नमस्कार,
आज की इस भागदौड़ भरी जिंदगी में हम-आप बहुत कुछ पीछे छोड़कर आगे बढ़ते जाते हैं. हम अपने समाज में हो रहे सामजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक बदलावों से या तो अनजान रहते हैं या जानबूझकर अनजान बनने की कोशिश करते हैं. हमारी यह प्रवृत्ति हमारे परिवार, समाज और देश के लिए घातक साबित हो सकती है. अपने इस चिट्ठे (Blog) "समाज की बात - Samaj Ki Baat" में इन्हीं मुद्दों से सम्बंधित विषयों का संकलन करने का प्रयास मैंने किया है. आपके सुझावों का हार्दिक स्वागत रहेगा...कृष्णधर शर्मा - 9479265757

बुधवार, 18 जून 2025

रंगमंच के रूप

 

 भारतीय समाज में पारंपरिकता का विशेष स्‍थान है । परंपरा एक सहज प्रवाह है । निश्‍चय ही, पारंपरिक कलाएं समाज की जिजीविषा, संकल्‍पना, भावना, संवेदना तथा ऐतिहासिकता को अभिव्‍यक्‍त करती हैं । नाटक अपने आप में संपूर्ण विधा है, जिसमें अभिनय, संवाद, कविता, संगीत इत्‍यादि एक साथ उपस्थित रहते हैं । परंपरा में नाटक्‍ एक कला की तरह है ।

लोकजीवन में गेयता एक प्रमुख तत्‍व है । सभी पारंपरिक भारतीय नाट्यशैलियों में गायन की प्रमुखता है । यह जातीय संवेदना का प्रकटीकरण है ।

पारंपरिक रूप से लोक की भाषा में सृजनात्‍मकता सूत्रबद्ध रूप में या शास्‍त्रीय तरीके से नहीं, अपितु बिखरे, छितराये, दैनिक जीवन की आवश्‍यकताओं के अनुरूप होती है । जीवन के सघन अनुभवों से जो सहज लय उत्‍पन्‍न होती है, वही अंतत: लोकनाटक बन जाती है । उसमें दु:ख, सुख, हताशा, घृणा, प्रेम आदि मानवीय प्रसंग आते हैं ।

भारत के विभिन्‍न क्षेत्रों में तीज-त्‍यौहार, मेले, समारोह, अनुष्‍ठान, पूजा-अर्चना आदि होते रहते हैं, उन अवसरों पर ये प्रस्‍तुतियां भी होती हैं । इसलिए इनमें जनता का सामाजिक दृष्टिकोण प्रकट होता है । इस सामाजिकता में गहरी वैयक्तिकता भी होती है ।

पारंपरिक नाट्य में लोकरुचि के अलावा क्‍लासिक तत्‍त्‍व भी उपस्थित होते हैं, लेकिन क्‍लासिक अंदाज़ अने क्षेत्रीय, स्‍थानीय एवं लोरूप में होते हैं । संस्‍कृत रंगमंच के निष्क्रिय होने पर उससे जुड़े लोग प्रदेशों में जांकर वहां के रंगकर्म से जुड़े होंगे । इस प्रकार लेन-देन की प्रक्रिया अनेक रूपों में संभव हुई । वस्‍तुत: इसके कई स्‍तर थे- लिखित, मौखिक, शास्‍त्रीय-तात्‍कालिक, राष्‍ट्रीय- स्‍थानीय ।

विभिन्‍न पारंपरिक नाट्यों में प्रवेश-नृत्‍य, कथन नृत्‍य और दृश्‍य नृत्‍य की प्रस्‍तुति किसी न किसी रूप में होती है । दृश्‍य नृत्‍य का श्रेष्‍ठ उदाहरण बिदापत नाच नामक नाट्य शैली में भी मिलता है । इसकी महत्‍ता किसी प्रकार के कलात्‍मक सौंदर्य में नहीं, अपितु नाट्य में है तथा नृत्‍य के दृश्‍य पक्ष की स्‍थापना करने में है । कथन नृत्‍य पारंपरिक नाट्य का आधार है । इसका अच्‍छा उपयोग गुजरात की भवाई में देखने को मिलता है । इसमें पदक्षेप की क्षिप्र अथवा मंथर गति से कथन की पुष्टि होती है । प्रवेश नृत्‍य का उदाहरण है- कश्‍मीर का भांडजश्‍न नृत्‍य । प्रत्‍येक पात्र की गति और चलने की भंगिमा उसके चरित्र को व्‍यक्‍त करती है । कुटियाट्टम तथा अंकिआनाट में प्रेवश नृत्‍य जटिल तथा कलात्‍मक होते हैं । दोनों ही लोकनाट्य शै‍लियों में गति व भंगिमा से स्‍वभावगत वैशिष्‍ट्य को दर्शक तक पहुँचाते हैं ।

