप में मिल कर एक बड़ी आँख के आकार में परिणत हो गईं। वह बड़ी आँखें उसके शरीर को छेद कर उसके हृत्पिंड को छू कर फिर ऊपर आकाश की ओर तीर की तरह छूटीं और आकाश में फैली हुई गुलाबी साड़ी में जा लगीं और फट कर फिर से दो सुंदर, किंतु करुणा-विकल आँखों के आकार में विभक्त हो गईं।

 

टुँडला स्टेशन पर गाड़ी ठहरने पर महेंद्र पूर्णत: सचेत हो कर बैठ गया। चश्माधारी महाशय दोनों महिलाओं को साथ ले कर कंपार्टमेंट से बाहर उतरे और सामान को कुलियों के हवाले करके उनके साथ बाहर फाटक की ओर चले। महेंद्र ने अपने कंपार्टमेंट से अपनी विश्वविजयिनी को देखा। वह इस उत्सुकता में था कि एक बार अंतिम समय के लिए दोनों की आँखें चार हो जावें, पर न हुईं और गुलाबी साड़ी से आवृत सजीव प्रतिमा व्यस्त विह्वल-सी आगे को निकल गई।

टुँडला से गाड़ी छूटने पर महेंद्र के कानों में चश्माधारी सज्जन के ठठा कर हँसने का शब्द गूँजने लगा। उसके अदृष्ट का चिर व्यंग्य पुकार मानो बार-बार कहता था— हा! हा! आप भी बड़े मज़े के आदमी हैं : ख़ूब!

 

इलाचंद्र जोशी

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