पारंपरिक नाट्य में परंपरागत निर्देशों तथा तुरंत उत्‍पन्‍न मति को मिश्रण होता है । परंपरागत निर्देशों का पालन गंभीर प्रसंगों पर होता है, लेकिन समसामयिक प्रसंगों में अभिनेता या अभिनेत्री अपनी आवश्‍यकता से भी संवाद की सृष्टि कर लेता है । भिखारी ठाकुर के ‘बिदेसिया’ में ये दोनों स्‍तर पर कार्य करते हैं ।

पारंपरिक नाट्यों में कुछ विशिष्‍ट प्रदर्शन रुढियां होती हैं । ये रंगमंच के रूप, आकार तथा अन्‍य परिस्थितियों से जन्‍म लेती हैं । पात्रों के प्रवेश तथा प्रस्‍थान का कोई औपचारिक रूप नहीं होता । नाटकीय स्थिति के अनुसार बिना किसी भूमिका के पात्र रंगमंच पर आकर अपनी प्रस्‍तुति करते हैं । किसी प्रसंग और खास दृश्‍य के पात्रों के एक साथ रंगमंच को छोड़कर चले जाने अथवा पीछे हटकर बैठ जाने से नाटक में दृश्‍यांतर बता दिया जाता है ।

पारंपरिक नाट्यों में सुसंबद्ध दृश्‍यों के बदले नाटकीय व्‍यापार की पूर्ण इकाइयां होती हैं । इसका गठन बहुत शिथिल होता है, इसलिए नए-नए प्रसंग जोड़ते हुए कथा-विस्‍तार के लिए काफी संभावना रहती है । अभिनेताओं तथा दर्शकों के बीच संप्रेषण सीधा व सरल होता है ।

नाट्य परंपरा पर औद्योगिक सभ्‍यता, औद्यो‍गीकरण तथा नगरीकरण का असर भी पड़ा है । इसकी सामाजिक-सांस्‍कृतिक पड़ताल करनी चाहिए । कानपुर शहर नौटंकी का प्रमुख केन्‍द्र बन गया था । नर्तकों, अभिनेताओं, गायकों इत्‍यादि ने इस स्थिति का उपयोग कर स्‍थानीय रूप को प्रमुखता से उभारा ।

पारंपरिक नाट्य की विशिष्‍टता उसकी सहजता है । आखिर क्‍या बात है कि शताब्दियों से पारंपरिक नाट्य जीवित रहने तथा सादगी बनाए रखने में समर्थ सिद्ध हुए हैं ? सच तो यह है कि दर्शक जितना शीघ्र, सीधा, वास्‍तविक तथा लयपूर्ण संबंध पारंपरिक नाट्य से स्‍थापित कर पाता है, उतना अन्‍य कला रूपों से नहीं । दर्शकों की ताली, वाह-वाही उनके संबंध को दर्शाती है ।

वस्‍तुत: पारंपरिक नाट्यशैलियों का विकास ऐसी स्‍थानीय या क्षेत्रीय विशिष्‍टता के आधार पर हुआ, जो सामाजिक, आर्थिक स्‍तरबद्धता की सीमाओं से बँधी हुई नहीं थीं । पारंपरिक कलाओं ने शास्‍त्रीय कलाओं को प्रभावित किया, साथ ही, शास्‍त्रीय कलाओं ने पारंपरिक कलाओं को प्रभावित किया । यह एक सांस्‍कृतिक अन्‍तर्यात्रा है ।

पारंपरिक लोकनाट्यों में स्थितियों में प्रभावोत्‍पादकता उत्‍पन्‍न करने के लिए पात्र मंच पर अपनी जगह बदलते रहते हैं । इससे एकरसता भी दूर होती है । अभिनय के दौरान अभिनेता व अभिनेत्री प्राय: उच्‍च स्‍वर में संवाद करते हैं । शायद इसकी वजह दर्शकों तक अपनी आवाज़ सुविधाजनक तरीके से पहुँचानी है । अभिनेता अपने माध्‍यम से भी कुछ न कुछ जोड़ते चलते हैं । जो आशु शैली में जोड़ा जाता है, वह दर्शकों को भाव-विभोर कर देता है, साथ ही, दर्शकों से सीधा संबंध भी बनाने में सक्षम होता है । बीच-बीच में विदूषक भी यही कार्य करते हैं । वे हल्‍के-फुल्‍के ढंग से बड़ी बात कह जाते हैं । इसी बहाने वे व्‍यवस्‍था, समाज, सत्‍ता, प‍रिस्थितियों पर गहरी टिप्‍पणी करते हैं । विदूषक को विभिन्‍न पारंपरिक नाट्यों में अलग-अलग नाम से पुकारते हैं । संवाद की शैली कुछ इस तरह होती है कि राजा ने कोई बात कही, जो जनता के हित में नही है तो विदूषक अचानक उपस्थित होकर जनता का पक्ष ले लेगा और ऐसी बात कहेगा, जिससे हँसी तो छूटे ही, राजा के जन-विरोधी होने की कलई भी खुले ।

विविध पारंपरिक नाट्य शैलियां
भांड-पाथर, कश्‍मीर का पारंपरिक नाट्य है । यह नृत्‍य, संगीत और नाट्यकला का अनूठा संगम है । व्‍यंगय मज़ाक और नकल उतारने हेतु इसमें हँसने और हँसाने को प्राथमिकता दी गयी है । संगीत के लिए सुरनाई, नगाड़ा और ढोल इत्‍यादि का प्रयोग किया जाता है । मूलत: भांड कृषक वर्ग के हैं, इसलिए इस नाट्यकला पर कृषि-संवेदना का गहरा प्रभाव है ।

स्‍वांग, मूलत: स्‍वांग में पहले संगीत का विधान रहता था, परन्‍तु बाद में गद्य का भी समावेश हुआ । इसमें भावों की कोमलता, रससिद्धि के साथ-साथ चरित्र का विकास भी होता है । स्‍वांग को दो शैलियां (रोहतक तथा हाथरस) उल्‍लेखनीय हैं । रोहतक शैली में हरियाणवी (बांगरू) भाषा तथा हाथरसी शैली में ब्रजभाषा की प्रधानता है ।

नौटंकी प्राय: उत्‍तर प्रदेश से सम्‍बंधित है । इसकी कानपुर, लखनऊ तथा हाथरस शैलियां प्रसिद्ध हैं । इसमें प्राय: दोहा, चौबोला, छप्‍पय, बहर-ए-तबील छंदों का प्रयोग किया जाता है । पहले नौटंकी में पुरुष ही स्‍त्री पात्रों का अभिनय करते थे, अब स्त्रियां भी काफी मात्रा में इसमें भाग लेने लगी हैं । कानपुर की गुलाब बाई ने इसमें जान डाल दी । उन्‍होंने नौटंकी के क्षेत्र में नये कीर्तिमान स्‍थापित किए ।

रासलीला में कृष्‍ण की लीलाओं का अभिनय होता है । ऐसे मान्‍यता है कि रासलीला सम्‍बंधी नाटक सर्वप्रथम नंददास द्वारा रचित हुए इसमें गद्य-संवाद, गेय पद और लीला दृश्‍य का उचित योग है । इसमें तत्‍सम के बदले तद्भव शब्‍दों का अधिक प्रयोग होता है ।

भवाई, गुजरात और राजस्‍थान की पारंपरिक नाट्यशैली है । इसका विशेष स्‍थान कच्‍छ-काठियावाड़ माना जाता है । इसमें भुंगल, तबला, ढोलक, बांसुरी, पखावज, रबाब, सारंगी, मंजीरा इत्‍यादि वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है । भवाई में भक्ति और रूमान का उद्भुत मेल देखने को मिलता है ।

जात्रा, देवपूजा के निमित्‍त आयोजित मेलों, अनुष्‍ठानों आदि से जुड़े नाट्यगीतों को ‘जात्रा’ कहा जाता है । यह मूल रूप से बंगाल में पला-बढ़ा है । वस्‍तुत: श्री चैतन्‍य के प्रभाव से कृष्‍ण-जात्रा बहुत लो‍कप्रिय हो गयी थी । बाद में इसमें लौकिक प्रेम प्रसंग भी जोड़े गए । इसका प्रारंभिक रूप संगीतपरक रहा है । इसमसेंस कहीं-कहीं संवादों को भी संयोजित किया गया । दृश्‍य, स्‍थान आदि के बदलाव के बारे में पात्र स्‍वयं बता देते हैं ।

माच, मध्‍य प्रदेश का पारंपरिक नाट्य है । ‘माच’ शब्‍द मंच और खेल दोनों अर्थों में इस्‍तेमाल किया जाता है । माच में पद्य की अधिकता होती है । इसके संवादों को बोल तथा छंद योजना को वणग कहते हैं । इसकी धुनों को रंगत के नाम से जाना जाता है ।

भाओना, असम के अंकिआ नाट की प्रस्‍तुति है । इस शैली में असम, बंगाल, उड़ीसा, वृंदावन-मथुरा आदि की सांस्‍कृतिक झलक मिलती है । इसका सूत्रधार दो भाषाओं में अपने को प्रकट करता है- पहले संस्‍कृत, बाद में ब्रजबोली अथवा असमिया में ।

तमाशा महाराष्‍ट्र की पारंपरिक नाट्यशैली है । इसके पूर्ववर्ती रूप गोंधल, जागरण व कीर्तन रहे होंगे । तमाशा लोकनाट्य में नृत्‍य क्रिया की प्रमुख प्रतिपादिका स्‍त्री कलाकार होती है । वह ‘मुरकी’ के नाम से जानी जाती है । नृत्‍य के माध्‍यम से शास्‍त्रीय संगीत, वैद्युतिक गति के पदचाप, विविध मुद्राओं द्वारा सभी भावनाएं दर्शाई जा सकती हैं ।

दशावतार कोंकण व गोवा क्षेत्र का अत्‍यंत विकसित नाट्य रूप है । प्रस्‍तोता पालन व सृजन के देवता-भगवान विष्‍णु के दस अवतारों को प्रस्‍तुत करते हैं । दस अवतार हैं- मत्‍स्‍य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्‍ण (या बलराम), बुद्ध व कल्कि । शैलीगत साजसिंगार से परे दशावतार का प्रदर्शन करने वाले लकड़ी व पेपरमेशे का मुखौटा पहनते हैं ।

केरल का लोकनाट्य कृष्‍णाट्टम 17वीं शताब्‍दी के मध्‍य कालीकट के महाराज मनवेदा के शासन के अधीन अस्तित्‍व में आया । कृष्‍णाट्टम आठ नाटकों का वृत्‍त है, जो क्रमागत रुप में आठ दिन प्रस्‍तुत किया जाता है । नाटक हैं-अवतारम्, कालियमर्दन, रासक्रीड़ा, कंसवधाम् स्‍वयंवरम्, वाणयुद्धम्, विविधविधम्, स्‍वर्गारोहण । वृत्‍तांत भगवान कृष्‍ण को थीम पर आधारित हैं- श्रीकृष्‍ण जन्‍म, बाल्‍यकाल तथा बुराई पर अच्‍छाई के विजय को चित्रित करते विविध कार्य ।

केरल के पारंपरिक लोकनाट्य मुडियेट्टु का उत्‍सव वृश्चिकम् (नवम्‍बर-दिसम्‍बर) मास में मनाया जाता है । यह प्राय: देवी के सम्‍मान में केरल के केवल काली मंदिरों में प्रदर्शित किया जाता है । यह असुर दारिका पर देवी भद्रकाली की विजय को चित्रित करता है । गहरे साज-सिंगार के आधार पर सात चरित्रों का निरूपण होता है- शिव, नारद, दारिका, दानवेन्‍द्र, भद्रकाली, कूलि, कोइम्बिदार (नंदिकेश्‍वर) ।

कुटियाट्टम, जो कि केरल का सर्वाधिक प्राचीन पारंपरिक लोक नाट्य रुप है, संस्‍कृत नाटकों की परंपरा पर आधारित है । इसमें ये चरित्र होते हैं- चाक्‍यार या अभिनेता, नांब्‍यार या वादक तथा नांग्‍यार या स्‍त्रीपात्र । सूत्रधार और विदूषक भभ्‍ कुटियाट्टम् के विशेष पात्र हैं । सिर्फ विदूषक को ही बोलने की स्‍वंतत्रता है । हस्‍तमुद्राओं तथा आंखों के संचलन पर बल देने के कारण यह नृत्‍य एवं नाट्य रूप विशिष्‍ट बन जाता है ।

कर्नाटक का पारंपरिक नाट्य रूप यक्षगान मिथकीय कथाओं तथा पुराणों पर आधारित है । मुख्‍य लोकप्रिय कथानक, जो महाभारत से लिये गये हैं, इस प्रकार हैं : द्रौपदी स्‍वयंवर, सुभद्रा विवाह, अभिमन्‍युवध, कर्ण-अर्जुन युद्ध तथा रामायण के कथानक हैं : वलकुश युद्ध, बालिसुग्रीव युद्ध और पंचवटी ।

तमिलनाडु की पारंपरिक लोकनाट्य कलाओं में तेरुक्‍कुत्‍तु अत्‍यंत जनप्रिय माना जाता है । इसका सामान्‍य शाब्दिक अर्थ है- सड़क पर किया जाने वाला नाट्य । यह मुख्‍यत: मारियम्‍मन और द्रोपदी अम्‍मा के वार्षिक मंदिर उत्‍सव के समय प्रस्‍तुत किया जाता है । इस प्रकार, तेरुक्‍कुत्‍तु के माध्‍यम से संतान की प्राप्ति और अच्‍छी फसल के लिए दोनों देवियों की आराधना की जाती है । तेरुक्‍कुत्‍तु के विस्‍तृत विषय-वस्‍तु के रुप में मूलत: द्रौपदी के जीवन-चरित्र से सम्‍बंधित आठ नाटकों का यह चक्र होता है । काट्टियकारन सूत्रधार की भूमिका निभाते हुए नाटक का परिचय देता है तथा अपने मसखरेपन से श्रोताओं का मनोरंजन करता है ।

साभार- संस्कृति मंत्रालय- भारत सरकार 

समाज की बात Samaj Ki  Baat

कृष्णधर शर्मा

 

बुधवार, 11 जून 2025

रामकथा-फादर कामिल बुल्के

 विस्तृत वैदिक साहित्य की बहुसंख्यक रचनाओं में जहाँ कहीं रामकथा के पात्रों के नाम मिलते हैं, उन सब स्थलों का उल्लेख और महत्त्वानुसार उनके प्रसंग का वर्णन प्रस्तुत अध्याय के पहले दो परिच्छेदों में किया गया है। सारी सामग्री का सिंहावलोकन करने पर वैदिक साहित्य और रामकथा के सम्बन्ध के विषय में हम किस निष्कर्ष पर पहुँच सकते हैं, इसका इस अन्तिम परिच्छेद में निर्णय करना है। 

ऋग्वेद में इक्ष्वाकु, दशरथ और राम, इन तीनों का एक-एक बार उल्लेख हुआ है। वे प्रभावशाली ऐतिहासिक राजा थे, इतना ही परिचय इन स्थलों से मिल सकता है। इनका पारस्परिक सम्बन्ध असम्भव नहीं है, लेकिन इसका कोई निर्देश नहीं मिलता। आगे चलकर इनका वैदिक साहित्य में और कहीं उल्लेख नहीं हुआ है। ऋग्वेद में सीता का भी एक बार उल्लेख हुआ है। लेकिन इस सीता का रामायण के उपर्युक्त अन्य ऐतिहासिक पात्रों से सम्बन्ध असम्भव ही है, क्योंकि उसका व्यक्तित्व ऐतिहासिक न होकर सीता अर्थात् लांगलपद्धति के मानवीकरण का परिणाम है। इस सीता का उल्लेख वैदिक काल के प्रारम्भ से लेकर अन्त तक बराबर होता रहा है। 

ब्राह्मणों से राम मार्गवय, राम औपतस्विनी तथा राम क्रातुजातेय इन तीनों का परिचय मिलता है। इनके ऐतिहासिक होने में संदेह नहीं किया जा सकता है, लेकिन उनका रामायण के राम से कोई भी सम्बन्ध संभव प्रतीत नहीं होता। 

ब्राह्मणों तथा प्राचीन उपनिषदों में अश्वपति और जनक का पहले पहल उल्लेख मिलता है। अश्वपति का रामायण के पात्रों से कोई सम्बन्ध निर्दिष्ट नहीं हुआ है। इतना ही प्रतीत होता है कि वे ऐतिहासिक राजा थे, जो सम्भवतः जनक के समकालीन थे। ब्राह्मणों के जनक और रामायणीय जनक की अभिन्नता की समस्या का निर्णय करना असम्भव प्रतीत होता है। इसका उल्लेख ऊपर हो चुका है। रामायण का रचयिता सीता के पिता जनक का प्रसिद्ध वैदिक जनक से सम्बन्ध जोड़ता है, यह स्पष्ट है और स्वाभाविक भी है। लेकिन इस अभिन्नता के लिए वैदिक साहित्य से कोई प्रमाण नहीं निकाला जा सकता। जनक के सारे वृत्तांत में रामकथा का कोई भी संकेत विद्यमान नहीं है।

 इस तरह हम देखते हैं कि वैदिक रचनाओं में रामायण के एकाध पात्रों के नाम अवश्य मिलते हैं, लेकिन न तो इसके पारस्परिक सम्बन्ध की कोई सूचना दी गई है और न इनके विषय में रामायण की कथावस्तु का किंचित् भी निर्देश किया गया है। जनक और सीता का बार-बार उल्लेख होने पर भी दोनों का पिता-पुत्री-सम्बन्ध कहीं भी निर्दिष्ट नहीं हुआ है। अतः वैदिक काल में रामायण की रचना हुई थी अथवा रामकथा सम्बन्धी गाथाएँ प्रसिद्ध हो चुकी थीं, इसका निर्देश समस्त विस्तृत वैदिक साहित्य में कहीं भी नहीं पाया जाता। अनेक ऐतिहासिक व्यक्तियों के नाम रामायण के पात्रों के नामों से मिलते हैं; इससे इतना ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ये नाम प्राचीनकाल में भी प्रचलित थे। (रामकथा-फादर कामिल बुल्के)




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बुधवार, 23 अप्रैल 2025

किस्सा अटलजी का : 20 साल पहले धोती गिफ्ट करने वाले को पलभर में पहचान लिया

 

अटल बिहारी बाजपेयी, भारतीय राजनीति की एक ऐसी शख्सियत, जहां से राजनीति की नैतिकता की शुरूआत होती है। अटलजी का व्यक्तित्व हमेशा विराट रहा, उनके इरादे बुलंद रहे, संघर्षों में तपकर वह कुंदन बने, उनकी भाषाशैली का विपक्ष भी कायल रहा और उनके तीखे और कटाक्ष भरे भाषणों से विपक्ष हमेशा आहत होता भी रहा, लेकिन इन सब बातों से अलग अटलजी का सादगीभरा अंदाज भी उनके व्यक्तित्व की विशिष्ट पहचान है।

अटलजी की जन्मस्थली होने का गौरव ग्वालियर को प्राप्त है। इसके साथ ही प्रदेश के मालवा प्रांत का भी अटलजी से गहरा संबंध रहा है। प्रभास प्रकाशन की बुकमै अटल बिहारी बाजपेयी बोल रहा हूंमें अटलजी ने कहा किजब मैं पहली बार भाषण देने के खड़ा हुआ तथा उस वक्त मैं बड़नगर में था। वहां पर मेरे पिताजी हेडमास्टर थे। वार्षिकोत्सव का अवसर था और मैं बगैर तैयारी के मंच पर खड़ा हो गया। बीच में मैं लड़खड़ा गया इसलिए भाषण को बीच में ही बंद कर स्टेज को छोड़ना पड़ा। उस वक्त मैं पांचवी क्लास में था और मैने इस वाकये को गंभीरता से नहीं लिया।

अटलजी को दी पुरानी की जगह नई धोती -

ऐसा ही एक दिल को छू जाने वाला वाकया उज्जैन से 40 किलोमीटर दूर तराना कस्बे में हुआ था। यह वह समय था जब संघ अपनी पहचान बनाने के दौर से गुजर रहा था। अटलबिहारी बाजपेयी संघ के त्याग, तपस्या और आदर्शों की भट्टी में तपकर एक आदर्श स्वयंसेवक बने थे। यह 1960 की बात है जब संघ प्रचारक बनकर संघ के किसी काम के सिलसिले में वे तराना गए हुए थे। उस वक्त संघ प्रचारक किसी उचित जगह की तलाश कर वहां पर अपनी दिनचर्या व्यतीत करते थे। क्योंकि संघ कार्यालय के भवन उस समय बड़े नगरों में भी नहीं थे। ऐसे में तराना जैसे छोटे कस्बे में जाकर अटलजी ने अपना ठिकाना वहां के प्राचीन द्वारकाधीश मंदिर जिसको कुंड का द्वारकाधीश मंदिर के नाम से भी जाना जाता है, को बनाया।

अटलजी ने द्वारकाधीश मंदिर तराना में गुजारी थी रात -

इसके बात की दिलचस्प और आदर्शवादी कहानी को नगर के संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता और भाजपा के वरिष्ठ नेता ओमप्रकाश पलोड़ ने बताई। द्वारकाधीश मंदिर में रात गुजारने के बाद अटलजी सुबह स्नान और भोजन करने के लिए मदनलाल रेटीवाले के आमंत्रण पर उनके घर पहुंचे। मदनलाल रेटीवाले के यहां पर जब वह स्नान के लिए बाथरुम में गए तो अपनी धोती उतार कर बाहर खूंटी पर टांग गए।

मदनलालजी ने जब अटलजी की धोती को देखा तो वह कई जगहों से फटी हुई थी और उसमे बेतरतीब तरीके से पैबंद लगे हुए थे। चूंकि मदनलालजी भी संघ के समर्पित कार्यकर्ता थे इसलिए उनको यह नागवार गुजरा कि संघ का कोई प्रचारक इस हालत में उनके घर से विदाई ले। वह कपड़े के कारोबारी भी थे, इसलिए उन्होने तुरंत अपनी दुकान से बेहतरीन एवन ब्रांड की धोती मंगवाई और फटी हुई पैबंद लगी धोती की जगह नई धोती टांग दी।

दो धोती लेने से कर दिया था इंकार -

अटलजी जब स्नान कर बाहर निकले तो उन्होने अपनी पुरानी धोती के बारे में पूछा कि ’ वह कहां है? ‘ तब मदनलालजी ने कहा कि ‘ आपकी धोती फट गई थी इसलिए उसकी जगह मैने नई धोती मंगवा दी है। ‘ अटलजी ने तराना की इस भेंट को सहर्ष स्वीकार कर लिया। अटलजी जब खाना खाने के बाद मदनलालजी के घर से प्रस्थान करने लगे तो उनको अपना कपड़े का झोला कुछ भारी लगा।

तब उन्होंने उस झोले में देखा तो एक और उम्दा किस्म की धोती झोले में रखी हुई थी। उन्होने कहा कि ‘ यह क्या है ? ‘ तब मदनलालजी ने कहा कि ‘ दूसरी धोती भी आपके लिए है आप इसको बदल कर पहनते रहना ‘, लेकिन आदर्शवादी अटलजी ने दूसरी धोती को लेने से साफ इंकार कर दिया और कहा कि ‘ दूसरी धोती की जरूरत नहीं है और जब जरूरत होगी तो जहां पर रहूंगा वहां के संघ कार्यकर्ता इंतजाम कर देंगे।‘

20 साल बाद भी पहचान लिया धोती गिफ्ट करने वाले को -

इस बात को लंबा अरसा हो गया। इसके 20 साल बाद जब उज्जैन से जनसंघ के वरिष्ठ नेता सत्यनारायण जटिया ने जब राजनीति में पदार्पण करते हुए अपना पहला चुनाव लड़ा तो। अटलजी उनके प्रचार के लिए बतौर नेता जनसंघ उज्जैन पधारे। क्षीरसागर में अटलजी की सभा का आयोजन किया गया। उस वक्त मंच पर अटलजी के स्वागत के लिए मदनलाल रेटीवाले हार पहनाने गए तो 20 साल बाद अटलजी ने उनको पहचान लिया और उनके दोनों हाथ पकड़कर कहा कि ' आप वही एवन ब्रांड धोतीवाले मदनलालजी हो न ?’ इस तरह अटलजी ने अपने मुफलिसी के दिनों में भी अपने आदर्शवाद को कायम रखा साथ ही तराना के मदलालजी रेटीवाले की धोती के प्रसंग को भी वह कभी नहीं भूले।

योगेंद्र शर्मा (साभार- नई दुनिया)

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